शनिवार, 15 मई 2021

पक्षियों से इतना तो जरूर सीखें।

 पक्षियों से कुछ कुछ सीखे:.

  

१. वो रात को कुछ नही खाते।

 

२. रात को घूमते नही।

 

३. अपने बच्चे को खुद ट्रेनिंग देते है। दूसरों के पास सिखने कभी नही भेजते।

 

४. ठूस ठूस के कभी नही खाते। आप ने कितने भी दाने डाले हो। थोड़ा खाके उड़ जायेंगे। साथ कुछ नही ले जाते।

 

५. रात होते ही सो जायेंगे सुबह जल्दी जाग जायेंगे, गाते गाते उठेंगे। 

 

६. अपना आहार कभी नही बदलते।

 

७. अपनी पक्षी जाती मे ही संबंध एवं मित्रता करेंगे (यानि साथ रहेंगे) काग और हंस की जोड़ी कभी नही होगी।

 

८. अपने शरीर से सतत् काम लेंगे. रात के सिवा आराम नही।

 

९. बीमारी आई तो खाना छोड़ देंगे, तभी खायेंगे जब ठीक होंगे 


 १०. अपने बच्चे को खुब प्यार देंगे।

 

११. आपस मे मिलजुल के रहेंगे... कभी नही लड़ते


 १२. प्रकृति के सभी नियमों का पालन करते है।


 १३. अपना घर इको फ्रेंडली बनायेंगे।

 

।।जय महादेव।।

हम भी इनसे कुछ सीखें तो जीवन सरल, सुंदर व सफल हो जाए !

शुक्रवार, 14 मई 2021

अक्षय तृतीया का महत्व

 🙏🙏 जय जय श्री राधे🙏🙏




*🔱आइए जानें अक्षय तृतीया का महत्व!!! 14मई 2021 दिन शुक्रवार*🎄


शास्त्रों में अक्षय तृतीया को स्वयंसिद्ध मुहूर्त माना गया है। अक्षय तृतीया के दिन मांगलिक कार्य जैसे-विवाह, गृहप्रवेश, व्यापार अथवा उद्योग का आरंभ करना अति शुभ फलदायक होता है। सही मायने में अक्षय तृतीया अपने नाम के अनुरूप शुभ फल प्रदान करती है। अक्षय तृतीया पर सूर्य व चंद्रमा अपनी उच्च राशि में रहते हैं।


*इस वर्ष 2021 में अक्षय तृतीया 14 मई 2021 दिन शुक्रवार को होगी।*


*🎁तो आइए जानें 25 बातों से अक्षय तृतीया का महत्व...🎂*


1.“न माधव समो मासो न कृतेन युगं समम्।

न च वेद समं शास्त्रं न तीर्थ गंगयां समम्।।”


*🙏वैशाख के समान कोई मास नहीं है, सत्ययुग के समान कोई युग नहीं हैं, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं है और गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं है। उसी तरह अक्षय तृतीया के समान कोई तिथि नहीं है।*


2 .अक्षय तृतीया के विषय में मान्यता है कि इस दिन जो भी काम किया जाता है उसमें बरकत होती है। यानी इस दिन जो भी अच्छा काम करेंगे उसका फल कभी समाप्त नहीं होगा अगर कोई बुरा काम करेंगे तो उस काम का परिणाम भी कई जन्मों तक पीछा नहीं छोड़ेगा।


3. धरती पर भगवान विष्णु ने 24 रूपों में अवतार लिया था। इनमें छठा अवतार भगवान परशुराम का था। पुराणों में उनका जन्म अक्षय तृतीया को हुआ था।


4. इस दिन धरती पर गंगा अवतरित हुई। सतयुग, द्वापर व त्रेतायुग के प्रारंभ की गणना इस दिन से होती है।


5.शास्त्रों की इस मान्यता को वर्तमान में व्यापारिक रूप दे दिया गया है जिसके कारण अक्षय तृतीया के मूल उद्देश्य से हटकर लोग खरीदारी में लगे रहते हैं। वास्तव में यह वस्तु खरीदने का दिन नहीं है। वस्तु की खरीदारी में आपका संचित धन खर्च होता है।


