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॥ शिखा बन्धनस्य आवश्यकता॥

 #शिखाविचार *॥ शिखा बन्धनस्य आवश्यकता॥*   *स्नाने दाने जपे होमे सन्ध्यायां देवतार्चने ।*   *शिखाग्रन्थिं सदा कुर्यादित्येतन्मनुरब्रवीत् ॥*   मनुसंहिता स्नान, दान, जप, होम और देव पूजन में सर्वदा शिखा बाँधना चाहिए ।  *॥शिखाबन्धन - विधिः ॥*  *शिखीवच्छिखया भाव्यं ब्रह्मावर्तनिबद्धया ।*   *प्रदक्षिणं द्विरावर्त्य पाशान्तः सम्प्रवेशनात् ॥*   *प्रथमं द्विगुणं कृत्वा ब्रह्मावर्त मितीरितम् ।*  गायत्रीजपनं निबन्धने ॥  कुर्याच्छिखायाश्च इति कौथुमि: शिखा को दुगना करके प्रदक्षिण क्रम घुमाकर उसमें ब्रह्मग्रन्थि लगा दे। मयूर के शिखा के समान शिखा होनी चाहिये। पहले दुगना किया हुआ को ब्रह्मग्रन्थि कहा गया है। गायत्री मन्त्रका जप करते हुए शिखा को बाँधना चाहिये ।   *विप्रादिकानां खलु मुष्टिमेय-*   *केशाः शिखा स्यादधिका न तेन।*   *द्विधा त्रिधा वापि विभज्य बन्धो*   *ह्यल्पास्ततोऽल्पापि न लम्बितानि ॥*   ब्राह्मणों कि शिखा मुष्टि में आने योग्य होनी चाहिये। दुगना या तिगुना करके बाँधना चा...
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कर्मचण्डाल

 *कन्या के पिता से धन लेकर विवाह करनेवाले को "कर्मचण्डाल" कहते हैं।*      *स्कन्दपुराण के, रेवाखण्ड के,50 वें ,अध्याय के, 30 वें,33 वें 34 वें और 35 वें श्लोक में,कन्यादान के महत्त्व के साथ साथ, कन्यादान के साथ साथ,कन्या के पिता से धन की याचना करनेवाले की "कर्मचण्डाल" संज्ञा देते हुए, उनके यहां भोजन करने तक का निषेध करते हुए, भगवान शिव ने, महाराज उत्तानपाद से कहा कि -*   *सर्वेषामेव दानानां,कन्यादानं विशिष्यते।*   *यो दद्यात् परया भक्त्याभिगम्य तनयां निजाम्।।30।।*   *भगवान शिव ने कहा कि - हे राजन्! किसी धर्मात्मा का सत्कर्म करते रहना,दान देना, परोपकार करना आदि परमधर्म है।*   *धर्म पालन के कारण ही तो, मनुष्य को "धर्मात्मा,धर्मज्ञ, धर्मपालक" आदि शब्दों से उसके गुणों को जाना जाता है।*   *सर्वेषामेव दानानां कन्यादानं विशिष्यते।*       सभी प्रकार के दानों में, कन्यादान, विशिष्ट दान है। कन्यादान से ही,कुल गोत्र की रक्षा होती है। कुल वृद्धि होती है। माता पिता के पुत्र उत्पत्ति की सार्थकता होती है। यदि किस...

सुख सौभाग्य दायक शिव पूजन के मंत्र एवं अभिषेक विधि

 सुख सौभाग्य दायक शिव पूजन के मंत्र एवं अभिषेक विधि =================================== शिव पुराण संहिता में कहा है कि सर्वज्ञ शिव ने संपूर्ण देहधारियों के सारे मनोरथों की सिद्धि के लिए इस 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का प्रतिपादन किया है। यह आदि षड़क्षर मंत्र संपूर्ण विद्याओं का बीज है। जैसे वट बीज में महान वृक्ष छिपा हुआ है, उसी प्रकार अत्यंत सूक्ष्म होने पर भी यह मंत्र महान अर्थ से परिपूर्ण है। भगवान शिव को नमस्कार करने का मंत्र ---------------------------------------------------- नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शन्कराय च मयस्करय च नमः शिवाय च शिवतराय च।। ईशानः सर्वविध्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रम्हाधिपतिर्ब्रम्हणोधपतिर्ब्रम्हा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम।। तत्पुरषाय विद्म्हे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात।। शनि या राहु आदि ग्रह पीड़ा शांति के लिए शिव गायत्री मंत्र  --------------------------------------------------------------------------- ॐ तत्पुरुषाय विद्महे। महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात।। महामृत्युंजय प्रभावशाली मंत्र -------------------------------------- ॐ ह्रौं जूं सः...

तिरुपति बालाजी

 " तिरुपति बालाजी " ============  "कर्ज में डूबे भगवान" ------------------------------            एक बार भृगु ऋषि ने जानना चाहा कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कौन सबसे श्रेष्ठ है ? वह बारी-बारी से सबके पास गये। ब्रह्मा और महेश ने भृगु को पहचाना तक नही, न ही आदर किया। इसके बाद भृगु विष्णु के यहाँँ गये। विष्णु भगवान विश्राम कर रहे थे और माता लक्ष्मी उनके पैर दबा रही थी। भृगु ने पहुँचते ही न कुछ कहा, न सुना और भगवान विष्णु की छाती पर पैर से प्रहार कर दिया। लक्ष्मी जी यह सब देखकर चकित रह गयी किन्तु विष्णु भगवान ने भृगु का पैर पकडकर विनीत भाव से कहा ”मुनिवर ! आपके कोमल पैर में चोट लगी होगी। इसके लिए क्षमा करें।“            लक्ष्मी जी को भगवान विष्णु की इस विन्रमता पर बड़ा क्रोध आया। वह भगवान विष्णु से नाराज होकर भू-लोक में आ गयीं तथा कोल्हापुर में रहने लगीं। लक्ष्मी जी के चले जाने से विष्णु भगवान को लगा कि उनका श्री और वैभव ही नष्ट हो गया और उनका मन बड़ा अशान्त रहने लगा। लक्ष्मी जी को ढूँढ़ने के लिए वह श्रीनिवास के नाम से भू...

