सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कलंक या बदनामी

 कलंक या बदनामी


कलंक या बदनामी किसी भी व्यक्ति के लिए सबसे बुरा समय कहा जा सकता है। जीवन में कई बार आप कुछ भी गलत नहीं कर रहे होते हैं, फिर भी जब समय चक्र की गति विपरीत होती है, तो आप इसके निशाने पर आ जाते हैं। आप किसी के बारे में अच्छा सोचते हैं और अच्छा करते हैं, लेकिन वही व्यक्ति आपके बारे में गलत धारणा बना लेता है। यह स्थिति डरावनी होती है, क्योंकि ऐसी स्थिति से छुटकारा पाना बहुत मुश्किल होता है।


ऐसी स्थितियों के लिए सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार ग्रह शनि है। आमतौर पर शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या में सबसे ज़्यादा प्रतिकूल परिणाम देखने को मिलते हैं। अगर किसी व्यक्ति की कुंडली के अनुसार वह साढ़ेसाती या ढैय्या के प्रभाव में है, तो उसे अक्सर बिना किसी कारण के कलंक और बदनामी का सामना करना पड़ता है।


इसके अलावा कुंडली में कई अन्य ग्रह संयोजन भी ग्रहों की दोषपूर्ण स्थिति के कारण व्यक्ति को बदनामी का सामना करवा सकते हैं। ख़ास तौर पर प्रेम संबंधों में, बदनामी एक ऐसा विषय है जो अक्सर जीवन में तब सामने आता है जब दोष युक्त ग्रह स्थिति होती है।  ऐसे व्यक्ति को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए और अपने मन पर नियंत्रण रखना चाहिए। कुछ विशेष प्रकार के ज्योतिषीय योगों के बारे में जो किसी को भी प्रेम में बदनाम कर सकते हैं। अक्सर शनि का दोष व्यक्ति को प्रेम संबंध में बदनामी का कारण बन सकता है। यदि कुंडली के पंचम भाव में शनि स्थित हो और उसके साथ किसी अन्य क्रूर ग्रह की युति या दृष्टि हो तो ऐसे व्यक्ति को प्रेम में अपयश का सामना करना पड़ सकता है।


दूसरी स्थिति राहु या केतु की खराब दशा में तब होती है जब व्यक्ति मतिभ्रम का शिकार हो जाता है। खुद को श्रेष्ठ समझने लगता है और परिणामस्वरूप वह अक्सर गलतियां कर बैठता है। जब राहु और केतु किसी क्रूर या पापी ग्रह के साथ हों तो इनके बुरे प्रभाव और भी भयावह हो जाते हैं।


ऐसे ही अपयश या बदनामी देने वाले दर्जनों ग्रह योग होते हैं। जैसे कि यदि नवमांश कुंडली में शुक्र और मंगल की युति किसी भी राशी में बने तो भी बदनामी योग बनता है । ज्योतिष शास्त्र में शुक्र को प्रेम प्रणय का कारक मानते हैं। और मंगल को उत्तेजना का कारक कहा जाता हैं। जब भी प्रेम और उत्तेजना कि युति योगी तो बदनामी योग का निर्माण होगा ।


यदि कुंडली में 5,7,11,12 भाव में क्रूर या दुष्ट ग्रहों की युति या द्रष्टि संबंध बने तो बदनामी योग का उपयोग व्यावसायिक कार्यों में होता है और यदि कुंडली में 5,8,12 भावेशो की युति या द्रष्टि संबंध बने तो बदनामी या लांछन का प्रबल योग भी बनता है। क्यों कि अष्टम भाव बदनामी का भाव होता हैं और यदि इस योग में 1,5,6,8,12 व् शनि की युति भी हो जाये तो जातक किसी कोर्ट केस में उलझ जाता है।


साथ ही राहू और शुक्र की युति विरोधी सेक्स के प्रति तीव्र आकर्षण और गुप्त संबंधों का निर्देश देते हैं। राहू के साथ शुक्र के जुड़े होने से जातक को अपने चरित्र में सयंम बनाये रखने के लिये स्वयं से संघर्ष करना पड़ता है।


इसी तरह अन्य आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, व्यवसायिक, क़ानूनी आदि मामलों में बदनामी, लालछन, कलंक आदि योगों के लिये अन्य भावेश और ग्रह फलों का भी अध्ययन अनिवार्य है | बस आवश्यकता है जातक के जन्म के समय के स्पष्ट जानकारी और उसके सटीक विशलेषण की और इन आरोपों से बचने के लिये शास्त्र सम्मत सही पध्यति से उपाय कर के बचा भी जा सकता है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

