" असुरैर्मुनिभिर्गोत्रैस्तन्त्रविद्भिः प्रतिष्ठितम् ।
जीर्णं वाऽप्यथवा भग्नं विधिनापि न चालयेत्।। "
राक्षसों के द्वारा - मुनियों के द्वारा - मुनियों के गोत्रजों के द्वारा और तन्त्रवेताओं के द्वारा प्रतिष्ठित मूर्ति यदि जीर्ण हो जाये अथवा खण्डित हो जाये तो उस मूर्ति को किसी भी रूप से हटाना उचित नहीं । ( अग्निपुराण १७३|१९ )
🚩 शिवलिंग आदि मूर्तियों के जलने - टूटने और चलने पर ( स्थानभ्रष्ट होने पर ) जीर्णोद्धार करना चाहिए - किन्तु अनादिसिद्ध लिङ्ग आदि मूर्तियों के खण्डित होने पर उनका जीर्णोद्धार करना उचित नहीं है -- ऐसी मूर्तियों के लिए ' महाभिषेक ' करना चाहिए। ( निर्णयसिन्धु )
🛕 देवमूर्ति के अंग में यदि दूसरा अंग अर्थात् दूसरे नेत्र चढाने हों - तो पुनः प्रतिष्ठा करनी चाहिए -- किन्तु जलाधिवास में नेत्रोन्मीलन को त्याग देना चाहिए।
" अङ्गादङ्गादिसन्धाने प्रतिष्ठां पुनराचरेत् ।
जलाधिवासविहितनेत्रोन्मीलनवर्जिताम् ।। "
🚩 हर हर महादेव 🚩 ।
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