गुरुवार, 24 सितंबर 2026

पितृपक्ष में परान्न से बचें

 गरुड़ पुराणोक्त पितृपक्ष परान्न निषेध कथा

सनातन धर्म में 16 दिनों का पितृपक्ष वर्ष का सबसे सूक्ष्म और संवेदनशील समय माना गया है। गरुड़ पुराण के अनुसार, इन दिनों में आपका शरीर केवल आपका नहीं रहता, बल्कि यह आपके पितरों के लिए एक "पवित्र पात्र" बन जाता है। इसी कारण पितृपक्ष में भोजन, विशेषकर परान्न (दूसरे के घर का अन्न), ग्रहण करने के नियम अत्यंत कठोर हैं।

भाग 1: गरुड़ पुराण का सिद्धांत — अन्न ही मन है

गरुड़ पुराण के प्रेत कल्प (अध्याय 17 और 33) में भगवान विष्णु गरुड़ जी से कहते हैं:

"अन्नं ब्रह्म रसं विष्णुः भोक्ता देवो महेश्वरः।"

अर्थात अन्न ब्रह्मा है, उसका रस विष्णु है, और भोक्ता स्वयं महेश है।

अन्न केवल शरीर नहीं बनाता, बल्कि चेतना का निर्माण करता है ("जैसा अन्न वैसा मन")। अन्न में तीन प्रमुख दोष हो सकते हैं जो सीधे खाने वाले के भीतर प्रवेश करते हैं:

 * जाति दोष: उगाने वाले किसान का भाव (लोभ या क्रोध)।

 * निमित्त दोष: पकाने वाले की मानसिकता (रसोई में क्लेश या क्रोध)।

 * आश्रय दोष: अन्न खरीदने के लिए उपयोग किए गए धन का स्रोत (चोरी, ब्याज, या अधर्म की कमाई)।

   पितृपक्ष में यही आश्रय दोष सबसे घातक हो जाता है।

भाग 2: सूक्ष्म विज्ञान — पितरों की उपस्थिति

मृत्यु के पश्चात् जीव के पास सूक्ष्म और कारण शरीर शेष रहते हैं। यमराज 16 दिनों के लिए पितरों को मुक्त करते हैं, और वे अपने वंशजों के घर, रसोई और छाया में वास करते हैं। वे भौतिक भोजन नहीं, बल्कि गंध और भाव ग्रहण करते हैं।

यदि आप किसी ऐसे घर में भोजन करते हैं जहाँ मांस-मदिरा बनता है, अधर्म का पैसा है, या उनके स्वयं के पितर अतृप्त हैं, तो वह नकारात्मक ऊर्जा आपके शरीर रूपी "घड़े" के माध्यम से आपके पितरों तक पहुँचती है। अशुद्ध घड़े से पितर जल कैसे ग्रहण कर सकते हैं?

भाग 3: दूसरे के घर अन्न न खाने के 5 बड़े कारण

 * शरीर पितरों की यज्ञशाला है: गरुड़ पुराण के अनुसार, पुत्र की नाभि से एक सूक्ष्म नाड़ी पितरों तक जाती है। आप जो खाते हैं, वही सूक्ष्म रूप में उन्हें मिलता है। तामसिक या अपवित्र अन्न पितरों को अशांत करता है। ("स्वगृहे भोजनं कुर्यात्")

 * व्रत का खंडन: पितृपक्ष 16 दिन का महाव्रत है। "परान्नं च परवस्त्रं परशय्या परस्त्रियः, पितृपक्षे विवर्जयेत्।" दूसरे का अन्न, वस्त्र और शय्या इस दौरान पूर्णतः वर्जित हैं। परान्न खाने वाले का पिंड कौवे भी ग्रहण नहीं करते।

 * अन्न का ऋण (सबसे बड़ा कर्ज): सनातन धर्म में परान्न खाने से आप उस व्यक्ति के सूक्ष्म कर्जदार बन जाते हैं। गरुड़ पुराण की एक कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण ने पितृपक्ष में मित्र के घर खीर खाई। मित्र के मन में स्वार्थ था। परिणामस्वरुप, ब्राह्मण के पितर भूखे लौट गए और उसे पितृदोष लगा, क्योंकि उसने पितरों का हिस्सा दूसरे की कामना को सौंप दिया।

