मंगलवार, 28 जनवरी 2025

त्रिशंकु की स्वर्गयात्रा

 त्रिशंकु की स्वर्गयात्रा

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इक्ष्वाकु वंश में त्रिशंकु नाम के एक राजा हुये। त्रिशंकु की इच्छा सशरीर स्वर्ग जाने की थी 


अपनी वार्ता जारी रखते हुये मिथिला के राजपुरोहित शतानन्द जी ने कहा, "इस बीच इक्ष्वाकु वंश में त्रिशंकु नाम के एक राजा हुये। त्रिशंकु की इच्छा सशरीर स्वर्ग जाने की थी अतः इसके लिए उन्होंने वशिष्ठ जी से यज्ञ करने के लिए कहा। वशिष्ठ जी ने बताया कि कि मुझमें इतनी सामर्थ्य नहीं है कि मैं किसी व्यक्ति को शरीर सहित स्वर्ग भेज सकूँ। वशिष्ठ जी के असमर्थता प्रकट करने पर त्रिशंकु ने यही प्रार्थना वशिष्ठ जी के पुत्रों से भी की जो दक्षिण प्रान्त में घोर तपस्या कर रहे थे। इस पर वशिष्ठ जी के पुत्रों ने कहा कि 'अरे मूर्ख! जिस काम को हमारे पिता नहीं कर सके तू उसे हम से कराना चाहता है। ऐसा प्रतीत होता है कि तू हमारे पिता का अपमान करने के लिये यहाँ आया है।' उनके इस प्रकार कहने से त्रिशंकु ने क्रोधित होकर वशिष्ठ जी के पुत्रों को अपशब्द कहे। वशिष्ठ जी के पुत्रों ने रुष्ट होकर त्रिशंकु को चाण्डाल हो जाने का शाप दे दिया।


"शाप के कारण त्रिशंकु का सुन्दर शरीर काला पड़ गया। सिर के बाल चाण्डालों जैसे छोटे छोटे हो गये। गले में हड्डियों की माला पड़ गई। हाथ पैरों में लोहे की कड़े पड़ गये। त्रिशंकु का ऐसा वेश देखकर उनके मन्त्री तथा दरबारी उनका साथ छोड़कर चले गये। फिर भी उन्होंने सशरीर स्वर्ग जाने की इच्छा का परित्याग नहीं किया। वे विश्वामित्र के पास जाकर बोले कि ऋषिराज! आप महान तपस्वी हैं। मेरी सशरीर स्वर्ग जाने की इच्छा को पूर्ण करके मुझे कृतार्थ कीजिये। विश्वामित्र ने कहा कि राजन्! तुम मेरी शरण में आये हो। मैं तुम्हारी इच्छा अवश्य पूर्ण करूँगा। इतना कहकर विश्वामित्र ने अपने उन चारों पुत्रों को बुलाया जो दक्षिण प्रान्त में अपनी पत्नी के साथ तपस्या करते हुये उन्हें प्राप्त हुये थे और उनसे यज्ञ की सामग्री एकत्रित करने के लिये कहा। उन्होंने अपने शिष्यों के द्वारा वशिष्ठ के पुत्रों सहित वन में रहने वाले सब ऋषि-मुनियों को यज्ञ में सम्मिलित होने के लिये निमन्त्रण भी भिजवा दिया।


"शिष्यों ने लौटकर बताया कि सब ऋषि-मुनियों ने निमन्त्रण स्वीकार कर लिया है किन्तु वशिष्ठ जी के पुत्रों ने यह कहकर निमन्त्रण अस्वीकार कर दिया कि जिस यज्ञ में यजमान चाण्डाल और पुरोहित क्षत्रिय हो उस यज्ञ का भाग हम स्वीकार नहीं कर सकते। यह सुनकर विश्वामित्र जी ने क्रुद्ध होकर कहा कि उन्होंने अकारण ही मेरा अपमान किया है। मैं उन्हें शाप देता हूँ कि उन सबका नाश हो। आज ही वे सब कालपाश में बँध कर यमलोक को जायें और सात सौ वर्षों तक चाण्डाल योनि में विचरण करें। उन्हें खाने के लिये केवल कुत्ते का माँस मिले और सदैव कुरूप बने रहें। इस प्रकार शाप देकर वे यज्ञ की तैयारी में लग गये।"


शतानन्द जी ने आगे कहा, "हे राघव! विश्वामित्र के शाप से वशिष्ठ जी के पुत्र यमलोक सिधार गये। वशिष्ठ जी के पुत्रों के परिणाम से भयभीत सभी ऋषि मुनियों ने यज्ञ में विश्वामित्र का साथ दिया। यज्ञ की समाप्ति पर विश्वामित्र ने सब देवताओं को नाम ले लेकर अपने यज्ञ भाग ग्रहण करने के लिये आह्वान किया किन्तु कोई भी देवता अपना भाग लेने नहीं आया। इस पर क्रुद्ध होकर विश्वामित्र ने अर्ध्य हाथ में लेकर कहा कि 'हे त्रिशंकु! मैं तुझे अपनी तपस्या के बल से स्वर्ग भेजता हूँ' इतना कह कर विश्वामित्र ने मन्त्र पढ़ते हुये आकाश में जल छिड़का और राजा त्रिशंकु शरीर सहित आकाश में चढ़ते हुये स्वर्ग जा पहुँचे। त्रिशंकु को स्वर्ग में आया देख इन्द्र ने क्रोध से कहा कि 'रे मूर्ख! तुझे तेरे गुरु ने शाप दिया है इसलिये तू स्वर्ग में रहने योग्य नहीं है'।


इन्द्र के ऐसा कहते ही त्रिशंकु सिर के बल पृथ्वी पर गिरने लगे और विश्वामित्र से अपनी रक्षा की प्रार्थना करने लगे। विश्वामित्र ने उन्हें वहीं ठहरने का आदेश दिया और वे अधर में ही सिर के बल लटक गये। त्रिशंकु की पीड़ा की कल्पना करके विश्वामित्र ने उसी स्थान पर अपनी तपस्या के बल से स्वर्ग की सृष्टि कर दी और नये तारे तथा दक्षिण दिशा में सप्तर्षि मण्डल बना दिया। इसके बाद उन्होंने नये इन्द्र की सृष्टि करने का विचार किया जिससे इन्द्र सहित सभी देवता भयभीत होकर विश्वामित्र से अनुनय विनय करने लगे। वे बोले कि हमने त्रिशंकु को केवल इसलिये लौटा दिया था कि वे गुरु के शाप के कारण स्वर्ग में नहीं रह सकते थे।


इन्द्र की बात सुन कर विश्वामित्र जी बोले कि मैंने इसे स्वर्ग भेजने का वचन दिया है इसलिये मेरे द्वारा बनाया गया यह स्वर्ग मण्डल हमेशा रहेगा और त्रिशंकु सदा इस नक्षत्र मण्डल में अमर होकर राज्य करेगा। इससे सन्तुष्ट होकर इन्द्रादि देवता अपने अपने स्थानों को वापस चले गये।


।। जय जय सियाराम ।।

सूतक और पातक

 क्या होता है सूतक और पातक, क्यों इनके नियमों का पालन करना है जरूरी?



सनातन धर्म में सूतक और पातक दोनों ही विशेष अवधारणाएँ हैं जो शुद्धि और अशुद्धि के संदर्भ में उपयोग की जाती हैं। ये अवधारणाएँ विभिन्न धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक नियमों का पालन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।


सूतक:

सूतक का संबंध अशुद्धि की अवधि से है जो किसी विशेष घटना के बाद लगती है। यह मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है:

1. **जन्म सूतक**: किसी परिवार में बच्चे के जन्म के बाद लगने वाली अशुद्धि की अवधि को जन्म सूतक कहा जाता है। यह अवधि सामान्यतः दस दिनों तक रहती है, लेकिन विभिन्न समुदायों में इसका समय भिन्न हो सकता है। इस दौरान परिवार के सदस्य कुछ धार्मिक कृत्यों से परहेज करते हैं।


2. **मृत्यु सूतक**: किसी परिवार के सदस्य की मृत्यु के बाद लगने वाली अशुद्धि की अवधि को मृत्यु सूतक कहा जाता है। यह अवधि भी सामान्यतः तेरह दिनों की होती है, लेकिन इसके नियम और अवधि भी विभिन्न समुदायों में अलग-अलग हो सकती है। इस अवधि के दौरान परिवार के सदस्य विभिन्न धार्मिक और सामाजिक कृत्यों में भाग नहीं लेते हैं।


पातक:

पातक का संबंध पाप या दोष से है, जो किसी अनुचित या अधार्मिक कार्य को करने से उत्पन्न होता है। 

 बुरे कर्मों या पाप के कारण होने वाली नैतिक और धार्मिक अशुद्धि, जिससे मुक्त होने के लिए प्रायश्चित करना पड़ता है।


सूतक का सम्बन्ध "जन्म के" निमित्त से हुई अशुद्धि से है !

