मंगलवार, 1 सितंबर 2026

प्रेतों का भोजन

 प्रेतों का भोजन ❓


महर्षि गौतम ने पूछा -- संसार में कोई भी प्राणी बिना भोजन के नहीं रहते -- अतः बताओ , तुम लोग क्या आहार करते हो ❓

      

प्रेतों ने कहा --

       " अप्रक्षालितपादस्तु यो भुङ्क्ते दक्षिणामुखः ।

          यो वेष्टितशिरा भुङ्क्ते प्रेता भुञ्जन्ति नित्यशः ।। "

अर्थात् :--                 

           द्विजश्रेष्ठ ! जहाँ भोजन के समय आपस में कलह होने लगता है - वहाँ उस अन्न के रस को हम ही खाते हैं ।

             जहाँ मनुष्य बिना लिपी - पुती ( पोछा आदि से साफ हुई ) धरती पर खाते हैं - 

              जहाँ ब्राह्मण शौचाचार से भ्रष्ट होते हैं वहाँ हम को भोजन मिलता है --

             जो पैर धोये बिना खाता है - और जो दक्षिण की ओर मुँह करके भोजन करता है-- अथवा जो सिर पर वस्त्र लपेट कर भोजन करता है - उसके उस अन्न को सदा हम प्रेत ही खाते हैं --

           

            जहाँ रजस्वला स्त्री - चाण्डाल - और सुअर श्राद्ध के अन्न पर दृष्टि डाल देते हैं - वह अन्न पितरों का नहीं हम प्रेतों का ही भोजन होता है --

          जिस घर में सदा जूठन पडा रहे - निरन्तर कलह होता रहे - और बलिविश्वैदैव न किया जाता हो - वहाँ हम प्रेत लोग भोजन करते हैं ।


महर्षि गौतम ने पूछा ❓

            कैसे घरों में तुम्हारा प्रवेश होता है - यह बात मुझे सत्य - सत्य बताओ ❓


प्रेत बोले :---

             " ब्राह्मण ! जिस घर में बलिवैश्वदेव होने से धुएं की बत्ती उडती दिखाई देती है - उसमें हम प्रवेश नहीं कर पाते ---

             जिस घर में सवेरे चौका लग जाता है - तथा वेद मंत्रों की ध्वनि होती रहती है- वहाँ की किसी वस्तु पर हमारा अधिकार नहीं होता ।


गौतम ने पूछा ❓

           " किस कर्म के परिणाम में मनुष्य प्रेत भाव को प्राप्त होता है ❓

प्रेत बोले :--

             " जो धरोहर हडप लेते हैं - जुठे मुँह यात्रा करते हैं - गाय और ब्राह्मण की हत्या करने वाले हैं वे प्रेत योनि को प्राप्त होते हैं ।

                चुगली करने वाले -झूठी गवाही देने वाले - न्याय के पक्ष में नहीं रहने वाले - वे मरने पर प्रेत होते हैं ।

              सूर्य की ओर मुँह करके थूक - खकार - और मल - मूत्र त्याग करते हैं - वे प्रेत शरीर प्राप्त करके दीर्घकाल तक उसी में स्थित रहते हैं --

         गौ - ब्राह्मण तथा रोगी को जब कुछ दिया जाता हो - उस समय जो न देने की सलाह देते हैं - वे भी प्रेत ही होते हैं - 

           यदि शूद्र का अन्न पेट में रहते हुए ब्राह्मण की मृत्यु हो जाये तो वह अत्यंत भयंकर प्रेत होता है --

            विप्रवर ! -- जो अमावस्या की तिथि में हल में बैलों को जोतता है वह मनुष्य प्रेत बनता है ।

            जो विश्वासघाती - ब्रह्महत्यारा - स्त्रीवध करने वाला - गोघाती - गुरूघाती - और पितृहत्या करने वाला है वह मनुष्य भी प्रेत होता है। 

               मरने पर जिसके १६ एकोदिष्ट श्राद्ध नहीं किये गये हैं - उसको भी प्रेतयोनि प्राप्त होती है ।। महाभारत ।।


                   🚩 हर हर महादेव 🚩 ।।  

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