त्रिशंकु की स्वर्गयात्रा

 त्रिशंकु की स्वर्गयात्रा ============= इक्ष्वाकु वंश में त्रिशंकु नाम के एक राजा हुये। त्रिशंकु की इच्छा सशरीर स्वर्ग जाने की थी  अपनी वार्ता जारी रखते हुये मिथिला के राजपुरोहित शतानन्द जी ने कहा, "इस बीच इक्ष्वाकु वंश में त्रिशंकु नाम के एक राजा हुये। त्रिशंकु की इच्छा सशरीर स्वर्ग जाने की थी अतः इसके लिए उन्होंने वशिष्ठ जी से यज्ञ करने के लिए कहा। वशिष्ठ जी ने बताया कि कि मुझमें इतनी सामर्थ्य नहीं है कि मैं किसी व्यक्ति को शरीर सहित स्वर्ग भेज सकूँ। वशिष्ठ जी के असमर्थता प्रकट करने पर त्रिशंकु ने यही प्रार्थना वशिष्ठ जी के पुत्रों से भी की जो दक्षिण प्रान्त में घोर तपस्या कर रहे थे। इस पर वशिष्ठ जी के पुत्रों ने कहा कि 'अरे मूर्ख! जिस काम को हमारे पिता नहीं कर सके तू उसे हम से कराना चाहता है। ऐसा प्रतीत होता है कि तू हमारे पिता का अपमान करने के लिये यहाँ आया है।' उनके इस प्रकार कहने से त्रिशंकु ने क्रोधित होकर वशिष्ठ जी के पुत्रों को अपशब्द कहे। वशिष्ठ जी के पुत्रों ने रुष्ट होकर त्रिशंकु को चाण्डाल हो जाने का शाप दे दिया। "शाप के कारण त्रिशंकु का सुन्दर शरीर काला ...

सूतक और पातक

 क्या होता है सूतक और पातक, क्यों इनके नियमों का पालन करना है जरूरी? सनातन धर्म में सूतक और पातक दोनों ही विशेष अवधारणाएँ हैं जो शुद्धि और अशुद्धि के संदर्भ में उपयोग की जाती हैं। ये अवधारणाएँ विभिन्न धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक नियमों का पालन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। सूतक: सूतक का संबंध अशुद्धि की अवधि से है जो किसी विशेष घटना के बाद लगती है। यह मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है: 1. **जन्म सूतक**: किसी परिवार में बच्चे के जन्म के बाद लगने वाली अशुद्धि की अवधि को जन्म सूतक कहा जाता है। यह अवधि सामान्यतः दस दिनों तक रहती है, लेकिन विभिन्न समुदायों में इसका समय भिन्न हो सकता है। इस दौरान परिवार के सदस्य कुछ धार्मिक कृत्यों से परहेज करते हैं। 2. **मृत्यु सूतक**: किसी परिवार के सदस्य की मृत्यु के बाद लगने वाली अशुद्धि की अवधि को मृत्यु सूतक कहा जाता है। यह अवधि भी सामान्यतः तेरह दिनों की होती है, लेकिन इसके नियम और अवधि भी विभिन्न समुदायों में अलग-अलग हो सकती है। इस अवधि के दौरान परिवार के सदस्य विभिन्न धार्मिक और सामाजिक कृत्यों में भाग नहीं लेते हैं। पातक: पातक का स...

देवीपार्वती के 108 नाम और इनका अर्थ

 देवीपार्वती के 108 नाम और इनका अर्थ 〰️〰️🔸〰️〰️🔸🔸〰️〰️🔸〰️〰️ देवी पार्वती विभिन्न नामों से जानी जाता है और उनमें से हर एक नाम का एक निश्चित अर्थ और महत्व है। देवी पार्वती से 108 नाम जुड़े हुए है । भक्त बालिकाओं के नाम के लिए इस नाम का उपयोग करते है।  1 . आद्य - इस नाम का मतलब प्रारंभिक वास्तविकता है। 2 . आर्या - यह देवी का नाम है 3 . अभव्या - यह भय का प्रतीक है। 4 . अएंदरी - भगवान इंद्र की शक्ति। 5 . अग्निज्वाला - यह आग का प्रतीक है। 6 . अहंकारा - यह गौरव का प्रतिक है । 7 . अमेया - नाम उपाय से परे का प्रतीक है। 8 . अनंता - यह अनंत का एक प्रतीक है। 9 . अनंता - अनंत 10 अनेकशस्त्रहस्ता - इसका मतलब है कई हतियारो को रखने वाला । 11 . अनेकास्त्रधारिणी - इसका मतलब है कई हतियारो को रखने वाला । 12 . अनेकावारना - कई रंगों का व्यक्ति । 13 . अपर्णा – एक व्यक्ति जो उपवास के दौरान कुछ नहि कहता है यह उसका प्रतिक है । 14 . अप्रौधा – जो व्यक्ति उम्र नहि करता यह उसका प्रतिक है । 15 . बहुला - विभिन्न रूपों । 16 . बहुलप्रेमा - हर किसी से प्यार । 17 . बलप्रदा - यह ताकत का दाता का प्रतीक है । 18 . ...