बुधवार, 19 फ़रवरी 2025

कर्मचण्डाल

 *कन्या के पिता से धन लेकर विवाह करनेवाले को "कर्मचण्डाल" कहते हैं।* 

    *स्कन्दपुराण के, रेवाखण्ड के,50 वें ,अध्याय के, 30 वें,33 वें 34 वें और 35 वें श्लोक में,कन्यादान के महत्त्व के साथ साथ, कन्यादान के साथ साथ,कन्या के पिता से धन की याचना करनेवाले की "कर्मचण्डाल" संज्ञा देते हुए, उनके यहां भोजन करने तक का निषेध करते हुए, भगवान शिव ने, महाराज उत्तानपाद से कहा कि -* 


 *सर्वेषामेव दानानां,कन्यादानं विशिष्यते।* 

 *यो दद्यात् परया भक्त्याभिगम्य तनयां निजाम्।।30।।* 


 *भगवान शिव ने कहा कि - हे राजन्! किसी धर्मात्मा का सत्कर्म करते रहना,दान देना, परोपकार करना आदि परमधर्म है।* 

 *धर्म पालन के कारण ही तो, मनुष्य को "धर्मात्मा,धर्मज्ञ, धर्मपालक" आदि शब्दों से उसके गुणों को जाना जाता है।* 


 *सर्वेषामेव दानानां कन्यादानं विशिष्यते।* 

     सभी प्रकार के दानों में, कन्यादान, विशिष्ट दान है। कन्यादान से ही,कुल गोत्र की रक्षा होती है। कुल वृद्धि होती है। माता पिता के पुत्र उत्पत्ति की सार्थकता होती है। यदि किसी गृहस्थ के, पुत्र का विवाह ही नहीं हो,उसको कोई कन्यादान ही न करे, तो उस वंश का उच्छेदन हो जाता है।

वंश की समाप्ति से रक्षा करनेवाला,कन्यापिता, श्रेष्ठ होता है। पुत्र के पिता से,कन्या पिता श्रेष्ठ होता है। क्यों कि - दान देनेवाला ही श्रेष्ठ होता है। दानग्रहीता पुरुष, श्रेष्ठ नहीं होता है।

कन्या के पिता को,कुलीन,सुशील,समान आयु वाले,गुणवाले, बुद्धिमान व्यक्ति को,अच्छे लग्न मुहूर्त में,कन्या दान करना चाहिए।

 

*यो दद्यात् परया भक्त्याभिगम्य तनयां निजाम्।।* 

    कन्या के पिता को,ऐसी भावना करना चाहिए कि - भगवान ने,किसी अच्छे कुलीन वंश की रक्षा के लिए,मुझे कन्या प्रदान की है। ऐसी परा भक्ति से युक्त होकर कन्यादान करना चाहिए। 

अब 33 वें श्लोक में, *"कन्यादान"* का माहात्म्य देखिए!

 

*येनात्र दुहिता दत्ता प्राणेभ्योऽपि गरीयसी।* 

 *तेन सर्वमिदं दत्तं त्रैलोक्यं सचराचरम्।।33।।* 

       भगवान शिव ने कहा कि - हे उत्तानपाद! कन्या का पिता,जब अपनी प्राणों से भी अधिक प्रियतमा कन्या का दान,किसी पुरुष को करता है,तो उसने क्या दान नहीं कर दिया।

 *अर्थात - सर्वस्व दान कर दिया।*             


 *"प्राणेभ्योऽपि गरीयसी" अर्थात प्राणों से भी अधिक,गरीयसी अर्थात प्रिय।* 

माता पिता के यहां,जब कन्या का जन्म होता है तो,पिता को,कन्या ही, पुत्र से अधिक प्रिय होती है। 

 *कन्यादान लेनेवाले, पुरुष को,कन्या के माता पिता की इस सद्भावना को समझना चाहिए।* 

 

*तेन सर्वमिदं दत्तम्।* 

****************

जिन माता पिता ने, कन्यादान किया है,समझिए कि - *उसने "सर्वं दत्तम्",* सबकुछ दान कर दिया है। सर्वस्वदान ही कन्यादान है,तथा कन्यादान ही सर्वदान है। 

 

*त्रैलोक्यं सचराचरम्।* 

*****************

जो शरीरधारी हैं,उनको चर शब्द से कहा जाता। वस्तुओं को अचर कहा जाता है। जिसने अपनी कन्या का दान किया है,समझिए कि - उसने तीनों लोकों का सम्पूर्ण दान कर दिया है।

