वसंत ऋतुचर्या: मार्च-अप्रैल में शरीर का 'नेचुरल डिटॉक्स' कैसे करें? ऋतुचर्या का अर्थ है प्रकृति की लय के साथ तालमेल बिठाना। आयुर्वेद के अनुसार, जैसे मौसम बदलता है, वैसे ही हमारे शरीर के आंतरिक दोषों ( वात, पित्त और कफ ) का संतुलन भी बदलता है। मार्च और अप्रैल का समय 'ऋतु संधि' का काल होता है, जहाँ सर्दियों की विदाई और गर्मियों का आगमन होता है। इसी बदलाव के समय यदि हम अपनी जीवनशैली नहीं बदलते, तो बीमारियाँ हमें घेर लेती हैं। वसंत में क्यों बिगड़ती है सेहत? सर्दियों के दौरान हमारे शरीर में कफ जमा (संचय) होता है। जैसे ही वसंत की धूप तेज होती है, यह जमा हुआ कफ पिघलने लगता है, जिससे शरीर में 'कफ का प्रकोप' हो जाता है। यही कारण है कि इस मौसम में सुस्ती, भारीपन और एलर्जी जैसी समस्याएँ बढ़ जाती हैं। कफ बढ़ने के मुख्य संकेत: पाचन की समस्या: भूख न लगना और खाया हुआ भोजन भारी महसूस होना। श्वसन संबंधी रोग: बार-बार सर्दी-जुकाम, खांसी या अस्थमा का बढ़ना। मानसिक स्थिति: जरूरत से ज्यादा नींद आना, आलस और काम में मन न लगना। त्वचा: खुजली या छोटे-छोटे दानों ...
शकुन-अपशकुन की मान्यता क्यों? 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ प्राचीन काल से ही भारत में शकुन द्वारा शुभाशुभ विचार करके यात्रा या किसी नवीन कार्य के आरम्भ करने की परंपरा रही है। प्रकृति से प्राप्त संकेत ही शकुन का आधार हैं। अच्छी या बुरी किसी भी महत्वपूर्ण घटना से पूर्व प्रकृति में कुछ विकार उत्पन्न होता है। हमारे ऋषि मुनियों ने इन प्राकृतिक विकारों का अपने अनुभव के आधार पर शुभाशुभ वर्गों में वर्गीकरण किया वास्तव में शकुन स्वयं न तो शुभ हैं न अशुभ , ये केवल इष्ट अथवा अनिष्ट के सूचक मात्र हैं। किसी महत्वपूर्ण कार्य को आरम्भ करते समय या उसके लिए यात्रा पर जाते समय शकुन पर विचार किया जाता है। शुभ शकुन होने पर कार्यसिद्धि तथा अशुभ शकुन होने पर कार्य की हानि का संकेत मिलता है। प्राचीन राजा –महाराजा भी अपने दरबार में विद्वान शकुनी को महत्वपूर्ण स्थान देते थे तथा प्रत्येक कार्य से पूर्व उसका परामर्श लेते थे। पुराणों में शकुन विचार 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ वेदों, स्मृतियों, पुराणादि धर्मशास्त्रों एवं फलित ज्योतिष शास्त्रों तथा धर्मसिन्धु में शुभ-अशुभ शकुनों के विषय में विस्तार से जानकारी दी गई है। शकुन हेतु...