 * प्रेत-पिशाच बाधा से बचाव: यमलोक के द्वार खुले होने के कारण प्रेत सक्रिय रहते हैं। अज्ञात घरों, ढाबों या होटलों के अन्न में अशुद्ध ऊर्जा होती है, जो शरीर में प्रवेश कर पितरों की ऊर्जा से टकराती है, जिससे क्लेश और पितृदोष उत्पन्न होता है।

 * पुण्य का स्थानांतरण (Transfer of Punya): परान्न ग्रहण करने से आपके श्राद्ध का पुण्य अनजाने में उस घर के पितरों को चला जाता है, ठीक वैसे ही जैसे डिजिटल माध्यम से पैसे ट्रांसफर होते हैं।

भाग 4: निषिद्ध स्थान — कहाँ बिल्कुल न खाएं?

गरुड़ पुराण के अनुसार, इन 8 स्थानों का अन्न पितृपक्ष में महापाप है:

 * जहाँ शौच-अशौच का पालन न होता हो।

 * शराबी या मांसाहारी का घर।

 * पुत्रहीन या श्राद्धहीन घर (जहाँ पितर अतृप्त हों)।

 * चरित्रहीन या परस्त्रीगामी का घर।

 * चोरी, रिश्वत या अनुचित ब्याज से कमाने वाले का घर।

 * बिना निमंत्रण के किसी के श्राद्ध का भोजन।

 * होटल, ढाबा या बाजार का भोजन (जहाँ अनेक लोगों की वासनाएँ जुड़ी हों)।

 * दूसरे के श्राद्ध का बचा हुआ भोजन (यह सीधे पितृदोष का कारण बनता है)।

भाग 5: पितृपक्ष का आहार विधान

क्या और कैसे खाएं:

 * अपने घर में, स्वयं या परिवार (पत्नी, माता, पुत्री) के हाथों बना सादा भोजन।

 * गाय के घी में बना आहार, जौ, चावल, गेहूं, मूंग, दूध, दही, शहद, और कंद-मूल।

 * दिन में एक बार सात्विक भोजन। भोजन से पूर्व पंचबलि (गाय, कौवा, कुत्ता, चींटी, देव) के लिए अंश अवश्य निकालें।

क्या न खाएं:

 * लहसुन, प्याज, मसूर, उड़द, चना, हींग, बैंगन, लौकी, मांस, मदिरा, तंबाकू और बासी/जूठा भोजन।

जल का नियम:

"जलं पीत्वा परगृहे, पितृणां तृप्ति नश्यति।" दूसरे के घर का जल पीने से भी पितरों की तृप्ति नष्ट होती है। हमेशा अपना, कुएं का, या गंगाजल पिएं।

भाग 6: अपवाद — कहाँ भोजन किया जा सकता है?

गरुड़ पुराण अत्यंत करुण भी है और 3 अपवाद देता है:

 * गुरु का घर: गुरु या ज्ञानी आचार्य का अन्न अमृत समान है।

 * पुत्री का घर: विवाहित पुत्री अपने पिता के घर खा सकती है (पिता पुत्री के घर नहीं खा सकता)।

 * आपातकाल: यात्रा या बीमारी में फल, दूध और गंगाजल "पितृभ्यो नमः" कहकर भगवान विष्णु को अर्पित कर ग्रहण किया जा सकता है।

भाग 7: आधुनिक जीवन के लिए व्यावहारिक उपाय

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और नौकरी के बीच इन नियमों का पालन ऐसे करें:

 * अपना टिफिन ले जाएं: कार्यालय में घर का ही भोजन करें।

 * फलाहार चुनें: बाहर होने पर केवल फल, दूध, मूंगफली या गंगाजल ग्रहण करें।

 * मानसिक क्षमा: अज्ञानवश बाहर खा लिया हो, तो रात को दक्षिण दिशा में मुख कर जल लें और पितरों से क्षमा मांगें। अगले दिन प्रायश्चित स्वरूप गो-ग्रास दें या ब्राह्मण भोजन कराएं।

