शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

सत्कर्म का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता

सत्कर्मों का फल देर से मिलने की वजह से लोग अक्सर दुष्कर्मों को अपना लेते है । किन्तु ऐसा करने वाले हमेशा याद रखे “ अपने किये हुए कर्म का फल जीव अवश्य भोगता है ” ऐसा गीता में कहा गया है । “ सत्कर्म का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता ” यह इस छोटी सी कहानी में समझाया गया है ।महाभारत के समय की बात है । उस समय सभी लोग नदियों के किनारे या घाट पर स्नान करने जाया करते थे । एक दिन प्रातःकाल द्रौपदी भी यमुना स्नान को गई । उसी समय एक महात्मा भी उससे थोड़ी ही दुरी पर स्नान करने आये । महात्मा ने अपना एक वस्त्र यमुना किनारे रख दिया और नदी में उतरकर नहाने लगे ।
थोड़ी ही देर में जब दौपदी ने स्नान कर लिया तो वह नगर की ओर जाने को हुई, तभी उसने देखा कि महात्मा अभी भी यमुना में ही खड़े थे (महात्मा का अधोवस्त्र यमुना के तीव्र प्रवाह में बह चूका था ) । उसे आश्चर्य तो हुआ किन्तु फिर भी वह आगे बढ़ दी । थोड़ी दूर जाने के बाद उसने फिर मुड़कर महात्मा की ओर देखा तो पता चला कि महात्मा नदी में नहीं है । ध्यान से देखने पर ज्ञात हुआ कि महात्मा पास की एक झाड़ी में छुपकर बैठ गये । द्रौपदी के मन में सहज जिज्ञासा हुई कि महात्मा झाड़ी में क्यों छुपे होंगे । तभी उसे महात्मा का किनारे पर रखा वस्त्र दूर आकाश में उड़ता हुआ दिखाई दिया । द्रौपदी को महात्मा की समस्या समझते देर न लगी । वह झाड़ी के निकट गई और बोली, बाबा ! मैं आपकी समस्या समझ चुकी हूँ । यह कहते हुए द्रौपदी ने अपना आधा वस्त्र फाड़कर महात्मा को दे दिया और आधे से अपना तन ढक लिया ।
महात्मा ने वस्त्र लेते हुए द्रौपदी को आशीर्वाद दिया – “ बेटी ! तूने आज मेरी लाज बचाई, ईश्वर हमेशा तेरे शील की रक्षा करें ” यह कहकर महात्मा वहाँ से चल दिए और द्रौपदी भी अपने महल की और चल दी ।इस घटना के बहुत दिनों बाद जब पांडव द्रौपदी को द्युत क्रीड़ा में कोरवों के हाथों हार गये तो दुष्ट दुष्शासन ने भरी सभा में द्रौपदी का अपमान किया । विजय के उन्माद में उन्मुख दुष्शासन का इतना दुस्साहस हो गया कि वह द्रौपदी को घसीटते हुए भरी सभा में ले आया । सभी सभासदों की बुद्धियाँ धृतराष्ट्र की तरह ही अंध तमिस्त्रा से इतनी आच्छादित हो गई कि किसी ने भी राई – रत्ती भर भी विरोध नहीं किया । हद तो तब हो गई जब दुष्शासन ने द्रौपदी के वस्त्रों का हरण करना शुरू कर दिया । धर्मराज ने भी शर्म के मारे अपनी गर्दन झुका ली । पिता, पितामह और सभी गुरुजन लज्जा से जमीन में गढ़ चुके थे किन्तु विरोध का एक शब्द भी नहीं कह सके । तभी द्रौपदी ने अपने भगवान को याद किया ।
सभी देवतागण इस दृश्य को देखकर व्यथित थे । तभी नारद जी भगवान नारायण के पास पहुँच गये और बोले – “ प्रभु ! अपने भक्त की लाज बचाइए ! ”
प्रभु बोले – “ नारद ! मुझे किसी की लाज बचाने की कोई आवश्यता नहीं है सभी अपने ही कर्म का फल भोगते है । यदि द्रौपदी ने कोई सत्कर्म किया है तो उसके शील की रक्षा अवश्य होगी ”
थोड़ी देर सोचने के बाद नारायण बोले – “ नारद ! एक बार द्रौपदी ने एक महात्मा की लाज बचाई थी अतः प्रत्युपकार स्वरूप उसके शील की रक्षा होना अवश्यम्भावी है ।” यह कहकर भगवान नारायण ने अपनी लीला दिखाई । दुष्ट दुष्शासन वस्त्र हरण करते – करते पसीना – पसीना हो गया किन्तु वस्त्र समाप्त नहीं हुआ । इस तरह प्रभु ने द्रौपदी के शील की रक्षा की ।
यह महाभारत का एक छोटा सा दृष्टान्त है जिसके माध्यम से हमें यह शिक्षा मिलती है कि “ सत्कर्म का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता ”। इसलिए हमेशा सत्कर्म ही करे तथा सुकर्मों को ही प्रोत्साहन दे ।

*मेरे प्रभु महादेव जी की महिमा श्री रामेश्वर महादेव की कथा ।*

*एकानेत्रिशतं विद्धि देवं रमेश्वरम प्रिये।*
*यस्य दर्शन मात्रेण मुच्यते ब्रम्हहत्यया। ।*