अति आत्मीयता से पालित पोषित,शील,सदाचार आदि गुणों से युक्त कन्या का दान सर्वस्वदान है।

माता पिता,कन्या के धर्म और शरीर, दोनों के सतर्क प्रहरी हैं। शिक्षा और सद्गुणों के दाता गुरु हैं। जन्मदाता पालक जनक हैं। 

 *कन्यादान गृहीता पुरुष को,कन्यापिता की सद्भावना का, तथा उनकी आत्मीयता का, और कन्यादान के महत्त्व का आत्मबोध करना चाहिए।* 


जो पुरुष,कन्या के माता पिता की, सेवा भावना को नहीं समझते हैं,तथा कन्यादान का माहात्म्य नहीं समझते हैं,ऐसे लोभी स्त्री पुरुषों की निंदा करते हुए, उनको दोषयुक्त बताते हुए, 34 वें श्लोक भगवान शिव ने कहा कि -


 *य:कन्यार्थं धनं लब्ध्वा भिक्षते चैव तद्धनम्।* 

 *स भवेत् कर्मचाण्डाल:काष्ठकीलो भवेन्मृत:।34।।* 

भगवान शिव ने कहा कि - हे राजन! जो पुरुष,या पुरुष के माता पिता,कन्या के साथ साथ, कन्या के पिता से,धन की याचना करते हैं,उनको "कर्मचण्डाल" शब्द से कहा जाता है।

 

*भिक्षते चैव तद्धनम्।।* 

 *भिक्षते अर्थात मांगता है। याचना करता है।* 

पुरुष या पुरुष के माता पिता,जब किसी कन्या के पिता से कहते हैं कि - *"इतना धन देंगे,तो हम विवाह करेंगे"* ऐसा कहनेवाले को *"भिक्षुक"* शब्द से कहना चाहिए था। 

 *किन्तु,वह तो भिक्षुक से भी पतित व्यक्ति है।* 

इसीलिए, भगवान शिव ने कहा कि -

 *स भवेत् कर्मचाण्डाल:।* 

 *कन्या के पिता से धन लेकर,कन्या को स्वीकार करनेवाला"कर्मचण्डाल" कहा जाता है।* 

 *जिस व्यक्ति के किए गए,किसी भी कर्म को,देवता और पितरगण, स्वीकार नहीं करते हैं,ऐसे व्यक्ति को* *"कर्मचण्डाल* शब्द से कहा जाता है।

धन लेकर कन्यादान स्वीकार करनेवाले परिवार के द्वारा किए गए,किसी भी श्राद्ध ,यज्ञ, दान, तप, हवन आदि सत्कर्म को देवता और पितर ग्रहण नहीं करते हैं। ये बहुत अधिक दोष है। 


अब 35 वें श्लोक में, आचार्यों को भी ऐसे गृहस्थों के यहां भोजन का निषेध करते हुए भगवान शिव ने कहा कि - 

 *गृहेऽपि तस्य योऽश्नीयात् जिह्वालौल्यात् कथञ्चन।* 

 *चान्द्रायणेन शुद्ध्येत तप्तकृच्छ्रेण वा पुनः।।35।।* 


 *गृहेऽपि तस्य योऽश्नीयात्।* 

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धन लेकर कन्या लेनेवाले घर में आचार्यो को भोजन नहीं करना चाहिए। *यदि, कोई व्यक्ति या आचार्य भोजन कर भी लेता है तो, उनका धनदोष का फल, भोजन करनेवाले को भी भोगना पड़ता है।* 

 *जिह्वा लौल्यात् कथञ्चन।* 

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 *कथंचन अर्थात यदि कभी जैसे तैसे।* *जिह्वालौल्यात् अर्थात जिह्वा के चंचलता के कारण,* स्वादिष्ट भोजन के लोभ से भी कोई,इनके यहां भोजन कर लेता है तो,उसको प्रायश्चित्त करना चाहिए। क्या प्रायश्चित्त है, तो सुनिए!