जन्म के अवसर पर जो नाल काटा जाता है और जन्म होने की प्रक्रिया में अन्य प्रकार की जो हिंसा होती है, उसमे लगने वाले दोष/पाप के प्रायश्चित स्वरुप "सूतक" माना जाता है !


जन्म के बाद नवजात की पीढ़ियों को हुई अशुचिता :-

3 पीढ़ी तक - 10 दिन

4 पीढ़ी तक - 10 दिन

5 पीढ़ी तक - 6 दिन


ध्यान दें :- एक रसोई में भोजन करने वालों के पीढ़ी नहीं गिनी जाती ... वहाँ पूरा 10 दिन का सूतक माना है !

प्रसूति (नवजात की माँ) को 45 दिन का सूतक रहता है !

प्रसूति स्थान 1 माह तक अशुद्ध है ! इसीलिए कई लोग जब भी अस्पताल से घर आते हैं तो स्नान करते हैं !


अपनी पुत्री :-

पीहर में जनै तो हमे 3 दिन का,

ससुराल में जन्म दे तो उन्हें 10 दिन का सूतक रहता है ! और हमे कोई सूतक नहीं रहता है !


नौकर-चाकर :-

अपने घर में जन्म दे तो 1 दिन का,

बाहर दे तो हमे कोई सूतक नहीं ! पालतू पशुओं का :-

घर के पालतू गाय, भैंस, घोड़ी, बकरी इत्यादि को घर में बच्चा होने पर हमे 1 दिन का सूतक रहता है !

किन्तु घर से दूर-बाहर जन्म होने पर कोई सूतक नहीं रहता !

बच्चा देने वाली गाय, भैंस और बकरी का दूध, क्रमशः 12 दिन, 10 दिन और 6 दिन तक "अभक्ष्य/अशुद्ध" रहता है !


पातक :-

पातक का सम्बन्ध "मरण के" निम्मित से हुई अशुद्धि से है !

मरण के अवसर पर दाह-संस्कार इत्यादि में जो हिंसा होती है, उसमे लगने वाले दोष/पाप के प्रायश्चित स्वरुप "पातक" माना जाता है !


मरण के बाद हुई अशुचिता :-

3 पीढ़ी तक - 12 दिन

4 पीढ़ी तक - 10 दिन

5 पीढ़ी तक - 6 दिन


ध्यान दें :- जिस दिन मृत्यु होती है, उस दिन से पातक के दिनों की गणना होती है।

यदि घर का कोई सदस्य बाहर/विदेश में है, तो जिस दिन उसे सूचना मिलती है, उस दिन से शेष दिनों तक उसके पातक लगता है !


अगर 12 दिन बाद सूचना मिले तो स्नान-मात्र करने से शुद्धि हो जाती है !

किसी स्त्री के यदि गर्भपात हुआ हो तो, जितने माह का गर्भ पतित हुआ, उतने ही दिन का पातक मानना चाहिए !

घर का कोई सदस्य मुनि-आर्यिका-तपस्वी बन गया हो तो, उसे घर में होने वाले जन्म-मरण का सूतक-पातक नहीं लगता है ! किन्तु स्वयं उसका ही मरण हो जाने पर उसके घर वालों को 1 दिन का पातक लगता है !


किसी अन्य की शवयात्रा में जाने वाले को 1 दिन का, मुर्दा छूने वाले को 3 दिन और मुर्दे को कन्धा देने वाले को 8 दिन की अशुद्धि जाननी चाहिए !

घर में कोई आत्मघात कर ले तो 6 महीने का पातक मानना चाहिए !


यदि कोई स्त्री अपने पति के मोह/निर्मोह से जल मरे, बालक पढाई में फेल होकर या कोई अपने ऊपर दोष देकर मरता है तो इनका पातक बारह पक्ष याने 6 महीने का होता है !


उसके अलावा भी कहा है कि :-

जिसके घर में इस प्रकार अपघात होता है, वहाँ छह महीने तक कोई बुद्धिमान मनुष्य भोजन अथवा जल भी ग्रहण नहीं करता है ! वह मंदिर नहीं जाता और ना ही उस घर का द्रव्य मंदिर जी में चढ़ाया जाता है ! 

(क्रियाकोष १३१९-१३२०)

अनाचारी स्त्री-पुरुष के हर समय ही पातक रहता है। 

सूतक-पातक की अवधि में "देव-शास्त्र-गुरु" का पूजन, प्रक्षाल, आहार आदि धार्मिक क्रियाएं वर्जित होती हैं !


इन दिनों में मंदिर के उपकरणों को स्पर्श करने का भी निषेध है !

यहाँ तक की गुल्लक में रुपया डालने का भी निषेध बताया है !


सूतक-पातक के नियम : --

1. सूतक और पातक में अन्य व्यक्तियों को स्पर्श न करें।

2. कोई भी धर्मकृत्य अथवा मांगलिक कार्य न करें तथा सामाजिक कार्य में भी सहभागी न हों।

3. अन्यों की पंगत में भोजन न करें।

4. किसी के घर न जाएं और ना ही किसी भी प्रकार का भ्रमण करें। घर में ही रहकर नियमों का पालन करें।

5. किसी का जन्म हुआ है तो शुद्धि का ध्यान रखते हुए भगवान का भजन करें और यदि कोई मर गया है तो गरुड़ पुराण सुनकर समय गुजारें।

6. सूतक या पातक काल समाप्त होने पर स्नान तथा पंचगव्य (गाय के दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर का मिश्रण) सेवन कर शुद्ध हो जाएं।

7. सूतक पातक की अवधि में देव शास्त्र गुरु, पूजन प्राक्षाल, आहार आदि धार्मिक क्रियाएं वर्जित होती है।

8. जिस व्यक्ति या परिवार के घर में सूतक-पातक रहता है, उस व्यक्ति और परिवार के सभी सदस्यों को कोई छूता भी नहीं है। वहां का अन्न-जल भी ग्रहण नहीं करता है। वह परिवार भी मंदिर सहित किसी के घर नहीं जा सकता है और न किसी का भोग, पानी या प्रसाद नही ग्रहण करना चाहिए ।

यह सूतक-पातक आर्ष-ग्रंथों से मान्य है !


कहीं कहीं लोग सूतक-पातक के दिनों में मंदिर ना जाकर इसकी समाप्ति के बाद मंदिर से गंधोदक लाकर शुद्धि के लिए घर-दुकान में छिड़कते हैं, ऐसा करके नियम से घोर पाप का बंध करते हैं !

इन्हे समझना इसलिए ज़रूरी है, ताकि अब आगे घर-परिवार में हुए जन्म-मरण के अवसरों पर अनजाने से भी कहीं दोष का उपार्जन न हो। 

जीवन अगर खुशियों से भरा है तो वह बहुत छोटा लगता है, ऐसा लगता है यह सफर कितनी जल्दी समाप्त होने जा रहा है। वहीं अगर सिर्फ गम के साये में ही समय बीत रहा हो तो एक-एक दिन भी बोझिल हो जाता है और ऐसा लगता है ना जाने यह सफर अचानक इतना लंबा कैसे हो गया। 


 अंधविश्वास या व्यवहारिक

अकसर इसे एक अंधविश्वास मान लिया जाता है जबकि इसके पीछे छिपे बड़े ही प्रैक्टिकल कारण की तरफ ध्यान नहीं दिया जाता। 

 पहले के दौर में संयुक्त परिवारों का चलन ज्यादा था। घर की महिलाओं को हर हालत में पारिवारिक सदस्यों की जरूरतों को पूरा करना होता था। लेकिन बच्चे को जन्म देने के बाद महिलाओं का शरीर बहुत कमजोर हो जाता है।

 स्त्री को आराम देना

उन्हें हर संभव आराम की जरूरत होती है जो उस समय संयुक्त परिवार में मिलना मुश्किल हो सकता था, इसलिए सूतक के नाम पर इस समय उन्हें आराम दिया जाता था ताकि वे अपने दर्द और थकान से बाहर निकल पाएं।


संक्रमण का खतरा

 जब बच्चे का जन्म होता है तो उसके शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास भी नहीं हुआ होता। वह बहुत ही जल्द संक्रमण के दायरे में आ सकता है, इसलिए 10-30 दिनों की समयावधि में उसे बाहरी लोगों से दूर रखा जाता था, उसे घर से बाहर नहीं लेकर जाया जाता था। बाद में जरूर सूतक को एक अंधविश्वास मान लिया गया लेकिन इसका मौलिक उद्देश्य स्त्री के शरीर को आराम देना और शिशु के स्वास्थ्य का ख्याल रखने से ही था।

 बच्चे का शरीर

आज के समय में वे बच्चे जो जन्म के समय काफी कमजोर होते हैं उन्हें डॉक्टर इंक्यूबेटर में रखते हैं ताकि वे बाहरी वातावरण के लिए शारीरिक तौर पर तैयार हो जाएं। 


