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रजस्वला_स्त्री_के_लिए_त्याज्य_कर्म

   रजस्वला_स्त्री_के_लिए_त्याज्य_कर्म ~ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन न सम्भाष्या रजस्वला ।   प्रथमेऽहनि चाण्डाली यथा वर्ज्या तथाङ्गना ।।   द्वितीयेऽहनि विप्रा हि यथा वै ब्रह्मघातनी ।   तृतीयेऽह्नि तदर्धेन चतुर्थेऽहनि सुव्रताः ।।                    पहले दिन रजस्वला स्त्री चाण्डाली की भाँति वर्ज्य होती है -- हे विप्रो ! दूसरे दिन वह ब्रह्मघातनी के समान होती है और तीसरे दिन उसके आधे पाप से युक्त रहती है ---               चौथे दिन स्नान करके वह आधे महीने तक देवपूजन आदि के लिए शुद्ध रहती है---                पाँचवे दिन से सोलहवें दिन तक रजोदोष रहने के कारण स्त्री स्पर्श आदि की शुद्धि मूत्रोत्सर्ग की शुद्धि की तरह कही गई है -- इसके बाद ही वह पूर्ण शुद्ध होती है ----  स्नानं शौचं तथा गानं रोदनं हसनं तथा ।   यानमभ्यञ्जनं नारी द्यूतं चैवानुलेपनम् ।।   दिवास्वप्नं विशेषेण तथा वै दन्तधावनम् ।   मैथुनं मानसं वापि वाचिकं द...

शास्त्रों के अनुसार स्त्री सहवास

 अनेकों जन्मों के पुण्यकर्मों से जीव मनुष्य शरीर प्राप्त करता है। माता-पिता द्वारा खाये हुए अन्न से शुक्र-शोणित बनता है , माता के पेट में मिलकर रज की अधिकता से स्त्री , शुक्र की अधिकता से पुरुष होता है , यदि दोनों का तेज समान हो तो नपुंसक होता है । ऋतुस्नाता पत्नी के ४ दिन बाद ५वें दिन से लेकर १६ दिन तक ऋतुकाल होता है । विषम रात्रियों में ५, ७, ९, ११, १३, १५ रात्रियों में भोग से कन्या तथा सम रात्रियों में ६ , ८, १०, १२, १४, १६ इनमें बालक का जन्म होता है । विषम रात्रियों में यदि पति का शुक्र अधिक है तो होता तो बालक है , किन्तु आकार बालिका की तरह तथा सम रात्रियों के संयोग में स्त्री की रज की अधिकता में कन्या होती है , किन्तु उसका रूप पुत्र जैसा होता है । लिङ्गपुराण में कहा है ----- "चतुर्थ्यां रात्रौ विद्याहीनं व्रतभ्रष्टम् पतितं परदारिकम् दरिद्रार्णव मग्नं च तनयं सा प्रसूयते । पञ्चम्यामुत्तमांकन्यां षष्ठ्यां सत्पुत्रं सप्तम्यां कन्यां अष्टम्यां सम्पन्नं पुत्रम् ।। त्रयोदश्यां व्यभिचारिणी कन्या चतुर्दश्यां सत्पुत्रं पंचदश्यां धर्मज्ञा कन्यां षोडश्यां ज्ञानं पारंगपुत्रं प्रसूयते ।...

ब्राह्मण देव

आइये देखते है हमारे धर्मशास्त्र क्या कहते है इस विषय में----*_                             *शास्त्रीय_मत* _पृथिव्यां यानी तीर्थानि तानी तीर्थानि सागरे ।_ _सागरे  सर्वतीर्थानि पादे विप्रस्य दक्षिणे ।।_ _चैत्रमाहात्मये तीर्थानि दक्षिणे पादे वेदास्तन्मुखमाश्रिताः  ।_ _सर्वांगेष्वाश्रिता देवाः पूजितास्ते तदर्चया  ।।_ _अव्यक्त रूपिणो विष्णोः स्वरूपं ब्राह्मणा भुवि ।_ _नावमान्या नो विरोधा कदाचिच्छुभमिच्छता ।।_ *•अर्थात पृथ्वी में जितने भी तीर्थ हैं वह सभी समुद्र में मिलते हैं और समुद्र में जितने भी तीर्थ हैं वह सभी ब्राह्मण के दक्षिण पैर में  है । चार वेद उसके मुख में हैं  अंग में सभी देवता आश्रय करके रहते हैं इसवास्ते ब्राह्मण को पूजा करने से सब देवों का पूजा होती है । पृथ्वी में ब्राह्मण जो है विष्णु रूप है इसलिए  जिसको कल्याण की इच्छा हो वह ब्राह्मणों का अपमान तथा द्वेष  नहीं करना चाहिए ।* _•देवाधीनाजगत्सर्वं मन्त्राधीनाश्च देवता: ।_ _ते मन्त्रा: ब्राह्मणाधीना:तस्माद् ...