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श्री रामेश्वर महादेव की कथा महाकाल वन का महात्मय दर्शाती है। परशुरामजी ने कई तीर्थों के दर्शन एवं तप किये लेकिन उनका ब्रम्ह हत्या दोष निवारण महाकाल वन में स्थित श्री रामेश्वर महादेव के पूजन से ही हुआ।
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पौराणिक आधार एवं महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार त्रेता युग में शास्त्रों को धारण करने वाले सर्वगुण संपन्न परशुराम हुए। वे विष्णु के अवतार थे जिनका जन्म भृगु ऋषि के शाप के कारण हुआ था। उनकी माता रेणुका थी और पिता जमदग्नि थे।
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 परशुराम के चार बड़े भाई थे लेकिन सभी में परशुराम सबसे अधिक योग्य एवं तेजस्वी थे। एक बार जमदग्नि ने रेणुका को हवन हेतु गंगा तट पर जल लाने के लिए भेजा। गंगा तट पर गंधर्वराज चित्ररथ अप्सराओं के साथ विहार कर रहे थे जिन्हें देख रेणुका आसक्त हो गई और कुछ देर तक वहीँ रुक गई। इस कारण हुए विलंब के फलस्वरूप हवन काल व्यतीत हो गया। इससे जमदग्नि बेहद क्रोधित हुए और उन्होंने रेणुका के इस कृत्य को आर्य विरोधी आचरण माना। क्रुद्ध हो उन्होंने अपने सभी पुत्रों को रेणुका का वध करने का आदेश दे डाला। लेकिन मातृत्व मोहवश कोई पुत्र ऐसा ना कर सका। पुत्रों को आज्ञा पालन न करते देख जमदग्नि ने उन्हें विचार शक्ति नष्ट होने का श्राप दे दिया।
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तभी पिता के तपोबल से प्रभावित परशुराम ने उनकी आज्ञानुसार माता रेणुका का शिरोच्छेद कर दिया। परशुराम की कर्तव्यपरायणता देख जमदग्नि बेहद प्रसन्न हुए और परशुराम से वरदान मांगने को कहा। वरदान स्वरुप पशुराम ने अपनी माता रेणुका को पुनर्जीवित करने एवं भाइयों को पुनः विचारशील करने की प्रार्थना की। वरदान में भी स्वयं के लिए कुछ ना मांग माता एवं भाइयों के लिए की गई प्रार्थना से जमदग्नि और अत्यधिक प्रसन्न हुए एवं उन्होंने परशुराम द्वारा मांगे गए वरदानों को प्रदान करने के साथ कहा- कि इस संसार में तुम्हें कोई परास्त नहीं कर पाएगा, तुम अजेय रहोगे। तुम अग्नि से उत्पन्न होने वाले इस दृढ परशु को ग्रहण करो। इसी तीक्ष्ण धार वाले परशु से तुम विख्यात होंगे। वरदान के फलस्वरूप माता रेणुका पुनर्जीवित हो गई पर परशुराम पर ब्रम्ह ह्त्या का दोष चढ़ गया।
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कुछ समय के बाद हैहयवंश में कार्तवीर्य अर्जुन राजा हुआ। वह सहस्त्रबाहु था। उसने कामधेनु के लिए जमदग्नि ऋषि को मार डाला। पिता के वध से क्रुद्ध हो परशुराम ने परशु से अर्जुन की हजार भुजाएं काट डाली। फिर परशु ने उसकी सेना का भी नाश कर डाला। इसी अपराध को लेकर उन्होंने क्षत्रियों का २१ बार पृथ्वी से नामों निशान मिटा दिया। फिर ब्रम्ह हत्या पाप के निवारण हेतु परशुराम ने अश्वमेध यज्ञ किया और कश्यप मुनि को पृथ्वी का दान कर दिया। इसके साथ ही अश्व, रथ, सुवर्ण आदि नाना प्रकार के दान किये।
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 लेकिन फिर भी ब्रम्ह हत्या का पाप दूर नहीं हुआ। फिर वे रैवत पर्वत पर तपस्या करने चले गए जहाँ उन्होंने घोर तपस्या की। फिर भी दोष दूर नहीं हुआ तो वे हिमालय पर्वत तथा बद्रिकाश्रम गए। उसके बाद नर्मदा, चन्द्रभागा, गया, कुरुक्षेत्र, नैमीवर, पुष्कर, प्रयाग, केदारेश्वर आदि तीर्थों के दर्शन कर स्नान किया। फिर भी उनकी ब्रम्ह हत्या के दोष का निवारण नही हुआ।
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तब वे अत्यंत दुखी हुए एवं उनका दृष्टिकोण नकारात्मक होने लगा। वे सोचने लगे कि शास्त्रों में जो तीर्थ, दान इत्यादि का महात्मय बताया गया है वह सब मिथ्या है। तभी वहां नारद मुनि पहुंचे। परशुराम नारद मुनि से बोले कि मैंने पिता की आज्ञा पर माता का वध किया, क्षत्रियों का विनाश किया जिसके फलस्वरूप मुझे ब्रम्ह हत्या का दोष लगा। इस दोष के निवारण के लिए मैंने अश्वमेध यज्ञ किया, पर्वतों पर तप किया, कई तीर्थों में स्नान किया लेकिन फिर भी मेरी ब्रम्ह हत्या दूर नहीं हो रही है। तब नारदजी बोले कि आप कृपया महाकाल वन में जाइये। वहां जटेश्वर के पास स्थित दिव्य लिंग का पूजन अर्चन करें।
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 उससे आपकी ब्रम्हहत्या दूर हो जाएगी। नारदमुनि के कथनानुसार परशुराम महाकाल वन आये और नारदमुनि द्वारा बताये गए दिव्य लिंग का पूजन अर्चन किया। उनके श्रद्धापूर्वक किये गए पूजन अर्चन से भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्हें ब्रम्ह हत्या के पाप से मुक्त कर दिया।
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*दर्शन लाभ:*
मान्यतानुसार श्री रामेश्वर महादेव के दर्शन करने से दोषों का नाश होता है। ऐसा माना जाता है कि यहाँ दर्शन करने पर विजयश्री प्राप्त होती है।
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*कहाँ स्थित है?*
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उज्जयिनी स्थित चौरासी महादेव में से एक श्री रामेश्वर महादेव का मंदिर सती दरवाजे के पास रामेश्वर गली में स्थित है।
*जय जय सियाराम जी।*

नाड़ी शोधन प्राणायाम का सही तरीका और लाभ

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नाड़ी शोधन प्राणायम से सूर्य स्वर और चंद्र स्वर में संतुलन बनता है।

आपने नाड़ी शोधन प्राणायाम के बारे में जरूर सुना होगा। आज हम आपको इस प्राणायाम को करने का सही तरीका और इससे होने वाले फायदों के बारे में बतायेंगे।

 योग विज्ञान के मुताबिक, हमारे शरीर में 72 हजार से ज्‍यादा नाड़ियां हैं। हर एक का अलग अलग काम है। आधुनिक विज्ञान इन्‍हें नहीं खोज पाया मगर पुराने ग्रंथ इसकी गवाही देते हैं।

बहरहाल हम अभी दो नाडि़यों की बात करते हैं सूर्य नाड़ी और च्रंद नाड़ी। हमारी नाक के बायें छेद से जुड़ी है चंद्र नाड़ी और दायें से सूर्य नाड़ी। हम नाक के दोनों छेदों – नसिकाओं से सांस नहीं लेते। जब हम बाईं नसिका से सांस ले रहे होते हैं तो योग की भाषा में हम कहते हैं कि हमारा चंद्र स्‍वर चल रहा है। जब हम दाईं नसिका से सांस ले रहे होते हैं तो हम कहते हैं कि हमारा सूर्य स्‍वर चल रहा है।

चंद्र स्‍वर से हमारे शरीर में ठंडक पहुंचती है और मन शांत होता है वहीं सूर्य स्‍वर गर्मी देने वाला होता है और इससे हमारा तेज बढ़ता है। नाड़ी शोधन का मकसद इन दोनों में संतुलन करना होता है। इससे हमारे सिंपेथेटिक और पैरा सिंपेथेटिक नर्वस सिस्‍टम पर असर पड़ता है।

