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यज्ञ सामग्री का अनुपात

 🔥 यज्ञ में शाकल्य ( सामग्री ) का परिमाण कितना होना                                    चाहिए 🔥   " तिलार्धं तण्डुला देयास्तण्डुलार्धं यवास्तथा ।   यवार्धं शर्कराः प्रोक्ताः सर्वार्धं च घृतं स्मृतम्।। "                 तिल का आधा चावल - और चावल का आधा जौ लेना चाहिए - जौ से आधा शक्कर कही गई है और सब से आधा घृत कहा गया है - ( एक हिस्सा गुगलादि और यथा शक्ति मेवा )। " तिलाधिक्ये भवेल्लक्ष्मीर्यवाधिक्ये दरिद्रता ।    धृताधिक्ये भवेन्मुक्तिः सर्वसिद्धिस्तु शर्करा ।। "                  तिल की अधिकता से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है और यव की अधिकता से दरिद्रता की प्राप्ति होती है -- घृत की अधिकता से मुक्ति शर्करा की अधिकता से सर्वसिद्धि होती है । " आयुःक्षयं यवाधिक्यं यवसाम्यं धनक्षयम् ।    सर्वकामसमृद्ध्यर्थं तिलाधिक्यं सदैव हि ।। "             ...
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किसका अभिवादन न करें

 इन्हे किया अभिवादन निष्फल होता है :--           रजस्वला -- अशौचयुक्त सूतीका स्त्री -- पति की प्राण घातिनी तथा गर्भपात कराने वाली स्त्री अभिवादन करने के योग्य नहीं है ---                      इसी प्रकार पाखण्डी -- पतित -- व्रात्य ( यज्ञोपवित के नियत काल का उल्लंघन करने वाला ) -- महापातकी -- ( शराब पीने वाला - गुरुपत्नी गामी - चोर - ब्राह्मण व गौहत्यारा और इनका संग करने वाला ) -- दुष्ट स्वभाव वाला -- जूता पहने हुए व्यक्ति को तथा कृतघ्न -- मंत्रोच्चारण करते हुए द्विज -- शत्रु --                तथा भोजन करते हुए या भोजन कराने वाले व्यक्ति को और अपवित्र -- दौडते हुए या दौड़ने वाले तथा नास्तिक व्यक्ति को -- वमन करते समय -- जम्हाई लेते समय -- दन्तधावन करते समय -- जो द्विज प्रमाद से अभिवादन करता है -- वह स्वयं अशुद्ध हो जाता है और अहोरात्र ( एक दिन व रात ) उपवास करने से शुद्ध होता है ।           ये महर्षि व्याघ्रपाद जो उपमन्यु के पि...

प्रेतों का भोजन

 प्रेतों का भोजन ❓ महर्षि गौतम ने पूछा -- संसार में कोई भी प्राणी बिना भोजन के नहीं रहते -- अतः बताओ , तुम लोग क्या आहार करते हो ❓        प्रेतों ने कहा --        " अप्रक्षालितपादस्तु यो भुङ्क्ते दक्षिणामुखः ।           यो वेष्टितशिरा भुङ्क्ते प्रेता भुञ्जन्ति नित्यशः ।। " अर्थात् :--                             द्विजश्रेष्ठ ! जहाँ भोजन के समय आपस में कलह होने लगता है - वहाँ उस अन्न के रस को हम ही खाते हैं ।              जहाँ मनुष्य बिना लिपी - पुती ( पोछा आदि से साफ हुई ) धरती पर खाते हैं -                जहाँ ब्राह्मण शौचाचार से भ्रष्ट होते हैं वहाँ हम को भोजन मिलता है --              जो पैर धोये बिना खाता है - और जो दक्षिण की ओर मुँह करके भोजन करता है-- अथवा जो सिर पर वस्त्र लपेट कर भोजन करता है - उसके उस अन्न को सदा हम प्र...

