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श्रीदत्तात्रेयसहस्रनामस्तोत्रम्

  श्रीदत्तात्रेयसहस्रनामस्तोत्रम् 🌹🌿 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ निखिलागमतत्त्वज्ञ ब्रह्मज्ञानपरायण । वदास्माकं मुक्त्युपायं सूत सर्वोपकारकम् ॥ १॥ सर्वदेवेषु को देवः सद्यो मोक्षप्रदो भवेत् । को मनुर्वा भवेत्तस्य सद्यः प्रीतिकरो ध्रुवम् ॥ २॥ सूत उवाच - निगमागमतत्त्वज्ञो ह्यवधूतश्चिदम्बरः । भक्तवात्सल्यप्रवणो दत्त एव हि केवलः ॥ ३॥ सदा प्रसन्नवदनो भक्तचिन्तैकतत्परः । तस्य नामान्यनन्तानि वर्तन्तेऽथाप्यदः परम् ॥ ४॥ दत्तस्य नामसाहस्रं तस्य प्रीतिविवर्धनम् । यस्त्विदं पठते नित्यं दत्तात्रेयैकमानसः ॥ ५॥ मुच्यते सर्वपापेभ्यः स सस्द्यो नात्र संशयः । अन्ते तद्धाम संयाति पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥ ६॥ (अस्य श्रीमद्दत्तात्रेयसहस्रनामकस्य तु । ऋषिर्ब्रह्म विनिरिर्दिष्टोनुष्टुप्छन्दं प्रकीर्तिम् ॥ दत्तात्रेयोऽस्यदेवता दत्तात्रेयात्मतारकम् । दाकारंरेफसंयुक्तं दत्तबीजमुदाहृतम् ॥ द्रामित्यादि त्रिभिः प्रोक्तं बीजं शक्तिश्च कीलकम् । षाअॅऊघर्फु? बीजसंयुक्तैं षडङ्गन्यास ईरितः ॥ ?? पीताम्बरालङ्कृत पृष्ठभागं भस्मावगुण्ठामलरुक्मदेहम् । विद्युत्रभापिङ्गजटाभिरामं श्रीदत्तयोगीशमहं भजामि ॥) अस्य श्रीमद्दत्तात्रेयसहस्रन...

रक्षाबंधन विशेष

* वैदिक रक्षासूत्र *  〰〰🌸〰〰 रक्षासूत्र मात्र एक धागा नहीं बल्कि शुभ भावनाओं व शुभ संकल्पों का पुलिंदा है । यही सूत्र जब वैदिक रीति से बनाया जाता है और भगवन्नाम व भगवद्भाव सहित शुभ संकल्प करके बाँधा जाता है तो इसका सामर्थ्य असीम हो जाता है। प्रतिवर्षश्रावणी-पूर्णिमा को रक्षाबंधन का त्यौहार होता है, इस दिनबहनें अपने भाई को रक्षा-सूत्र बांधती हैं । यह रक्षासूत्र यदि वैदिक रीति से बनाई जाए तो शास्त्रों में भी उसका बड़ा महत्व है । * कैसे बनायें वैदिक राखी ?* 〰〰〰〰〰〰〰 वैदिक राखी बनाने के लिए सबसे पहले एक छोटा-सा ऊनी, सूती या रेशमी पीले कपड़े का टुकड़ा लें। (1) दूर्वा (2) अक्षत (साबूत चावल) (3) केसर या हल्दी (4) शुद्ध चंदन (5) सरसों के साबूत दाने इन पाँच चीजों को मिलाकर कपड़े में बाँधकर सिलाई कर दें । फिर कलावे से जोड़कर राखी का आकार दें । सामर्थ्य हो तो उपरोक्त पाँच वस्तुओं के साथ स्वर्ण भी डाल सकते हैं। * वैदिक राखी का महत्त्व * 〰〰〰〰〰〰〰 वैदिक राखी में डाली जानेवाली वस्तुएँ हमारे जीवन को उन्नति की ओर ले जानेवाले संकल्पों को पोषित करती हैं । *(1) दूर्वा* 〰〰 जैसे दूर्वा का एक अंकुर जमीन म...

