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मल-मूत्र त्याग के बाद शौच का महत्व

 *मलमूत्रशुक्रत्याग के बाद शास्त्र ने जल और मिट्टी से गुह्याङ्ग और हाथ-पैर की शुद्धि निश्चित्त की हैं उसमें पवित्रता होना ही मुख्यत्वे प्रयोजन हैं।*



 ऐसी शुद्धि साबुन शेम्पू सेनेटाईझर आदि से नहीं होती उपर से केमीकल अण्डे की जर्दी , प्राणियो की चरबी आदि से बने साबून-शेम्पू से तो अपवित्रता ही रहती हैं । 


हे आधुनिको ! ऐसी कोई वैज्ञानिकता नहीं हैं कि साबुनशेम्पू से शौचाचार करनेपर  शास्त्रीय अधिकारीत्व प्राप्त होता हो !


चरबी , वीर्य(रज), रक्त , मज्जा , मूत्र , विष्ठा , नासिकामल , कर्णमल , कफ , आँसु , आँखो के चीपडे़  और प्रस्वेद -- यह बारह मनुष्य के मल हैं  मनुस्मृति ५/१३५ , इसमें से प्रथम छह की शुद्धि जल और मिट्टी के संयोग से ही होती हैं ,दूसरे छहों की केवल जल से  वैसे भी शुद्ध्याशुद्धि विषय शास्त्र का हैं  "प्योर अथवा क्लिन " जैसा कोई शब्द हमारे शास्त्र में नहीं हैं । क्लिन का अर्थ होता हैं साफ करना साबुनशेम्पू  से सफाई करने पर धूला केमिकल युक्त जहरीला पानी  सुक्ष्मजीवों का नाशक हैं जबकि हमारे धर्मशास्त्र में मच्छर तक  जीवो पर हिंसाभाव नहीं हैं। 


मिट्टी में रहे अपराध नाशक गुण ->  


हे वसुन्धरे !  तुम्हारे उपर अश्व और रथ चला करते हैं तथा वामनावतार में  भगवान विष्णुने भी तुम्हें अपने पैरों से नापा था  मृत्तिके मेरे किये हुए पूर्वसञ्चित पापो को हरे  इत्यादि ...


*"अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते  विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे। उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना।। मृत्तिके हर मे पापं यन्मया पूर्वसञ्चितम् ।।*

~~~~~= ⚛️अग्नि पुराण⚛️=~~~


कैसी मिट्टी चाहिये , कितनी , किसे  कहाँ कितनी बार मिट्टी लगाकर शौच करना आवश्यक हैं यह सब शास्त्र आज्ञा करते हैं और अक्कल के आधुनिक दुश्मनो ! आपके बहकावे में , आपके कहावें में हम क्यों आवे क्योंकि हम "मानव्यो हि प्रजाः " मनु की ही तो प्रजा हैं , दानव्यप्रजा नहीं हैं कि किसी के कहावे में आकर  अमेध्यपदार्थ को शरीरपर घीसडचूपड करा करे  ।


अकेला शौचाचार नहीं अपितु कौनसे द्रव्य , वस्त्र , पात्र, पदार्थ  की  शुद्धि कैसे की जाती हैं वह भी  स्मृतियों में उक्त हैं । मनुस्मृति अध्याय ५  / १०५ से  १४५  अवलोकनीय हैं।


विशेष - जो ब्राह्मण मल- मूत्रत्याग, शुक्रमोचनोपरांत अपने गृह्यसूत्रादि शास्त्रप्रोक्त संख्यानुसार जल और मिट्टी से शौचाचार नहीं करते उस विप्र को चाहे वेदविद् भी क्यों न हो उसे किसी भी प्रकार का काम्यदान न दिया जाय , शौचाचारशून्य, ब्रह्मचर्यादि व्रतभ्रष्ट वेदविहीन विप्र को अन्नदान करनेपर , स्वयं अन्नदेवता रुदनपूर्वक विचार करते हैं कि मैरे ऐसे कौनसे पाप हैं कि मैं इनके भाण्ड में आ गया । शौचाचारहीन , ब्रह्मसूत्रविहीन  विप्र के द्वारा किया हुआ होमहवन ,दान और तप आदि नष्ट हो जाते हैं --->

*नष्टशौचे व्रतभ्रष्टे विप्रे वेदविवर्जिते।* 

*रोदित्यन्नं दीयमानं किं मया दुष्कृतं कृतम्।। शौचहीनाश्च ये विप्रा न च यज्ञोपवीतिनः।*

*हुतं दत्तं तपस्तेषां नश्यत्यत्र न संशयः।।* 

~~~~= दानसागरे व्यासः=~~~


मृत्तिका के बिना शौच करनेवाला विप्र  सातदिन में बिना प्रायश्चित्त किये शूद्र के समान वेदादिकर्मो में अनधिकारी हो जाता हैं - >

*चतुर्वर्ग चिंतामणि प्रायश्चित्त खण्डे -- मृत्तिकाभिर्विना शौचं स्नानमुष्णोदकेन वै। कूपोदकेन सप्ताहं कृत्वा विप्रः स शूद्रवान्।।* ~~~~~~~~~~⚛️गौतम⚛️~~~~~~~~

*उष्णोदकेन सप्ताहं तथा कूपोदकेन च । मृत्तिकाभिर्विना शौचं तथा कूपोदकेन च। कृत्वा शौचादिकं विप्रः शूद्र एव न संशयः।।* ~~~~~~~~~⚛️जाबालिः⚛️~~~~~~~


अनधिकारी हुए इसलिये तो कहा हैं कि - शौचाचार में सदा प्रयत्नशील रहना चाहिये, क्योंकि त्रैवर्णिकद्विजो के द्विजत्व संरक्षण का मूल शौचाचार ही हैं। शौचाचार का पालन न करनेपर सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं -


*शौचे यत्नः सदा कार्यः*

        *शौचमूलो द्विजः स्मृतः।*

*शौचाचारविहीनस्य* 

       *समस्ता निष्फलाः क्रियाः।।* 

~~~~~~⚛️वाधूल स्मृति ⚛️~~~~~


और शौचादि के आचार आदि विप्रो को अपनी अपनी वेदशाखा के गृह्यसूत्र से ही मान्य हैं अन्यथा अनाचारी होते ही वेद भी पावन नहीं कर सकते ->


*कर्ममात्रं_स्वसूत्रशास्त्राद्*

            *आचारादि_प्रचोदितम्।।((लौगाक्षीस्मृतौ।।)) तथा च*


*स्वकल्पोक्तं परित्यज्य*    

             *योऽन्यकल्पोक्तमाचरेत्।*

*स्वाचारहीनोऽनाचारस्तं -*

              *- -- वेदा न पुनंति हि।।* 

[स्वकल्पोक्तं यथा गृह्यसूत्राद्युक्तम्]

=====~ मन्त्रभ्रान्तिहर सूत्र~======


आचरण का परित्याग करने से ब्राह्मण का ब्राह्मणत्व विनाशोन्मुख हो जाता हैं - >


*अनभ्यासेन वेदानां आचारस्य च वर्जनात्।*

*आलस्यादन्नदोषाच्च मृत्युर्विप्राञ्जिघांसति।।*

=====⚛️((( मनुः ५/४।।))⚛️=====

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