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मनसा देवी की कथा एवं स्तोत्र

  मनसा देवी की कथा एवं स्तोत्र   〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ इनके नाम-स्मरण से सर्पभय और सर्पविष से मिलती है मुक्ति प्राचीनकाल में जब सृष्टि में नागों का भय हो गया तो उस समय नागों से रक्षा करने के लिए ब्रह्माजी ने अपने मन से एक देवी का प्राकट्य किया, मन से प्रकट होने के कारण ये ‘मनसा देवी’ के नाम से जानी जाती हैं, देवी मनसा दिव्य योगशक्ति से सम्पन्न होने के कारण कुमारावस्था में ही भगवान शंकर के धाम कैलास पहुंच गईं और वहां गहन तप किया, इससे प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उन्हें सामवेद का अध्ययन कराया और ‘मृतसंजीवनी विद्या’ प्रदान की इसीलिए देवी मनसा को ‘मृतसंजीवनी’ और ‘ब्रह्मज्ञानयुता’ कहते हैं। भगवान शंकर ने देवी मनसा को भगवान श्रीकृष्ण के अष्टाक्षर ( 18 अक्षर का ) मन्त्र—‘ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं कृष्णाय नम:’ का भी उपदेश किया साथ ही वैष्णवी दीक्षा दी, भगवान शिव से शिक्षा प्राप्त करने के कारण ये शिव की शिष्या हुईं इसलिए ये ‘शैवी’ कहलाती हैं, इन्होंने भगवान शिव से सिद्धयोग प्राप्त किया था, इसलिए वे ‘सिद्धयोगिनी’ के नाम से भी जानी जाती हैं। इसके बाद देवी मनसा ने तीन युगों तक पुष्कर में तप करक...

समस्त पापों के नाश हेतु श्री रुद्र द्वादश नाम स्तोत्र

 * श्रीरुद्रद्वादशनामस्तोत्रं * 〰️〰️〰️🌸🕉️🌸〰️〰️〰️ प्रथमं तु महादेवं द्वितीयं तु महेश्वरं । तृतीयं शङ्करं प्रोक्तं चतुर्थं वृषभध्वजम् ॥ १॥ पञ्चमं कृत्तिवासं च षष्ठं कामाङ्गनाशनं । सप्तमं देवदेवेशं श्रीकण्ठं चाष्टमं तथा ॥ २॥ नवमं तु हरं देवं दशमं पार्वतीपतिं । रुद्रमेकादशं प्रोक्तं द्वादशं शिवमुच्यते ॥ ३॥ एतद्वादशनामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः । गोघ्नश्चैव कृतघ्नश्च भ्रूणहा गुरुतल्पगः ॥ ४॥ स्त्रीबालघातकश्चैव सुरापो वृषलीपतिः । सर्वं नाशयते पापं शिवलोकं स गच्छति ॥ ५॥ शुद्धस्फटिकसङ्काशं त्रिनेत्रं चन्द्रशेखरं । इन्दुमण्डलमध्यस्थं वन्दे देवं सदाशिवम् ॥ ६॥ ॥श्रीरुद्रद्वादशनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ 〰️〰️〰️🌸🕉️🌸〰️〰️〰️

पापनाशक स्तोत्र

*जानकि त्वाम् नमस्यामि सर्वपापप्रणाशिनीम् ॥* *दारिद्र्यरणसन्हर्त्री भक्तानामिष्टदायिनीम् ॥* *विदेहराजतनयां राघवानन्दकारिणीम ॥* *भूमेर्दुहितरं विद्यां नमामि प्रकृतिं शिवाम् ॥* *पौलस्त्यैश्वर्यसन्हर्त्री भक्ताभीष्टाम् सरस्वतीम् ॥* *पतिव्रताधुरीणां त्वाम् नमामि जनकात्मजां ॥* *अनुग्रहपरामृद्धिमनघां हरिवल्लभाम ॥* *आत्मविद्यां त्रयीरूपामुमारूपां नमाम्यहं ॥* *प्रसादाभिमुखीम् लक्ष्मीं क्षीराब्धितनयां शुभां ॥* *नमामि चन्द्रभगिनीम् सीताम् सर्वाङ्गसुन्दरीम् ॥* *नमामि धर्मनिलयां करुणां वेदमातरं ॥* *पद्मालयां पद्महस्तां विष्णु वक्षः स्थलालयां ॥* *नमामि चन्द्रनिलयां सीतां चन्द्रनिभाननां ॥* *आल्हादरूपिणीम् सिद्धिं शिवाम् शिवकरीं सतीम् ॥* *नमामि विश्वजननीम् रामचन्द्रेष्टवल्लभां ॥* *सीतां सर्वानवद्यान्गीम् भजामि सततं हृदा ॥* (स्कन्द पुराण ४६/५०-५७) *जो मनुष्य वायुपुत्र हनुमान द्वारा वर्णित श्री राम और सीताजी के इन पाप नाशक स्तोत्रों का प्रतिदिन पाठ करता है , वह सदा मनोवांछित महान एश्वर्य का उपभोग करता है*।

