सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

घर में कभी गरीबी नही आएगी रामायण की इन आठ चौपाइयों का नित्य पाठ करे-

 🚩घर में कभी गरीबी नही आएगी रामायण की इन आठ चौपाइयों का नित्य पाठ करे--जय श्री राम🚩अदभुद🍁


   जब तें रामु ब्याहि घर आए।

        नित नव मंगल मोद बधाए॥🚩


     भुवन चारिदस भूधर भारी। 

         सुकृत मेघ बरषहिं सुख बारी॥🚩


    रिधि सिधि संपति नदीं सुहाई। 

         उमगि अवध अंबुधि कहुँ आई॥🚩


     मनिगन पुर नर नारि सुजाती।

          सुचि अमोल सुंदर सब भाँती॥🚩


      कहि न जाइ कछु नगर बिभूती। 

             जनु एतनिअ बिरंचि करतूती॥🚩


     सब बिधि सब पुर लोग सुखारी।

                रामचंद मुख चंदु निहारी॥🚩


      मुदित मातु सब सखीं सहेली। 

          फलित बिलोकि मनोरथ बेली॥🚩


    राम रूपु गुन सीलु सुभाऊ।

           प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ॥🚩


भावार्थ:-जब से श्री रामचन्द्रजी विवाह करके घर आए, तब से (अयोध्या में) नित्य नए मंगल हो रहे हैं और आनंद के बधावे बज रहे हैं। चौदहों लोक रूपी बड़े भारी पर्वतों पर पुण्य रूपी मेघ सुख रूपी जल बरसा रहे हैं॥🚩


रिधि सिधि संपति नदीं सुहाई। 

       उमगि अवध अंबुधि कहुँ आई॥🚩


मनिगन पुर नर नारि सुजाती।

       सुचि अमोल सुंदर सब भाँती॥🚩


भावार्थ:-ऋद्धि-सिद्धि और सम्पत्ति रूपी सुहावनी नदियाँ उमड़-उमड़कर अयोध्या रूपी समुद्र में आ मिलीं। नगर के स्त्री-पुरुष अच्छी जाति के मणियों के समूह हैं, जो सब प्रकार से पवित्र, अमूल्य और सुंदर हैं॥🚩


कहि न जाइ कछु नगर बिभूती। 

       जनु एतनिअ बिरंचि करतूती॥🚩


सब बिधि सब पुर लोग सुखारी।

            रामचंद मुख चंदु निहारी॥🚩


भावार्थ:-नगर का ऐश्वर्य कुछ कहा नहीं जाता। ऐसा जान पड़ता है, मानो ब्रह्माजी की कारीगरी बस इतनी ही है। सब नगर निवासी श्री रामचन्द्रजी के मुखचन्द्र को देखकर सब प्रकार से सुखी हैं॥🚩


मुदित मातु सब सखीं सहेली। 

     फलित बिलोकि मनोरथ बेली॥🚩


राम रूपु गुन सीलु सुभाऊ।

      प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ॥🚩


भावार्थ:-सब माताएँ और सखी-सहेलियाँ अपनी मनोरथ रूपी बेल को फली हुई देखकर आनंदित हैं। श्री रामचन्द्रजी के रूप, गुण, शील और स्वभाव को देख-सुनकर राजा दशरथजी बहुत ही आनंदित होते हैं॥🚩


