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शकुन-अपशकुन

 शकुन-अपशकुन की मान्यता क्यों? 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ प्राचीन काल से ही भारत में शकुन द्वारा शुभाशुभ विचार करके यात्रा या किसी नवीन कार्य के आरम्भ करने की परंपरा रही है। प्रकृति से प्राप्त संकेत ही शकुन का आधार हैं। अच्छी या बुरी किसी भी महत्वपूर्ण घटना से पूर्व प्रकृति में कुछ विकार उत्पन्न होता है। हमारे ऋषि मुनियों ने इन प्राकृतिक विकारों का अपने अनुभव के आधार पर शुभाशुभ वर्गों में वर्गीकरण किया वास्तव में शकुन स्वयं न तो शुभ हैं न अशुभ , ये केवल इष्ट अथवा अनिष्ट के सूचक मात्र हैं। किसी महत्वपूर्ण कार्य को आरम्भ करते समय या उसके लिए यात्रा पर जाते समय शकुन पर विचार किया जाता है। शुभ शकुन होने पर कार्यसिद्धि तथा अशुभ शकुन होने पर कार्य की हानि का संकेत मिलता है। प्राचीन राजा –महाराजा भी अपने दरबार में विद्वान शकुनी को महत्वपूर्ण स्थान देते थे तथा प्रत्येक कार्य से पूर्व उसका परामर्श लेते थे। पुराणों में शकुन विचार 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ वेदों, स्मृतियों, पुराणादि धर्मशास्त्रों एवं फलित ज्योतिष शास्त्रों तथा धर्मसिन्धु में शुभ-अशुभ शकुनों के विषय में विस्तार से जानकारी दी गई है। शकुन हेतु...
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स्वप्नसंकेत

  स्वप्नसंकेत --- ज्योतिष के अनुसार रात्रि नींद में दिखाई देने वाले हर स्वप्न का एक ख़ास संकेत एवं संभावित फल कितनी जल्दी मिलेगा, यह स्वप्न रात्रि के किस पहर में देखा गया है इस पर आधारित है सामान्यत: ब्राह्मवेला में देखे गए स्वप्न जल्दी फलीभूत होते हैं।       ~ रात्रि स्वप्न~ ~ फल~ 1- आंखों में काजल लगाना- शारीरिक कष्ट होना 2- स्वयं के कटे हाथ देखना- किसी निकट परिजन की मृत्यु 3- सूखा हुआ बगीचा देखना- कष्टों की प्राप्ति 4- मोटा बैल देखना- अनाज सस्ता होगा 5- पतला बैल देखना - अनाज महंगा होगा 6- भेडिय़ा देखना- दुश्मन से भय 7- राजनेता की मृत्यु देखना- देश में समस्या होना 8- पहाड़ हिलते हुए देखना- किसी बीमारी का प्रकोप होना 9- पूरी खाना- प्रसन्नता का समाचार मिलना 10- तांबा देखना- गुप्त रहस्य पता लगना 11- पलंग पर सोना- गौरव की प्राप्ति 12- थूक देखना- परेशानी में पडऩा 13- हरा-भरा जंगल देखना- प्रसन्नता मिलेगी 14- स्वयं को उड़ते हुए देखना- किसी मुसीबत से छुटकारा 15- छोटा जूता पहनना- किसी स्त्री से झगड़ा 16- स्त्री से मैथुन करना- धन की प्राप्ति 17- किसी से ...

