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सफलता का रहस्य

बाज लगभग 70 वर्ष जीता है, परन्तु अपने जीवन के 40वें वर्ष में आते आते उसे एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ता है। उस अवस्था में उसके शरीर के तीन प्रमुख अंग निष्प्रभावी होने लगते हैं- 1. पंजे लम्बे और लचीले हो जाते है व शिकार पर पकड़ बनाने में अक्षम होने लगते हैं। 2. चोंच आगे की ओर मुड़ जाती है और भोजन निकालने में व्यवधान उत्पन्न करने लगती है। 3. पंख भारी हो जाते हैं, और सीने से चिपकने के कारण पूरे खुल नहीं पाते हैं, उड़ानें सीमित कर देते हैं। भोजन ढूँढ़ना, भोजन पकड़ना और भोजन खाना.... तीनों प्रक्रियायें अपनी धार खोने लगती हैं। उसके पास तीन ही विकल्प बचते हैं, या तो देह त्याग दे, या अपनी प्रवृत्ति छोड़ गिद्ध की तरह त्यक्त भोजन पर निर्वाह करे... या फिर स्वयं को पुनर्स्थापित करे, आकाश के निर्द्वन्द्व एकाधिपति के रूप में। जहाँ पहले दो विकल्प सरल और त्वरित हैं, वहीं तीसरा अत्यन्त पीड़ादायी और लम्बा। बाज पीड़ा चुनता है और स्वयं को पुनर्स्थापित करता है। वह किसी ऊँचे पहाड़ पर जाता है, एकान्त में अपना घोंसला बनाता है, और तब प्रारम्भ करता है पूरी प्रक्रिया। सबसे पहले वह अपनी ...

रुद्राभिषेक से क्या क्या लाभ मिलता है ?

  शिव पुराण के अनुसार किस द्रव्य से अभिषेक करने से क्या फल मिलता है अर्थात आप जिस उद्देश्य की पूर्ति हेतु रुद्राभिषेक करा रहे है उसके लिए किस द्रव्य का इस्तेमाल करना चाहिए का उल्लेख शिव पुराण में किया गया है उसका सविस्तार विवरण प्रस्तुत कर रहा हू और आप से अनुरोध है की आप इसी के अनुरूप रुद्राभिषेक कराये तो आपको पूर्ण लाभ मिलेगा। श्लोक जलेन वृष्टिमाप्नोति व्याधिशांत्यै कुशोदकै दध्ना च पशुकामाय श्रिया इक्षुरसेन वै। मध्वाज्येन धनार्थी स्यान्मुमुक्षुस्तीर्थवारिणा। पुत्रार्थी पुत्रमाप्नोति पयसा चाभिषेचनात।। बन्ध्या वा काकबंध्या वा मृतवत्सा यांगना। जवरप्रकोपशांत्यर्थम् जलधारा शिवप्रिया।। घृतधारा शिवे कार्या यावन्मन्त्रसहस्त्रकम्। तदा वंशस्यविस्तारो जायते नात्र संशयः। प्रमेह रोग शांत्यर्थम् प्राप्नुयात मान्सेप्सितम। केवलं दुग्धधारा च वदा कार्या विशेषतः। शर्करा मिश्रिता तत्र यदा बुद्धिर्जडा भवेत्। श्रेष्ठा बुद्धिर्भवेत्तस्य कृपया शङ्करस्य च!! सार्षपेनैव तैलेन शत्रुनाशो भवेदिह! पापक्षयार्थी मधुना निर्व्याधिः सर्पिषा तथा।। जीवनार्थी तू पयसा श्रीकामीक्षुरसेन वै। पुत्रार्थी शर...

