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दायें कान पर ही क्यों यज्ञोपवीत

 अशौच आदि अवस्था में यज्ञोपवित को दायें कान पर ही क्यों टांगना चाहिए         यज्ञोपवित बहुत ही पवित्र सूत्र है - जिसे हमेशा हर परिस्थिति में शुद्ध रखने का दायित्व धारक पर होता है - परन्तु अशौच आदि अवस्था में जब पूर्ण शरीर ही अशुद्ध होता है तब उसे कहाँ रखा जाये कि वह शुद्ध रह सके ---         इस के लिए शास्त्र में ये विधान है :---  " आदित्या वसवो रूद्रा वायुरग्निश्च धर्मराट् ।   विप्रस्य दक्षिणे कर्णे नित्यं तिष्ठन्ति देवताः ।। "            प्रस्तुत श्लोक द्वारा दाहिने कान में आदित्य - वसु - रूद्र आदि देवताओं का निवास बताया गया है - इसलिए दाहिने कान की पवित्रता तथा महत्ता के अभिप्राय से ही पूज्य महर्षियों ने यज्ञोपवित को को उस दशा में जब कि सम्पूर्ण शरीर ही अपावन होता है - पवित्रता के सब से महान केंद्र कान पर रखने का विधान किया है ।          और भी कहा है कि कभी आचमन करना है और जल उस समय उपलब्ध नहीं है तो दाहिने कान का स्पर्श करने से आचमन हो जाता है ।। 
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आहुति कैसे डालें

 🔥 अग्नि में आहूति किस स्थान में डालें 🔥 " सर्वकार्यप्रसिद्धयर्थं जिह्वायां तत्र होमयेत् ।   चक्षुः कर्णादिकं ज्ञात्वा होमयेद्देशिकोत्तमः ।।   अग्निकर्णे हुतं यस्तु कुर्याच्चेद् व्याधितो भयम् ।   नासिकायां महद्दुःखं चक्षुषोर्नाशनं भवेत् ।।   केशे दारिद्रयदं प्रोक्तं तस्माज्जिह्वासु होमयेत् ।    यत्र काष्ठं तत्र श्रोते यत्र धूमस्तु नासिके ।।   यत्राल्पज्वलनं नेत्रं यत्र भस्म तु तच्छिरः ।    यत्र न ज्वलितो वह्निस्तत्र जिह्वा प्रकीर्तिता ।। " ☛ समस्त कार्यों की सिद्धि के लिए अग्नि की जिह्वा में होम करना चाहिए -- श्रेष्ठ आचार्य चक्षु - कर्ण - नासिका - सिर आदि की पहचान कर हवन करें ---                     अग्नि के कान में यदि हवन करें तो उसे व्याधि से भय होता है -- नासिका में हवन करें तो महादुःख होता है -- नेत्रों में हवन करें तो विनाश होता है -- केशों में किया गया हवन दारिद्र्यप्रद कहा गया है -- इसलिए जिह्वाओं में हवन करना चाहिए --- ...

यज्ञ सामग्री का अनुपात

 🔥 यज्ञ में शाकल्य ( सामग्री ) का परिमाण कितना होना                                    चाहिए 🔥   " तिलार्धं तण्डुला देयास्तण्डुलार्धं यवास्तथा ।   यवार्धं शर्कराः प्रोक्ताः सर्वार्धं च घृतं स्मृतम्।। "                 तिल का आधा चावल - और चावल का आधा जौ लेना चाहिए - जौ से आधा शक्कर कही गई है और सब से आधा घृत कहा गया है - ( एक हिस्सा गुगलादि और यथा शक्ति मेवा )। " तिलाधिक्ये भवेल्लक्ष्मीर्यवाधिक्ये दरिद्रता ।    धृताधिक्ये भवेन्मुक्तिः सर्वसिद्धिस्तु शर्करा ।। "                  तिल की अधिकता से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है और यव की अधिकता से दरिद्रता की प्राप्ति होती है -- घृत की अधिकता से मुक्ति शर्करा की अधिकता से सर्वसिद्धि होती है । " आयुःक्षयं यवाधिक्यं यवसाम्यं धनक्षयम् ।    सर्वकामसमृद्ध्यर्थं तिलाधिक्यं सदैव हि ।। "             ...