किस महीने में क्या खाए और क्या नहीं खाए

 * आयुर्वेद के अनुसार किस महीने में क्या खाए और क्या नहीं खाए जिससे रहे निरोगी काया* मौसम के अनुकूल अगर आप भोजन करते है। या फिर खाना-पीना खाते है तो अक्सर आप बड़े-बुजुर्गों के मुख ये शब्द जरूर सुने होंगे। चौते गुड़, वैशाखे तेल, जेठ के पंथ, अषाढ़े बेल। सावन साग, भादो मही, कुवांर करेला, कार्तिक दही। अगहन जीरा, पूसै धना, माघै मिश्री, फाल्गुन चना। जो कोई इतने परिहरै, ता घर बैद पैर नहिं धरै। अर्थात इस दोहा के माध्यम से बताया गया है कि जो आदमी इन चीजों पर अमल करेगा यानी कि नहीं खाएगा। वह इंसान कभी बीमार नहीं होगा। चिकित्सक-वैद्य के पास नहीं जाना पड़ेगा। हिन्दू धर्मशास्त्र के जानकार आज भी कहते है कि आयुर्वेद में भोजन के संबंध में बहुत कुछ लिखा है। जैसे किस सप्ताह में क्या खाना है क्या नहीं। किस तिथि को क्या खाना चाहिए अथवा क्या नहीं। किस महीने में क्या भोजन सही है और क्या नहीं। दरअसल, इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी है। प्रत्येक सप्ताह, तिथि या महीने में मौसम में बदलाव होता है। इस बदलाव को समझकर ही खाना जरूरी है। *किस माह में क्या खाएं?* 💐💐💐💐💐💐💐💐 जिस तरह पूर्वजों को बताया गया है कि चै...

🌕 शरद पूर्णिमा 2025: धन, सुख और सौभाग्य के लिए प्रभावी उपाय व टोटके

🌕 शरद पूर्णिमा 2025: धन, सुख और सौभाग्य के लिए प्रभावी उपाय व टोटके शरद पूर्णिमा हिन्दू पंचांग की अत्यंत शुभ रात मानी जाती है। इस दिन चंद्रमा पूर्ण तेजस के साथ आकाश में उदित होता है और उसकी चाँदनी में दिव्यता का अद्भुत संगम होता है। शास्त्रों के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात माता लक्ष्मी की रात्रि मानी जाती है और इस दिन किए गए उपाय शीघ्र फलदायी होते हैं। यह दिन धन प्राप्ति, स्वास्थ्य और मानसिक शांति के लिए सर्वोत्तम माना गया है। 🌼 शरद पूर्णिमा के प्रभावी उपाय और टोटके 1. लक्ष्मी पूजन और पीपल वृक्ष की आराधना सुबह-सुबह स्नान करके पीपल के पेड़ के नीचे माता लक्ष्मी का पूजन करें और उन्हें घर में निवास के लिए आमंत्रित करें। इससे लक्ष्मी कृपा घर में बनी रहती है। 2. भगवान विष्णु और महालक्ष्मी की पूजा रात में भगवान विष्णु के साथ महालक्ष्मी की पूजा करें। यदि ब्राह्मण के माध्यम से पूजा कराई जाए तो इसका प्रभाव अधिक होता है। 3. चंद्रमा को दूध-चावल से अर्घ्य दें चंद्र उदय के बाद कच्चे दूध, चावल और चीनी के मिश्रण से चंद्रमा को अर्घ्य दें। मंत्र जप करें – “ओम स्त्रां स्त्रीं स्त्रों सः चंद्रमसे नमः।” ...

यज्ञादि में त्याज्य पदार्थ

 🔥 यज्ञादि में त्याज्य पदार्थ 🔥 यज्ञ कर्म में भावदुष्ट  - क्रियादुष्ट  - कालदुष्ट  - संसर्गदुष्ट  तथा जातिदुष्ट -- इन पदार्थों का त्याग करना चाहिए । १-- भावदुष्ट :--        " रूपतो गन्धतो वापि यच्चाभक्ष्यैः समं भवेत् ।          भावदुष्टं   च    तत्प्रोक्तं    मुनिभिर्धर्मपारगैः ।। " जो पदार्थ रूप से अथवा गंध से भी अभक्ष्य पदार्थों के सदृश हो - उसे धर्म के पारङ्गत मुनियों ने " भावदुष्ट " कहा है । २-- क्रियादुष्ट :--         " आरनालं  च   मद्यं  च   करनिर्मथितं  दधि ।            हस्तदत्तं  च  लवणं   क्षीरं  घृतपयांसि  च ।।            हस्तेनोद्धृत्य तोयं च  पीतं वक्त्रेण वैकदा ।             शब्देन पीतं भुक्तं च गव्यं ताम्रेण संयुक्तम् ।।            क्षीरं च  लवणोन्मिश्रं...

