रविवार, 6 सितंबर 2026

दायें कान पर ही क्यों यज्ञोपवीत

 अशौच आदि अवस्था में यज्ञोपवित को दायें कान पर ही क्यों टांगना चाहिए 


       यज्ञोपवित बहुत ही पवित्र सूत्र है - जिसे हमेशा हर परिस्थिति में शुद्ध रखने का दायित्व धारक पर होता है - परन्तु अशौच आदि अवस्था में जब पूर्ण शरीर ही अशुद्ध होता है तब उसे कहाँ रखा जाये कि वह शुद्ध रह सके --- 


       इस के लिए शास्त्र में ये विधान है :--- 


" आदित्या वसवो रूद्रा वायुरग्निश्च धर्मराट् ।

  विप्रस्य दक्षिणे कर्णे नित्यं तिष्ठन्ति देवताः ।। "


           प्रस्तुत श्लोक द्वारा दाहिने कान में आदित्य - वसु - रूद्र आदि देवताओं का निवास बताया गया है - इसलिए दाहिने कान की पवित्रता तथा महत्ता के अभिप्राय से ही पूज्य महर्षियों ने यज्ञोपवित को को उस दशा में जब कि सम्पूर्ण शरीर ही अपावन होता है - पवित्रता के सब से महान केंद्र कान पर रखने का विधान किया है । 

        और भी कहा है कि कभी आचमन करना है और जल उस समय उपलब्ध नहीं है तो दाहिने कान का स्पर्श करने से आचमन हो जाता है ।। 

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

आहुति कैसे डालें

 🔥 अग्नि में आहूति किस स्थान में डालें 🔥


" सर्वकार्यप्रसिद्धयर्थं जिह्वायां तत्र होमयेत् ।

  चक्षुः कर्णादिकं ज्ञात्वा होमयेद्देशिकोत्तमः ।।

  अग्निकर्णे हुतं यस्तु कुर्याच्चेद् व्याधितो भयम् ।

  नासिकायां महद्दुःखं चक्षुषोर्नाशनं भवेत् ।।

  केशे दारिद्रयदं प्रोक्तं तस्माज्जिह्वासु होमयेत् । 

  यत्र काष्ठं तत्र श्रोते यत्र धूमस्तु नासिके ।।

  यत्राल्पज्वलनं नेत्रं यत्र भस्म तु तच्छिरः । 

  यत्र न ज्वलितो वह्निस्तत्र जिह्वा प्रकीर्तिता ।। "

☛ समस्त कार्यों की सिद्धि के लिए अग्नि की जिह्वा में होम करना चाहिए -- श्रेष्ठ आचार्य चक्षु - कर्ण - नासिका - सिर आदि की पहचान कर हवन करें ---

                    अग्नि के कान में यदि हवन करें तो उसे व्याधि से भय होता है -- नासिका में हवन करें तो महादुःख होता है -- नेत्रों में हवन करें तो विनाश होता है -- केशों में किया गया हवन दारिद्र्यप्रद कहा गया है -- इसलिए जिह्वाओं में हवन करना चाहिए ---

                  

               जहाँ काष्ठ है वहाँ अग्नि के कान कहे गये हैं --

जहाँ धुआं है वहाँ अग्नि की नासिका कही गई है -- जहाँ अग्नि कम जलती है वहाँ अग्नि के नेत्र कहे गये हैं -- जहाँ भस्म है वहाँ अग्नि का सिर कहा गया है -- और जहाँ अग्नि ज्वालायुक्त है वहाँ अग्नि की जिह्वा कही गई है - अतः जिह्वा में ही हवन श्रेष्ठ कहा गया है ।


               🚩 हर हर महादेव 🚩 ।।वशिष्ठ ।।

मंगलवार, 1 सितंबर 2026

यज्ञ सामग्री का अनुपात

 🔥 यज्ञ में शाकल्य ( सामग्री ) का परिमाण कितना होना

                                   चाहिए 🔥  


" तिलार्धं तण्डुला देयास्तण्डुलार्धं यवास्तथा ।

  यवार्धं शर्कराः प्रोक्ताः सर्वार्धं च घृतं स्मृतम्।। "