|| चत्वारो वेदाः परिचयः ||

 ऋग्वेद का सामान्य परिचय 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 (१)  ऋग्वेद की शाखा :👉  महर्षि पतञ्जलि के अनुसार ऋग्वेद की २१ शाखाएँ हैं, किन्तु पाँच ही शाखाओं के नाम उपलब्ध होते हैं :--- (१) शाकल (२) बाष्कल (३) आश्वलायन (४) शांखायन (५) माण्डूकायन संप्रति केवल शाकल शाखा ही उपलब्ध है ! ऋग्वेद के ब्राह्मण 🔸🔸🔹🔸🔸 (१) ऐतरेय ब्राह्मण (२) शांखायन ब्राह्मण ऋग्वेद के आरण्यक 🔸🔸🔹🔹🔸🔸 (१) ऐतरेय आरण्यक (२) शांखायन आरण्यक ऋग्वेद के उपनिषद 🔸🔸🔹🔹🔸🔸 (१) ऐतरेय उपनिषद् (२) कौषीतकि उपनिषद् ऋग्वेद के देवता 🔸🔸🔹🔸🔸 तिस्र एव देवताः इति नैरुक्ताः ! (१) अग्नि (पृथिवी स्थानीय ) (२) इन्द्र या वायु (अन्तरिक्ष स्थानीय ) (३) सूर्य (द्यु स्थानीय ) ऋग्वेद में बहु प्रयोग छंद 🔸🔸🔹🔸🔹🔸🔸 (१) गायत्री , (२) उष्णिक् (३) अनुष्टुप् , (४) त्रिष्टुप् (५) बृहती, (६) जगती, (७) पंक्ति, ऋग्वेद के मंत्रों के तीन विभाग 🔸🔸🔹🔹🔸🔸🔹🔹 (१) प्रत्यक्षकृत मन्त्र (२) परोक्षकृत मन्त्र (३) आध्यात्मिक मन्त्र ऋग्वेद का विभाजन 🔸🔸🔹🔸🔸 (१) अष्टक क्रम :- ८ अष्टक ६४ अध्याय ...

देवी-देवताओ की सवारी

भगवान शिव के वाहन नंदी, गणेश जी के वाहन मूषक, मां दुर्गा के वाहन शेर एवं भगवान सूर्य के वाहन सातघोड़े हैं। क्या आप जानते हैं कि सूर्य देव एक या दो नहीं, बल्कि पूरे सात घोड़ों की सवारो क्यों करते हैं। दरअसल इसके पीछे धार्मिक के साथ-साथ वैज्ञानिक उद्देश्य भी छिपा है। कहते हैं इन सातो घोड़ों का एक खास उद्देश्य था, सभी के पास एक खास ऊर्जा थी। वैज्ञानिक दृष्टि से इन सात घोड़ों को सूर्य की सात किरणों का नाम दिया जाता है। इसी तरह से भगवान शिव एवं गणेश जी या अन्य किसी भी हिन्दू देवी-देवता को मिले वाहन के पीछे एक दिलचस्प कहानी है। आज हम आपको एक ऐसी ही कहानी बताने जा रहे हैं जो देवी दुर्गा एवं उनके वाहन शेर से जुड़ी है। शक्ति का रूप दुर्गा, जिन्हें सारा जगत मानता है... ना केवल कोई साधारण मनुष्य, वरन् सभी देव भी उनकी अनुकम्पा से प्रभावित रहते हैं। एक पौराणिक आख्यान के अनुसार मां दुर्गा को यूंही शेर की सवारी प्राप्त नहीं हुई थी, इसके पीछे एक रोचक कहानी बनी है। आदि शक्ति, पार्वती, शक्ति... आदि नाम से प्रसिद्ध हैं मां दुर्गा। धार्मिक इतिहास के अनुसार भगवान शिव को पति के रूप में पानेके लिए देवी पा...

श्री खाटू श्याम जी कथा

महाबली भीम के पुत्र घटोत्कच के विषय में हम सब जानते हैं । वीर घटोत्कच का विवाह दैत्यराज मुर की पुत्री मौरवी से हुआ । मौरवी को कामकंटका व आहिल्यावती के नामों से भी जाना जाता है । वीर घटोत्कच तथा महारानी मौरवी को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई । बालक के बाल बब्बर शेर की तरह होने के कारण इनका नाम बर्बरीक रखा गया । इन्हीं वीर बर्बरीक को आज दुनिया ' खाटू श्याम ' के नाम से जानती है । वीर बर्बरीक को बचपन में भगवान श्री कृष्ण द्वारा परोपकार करने एवं निर्बल का साथ देने की शिक्षा दी गयी । इन्होनें अपने पराक्रम से ऐसे अनेक असुरों का वध किया जो निर्बल ऋषि - मुनियों को हवन - यज्ञ आदि धार्मिक कार्य करने से रोकते थे । विजय नामक ब्राह्मण का शिष्य बनकर उनके यज्ञ को राक्षसों से बचाकर, उनका यज्ञ सम्पूर्ण करवाने पर भगवान शिव ने सम्मुख प्रकट होकर इन्हें तीन बाण प्रदान किये, जिनसे समस्त लोगों में विजय प्राप्त की जा सकती है। जब महाभारत के युद्ध की घोषणा हुई तो वीर बर्बरीक ने भी अपनी माता के सम्मुख युद्ध में भाग लेने की इच्छा प्रकट की। माता ने इन्हें युद्ध में भाग लेने की आज्ञा इस वचन के साथ दी कि तु...