किसका अभिवादन न करें

 इन्हे किया अभिवादन निष्फल होता है :--           रजस्वला -- अशौचयुक्त सूतीका स्त्री -- पति की प्राण घातिनी तथा गर्भपात कराने वाली स्त्री अभिवादन करने के योग्य नहीं है ---                      इसी प्रकार पाखण्डी -- पतित -- व्रात्य ( यज्ञोपवित के नियत काल का उल्लंघन करने वाला ) -- महापातकी -- ( शराब पीने वाला - गुरुपत्नी गामी - चोर - ब्राह्मण व गौहत्यारा और इनका संग करने वाला ) -- दुष्ट स्वभाव वाला -- जूता पहने हुए व्यक्ति को तथा कृतघ्न -- मंत्रोच्चारण करते हुए द्विज -- शत्रु --                तथा भोजन करते हुए या भोजन कराने वाले व्यक्ति को और अपवित्र -- दौडते हुए या दौड़ने वाले तथा नास्तिक व्यक्ति को -- वमन करते समय -- जम्हाई लेते समय -- दन्तधावन करते समय -- जो द्विज प्रमाद से अभिवादन करता है -- वह स्वयं अशुद्ध हो जाता है और अहोरात्र ( एक दिन व रात ) उपवास करने से शुद्ध होता है ।           ये महर्षि व्याघ्रपाद जो उपमन्यु के पि...

प्रेतों का भोजन

 प्रेतों का भोजन ❓ महर्षि गौतम ने पूछा -- संसार में कोई भी प्राणी बिना भोजन के नहीं रहते -- अतः बताओ , तुम लोग क्या आहार करते हो ❓        प्रेतों ने कहा --        " अप्रक्षालितपादस्तु यो भुङ्क्ते दक्षिणामुखः ।           यो वेष्टितशिरा भुङ्क्ते प्रेता भुञ्जन्ति नित्यशः ।। " अर्थात् :--                             द्विजश्रेष्ठ ! जहाँ भोजन के समय आपस में कलह होने लगता है - वहाँ उस अन्न के रस को हम ही खाते हैं ।              जहाँ मनुष्य बिना लिपी - पुती ( पोछा आदि से साफ हुई ) धरती पर खाते हैं -                जहाँ ब्राह्मण शौचाचार से भ्रष्ट होते हैं वहाँ हम को भोजन मिलता है --              जो पैर धोये बिना खाता है - और जो दक्षिण की ओर मुँह करके भोजन करता है-- अथवा जो सिर पर वस्त्र लपेट कर भोजन करता है - उसके उस अन्न को सदा हम प्र...

अयोग्य द्वारा स्थापित मूर्ति से नुक़सान

 🔥 शूद्र और स्त्री के द्वारा स्थापित मूर्तियों को प्रणाम करने से                              हानि 🔥 " यः शूद्रेणार्चितं लिङ्गं विष्णुं वा प्रणमेन्नरः।    न तस्य निष्कृतिर्दष्टा प्रायश्चित्तायुतेरपि ।।   नमेद्यः शूद्रसंस्पृष्टं लिङ्गं वा हरिमेव वा ।   स सर्वयातनाभोगी यावदाचन्द्रतारकम् ।।                    पाखण्डपूजितं लिङ्गं नत्वा पाखण्डतां व्रजेत् ।                    आभीरपूजितं लिङ्गं नत्वा पाखण्डतां व्रजेत् ।।                    योषिद्भिः पूजितं लिङ्गं विष्णुं वापि नमेत्तु यः ।                    स कोटिकुलसंयुक्तमाकल्पं रौरवं वसेत् ।। जो मनुष्य शूद्र से पूजित शिवलिंग और विष्णु को अभिवादन करता है - उसके पाप की निवृत्ति दस हजार बार प्रायश्चित करने से भी नहीं होती -- जो शूद्र क...

सदा दुखी ही रहेगा

 ईर्ष्या घृणी त्वसंतुष्टः क्रोधनो नित्यशंकितः । परभाग्योपजीवी च षडेते दुःखभागिनः ।। भावार्थ : _*ईर्ष्या करने वाला, घृणा करने वाला, सदैव क्रोध करने वाला, सदा असन्तुष्ट रहने वाला, सदा शंका करने वाला तथा दूसरे के भरोसे जीनेवाला, ये छ: सदा दुःख भोगते हैं।*_👆👆👆👆👆