 *चान्द्रायणेन शुद्ध्येत।।* 

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 *जो सभी व्रतों में अतिक्लिष्ट चांद्रायण व्रत है। इस व्रत करके ही भोजन करनेवाला, शुद्ध होता है।* 

यदि चांद्रायण व्रत नहीं कर सकते हैं तो ---

 *तप्तकृच्छ्रेण वा पुनः!* 

 *भोजन करनेवाले को "तप्तकृच्छ्र" अर्थात घोर तप जप करना होगा,तब भोजनकर्ता शुद्ध होगा।* 

 *कर्मचण्डाल का अन्न खानेवाले के पितर और देवता भी पूजा श्राद्ध आदि स्वीकार नहीं करते हैं।* 

आजकल, स्त्री पुरुष पूछते हैं कि - हमारी पूजा उपासना का फल क्यों नहीं मिलता है? अरे भाई! अपने दोषों को तो देखिए! कोई न कोई अवश्य ही दोष होगा। निज दोषों के कारण ही, सत्कर्म का फल प्राप्त नहीं होता है। मंत्र और विधि, शास्त्र वेद पुराण असत्य नहीं होते हैं। न ही इनमें कोई दोष हैं।


 *मनुष्य,अपने दोषों के कारण ही दुखी होता है। अधिक लोभ, अधिक मोह,तथा अधिक काम क्रोध ही तो दुखदायी हैं।* 

 *धर्म से ही इन दोषों का नियन्त्रण होता है। अन्य कोई उपाय नहीं है।* 

 *दहेज लेना तो,कन्या के भ्राता का अंश तथा कन्या के माता पिता का अंश लेना है।* 

 *दहेज लोभी लोग कन्या के पिता से इतना अधिक धन ले लेते हैं कि - उसके शेष पुत्र पुत्री की व्यवस्था में अव्यवस्था हो जाती है। किसी को कष्ट देकर धन लेनेवाले सुखी कैसे हो सकते हैं!* 

प्रतिलिपी💐




  नारायण

🪷🌷🪷

                        🚩 हर हर महादेव 🚩

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2025

सुख सौभाग्य दायक शिव पूजन के मंत्र एवं अभिषेक विधि

 सुख सौभाग्य दायक शिव पूजन के मंत्र एवं अभिषेक विधि

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शिव पुराण संहिता में कहा है कि सर्वज्ञ शिव ने संपूर्ण देहधारियों के सारे मनोरथों की सिद्धि के लिए इस 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का प्रतिपादन किया है। यह आदि षड़क्षर मंत्र संपूर्ण विद्याओं का बीज है। जैसे वट बीज में महान वृक्ष छिपा हुआ है, उसी प्रकार अत्यंत सूक्ष्म होने पर भी यह मंत्र महान अर्थ से परिपूर्ण है।


भगवान शिव को नमस्कार करने का मंत्र

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नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शन्कराय च मयस्करय च नमः शिवाय च शिवतराय च।। ईशानः सर्वविध्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रम्हाधिपतिर्ब्रम्हणोधपतिर्ब्रम्हा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम।। तत्पुरषाय विद्म्हे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात।।


शनि या राहु आदि ग्रह पीड़ा शांति के लिए शिव गायत्री मंत्र 

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ॐ तत्पुरुषाय विद्महे। महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात।।


महामृत्युंजय प्रभावशाली मंत्र

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ॐ ह्रौं जूं सः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। सः जूं ह्रौं ॐ ॥


इस मंत्र से शिव पूजा कर दूर करें पैसों की परेशानी 

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मन्दारमालाङ्कुलितालकायै कपालमालांकितशेखराय।

दिव्याम्बरायै च दिगम्बराय नम: शिवायै च नम: शिवाय।।

श्री अखण्डानन्दबोधाय शोकसन्तापहा​रिणे।

सच्चिदानन्दस्वरूपाय शंकराय नमो नम:॥


शास्त्रों में मनोरथ पूर्ति व संकट मुक्ति के लिए अलग-अलग तरह की धारा से शिव का अभिषेक करना शुभ बताया गया है। अलग-अलग धाराओं से शिव अभिषेक का फल- जब किसी का मन बेचैन हो, निराशा से भरा हो, परिवार में कलह हो रहा हो, अनचाहे दु:ख और कष्ट मिल रहे हो तब शिव लिंग पर दूध की धारा चढ़ाना सबसे अच्छा उपाय है। इसमें भी शिव मंत्रों का उच्चारण करते रहना चाहिए।