 * गायत्री मंत्र से शुद्धि: विवशता में बाहर खाना पड़े, तो 3 बार गायत्री मंत्र पढ़कर भोजन पर फूंक मारें; इससे दोष कम होता है।

 * तुलसी दल का प्रयोग: भोजन या जल में तुलसी का पत्ता डाल दें। विष्णु प्रिया तुलसी अन्न को पवित्र कर प्रेत बाधा से बचाती है।

पितृपक्ष भय का नहीं, बल्कि समर्पण और पवित्रता का पर्व है। जो मनुष्य मोह त्यागकर 16 दिन अपने घर का पवित्र अन्न पितरों को स्मरण कर ग्रहण करता है, उसके पितर उसे "धनं धान्यं संतानं, सुखं समृद्धि वर्धताम्" का अखंड आशीर्वाद देते हैं।

।। इति ग

रुड़ पुराणोक्त पितृपक्ष परान्न निषेध कथा संपूर्णा ।।

रविवार, 6 सितंबर 2026

दायें कान पर ही क्यों यज्ञोपवीत

 अशौच आदि अवस्था में यज्ञोपवित को दायें कान पर ही क्यों टांगना चाहिए 


       यज्ञोपवित बहुत ही पवित्र सूत्र है - जिसे हमेशा हर परिस्थिति में शुद्ध रखने का दायित्व धारक पर होता है - परन्तु अशौच आदि अवस्था में जब पूर्ण शरीर ही अशुद्ध होता है तब उसे कहाँ रखा जाये कि वह शुद्ध रह सके --- 


       इस के लिए शास्त्र में ये विधान है :--- 


" आदित्या वसवो रूद्रा वायुरग्निश्च धर्मराट् ।

  विप्रस्य दक्षिणे कर्णे नित्यं तिष्ठन्ति देवताः ।। "


           प्रस्तुत श्लोक द्वारा दाहिने कान में आदित्य - वसु - रूद्र आदि देवताओं का निवास बताया गया है - इसलिए दाहिने कान की पवित्रता तथा महत्ता के अभिप्राय से ही पूज्य महर्षियों ने यज्ञोपवित को को उस दशा में जब कि सम्पूर्ण शरीर ही अपावन होता है - पवित्रता के सब से महान केंद्र कान पर रखने का विधान किया है । 

        और भी कहा है कि कभी आचमन करना है और जल उस समय उपलब्ध नहीं है तो दाहिने कान का स्पर्श करने से आचमन हो जाता है ।। 

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

आहुति कैसे डालें

 🔥 अग्नि में आहूति किस स्थान में डालें 🔥


" सर्वकार्यप्रसिद्धयर्थं जिह्वायां तत्र होमयेत् ।

  चक्षुः कर्णादिकं ज्ञात्वा होमयेद्देशिकोत्तमः ।।

  अग्निकर्णे हुतं यस्तु कुर्याच्चेद् व्याधितो भयम् ।

  नासिकायां महद्दुःखं चक्षुषोर्नाशनं भवेत् ।।

  केशे दारिद्रयदं प्रोक्तं तस्माज्जिह्वासु होमयेत् । 

  यत्र काष्ठं तत्र श्रोते यत्र धूमस्तु नासिके ।।

  यत्राल्पज्वलनं नेत्रं यत्र भस्म तु तच्छिरः । 

  यत्र न ज्वलितो वह्निस्तत्र जिह्वा प्रकीर्तिता ।। "

☛ समस्त कार्यों की सिद्धि के लिए अग्नि की जिह्वा में होम करना चाहिए -- श्रेष्ठ आचार्य चक्षु - कर्ण - नासिका - सिर आदि की पहचान कर हवन करें ---

                    अग्नि के कान में यदि हवन करें तो उसे व्याधि से भय होता है -- नासिका में हवन करें तो महादुःख होता है -- नेत्रों में हवन करें तो विनाश होता है -- केशों में किया गया हवन दारिद्र्यप्रद कहा गया है -- इसलिए जिह्वाओं में हवन करना चाहिए ---

                  