श्रीशिव महिम्न: स्तोत्रम्

              __श्रीशिव महिम्न: स्तोत्रम्__ शिव महिम्न: स्तोत्रम शिव भक्तों का एक प्रिय मंत्र है| ४३ क्षन्दो के इस स्तोत्र में शिव के दिव्य स्वरूप एवं उनकी सादगी का वर्णन है| स्तोत्र का सृजन एक अनोखे असाधारण परिपेक्ष में किया गया था तथा शिव को प्रसन्न कर के उनसे क्षमा प्राप्ति की गई थी | कथा कुछ इस प्रकार के है … एक समय में चित्ररथ नाम का राजा था| वो परं शिव भक्त था| उसने एक अद्भुत सुंदर बागा का निर्माण करवाया| जिसमे विभिन्न प्रकार के पुष्प लगे थे| प्रत्येक दिन राजा उन पुष्पों से शिव जी की पूजा करते थे | फिर एक दिन … पुष्पदंत नामक के गन्धर्व उस राजा के उद्यान की तरफ से जा रहा था| उद्यान की सुंदरता ने उसे आकृष्ट कर लिया| मोहित पुष्पदंत ने बाग के पुष्पों को चुरा लिया| अगले दिन चित्ररथ को पूजा हेतु पुष्प प्राप्त नहीं हुए | पर ये तो आरम्भ मात्र था … बाग के सौंदर्य से मुग्ध पुष्पदंत प्रत्यक दिन पुष्प की चोरी करने लगा| इस रहश्य को सुलझाने के राजा के प्रत्येक प्रयास विफल रहे| पुष्पदंत अपने दिव्या शक्तियों के कारण अदृश्य बना रहा | और फिर … राजा च...

शिव नाम महिमा

भगवान् श्रीकृष्ण कहते है ‘महादेव महादेव’ कहनेवाले के पीछे पीछे मै नामश्रवण के लोभ से अत्यन्त डरता हुआ जाता हूं। जो शिव शब्द का उच्चारण करके प्राणों का त्याग करता है, वह कोटि जन्मों के पापों से छूटकर मुक्ति को प्राप्त करता है । शिव शब्द कल्याणवाची है और ‘कल्याण’ शब्द मुक्तिवाचक है, वह मुक्ति भगवन् शंकर से ही प्राप्त होती है, इसलिए वे शिव कहलाते है । धन तथा बान्धवो के नाश हो जानेके कारण शोकसागर मे मग्न हुआ मनुष्य ‘शिव’ शब्द का उच्चारण करके सब प्रकार के कल्याणको प्राप्त करता है । शि का अर्थ है पापोंका नाश करनेवाला और व कहते है मुक्ति देनेवाला। भगवान् शंकर मे ये दोनों गुण है इसीलिये वे शिव कहलाते है । शिव यह मङ्गलमय नाम जिसकी वाणी मे रहता है, उसके करोड़ जन्मों के पाप नष्ट हो जाते है । शि का अर्थ है मङ्गल और व कहते है दाता को, इसलिये जो मङ्गलदाता है वही शिव है । भगवान् शिव विश्वभर के मनुष्योंका सदा ‘शं’ कल्याण करते है और ‘कल्याण’ मोक्ष को कहते है । इसीसे वे शंकर कहलाते है । ब्रह्मादि देवता तथा वेद का उपदेश करनेवाले जो कोई भी संसार मे महान कहलाते हैं उन सब के देव अर्थात् उपास्य होने...

नाम जप महिमा

श्री रामचरितमानस के अनुसार नामजपकी महिमा... कलियुगमें जितने भी साधनामार्ग है उसमें सबसे सहज मार्ग है भक्तियोग, और भक्तियोग अंतर्गत नामसंकीर्तनयोग अनुसार साधना करना इस युगकी सर्वश्रेष्ट साधनामार्ग है। संत तुलसीदासने श्री रामचरितमानसमें नामके महिमाका गुणगान किया है।  संत जिस देवी या देवताके स्वरूपकी आराधना कर आध्यात्मिक प्रगति कर आत्मज्ञानी बनते हैं उसी आराध्यके नामकी गुणगान कर उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। अध्यात्मशास्त्र अनुसार हमारे सूक्ष्म पिंडमें जिस सूक्ष्म तत्त्वकी कमी होती है, जब हम उस तत्त्वकी पूर्ति हेतु उस आराध्यके नामका जप करते हैं तो हमारी आध्यात्मिक प्रगति करते हैं द्रुत गतिसे होती है | जब तक हमने गुरुमंत्र नहीं मिला हो हमें आप कुलदेवता का जप करना चाहिए और यदि कुलदेवताका नाम नहीं पता हो तो या तो ‘श्री कुलदेवतायै नमः’ का जप करना चाहिए या अपने इष्टदेवताका जप करना चाहिए।  यदि घरमें पितृ दोष हो तो एक घंटे ‘श्री गुरुदेव दत्त’ का जप करना चाहिए और शेष समय अपने कुलदेवताका या इष्टदेवताका मंत्र जपना चाहिए। ५० % से अधिक आध्यात्मिक स्तरके साधक उच्च कोटिक...