नाड़ी शोधन करने का सही तरीका
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अपनी कमर को सीधा रखते हुए पदमासन, अर्ध पदमासन या सुखासन में खड़ी कमर से जिसमें भी आप सुविधा के हिसाब से बैठ पायें उसमें बैठ जायें।फिर दाहिने हाथ के अंगूठे से दाईं नसिका को बंद करें, मध्‍यमा यानी मिडिल फिंगर से बाईं नसिका को बंद करें। चाहें तो तर्जनी उंगली यानी फोर फिंगर को अपनी आई ब्रो, भौं के बीच में रख लें। वैसे फोर फिंगर को बीच में रखना जरूरी नहीं।आपका दायां हाथ जितना हो सके उतना बॉडी से सटा रहे। उसे उठायें नहीं क्‍योंकि अगर आपने उसे उठा लिया तो थोड़ी ही देर में आपका हाथ दुखने लगेगा।योग में सांस लेने को पूरक, सांस छोड़ने को रेचक और सांस रोकने को कुंभक कहते हैं। जब सांस लेकर रोकी जाये तो उसे आतंरिक कुंभक और जब सांस छोड़कर रोकी जाये तो उसे बाहरी कुंभक कहते हैं।आंखें कोमलता से बंद कर लें। गर्मी के मौसम में चंद्र स्‍वर या यानी बाईं नसिका से सांस भरते हुए इसे शुरू करें और सर्दी के मौसम में सूर्य स्‍वर यानी दाईं नसिका से सांस लेते हुए शुरू करें।मान लें अभी गर्मी चल रही है तो अपने अंगूठे से दाईं नसिका को दबा लें और बाईं नसिका से सांस भरें दाईं नसिका से छोड़ें फिर दाईं नसिका से सांस लें और बाईं से छोड़ें। यही क्रम चलता रहेगा। सांस लंबा और गहरा लें, जबरदस्‍ती न करें। कोशिश करें कि आपकी सांस लेने की आवाज न आये।अगर कर सकते हैं तो पूरक और रेचक का अनुपात 1: 2 रखें यानी अगर सांस लेने में 5 सेकेंड का वक्‍त लगता है तो सांस छोड़ने में 10 सेकेंड का वक्‍त लगे।अब अगर कर सकते हैं तो धीरे धीरे कुंभक करें यानी सांस भरने के बाद जितना आसानी से रुका जा सके रुकें और सांस छोड़ने के बाद जितना आसानी से रुक सकते हैं रुकें। ध्‍यान रखें जबरदस्‍ती नहीं करनी है। वरना प्राणायाम का अर्थ ही खत्‍म हो जायेगा। सबकुछ सहज भाव से चलने दें।इसके आगे जा सकते हैं तो फिर कुंभक में भी पूरक से दोगुना समय लगायें यानी सांस लेने में अगर 5 सेंकेंड लगे तो कुंभक (आंतरिक) में 10 सेकेंड, फिर रेचक (सांस छोड़ना) में 10 सेकेंड फिर कुंभक (बाहरी) में 10 सेकेंड। आपको एक एक करके आगे बढ़ना है।पहले केवल सांस लें और छोड़ें। फिर सांस लेने और छोड़ने में 1 और 2 का रेशो रखें। फिर 1, 2 और 2 के रेशो में सांस लें, सांस रोकें और सांस छोड़ें। इसके बाद 1, 2, 2 और 2 के रेशो में सांस लें, सांस रोकें, सांस छोड़ें, फिर सांस रोकें।
बाईं नसिका से सांस लेना, दाईं से छोड़ना और फिर दाईं नसिका से सांस लेना और बाईं से छोड़ने को एक आवृति माना जाता है। आप नौ बार यानी नौ आवृति करें।इस प्राणायाम को आप दिन में तीन बार सुबह, दोपहर और शाम को कर सकते हैं। वैसे सुबह का वक्‍त सबसे अच्‍छा होता है।

नाड़ी शोधन के लाभ
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इससे दोनों नाड़ियों में बैलेंस बनता है। बॉडी का तापमान सही बना रहता है।नर्वस सिस्‍टम ताकतवर बनता है।मन का झुकाव अच्‍छे व्‍यवहार और सादगी की ओर बढ़ता है।इसमें कुंभक करने से ऑक्‍सीजन फेफड़ों के आखिरी हिस्‍सों तक पहुंचती है। इससे खून में मौजूद गंदगी बाहर निकलती है।फेफड़ों की ताकत बढ़ती है और उनके काम करने की ताकत बढ़ती है।
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श्रीमद् भगवदगीता माहात्म्य

धरोवाच
भगवन्परमेशान भक्तिरव्यभिचारिणी ।
प्रारब्धं भुज्यमानस्य कथं भवति हे प्रभो ।।1।।
श्री पृथ्वी देवी ने पूछाः
हे भगवन ! हे परमेश्वर ! हे प्रभो ! प्रारब्धकर्म को भोगते हुए मनुष्य को एकनिष्ठ भक्ति कैसे प्राप्त हो सकती है?(1)

श्रीविष्णुरुवाच
प्रारब्धं भुज्यमानो हि गीताभ्यासरतः सदा ।
स मुक्तः स सुखी लोके कर्मणा नोपलिप्यते ।।2।।
श्री विष्णु भगवान बोलेः
प्रारब्ध को भोगता हुआ जो मनुष्य सदा श्रीगीता के अभ्यास में आसक्त हो वही इस लोक में मुक्त और सुखी होता है तथा कर्म में लेपायमान नहीं होता |(2)

महापापादिपापानि गीताध्यानं करोति चेत् ।
क्वचित्स्पर्शं न कुर्वन्ति नलिनीदलमम्बुवत् ।।3।।
जिस प्रकार कमल के पत्ते को जल स्पर्श नहीं करता उसी प्रकार जो मनुष्य श्रीगीता का ध्यान करता है उसे महापापादि पाप कभी स्पर्श नहीं करते |(3)

गीतायाः पुस्तकं यत्र पाठः प्रवर्तते।
तत्र सर्वाणि तीर्थानि प्रयागादीनि तत्र वै।।4।।
जहाँ श्रीगीता की पुस्तक होती है और जहाँ श्रीगीता का पाठ होता है वहाँ प्रयागादि सर्व तीर्थ निवास करते हैं |(4)

सर्वे देवाश्च ऋषयो योगिनः पन्नगाश्च ये।
गोपालबालकृष्णोsपि नारदध्रुवपार्षदैः ।।
सहायो जायते शीघ्रं यत्र गीता प्रवर्तते ।।5।।
जहाँ श्रीगीता प्रवर्तमान है वहाँ सभी देवों, ऋषियों, योगियों, नागों और गोपालबाल श्रीकृष्ण भी नारद, ध्रुव आदि सभी पार्षदों सहित जल्दी ही सहायक होते हैं |(5)

यत्रगीताविचारश्च पठनं पाठनं श्रुतम् ।
तत्राहं निश्चितं पृथ्वि निवसामि सदैव हि ।।6।।
जहाँ श्री गीता का विचार, पठन, पाठन तथा श्रवण होता है वहाँ  हे पृथ्वी ! मैं अवश्य निवास करता हूँ | (6)
गीताश्रयेऽहं तिष्ठामि गीता मे चोत्तमं गृहम्।
गीताज्ञानमुपाश्रित्य त्रींल्लोकान्पालयाम्यहंम्।।7।।
मैं श्रीगीता के आश्रय में रहता हूँ, श्रीगीता मेरा उत्तम घर है और श्रीगीता के ज्ञान का आश्रय करके मैं तीनों लोकों का पालन करता हूँ |(7)
गीता मे परमा विद्या ब्रह्मरूपा न संशयः।
अर्धमात्राक्षरा नित्या स्वनिर्वाच्यपदात्मिका।।8।।
श्रीगीता अति अवर्णनीय पदोंवाली, अविनाशी, अर्धमात्रा तथा अक्षरस्वरूप, नित्य, ब्रह्मरूपिणी और परम श्रेष्ठ मेरी विद्या है इसमें सन्देह नहीं है |(8)
चिदानन्देन कृष्णेन प्रोक्ता स्वमुखतोऽर्जुनम्।
वेदत्रयी परानन्दा तत्त्वार्थज्ञानसंयुता।।9।।
वह श्रीगीता चिदानन्द श्रीकृष्ण ने अपने मुख से अर्जुन को कही हुई तथा तीनों वेदस्वरूप, परमानन्दस्वरूप तथा तत्त्वरूप पदार्थ के ज्ञान से युक्त है |(9)
योऽष्टादशजपो नित्यं नरो निश्चलमानसः।
ज्ञानसिद्धिं स लभते ततो याति परं पदम्।।10।।
जो मनुष्य स्थिर मन वाला होकर नित्य श्री गीता के 18 अध्यायों का जप-पाठ करता है वह ज्ञानस्थ सिद्धि को प्राप्त होता है और फिर परम पद को पाता है |(10)
पाठेऽसमर्थः संपूर्णे ततोऽर्धं पाठमाचरेत्।
तदा गोदानजं पुण्यं लभते नात्र संशयः।।11।।
संपूर्ण पाठ करने में असमर्थ हो तो आधा पाठ करे, तो भी गाय के दान से होने वाले पुण्य को प्राप्त करता है, इसमें सन्देह नहीं |(11)
त्रिभागं पठमानस्तु गंगास्नानफलं लभेत्।
षडंशं जपमानस्तु सोमयागफलं लभेत्।।12।।
तीसरे भाग का पाठ करे तो गंगास्नान का फल प्राप्त करता है और छठवें भाग का पाठ करे तो सोमयाग का फल पाता है |(12)