अयोग्य द्वारा स्थापित मूर्ति से नुक़सान

 🔥 शूद्र और स्त्री के द्वारा स्थापित मूर्तियों को प्रणाम करने से                              हानि 🔥 " यः शूद्रेणार्चितं लिङ्गं विष्णुं वा प्रणमेन्नरः।    न तस्य निष्कृतिर्दष्टा प्रायश्चित्तायुतेरपि ।।   नमेद्यः शूद्रसंस्पृष्टं लिङ्गं वा हरिमेव वा ।   स सर्वयातनाभोगी यावदाचन्द्रतारकम् ।।                    पाखण्डपूजितं लिङ्गं नत्वा पाखण्डतां व्रजेत् ।                    आभीरपूजितं लिङ्गं नत्वा पाखण्डतां व्रजेत् ।।                    योषिद्भिः पूजितं लिङ्गं विष्णुं वापि नमेत्तु यः ।                    स कोटिकुलसंयुक्तमाकल्पं रौरवं वसेत् ।। जो मनुष्य शूद्र से पूजित शिवलिंग और विष्णु को अभिवादन करता है - उसके पाप की निवृत्ति दस हजार बार प्रायश्चित करने से भी नहीं होती -- जो शूद्र क...

सदा दुखी ही रहेगा

 ईर्ष्या घृणी त्वसंतुष्टः क्रोधनो नित्यशंकितः । परभाग्योपजीवी च षडेते दुःखभागिनः ।। भावार्थ : _*ईर्ष्या करने वाला, घृणा करने वाला, सदैव क्रोध करने वाला, सदा असन्तुष्ट रहने वाला, सदा शंका करने वाला तथा दूसरे के भरोसे जीनेवाला, ये छ: सदा दुःख भोगते हैं।*_👆👆👆👆👆

मूर्ति का त्याग

" असुरैर्मुनिभिर्गोत्रैस्तन्त्रविद्भिः        प्रतिष्ठितम् ।    जीर्णं वाऽप्यथवा भग्नं विधिनापि न चालयेत्।। "                   राक्षसों के द्वारा  - मुनियों के द्वारा - मुनियों के गोत्रजों के द्वारा और तन्त्रवेताओं के द्वारा प्रतिष्ठित मूर्ति यदि जीर्ण हो जाये अथवा खण्डित हो जाये तो उस मूर्ति को किसी भी रूप से हटाना उचित नहीं ।         ( अग्निपुराण १७३|१९ ) 🚩    शिवलिंग आदि मूर्तियों के जलने - टूटने और चलने पर ( स्थानभ्रष्ट होने पर  ) जीर्णोद्धार करना चाहिए  - किन्तु अनादिसिद्ध लिङ्ग आदि मूर्तियों के खण्डित होने पर उनका जीर्णोद्धार करना उचित नहीं है -- ऐसी मूर्तियों के लिए ' महाभिषेक ' करना चाहिए।                     ( निर्णयसिन्धु )                 🛕     देवमूर्ति के अंग में यदि दूसरा अंग अर्थात् दूसरे नेत्र चढाने हों - तो पुनः प्रतिष्ठा करनी चाहि...

आसन

  ग्राह्य व अग्राह्य आसन  " काम्यार्थ  कम्बलं  चैव श्रेष्ठं  च  रक्तकम्बलम् ।   कृष्णाजिने ज्ञानसिद्धिर्मोक्ष श्री र्व्याघ्चर्म्मणि ।।   कुशासने    मंत्रसिद्धिर्नात्रकार्य्या   विचारणा ।। "                 काम्य कर्म में कम्बल का आसन वह भी लाल हो श्रेष्ठ है -- काले मर्गचर्म ज्ञानसिद्धि प्राप्त होती है -- व्याघ्रचर्म पर मोक्षश्री प्राप्त होती है - कुशासन पर सब मंत्रों की सिद्धि प्राप्त होती है -- इसमें कुछ भी संदेह नहीं है । " धरण्यां     दुःखसम्भूतिर्दौर्भाग्यं     दारूजासने ।   वंशासने दरिद्रः स्यात् पाषाणो व्याधि पीडनम् ।।   तृणासने    यशोहानिः     पल्लवे    चित्तविभ्रमः।   जपध्यानतपोहानिं    वस्त्रासनं    करोति    हि ।। "                   खाली भूमि पर निरासन यानि बिना आसन से बैठने से दुःख  -- लकडी के आसन पर बैठने से दौर्भाग्य...