सभी सुहागिन माताओं और बहनों को पावन व्रत करवा चौथ की हार्दिक शुभकामनाएं!
स्त्री का जीवन असीम त्याग, तपस्या और समर्पण का प्रतीक है, जिसे शब्दों में पूरी तरह बांधना असंभव है। यही कारण है कि हमारे धर्मशास्त्रों ने स्त्री को सर्वोच्च और अत्यंत पवित्र स्थान पर स्थापित किया है। सनातन परंपरा में नारी केवल देह नहीं, बल्कि साक्षात् शक्ति और देवत्व का स्वरूप है।
इस विषय में विभिन्न धर्मशास्त्रों और पुराणों के प्रामाणिक संदर्भ स्त्री के इसी असीमित महत्त्व को स्पष्ट करते हैं:
१. नारी का सम्मान और देवत्व का वास
महर्षि मनु ने मनुस्मृति में स्पष्ट किया है कि नारी का सम्मान ही किसी कुल या समाज की उन्नति का आधार है। जहां नारी का अपमान होता है, वहां किए गए सभी सत्कर्म निष्फल हो जाते हैं:
> यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।
> यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:।।
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२. स्त्री सर्वथा 'अवध्या' (अहंतव्य) है
सनातन शास्त्रों के अनुसार स्त्री को किसी भी परिस्थिति में शारीरिक पीड़ा देना या उसका वध करना महापाप है:
* रामायण प्रसंग: वनवास के बाद जब भरत और शत्रुघ्न को मंथरा की कुटिलता का पता चलता है, तो क्रोधित शत्रुघ्न उसे पीटने लगते हैं। तब भरत जी उन्हें रोकते हुए कहते हैं कि चाहे जो भी हुआ हो, सभी प्राणियों में स्त्री सदा अवध्या (जिसे मारा न जा सके) है:
> अवध्या: सर्वभूतानां प्रमदा: क्षम्यतामिति।।
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* वायु पुराण (भृगु ऋषि का श्राप): जब भगवान विष्णु ने देवी ख्याति का मस्तक काट दिया, तो महर्षि भृगु ने कुपित होकर उन्हें श्राप दिया: "नारायण! धर्मतः स्त्री अवध्या है, यह जानते हुए भी आपने यह अपकर्म किया। अतः आपको पृथ्वी पर बार-बार गर्भवास (जन्म) लेना होगा।" (यस्मात्ते जानता धर्मानवध्या स्त्री निषूदिता।।)
* ब्रह्मांड पुराण: राजा पृथु के क्रोधित होने पर धरती देवी (गाय रूप में) उनसे प्राणदान मांगते हुए कहती हैं कि विद्वानों का मत है कि पशु-पक्षियों (तिर्यक योनि) में भी स्त्री जाति सदा अवध्या है। (अवध्याश्च स्त्रिय: प्राहुस्तिर्यग्योनिगतेष्वपि।।)
३. स्त्री साक्षात् भगवती और प्रकृति का अंश
शाक्त, वैष्णव और शैव संप्रदायों में स्त्री को जगदम्बा का साक्षात् रूप माना गया है। उसे भूल से या फूल से भी आघात पहुंचाना निषिद्ध है।
* ब्रह्मवैवर्त पुराण: जो व्यक्ति स्त्री के सम्मान की रक्षा करता है, उसका पग-पग पर कल्याण होता है। स्त्री का अपमान करने वाले नराधम का भगवती पार्वती सदैव अमंगल करती हैं। (पदे पदे शुभं तस्य य: स्त्रीमानं च रक्षति।।)
* देवी भागवत पुराण: संसार की उत्तम, मध्यम और अधम—सभी स्त्रियां प्रकृति (देवी) का ही अंश हैं। इसलिए स्त्री का अपमान सीधे प्रकृति देवी का अपमान है। दुराचारिणी स्त्रियां भी उसी प्रकृति का हिस्सा हैं, अतः उनका भी तिरस्कार न करें; उनके कर्मों का निर्णय कर्म-सिद्धांत करेगा। (योषितामवमानेन प्रकृतेश्च पराभव:।।)