एकाध्यायं तु यो नित्यं पठते भक्तिसंयुतः।
रूद्रलोकमवाप्नोति गणो भूत्वा वसेच्चिरम।।13।।

जो मनुष्य भक्तियुक्त होकर नित्य एक अध्याय का भी पाठ करता है, वह रुद्रलोक को प्राप्त होता है और वहाँ शिवजी का गण बनकर चिरकाल तक निवास करता है |(13)

अध्याये श्लोकपादं वा नित्यं यः पठते नरः।
स याति नरतां यावन्मन्वन्तरं वसुन्धरे।।14।।

हे पृथ्वी ! जो मनुष्य नित्य एक अध्याय एक श्लोक अथवा श्लोक के एक चरण का पाठ करता है वह मन्वंतर तक मनुष्यता को प्राप्त करता है |(14)

गीताया श्लोकदशकं सप्त पंच चतुष्टयम्।
द्वौ त्रीनेकं तदर्धं वा श्लोकानां यः पठेन्नरः।।15।।
चन्द्रलोकमवाप्नोति वर्षाणामयुतं ध्रुवम्।
गीतापाठसमायुक्तो मृतो मानुषतां व्रजेत्।।16।।
जो मनुष्य गीता के दस, सात, पाँच, चार, तीन, दो, एक या आधे श्लोक का पाठ करता है वह अवश्य दस हजार वर्ष तक चन्द्रलोक को प्राप्त होता है | गीता के पाठ में लगे हुए मनुष्य की अगर मृत्यु होती है तो वह (पशु आदि की अधम योनियों में न जाकर) पुनः मनुष्य जन्म पाता है |(15,16)

गीताभ्यासं पुनः कृत्वा लभते मुक्तिमुत्तमाम्।
गीतेत्युच्चारसंयुक्तो म्रियमाणो गतिं लभेत्।।17।।

(और वहाँ) गीता का पुनः अभ्यास करके उत्तम मुक्ति को पाता है | 'गीता' ऐसे उच्चार के साथ जो मरता है वह सदगति को पाता है |

गीतार्थश्रवणासक्तो महापापयुतोऽपि वा।
वैकुण्ठं समवाप्नोति विष्णुना सह मोदते।।18।।
गीता का अर्थ तत्पर सुनने में तत्पर बना हुआ मनुष्य महापापी हो तो भी वह वैकुण्ठ को प्राप्त होता है और विष्णु के साथ आनन्द करता है |(18)

गीतार्थं ध्यायते नित्यं कृत्वा कर्माणि भूरिशः।
जीवन्मुक्तः स विज्ञेयो देहांते परमं पदम्।।19।।
अनेक कर्म करके नित्य श्री गीता के अर्थ का जो विचार करता है उसे जीवन्मुक्त जानो | मृत्यु के बाद वह परम पद को पाता है |(19)

गीतामाश्रित्य बहवो भूभुजो जनकादयः।
निर्धूतकल्मषा लोके गीता याताः परं पदम्।।20।।

गीता का आश्रय करके जनक आदि कई राजा पाप रहित होकर लोक में यशस्वी बने हैं और परम पद को प्राप्त हुए हैं |(20)

गीतायाः पठनं कृत्वा माहात्म्यं नैव यः पठेत्।
वृथा पाठो भवेत्तस्य श्रम एव ह्युदाहृतः।।21।।

श्रीगीता का पाठ करके जो माहात्म्य का पाठ नहीं करता है उसका पाठ निष्फल होता है और ऐसे पाठ को श्रमरूप कहा है |(21)

एतन्माहात्म्यसंयुक्तं गीताभ्यासं करोति यः।
स तत्फलमवाप्नोति दुर्लभां गतिमाप्नुयात्।।22।।

इस माहात्म्यसहित श्रीगीता का जो अभ्यास करता है वह उसका फल पाता है और दुर्लभ गति को प्राप्त होता है |(22)

सूत उवाच
माहात्म्यमेतद् गीताया मया प्रोक्तं सनातनम्।
गीतान्ते पठेद्यस्तु यदुक्तं तत्फलं लभेत्।।23।।

सूत जी बोलेः
गीता का यह सनातन माहात्म्य मैंने कहा | गीता पाठ के अन्त में जो इसका पाठ करता है वह उपर्युक्त फल प्राप्त करता है |(23)

इति श्रीवाराहपुराणे श्रीमद् गीतामाहात्म्यं संपूर्णम्।
इति श्रीवाराहपुराण में श्रीमद् गीता माहात्म्य संपूर्ण।।
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कुबेर का अहंकार

यह एक पौराणिक कथा है। कुबेर तीनों लोकों में सबसे धनी थे। एक दिन उन्होंने सोचा कि हमारे पास इतनी संपत्ति है, लेकिन कम ही लोगों को इसकी जानकारी है। इसलिए उन्होंने अपनी संपत्ति का प्रदर्शन करने के लिए एक भव्य भोज का आयोजन करने की बात सोची। उस में तीनों लोकों के सभी देवताओं को आमंत्रित किया गया।

भगवान शिव उनके इष्ट देवता थे, इसलिए उनका आशीर्वाद लेने वह कैलाश पहुंचे और कहा, प्रभो! आज मैं तीनों लोकों में सबसे धनवान हूं, यह सब आप की कृपा का फल है। अपने निवास पर एक भोज का आयोजन करने जा रहा हूँ, कृपया आप परिवार सहित भोज में पधारने की कृपा करे।

भगवान शिव कुबेर के मन का अहंकार ताड़ गए, बोले, वत्स! मैं बूढ़ा हो चला हूँ, कहीं बाहर नहीं जाता। कुबेर गिड़गिड़ाने लगे, भगवन! आपके बगैर तो मेरा सारा आयोजन बेकार चला जाएगा। तब शिव जी ने कहा, एक उपाय है। मैं अपने छोटे बेटे गणपति को तुम्हारे भोज में जाने को कह दूंगा। कुबेर संतुष्ट होकर लौट आए। नियत समय पर कुबेर ने भव्य भोज का आयोजन किया।

