सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

श्री राधा लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

राधे कृष्ण की प्रेम लीला

राधे कृष्ण की प्रेम लीला 🍁🍁🍁🍁 . एक बार बरसाने में एक वृजबासी के बेटे की शादी हुई, वो वृजबसिन् ने सबको बुलाया पर राधा रानी को न्योता देना भूल गयी । . उसको शादी के पहले याद था  पर शादी के समय ही भूल गयी। . जब शादी हो गयी और बहु घर मे आ गयी तब उसको याद आया , हाय रे  राधा रानी को बुलाना तो भूल गयी। . तब वो राधा रानी के पास गयी बोली राधा रानी माफ़ कर दो आपको बुलाना तो भूल गयी मैं। . राधा रानी बोली कोई बात नहीं भूल गयी तो पर आपने मुझे अपने दिल में तो रखा यही मेरे लिए बहुत सौभाग्य की बात है। . कितनी उदार है राधा रानी कितनी करुणा शील है . राधा रानी बोली नयी नवेली बहु कैसी है ? . वृजबसिन् बोली अभी अपनी नयी बहु को बुला के लाती हुँ। . जब राधारानी से मिलने गयी थी तो अपनी बहु की रखवाली के लिए वो एक सखी को साथ छोड के गयीं थी बहु के पास। . वृज वासिन के आने से पहले ठाकुर जी उसके घर गये और  हमारे ठाकुर जी तो है ही शरारती । तो उन्होने दुल्हन का श्रृंगार करके बहु को सुला दिया और खुद बहु बनके घुंघट ओढ़ कर बैठ गए। . वृजबसिन् जल्दी घर मे आई और बोली बहु से : राधा रा...

श्री राधा जी के सोलह नाम

श्री राधा के सोलह नाम राधा रासेस्वरी रासवासिनी रसिकेश्वरी। कृष्णप्राणाधिका कृष्णप्रियाव् कृष्णस्वरूपिणी॥ कृष्णवामांगसम्भूता परमानन्दरूपिणी। कृष्णा वृन्दावनी वृन्दा वृन्दावनविनोदिनी॥ चन्द्रावली चन्द्रकान्ता शरच्चन्द्रप्रभानना। नामान्येतानि साराणि तेषामभ्यन्तराणि च॥ (ब्रह्मवैवर्त पुराण, श्रीकृष्ण जन्म खण्ड, १७। २२०-२२२) श्री राधा के इन सोलह नामों की व्याख्या स्वयं भगवान नारायण ने नारदजी को बताया था जो कि इस प्रकार है– १. राधा–ये निर्वाण (मोक्ष) प्रदान करने वाली हैं। २. रासेस्वरी–रासेश्वर की प्राणप्रिया हैं, अत: रासेश्वरी हैं। ३. रासवासिनी–रासमण्डल में निवास करने वाली हैं। ४. रसिकेश्वरी–समस्त रसिक देवियों की सर्वश्रेष्ठ स्वामिनी हैं। ५. कृष्णप्राणाधिका–श्री कृष्ण को वे प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं इसलिए उन्हें कृष्णप्राणाधिका कहा जाता है। ६. कृष्णप्रिया–वे श्री कृष्ण की परम प्रिया हैं या श्री कृष्ण उन्हें परम प्रिय हैं अत: उन्हें कृष्णप्रिया कहते हैं। ७. कृष्णस्वरूपिणी–ये स्वरूपत:  श्री कृष्ण के समान हैं। ८. कृष्णवामांगसम्भूता–ये श्री कृष्ण के वामांग से प्रकट हुई ...