घर में धन-धान्य की पूर्ति हेतु सरल उपाय

घर मे अन्न धन धान्य की निर्विघ्न प्राप्ति और भंडारे परिपूर्ण करने के लिए माँ अन्नपूर्णा स्तोत्र के नित्य पठन का बहुत फल बताया गया है  जो व्यक्ति अन्नपूर्णा स्तोत्र का प्रतिदिन पाठ करता है उसके जीवन मे अनवरत खाद्य पदार्थ और सुख समृद्धि की प्राप्ति बनी रहती है। श्री माँ अन्नपूर्णा स्तोत्र नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौन्दर्य रत्नाकरी निर्धूताखिल घोर पावनकरी प्रत्यक्ष माहेश्वरी । प्रालेयाचल वंश पावनकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ 1 ॥ नाना रत्न विचित्र भूषणकरि हेमाम्बराडम्बरी मुक्ताहार विलम्बमान विलसत्-वक्षोज कुम्भान्तरी । काश्मीरागरु वासिता रुचिकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ 2 ॥ योगानन्दकरी रिपुक्षयकरी धर्मैक्य निष्ठाकरी चन्द्रार्कानल भासमान लहरी त्रैलोक्य रक्षाकरी । सर्वैश्वर्यकरी तपः फलकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ 3 ॥ कैलासाचल कन्दरालयकरी गौरी-ह्युमाशाङ्करी कौमारी निगमार्थ-गोचरकरी-ह्योङ्कार-बीजाक्षरी । मोक्षद्वार-कवाटपाटनकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि...

माँ महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र हिन्दी अर्थ सहित

माँ महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र हिन्दी अर्थ सहित अयि गिरि-नन्दिनि नंदित-मेदिनि विश्व-विनोदिनि नंदनुते गिरिवर विंध्य शिरोधि-निवासिनि विष्णु-विलासिनि जिष्णुनुते। भगवति हे शितिकण्ठ-कुटुंबिनि भूरि कुटुंबिनि भूरि कृते जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते॥ अर्थ 〰️〰️ हे गिरिपुत्री, पृथ्वी को आनंदित करने वाली, संसार का मन मुदित रखने वाली, नंदी द्वारा नमस्कृत,पर्वतप्रवर विंध्याचल के सबसे ऊंचे शिखर पर निवास करने वाली, विष्णु को आनंद देने वाली, इंद्रदेव द्वारा नमस्कृत, नीलकंठ महादेव की गृहिणी, विशाल कुटुंब वाली, विपुल मात्रा में निर्माण करने वाली देवी, तुम्हारी जय हो, जय हो। हे महिषासुर का घात करने वाली, सुन्दर जटाधरी गिरिजा ! स्तोत्र 〰️〰️ सुरवर-वर्षिणि दुर्धर-धर्षिणि दुर्मुख-मर्षिणि हर्षरते त्रिभुवन-पोषिणि शंकर-तोषिणि किल्बिष-मोषिणि घोषरते। दनुज निरोषिणि दितिसुत रोषिणि दुर्मद शोषिणि सिन्धुसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते॥ अर्थ 〰️〰️ हे सुरों पर वरदानों का वर्षंण करने वाली, दुर्मुख और दुर्धर नामक दैत्यों का संहार करने वाली, सदा हर्षित रह...