                तिल का आधा चावल - और चावल का आधा जौ लेना चाहिए - जौ से आधा शक्कर कही गई है और सब से आधा घृत कहा गया है - ( एक हिस्सा गुगलादि और यथा शक्ति मेवा )।


" तिलाधिक्ये भवेल्लक्ष्मीर्यवाधिक्ये दरिद्रता । 

  धृताधिक्ये भवेन्मुक्तिः सर्वसिद्धिस्तु शर्करा ।। "

                 तिल की अधिकता से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है और यव की अधिकता से दरिद्रता की प्राप्ति होती है -- घृत की अधिकता से मुक्ति शर्करा की अधिकता से सर्वसिद्धि होती है ।


" आयुःक्षयं यवाधिक्यं यवसाम्यं धनक्षयम् । 

  सर्वकामसमृद्ध्यर्थं तिलाधिक्यं सदैव हि ।। "

                तिल से जौ अधिक होने पर आयु का नाश होता है -- तिल के बराबर यव रहने पर धन का नाश होता है - अतः सर्वदा तिल की अधिकता ही उचित है - इससे सम्पूर्ण कार्यों की सिद्धि होती है ।


🔥यज्ञ में तिल की इतनी उपयोगिता क्यों हैं ?🔥


           यज्ञ भगवान् विष्णु का स्वरूप है --- " यज्ञो वे विष्णुः " ( तैत्तिरीय ब्राह्मण १|२|५|४० )-- " विष्णुर्वै यज्ञः " ( ऐतरेय ब्राह्मण १|१५ )-- " यो वै विष्णुः स यज्ञः ( शतपथ ब्राह्मण ५|२|३|६ ) --- " त्वमेव यज्ञो यष्टा च यज्वनां परमेश्वर ।। "

       हे परमेश्वर ! आप ही यज्ञ करने वालों के यष्टा और यज्ञ स्वरूप हैं ।


" तिलाः पुण्याः पवित्राश्च सर्वपापहराः स्मृताः। 

  शुक्लाश्चैव तथा कृष्णा विष्णुगात्रसमुद्भवाः।। "

                 तिल अत्यंत पवित्र है और पुण्यप्रद है तथा वह समस्त प्रकार के पापों को दूर करने वाला है -- वह तिल सफेद और काला दो प्रकार का भगवान् श्री विष्णु के शरीर से उत्पन्न हुआ है ।


                🚩 हर हर महादेव 🚩 ।। 

किसका अभिवादन न करें

 इन्हे किया अभिवादन निष्फल होता है :--


          रजस्वला -- अशौचयुक्त सूतीका स्त्री -- पति की प्राण घातिनी तथा गर्भपात कराने वाली स्त्री अभिवादन करने के योग्य नहीं है ---

          

          इसी प्रकार पाखण्डी -- पतित -- व्रात्य ( यज्ञोपवित के नियत काल का उल्लंघन करने वाला ) -- महापातकी -- ( शराब पीने वाला - गुरुपत्नी गामी - चोर - ब्राह्मण व गौहत्यारा और इनका संग करने वाला ) -- दुष्ट स्वभाव वाला -- जूता पहने हुए व्यक्ति को तथा कृतघ्न -- मंत्रोच्चारण करते हुए द्विज -- शत्रु -- 

              तथा भोजन करते हुए या भोजन कराने वाले व्यक्ति को और अपवित्र -- दौडते हुए या दौड़ने वाले तथा नास्तिक व्यक्ति को -- वमन करते समय -- जम्हाई लेते समय -- दन्तधावन करते समय -- जो द्विज प्रमाद से अभिवादन करता है -- वह स्वयं अशुद्ध हो जाता है और अहोरात्र ( एक दिन व रात ) उपवास करने से शुद्ध होता है । 

 