*ब्राह्मण के दश प्रकार*

 🔥 *ब्राह्मण के दश प्रकार* 🔥 * जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः  - अत्रि स्मृति १३८ ब्राह्मण वंश में जन्म लेने वाला जन्म से ही ब्राह्मण है।  भले ही वो नीच कार्य भी क्यों न करें वह अंत तक ब्राह्मण ही रहेगा। महर्षि अत्रि ने ब्राह्मणो का कर्म अनुसार विभाग किया है। देवो मुनिर्द्विजो राजा वैश्यः शूद्रो निषादकः ॥ पशुम्लेच्छोपि चंडालो विप्रा दशविधाः स्मृताः॥  - अत्रि स्मृति ३७१ देव, मुनि, द्विज, राजा, वैश्य, शूद्र, निषाद, पशु, म्लेच्छ, चांडाल यह दश प्रकार के ब्राह्मण कहे हैं ॥ ३७१ ॥ १.देव ब्राह्मण -  ब्राह्मणोचित श्रोत स्मार्त कर्म करने वाला हो  २. मुनि ब्राह्मण - शाक पत्ते फल आहार कर वन में रहने वाला ३. द्विज ब्राह्मण - वेदांत,सांख्य,योग आदि अध्ययन व ज्ञान पिपासु ४. क्षत्रिय ब्राह्मण - युद्ध कुशल हो ५. वैश्य ब्राह्मण - व्यवसाय गोपालन आदि ६. शुद्र ब्राह्मण - लवण,लाख,घी,दूध,मांस आदि बेचने वाला ७. निषाद ब्राह्मण - चोर, तस्कर, मांसाहारी,व्यसनी हो ८. पशु ब्राह्मण - शास्त्र विहीन हो किन्तु मिथ्याभिमान हो ९. म्लेच्छ ब्राह्मण - बावड़ी,कूप,बाग,तालाब को बंद करने वाला १०. चांडाल ब...

हिंदू धर्म में दस पवित्र पक्षी

हिंदू धर्म के दस पवित्र पक्षी, जानिए उनका रहस्य!!!!!!!!! हिंदू धर्म संपूर्ण पशु-पक्षी और वृक्षों को मानव अस्तित्व की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण घटक मानता है। उनमें से भी कुछ वृक्ष, पशु और पक्षी ऐसे हैं ‍जिनके नहीं होने से मानव का अस्तित्व भी संकट में पड़ सकता है। इसके अलावा हिंदू धर्म के ऋषियों और मुनियों ने यह जाना कि कौन से पक्षी में क्या रहस्य छिपा हुआ है। आओ जानने हैं ऐसे दस दिव्य और पवित्र पक्षी जिनका हिंदू धर्म में बहुत ही महत्व माना गया है और जिनका सम्मान और आदर करना प्रत्येक हिंदू का कर्तव्य है।  पहला पक्षी, हंस : - जब कोई व्यक्ति सिद्ध हो जाता है तो उसे कहते हैं कि इसने हंस पद प्राप्त कर लिया और जब कोई समाधिस्थ हो जाता है, तो कहते हैं कि वह परमहंस हो गया। परमहंस सबसे बड़ा पद माना गया है। पक्षियों में हंस एक ऐसा पक्षी है जहां देव आत्माएं आश्रय लेती हैं। यह उन आत्माओं का ठिकाना हैं जिन्होंने अपने ‍जीवन में पुण्यकर्म किए हैं और जिन्होंने यम-नियम का पालन किया है। कुछ काल तक हंस योनि में रहकर आत्मा अच्छे समय का इंतजार कर पुन: मनुष्य योनि में लौट आती है या फिर वह देवलोक ...

पूजा से सम्बंधित तीस आवश्यक नियम

सुखी और समृद्धिशाली जीवन के लिए देवी-देवताओं के पूजन की परंपरा काफी पुराने समय से चली आ रही है। आज भी बड़ी संख्या में लोग इस परंपरा को निभाते हैं। पूजन से हमारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, लेकिन पूजा करते समय कुछ खास नियमों का पालन भी किया जाना चाहिए। अन्यथा पूजन का शुभ फल पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं हो पाता है। यहां 30  ऐसे नियम बताए जा रहे हैं जो सामान्य पूजन में भी ध्यान रखना चाहिए। इन बातों का ध्यान रखने पर बहुत ही जल्द शुभ फल प्राप्त हो सकते हैं। ये नियम इस प्रकार हैं… 1. सूर्य, गणेश, दुर्गा, शिव और विष्णु, ये पंचदेव कहलाते हैं, इनकी पूजा सभी कार्यों में अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए। प्रतिदिन पूजन करते समय इन पंचदेव का ध्यान करना चाहिए। इससे लक्ष्मी कृपा और समृद्धि प्राप्त होती है। 2. शिवजी, गणेशजी और भैरवजी को तुलसी नहीं चढ़ानी चाहिए। 3. मां दुर्गा को दूर्वा (एक प्रकार की घास) नहीं चढ़ानी चाहिए। यह गणेशजी को विशेष रूप से अर्पित की जाती है। 4. सूर्य देव को शंख के जल से अर्घ्य नहीं देना चाहिए। 5. तुलसी का पत्ता बिना स्नान किए नहीं तोड़ना चाहिए। शास्त्रों के अनुसा...