👉 वंश की वृद्धि के लिए शिवलिंग पर शिव सहस्त्रनाम बोलकर घी की धारा अर्पित करें।


👉 शिव पर जलधारा से अभिषेक मन की शांति के लिए श्रेष्ठ मानी गई है।


👉 भौतिक सुखों को पाने के लिए इत्र की धारा से शिवलिंग का अभिषेक करें।


👉 बीमारियों से छुटकारे के लिए शहद की धारा से शिव पूजा करें।


👉 गन्ने के रस की धारा से अभिषेक करने पर हर सुख और आनंद मिलता है।


👉 सभी धाराओं से श्रेष्ठ है गंगाजल की धारा। शिव को गंगाधर कहा जाता है। शिव को गंगा की धार बहुत प्रिय है। गंगा जल से शिव अभिषेक करने पर चारों पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है। इससे अभिषेक करते समय महामृत्युंजय मन्त्र जरुर बोलना चाहिए।


शिव पंचाक्षर स्त्रोत

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नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागाय महेश्वराय|

नित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मे "न" काराय नमः शिवायः॥


हे महेश्वर! आप नागराज को हार स्वरूप धारण करने वाले हैं। हे (तीन नेत्रों वाले) त्रिलोचन आप भष्म से अलंकृत, नित्य (अनादि एवं अनंत) एवं शुद्ध हैं। अम्बर को वस्त्र सामान धारण करने वाले दिग्म्बर शिव, आपके न् अक्षर द्वारा जाने वाले स्वरूप को नमस्कार।


मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय।

मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मे "म" काराय नमः शिवायः॥


चन्दन से अलंकृत, एवं गंगा की धारा द्वारा शोभायमान नन्दीश्वर एवं प्रमथनाथ के स्वामी महेश्वर आप सदा मन्दार पर्वत एवं बहुदा अन्य स्रोतों से प्राप्त्य पुष्पों द्वारा पुजित हैं। हे म् स्वरूप धारी शिव, आपको नमन है।


शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।

श्री नीलकंठाय वृषभद्धजाय तस्मै "शि" काराय नमः शिवायः॥


हे धर्म ध्वज धारी, नीलकण्ठ, शि अक्षर द्वारा जाने जाने वाले महाप्रभु, आपने ही दक्ष के दम्भ यज्ञ का विनाश किया था। माँ गौरी के कमल मुख को सूर्य सामान तेज प्रदान करने वाले शिव, आपको नमस्कार है।


वषिष्ठ कुभोदव गौतमाय मुनींद्र देवार्चित शेखराय।

चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय तस्मै "व" काराय नमः शिवायः॥


देवगणो एवं वषिष्ठ, अगस्त्य, गौतम आदि मुनियों द्वार पुजित देवाधिदेव! सूर्य, चन्द्रमा एवं अग्नि आपके तीन नेत्र सामन हैं। हे शिव आपके व् अक्षर द्वारा विदित स्वरूप कोअ नमस्कार है।


यज्ञस्वरूपाय जटाधराय पिनाकस्ताय सनातनाय|

दिव्याय देवाय दिगंबराय तस्मै "य" काराय नमः शिवायः॥


हे यज्ञस्वरूप, जटाधारी शिव आप आदि, मध्य एवं अंत रहित सनातन हैं। हे दिव्य अम्बर धारी शिव आपके शि अक्षर द्वारा जाने जाने वाले स्वरूप को नमस्कार है।


पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेत शिव सन्निधौ|

शिवलोकं वाप्नोति शिवेन सह मोदते॥


जो कोई शिव के इस पंचाक्षर मंत्र का नित्य ध्यान करता है वह शिव के पून्य लोक को प्राप्त करता है तथा शिव के साथ सुख पुर्वक निवास करता है।


लिंगाष्टकम

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ब्रह्ममुरारिसुरार्चित लिगं निर्मलभाषितशोभित लिंग |

जन्मजदुःखविनाशक लिंग तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥


मैं उन सदाशिव लिंग को प्रणाम करता हूँ जिनकी ब्रह्मा, विष्णु एवं देवताओं द्वारा अर्चना की जाति है, जो सदैव निर्मल भाषाओं द्वारा पुजित हैं तथा जो लिंग जन्म-मृत्यू के चक्र का विनाश करता है (मोक्ष प्रदान करता है)


देवमुनिप्रवरार्चित लिंगं, कामदहं करुणाकर लिंगं|

रावणदर्पविनाशन लिंगं तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥


देवताओं और मुनियों द्वारा पुजित लिंग, जो काम का दमन करता है तथा करूणामयं शिव का स्वरूप है, जिसने रावण के अभिमान का भी नाश किया, उन सदाशिव लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।