               जहाँ काष्ठ है वहाँ अग्नि के कान कहे गये हैं --

जहाँ धुआं है वहाँ अग्नि की नासिका कही गई है -- जहाँ अग्नि कम जलती है वहाँ अग्नि के नेत्र कहे गये हैं -- जहाँ भस्म है वहाँ अग्नि का सिर कहा गया है -- और जहाँ अग्नि ज्वालायुक्त है वहाँ अग्नि की जिह्वा कही गई है - अतः जिह्वा में ही हवन श्रेष्ठ कहा गया है ।


               🚩 हर हर महादेव 🚩 ।।वशिष्ठ ।।

मंगलवार, 1 सितंबर 2026

यज्ञ सामग्री का अनुपात

 🔥 यज्ञ में शाकल्य ( सामग्री ) का परिमाण कितना होना

                                   चाहिए 🔥  


" तिलार्धं तण्डुला देयास्तण्डुलार्धं यवास्तथा ।

  यवार्धं शर्कराः प्रोक्ताः सर्वार्धं च घृतं स्मृतम्।। "

                तिल का आधा चावल - और चावल का आधा जौ लेना चाहिए - जौ से आधा शक्कर कही गई है और सब से आधा घृत कहा गया है - ( एक हिस्सा गुगलादि और यथा शक्ति मेवा )।


" तिलाधिक्ये भवेल्लक्ष्मीर्यवाधिक्ये दरिद्रता । 

  धृताधिक्ये भवेन्मुक्तिः सर्वसिद्धिस्तु शर्करा ।। "

                 तिल की अधिकता से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है और यव की अधिकता से दरिद्रता की प्राप्ति होती है -- घृत की अधिकता से मुक्ति शर्करा की अधिकता से सर्वसिद्धि होती है ।


" आयुःक्षयं यवाधिक्यं यवसाम्यं धनक्षयम् । 

  सर्वकामसमृद्ध्यर्थं तिलाधिक्यं सदैव हि ।। "

                तिल से जौ अधिक होने पर आयु का नाश होता है -- तिल के बराबर यव रहने पर धन का नाश होता है - अतः सर्वदा तिल की अधिकता ही उचित है - इससे सम्पूर्ण कार्यों की सिद्धि होती है ।


🔥यज्ञ में तिल की इतनी उपयोगिता क्यों हैं ?🔥


           यज्ञ भगवान् विष्णु का स्वरूप है --- " यज्ञो वे विष्णुः " ( तैत्तिरीय ब्राह्मण १|२|५|४० )-- " विष्णुर्वै यज्ञः " ( ऐतरेय ब्राह्मण १|१५ )-- " यो वै विष्णुः स यज्ञः ( शतपथ ब्राह्मण ५|२|३|६ ) --- " त्वमेव यज्ञो यष्टा च यज्वनां परमेश्वर ।। "

       हे परमेश्वर ! आप ही यज्ञ करने वालों के यष्टा और यज्ञ स्वरूप हैं ।


" तिलाः पुण्याः पवित्राश्च सर्वपापहराः स्मृताः। 

  शुक्लाश्चैव तथा कृष्णा विष्णुगात्रसमुद्भवाः।। "

                 तिल अत्यंत पवित्र है और पुण्यप्रद है तथा वह समस्त प्रकार के पापों को दूर करने वाला है -- वह तिल सफेद और काला दो प्रकार का भगवान् श्री विष्णु के शरीर से उत्पन्न हुआ है ।


                🚩 हर हर महादेव 🚩 ।। 

किसका अभिवादन न करें

 इन्हे किया अभिवादन निष्फल होता है :--


          रजस्वला -- अशौचयुक्त सूतीका स्त्री -- पति की प्राण घातिनी तथा गर्भपात कराने वाली स्त्री अभिवादन करने के योग्य नहीं है ---

          

          इसी प्रकार पाखण्डी -- पतित -- व्रात्य ( यज्ञोपवित के नियत काल का उल्लंघन करने वाला ) -- महापातकी -- ( शराब पीने वाला - गुरुपत्नी गामी - चोर - ब्राह्मण व गौहत्यारा और इनका संग करने वाला ) -- दुष्ट स्वभाव वाला -- जूता पहने हुए व्यक्ति को तथा कृतघ्न -- मंत्रोच्चारण करते हुए द्विज -- शत्रु -- 

