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वसंत ऋतुचर्या: मार्च-अप्रैल में शरीर का 'नेचुरल डिटॉक्स' कैसे करें?

  वसंत ऋतुचर्या: मार्च-अप्रैल में शरीर का 'नेचुरल डिटॉक्स' कैसे करें? ​ऋतुचर्या का अर्थ है प्रकृति की लय के साथ तालमेल बिठाना। आयुर्वेद के अनुसार, जैसे मौसम बदलता है, वैसे ही हमारे शरीर के आंतरिक दोषों ( वात, पित्त और कफ ) का संतुलन भी बदलता है। मार्च और अप्रैल का समय 'ऋतु संधि' का काल होता है, जहाँ सर्दियों की विदाई और गर्मियों का आगमन होता है। इसी बदलाव के समय यदि हम अपनी जीवनशैली नहीं बदलते, तो बीमारियाँ हमें घेर लेती हैं। ​वसंत में क्यों बिगड़ती है सेहत? ​सर्दियों के दौरान हमारे शरीर में कफ जमा (संचय) होता है। जैसे ही वसंत की धूप तेज होती है, यह जमा हुआ कफ पिघलने लगता है, जिससे शरीर में 'कफ का प्रकोप' हो जाता है। यही कारण है कि इस मौसम में सुस्ती, भारीपन और एलर्जी जैसी समस्याएँ बढ़ जाती हैं। ​कफ बढ़ने के मुख्य संकेत: ​ पाचन की समस्या: भूख न लगना और खाया हुआ भोजन भारी महसूस होना। ​ श्वसन संबंधी रोग: बार-बार सर्दी-जुकाम, खांसी या अस्थमा का बढ़ना। ​ मानसिक स्थिति: जरूरत से ज्यादा नींद आना, आलस और काम में मन न लगना। ​ त्वचा: खुजली या छोटे-छोटे दानों ...