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आठ_प्रकार_के_ब्राह्मण

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श्रीराम! 
(स्कन्द पुराण के आधार पर.....)
      कलाप ग्राम निवासी  सुतनु जी नारद जी के बारह प्रश्नों में से "किन को आठ प्रकार के ब्राह्मणत्व का ज्ञान है" इस प्रश्न के परिप्रेक्ष में उत्तर देते हैं--
#अथ_ब्राह्मणभेदांस्तवष्टौ_विप्रावधारय।।
#मात्रश्च_ब्रारह्मणश्चैव_श्रोत्रियश्च_ततः_परम् ।
#अनूचनस्तथा_भ्रूणो_ऋषिकल्प_ऋषिमुनि:।।
#इत्येतेष्टौ_समुद्ष्टा_ब्राह्मणाः_प्रथमं_श्रुतौ।
#तेषां_परः_परः_श्रेष्ठो_विद्यावृत्तिविशेषतः।। (स्कन्द पु. महेश्वर खण्ड कुमा. ३/२८७-२२८९).
 विद्या  वंश व वृत्त की महिमा से ब्राह्मण आठ प्रकार के कहे गये हैं, और इन में से उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं।
१-मात्र, २-ब्राह्मण, ३-श्रोत्रिय, ४-अनूचान, ५- भ्रूण, ६- ऋषिकल्प, ७-ऋषि और ८-मुनि!
इन के लक्षण इस प्रकार हैं!
१-#मात्र :- जो ब्राह्मणों के कुल में उत्पन्न हुआ हो, किन्तु उनके गुणों से युक्त न हो, आचार और क्रिया से रहित हो, वह "मात्र" कहलाता है!
२-#ब्राह्मण :-जो वेदों में पारंगत हो, आचारवान हो, सरल-स्वभाव, शांतप्रकृति, एकांतसेवी, सत्यभाषी और दयालु हो वह " वह "ब्राह्मण" कहा जाता है!
३-#श्रोत्रिय : जो वेदों की एक शाखा छ: अंगों और श्रौत विधियों के सहित अध्ययन करके अध्ययन-अध्यापन, यजन-याजन, दान और प्रतिग्रह -इन छ: कर्मों में रत रहता हो, उस धर्मविद ब्रह्मण को "श्रोत्रिय" कहते हैं!
४-#अनूचान : जो ब्राह्मण वेदों और वेदांगों के तत्त्व को जाननेवाला, शुद्धात्मा, पाप रहित, शोत्रिय के गुणों से संपन्न, श्रेष्ठ और प्राज्ञ हो, उसे "अनूचान" कहा गया है!
५ #भ्रूण : जो अनूचान के गुणों से युक्त हो, नियमित रूप से यज्ञ और स्वाध्याय करने वाला, यज्ञ शेष का ही भोग करने वाला और जितेन्द्रिय हो उसे शिष्टजनों ने "भ्रूण" की संज्ञा दी है!
६- #ऋषिकल्प :- जो समस्त वैदिक और लौकिक ज्ञान प्राप्त करके आश्रम व्यवस्था का पालन करे, नित्य आत्मवशी रहे, उसे ज्ञानीजन "ऋषिकल्प" नामसे स्मरण किया है!
७-#ऋषि :-जो ब्राह्मण ऊर्ध्वरेता, अग्रासन का अधिकारी, नियत आहार करनेवाला, संशय रहित, शहप देने और अनुग्रह करने में समर्थ और सत्य-प्रतिज्ञा हो, उसे "ऋषि" की पदवी दी गयी है!
८-#मुनि :-जो कर्मों से निवृत्त, सम्पूर्ण तत्त्व का ज्ञाता, काम-क्रोध से रहित, ध्यानस्थ, निष्क्रिय और शान्त हो, मिट्टी और सोने में समभाव रखता हो, उसे "मुनि" के नाम से सम्मानित किया है! इस प्रकार ब्राह्मणों के आठ प्रकार ( भेद)  कहे गये हैं।
   इस प्रकार से वंश विद्या और वृत्त ( सदाचार) के द्वारा उत्कर्ष को प्राप्त #त्रिशुक्ल कहलाते हैं। ये ही यज्ञ आदि में पूजित  भी होते हैं।

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