श्री कृष्ण की ही भक्ति क्यों करें

केवल भगवान् श्रीकृष्ण की ‘ही’ भक्ति करना है, क्योंकि— यथा तरोर्मूलनिषेचनेन तृप्यन्ति तत्स्कन्धभुजोपशाखाः। प्राणोपहाराच्च यथेन्द्रियाणां  तथैव सर्वार्हणमच्युतेज्या॥ जैसे पेड़ की जड़ में खाद डाल दो, पानी डाल दो, तो पेड़ के तने में, डालों में, उपशाखाओं में, पत्रों में, पुष्पों में, फलों में जल पहुँच जाता है, अलग-अलग पत्ते पे पानी नहीं डालना पड़ता। ऐसे ही, केवल श्रीकृष्ण की भक्ति कर लो, तो सबकी भक्ति अपने आप मान ली जायेगी। ~~~जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज।

हनुमान जी के पुत्र की रोचक कथा

हनुमान पुत्र मकरध्वज की कथा। 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹❄ पवनपुत्र हनुमान बाल-ब्रह्मचारी थे। लेकिन मकरध्वज को उनका पुत्र कहा जाता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, लंका जलाते समय आग की तपिश के कारण हनुमानजी को बहुत पसीना आ रहा था। इसलिए लंका दहन के बाद जब उन्होंने अपनी पूँछ में लगी आग को बुझाने के लिए समुद्र में छलाँग लगाई तो उनके शरीर से पसीने के एक बड़ी-सी बूँद समुद्र में गिर पड़ी। उस समय एक बड़ी मछली ने भोजन समझ वह बूँद निगल ली। उसके उदर में जाकर वह बूँद एक शरीर में बदल गई। एक दिन पाताल के असुरराज अहिरावण के सेवकों ने उस मछली को पकड़ लिया। जब वे उसका पेट चीर रहे थे तो उसमें से वानर की आकृति का एक मनुष्य निकला। वे उसे अहिरावण के पास ले गए। अहिरावण ने उसे पाताल पुरी का रक्षक नियुक्त कर दिया। यही वानर हनुमान पुत्र ‘मकरध्वज’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। जब राम-रावण युद्ध हो रहा था, तब रावण की आज्ञानुसार अहिरावण राम-लक्ष्मण का अपहरण कर उन्हें पाताल पुरी ले गया। उनके अपहरण से वानर सेना भयभीत व शोकाकुल हो गयी। लेकिन विभीषण ने यह भेद हनुमान के समक्ष प्रकट कर दिया। तब राम-लक्ष्मण की स...

बदरीनाथ मंदिर का इतिहास

बद्रीनाथ मंदिर का इतिहास ! (HISTORY OF BADRINATH TEMPLE) बद्रीनाथ या बद्रीनारायण मंदिर एक हिन्दू मंदिर है |  यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है , ये मंदिर भारत में उत्तराखंड में बद्रीनाथ शहर में स्थित है | बद्रीनाथ मंदिर , चारधाम और छोटा चारधाम तीर्थ स्थलों में से एक है | बद्रीनाथ मंदिर का इतिहास और मान्यताये ! यह अलकनंदा नदी के बाएं तट पर नर और नारायण नामक दो पर्वत श्रेणियों के बीच स्थित है । ये पंच-बदरी में से एक बद्री हैं। उत्तराखंड में पंच बदरी, पंच केदार तथा पंच प्रयाग पौराणिक दृष्टि से तथा हिन्दू धर्म की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं | यह मंदिर भगवान विष्णु के रूप बद्रीनाथ को समर्पित है | ऋषिकेश से यह 214 किलोमीटर की दुरी पर उत्तर दिशा में स्थित है | बद्रीनाथ मंदिर शहर में मुख्य आकर्षण है | प्राचीन शैली में बना भगवान विष्णु का यह मंदिर बेहद विशाल है | इसकी ऊँचाई करीब 15 मीटर है | पौराणिक कथा के अनुसार , भगवान शंकर ने बद्रीनारायण की छवि एक काले पत्थर पर शालिग्राम के पत्थर के ऊपर अलकनंदा नदी में खोजी थी | वह मूल रूप से तप्त कुंड हॉट स्प्रिंग्स के पास एक गुफा में बना हुआ था ...