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प्रणाम के नियम

 *प्रणाम या नमस्कार*

*या*

*अभिवादनके मुख्य नियम*

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अभिवादन प्रणाम या नमस्कार के कुछ ऐसे नियम शास्त्रों में बताए हैं, जो जीवन में अत्यंत आवश्यक हैं प्रायः हम लोग जिन्हें नहीं जानते ,उन नियमों का कुछ अंश इस लेख में लिखा गया है। आप सभी लोग इसे अवश्य ही पढ़ें और परिपालन भी करें।


*अभिवादन शीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः!*

 *चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम् ||*


मनुः२/१२१||## अर्थात् जो वृद्धजनों,गुरुजनों,तथा माता-पिताको नित्य प्रणाम करता हैं और उनकी सेवा करता हैं,उसके आयु,विद्या,यश और बलकी वृद्धि होती हैं |


*मातापितरमुत्थायपूर्वमेवाभिवादयेत् |*

*आचार्यमथवाप्यन्यं तथायुर्विन्दते महत् ||*


१०४/४३-४४महाभा० || महाभारतमें भी बताया गया हैं कि अभिवादनसे दीर्घ अयुकी प्राप्ति होती हैं ||


 अपनेसे बड़े आनेपर उन्हें देखतें ही खड़े हो जाना चाहिये | यदि विशेष स्थिति न हो तो उनके समीप आनेकी प्रतिक्षा नहीं करनी चाहिये | यह सर्वसामान्य हैं कि मनुष्य शरीरमें एक प्रकारकी विद्युत-शक्ति हैं |


 दुर्बलको प्रबल विद्युत् अपनी और खींचती हैं | शास्त्रानुसार किसी अपनेसे बड़ेके आनेपर प्राण ऊपर उठतें हैं | उस समय खड़े हो जाने से उनमें विकृति नहीं आती | 


गुरुजनों को देखतें ही अविलम्ब खड़े हो जाना चाहिये | अभिवादनकी श्रेष्ठतम पद्धति साष्टाङ्ग प्रणाम हैं |"


*उरसा शिरसा दृष्ट्या मनसा वचसा तथा |*

*पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यां प्रणामोऽष्टांग उच्यते ||* 


पेटके बल भूमिपर दोनों हाथ आगे फैलाकर लेट जाना साष्टाङ्ग प्रणाम हैं; इसमें मस्तक,भ्रूमध्य, नासिका, वक्ष, ऊरु, घुटने,करतल तथा पैरोंकी अँगुलियोँका ऊपरी भाग- ये आठ अङ्ग भूमिसे स्पर्श करतें हो,इसके बाद दोनों हाथोसे सम्मान्य पुरुषका चरण-स्पर्श करके घुटनोंके बल बैठकर उसके चरणोंसे अपना भालका स्पर्श कराना और उसके पादाङ्गुष्ठो का हाथोंसे स्पर्श करके अपनें नेत्रोंसे लगा लेना- यह साष्टाङ्ग प्रणामकी पूर्ण विधि कही गयी हैं | 


*उपसंग्रहण चरणस्पर्श*-


*व्यत्यस्तपाणिना कार्यमुपसंग्रहणं गुरोः|*

 *सव्येन सव्यःस्पृष्टव्यो दक्षिणेन च दक्षिणः।।मनुः२/७२||* 


गुरुके चरणस्पर्श उलटे हाथसे अर्थात् छते बायें हाथसे बायेँ पैर तथा छते दायें हाथसे दायें हाथका स्पर्श करना, यह उपसंग्रहण चरण स्पर्श हैं|


 *लौकिकं वैदिकं वापि तथाऽध्यात्मिकमेव च |* 

*आददीत यतो ज्ञानं तं पूर्वमभिवादयेत् ||मनुः२/११७||*


जिसके पास लौकिक,वैदिक,और आध्यात्मिक ज्ञान स्वयं लेता हो उसको; शिष्य प्रथम प्रणाम करैं |#


 *जन्मप्रभृति यत्किंचिच्चेतसा धर्ममाचरेत् |* 

*तत्सर्वं विफलं ज्ञेयमेक हस्ताभिवादनात् ||*


 जन्मसे यथोचित्त कोईभी धर्माचरण किया हो वह सब एकहाथसे वंद. करनेपर निष्फल हो जाता हैं|


