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वाणासुर वध

ठाकुर श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध के एक विवाह की कथा श्री शुकदेव जी महाराज से सुनने के पश्चात् राजा परीक्षित ने पूछा - हे मुनीश्वर! मैंने सुना है कि अनिरुद्ध जी ने बाणासुर की पुत्री ऊषा से विवाह किया था और इस सब लीला-प्रसंग में भगवान श्रीकृष्ण और शंकर जी का बहुत बड़ा घमासान युद्ध हुआ था। आप कृपा करके यह वृत्तांत भी विस्तार से सुनाइए।

श्री शुकदेव जी महाराज कहते हैं - हे राजन! दैत्यराज बलि की कथा तो तुम सुन ही चुके हो, उन्हीं के सौ पुत्रों में ज्येष्ठ था यह औरसपुत्र - बाणासुर। सदा शिवभक्ति में रत रहने वाला, अपनी बात का धनी, उदारता और बुद्धिमत्ता से भरा हुआ, अटल-प्रतिज्ञ बाणासुर का समाज में बड़ा आदर था, जो कि परम सुंदर नगरी शोणितपुर में राज्य करता था।
एक बार भगवान शंकर को तांडव करते समय इसने अपनी हज़ार भुजाओं से विभिन्न प्रकार के वाद्य-यंत्र बजाकर भक्तवत्सल और शरणागतरक्षक आशुतोष भगवान को प्रसन्न कर लिया और भोलेनाथ बोले - “तुम्हारी जो इच्छा हो, मुझसे माँग लो” तो बाणासुर ने कहा, ‘हे प्रभु! आप मेरे नगर की रक्षा करते हुए यहीं रहा करें।’

राजन! एक बार का प्रसंग, बाणासुर अपने बल-पौरुष के मद में भरकर शिव जी के पास आया और कहने लगा -भगवन! ऐसा कौन-सा वर है जो आप नहीं दे सकते परंतु मुझे लगता है मुझे हज़ार भुजाओं का वर देकर आपने मेरा भार बढ़ा दिया है। मैं इन भुजाओं के बल से परास्त करूँ भी तो किसे? आपके अलावा कोई भी मेरे बल को जान-देखकर मुझसे युद्ध नहीं करता, एक बार तो मुझे बाज़ुओं में इतनी खुजलाहट हुई कि मैं दिग्गजों को ढूँढने निकला परंतु जब कोई न मिला तो मैंने बाँहों की चोट से कई पहाड़ों को फोड़ डाला।
यह सुनकर *भगवान शंकर ने तनिक लीला-क्रोध की दृष्टि में भरकर कहा - ‘रे मूढ़! जिस समय तेरी ध्वजा टूटकर गिर जाएगी, उस समय मेरे ही समान योद्धा से तेरा युद्ध होगा और वह युद्ध तेरा घमंड चूर-चूर कर देगा।’* वह मूढ़-माति भगवान शिव की बात सुनकर सहर्ष अपने नगर को लौट आया और प्रभु के आदेशानुसर उस युद्ध की प्रतीक्षा करने लगा।
*युद्ध की क्या कही जाए, अपनी मृत्यु की बाट देखने लगा।*

*बंधुओं! संकल्प के ठीक न होने से कितना विनाशकारक स्तिथि उत्पन्न होने की आशंका हो जाती है, आप देख लीजिए।* बाणासुर ने बल के संकल्प से हज़ार भुजाएँ माँग ली और अब प्रकृति के प्रति विरोध उत्पन्न करने लगा। कभी पर्वत फोड़ देता, वृक्षों से द्वन्द करता आदि। दैत्यकुल में उत्पन्न होने से इसकी बुद्धि में तामसिकता थी लेकिन दैत्यों की इच्छाशक्ति बहुत प्रबल होती है तो प्रबल इच्छाशक्ति से तप किया परंतु तामसिकता के कारण भक्ति न माँगकर ज़रूरत से अधिक और विनाशकरी बल माँग लिया। *ज़रूरत से अधिक किसी भी वस्तु का हो जाना विनाशकारी ही सिद्ध होता है, शास्त्रों में कथा हैं आप पढ़कर देख सकते हैं।*
इसलिए मैं आपसे निवेदन करूँ - मन में यदि संकल्प करना भी है तो कोई सत-संकल्प कीजिए जिससे सबका कल्याण हो, *प्रभु की भक्ति का संकल्प कीजिए, उनके अखंड नाम-जप का संकल्प कीजिए, देश से ग़रीबी और दरिद्रता चली जाए - ऐसा संकल्प कीजिए, प्रभु का चिंतन बना रहे - ऐसा संकल्प कीजिए।*
*बल के आधिक्य से हुआ क्या? अंतत: बाणासुर अपनी ही मौत की परीक्षा कर रहा है, और एक हैं राजा परीक्षित जिन्हें पट लग चुका है कि मेरी मृत्यु निश्चित हो चुकी है तो प्रभु के भोजन का मार्ग चुना, वहीं बाणासुर मृत्यु का इंतज़ार कर रहा है। यही अंतर है राजसी और तामसी प्रवृत्ति में, इसलिए हमें संकल्प लेना है कि हम केवल प्रभु समर्पित सतकर्म ही करेंगे।

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