 मृत्यु के पश्चात सूतक

जिस तरह जन्म के समय परिवार के सदस्यों पर सूतक लग जाता है उसी तरह परिवार के लिए सदस्य की मृत्यु के पश्चात सूतक का साया लग जाता है, जिसे ‘पातक’ कहा जाता है। इस समय भी परिवार का कोई सदस्य ना तो मंदिर या किसी अन्य धार्मिक स्थल जा सकता है और ना ही किसी धार्मिक कार्य का हिस्सा बन सकता है।

 स्नान का महत्व

यह भी मात्र अंधविश्वास ना होकर बहुत साइंटिफिक कहा जा सकता है क्योंकि या तो किसी लंबी और घातक बीमारी या फिर एक्सिडेंट की वजह से या फिर वृद्धावस्था के कारण व्यक्ति की मृत्यु होती है। 


कारण चाहे कुछ भी हो लेकिन इन सभी की वजह से संक्रमण फैलने की संभावनाएं बहुत हद तक बढ़ जाती हैं। इसलिए ऐसा कहा जाता है कि दाह-संस्कार के पश्चात स्नान आवश्यक है ताकि श्मशान घाट और घर के भीतर मौजूद कीटाणुओं से मुक्ति मिल सके।


 प्राचीन ऋषि-मुनि

प्राचीन भारत के ऋषि-मुनियों और ज्ञानियों ने बिना किसी ठोस कारण के कोई भी नियम नहीं बनाए। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र की जांच और उसे गहराई से समझने के बाद ही दिशा-निर्देश दिए गए, जो बेहद व्यवहारिक हैं। परंतु आज के दौर में उनकी व्यवहारिकता को समाप्त कर उन्हें मात्र एक अंधविश्वास की तरह अपना लिया गया है।


शुक्रवार, 24 जनवरी 2025

देवीपार्वती के 108 नाम और इनका अर्थ

 देवीपार्वती के 108 नाम और इनका अर्थ

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देवी पार्वती विभिन्न नामों से जानी जाता है और उनमें से हर एक नाम का एक निश्चित अर्थ और महत्व है। देवी पार्वती से 108 नाम जुड़े हुए है । भक्त बालिकाओं के नाम के लिए इस नाम का उपयोग करते है। 


1 . आद्य - इस नाम का मतलब प्रारंभिक वास्तविकता है।

2 . आर्या - यह देवी का नाम है

3 . अभव्या - यह भय का प्रतीक है।

4 . अएंदरी - भगवान इंद्र की शक्ति।

5 . अग्निज्वाला - यह आग का प्रतीक है।

6 . अहंकारा - यह गौरव का प्रतिक है ।

7 . अमेया - नाम उपाय से परे का प्रतीक है।

8 . अनंता - यह अनंत का एक प्रतीक है।

9 . अनंता - अनंत

10 अनेकशस्त्रहस्ता - इसका मतलब है कई हतियारो को रखने वाला ।

11 . अनेकास्त्रधारिणी - इसका मतलब है कई हतियारो को रखने वाला ।

12 . अनेकावारना - कई रंगों का व्यक्ति ।

13 . अपर्णा – एक व्यक्ति जो उपवास के दौरान कुछ नहि कहता है यह उसका प्रतिक है ।

14 . अप्रौधा – जो व्यक्ति उम्र नहि करता यह उसका प्रतिक है ।

15 . बहुला - विभिन्न रूपों ।

16 . बहुलप्रेमा - हर किसी से प्यार ।

17 . बलप्रदा - यह ताकत का दाता का प्रतीक है ।

18 . भाविनी - खूबसूरत औरत ।

19 . भव्य – भविष्य ।

20 . भद्राकाली - काली देवी के रूपों में से एक ।

21 . भवानी - यह ब्रह्मांड की निवासी है ।

22 . भवमोचनी - ब्रह्मांड की समीक्षक ।

23 . भवप्रीता - ब्रह्मांड में हर किसी से प्यार पाने वाली ।

24 . भव्य - यह भव्यता का प्रति है ।

25 . ब्राह्मी - भगवान ब्रह्मा की शक्ति ।

26 . ब्रह्मवादिनी – हर जगह उपस्तित ।

27 . बुद्धि - ज्ञानी

28 . बुध्हिदा - ज्ञान की दातरि ।

29 . चामुंडा - राक्षसों चंदा और मुंडा की हत्या करने वलि देवि ।

30 . चंद्रघंटा - ताकतवर घंटी

31 . चंदामुन्दा विनाशिनी - देवी जिसने चंदा और मुंडा की हत्या की ।

32 . चिन्ता - तनाव ।

33 . चिता - मृत्यु - बिस्तर ।

34 . चिति - सोच मन ।

35 . चित्रा - सुरम्य ।

36 . चित्तरूपा - सोच या विचारशील राज्य ।

37 . दक्शाकन्या - यह दक्षा की बेटी का नाम है ।

38 . दक्शायाज्नाविनाशिनी - दक्षा के बलिदान को टोकनेवाला ।

39 . देवमाता - देवी माँ ।

40 . दुर्गा - अपराजेय ।

41 . एककन्या - बालिका ।

42 . घोररूपा - भयंकर रूप ।

43 . ज्ञाना - ज्ञान ।

44 . जलोदरी - ब्रह्मांड मेइन वास करने वाली ।

45 . जया - विजयी

46 कालरात्रि - देवी जो कालि है और रात के समान है ।

47 . किशोरी - किशोर

48 . कलामंजिराराजिनी - संगीत पायल ।

49 . कराली - हिंसक

50 . कात्यायनी - बाबा कत्यानन इस नाम को पूजते है ।

51 . कौमारी - किशोर ।

52 . कोमारी - सुंदर किशोर ।

53 . क्रिया - लड़ाई ।

54 . क्र्रूना - क्रूर ।

55 . लक्ष्मी - धन की देवी ।

56 . महेश्वारी - भगवान शिव की शक्ति ।

57 . मातंगी - मतंगा की देवी ।

58 . मधुकैताभाहंत्री - देवी जिसने राक्षसों मधु और कैताभा को आर दिया ।

59 . महाबला - शक्ति ।

60 . महातपा - तपस्या ।

61 . महोदरी - एक विशाल पेट में ब्रह्मांड में रखते हुए ।

62 . मनः - मन ।

63 . मतंगामुनिपुजिता - बाबा मतंगा द्वारा पूजी जाती है ।

64 . मुक्ताकेशा - खुले बाल ।

65 . नारायणी - भगवान नारायण विनाशकारी विशेषताएँ ।

66 . निशुम्भाशुम्भाहनानी - देवी जिसने भाइयो शुम्भा निशुम्भा को मारा ।

67 . महिषासुर मर्दिनी - महिषासुर राक्षस को मार डाला जो देवी ने ।

68 नित्या - अनन्त ।

69 . पाताला - रंग लाल ।

70 . पातालावती - लाल और सफ़द पहेने वाली ।

71 . परमेश्वरी - अंतिम देवी ।

72 . पत्ताम्बरापरिधान्ना - चमड़े से बना हुआ कपडा ।

73 . पिनाकधारिणी - शिव का त्रिशूल ।

74 . प्रत्यक्ष – असली ।

75 . प्रौढ़ा - पुराना ।

76 . पुरुषाकृति - आदमी का रूप लेने वाला ।

77 . रत्नप्रिया - सजी

78 . रौद्रमुखी - विनाशक रुद्र की तरह भयंकर चेहरा ।

79 . साध्वी - आशावादी ।

80 . सदगति - मोक्ष कन्यादान ।

81 . सर्वास्त्रधारिणी - मिसाइल हथियारों के स्वामी ।

82 . सर्वदाना वाघातिनी - सभी राक्षसों को मारने के लिए योग्यता है जिसमें ।

83 . सर्वमंत्रमयी - सोच के उपकरण ।

84 . सर्वशास्त्रमयी - चतुर सभी सिद्धांतों में ।

85 . सर्ववाहना - सभी वाहनों की सवारी ।

86 . सर्वविद्या - जानकार ।

87 . सती - जो महिला जिसने अपने पति के अपमान पर अपने आप को जला दिया ।

89 . सत्ता - सब से ऊपर ।

90 . सत्य - सत्य ।

91 . सत्यानादास वरुपिनी - शाश्वत आनंद ।

92 . सावित्री - सूर्य भगवान सवित्र की बेटी ।

93 . शाम्भवी - शंभू की पत्नी ।

94 . शिवदूती - भगवान शिव के राजदूत ।

95 . शूलधारिणी – व्यक्ति जो त्र्सिहुल धारण करता है ।

96 . सुंदरी - भव्य ।

97 . सुरसुन्दरी - बहुत सुंदर ।

98 . तपस्विनी - तपस्या में लगी हुई ।

99 . त्रिनेत्र - तीन आँखों का व्यक्ति ।

100 . वाराही – जो व्यक्ति वाराह पर सवारी करता हियो ।

101 . वैष्णवी - अपराजेय ।

102 . वनदुर्गा - जंगलों की देवी ।

103 . विक्रम - हिंसक ।

104 . विमलौत्त्त्कार्शिनी - प्रदान करना खुशी ।

105 . विष्णुमाया - भगवान विष्णु का मंत्र ।

106 . वृधामत्ता - पुराना है , जो माँ ।

107 . यति - दुनिया त्याग जो व्यक्ति एक ।

108 . युवती - औरत ।

देवी पार्वती यह सभी नाम पूजा करने के लिए और उनके आशीर्वाद पाने के लिए , लिए जाते है।



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गुरुवार, 23 जनवरी 2025

क्यों किया था कृष्‍ण ने पलायन, जानें रहस्य

 क्यों किया था कृष्‍ण ने पलायन, जानें रहस्य...