              तथा भोजन करते हुए या भोजन कराने वाले व्यक्ति को और अपवित्र -- दौडते हुए या दौड़ने वाले तथा नास्तिक व्यक्ति को -- वमन करते समय -- जम्हाई लेते समय -- दन्तधावन करते समय -- जो द्विज प्रमाद से अभिवादन करता है -- वह स्वयं अशुद्ध हो जाता है और अहोरात्र ( एक दिन व रात ) उपवास करने से शुद्ध होता है । 

 

       ये महर्षि व्याघ्रपाद जो उपमन्यु के पिता थे और उपमन्यु भगवान श्रीकृष्ण के दीक्षागुरु थे उन व्याघ्रपाद ने अपनी स्मृति में कहे हैं -- ये भगवान के इतने श्रेष्ठभक्त थे - जब भगवान से इन्होनें व्याघ्र के पैर मांगे जिसे जंगलसे पूजा के लिए फूल - फल लाते इन्हें नंगे पैर कंकर व कांटों से वेदना ना हो ।।

प्रेतों का भोजन

 प्रेतों का भोजन ❓


महर्षि गौतम ने पूछा -- संसार में कोई भी प्राणी बिना भोजन के नहीं रहते -- अतः बताओ , तुम लोग क्या आहार करते हो ❓

      

प्रेतों ने कहा --

       " अप्रक्षालितपादस्तु यो भुङ्क्ते दक्षिणामुखः ।

          यो वेष्टितशिरा भुङ्क्ते प्रेता भुञ्जन्ति नित्यशः ।। "

अर्थात् :--                 

           द्विजश्रेष्ठ ! जहाँ भोजन के समय आपस में कलह होने लगता है - वहाँ उस अन्न के रस को हम ही खाते हैं ।

             जहाँ मनुष्य बिना लिपी - पुती ( पोछा आदि से साफ हुई ) धरती पर खाते हैं - 

              जहाँ ब्राह्मण शौचाचार से भ्रष्ट होते हैं वहाँ हम को भोजन मिलता है --

             जो पैर धोये बिना खाता है - और जो दक्षिण की ओर मुँह करके भोजन करता है-- अथवा जो सिर पर वस्त्र लपेट कर भोजन करता है - उसके उस अन्न को सदा हम प्रेत ही खाते हैं --

           

            जहाँ रजस्वला स्त्री - चाण्डाल - और सुअर श्राद्ध के अन्न पर दृष्टि डाल देते हैं - वह अन्न पितरों का नहीं हम प्रेतों का ही भोजन होता है --

          जिस घर में सदा जूठन पडा रहे - निरन्तर कलह होता रहे - और बलिविश्वैदैव न किया जाता हो - वहाँ हम प्रेत लोग भोजन करते हैं ।


महर्षि गौतम ने पूछा ❓

            कैसे घरों में तुम्हारा प्रवेश होता है - यह बात मुझे सत्य - सत्य बताओ ❓


प्रेत बोले :---

             " ब्राह्मण ! जिस घर में बलिवैश्वदेव होने से धुएं की बत्ती उडती दिखाई देती है - उसमें हम प्रवेश नहीं कर पाते ---

             जिस घर में सवेरे चौका लग जाता है - तथा वेद मंत्रों की ध्वनि होती रहती है- वहाँ की किसी वस्तु पर हमारा अधिकार नहीं होता ।


गौतम ने पूछा ❓

           " किस कर्म के परिणाम में मनुष्य प्रेत भाव को प्राप्त होता है ❓

प्रेत बोले :--

             " जो धरोहर हडप लेते हैं - जुठे मुँह यात्रा करते हैं - गाय और ब्राह्मण की हत्या करने वाले हैं वे प्रेत योनि को प्राप्त होते हैं ।

                चुगली करने वाले -झूठी गवाही देने वाले - न्याय के पक्ष में नहीं रहने वाले - वे मरने पर प्रेत होते हैं ।

