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अभिलाष्टकम्

। अभिलाष्टकम् ।।
एकं ब्रह्मैवाद्वितीयं समस्तं सत्यं सत्यं नेह नानास्ति कित्र्चित् ।
एको रुद्रो न द्वितीयोऽवतस्थे तस्मादेकं त्वां प्रपद्ये महेशम् ।।
कर्ता हर्ता त्वं हि सर्वस्य शम्भो नानारूपेष्वेकरूपोऽप्यरूप: ।
यद्वत्प्रत्यग्धर्म एकोऽप्यनेक स्तस्मान्नायं त्वा विनेशं प्रपद्ये ।।
रज्जौ सर्प: शुक्तिकायां च रौप्यं नैर: पूरस्तन्मृगाख्ये मरीचौ ।
यद्यत्सद्वद्विष्वगेव प्रपत्र्चो यस्मिन् ज्ञाते तं प्रपद्ये महेशम् ।।
तोये शैत्यं दाहकत्वं च वह्यौ तापो भानौ शीतभानौ प्रसाद: ।
पुष्पे गन्धो दुग्धमध्येऽपि सर्पिर्यत्तच्छम्भो त्वं ततस्त्वां प्रपद्ये ।।
शब्दं गृह्णास्यश्रावस्त्वं हि जिघ्रस्याघ्राणस्त्वं व्यंघ्रिरायासि दूरात् ।
व्यक्ष: पश्येस्त्वं रसज्ञोऽप्यजिह्व: कस्त्वां सम्यग्वेत्त्यतस्त्वां प्रपद्ये ।।
नो वेद त्वामीश साक्षाद्धि वेदो नो वा विष्णुर्नो विधाताखिलस्य ।
नो योगीन्द्रा नेन्द्रमुख्याश्र्च देवा भक्तो वेद त्वामतस्त्वां प्रपद्ये ।।
नो ते गोत्रं नेश जन्मापि नाख्या नो वा रूपं नैव शीलं न देश: ।
इत्थम्भूतोऽपीश्वरस्त्वं त्रिलोक्या: सर्वान्कामान्पूरयेस्त्वं भजे त्वाम् ।।
त्वत्त: सर्वं त्वं हि सर्वं स्मरारे त्वं गौरीशस्त्वं नग्नोऽतिशान्त: ।
त्वं वै वृद्धस्त्वं युवा त्वं च बालस्तत्त्वं यत्किं नान्यतस्त्वां नतोऽहम् ।।
- यह सब कुछ एक अद्वितीय ब्रह्म ही है और वही सत्य है - वही सत्य है और सर्वत्र उस ब्रह्म के अतिरिक्त कुछ भी नही है । वह ब्रह्म ही एकमात्र ही है और तो दूसरा कोई भी नही है इसीलिये हे महादेव मै एकमात्र आप ही की शरण प्राप्त करता हूँ ।
हे महादेव शम्भो एक आप ही सभी का सृजन तथा हरण करने वाले है । हे महादेव आप तो रूपविहीन हो कर भी अनेकों रूपों वाले हैं , जैसे आत्मधर्म एक होता हुआ भी अनेकों रूपों वाला है इसीलिये हे महादेव आप को छोड़ कर किसी अन्य की शरण प्राप्त नही करना चाहता हूँ ।
जिस प्रकार रस्सी मे साँप , सीपी मे चाँदी , मृगमरीचिका मे जल ( मिथ्या ) भासित होता है उसी प्रकार हे महादेव यह सारा का सारा प्रपंच आप मे ही भासित हो रहा है जिसे जान लेने पर इस प्रपंच का मिथ्यात्व भली भाँति ज्ञात हो जाता है इसीलिये मै उन्ही महादेव की शरण को प्राप्त करता हूँ ।
हे महादेव शम्भो ! जिस प्रकार जल मे शीतलता , अग्नि मे दाहकता , सूर्य मे ताप , चन्द्रमा मे आल्हादकत्व , फूलों मे गन्ध , दूध मे घी समाया हुआ रहता है उसी प्रकार हे महादेव आप ही आप सर्वत्र व्याप्त है अत: मै आप ही की शरण प्राप्त करता हूँ ।
हे महादेव आप कानों के बिना सुनते हैं , नाक के बिना सूँघते हैं , पैरों के बिना दूर से आते हैं , आँखों के बिना देखते हैं , जीभ के बिना रस लेते हैं । आप को भला कौन भली भाँति जान सकता है इसी प्रकार हे महादेव मै आपकी शरण प्राप्त करता हूँ ।
हे ईश ! आप को न तो साक्षात् वेद , न विष्णु , न सर्वस्त्रष्टा ब्रह्मा , न योगीन्द्र और न ही इन्द्रादि देवता गण ही जान सकते है । हे महादेव आप को तो केवल भक्त ही जान पाता है अत: हे महादेव मै आप की शरण प्राप्त करता हूँ ।
हे महादेव ! न तो आप का कोई गोत्र है , न जन्म ही है और न ही आप का कोई देश या नाम या रूप या शील ही है । ऐसा सब होते हुये भी आप तीनो लोकों के स्वामी है और आप ही समस्त मनोरथों को पूर्ण करते हैं , अत: हे महादेव मै तो आप ही का भजन करता हूँ ।
हे कामदेव के शत्रु महादेव सभी कुछ आप ही से है और ‘ आप ही सब कुछ हैं ‘ आप पार्वती पति हैं , आप दिगम्बर हैं , अत्यन्त शान्त हैं , वृद्ध हैं , युवा है , बालक हैं , ऐसा कौन सा पदार्थ है जो आप नही है अत: हे महादेव मै आप को नमस्कार करता हूँ ।
।। महादेव ।।

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