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कहते हैं कि राधा और कृष्ण के प्रेम की शुरुआत बचपन में ही हो गई थी। कृष्ण नंदगांव में रहते थे और राधा बरसाने में। नंदगांव और बरसाने से मथुरा लगभग 42-45 किलोमीटर दूर है। अब सवाल यह उठता है कि जब 11 वर्ष की अवस्था में श्रीकृष्ण मथुरा चले गए थे, तो इतनी लघु अवस्था में गोपियों के साथ प्रेम या रास की कल्पना कैसे की जा सकती है? मथुरा में उन्होंने कंस से लोहा लिया और कंस का अंत करने के बाद तो जरासंध उनकी जान का दुश्मन बन गया था जो शक्तिशाली मगथ का सम्राट था और जिसे कई जनपदों का सहयोग था। उससे दुश्मनी के चलते श्रीकृष्ण को कई वर्षों तक तो भागते रहना पड़ा था। जब परशुराम ने उनको सुदर्शन चक्र दिया तब जाकर कहीं आराम मिला। लेकिन इसके पीछे का सच भी जानेंगे अगले पन्नों पर।


उल्लेखनीय है कि महाभारत या भागवत पुराण में 'राधा' के नाम का उल्लेख नहीं मिलता है। फिर यह राधा नाम की महिला भगवान कृष्ण के जीवन में कैसे आ गई या कहीं यह मध्यकाल के कवियों की कल्पना तो नहीं?


यह सच है कि कृष्ण से जुड़े ग्रंथों में राधा का नाम नहीं है। सुखदेवजी ने भी भागवत में राधा का नाम नहीं लिया। यदि भगवान कृष्ण के जीवन में राधा का जरा भी महत्व था, तो क्यों नहीं राधा का नाम कृष्ण से जुड़े ग्रंथों में मिलता है? या कहीं ऐसा तो नहीं की वेद व्यासजी ने जानबूझकर श्रीकृष्ण और राधा के प्रेम प्रसंग को नहीं लिखा?


कृष्ण के साथ राधा भक्ति की शुरुआत कहां से हुई

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भक्तिकाल : माना जाता है कि मध्यकाल या भक्तिकाल में राधा और कृष्ण की प्रेमकथा को विस्तार मिला। अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया गया और कृष्ण के योद्धा चरित्र का नाश कर दिया गया। राधा-कृष्ण की भक्ति की शुरुआत निम्बार्क संप्रदाय, वल्लभ-संप्रदाय, राधावल्लभ संप्रदाय, सखीभाव संप्रदाय आदि ने की। निम्बार्क, चैतन्य, बल्लभ, राधावल्लभ, स्वामी हरिदास का सखी- ये संप्रदाय राधा-कृष्ण भक्ति के 5 स्तंभ बनकर खड़े हैं। निम्बार्क का जन्म 1250 ईस्वी में हुआ। इसका मतलब कृष्ण की भक्ति के साथ राधा की भक्ति की शुरुआत मध्यकाल में हुई। उसके पूर्व यह प्रचलन में नहीं थी?


पांचों संप्रदायों में सबसे प्राचीन निम्बार्क और राधावल्लभ दो संप्रदाय हैं।दक्षिण के आचार्य निम्बार्कजी ने सर्वप्रथम राधा-कृष्ण की युगल उपासना का प्रचलन किया। राधावल्भ संप्रदाय के लोग कहते हैं कि राधावल्लभ संप्रदाय के प्रवर्तक श्रीकृष्ण वंशी अवतार कहे जाने वाले और वृंदावन के प्राचीन गौरव को पुनर्स्थापित करने वाले रसिकाचार्य हित हरिवंशजी महाप्रभु के संप्रदाय की प्रवर्तक आचार्य राधा हैं।


इन दोनों संप्रदायों मेंराधाष्टमीके उत्सव का विशेष महत्व है। निम्बार्क व राधावल्लभ संप्रदाय का प्रमुख गढ़ वृंदावन है। निम्बार्क संप्रदाय के विद्वान व वृंदावन शोध संस्थान से जुड़े छीपी गली निवासी वृंदावन बिहारी कहते हैं कि कृष्ण सर्वोच्च प्रेमी थे। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था। वैष्णवाचार्यों ने भी अपने-अपने तरीकों से उनकी आराधना की है।


निम्बार्क संप्रदाय कहता है कि श्याम और श्यामा का एक ही स्वरूप हैं। भगवान कृष्ण ने अपनी लीलाओं के लिए स्वयं से राधा का प्राकट्य किया और दो शरीर धारण कर लिए। लेकिन यह तो भक्तिभाव में कही गई बाते हैं, इनमें तथ्‍य कहां है? इतिहास अलौकिक बातों से नहीं बनता। ऐसी बातें करने वालों को झूठा माना जाता है और ऐसे ही लोग तो धर्म की प्रतिष्ठा गिराते हैं। आखिर सच क्या है?जानते हैं अगले पन्नों पर...


 कौन थीं राधा

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बरसाना और नंदगांव :राधा का जिक्र पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है। पद्म पुराण के अनुसार राधा वृषभानु नामक गोप की पुत्री थीं। वृषभानु वैश्य थे। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार राधा कृष्ण की मित्र थीं और उसका विवाह रापाण, रायाण अथवा अयनघोष नामक व्यक्ति के साथ हुआ था। उस जमाने में स्त्री का विवाह किशोर अवस्था में ही कर दिया जाता था। बरसाना और नंदगाव के बीच 4 मील का फासला है।


महाभारत के सभी प्रमुख पात्र भीष्म, द्रोण, व्यास, कर्ण, अर्जुन, युधिष्ठिर आदि श्रीकृष्ण के महान-चरित्र की प्रशंसा करते थे। उस काल में भी परस्त्री से अवैध संबंध रखना दुराचार माना जाता था। यदि श्रीकृष्ण का भी राधा नामक किसी औरत से संबंध हुआ होता तो श्रीकृष्ण पर भी अंगुली उठाई जाती?


बरसाना राधा के पिता वृषभानु का निवास स्थान था। बरसाने से मात्र 4 मील पर नंदगांव है, जहां श्रीकृष्ण के सौतेले पिता नंदजी का घर था। होली के दिन यहां इतनी धूम होती है कि दोनों गांव एक हो जाते हैं। बरसाने से नंदगाव टोली आती है और नंदगांव से भी टोली जाती है।


कुछ विद्वान मानते हैं कि राधाजी का जन्म यमुना के निकट स्थित रावल ग्राम में हुआ था और बाद में उनके पिता बरसाना में बस गए। लेकिन अधिकतर मानते हैं कि उनका जन्म बरसाना में हुआ था। राधारानी का विश्वप्रसिद्ध मंदिर बरसाना ग्राम की पहाड़ी पर स्थित है। बरसाना में राधा को 'लाड़ली' कहा जाता है।


बरसाना गांव के पास दो पहाड़ियां मिलती हैं। उनकी घाटी बहुत ही कम चौड़ी है। मान्यता है कि गोपियां इसी मार्ग से दही-मक्खन बेचने जाया करती थीं। यहीं पर कभी-कभी कृष्ण उनकी मक्खन वाली मटकी छीन लिया करते थे।


गौरतलब है कि मथुरा में कृष्ण के जन्म के बाद कंस के सभी सैनिकों को नींद आ गई थी और वासुदेव की बेड़ियां किसी चमत्कार से खुल गई थीं, तब वासुदेवजी भगवान कृष्ण को नंदगांव में नंदराय के यहां आधी रात को छोड़ आए थे। कुछ मानते हैं कि वे मथुरा के पास गोकुल में यशोदा के मायके छोड़ आए थे, जहां से यशोदा उन्हें नंदगांव ले गईं।


नंद के घर लाला का जन्म हुआ है, ऐसी खबर धीरे-धीरे गांव में फैल गई। यह सुनकर सभी नंदगांववासी खुशियां मनाने लगे। कृष्ण ने नंदगांव में रहते हुए पूतना, शकटासुर, तृणावर्त आदि असुरों का वध किया। यहां के घाट और उसके पास अन्य मनोरम स्थल हैं, जैसे- गोविंद घाट, गोकुलनाथजी का बाग, बाजनटीला, सिंहपौड़ी, यशोदा घाट, रमणरेती आदि।


गोकुल क्या है :गोकुल यमुना के तट पर बसा एक गांव है, जहां सभी नंदों की गायों का निवास स्थान था। यहीं पर रोहिणी ने बलराम को जन्म दिया था। बलराम देवकी के 7वें गर्भ में थे जिन्हें योगमाया ने आकर्षित करके रोहिणी के गर्भ में डाल दिया था। यह स्थान गोप लोगों का था। मथुरा से गोकुल की दूरी महज 12 किलोमीटर है।


श्रीचैतन्य महाप्रभु के ब्रज आगमन के पश्चात श्रीवल्लभाचार्य ने यमुना के इस मनोहर तट पर श्रीमद्भागवत का पारायाण किया था। इनके पुत्र श्रीविट्ठलाचार्य और उनके पुत्र श्रीगोकुलनाथजी की बैठकें भी यहां पर हैं। असल में श्रीविट्ठलनाथजी ने औरंगजेब को चमत्कार दिखलाकर इस स्थान का अपने नाम पर पट्टा लिया था। उन्होंने ही इस गोकुल को बसाया था। यह नंद का रहने का स्थान नहीं था। गोकुल के पास काम्यवन से कृष्ण का नाता जरूर है।


राधा की कृष्ण से पहली मुलाकात..

