अशौच आदि अवस्था में यज्ञोपवित को दायें कान पर ही क्यों टांगना चाहिए
यज्ञोपवित बहुत ही पवित्र सूत्र है - जिसे हमेशा हर परिस्थिति में शुद्ध रखने का दायित्व धारक पर होता है - परन्तु अशौच आदि अवस्था में जब पूर्ण शरीर ही अशुद्ध होता है तब उसे कहाँ रखा जाये कि वह शुद्ध रह सके ---
इस के लिए शास्त्र में ये विधान है :---
" आदित्या वसवो रूद्रा वायुरग्निश्च धर्मराट् ।
विप्रस्य दक्षिणे कर्णे नित्यं तिष्ठन्ति देवताः ।। "
प्रस्तुत श्लोक द्वारा दाहिने कान में आदित्य - वसु - रूद्र आदि देवताओं का निवास बताया गया है - इसलिए दाहिने कान की पवित्रता तथा महत्ता के अभिप्राय से ही पूज्य महर्षियों ने यज्ञोपवित को को उस दशा में जब कि सम्पूर्ण शरीर ही अपावन होता है - पवित्रता के सब से महान केंद्र कान पर रखने का विधान किया है ।
और भी कहा है कि कभी आचमन करना है और जल उस समय उपलब्ध नहीं है तो दाहिने कान का स्पर्श करने से आचमन हो जाता है ।।
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