सर्वसुगंन्धिसुलेपित लिंगं, बुद्धिविवर्धनकारण लिंगं।

सिद्धसुरासुरवन्दित लिंगं, तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥


सभी प्रकार के सुगंधित पदार्थों द्वारा सुलेपित लिंग, जो कि बुद्धि का विकास करने वाल है तथा, सिद्ध- सुर (देवताओं) एवं असुरों सबों के लिए वन्दित है, उन सदाशिव लिंक को प्रणाम।


कनकमहामणिभूषित लिंगं, फणिपतिवेष्टितशोभित लिंगं।

दक्षसुयज्ञविनाशन लिंगं, 

तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥


स्वर्ण एवं महामणियों से विभूषित, एवं सर्पों के स्वामी से शोभित सदाशिव लिंग जो कि दक्ष के यज्ञ का विनाश करने वाल है ; आपको प्रणाम।


कुंकुमचंदनलेपित लिंगं,

पंङ्कजहारसुशोभित लिंगं।

संञ्चितपापविनाशिन लिंगं, 

तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥


कुंकुम एवं चन्दन से शोभायमान, कमल हार से शोभायमान सदाशिव लिंग जो कि सारे संञ्चित पापों से मुक्ति प्रदान करने वाला है, उन सदाशिव लिंग को प्रणाम।


देवगणार्चितसेवित लिंग, 

भवैर्भक्तिभिरेवच लिंगं।

दिनकरकोटिप्रभाकर लिंगं,

तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥


आप सदाशिव लिंग को प्रणाम जो कि सभी देवों एवं गणों द्वारा शुद्ध विचार एवं भावों द्वारा पुजित है तथा जो करोडों सूर्य सामान प्रकाशित हैं।


अष्टदलोपरिवेष्टित लिंगं, 

सर्वसमुद्भवकारण लिंगं|

अष्टदरिद्रविनाशित लिंगं, 

तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥


आठों दलों में मान्य, एवं आठों प्रकार के दरिद्रता का नाश करने वाले सदाशिव लिंग सभी प्रकार के सृजन के परम कारण हैं आप सदाशिव लिंग को प्रणाम।


सुरगुरूसुरवरपूजित लिंगं, 

सुरवनपुष्पसदार्चित लिंगं।

परात्परं परमात्मक लिंगं, 

ततप्रणमामि सदाशिव लिंगं।।


दवताओं एवं देव गुरू द्वारा स्वर्ग के वाटिका के पुष्पों से पुजित परमात्मा स्वरूप जो कि सभी व्याख्याओं से परे है उन सदाशिव लिंग को प्रणाम।

सोमवार, 17 फ़रवरी 2025

तिरुपति बालाजी

 "तिरुपति बालाजी"

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 "कर्ज में डूबे भगवान"

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           एक बार भृगु ऋषि ने जानना चाहा कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कौन सबसे श्रेष्ठ है ? वह बारी-बारी से सबके पास गये। ब्रह्मा और महेश ने भृगु को पहचाना तक नही, न ही आदर किया। इसके बाद भृगु विष्णु के यहाँँ गये। विष्णु भगवान विश्राम कर रहे थे और माता लक्ष्मी उनके पैर दबा रही थी। भृगु ने पहुँचते ही न कुछ कहा, न सुना और भगवान विष्णु की छाती पर पैर से प्रहार कर दिया। लक्ष्मी जी यह सब देखकर चकित रह गयी किन्तु विष्णु भगवान ने भृगु का पैर पकडकर विनीत भाव से कहा ”मुनिवर ! आपके कोमल पैर में चोट लगी होगी। इसके लिए क्षमा करें।“


           लक्ष्मी जी को भगवान विष्णु की इस विन्रमता पर बड़ा क्रोध आया। वह भगवान विष्णु से नाराज होकर भू-लोक में आ गयीं तथा कोल्हापुर में रहने लगीं। लक्ष्मी जी के चले जाने से विष्णु भगवान को लगा कि उनका श्री और वैभव ही नष्ट हो गया और उनका मन बड़ा अशान्त रहने लगा। लक्ष्मी जी को ढूँढ़ने के लिए वह श्रीनिवास के नाम से भू-लोक आये। घूमते घुमाते वेंकटचल पर्वत क्षेत्र में बकुलामाई के आश्रम में पहुँचे। बकुलामाई ने उनकी बड़ी आवाभगत की। उन्हें आश्रम में ही रहने को कहा।