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संकेत तीर्थ :कहते हैं कि राधा की कृष्ण से पहली मुलाकात नंदगांव और बरसाने के बीच हुई। एक-दूसरे को देखने के बाद दोनों में सहज ही एक-दूसरे के प्रति आकर्षण बढ़ गया। माना जाता है कि यहीं से राधा-कृष्ण के प्रेम की शुरुआत हुई। इस स्थान पर आज एक मंदिर है। इसे संकेत स्थान कहा जाता है। मान्यता है कि पिछले जन्म में ही दोनों ने यह तय कर लिया था कि हमें इस स्थान पर मिलना है। उस वक्त कृष्ण की उम्र क्या रही होगी?


यहां हर साल राधा के जन्मदिन यानी राधाष्टमी से लेकर अनंत चतुर्दशी के दिन तक मेला लगता है। इन दिनों लाड़ली मंदिर में दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्घालु आते हैं और राधा-कृष्ण के प्रथम स्थल पर आकर इनके शाश्वत प्रेम को याद करते हैं।


वृंदावन से राधा-कृष्ण का क्या रिश्ता है?

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वृंदावन कृष्ण लीलाओं का स्थल :वृंदावन मथुरा से 14 किलोमीटर दूर है। मथुरा कंस का नगर है, जहां यमुना तट पर बनी जेल से मुक्त कराकर वासुदेवजी कृष्ण को नंदगांव ले गए। मथुरा से नंदगांव 42 किलोमीटर दूर है। प्राचीन वृंदावन गोवर्धन के निकट था। बरसाना मथुरा से 50 किमी दूर उत्तर-पश्चिम में और गोवर्धन से 21 किमी दूर उत्तर में स्थित है। नंदगांव तो बरसाने के बिलकुल पास है लेकिन वृंदावन से दूर।


श्रीमद्भागवत और विष्णु पुराण के अनुसार कंस के अत्याचार से बचने के लिए नंदजी कुटुंबियों और सजातियों के साथ नंदगांव से वृंदावन में आकर बस गए थे। विष्णु पुराण में वृंदावन में कृष्ण की लीलाओं का वर्णन भी है। यहां श्रीकृष्‍ण ने कालिया का दमन किया था।


रासलीला :मान्यता है कि यहीं पर श्रीकृष्‍ण और राधा एक घाट पर युगल स्नान करते थे। यहीं पर श्रीकृष्ण और गोपियां आंख-मिचौनी का खेल खेलते थे। यहीं पर श्रीकृष्ण और उनके सभी सखा और सखियां मिलकर रासलीला अर्थात तीज-त्योहारों पर नृत्य-उत्सव का आयोजन करते थे। कृष्ण की शरारतों के कारण उन्हें बांकेबिहारी कहा जाता है। यहां पर यमुना घाट के प्रत्येक घाट से भगवान कृष्ण की कथा जुड़ी हुई है।


कृष्ण ने जो नंदगांव और वृंदावन में छोटा-सा समय गुजारा था, उसको लेकर भक्तिकाल के कवियों ने ही कविताएं लिखी हैं। उनमें कितनी सच्चाई है? इतिहासकार मानते हैं कि एक सच को इतना महिमामंडित किया गया कि अब वह कल्पनापूर्ण लगता है। कृष्ण जब मथुरा में कंस को मारने गए, तब उनका जीवन पूरी तरह से बदल गया। कंस को मारने के बाद उनके जीवन में उथल-पुथल शुरू हो गई।


क्या राधा कृष्ण की मामी थीं?

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कहते हैं कि राधा ने श्रीकृष्ण के प्रेम के लिए सामाजिक बंधनों का उल्लंघन किया था। ब्रह्मवैवर्त पुराण ब्रह्मखंड के 5वें अध्याय में श्लोक 25, 26 के अनुसार राधा को कृष्ण की पुत्री सिद्ध किया गया है। राधा का पति रायाण गोलोक में श्रीकृष्ण का अंशभूत गोप था। अतः गोलोक के रिश्ते से राधा श्रीकृष्ण की पुत्रवधू हुई। माना जाता है कि गोकुल में रायाण रहते थे।


ब्रह्मवैवर्त पुराण प्रकृति खंड अध्याय 48 के अनुसार राधा कृष्ण की पत्नी (विवाहिता) थीं, जिनका विवाह ब्रह्मा ने करवाया। इसी पुराण के प्रकृति खंड अध्याय 49 श्लोक 35, 36, 37, 40, 47 के अनुसार राधा श्रीकृष्ण की मामी थीं, क्योंकि उनका विवाह कृष्ण की माता यशोदा के भाई रायाण के साथ हुआ था।


ऐसा माना जाता है कि एक जंगल में स्वयं ब्रह्मा ने राधा और कृष्ण का गंधर्व विवाह करवाया था। गर्ग संहिता के अनुसार श्रीकृष्ण के पिता उन्हें अकसर पास के भंडिर ग्राम में ले जाया करते थे। वहां उनकी मुलाकाता राधा से होती थी।


एक बार की बात है कि जब वे अपने पिता के साथ भंडिर गांव गए तो अचानक तेज रोशनी चमकी और मौसम बिगड़ने लगा, कुछ ही समय में आसपास सिर्फ और सिर्फ अंधेरा छा गया। इस अंधेरे में एक पारलौकिक शख्सियत का अनुभव हुआ। वह राधारानी के अलावा और कोई नहीं थी। अपने बाल रूप को छोड़कर श्रीकृष्ण ने किशोर रूप धारण कर लिया और इसी जंगल में ब्रह्माजी ने विशाखा और ललिता की उपस्थिति में राधा-कृष्ण का गंधर्व विवाह करवा दिया। विवाह के बाद माहौल सामान्य हो गया, राधा ब्रह्मा, विशाखा और ललिता अंतर्ध्यान हो गए।


असल में इस वास्तविक घटना को अलंकृत कर दिया गया है। राधा सचमुच ही कृष्ण से बड़ी थीं और सामाजिक दबावों के चलते यह संभव नहीं था कि उम्र में कहीं बड़ी लड़की से विवाह किया जाए। लेकिन यदि दोनों के बीच प्रेम रहा होगा तो निश्चित ही गुपचुप रूप से गंधर्व विवाह किया गया हो और इस बात को छुपाए रखा हो?


पुराणों के अनुसार देवी रुक्मणि का जन्म अष्टमी तिथि को कृष्ण पक्ष में हुआ था और श्रीकृष्ण का जन्म भी कृष्ण पक्ष में अष्टमी तिथि को हुआ था व देवी राधा वह भी अष्टमी तिथि को अवतरित हुई थीं। राधाजी के जन्म में और देवी रुक्मणि के जन्म में एक अंतर यह है कि देवी रुक्मणि का जन्म कृष्ण पक्ष में हुआ था और राधाजी का शुक्ल पक्ष में। राधाजी को नारदजी के शाप के कारण विरह सहना पड़ा और देवी रुक्मणि से कृष्णजी की शादी हुई। राधा और रुक्मणि यूं तो दो हैं, परंतु दोनों ही माता लक्ष्मी के ही अंश हैं।


रामचरित मानस के बालकांड में जैसा कि तुलसीदासजी ने लिखा है कि नारदजी को यह अभिमान हो गया था कि उन्होंने काम पर विजय प्राप्त कर ली है। नारदजी की परीक्षा लेने के लिए भगवान विष्णु ने अपनी माया से एक नगर का निर्माण किया। उस नगर के राजा ने अपनी रूपवती पुत्री के लिए स्वयंवर का आयोजन किया। स्वयंवर में नारद मुनि भी पहुंचे और कामदेव के बाणों से घायल होकर राजकुमारी को देखकर मोहित हो गए।


राजकुमारी से विवाह की इच्छा लेकर वे भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उनसे निवेदन करने लगे कि प्रभु मुझे आप अपना सुंदर रूप प्रदान करें, क्योंकि मुझे राजकुमारी से प्रेम हो गया है और मैं उससे विवाह की इच्छा रखता हूं। नारदजी के वचनों को सुनकर भगवान मुस्कुराए और कहा तुम्हें विष्णु रूप देता हूं। जब नारद विष्णु रूप लेकर स्वयंवर में पहुंचे तब उस राजकुमारी ने विष्णुजी के गले में वरमाला डाल दी। नारदजी वहां से दु:खी होकर चले आ रहे थे। मार्ग में उन्हें एक जलाशय दिखा जिसमें उन्होंने चेहरा देखा तो वे समझ गए कि विष्णु भगवान ने उनके साथ छल किया है और उन्हें वानर रूप दिया है।


