इन्हे किया अभिवादन निष्फल होता है :--
रजस्वला -- अशौचयुक्त सूतीका स्त्री -- पति की प्राण घातिनी तथा गर्भपात कराने वाली स्त्री अभिवादन करने के योग्य नहीं है ---
इसी प्रकार पाखण्डी -- पतित -- व्रात्य ( यज्ञोपवित के नियत काल का उल्लंघन करने वाला ) -- महापातकी -- ( शराब पीने वाला - गुरुपत्नी गामी - चोर - ब्राह्मण व गौहत्यारा और इनका संग करने वाला ) -- दुष्ट स्वभाव वाला -- जूता पहने हुए व्यक्ति को तथा कृतघ्न -- मंत्रोच्चारण करते हुए द्विज -- शत्रु --
तथा भोजन करते हुए या भोजन कराने वाले व्यक्ति को और अपवित्र -- दौडते हुए या दौड़ने वाले तथा नास्तिक व्यक्ति को -- वमन करते समय -- जम्हाई लेते समय -- दन्तधावन करते समय -- जो द्विज प्रमाद से अभिवादन करता है -- वह स्वयं अशुद्ध हो जाता है और अहोरात्र ( एक दिन व रात ) उपवास करने से शुद्ध होता है ।
ये महर्षि व्याघ्रपाद जो उपमन्यु के पिता थे और उपमन्यु भगवान श्रीकृष्ण के दीक्षागुरु थे उन व्याघ्रपाद ने अपनी स्मृति में कहे हैं -- ये भगवान के इतने श्रेष्ठभक्त थे - जब भगवान से इन्होनें व्याघ्र के पैर मांगे जिसे जंगलसे पूजा के लिए फूल - फल लाते इन्हें नंगे पैर कंकर व कांटों से वेदना ना हो ।।
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