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शुभ-अशुभ लक्षण

सामुद्रिक शास्त्र में शुभाशुभ लक्षण जातक, रमल, केरलीय प्रश्न आदि अंगों की तरह सामुद्रिक शास्त्र भी ज्योतिषशास्त्र का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। पौराणिक आचार्यों का कथन है कि भगवान विष्णु ने सामुद्रिक नामक ब्राह्मण का अवतार लेकर जो फल कथन किया है उसे सामुद्रिक शास्त्र कहा गया है। कुछ अन्य लोगों का मत है कि समुद्र में शयन करने वाले भगवान विष्णु और लक्ष्मी के सौन्दर्य तथा शुभ लक्षणों को देखकर समुद्रदेव ने ही इस शास्त्र का निर्माण किया है। पुरुषोत्तमस्य लक्ष्म्या समं निजोत्सङ्गमधिशयानस्य। शुभलक्षणानि दृष्ट्वा क्षणं समुद्रः पुरा दध्यौ।। (सामुद्रिकशास्त्र, १३) अन्य आचार्यों का मत है कि समस्त शास्त्र भगवान शिव से उत्पन्न हैं और शिव ही त्रिभुवन गुरु हैं। अत: शंकर जी ने प्राणियों के शुभाशुभ लक्षणों का जो वर्णन पार्वती जी से किया था वही विषय सामुद्रिक शास्त्र के नाम से जाना गया है। वस्तुत: समुद्र अगाध है तथा प्राणियों के चिह्न (लक्षण) भी अगाध असंख्य हैं अत: जिस शास्त्र के द्वारा असंख्य लक्षणों का वर्णन प्राप्त होता है उस अंश को सामुद्रिक नाम दिया गया है। प्राणियों की आकृति, चिह्न, तिल, मशक आदि, हस्...