*शय्यासने ऽध्याचरिते श्रेयसा न समाविश |*

 *शय्यासनस्थैश्चैवैनं प्रत्युत्थायाभिवादयेत् ||मनुः२/११९||* 


विद्याआदिमें अपनेसे अधिक जाननेवाला पुरुष या गुरु शय्या या आसनपर हो,तो उस आसनपर न बैठे; तथा ऐसे वंदनीय यदि आजायें तब हम शय्या या आसनपर बैठे हो तो वहाँ से उठकर उनको वंदन करने चाहिये |


 *वंदनविधि-*


*अभिवादात्परं विप्रो ज्यायांसमभिवादयन् |*

 *असौ नामाहमस्मीति स्वं नाम परिकीर्तयेत् ||मनुः२/१२२||*


 बडेको वंदन करतें समय ब्राह्मण को अमुकनामका मैं आपको वंदन करता हूं ऐसे नाम बोलें( *अमुक गोत्रोत्पनः अमुकशर्माहं त्वामभिवादयामि भोः* )|| मनुः१/१२४||


*आयुष्मान्भव सौम्येति वाच्यो विप्रोऽभिवादने |* 

*अकारश्चास्य नाम्नोऽन्ते वाच्यः पूर्वाक्षरः प्लुतः|* मनुः२/१२५|#


 ब्राह्मण वंदन करैं तब वह वंदन स्विकार करनेवालें उनके प्रति "आयुष्मान् भव सौम्य | हे सौम्य! तुम अधिक वर्ष जीओं" ऐसा कहैं और अपने उच्चारणिय वाक्यमें नमस्कार करनेवालें के नामके अंतमें रहे हुए अकारादि स्वरको अथवा स्वरके पूर्वाक्षरको "प्लुत" उच्चारण करना हैं- जैसे" आयुष्मान् भव सौम्य अमुक! अथवा आयुष्मान् भव सौम्य अमुक ३शर्मन् ! | # 


*नामधेयस्य ये केचिदभिवादनं जानते |*

 *तान्प्राज्ञोऽहमिति ब्रूयात्स्त्रियः सर्वास्तथैव च ||* मनुः२/१२३||# 


जो भी वंदनीय! नामोच्चार पूर्वक नमस्कारको न समज़ सकता हो, उनके सामने बुद्धिमान्! "वंदन करता हूं" इतना ही कहैं ऐसा स्त्रियाँ भी कहैं|#


 *यो न वेत्त्यभिवादस्य विप्रः प्रत्यभिवादनम्|* 

*नाभिवाद्य स विदुषा यथा शूद्रस्तथैव सः||*#मनुः२/१२६||#


 जो ब्राह्मण नमनके बदलेमें सामने पद्धतिसर बोलनेका वाक्य बोलना न जानता हो, उनको विद्वान! नमन न करैं; वह शूद्र समान हैं अर्थात् सामान्य मैं आपको वंदन करता हूं ऐसा सीर्फ कहना हैं| 


*मातुलांश्च पितृव्यांश्च श्वसुरानृत्विजो गुरुन् |*

 *असावहमिति ब्रूयात्प्रत्युत्थाय यवीयसः||* २/१३०|


मामा,चाचा,ससुर, ऋत्विज और गुरुका मतलब यहाँ ज्ञानवृद्ध या तपोवृद्ध हैं, यह सब अपनेसे छोटें हो और इनमेंसे कोई आजायें तो उनके समक्ष खड़े होकर " मैं हूँ" ऐसा कहैं वंदन न करैं |# 


*मातृष्वसा मातुलानी श्वश्रूरथ पितृस्वसा |*

*संपूज्या गुरुपत्नीवत्समास्ता गुरुभार्यया |* मनुः२/१३१||# 


मौसी,मामी,सास,और बुआ यह सब गुरुपत्नी जैसे पूज्य हैं; इसलिये गुरुपत्नीके समान उनके सामने खडे होकर आदरसत्कार करना चाहिये |

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