तीनों लोकों के देवता पहुंच चुके थे। अंत में गणपति आए और आते ही कहा, मुझको बहुत तेज भूख लगी है। भोजन कहां है। कुबेर उन्हें ले गए भोजन से सजे कमरे में। सोने की थाली में भोजन परोसा गया। क्षण भर में ही परोसा गया सारा भोजन खत्म हो गया। दोबारा खाना परोसा गया, उसे भी खा गए। बार-बार खाना परोसा जाता और क्षण भर में गणेश जी उसे चट कर जाते।

थोड़ी ही देर में हजारों लोगों के लिए बना भोजन खत्म हो गया, लेकिन गणपति का पेट नहीं भरा। वे रसोईघर में पहुंचे और वहां रखा सारा कच्चा सामान भी खा गए, तब भी भूख नहीं मिटी। जब सब कुछ खत्म हो गया तो गणपति ने कुबेर से कहा, जब तुम्हारे पास मुझे खिलाने के लिए कुछ था ही नहीं तो तुमने मुझे न्योता क्यों दिया था? कुबेर का अहंकार चूर-चूर हो गया।  

स्त्री का गुण

एक बार सत्यभामा ने श्रीकृष्ण से पूछा मैं आप को कैसी लगती हूँ ? श्रीकृष्ण ने कहा तुम मुझे नमक जैसी लगती हो।
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सत्यभामा इस तुलना को सुन कर क्रुद्ध हो गयी, तुलना भी की तो किस से, आपको इस संपूर्ण विश्व में मेरी तुलना करने के लिए और कोई पदार्थ नहीं मिला।
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श्रीकृष्ण ने उस वक़्त तो किसी तरह सत्यभामा को मना लिया और उनका गुस्सा शांत कर दिया।
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कुछ दिन पश्चात श्रीकृष्ण ने अपने महल में एक भोज का आयोजन किया। छप्पन भोग की व्यवस्था हुई।
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सर्वप्रथम आठों पटरानियों को, जिनमें पाकशास्त्र में निपुण सत्यभामा भी थी, से भोजन प्रारम्भ करने का आग्रह किया श्रीकृष्ण ने।
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सत्यभामा ने पहला कौर मुँह में डाला मगर यह क्या.. सब्जी में नमक ही नहीं था।
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सत्यभामा ने उस कौर को मुँह से निकाल दिया। फिर दूसरा कौर मावा-मिश्री का मुँह में डाला और फिर उसे चबाते-चबाते बुरा सा मुँह बनाया और फिर पानी की सहायता से किसी तरह मुँह से उतारा।
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अब तीसरा कौर फिर कचौरी का मुँह में डाला और फिर.. आक्..थू !
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तब तक सत्यभामा का पारा सातवें आसमान पर पहुँच चुका था। जोर से चीखीं.. किसने बनाई है यह रसोइ ?
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सत्यभामा की आवाज सुन कर श्रीकृष्ण दौड़ते हुए सत्यभामा के पास आये और पूछा क्या हुआ देवी ?
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कुछ गड़बड़ हो गयी क्या ? इतनी क्रोधित क्यों हो ? तुम्हारा चेहरा इतना तमतमा क्यूँ रहा है ? क्या हो गया ?
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सत्यभामा ने कहा किसने कहा था आपको भोज का आयोजन करने को ? इस तरह बिना नमक की कोई रसोई बनती है ?
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किसी वस्तु में नमक नहीं है। मीठे में शक्कर नहीं है। एक कौर नहीं खाया गया। किसी तरह से पानी की सहायता से एक कौर मावा का गले से नीचे उतारा।
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श्रीकृष्ण ने बड़े भोलेपन से पूछा, जैसे कुछ हुआ ही नहीं था... तो क्या हुआ बिना नमक के ही खा लेती।
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सत्यभामा फिर चीख कर बोली लगता है दिमाग फिर गया है आपका ? बिना शक्कर के मिठाई तो फिर भी खायी जा सकती है मगर बिना नमक के कोई भी नमकीन वस्तु नहीं खायी जा सकती है।
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तब श्रीकृष्ण ने अपनी बालसुलभ मुस्कान के साथ कहा तब फिर उस दिन क्यों गुस्सा हो गयी थी जब मैंने तुम्हे यह कहा कि तुम मुझे नमक जितनी प्रिय हो।
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अब सत्यभामा को सारी बात समझ में आ गयी की यह सारा वाकया उसे सबक सिखाने के लिए था और उस की गर्दन झुक गयी जबकि अन्य रानियाँ मुस्कुराने लगी।
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कहने का तात्पर्य यह है कि स्त्री जल की तरह होती है, जिसके साथ मिलती है उसका ही गुण अपना लेती है।
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स्त्री नमक की तरह होती है, जो अपना अस्तित्व मिटा कर भी अपने प्रेम-प्यार तथा आदर-सत्कार से परिवार को ऐसा बना देती है।
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माला तो आप सबने देखी होगी। तरह-तरह के फूल पिरोये हुए... पर शायद ही कभी किसी ने अच्छी से अच्छी माला में "गुम" उस सूत को देखा होगा जिसने उन सुन्दर सुन्दर फूलों को एक साथ बाँध कर रखा है।
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लोग तारीफ़ तो उस माला की करते हैं जो दिखाई देती है मगर तब उन्हें उस सूत की याद नहीं आती जो अगर टूट जाये तो सारे फूल इधर-उधर बिखर जाते है।
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कहानी का तात्पर्य यह है कि स्त्री उस सूत की तरह होती है, जो बिना किसी चाह के, बिना किसी कामना के, बिना किसी पहचान के, अपना सर्वस्व खो कर भी किसी के जान-पहचान की मोहताज नहीं होती है...
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और शायद इसीलिए दुनिया राम के पहले सीता को और श्याम के पहले राधे को याद करती है।
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अपने को विलीन कर के पुरुषों को सम्पूर्ण करने की शक्ति भगवान् ने स्त्रियों को ही दी है।