नारदजी क्रोधित होकर वैकुंठ पहुंचे और भगवान को बहुत भला-बुरा कहा और उन्हें पत्नी का वियोग सहना होगा, यह श्राप दिया। नारदजी के इस श्राप की वजह से रामावतार में भगवान रामचन्द्रजी को सीता का वियोग सहना पड़ा था और कृष्णावतार में देवी राधा का।


श्रीकृष्ण ने देवी रुक्मणि के प्रेम और पतिव्रत को देखते हुए उन्हें वरदान दिया कि जो व्यक्ति पूरे वर्ष कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन आपका व्रत और पूजन करेगा और पौष मास की कृष्ण अष्टमी को व्रत कर के उसका उद्यापन यानी समापन करेगा उसे कभी धनाभाव का सामना नहीं करना होगा। जो आपका भक्त होगा उसे देवी लक्ष्मी की कृपा भी प्राप्त होगी।


राधा की कृष्ण से एक और मुलाकात...


कृष्ण की अनुपस्थिति में उसके प्रेमभाव में और भी वृद्धि हुई। जब कृष्ण वृंदावन छोड़कर मथुरा चले गए, तब राधा के लिए उन्हें देखना और उनसे मिलता और दुर्लभ हो गया।


राधा और कृष्ण दोनों का पुनर्मिलन कुरुक्षेत्र में बताया जाता है, जहां सूर्यग्रहण के अवसर पर द्वारिका से कृष्ण और वृंदावन से नंद के साथ राधा आई थीं। राधा सिर्फ कृष्ण को देखने और उनसे मिलने ही नंद के साथ गई थी। इसका जिक्र पुराणों में मिलता है।


अंत में एक अन्य कथा...

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ब्रह्मवैवर्त पुराण में आया है कि एक बार राधा गोलोक से कहीं बाहर गई थीं। उस समय श्रीकृष्ण अपनी विरजा नाम की सखी के साथ विहार कर रहे थे। संयोगवश राधा वहां आ गईं। विरजा के साथ कृष्ण को देखकर राधा क्रोधित हो गईं और कृष्ण एवं विरजा को भला-बुरा कहने लगी। लज्जावश विरजा नदी बनकर बहने लगी।


कृष्ण के प्रति राधा के क्रोधपूर्ण शब्दों को सुनकर कृष्ण का मित्र सुदामा आवेश में आ गया। सुदामा कृष्ण का पक्ष लेते हुए राधा से आवेशपूर्ण शब्दों में बात करने लगा। सुदामा के इस व्यवहार को देखकर राधा नाराज हो गईं।


राधा ने सुदामा को दानव रूप में जन्म लेने का शाप दे दिया। क्रोध में भरे हुए सुदामा ने भी हित-अहित का विचार किए बिना राधा को मनुष्य योनि में जन्म लेने का शाप दे दिया। राधा के शाप से सुदामा शंखचूर नाम का दानव बना जिसका वध भ गवान शिव ने किया। सुदामा के शाप के कारण राधा को मनुष्य रूप में जन्म लेकर धरती पर आना पड़ा।

सोमवार, 6 जनवरी 2025

स्वप्न फल


 स्वप्न फल ज्योतिष (Swapan Phal Jyotish) : स्वप्न ज्योतिष के अनुसार नींद में दिखाई देने वाले हर सपने महत्वपूर्ण संकेत को दर्शाते है, प्रत्येक स्वप्न का विशेष फल होता है। स्वप्न हमें भविष्य में होने वाली घटनाओं का संकेत देते हैं। स्वप्न और ज्योतिष एक दुसरे के सहयोगी हैं क्यूंकि ज्योतिषी हमारे स्वप्न का आंकलन कर हमारे भविष्य का स्पष्ट आंकलन कर सकते हैं। हमारी ग्रह स्थितियां ही हमें स्वप्न द्वारा सटीक भविष्य बताती हैं इसलिए हम स्वप्न को काबू नहीं कर सकते। परन्तु अगर स्वप्न में भविष्य के लिए कुछ नकारत्मक दीखता है तो किसी विशेषज्ञ के माध्यम से उसके फल को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। आध्यात्मिकता के पथ पर चलने वाले व्यक्तियों को भविष्य में घटित होने वाली कई घटनायें पहले से ही दिख जाती हैं।

स्वप्न का फल कितने समय में मिलेगा यह निर्धारित करता है कि स्वप्न रात्रि के किस पहर में देखा गया है। रात्रि में प्रथम पहर के स्वप्न का फल १ वर्ष में मिल जाता है। दुसरे पहर का फल ६ माह, तीसरे पहर का फल ३ माह में और चौथे पहर में देखे गए स्वप्न का फल १ माार में ही प्राप्त हो जाता है। सूर्य अस्त के समय में देखे गए स्वप्न का फल १० दिन के भीतर ही प्राप्त हो जाता है।


 


शुभ फलदाई स्वप्न – Shubh Faldai Swapan

 