➖जय हो प्रभु राम की➖जय हो राजाराम की➖

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

श्रीशिव महिम्न: स्तोत्रम्

              __श्रीशिव महिम्न: स्तोत्रम्__ शिव महिम्न: स्तोत्रम शिव भक्तों का एक प्रिय मंत्र है| ४३ क्षन्दो के इस स्तोत्र में शिव के दिव्य स्वरूप एवं उनकी सादगी का वर्णन है| स्तोत्र का सृजन एक अनोखे असाधारण परिपेक्ष में किया गया था तथा शिव को प्रसन्न कर के उनसे क्षमा प्राप्ति की गई थी | कथा कुछ इस प्रकार के है … एक समय में चित्ररथ नाम का राजा था| वो परं शिव भक्त था| उसने एक अद्भुत सुंदर बागा का निर्माण करवाया| जिसमे विभिन्न प्रकार के पुष्प लगे थे| प्रत्येक दिन राजा उन पुष्पों से शिव जी की पूजा करते थे | फिर एक दिन … पुष्पदंत नामक के गन्धर्व उस राजा के उद्यान की तरफ से जा रहा था| उद्यान की सुंदरता ने उसे आकृष्ट कर लिया| मोहित पुष्पदंत ने बाग के पुष्पों को चुरा लिया| अगले दिन चित्ररथ को पूजा हेतु पुष्प प्राप्त नहीं हुए | पर ये तो आरम्भ मात्र था … बाग के सौंदर्य से मुग्ध पुष्पदंत प्रत्यक दिन पुष्प की चोरी करने लगा| इस रहश्य को सुलझाने के राजा के प्रत्येक प्रयास विफल रहे| पुष्पदंत अपने दिव्या शक्तियों के कारण अदृश्य बना रहा | और फिर … राजा च...

नाम जप महिमा

श्री रामचरितमानस के अनुसार नामजपकी महिमा... कलियुगमें जितने भी साधनामार्ग है उसमें सबसे सहज मार्ग है भक्तियोग, और भक्तियोग अंतर्गत नामसंकीर्तनयोग अनुसार साधना करना इस युगकी सर्वश्रेष्ट साधनामार्ग है। संत तुलसीदासने श्री रामचरितमानसमें नामके महिमाका गुणगान किया है।  संत जिस देवी या देवताके स्वरूपकी आराधना कर आध्यात्मिक प्रगति कर आत्मज्ञानी बनते हैं उसी आराध्यके नामकी गुणगान कर उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। अध्यात्मशास्त्र अनुसार हमारे सूक्ष्म पिंडमें जिस सूक्ष्म तत्त्वकी कमी होती है, जब हम उस तत्त्वकी पूर्ति हेतु उस आराध्यके नामका जप करते हैं तो हमारी आध्यात्मिक प्रगति करते हैं द्रुत गतिसे होती है | जब तक हमने गुरुमंत्र नहीं मिला हो हमें आप कुलदेवता का जप करना चाहिए और यदि कुलदेवताका नाम नहीं पता हो तो या तो ‘श्री कुलदेवतायै नमः’ का जप करना चाहिए या अपने इष्टदेवताका जप करना चाहिए।  यदि घरमें पितृ दोष हो तो एक घंटे ‘श्री गुरुदेव दत्त’ का जप करना चाहिए और शेष समय अपने कुलदेवताका या इष्टदेवताका मंत्र जपना चाहिए। ५० % से अधिक आध्यात्मिक स्तरके साधक उच्च कोटिक...

शिव नाम महिमा

भगवान् श्रीकृष्ण कहते है ‘महादेव महादेव’ कहनेवाले के पीछे पीछे मै नामश्रवण के लोभ से अत्यन्त डरता हुआ जाता हूं। जो शिव शब्द का उच्चारण करके प्राणों का त्याग करता है, वह कोटि जन्मों के पापों से छूटकर मुक्ति को प्राप्त करता है । शिव शब्द कल्याणवाची है और ‘कल्याण’ शब्द मुक्तिवाचक है, वह मुक्ति भगवन् शंकर से ही प्राप्त होती है, इसलिए वे शिव कहलाते है । धन तथा बान्धवो के नाश हो जानेके कारण शोकसागर मे मग्न हुआ मनुष्य ‘शिव’ शब्द का उच्चारण करके सब प्रकार के कल्याणको प्राप्त करता है । शि का अर्थ है पापोंका नाश करनेवाला और व कहते है मुक्ति देनेवाला। भगवान् शंकर मे ये दोनों गुण है इसीलिये वे शिव कहलाते है । शिव यह मङ्गलमय नाम जिसकी वाणी मे रहता है, उसके करोड़ जन्मों के पाप नष्ट हो जाते है । शि का अर्थ है मङ्गल और व कहते है दाता को, इसलिये जो मङ्गलदाता है वही शिव है । भगवान् शिव विश्वभर के मनुष्योंका सदा ‘शं’ कल्याण करते है और ‘कल्याण’ मोक्ष को कहते है । इसीसे वे शंकर कहलाते है । ब्रह्मादि देवता तथा वेद का उपदेश करनेवाले जो कोई भी संसार मे महान कहलाते हैं उन सब के देव अर्थात् उपास्य होने...