‘श्रीसुदर्शन-चक्र’

भगवान् विष्णु का प्रमुख आयुध है, जिसके माहात्म्य की कथाएँ पुराणों में स्थान-स्थान पर दिखाई देती है। ‘मत्स्य-पुराण’ के अनुसार एक दिन दिवाकर भगवान् ने विश्वकर्मा जी से निवेदन किया कि‘कृपया मेरे प्रखर तेज को कुछ कम कर दें,क्योंकि अत्यधिक उग्र तेज के कारण प्रायः सभी प्राणी सन्तप्त हो जाते हैं।’ विश्वकर्मा जी ने सूर्य को ‘चक्र-भूमि’ पर चढ़ा कर उनका तेज कम कर दिया। उस समय सूर्य से निकले हुए तेज-पुञ्जों को ब्रह्माजी ने एकत्रित कर भगवान् विष्णु के‘सुदर्शन-चक्र’ के रुप में, भगवान् शिव के ‘त्रिशूल′-रुप में तथा इन्द्र के ‘वज्र’ के रुप में परिणत कर दिया। ‘पद्म-पुराण’ के अनुसार भिन्न-भिन्न देवताओं के तेज से युक्त ‘सुदर्शन-चक्र’ को भगवान् शिव ने श्रीकृष्ण को दिया था। ‘वामन-पुराण’ के अनुसार भी इस कथा की पुष्टि होती है। ‘शिव-पुराण’ के अनुसार ‘खाण्डव-वन’ को जलाने के लिए भगवान् शंकर ने श्रीकृष्ण को ‘सुदर्शन-चक्र’ प्रदान किया था। इसके सम्मुख इन्द्र की शक्ति भी व्यर्थ थी। ‘वामन-पुराण’ के अनुसार दामासुर नामक भयंकर असुर को मारने के लिए भगवान् शंकर ने विष्णु को ‘सुदर्शन-चक्र’ प्रदान किया था। बताया है ...

घमंड

महाभारत के युद्ध में अर्जुन और कर्ण के बीच घमासान चल रहा था । अर्जुन का तीर लगने पे कर्ण का रथ 25-30 हाथ पीछे खिसक जाता , और कर्ण के तीर से अर्जुन का रथ सिर्फ 2-3 हाथ । लेकिन श्री कृष्ण थे की कर्ण के वार की तारीफ़ किये जाते, अर्जुन की तारीफ़ में कुछ ना कहते । अर्जुन बड़ा व्यथित हुआ, पूछा , हे पार्थ आप मेरी शक्तिशाली प्रहारों की बजाय उसके कमजोर प्रहारों की तारीफ़ कर रहे हैं, ऐसा क्या कौशल है उसमे । श्री कृष्ण मुस्कुराये और बोले, तुम्हारे रथ की रक्षा के लिए ध्वज पे हनुमान जी, पहियों पे शेषनाग और सारथि रूप में खुद नारायण हैं । उसके बावजूद उसके प्रहार से अगर ये रथ एक हाथ भी खिसकता है तो उसके पराक्रम की तारीफ़ तो बनती है । कहते हैं युद्ध समाप्त होने के बाद श्री कृष्ण ने अर्जुन को पहले उतरने को कहा और बाद में स्वयं उतरे। जैसे ही श्री कृष्ण रथ से उतरे , रथ स्वतः ही भस्म हो गया । वो तो कर्ण के प्रहार से कबका भस्म हो चूका था, पर नारायण बिराजे थे इसलिए चलता रहा । ये देख अर्जुन का सारा घमंड चूर चूर हो गया । कभी जीवन में सफलता मिले तो घमंड मत करना, कर्म तुम्हारे हैं पर आशीष ऊपर वाले का है । और कि...