अनार (Pomegranate) देखना———————धन प्राप्ति के योग।

गड़ा धन दिखाना(Buried treasure)—————-अचानक धन लाभ।

अर्थी (Bier) देखना———————————बीमारी से छुटकारा।

झरना (Waterfall) देखना————————–दु:खों का अंत होना।

जलता हुआ दीया (Lightening lamp) देखना———आयु में वृद्धि।

धूप (Sunny) देखना——————————–पदोन्नति और धनलाभ।

चेक (Cheque) लिखकर देना————————विरासत में धन मिलना।

कुएं में पानी (water in well) देखना—————–धन लाभ।

इंद्रादेव (God Indra) को देखना———————-धन का लाभ, आरोग्यता और सुख की प्राप्ति।

आकाश (Sky) देखना——————————–पुत्र प्राप्ति।

भोहों (Eye Brow) को देखना————————धन व सम्मान की प्राप्ति।

इंद्रधनुष (Rainbow) देखना————————-उत्तम स्वास्थ्य।

कब्रिस्तान (Morgue) देखना————————-समाज में प्रतिष्ठा।

कमल का फूल (Lotus flower) देखना—————-रोग से छुटकारा।

सुंदर स्त्री (Beautifullady) देखना——————-प्रेम में सफलता।

सेब (Apple)देखना———————————आयु वृद्धि।

चूड़ी (Bangles) देखना—————————–सौभाग्य में वृद्धि।

कुआं (Well) देखना———————————सम्मान बढऩा।

गुरु (Teacher) दिखाई देना————————–सफलता मिलना।

गोबर (Cow-dung) देखना————————–पशुओं के व्यापार में लाभ।

देवी (Godess) के दर्शन करना————————रोग से मुक्ति।

भेड़ बकरियां (Sheep & Got) देखना——————धन व समृद्धि में वृद्धि।

चुनरी (Stole) दिखाई देना—————————-सौभाग्य की प्राप्ति।

छुरी (Knife) दिखना———————————संकट से मुक्ति।

बालक (Kid) दिखाई देना——————————संतान की वृद्धि।

चंदन (Sandalwood) देखना————————-शुभ समाचार मिलना।

जटाधारी साधु (Monk) देखना————————–अच्छे समय की शुरुआत।

सफ़ेद घोडा (White Horse) का रथ देखना————–राज्य पद की प्राप्ति।

चलता हुआ फव्वारा (Fountain) खाना——————खोई हुई वास्तु मिलना।

तपस्वी (Friar) दिखाई देना—————————-दान करना।

डाकिया (Postmaster) देखना————————दूर के रिश्तेदार से मिलना।

तमाचा (Slap) मारना———————————शत्रु पर विजय।

दवात (Ink Pot) दिखाई देना————————–धन आगमन।

जीभ (Tongue) पर लिखना—————————विद्या की प्राप्ति।

नक्शा (Map) देखना———————————-किसी योजना में सफलता।

नमक (Salt) देखना———————————–स्वास्थ्य में लाभ।

पगडंडी (Trail) देखना———————————समस्याओं का निवारण।

त्रिशूल (Trident) देखना——————————-शत्रुओं से मुक्ति।

शव (Dead Body) यात्रा——————————विरासत में धन प्राप्ति।

मृत्य दंड (Death Penalty) मिलना——————–आदर सम्मान मिलना।

तारामंडल (Constellation) देखना———————सौभाग्य की वृद्धि।

तीर (Arrow) दिखाई देना——————————लक्ष्य की ओर बढऩा।

सूखी घास (Dry grass) देखना————————-जीवन में समस्या।

भगवान शिव (Lord shiva) को देखना——————-विपत्तियों का नाश।

किसी रिश्तेदार (Relative) को देखना——————–उत्तम समय की शुरुआत।

दंपत्ति (Couple) को देखना—————————-दांपत्य जीवन में अनुकूलता।

शत्रु (Enemy) देखना———————————-उत्तम धनलाभ।

तलवार (Sword) चलाते देखना————————–शत्रु नाश।

दूध (Milk) देखना————————————-आर्थिक उन्नति।

नाख़ून (Nail) देखना———————————–धन संपत्ति की प्राप्ति।

मंदिर (Temple) देखना——————————–धार्मिक कार्य में सहयोग करना।

नदी (River) देखना————————————सौभाग्य वृद्धि।

कुत्ते (Dog) की सवार———————————-धन संपत्ति की प्राप्ति।

अपने आप को भिखारी (Beggar) देखना——————-समृद्धि बढ़ना।

नीलगाय (Blue Cow) देखना—————————-भौतिक सुखों की प्राप्ति।

नेवला (Mongoose) देखना—————————–शत्रुभय से मुक्ति।

पगड़ी (Turban) देखना———————————मान-सम्मान में वृद्धि।

हल (Plow) चलते देखना——————————–फसल अच्छी होना।

पूजा (Worship) होते हुए देखना————————–किसी योजना का लाभ मिलना।

फकीर (Dervish)को देखना——————————अत्यधिक शुभ फल।

दाढ़ी (Beard) निकलते देखना—————————-भविष्य में प्रगति होगी।

गाय (Cow) का बछड़ा (Calf) देखना———————-कोई अच्छी घटना होना।

मंडी में पूजा (Worship in bazaar) करना—————-सुख और शांति की प्राप्ति।

वसंत ऋतु (Spring) देखना——————————-सौभाग्य में वृद्धि।

शहतूत (Mulberry) का पेड़ देखना————————-धन संपत्ति में वृद्धि।

बिल्वपत्र (Leaf) देखना———————————–धन-धान्य में वृद्धि।

स्वयं की बहन (sister) देखना—————————–परिजनों में प्रेम बढऩा।

भाई (Brother) को देखना——————————–नए मित्र बनना।

भीख (Begging) मांगना———————————धन हानि होना।

शहद (Honey) देखना————————————जीवन में अनुकूलता।

देवदूत (Angel) देखना————————————आदर और सम्मान की प्राप्ति।

रुद्राक्ष (Rudraksha)देखना——————————-शुभ समाचार (good news) मिलना।

अंडा (Egg) देखना—————————————-धन की प्राप्ति।

हाथ-पैर धोना (Hand wash feet)————————समस्त चिंताए मिटना।

पैसा (Money) दिखाई देना———————————धन लाभ।

रोते (Crying) हुए देखना———————————–चिंताओं की समाप्ति, शुभ समाचार।

स्वर्ग (Heaven) देखना————————————भौतिक सुखों में वृद्धि।

पत्नी (Wife) को देखना————————————दांपत्य में प्रेम बढऩा।

रोटी (Food) खाना—————————————-स्वस्थ्य में सुधार।

स्वस्तिक (Swastika) दिखाई देना————————–धन लाभ होना।

मां सरस्वती (Muse) के दर्शन——————————-बुद्धि में वृद्धि।

कोयल (Cuckoo) देखना———————————–उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति।