* बृहद्धर्म पुराण: भगवती कहती हैं कि सभी स्त्रियों में मेरा उत्तम निवास है, विशेषकर कुमारियों और युवतियों में। (सर्वासु खलु नारीषु ममाधिष्ठानमुत्तमम्।)
* नारद पुराण: भगवती काली के भक्तों को अपने कल्याण के लिए स्त्रियों पर प्रहार, उनकी निंदा, छल या कटु वचन का सर्वथा त्याग करना चाहिए। (स्त्रीणां प्रहारं निन्दां च कौटिल्यं वाप्रियं वच:।)
४. पृथ्वी के तीन मंगल: ब्राह्मण, स्त्री और गाय
शास्त्रों में ब्राह्मण, स्त्री और गाय को पृथ्वी का मंगल-त्रय (तीन कल्याणकारी तत्त्व) माना गया है। यदि ये दंड के योग्य भी हों, तो भी इन्हें दंडित नहीं करना चाहिए:
> ब्राह्मणांश्च स्त्रियो गाश्च पुष्पेणापि न ताडयेत्।।
> स्त्रियो गावो ब्राह्मणाश्च पृथिव्यां मङ्गलत्रयम्।।
> इन्हें फूल से भी मारना अपने ही इष्टदेव को मारने के समान माना गया है। स्त्री के समस्त अंगों को ऋषियों ने 'तीर्थ रूप' कहा है।
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५. जीवन के चार रूपों में स्त्री का वैभव
स्त्री हमारे जीवन में मुख्य रूप से चार रूपों में आती है—माता, बहन, पत्नी और पुत्री। महर्षि याज्ञवल्क्य के अनुसार, पति, पिता, भाई, सास-ससुर और देवर आदि सभी के द्वारा स्त्री को सदैव सम्मान मिलना चाहिए।
> वर्णेषु ब्राह्मण: श्रेष्ठो गुरुर्माता गुरुष्वपि।।
> नास्ति भगिनीसमा मान्या नास्ति मातृसमो गुरु:।।
> नास्ति भार्यासमं मित्रम्।। गृहेषु तनया भूषा...
> अर्थात, गुरुओं में 'माता' सबसे बड़ी गुरु हैं। बहन के समान कोई माननीया नहीं, पत्नी के समान कोई सच्चा मित्र नहीं, और 'पुत्री' ही घर की असली शोभा है। स्त्री की पवित्रता असीमित है; अत्रि संहिता के अनुसार वह रजस्वला होने के पश्चात सर्वथा शुद्ध हो जाती है।
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६. अपवाद: ताड़का और पूतना वध का कारण
जब स्त्री जाति सर्वथा अवध्या है, तो भगवान राम द्वारा ताड़का और श्रीकृष्ण द्वारा पूतना का वध क्यों किया गया? महर्षि विश्वामित्र रामायण में इसका उत्तर देते हुए राम से कहते हैं:
> नृशंसमनृशंसं वा प्रजारक्षणकारणात्। पातकं वा सदोषं वा कर्त्तव्यं रक्षता सदा।।
> अर्थात, राजा का परम धर्म चारों वर्णों और प्रजा की रक्षा करना है। यदि कोई दुष्ट (जैसे ताड़का) असंख्य स्त्री-पुरुषों का भक्षण कर रहा हो, तो प्रजा-रक्षण के लिए दोषयुक्त कर्म (वध) करना भी धर्म है। यही नियम पूतना पर भी लागू होता है। इन विशेष परिस्थितियों को छोड़कर स्त्री सर्वथा दोषरहिता, शुद्ध और सम्माननीया है।
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दुर्गा सप्तशती में स्पष्ट उद्घोष है कि संसार की समस्त विद्याएं और सभी स्त्रियां माता की ही भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं (विद्या: समस्तास्तव देवि भेदा: स्त्रिय: समस्ता: सकला जगत्सु)। इसलिए सनातन धर्म का अंतिम और सर्वोच्च संदेश यही है कि प्रत्येक स्त्री में बिना किसी भेदभाव के साक्षात् जगदम्बा का दर्शन करें:
👉 जगदम्बामयं पश्य स्त्रीमात्रमविशेषतः।।