गुरुवार, 1 फ़रवरी 2018

श्री खाटू श्यामजी

आज से कुछ वर्षों पूर्व तक श्री खाटू श्यामजी का नाम केवल राजस्थान में ही जाना जाता था। मगर इधर कुछ वर्षों से खाटू श्यामजी का प्रचार इतना अधिक बढ़ गया है कि केवल भारत में ही नहीं, अपितु समूचे विश्व में न केवल इन्हें जाना जाता है कि बल्कि अनेक परिवार खाटू श्यामजी के चमत्कारों को अपनी आंखों से प्रत्यक्ष देख चुके हैं। राजस्थान के सीकर जिले में रिंगस कस्बे से 18 किलोमीटर की दूरी पर श्री खाटू श्यामजी का मन्दिर स्थिति है। जहाँ प्रभु के दर्शन मात्र से ही जीवन में खुशियों एवं सुख-शांति के भंडार भर जाते हैं। श्री खाटू श्यामजी की पौराणिक प्रचलित पावन कथा संक्षिप्त में इस प्रकार है : महाभारत युद्ध के लिए कौरव-पांडव दलों के विशाल शिविर आमने-सामने थे। शिविरों में दूसरे दिन शुरू होने वाले युद्ध की हलचल मची थी। युद्ध नीति के अनुसार सूर्यास्त पश्चात् दोनों पक्षों के लोग आपस में मिल-जुल सकते थे, अतः धर्मयुद्ध के इन शिविरों में भी सैनिक आपस में मिल-जुल रहे थे। शिविरों के बीच की भूमि वीरों के आवागमन से भरी हुई थी। तभी सुसज्जित रथ पर एक तेजस्वी योद्धा आया। पीपल वृक्ष के नीचे उसने अपना रथ रोका। घोड़ों को खोलकर चरने के लिए छोड़ दिया। शिरस्त्राण (शस्त्र आदि) उतारकर जलपान किया और अपने रथ पर विश्राम करने के लिए बैठ गया। उसे दोनों दलों के वीरों ने घेर लिया। सभी का एक ही प्रश्न था- ‘आप किस ओर से युद्ध करेंगे ?’ ‘किसी भी दल की ओर से नहीं। अभी तो मैं एक दर्शक की भांति इस महायुद्ध को देखने आया हूं, बाद में मैं उस दल की ओर से युद्ध करूंगा जो पराजित होगा या जिसके साथ अन्याय हुआ होगा।’ सब विस्मय ये उसे ही देख रहे थे। उपस्थित लोगों में से एक ने पूछा- ‘लेकिन आपकी सेना कहां है ? क्या आपकी सेना पीछे आ रही है ?’ ‘नहीं, मुझे सेना की आवश्यकता नहीं है। मैं बिना सेना के ही आया हूं।’ बर्बरीक ने गर्व से कहा। ‘तब आप पराजित दल की सहायता कैसे करेंगे?’ आगन्तुक महाबली मुस्कराया- ‘मुझे सेना की आवश्यकता ही नहीं है। मुझे अपने इस धनुष और इन तीन बाणों पर असमी विश्वास है। मैं एक ही बाण से शत्रु- सेना का संहार कर सकता हूँ, छूटने पर मेरा पहला बाण हर व्यक्ति के मृत्यु स्थल पर निशान लगा देगा और दूसरा बाण उन्हें बींध देगा।’ ‘आपका नाम ?’ बहुत से लोगों ने विस्मय से पूछा। ‘मैं भीमसेन का पौत्र, घटोत्कच का पुत्र महाबल बर्बरीक हूं।’ आंधी की तरह कुछ ही क्षणों में यह बात दोनों शिविरों में फैल गई। हर किसी पर बर्बरीक का ही नाम गूंज रहा था। सैनिक लोग बात की गहराई तक नहीं पहुंच रहे थे, पर बात की गम्भीरता को समझने वाले योद्धा चिन्तित हो उठे। भगवान श्रीकृष्ण सोच-विचार करने लगे कि यदि वास्तव में ही वह वीर निर्बल पक्ष का साथ देगा तो पाण्डवों की विजय होते ही कौरव निर्बल हो जाएंगे। फिर वह वीर उनकी ओर से लड़कर पाण्डवों की विजय को पराजय में बदल देगा। क्या वह वास्तव में ही ऐसा विलक्षण धनुर्धर है, जो दो बाणों से ही शत्रु सेना का संहार कर सकता है ? चलकर परीक्षा ली जाए। वह उठे और बर्बरीक के पास पहुंचे। उन्हें आता देख सभी सैनिक गण इधर-उधर हट गए। बर्बरीक ने श्रीकृष्ण का अभिवादन किया। दोनों में परिचय हुआ। श्रीकृष्ण ने कूटनीति का आश्रय लेते हुए पूछा-‘तुम इन तीन बाणों के द्वारा सारी सेना का संहार कैसे कर सकते हो ?’ बर्बरीक ने गर्व से अपना सिर ऊपर उठाया, धनुष पर एक बाण चढ़ाकर कहा-‘देखिए, मैं इस प्रकार समस्त शत्रु-सेना का संहार कर सकता हूं। आप इसपीपल के पेड़ को देख रहे हैं। मेरा यह बाण इसके समस्त पत्तों को चिह्न लगा आएगा और दूसरा बाण उन्हें बींध देगा। आप चाहें तो मैं धरती पर बिखरे इन सूखे पत्तों को भी बींध सकता हूं।’ श्रीकृष्ण यह दृश्य देखने को उत्सुक थे। उन्होंने दो पत्ते तोड़ लिए। एक को हाथ की मुट्ठी में बन्द कर लिया और दूसरे पांव के नीचे दबा लिया। बर्बरीक ने अभिमन्त्रित करके बाण छोड़ा। सभी ने देखा कि पेड़ और धरती का प्रत्येक पत्ता चिन्हित था। श्रीकृष्ण ने मुट्ठी खोली तो हाथ का पत्ता भी चिन्हित था और पांव के नीचे का पत्ता भी। श्रीकृष्ण अत्यधिक विस्मित थे। तब तक बर्बरीक ने दूसरा बाण छोड़ा। प्रत्येक पत्ता बीच में से बिंधा हुआ था। श्रीकृष्ण अकुला उठे और गहरी सोच में पड़ गए कि किस प्रकार से युद्ध में भाग लेने से रोका जाए। आखिर बहुत सोच-विचार के बाद उन्हें एक हल सूझ ही गया। प्रातःकाल वह उठे और याचक का रूप बर्बरीक के पास पहुंचे। वह संध्यावन्दन कर रहे थे। संध्यावन्दन के उपरांत बर्बरीक ने याचक से कहा- ‘आज्ञा करो ब्राह्मण देवता, क्या इच्छा है ?’ ‘कुछ दान पाने की इच्छा है महाराज!’ ब्राह्मण रूपधारी श्रीकृष्ण ने कहा। ‘यहां तो मेरे पास विशेष धन नहीं है, परदेश में हूं। ये बहुमूल्य वस्त्राभूषण हैं, इनकी इच्छा हो तो कहो। मेरे पास में जो कुछ भी होगा, वह मैं तुम्हें दान में अवश्य दूंगा।’ ‘वस्तु तो वही मांगूगा जो आपके वश में है।’ ‘तब मुझे कोई इंकार नहीं, चाहे तुम मेरे प्राण मांग लो।’ ‘प्राण! इतना दम्भ अच्छा नहीं है, महाबली।’ ‘कह तो दिया।’ ‘अच्छा, ऐसा है तो मुझे अपना शीश काटकर दे दीजिए।’ बर्बरीक यह सुनकर सिहर उठे। इतना कठोर दान भी कहीं मांगा जा सकता है। उन्होंने क्रोध को दबाकर कहा- ‘मुझे विश्वास ही नहीं होता कि तुम ब्राह्मण याचक हो। तुमने दान प्रथा को कलंकित किया हे। तुम अवश्य ही कोई कूटनीज्ञि हो। जो वचन मैंने दिया है, उसे मैं अवश्य पूरा करूंगा। किन्तु अब तुम यह बता दो कि वास्तव में तुम हो कौन ?’ श्रीकृष्ण ने अपना रूप बदलते हुए कहा- ‘मैं श्रीकृष्ण हूं बर्बरीक! मैं नहीं चाहता कि तुम इस महायुद्ध में भाग लो और तुम्हारे कारण दोनों पक्षों को विनाश हो जाए।’ ‘मैं अपने वचन को पूरा करूंगा, परन्तु मेरी इच्छा मेरे साथ ही मिट जाएगी।’ ‘निःसंकोच कहो, तुम्हारी क्या इच्छा है?’ ‘मैं। इस महायुद्ध की अच्छी तरह देखना चाहता हूं। सृष्टि के सभी महारथी इसमें सम्मिलित हुए हैं। मैं देखना चाहता हूँ कि कौन कितना बली है।’ ‘तुम्हारी यह इच्छा अवश्य पूरी होगी।’ 
