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युद्ध के दौरान अपने पुत्र के हाथों मारे गए थे अर्जुन, जानें रहस्य

अर्जुन महाराज पाण्डु एवं रानी कुंती के तीसरे पुत्र थे। ये महाभारत के मुख्य पात्र में से एक व द्रोणाचार्य के शिष्य थे। इनकी माता कुंती का एक नाम पृथा था, जिस कारण अर्जुन 'पार्थ' भी कहलाए। बहुत से लोगों को पता होगा कि अर्जुन की मृत्यु स्वर्ग की यात्रा के दौरान हुई थी। परंतु इसके पहले भी एक बार अर्जुन की मृत्यु हुई और वे पुनः जीवित हुए, इसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। तो आईए आज हम आपको महायोद्धा अर्जुन से जुड़ी इस पूरी कहानी के बारे में बताएं-

अश्वमेध यज्ञ
महाभारत युद्घ के समाप्त होने के उपरांत एक दिन महर्षि वेदव्यास जी और श्री कृष्ण के कहने पर पांडवों ने अश्वमेध यज्ञ करने का विचार बनाया। शुभ मुहूर्त देखकर यज्ञ का शुभारंभ किया गया और अर्जुन को रक्षक बना कर घोड़ा छोड़ दिया। वह घोड़ा जहां भी जाता, अर्जुन उसके पीछे जाते। अनेक राजाओं ने पांडवों की अधीनता स्वीकार कर ली वहीं कुछ ने मैत्रीपूर्ण संबंधों के आधार पर पांडवों को कर देने की बात मान ली।

मणिपुर का राजा था अर्जुन का पुत्र
किरात, मलेच्छ व यवन आदि देशों के राजाओं द्वारा यज्ञ को घोड़े में रोकना चाहा तो अर्जुन ने उनके साथ युद्ध कर उन्हें पराजित किया। इस तरह विभिन्न देशों के राजाओं के साथ अर्जुन को कई बार युद्ध करना पड़ा। यज्ञ का घोड़ा घूमते-घूमते मणिपुर पहुंच गया। यहां की राजकुमारी चित्रांगदा अर्जुन की पत्नी थी और उनके पुत्र का नाम बभ्रुवाहन था। बभ्रुवाहन ही उस समय मणिपुर का राजा था।

उलूपी द्वारा युद्ध के लिए बभ्रुवाहन को गया उकसाया
जब बभ्रुवाहन को अपने पिता अर्जुन के आने का समाचार मिला तो उनका स्वागत करने के लिए वह नगर के द्वार पर आया। अपने पुत्र बभ्रुवाहन को देखकर अर्जुन ने कहा कि मैं इस समय यज्ञ के घोड़े की रक्षा करता हुआ तुम्हारे राज्य में आया हूं। इसलिए तुम मुझसे युद्ध करो। जिस समय अर्जुन बभ्रुवाहन से यह बात कह रहा था, उसी समय नागकन्या उलूपी भी वहां आ गई। उलूपी भी अर्जुन की पत्नी थी। उलूपी ने भी बभ्रुवाहन को अर्जुन के साथ युद्ध करने के लिए उकसाया।

अपने ही पुत्र के हाथों मारे गए अर्जुन
अपने पिता अर्जुन व सौतेली माता उलूपी के कहने पर बभ्रुवाहन युद्ध के लिए तैयार हो गया। अर्जुन और बभ्रुवाहन में भयंकर युद्ध होने लगा। अपने पुत्र का पराक्रम देखकर अर्जुन बहुत प्रसन्न हुए। बभ्रुवाहन उस समय युवक ही था। अपने बाल स्वभाव के कारण बिना परिणाम पर विचार कर उसने एक तीखा बाण अर्जुन पर छोड़ दिया। उस बाण को चोट से अर्जुन बेहोश होकर धरती पर गिर पड़े।

बभ्रुवाहन भी उस समय तक बहुत घायल हो चुका था, वह भी बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा। तभी वहां बभ्रुवाहन की माता चित्रांगदा भी आ गई। अपने पति व पुत्र को घायल अवस्था में धरती पर पड़ा देख उसे बहुत दुख हुआ। चित्रांगदा ने देखा कि उस समय अर्जुन के शरीर में जीवित होने के कोई लक्षण नहीं दिख रहे थे। अपने पति को मृत अवस्था में देखकर वह फूट-फूट कर रोने लगी। उसी समय बभ्रुवाहन को भी होश आ गया।

पुनर्जीवित हुए अर्जुन
जब बभ्रुवाहन ने देखा कि उसने अपने पिता की हत्या कर दी है तो वह भी शोक करने लगा। अर्जुन की मृत्यु से दुखी होकर चित्रांगदा और बभ्रुवाहन दोनों ही आमरण उपवास पर बैठ गए। जब नागकन्या उलूपी ने देखा कि चित्रांगदा और बभ्रुवाहन आमरण उपवास पर बैठ गए हैं तो उसने संजीवन मणि का स्मरण किया। उस मणि के हाथ में आते ही उलूपी ने बभ्रुवाहन से कहा कि यह मणि अपने पिता अर्जुन की छाती पर रख दो। बभ्रुवाहन ने ऐसा ही किया। वह मणि छाती पर रखते ही अर्जुन जीवित हो उठे।

उलूपी ने बताई पूरी घटना
अर्जुन द्वारा पूछने पर उलूपी ने बताया कि यह मेरी ही मोहिनी माया थी। उलूपी ने बताया कि छल पूर्वक भीष्म का वध करने के कारण वसु (एक प्रकार के देवता) आपको श्राप देना चाहते थे। जब यह बात मुझे पता चली तो मैंने यह बात अपने पिता को बताई। उन्होंने वसुओं के पास जाकर ऐसा न करने की प्रार्थना की। तब वसुओं ने प्रसन्न होकर कहा कि मणिपुर का राजा बभ्रुवाहन अर्जुन का पुत्र है यदि वह बाणों से अपने पिता का वध कर देगा तो अर्जुन को अपने पाप से छुटकारा मिल जाएगा। आपको वसुओं के श्राप से बचाने के लिए ही मैंने यह मोहिनी माया दिखलाई थी। इस प्रकार पूरी बात जान कर अर्जुन, बभ्रुवाहन और चित्रांगदा भी प्रसन्न हो गए। अर्जुन ने बभ्रुवाहन को अश्वमेध यज्ञ में आने का निमंत्रण दिया और पुन: अपनी यात्रा पर चल दिए।

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