           एक दिन जंगल में एक मतवाला हाथी आ गया। आश्रमवासी डरकर इधर उधर भागने लगे। श्री निवास ने यह देखा तो धनुष बाण लेकर हाथी का पीछा किया। हाथी डरकर भागा और घने जंगल में अदृश्य हो गया। श्री निवास उसका पीछा करते-करते थक गये थे। वह एक सरोवर के किनारे वृक्ष की छाया में लेट गये और उन्हें हल्की सी झपकी आ गयी। थोड़ी देर में शोर सुनकर वह जागे तो देखा कि चार-छ युवतियाँ उन्हें घेरे खडी है। श्रीनिवास को जागा हुआ देखकर वे डपटकर बोली, “यह हमारी राजकुमारी पद्मावती का सुरक्षित उपवन है और यहाँँ पुरुषों का आना मना है। तुम यहाँ कैसे और क्यों आये हो ?”


           श्रीनिवास कुछ जवाब दे इससे पहले ही उनकी दृष्टि वृक्ष की ओट से झांकती राजकुमारी की ओर गयी। श्रीनिवास पद्मावती को एकटक देखते रह गये। थोडा संयत होकर कहा, “देवियों ! मुझे पता नही था, मैं शिकार का पीछा करता हुआ यहाँँ आया था। थक जाने पर मुझे नींद आ गयी इसलिए क्षमा करें।“ श्रीनिवास आश्रम में तो लौट आये किन्तु बड़े उदास रहने लगे। एक दिन बकुलामाई ने बड़े प्यार से उनकी उदासी का कारण पूछा तो श्रीनिवास ने पद्मावती से भेंट होने की सारी कहानी कह सुनाई फिर कहा, “उसके बिना मै नही रह सकता।“


           बकुलामाई बोली, “ऐसा सपना मत देखो। कहाँ वह प्रतापी चोल नरेश आकाशराज की बेटी और कहाँ तुम आश्रम में पलने वाले एक कुल गोत्रहीन युवक।” श्रीनिवास बोले, “माँ ! एक उपाय है तुम मेरा साथ दो तो सब सम्भव है।“ बकुलामाई ने श्रीनिवास का सच्चा प्यार देखकर हाँ कर दी। श्रीनिवास ज्योतिष जानने वाली औरत का वेश बनाकर राजा आकाश की राजधानी नारायणपुर पहुँचे। उसकी चर्चा सुन पद्मावती ने भी उस औरत को महल बुलाकर अपना हाथ दिखाया।


           राजकुमारी के हस्त रेखा देखकर वह बोली, “राजकुमारी ! कुछ दिन पहले तुम्हारी भेंट तुम्हारे सुरक्षित उद्यान में किसी युवक से हुयी थी। तुम दोनों की दृष्टि मिली थी। उसी युवक से तुम्हारी शादी का योग बनता है।” पद्मावती की माँ धरणा देवी ने पूछा, “यह कैसे हो सकता है ?” ज्योतिषी औरत बोली, “ऐसा ही योग है। ग्रह कहते है कोई औरत अपने बेटे के लिए आपकी बेटी माँगने स्वयं आयेगी।”


           दो दिन बाद सचमुच ही बकुलामाई एक तपस्विनी के वेश में राजमहल आयी। उसने अपने युवा बेटे के साथ पद्मावती के विवाह की चर्चा की। राजा आकाश में बकुलामाई को पहचान लिया। उन्होंने पूछा “वह युवक है कौन ?” बकुलामाई बोली, “उसका नाम श्री निवास है। वह चन्द्र वंश में पैदा हुआ है। मेरे आश्रम में रह रहा है। मुझे माँ की तरह मानता है।”


           राजा आकाश ने कुछ सोचकर उत्तर देने के लिए कहा। बकुलामाई के चले जाने पर आकाश ने राज पुरोहित को बुलाकर सारी बात बताई। राज पुरोहित ने गणना की। फिर सहमति देते हुए कहा, ”महाराज ! श्रीनिवास में विष्णु जैसा देवगुण है लक्ष्मी जैसी आपकी बेटी के लिए यह बड़ा सुयोग्य है।”


           राजा आकाश ने तुरन्त बकुलामाई के यहाँ अपनी स्वीकृति के साथ विवाह की लग्न पत्रिका भेज दी। बकुलामाई ने सुना तो वह चिंतित हो उठी। श्री निवास से बोली, “बेटा ! अब तक तो विवाह की ही चिंता थी। अब पैसे न होने की चिंता है। मैं वराहस्वामी के पास जाती हूँ। उनसे पूछती हूँ कि क्या किया जाए ?”