घर के प्रेत या पितर रुष्ट होने के लक्षण और उपाय

  घर के प्रेत या पितर रुष्ट होने के लक्षण और उपाय 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ बहुत जिज्ञासा होती है आखिर ये पितृदोष है क्या? पितृ -दोष शांति के सरल उपाय पितृ या पितृ गण कौन हैं ?आपकी जिज्ञासा को शांत करती विस्तृत प्रस्तुति। पितृ गण हमारे पूर्वज हैं जिनका ऋण हमारे ऊपर है ,क्योंकि उन्होंने कोई ना कोई उपकार हमारे जीवन के लिए किया है मनुष्य लोक से ऊपर पितृ लोक है,पितृ लोक के ऊपर सूर्य लोक है एवं इस से भी ऊपर स्वर्ग लोक है।  आत्मा जब अपने शरीर को त्याग कर सबसे पहले ऊपर उठती है तो वह पितृ लोक में जाती है ,वहाँ हमारे पूर्वज मिलते हैं अगर उस आत्मा के अच्छे पुण्य हैं तो ये हमारे पूर्वज भी उसको प्रणाम कर अपने को धन्य मानते हैं की इस अमुक आत्मा ने हमारे कुल में जन्म लेकर हमें धन्य किया इसके आगे आत्मा अपने पुण्य के आधार पर सूर्य लोक की तरफ बढती है। वहाँ से आगे ,यदि और अधिक पुण्य हैं, तो आत्मा सूर्य लोक को भेज कर स्वर्ग लोक की तरफ चली जाती है,लेकिन करोड़ों में एक आध आत्मा ही ऐसी होती है ,जो परमात्मा में समाहित होती है  जिसे दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता  मनुष्य लोक एवं पितृ लोक में...

॥ शिखा बन्धनस्य आवश्यकता॥

 #शिखाविचार *॥ शिखा बन्धनस्य आवश्यकता॥*   *स्नाने दाने जपे होमे सन्ध्यायां देवतार्चने ।*   *शिखाग्रन्थिं सदा कुर्यादित्येतन्मनुरब्रवीत् ॥*   मनुसंहिता स्नान, दान, जप, होम और देव पूजन में सर्वदा शिखा बाँधना चाहिए ।  *॥शिखाबन्धन - विधिः ॥*  *शिखीवच्छिखया भाव्यं ब्रह्मावर्तनिबद्धया ।*   *प्रदक्षिणं द्विरावर्त्य पाशान्तः सम्प्रवेशनात् ॥*   *प्रथमं द्विगुणं कृत्वा ब्रह्मावर्त मितीरितम् ।*  गायत्रीजपनं निबन्धने ॥  कुर्याच्छिखायाश्च इति कौथुमि: शिखा को दुगना करके प्रदक्षिण क्रम घुमाकर उसमें ब्रह्मग्रन्थि लगा दे। मयूर के शिखा के समान शिखा होनी चाहिये। पहले दुगना किया हुआ को ब्रह्मग्रन्थि कहा गया है। गायत्री मन्त्रका जप करते हुए शिखा को बाँधना चाहिये ।   *विप्रादिकानां खलु मुष्टिमेय-*   *केशाः शिखा स्यादधिका न तेन।*   *द्विधा त्रिधा वापि विभज्य बन्धो*   *ह्यल्पास्ततोऽल्पापि न लम्बितानि ॥*   ब्राह्मणों कि शिखा मुष्टि में आने योग्य होनी चाहिये। दुगना या तिगुना करके बाँधना चा...