       ये महर्षि व्याघ्रपाद जो उपमन्यु के पिता थे और उपमन्यु भगवान श्रीकृष्ण के दीक्षागुरु थे उन व्याघ्रपाद ने अपनी स्मृति में कहे हैं -- ये भगवान के इतने श्रेष्ठभक्त थे - जब भगवान से इन्होनें व्याघ्र के पैर मांगे जिसे जंगलसे पूजा के लिए फूल - फल लाते इन्हें नंगे पैर कंकर व कांटों से वेदना ना हो ।।

प्रेतों का भोजन

 प्रेतों का भोजन ❓


महर्षि गौतम ने पूछा -- संसार में कोई भी प्राणी बिना भोजन के नहीं रहते -- अतः बताओ , तुम लोग क्या आहार करते हो ❓

      

प्रेतों ने कहा --

       " अप्रक्षालितपादस्तु यो भुङ्क्ते दक्षिणामुखः ।

          यो वेष्टितशिरा भुङ्क्ते प्रेता भुञ्जन्ति नित्यशः ।। "

अर्थात् :--                 

           द्विजश्रेष्ठ ! जहाँ भोजन के समय आपस में कलह होने लगता है - वहाँ उस अन्न के रस को हम ही खाते हैं ।

             जहाँ मनुष्य बिना लिपी - पुती ( पोछा आदि से साफ हुई ) धरती पर खाते हैं - 

              जहाँ ब्राह्मण शौचाचार से भ्रष्ट होते हैं वहाँ हम को भोजन मिलता है --

             जो पैर धोये बिना खाता है - और जो दक्षिण की ओर मुँह करके भोजन करता है-- अथवा जो सिर पर वस्त्र लपेट कर भोजन करता है - उसके उस अन्न को सदा हम प्रेत ही खाते हैं --

           

            जहाँ रजस्वला स्त्री - चाण्डाल - और सुअर श्राद्ध के अन्न पर दृष्टि डाल देते हैं - वह अन्न पितरों का नहीं हम प्रेतों का ही भोजन होता है --

          जिस घर में सदा जूठन पडा रहे - निरन्तर कलह होता रहे - और बलिविश्वैदैव न किया जाता हो - वहाँ हम प्रेत लोग भोजन करते हैं ।


महर्षि गौतम ने पूछा ❓

            कैसे घरों में तुम्हारा प्रवेश होता है - यह बात मुझे सत्य - सत्य बताओ ❓


प्रेत बोले :---

             " ब्राह्मण ! जिस घर में बलिवैश्वदेव होने से धुएं की बत्ती उडती दिखाई देती है - उसमें हम प्रवेश नहीं कर पाते ---

             जिस घर में सवेरे चौका लग जाता है - तथा वेद मंत्रों की ध्वनि होती रहती है- वहाँ की किसी वस्तु पर हमारा अधिकार नहीं होता ।


गौतम ने पूछा ❓

           " किस कर्म के परिणाम में मनुष्य प्रेत भाव को प्राप्त होता है ❓

प्रेत बोले :--

             " जो धरोहर हडप लेते हैं - जुठे मुँह यात्रा करते हैं - गाय और ब्राह्मण की हत्या करने वाले हैं वे प्रेत योनि को प्राप्त होते हैं ।

                चुगली करने वाले -झूठी गवाही देने वाले - न्याय के पक्ष में नहीं रहने वाले - वे मरने पर प्रेत होते हैं ।

              सूर्य की ओर मुँह करके थूक - खकार - और मल - मूत्र त्याग करते हैं - वे प्रेत शरीर प्राप्त करके दीर्घकाल तक उसी में स्थित रहते हैं --

         गौ - ब्राह्मण तथा रोगी को जब कुछ दिया जाता हो - उस समय जो न देने की सलाह देते हैं - वे भी प्रेत ही होते हैं - 

           यदि शूद्र का अन्न पेट में रहते हुए ब्राह्मण की मृत्यु हो जाये तो वह अत्यंत भयंकर प्रेत होता है --

            विप्रवर ! -- जो अमावस्या की तिथि में हल में बैलों को जोतता है वह मनुष्य प्रेत बनता है ।