चिडिय़ा (Bird) दिखाई देना———————————-नौकरी में पदोन्नति।

तोता (Parrot) दिखाई देना———————————सौभाग्य में वृद्धि।

इलाइची (Amomum) देखना——————————-मान-सम्मान की प्राप्ति।

खाली थाली (Empty Hand) देखना————————-धन प्राप्ति के योग।

गुड़ (Jaggery Palma) खाते हुए देखना———————अच्छा समय आने के संकेत।

शेर (Tiger) दिखाई देना————————————शत्रुओं पर विजय।

हाथी (Elephant) दिखाई देना——————————ऐेश्वर्य की प्राप्ति।

कन्या (Girl) को घर (House) में आते देखना—————–मां लक्ष्मी की कृपा मिलना।

दूध (Milk) देती भैंस (Buffalo) देखना———————-उत्तम अन्न लाभ के योग।

चोंच वाला पक्षी (Beaked Bird) देखना———————-व्यवसाय में लाभ।

अंगूठी (Ring) पहनना————————————-सुंदर स्त्री प्राप्त करना।

आकाश (Sky) में उडऩा————————————-लंबी यात्रा करना।

आम (Mango) खाना————————————–धन प्राप्त होना।

अनार का रस (Pomegranate Juice) पीना—————-प्रचुर धन प्राप्त होना।

ऊँट (Camel) को देखना————————————धन लाभ।

सूर्य (Sun) देखना—————————————–खास व्यक्ति से मुलाकात।

बादल (Cloud) देखना————————————-जल्दी तरक्की होना।

घोड़े (Horse) पर चढऩा————————————व्यापार में उन्नति होना।

आंधी तूफान (Storm) देखना——————————-यात्रा में कष्ट होना।

दर्पण (Mirror) में चेहरा देखना——————————किसी स्त्री से प्रेम बढऩा।

सिर के कटे बाल (Hair) देखना——————————कर्ज से छुटकारा।

बर्फ (Snow) देखना—————————————अलौकिक शक्ति की प्राप्ति होना।

बिस्तर (Bed) देखना————————————–धनलाभ और दीर्घायु होना।

बुलबुल (Nightingale) देखना—————————–विद्वान व्यक्ति से मुलाकात।

बादाम (almond) खाना———————————–धन की प्राप्ति।

अंडे (egg) खाना——————————————पुत्र प्राप्ति।

स्वयं के सफेद (White hair) बाल देखना———————आयु बढ़ेगी।

बिच्छू (Scorpion) देखना———————————प्रतिष्ठा प्राप्त होगी।

पहाड़ (Hill) पर चढऩा————————————–उन्नति मिलेगी।

फूल (flowers) देखना————————————प्रेमी से मिलन।

शरीर (Body) पर गंदगी (Garbage) लगाना—————–धन प्राप्ति के योग।

पुल (Bridge) पर चलना———————————–समाज हित में कार्य करना।

मोटा बैल (Healthy Ox) देखना—————————-अनाज सस्ता होग।

पूरी (Poori) खाना—————————————-प्रसन्नता का समाचार मिलना।

तांबा (Copper) देखना————————————गुप्त रहस्य पता लगना।

पलंग पर सोना (Sleep on bed)—————————गौरव की प्राप्ति।

हरा-भरा जंगल Green Forest) देखना———————-प्रसन्नता मिलेगी।

स्वयं को उड़ते (Flying) हुए देखना—————————किसी मुसीबत से छुटकारा।

किसी से लड़ाई (Fight) करना——————————-प्रसन्नता प्राप्त होना।

प्यास (Thirsty) लगना————————————लोभ बढऩा।

पान (Betel leaf) खाना———————————–सुंदर स्त्री की प्राप्ति।

पानी में डूबना (drown in water)————————-अच्छा कार्य करना।

तलवार (sword) देखना————————————शत्रु पर विजय।

हरी सब्जी Green Vegetable) देखना———————-प्रसन्न होना।

तोप (Tope) देखना—————————————-शत्रु नष्ट होना।

तीर (Arrow) चलाना————————————–इच्छा पूर्ण होना।

तीतर (Partridge) देखना———————————-सम्मान में वृद्धि।

स्वयं को रोते (Crying) हुए देखना—————————-प्रसन्नता प्राप्त होना।

अनाज (Grain) भरना————————————–धन लाभ।

आग (Fire) देखना—————————————–धन हानि।

इमारत (Building) बनाना———————————-लाभ।

झंडा (flag) देखना——————————————धर्म में आस्था बढ़ेगी।

लड़ाई में मारे (Death in fight) जाना————————राज प्राप्ति के योग।

खुला दरवाजा (Open Door) देखना—————————किसी व्यक्ति से मित्रता होगी।

धनवान व्यक्ति (Rich Person) देखना———————–धन प्राप्ति के योग।

घोडा (Horse) देखना—————————————स्त्री लाभ।

चित्र (Photo) देखना—————————————-राजसम्मान।

कमल (Lotus) का फूल देखना——————————–रोगों से छुटकारा।

गार्डन (Garden) देखना————————————-अपर सुख मिलेगा।

लाल फूल (Fruit & Flower) देखना————————–भाग्योदय।

चन्द्रमा Moon) देखना—————————————सम्मान।

बन्दर (Monkey) देखना————————————-धन लाभ।

बादल (Sky) देखना——————————————लाभ।

बिल्ली (Cat) देखना——————————————तरक्की पाना।

आभूषण (Ornament) की चोरी——————————-सफ़र।

मन्दिर (Temple) में जाना———————————–कार्य पूरा होना।

मदिरा (Wine) पीना—————————————–धन लाभ।

चांदी (Silver) देखना—————————————-धन पाना।

जहाज (Aeroplane) देखना———————————-राज्य लाभ, अच्छा समय।

साइकिल (Cycle) देखना————————————–सर्व कार्य सिद्ध।

जहाज (Aeroplane) पर चढना——————————–तबादला।

तख्त (Throne) देखना—————————————उन्नति।

तख्त (Throne) पर बैठना————————————आदर पाना।

तालाब (Pond) स्नान—————————————-इज्जत पाना।

नितम्ब (Hip) देखना —————————————-सौभाग्य की प्राप्ति।

पैर (Feet) देखना ——————————————-यात्रा हो।

दही Curd) खाना——————————————–यात्रा।

दूध (Milk) पीना———————————————खुशी पाना।

बादाम (Almond) कहना————————————-धन मिले।

देव (God) प्रतिमा देखना————————————–धन लाभ।

नदी (River) स्नान——————————————रोग दूर होना।

ऊंचाई (Height) पर चढना————————————शुभ लाभ।

हरे वॄक्ष (Green Tree) देखना——————————–शुभ लाभ।

वॄक्ष पर चढना (Climb on Tree)—————————–सफलता पाना।

हाथी (Elephant) पर सवारी———————————-लाभ।

रोटी (Meal) खाना——————————————-शुभ समाचार।

फल (Fruit) वाले वृक्ष (Tree) देखना—————————शुभ।

मॄत्यु (Death) होना——————————————दीर्घायु होना।

चूहा (Mouse) देखना—————————————–व्यापर में उन्नति।

स्वयं की मृत्यु (death) देखना———————————-भयंकर रोग से मुक्ति।

मुकदमे (Court Case) निर्दोष छूटना—————————अपार धन संपदा की प्राप्ति।

किला (Fort) देखना——————————————ख़ुशी मिलेगी, विकास होगा।

मिठाई (Sweets) बनाते देखना——————————–धन की प्राप्ति।

महल (Palace)देखना—————————————-कष्ट समाप्त।

चावल (Rice) देखना—————————————–धन की प्राप्ति।

मछली (Fish) देखना—————————————–धन की प्राप्ति।

हड्डी (Bone) देखना—————————————–रुका हुआ धन मिलेगा।

ईमारत (building) बनते देखना——————————-सौभाग्य एवं तरक्की।

भरी हुई दुकान (Shop) देखना———————————-धन वृद्धि।


 

अशुभ फलदाई स्वप्न – Ashubh Faldai Swapan

 


खली दुकान (Shop) देखना————————————धन हानि।

तालाब (Pond) में नहाना————————————–शत्रु से हानि।

तरबूज (Watermelon) खाते हुए देखना————————किसी से दुश्मनी होगी।

स्वयं को हंसते (Laughing) हुए देखना————————–किसी से विवाद होना।

तिल (Sesame) खाना—————————————-दोष लगना।

लोहा (Iron) देखना——————————————-दुर्घटना से सामना होगा।

छिपकली (Wall Lizard) देखना——————————-अशुभ, दुर्घटना, हानि।

लोमड़ी (Fox) देखना——————————————दोस्त से धोखा मिलना।

बिच्छू (Scorpion)कटे तो————————————-हानि, नुक्सान।

राजनेता (Leader) की मृत्यु देखना——————————देश में समस्या होना।

पहाड़ (Hill)हिलते हुए देखना————————————किसी बीमारी का प्रकोप होना।

थूक देखना (Spit)——————————————–परेशानी में पडऩा।

छोटा जूता (Shoes) पहनना————————————किसी स्त्री से झगड़ा।

चंद्रग्रहण (Moon Eclipse)देखना——————————-रोग होना।

चंद्रमा (Moon) को टूटते हुए देखना—————————— कोई समस्या आना।

भोजन (Food) की थाली देखना———————————-धनहानि के योग।

कौआ (crow) दिखाई देना————————————–बुरी सूचना मिलना।

छिपकली (lizard) दिखाई देना———————————-घर में चोरी होना।

पिंजरा (Cage) देखना——————————————कैद होने के योग।

दन्त (Teeth) देखना——————————————किसी परिजन की मृत्यु।

भूकंप(Earthquake) देखना———————————–परेशानी एवं विपत्ति।

अतिथि (Guest) देखना—————————————-घर में परेशानी का आगमन।

विधवा (Widow) देखना—————————————हानि।

कैंची (Scissor) देखना—————————————-कलेश होने वाला है।

आंखों (eyes) में काजल (Kohl) लगाना————————-शारीरिक कष्ट होना।

स्वयं के कटे हाथ (Hand) देखना——————————–किसी निकट परिजन की मृत्यु।

सूखा हुआ बगीचा (Garden) देखना——————————कष्टों की प्राप्ति।

तेल (Oil) पीना———————————————–किसी भयंकर रोग की आशंका।

सूखा अन्न (Grain) खाना————————————–परेशानी बढऩा।

बिजली (Thundering) गिरना———————————संकट में फंसना।

चादर (Bed Sheet) देखना————————————बदनामी के योग।

रत्न (Precious Stones) देखना——————————व्यय एवं दु:ख।

अस्त्र-शस्त्र (weapons) देखना———————————मुकद्में में हार।

चाबुक (Hunter) दिखाई देना———————————–झगड़ा होना।

बाढ़ (flood) देखना——————————————-व्यापार में हानि।

जाल (Net)देखना———————————————मुकद्में में हानि।

जेब काटना(Pick pocket)————————————व्यापार में घाटा।

फूलमाला (Lei) दिखाई देना————————————-निंदा होना।

पतला बैल (Ox) देखना—————————————–अनाज महंगा होगा।

भेडिय़ा (Wolf) देखना—————————————–दुश्मन से भय।

चींटी (Ant) देखना——————————————–किसी समस्या में पढऩा।

चक्की (Grinding Mill) देखना——————————–शत्रुओं से हानि।

दांत (Teeth) टूटते हुए देखना———————————-समस्याओं में वृद्धि।

बंद दरवाजा (Door) देखना————————————-धन की हानि होना।

जुगनू (Brooch) देखना—————————————बुरे समय की शुरुआत।

टिड्डी (Insect) दल देखना————————————व्यापार में हानि।

डॉक्टर (Doctor) को देखना————————————स्वास्थ्य संबंधी समस्या।

ढोल (Drum) दिखाई देना————————————–किसी दुर्घटना की आशंका।

पत्थर (Stone) देखना—————————————–संकट एवं विपत्ति।

तर्पण (Satiating)करते हुए देखना——————————परिवार में किसी बुुजुर्ग की मृत्यु।

उत्सव (Festival) मनाते हुए देखना—————————–शोक होना।

ताश (Cards) देखना——————————————समस्या में वृद्धि।

कोर्ट-कचहरी (Court) देखना———————————–विवाद में पडऩा।

अग्नि (Fire) देखना——————————————व्यापर में नुकसान।

नाच-गाना (Dance) देखना————————————अशुभ समाचार मिलने के योग।

हथकड़ी (hand cuff) दिखाई देना——————————भविष्य में भारी संकट।

कबूतर (Pigeon) दिखाई देना———————————-रोग से छुटकारा।

अजगर (Snake) दिखाई देना———————————-व्यापार में हानि।

सफेद बिल्ली (white cat) देखना——————————धन की हानि।

आकाश (Sky) से गिरना————————————–संकट में फंसना।

ऊँट (Camel) की सवारी————————————–रोगग्रस्त होना।

धुँआ (Smoke) देखना—————————————शत्रु एवं रोग वृद्धि, व्यापर में हानि।

घोड़े (Horse) से गिरना————————————–व्यापार में हानि होना।

ऊँचाई (Height) से गिरना————————————परेशानी आना।

बारिश (Rain) होते देखना————————————-घर में अनाज की कमी, चिन्ता।

बांसुरी (Flute) बजाना—————————————-परेशान होना।

स्वयं को बीमार (Disease) देखना—————————–जीवन में कष्ट।

बाल (Hair) बिखरे हुए देखना———————————-धन की हानि।

सुअर (Pig) देखना——————————————-शत्रुता और स्वास्थ्य संबंधी समस्या।

भैंस (Buffalo) देखना—————————————किसी मुसीबत में फंसना।

भूत (Ghost) देखना—————————————–नुकसान का समय।

ऊंचाई से गिरना (Falling from height)———————अपमान।

कुत्ते (Dog bite) का काटना———————————शत्रु वृध्दि।

चीखें (Squawk) मारना————————————-संकट।

बारात (Procession) देखना———————————रोग।

मंगनी (Begging) होते हुए देखना—————————–दुःख आने वाला है।

झाडू (Broom) देखना—————————————खर्च।

विदाई (Parting)देखना————————————–आर्थिक लाभ।

सोना (Gold) पाना——————————————परेशानी।

पानी (Water) में डूबना————————————–कष्ट पाना।

शादी (Marriage) देखन————————————-बड़ा संकट आने वाला है।

उत्सव (Function) देखना———————————–किसी शोक सभा में जाना होगा।

डोली (Lewis) देखना—————————————-परेशानी में पड़ना।


पितृपक्ष में परान्न से बचें

 गरुड़ पुराणोक्त पितृपक्ष परान्न निषेध कथा सनातन धर्म में 16 दिनों का पितृपक्ष वर्ष का सबसे सूक्ष्म और संवेदनशील समय माना गया है। गरुड़ पुरा...