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यज्ञादि में त्याज्य पदार्थ

 🔥 यज्ञादि में त्याज्य पदार्थ 🔥


यज्ञ कर्म में भावदुष्ट  - क्रियादुष्ट  - कालदुष्ट  - संसर्गदुष्ट  तथा जातिदुष्ट -- इन पदार्थों का त्याग करना चाहिए ।


१-- भावदुष्ट :--

       " रूपतो गन्धतो वापि यच्चाभक्ष्यैः समं भवेत् ।

         भावदुष्टं   च    तत्प्रोक्तं    मुनिभिर्धर्मपारगैः ।। "

जो पदार्थ रूप से अथवा गंध से भी अभक्ष्य पदार्थों के सदृश हो - उसे धर्म के पारङ्गत मुनियों ने " भावदुष्ट " कहा है ।


२-- क्रियादुष्ट :--

        " आरनालं  च   मद्यं  च   करनिर्मथितं  दधि ।

           हस्तदत्तं  च  लवणं   क्षीरं  घृतपयांसि  च ।।

           हस्तेनोद्धृत्य तोयं च  पीतं वक्त्रेण वैकदा । 

           शब्देन पीतं भुक्तं च गव्यं ताम्रेण संयुक्तम् ।।

           क्षीरं च  लवणोन्मिश्रं  क्रियादुष्टमिहोच्यते ।। "

आरनल ( काञ्जिक ) - मद्य - हाथ से मथा हुआ दही - हाथ से हाथ में दिया गया नमक - दूध - घी और जल - हाथ से उठाकर  मुहँ से एक बार पिया गया जल - बोलते हुए पीया और खाया गया - ताँबे के पात्र से संयुक्त गोदुग्ध तथा नमक मिला हुआ दूध  -- ये सब " क्रियादुष्ट " कहे जाते हैं ।


३-- कालदुष्ट :--

           " एकादश्यां तु  यच्चान्नं यच्चान्नं राहुदर्शने ।

             सूतके मृतके चान्नं शुष्कं  पर्युषितं तथा ।।

             अनिर्दशाहगोक्षीरं षष्ठ्यां तैलं तथापि च ।

             नदीष्वसमुद्रगासु   सिहंकर्कटयोर्जलम् ।।

             निःशेषजलवाप्यादौ यत्प्रविष्टं नवोदकम् ।

             नातीतपञ्चरात्रं   तत्कालदुष्टमिहोच्यते ।। "

एकादशी के दिन अन्न  ( भात - रोटी - पुडी आदि ) - ग्रहण के समय अन्न - जननाशौच तथा मरणाशौच में अन्न - सूखा अन्न - बासी अन्न - नई ब्यायी गौ का दश दिन बीतने के पहले का दूध - षष्ठी तिथि में तेल - श्रावण और भाद्रपद महीनों में उन नदियों का जल जो समुद्रगामिनी नहीं हैं - निःशेष जल वाली ( सूखी ) बावड़ी आदि में प्रविष्ट नूतन जल जब तक पांच रातें न बीतें  - तब तक वे सब " कालदुष्ट " कहे जाते हैं ।


४-- संसर्गदुष्ट :--

         " शैवापाषण्डपतितैर्विकर्मस्थैर्निरीश्वरैः ।

           अवैष्णवबैर्द्विजैः     शूद्रेर्हरिवासरभोक्तृभिः ।

           श्व - काकसूकरोष्ट्रद्यैरूदक्यासूतिकादिभिः।।

           पुंश्चलीभिश्च      नारीभिर्वृषलीपतिभिस्तथा ।

           दृष्टं   स्पृष्टं   च   दत्तं  च   भुक्तशेषं  तथैव  ।।

           अभक्ष्याणां   च   संयुक्तं   संसर्गदुष्टमुच्यते ।। "

शैवों ( कापिलाकादि ) - पाखण्डियों ( वेदविरूद्ध आचरण करने वाले ) - पतित ( स्वधर्मभ्रष्ट ) पुरूषों - कर्मभ्रष्ट ( विकर्मस्थ  ) - नास्तिक  - अवैष्णव द्विजों - शूद्रों और एकादशी के दिन अन्नभोजी पुरूषों से - कुत्ते  - कौए - सुअर - ऊँट आदि से तथा रजस्वला - सूतिका - व्याभिचारी स्त्री और पुरुष के द्वारा देखा गया - छुआ गया - दिया गया तथा उन के भोजन से बचा हुआ एवं अभक्ष्य ( प्याज - लहसुन ) आदि से संयुक्त अन्न " संसर्गदुष्ट " कहलाता है ।


५-- जातिदुष्ट :--

          " बिम्बं शिग्रुं च कालिङ्गं तिलपिष्टं च  मूलकम् ।

            कोशातकीमलाबुं   च  तथा  कट्फलमेव च ।।

            वालिका    नारिकेलादि   जातिदुष्टमिहोच्यते ।

            एवं सर्वाण्यभक्ष्याणि तत्सङ्गान्यपि सन्त्यजेत्।। "

बिम्बफल ( कुन्दरू ) - शिग्रु ( सहिजन) - कालिङ्ग ( सफेद पेठा - कुम्हडा ) - तिलपिष्ट ( तिल की खली ) - शलगम - तोरई  - तुम्बा  - कायफल  - वालिका  - नारिका ( निलिका  ) इत्यादि " जातिदुष्ट " कहे गए हैं ।

                 इस प्रकार के सब अभक्ष्यों का एवं उनसे संसृष्ट वस्तुओं का भी यज्ञादि में त्याग करना चाहिए ।


                   🚩 हर हर महादेव 🚩।।वशिष्ठ।।

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