            जो विश्वासघाती - ब्रह्महत्यारा - स्त्रीवध करने वाला - गोघाती - गुरूघाती - और पितृहत्या करने वाला है वह मनुष्य भी प्रेत होता है। 

               मरने पर जिसके १६ एकोदिष्ट श्राद्ध नहीं किये गये हैं - उसको भी प्रेतयोनि प्राप्त होती है ।। महाभारत ।।


                   🚩 हर हर महादेव 🚩 ।।  

अयोग्य द्वारा स्थापित मूर्ति से नुक़सान

 🔥 शूद्र और स्त्री के द्वारा स्थापित मूर्तियों को प्रणाम करने से

                             हानि 🔥


" यः शूद्रेणार्चितं लिङ्गं विष्णुं वा प्रणमेन्नरः। 

  न तस्य निष्कृतिर्दष्टा प्रायश्चित्तायुतेरपि ।।

  नमेद्यः शूद्रसंस्पृष्टं लिङ्गं वा हरिमेव वा ।

  स सर्वयातनाभोगी यावदाचन्द्रतारकम् ।।

                   पाखण्डपूजितं लिङ्गं नत्वा पाखण्डतां व्रजेत् ।

                   आभीरपूजितं लिङ्गं नत्वा पाखण्डतां व्रजेत् ।।

                   योषिद्भिः पूजितं लिङ्गं विष्णुं वापि नमेत्तु यः ।

                   स कोटिकुलसंयुक्तमाकल्पं रौरवं वसेत् ।।

जो मनुष्य शूद्र से पूजित शिवलिंग और विष्णु को अभिवादन करता है - उसके पाप की निवृत्ति दस हजार बार प्रायश्चित करने से भी नहीं होती -- जो शूद्र के स्पर्श किये हुए लिङ्ग और हरि ( विष्णु ) की मूर्ति को अभिवादन करता है वह समस्त प्रकार की यातनाओं को तब तक भोगता है जब तक सूर्य और चंद्र की स्थिति रहती है ।

                    जो पाखण्डी से पूजित लिङ्ग को प्रणाम करता है वह पाखण्ड को प्राप्त करता है-- जो आभिर से ( ग्वाला से ) पूजित लिङ्ग को प्रणाम करता है- वह नर्क को प्राप्त होता है -- जो स्त्रियों से पूजित लिङ्ग और विष्णु को प्रणाम करता है - वह करोडों कुलों सहित कल्पपर्यन्त रौरव नरक निवास करता है ।

                                                                    ( नारदपुराण )


🌷 विष्णु और शिव की मूर्ति के स्पर्श से शूद्रादि की हानि 🌷


" शूद्रो वाऽनुपनीतो वा स्त्रियो वा पतितोऽपि वा ।

  केशवं वा शिवं वापि स्पृष्ट्वा नरकम्श्नुते ।। "

                 शूद्र - अनुपनीत - ( यज्ञोपवीत संस्कार से रहित ) - स्त्री और पतित -- ये विष्णु और शिव की मूर्ति को स्पर्श करके नरक को प्राप्त करते हैं ।


                  🚩 हर हर महादेव 🚩 ।।

सदा दुखी ही रहेगा

 ईर्ष्या घृणी त्वसंतुष्टः क्रोधनो नित्यशंकितः । परभाग्योपजीवी च षडेते दुःखभागिनः ।।


भावार्थ : _*ईर्ष्या करने वाला, घृणा करने वाला, सदैव क्रोध करने वाला, सदा असन्तुष्ट रहने वाला, सदा शंका करने वाला तथा दूसरे के भरोसे जीनेवाला, ये छ: सदा दुःख भोगते हैं।*_👆👆👆👆👆

दायें कान पर ही क्यों यज्ञोपवीत

 अशौच आदि अवस्था में यज्ञोपवित को दायें कान पर ही क्यों टांगना चाहिए         यज्ञोपवित बहुत ही पवित्र सूत्र है - जिसे हमेशा हर परिस्थिति में...