कहते हैं कि तब भगवान श्रीकृष्ण ने बर्बरीक के सिर को किसी दिव्य औषधि के सहारे जीवित रखा व उसे पीपल की सबसे ऊंची शाख पर टांग दिया, जिससे वह भलीभांति युद्ध देख सके और यह बात सही है कि बर्बरीक ने उस धर्मयुद्ध को भलीभांति देखा। अठारह दिन तक महाभारत का महायुद्ध हुआ। अन्त में दुर्योधन की मृत्यु के साथ इस महायुद्ध का अन्त हुआ। पाण्डव विजयी हुए, कौरव पराजित ! इस महायुद्ध की भीषण विभिषिका से दोनों पक्षों में केवल दस व्यक्ति ही जीवित बचे थे- पाण्डव पक्ष में पांच पाण्डव, श्रीकृष्ण व सात्यकि और कौरव पक्ष में अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा। युद्ध समाप्ति के पश्चात् भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि पाण्डव अपनी विजय के मद में चूर है। उनका व्यर्थ का अभिमान दूर करने के लिए वह पांचों पाण्डवों, सात्यकि, द्रोपदी और कुन्ती सहित बर्बरीक के पास पहुंचे। बर्बरीक का मुखमण्डल चमक रहा था। उसने आदर सत्कार के पश्चात् पूछा-‘कहो, कैसे आना हुआ?’ सभी उनके मुख से अपनी-अपनी वीरता की प्रशंसा सुनना चाहते थे। अर्जुन उनके मुख से यह सुनना चाहते थे कि मेरे समान धनुर्विद्या का ज्ञाता इस संसार में दूसरा कोई नहीं है। वह अपनी प्रशंसा स्वयं करने लगे-‘बर्बरीक ! क्या तुमने इस महायुद्ध को भलीभांति देखा है ?’ बर्बरीक ने स्वीकारात्मक मुद्रा में सिर हिला दिया। अर्जुन गर्व से भरकर बोला-‘तब तो तुम इस बात को भी मानोगे कि यह युद्ध मैंने अपने बाहुबल से जीता है। अठारह दिन निरन्तर गांडीव की टकार से दसों दिशाएं गूंजती रहीं। भीष्म पितामह को मारना कोई हंसी-खेल नहीं था।’ भीमसेन के पौत्र बर्बरीक के मुख पर व्यंग्यभरी मुस्कान खेलने लगी, बोले- ‘हां भीष्म पितामह के विषय में मेरा भी यही विचार है, कहे चलो। रूको नहीं।’ अर्जुन फिर बोला- ‘मैंने भगदत्त जैसे महाबली को मार गिराया। द्रोण को निस्तेज कर दिया था और कर्ण, जिसके भय से धर्मराज युधिष्ठिर को रातभर नींद नहीं आती थी, उसका वध भी मेरे ही हाथों हुआ। बाद में अश्वत्थामा को मणिरहित भी मैंने ही किया। क्यों बर्बरीक, अब तो तुम मेरी और मेरे गांडीव की प्रशंसा करोगे ?’ बर्बरीक खुलकर हंसा-‘उत्तर दूंगा और भी किसी को कुछ कहना हो तो कह लो।’ भीम बोल पड़ा-‘मेरी इस पर्वत-सी विशाल गदा के विषय में क्या विचार है बर्बरीक ? तुमने देखा होगा कि इसी गदा के सहारे मैंने दुष्ट दुशासन का रक्त पिया। इसी गदा से मैंने अद्वितीय गदाधारी दुर्योधन का वध किया। हिडिम्ब, बकासुर और कीचक के वध की कहानियां भी तुमने सुनी होंगी। अब तुम मेरी वीरता के बारे में कुछ कहो।’ बर्बरीक हंस दिया- ‘कहूंगा, पहले तुम सब अपनी बात कह लो, फिर मैं सबका जवाब एक साथ दूंगा।’ नकुल-सहदेव ने अपनी-अपनी विशाल तलवारों की प्रशंसा की। बाद में युधिष्ठिर ने कहा- ‘मेरा विचार है बर्बरीक, कि यह युद्ध मैंने सत्य के बल पर जीता।’ बर्बरीक ने सबकी ओर अपेक्षा से देखकर श्रीकृष्ण से प्रश्न किया- ‘क्यों श्रीकृष्ण, क्या तुमको अपने विषय में कुछ नहीं कहना है ?’ श्रीकृष्ण, जो अब तक सबकी बातें सुन रहे थे, मुस्कुराकर बोले- ‘मुझे कुछ नहीं कहना बर्बरीक ! मैंने योद्धा के रूप में तो इस युद्ध में भाग लिया ही नहीं। मैं। तो मात्र सारथी था। रथ चलाता रहा, युद्ध देखता रहा, बस इससे अधिक कुछ नहीं किया मैंने।’ यह सुनते ही बर्बरीक खुलकर हंसा। उसके अट्टहास से दसों दिखाएं गूंज उठीं। बाद में वह गम्भीर स्वर में बोला-‘अच्छा किया श्रीकृष्ण तुमने सारथी के रूप् में ही इस युद्ध में भाग लिया योद्धा के रूप में नहीं। शस्त्र धारण करके भाग लेते तो सम्भवतः पांडवों की पराजय ही होती। नकुल, सहदेव और युधिष्ठिर को तो मैं महावीरों की श्रेणी में गिनता ही नहीं। रहे अर्जुन और भीम, ये महाबली अवश्य हैं किन्तु कौरव पक्ष के धनुर्धरों के सम्मुख ये दोनों भी अनाड़ी और नौसिखिए लग रहे थे। अकेले भीष्म नही समस्त पाण्डव सेना और पाण्डव वीरों का बुरा हाल कर दिया था। उन्हें तो इच्छा-मृत्यु का वरदान प्राप्त था। भला इनके मारे वे क्या मरते। इस वृद्धावस्था में भी कितना तेज था उनमें मुख पर।’ बर्बरीक ने फिर अर्जुन की ओर देखकर कहा- ‘मैं तुम्हारी बात का उत्तर दे रहा हूँ अर्जुन ! जिस गाण्डीव की तुम इतनी प्रशंसा कर रहे हो, वह उस वक्त कहां गया था अब भीष्म ने तुम्हारी सेना को छिन्न-भिन्न कर दिया था, रथ तोड़ दिया था, कपिध्वज धरती पर पड़ा था, तुम मूर्च्छित हो गए थे और श्रीकृष्ण को अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर तुम्हारी रक्षा करनी पड़ी थी। फिर तुम श्रीकृष्ण की सलाह पर भीष्म से यह पूछने गए थे कि उनकी मृत्यु कैसे होगी। तब तुम लोगों को लाज नहीं आई थी ? शिखण्डी के पीछे से भी निहत्थे भीष्म पर मैंने तुम्हारे शस्त्रों को चलते देखा था। वह तुम्हारी वीरता की चरमसीमा थी। जयद्रथ वध के दिन भी मैं तुम्हारी वीरता को देख चुका हूं। श्रीकृष्ण की माया यदि साथ न देती तो एक क्या सैकड़ों अर्जुन भी जयद्रथ की परछाईं नहीं पा सकते थे।’ ‘तेजस्वी वृद्ध आचार्य द्रोण ने तुम्हारी और तुम्हारी सेना की जो दुर्दशा की थी वह भी किसी से छिपी नहीं है। तब तुम्हारा बल-तेज कहाँ गया था ? युधिष्ठिर कितने सत्यवादी हैं, मैंने यह भी इसी युद्ध में देखा। श्रीकृष्ण की सलाह पर अपने गुरू के सम्मुख जाकर उन्होंने झूठ बोला। जीवित अश्वत्थामा को मृत बताया, क्योंकि पुत्र शोक ही उनकी मृत्यु का कारण हो सकता था।’ यह सुनते ही युधिष्ठिर बोल उठे-‘भूलते हो बर्बरीक ! मैंने कहा था, अश्वत्थामा मर गया है, किन्तु न नहीं हाथी।’ बर्बरीक उत्तेजित हो उठे, क्रोध से बोले- ‘नर नहीं हाथी, धीमे स्वर में कहा था। मन में कहा होगा। द्रोण केवल यह सुन सके कि अश्वत्थामा मर गया है। उसके बाद श्रीकृष्ण और अर्जुन ने अपने शंख बजाने शुरू कर दिए। क्यों, यह सब पहले से ही निश्चित था न ? बर्बरीक आगे बोला, ‘सुनो अर्जुन। कर्ण के बाणों के सामने तुम्हारे दिव्यास्त्र कहां गए थे ? उन बाणों को विफल करने के लिए उन्हें चलाया तो था पर असफल रहे, क्यों सचाई यही है न ? श्रीकृष्ण ने उस वक्त घोड़ों को बैठाकर अपनी और तुम्हारी रक्षा की, फिर भी तुम्हारा मुकुट कट गया था और सुनो, निहत्थे कर्ण को मारते हुए तुमको लाज न आई होगी।’ अर्जुन हत्प्रभ हो रहा था, फिर भी बोला- ‘मैं तो रूक गया था, लेकिन श्रीकृष्ण की मुझे आज्ञा मिली थी कि यही समय है जब कर्ण को मार सकते हो। यदि कर्ण रथ का पहिया कीचड़ से निकालकर रथ पर बैठ गया तो एक क्या अनेक अर्जुन भी उसे मार नहीं पाएंगे।’ बर्बरीक की बाणी में व्यंग्य उभर आया- ‘ठीक ही किया श्रीकृष्ण ने, तुम्हें युद्ध जो जिताना था। मुझे याचक बनकर बेकार कर दिया। बली भगदत्त की प्रचण्ड शक्ति को श्रीकृष्ण ने अपनी छाती पर सहा, क्योंकि तुम्हारे शरीर के वह शत खण्ड कर देती।’ हाँ, भीम अब तुम भी सुनो, यह तो सच ही है कि तुम अतुल बल के स्वामी हो, तुमने निश्चित ही हिडिम्ब, बकासुर और कीचक को मारा। पर यह युद्ध तो गदा से नहीं जीता जा सकता था, क्योंकि इस युद्ध में इस युग के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर सम्मिलित हुए थे। धनुर्धर कर्ण के सम्मुख तुम्हारी गदा को क्या हो गया था, जो तुम जान बचाने के लिए हुए हाथियों के झुण्ड के पीछे जा छिपे थे। कर्ण ने अपने धनुष की डोरी तुम्हारे गले में डालकर तुम्हें बाहर खींच लिया था। वह चाहता तो तुम्हारा वध कर सकता था। किंतु उसने तुम्हें छोड़ दिया और तुम्हें ही क्या उसने नकुल, सहदेव और युधिष्ठिर को भी छोड़ दिया था। आज तो तुम सब अपनी वीरता की डींगें हांक रहे हो, लेकिन यह भूल गए कि तुम उस महारथी से प्राण दान लेकर लौटे थे। वास्तव में ही वह सच्चा दानी था। तभी श्रीकृष्ण और कुन्ती की आंखे टकराई। कुन्ती की आंखों में आंसू थे। किन्तु बर्बरीक बोलता ही रहा- ‘उसने अवसर मिलने पर भी तुम्हें क्यों नही मारा, यह वास्तव में अद्भुत रहस्य है। वैसे इस बात से उसकी करूणा तुम पर प्रकट होती है। जयद्रथ के सामने तुम्हारी वीरता कहां गई थी। उसने तुम्हें चक्रव्यूह में घुसने नहीं दिया था। सुनो भीम ! तुम्हारे और दुर्योधन के बीच हुए गदायुद्ध में तुम अपनी महानता प्रकट कर सकते थे, किन्तु वहां पर भी तुमने नीचता का प्रदर्शन किया। श्रीकृष्ण ही के इशारे पर गदायुद्ध के नियमों का उल्लंघन करके तुमने दुर्याधन की जांघ पर गदा मारी। धिक्कार है तुम्हें और तुम्हारी वीरता पर। बलराम तो तुम्हें तुम्हारी दुष्टता का दण्ड देने उठे थे, पर श्रीकृष्ण ने तुम्हें बचा लिया था। क्योंकि यह सब उन्हीं के इशारे पर हुआ था।’ ‘धन्य था दुर्योधन ! वीरता की लाज रखनी उसे आती थी। युधिष्ठिर के यह कहने पर भी हम पांचों में किसी को भी द्वन्द्व युद्ध के लिये चुन लो, उसने अपने से बली को चुना। यदि शेष चारों में से वह किसी एक को चुन लेता तो क्या होता ? गदा- युद्ध व मल्ल-युद्ध में ये सब उनके सामने खिलौने जैसे थे। वैसे युद्ध में तुम्हारी भी मृत्यु निश्चित थी। क्योंकि वह गदा-युद्ध का श्रेष्ठ ज्ञाता और बहुत फुर्तीला था।’ फिर बर्बरीक सांस भरकर बोला- ‘श्रीकृष्ण की नीति पराजित कैसे हो सकती थी। मुझसे यदि कोई पूछे तो मैं यही कहूंगा कि इस युद्ध के वास्तविक विजेता श्रीकृष्ण ही हैं, जिन्होंने अपनी बुद्धि और नीति के सहारे इस युद्ध को जीता। मुझे तो इस युद्ध में चारों ओर श्रीकृष्ण ही श्रीकृष्ण नजर आते थे। श्रीकृष्ण नीति की जय हो।’ यह कहकर बर्बरीक मौन हो गया। इतना सुनकर श्रीकृष्ण ने महाबली को खुश होकर यह वरदान दिया कि महाबली बर्बरीक कलियुग में तुम मेरे नाम से पूजे जाओगे और जो तुम्हें सच्चे मन से ध्याएगें वह मनवांछित फल पाएंगे। और आज यह सच जग विख्यात है कि उस काल के बर्बरीक आज के बाबा श्याम हैं। आज सारा संसार उन्हें शीश के दानी के रूप में जानता है और जो भी सच्चे मन से इनकी शरण में खाटू श्याम जी जाता है, उसके समस्त कारज प्रभु श्री श्याम पूर्ण करते है

पितृपक्ष में परान्न से बचें

 गरुड़ पुराणोक्त पितृपक्ष परान्न निषेध कथा सनातन धर्म में 16 दिनों का पितृपक्ष वर्ष का सबसे सूक्ष्म और संवेदनशील समय माना गया है। गरुड़ पुरा...