              सूर्य की ओर मुँह करके थूक - खकार - और मल - मूत्र त्याग करते हैं - वे प्रेत शरीर प्राप्त करके दीर्घकाल तक उसी में स्थित रहते हैं --

         गौ - ब्राह्मण तथा रोगी को जब कुछ दिया जाता हो - उस समय जो न देने की सलाह देते हैं - वे भी प्रेत ही होते हैं - 

           यदि शूद्र का अन्न पेट में रहते हुए ब्राह्मण की मृत्यु हो जाये तो वह अत्यंत भयंकर प्रेत होता है --

            विप्रवर ! -- जो अमावस्या की तिथि में हल में बैलों को जोतता है वह मनुष्य प्रेत बनता है ।

            जो विश्वासघाती - ब्रह्महत्यारा - स्त्रीवध करने वाला - गोघाती - गुरूघाती - और पितृहत्या करने वाला है वह मनुष्य भी प्रेत होता है। 

               मरने पर जिसके १६ एकोदिष्ट श्राद्ध नहीं किये गये हैं - उसको भी प्रेतयोनि प्राप्त होती है ।। महाभारत ।।


                   🚩 हर हर महादेव 🚩 ।।  

अयोग्य द्वारा स्थापित मूर्ति से नुक़सान

 🔥 शूद्र और स्त्री के द्वारा स्थापित मूर्तियों को प्रणाम करने से

                             हानि 🔥


" यः शूद्रेणार्चितं लिङ्गं विष्णुं वा प्रणमेन्नरः। 

  न तस्य निष्कृतिर्दष्टा प्रायश्चित्तायुतेरपि ।।

  नमेद्यः शूद्रसंस्पृष्टं लिङ्गं वा हरिमेव वा ।

  स सर्वयातनाभोगी यावदाचन्द्रतारकम् ।।

                   पाखण्डपूजितं लिङ्गं नत्वा पाखण्डतां व्रजेत् ।

                   आभीरपूजितं लिङ्गं नत्वा पाखण्डतां व्रजेत् ।।

                   योषिद्भिः पूजितं लिङ्गं विष्णुं वापि नमेत्तु यः ।

                   स कोटिकुलसंयुक्तमाकल्पं रौरवं वसेत् ।।

जो मनुष्य शूद्र से पूजित शिवलिंग और विष्णु को अभिवादन करता है - उसके पाप की निवृत्ति दस हजार बार प्रायश्चित करने से भी नहीं होती -- जो शूद्र के स्पर्श किये हुए लिङ्ग और हरि ( विष्णु ) की मूर्ति को अभिवादन करता है वह समस्त प्रकार की यातनाओं को तब तक भोगता है जब तक सूर्य और चंद्र की स्थिति रहती है ।

                    जो पाखण्डी से पूजित लिङ्ग को प्रणाम करता है वह पाखण्ड को प्राप्त करता है-- जो आभिर से ( ग्वाला से ) पूजित लिङ्ग को प्रणाम करता है- वह नर्क को प्राप्त होता है -- जो स्त्रियों से पूजित लिङ्ग और विष्णु को प्रणाम करता है - वह करोडों कुलों सहित कल्पपर्यन्त रौरव नरक निवास करता है ।

                                                                    ( नारदपुराण )


🌷 विष्णु और शिव की मूर्ति के स्पर्श से शूद्रादि की हानि 🌷


" शूद्रो वाऽनुपनीतो वा स्त्रियो वा पतितोऽपि वा ।

  केशवं वा शिवं वापि स्पृष्ट्वा नरकम्श्नुते ।। "

                 शूद्र - अनुपनीत - ( यज्ञोपवीत संस्कार से रहित ) - स्त्री और पतित -- ये विष्णु और शिव की मूर्ति को स्पर्श करके नरक को प्राप्त करते हैं ।


                  🚩 हर हर महादेव 🚩 ।।

सदा दुखी ही रहेगा

 ईर्ष्या घृणी त्वसंतुष्टः क्रोधनो नित्यशंकितः । परभाग्योपजीवी च षडेते दुःखभागिनः ।।