           बकुलामाई श्रीनिवास को लेकर वराहस्वामी के पास गयी और श्रीनिवास के विवाह के लिए धन की समस्या बताई तो वराह स्वामी ने आठों दिग्पालों, इन्द्र, कुबेर, ब्रह्मा, शंकर आदि देवताओ को अपने आश्रम में बुलवाया और फिर श्रीनिवास को बुलाकर कहा, “तुम स्वयं इन्हें अपनी समस्या बताओ।”


           श्रीनिवास ने देवताओ से कहा, “मैं चोल नरेश राजा आकाश की बेटी पद्मावती से विवाह करना चाहता हूँ। मेरी हैसियत राजा के अनुरूप नही है मेरे पास धन नही है, मै क्या करूँ ?”


           इन्द्र ने कुबेर से कहा, “कुबेर ! इस काम के लिए तुम श्रीनिवासन को ऋण दे दो।” कुबेर ने कहा, “ऋण तो दे दूँगा पर उसे यह वापस कब और कैसे करेंगे, इसका निर्णय होना चाहिये ?” श्रीनिवास बोले, “इसकी चिन्ता मत कीजिये। कलियुग के अन्त तक मैं सब ऋण चुका दूँगा।”


           कुबेर ने स्वीकार कर लिया। सब देवताओं की साक्षी में श्रीनिवास के ऋण पत्र लिख दिया। उस धन से श्री निवास और पद्मावती का विवाह बड़ी धूमधाम से हुआ। तभी नारद ने कोल्हापुर जाकर लक्ष्मी को बताया, “विष्णु ने श्रीनिवास के रूप में पद्मावती से विवाह कर लिया है। दोनों वेंकटाचलम् पर्वत पर रह रहे हैं।”


           यह सुनकर लक्ष्मी जी को बड़ा दुःख हुआ। वह सीधे वेंकटाचलम पहुँची। विष्णु जी की सेवा में लगी पद्मावती को भला बुरा कहने लगी, “श्रीनिवास ! विष्णु रूप मेरे पति हैं। तूने इनके साथ विवाह क्यों किया ?”


           दोनों ने वाक् युद्ध होने लगा तो श्री निवास को बड़ा दुःख हुआ। वे पीछे हटे और पत्थर की मूर्ति के रूप में बदल गये। जब दोनों देवियों ने यह देखा तो उन्हें बड़ा दुःख हुआ कि श्रीनिवास तो अब किसी के न रहे।


           इतने में शिला विग्रह से आवाज आयी, “देवियों मै इस स्थान पर वेंकटेश्वर स्वामी के नाम से, अपने भक्तों का अभीष्ट पूरा करता रहूँगा। उनसे प्राप्त चढावे के धन द्वारा कुबेर के कर्ज का ब्याज चुकाता रहूँगा इसलिए तुम दोनों मेरे लिए आपस में झगड़ा मत करो।”


           यह वाणी सुनते ही लक्ष्मी जी और पद्मावती दोनों ने सिर झुका लिया। लक्ष्मी कोल्हापुर आकर महालक्ष्मी के रूप में प्रतिष्ठित हो गयी और पद्मावती तिरुनाचुर में शिला विग्रह हो गयी। आज भी तिरुपति क्षेत्र में तिरुमला पहाडी पर भगवान वेंकटेश्वर स्वामी के दर्शन हेतु भक्तगणों से इसी भाव से शुल्क लिया जाता है। उनकी पूजा पुष्प मिष्टान आदि से न होकर धन द्रव्य से होती है। इसी धन से भगवान श्री कृष्ण वेंकटेश्वर स्वामी कुबेर का कर्ज चुका रहे है।                    


                    "जय जय श्री राधे"

पितृपक्ष में परान्न से बचें

 गरुड़ पुराणोक्त पितृपक्ष परान्न निषेध कथा सनातन धर्म में 16 दिनों का पितृपक्ष वर्ष का सबसे सूक्ष्म और संवेदनशील समय माना गया है। गरुड़ पुरा...