🔥 यज्ञ में शाकल्य ( सामग्री ) का परिमाण कितना होना
चाहिए 🔥
" तिलार्धं तण्डुला देयास्तण्डुलार्धं यवास्तथा ।
यवार्धं शर्कराः प्रोक्ताः सर्वार्धं च घृतं स्मृतम्।। "
तिल का आधा चावल - और चावल का आधा जौ लेना चाहिए - जौ से आधा शक्कर कही गई है और सब से आधा घृत कहा गया है - ( एक हिस्सा गुगलादि और यथा शक्ति मेवा )।
" तिलाधिक्ये भवेल्लक्ष्मीर्यवाधिक्ये दरिद्रता ।
धृताधिक्ये भवेन्मुक्तिः सर्वसिद्धिस्तु शर्करा ।। "
तिल की अधिकता से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है और यव की अधिकता से दरिद्रता की प्राप्ति होती है -- घृत की अधिकता से मुक्ति शर्करा की अधिकता से सर्वसिद्धि होती है ।
" आयुःक्षयं यवाधिक्यं यवसाम्यं धनक्षयम् ।
सर्वकामसमृद्ध्यर्थं तिलाधिक्यं सदैव हि ।। "
तिल से जौ अधिक होने पर आयु का नाश होता है -- तिल के बराबर यव रहने पर धन का नाश होता है - अतः सर्वदा तिल की अधिकता ही उचित है - इससे सम्पूर्ण कार्यों की सिद्धि होती है ।
🔥यज्ञ में तिल की इतनी उपयोगिता क्यों हैं ?🔥
यज्ञ भगवान् विष्णु का स्वरूप है --- " यज्ञो वे विष्णुः " ( तैत्तिरीय ब्राह्मण १|२|५|४० )-- " विष्णुर्वै यज्ञः " ( ऐतरेय ब्राह्मण १|१५ )-- " यो वै विष्णुः स यज्ञः ( शतपथ ब्राह्मण ५|२|३|६ ) --- " त्वमेव यज्ञो यष्टा च यज्वनां परमेश्वर ।। "
हे परमेश्वर ! आप ही यज्ञ करने वालों के यष्टा और यज्ञ स्वरूप हैं ।
" तिलाः पुण्याः पवित्राश्च सर्वपापहराः स्मृताः।
शुक्लाश्चैव तथा कृष्णा विष्णुगात्रसमुद्भवाः।। "
तिल अत्यंत पवित्र है और पुण्यप्रद है तथा वह समस्त प्रकार के पापों को दूर करने वाला है -- वह तिल सफेद और काला दो प्रकार का भगवान् श्री विष्णु के शरीर से उत्पन्न हुआ है ।
🚩 हर हर महादेव 🚩 ।।
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