भावार्थ : _*ईर्ष्या करने वाला, घृणा करने वाला, सदैव क्रोध करने वाला, सदा असन्तुष्ट रहने वाला, सदा शंका करने वाला तथा दूसरे के भरोसे जीनेवाला, ये छ: सदा दुःख भोगते हैं।*_👆👆👆👆👆

मूर्ति का त्याग



" असुरैर्मुनिभिर्गोत्रैस्तन्त्रविद्भिः        प्रतिष्ठितम् ।

   जीर्णं वाऽप्यथवा भग्नं विधिनापि न चालयेत्।। " 

                 राक्षसों के द्वारा  - मुनियों के द्वारा - मुनियों के गोत्रजों के द्वारा और तन्त्रवेताओं के द्वारा प्रतिष्ठित मूर्ति यदि जीर्ण हो जाये अथवा खण्डित हो जाये तो उस मूर्ति को किसी भी रूप से हटाना उचित नहीं ।         ( अग्निपुराण १७३|१९ )


🚩    शिवलिंग आदि मूर्तियों के जलने - टूटने और चलने पर ( स्थानभ्रष्ट होने पर  ) जीर्णोद्धार करना चाहिए  - किन्तु अनादिसिद्ध लिङ्ग आदि मूर्तियों के खण्डित होने पर उनका जीर्णोद्धार करना उचित नहीं है -- ऐसी मूर्तियों के लिए ' महाभिषेक ' करना चाहिए।                     ( निर्णयसिन्धु )

               

🛕     देवमूर्ति के अंग में यदि दूसरा अंग अर्थात् दूसरे नेत्र चढाने हों - तो पुनः प्रतिष्ठा करनी चाहिए -- किन्तु जलाधिवास में नेत्रोन्मीलन को त्याग देना चाहिए। 

" अङ्गादङ्गादिसन्धाने   प्रतिष्ठां   पुनराचरेत् ।

  जलाधिवासविहितनेत्रोन्मीलनवर्जिताम् ।। "


                  🚩 हर हर महादेव 🚩 ।

आसन

  ग्राह्य व अग्राह्य आसन 


" काम्यार्थ  कम्बलं  चैव श्रेष्ठं  च  रक्तकम्बलम् ।

  कृष्णाजिने ज्ञानसिद्धिर्मोक्ष श्री र्व्याघ्चर्म्मणि ।।

  कुशासने    मंत्रसिद्धिर्नात्रकार्य्या   विचारणा ।। "

                काम्य कर्म में कम्बल का आसन वह भी लाल हो श्रेष्ठ है -- काले मर्गचर्म ज्ञानसिद्धि प्राप्त होती है -- व्याघ्रचर्म पर मोक्षश्री प्राप्त होती है - कुशासन पर सब मंत्रों की सिद्धि प्राप्त होती है -- इसमें कुछ भी संदेह नहीं है ।


" धरण्यां     दुःखसम्भूतिर्दौर्भाग्यं     दारूजासने ।

  वंशासने दरिद्रः स्यात् पाषाणो व्याधि पीडनम् ।।

  तृणासने    यशोहानिः     पल्लवे    चित्तविभ्रमः।

  जपध्यानतपोहानिं    वस्त्रासनं    करोति    हि ।। "

                  खाली भूमि पर निरासन यानि बिना आसन से बैठने से दुःख  -- लकडी के आसन पर बैठने से दौर्भाग्य  - बांस के आसन पर बैठने से दरिद्रता  -- पत्थर पर बैठने से रोग -- घास - फूँस के आसन पर बैठने से अपयश -- पत्तों के आसन पर बैठने से चित्तभ्रम -- और कपडे के आसन पर बैठने जप - ध्यान और तप की हानि होती है ।


" आसीनासो अरूणीनामुपस्थे " ऊर्णा ( ऊन ) निर्मित आसन पर बैठने का भी निर्देश है ।


                  🚩 हर हर महादेव 🚩 ।।

पितृपक्ष में परान्न से बचें

 गरुड़ पुराणोक्त पितृपक्ष परान्न निषेध कथा सनातन धर्म में 16 दिनों का पितृपक्ष वर्ष का सबसे सूक्ष्म और संवेदनशील समय माना गया है। गरुड़ पुरा...