6. नया वाहन लेना या गृह प्रवेश करना, आभूषण खरीदना इत्यादि जैसे कार्यों के लिए तो लोग इस तिथि का विशेष उपयोग करते हैं। मान्यता है कि यह दिन सभी का जीवन में अच्छे भाग्य और सफलता को लाता है। इसलिए लोग जमीन जायदाद संबंधी कार्य, शेयर मार्केट में निवेश रीयल एस्टेट के सौदे या कोई नया बिजनेस शुरू करने जैसे काम भी लोग इसी दिन करने की चाह रखते हैं...


7. वैशाख मास की विशिष्टता इसमें आने वाली अक्षय तृतीया के कारण अक्षुण्ण हो जाती है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाए जाने वाले इस पर्व का उल्लेख विष्णु धर्म सूत्र, मत्स्य पुराण, नारदीय पुराण तथा भविष्य पुराण आदि में मिलता है।


8.यह समय अपनी योग्यता को निखारने और अपनी क्षमता को बढ़ाने के लिए उत्तम है।


9. यह मुहूर्त अपने कर्मों को सही दिशा में प्रोत्साहित करने के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। शायद यही मुख्य कारण है कि इस काल को ‘दान’ इत्यादि के लिए सबसे अच्छा माना जाता है।


10. ‘वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को आखातीज के रुप में मनाया जाता है भारतीय जनमानस में यह अक्षय तीज के नाम से प्रसिद्ध है।


11.पुराणों के अनुसार इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान,दान,जप,स्वाध्याय आदि करना शुभ फलदायी माना जाता है इस तिथि में किए गए शुभ कर्म का फल क्षय नहीं होता है इसको सतयुग के आरंभ की तिथि भी माना जाता है इसलिए इसे’कृतयुगादि’ तिथि भी कहते हैं ।


12.यदि इसी दिन रविवार हो तो वह सर्वाधिक शुभ और पुण्यदायी होने के साथ-साथ अक्षय प्रभाव रखने वाली भी हो जाती है।


13. मत्स्य पुराण के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन अक्षत पुष्प दीप आदि द्वारा भगवान विष्णु की आराधना करने से विष्णु भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है तथा संतान भी अक्षय बनी रहती है।


14.दीन दुखियों की सेवा करना, वस्त्रादि का दान करना ओर शुभ कर्म की ओर अग्रसर रहते हुए मन वचन व अपने कर्म से अपने मनुष्य धर्म का पालन करना ही अक्षय तृतीया पर्व की सार्थकता है।🅿


15. कलियुग के नकारात्मक प्रभाव से बचने के लिए इस दिन भगवान विष्णु की उपासना करके दान अवश्य करना चाहिए। ऐसा करने से निश्चय ही अगले जन्म में समृद्धि, ऐश्वर्य व सुख की प्राप्ति होती है।


16. भविष्य पुराण के एक प्रसंग के अनुसार शाकल नगर रहने वाले एक वणिक नामक धर्मात्मा अक्षय तृतीया के दिन पूर्ण श्रद्धा भाव से स्नान ध्यान व दान कर्म किया करता था जबकि उसकी पत्नी उसको मना करती थी,मृत्यु बाद किए गए दान पुण्य के प्रभाव से वणिक द्वारकानगरी में सर्वसुख सम्पन्न राजा के रुप में अवतरित हुआ।


17. इस दिन पवित्र नदियों में स्नान कर सामर्थ्य अनुसार जल,अनाज,गन्ना,दही,सत्तू,फल,सुराही,हाथ से बने पंखे वस्त्रादि का दान करना विशेष फल प्रदान करने वाला माना गया है।


18. दान को वैज्ञानिक तर्कों में ऊर्जा के रूपांतरण से जोड़ कर देखा जा सकता है। दुर्भाग्य को सौभाग्य में परिवर्तित करने के लिए यह दिवस सर्वश्रेष्ठ है।


19. यदि अक्षय तृतीया रोहिणी नक्षत्र को आए तो इस दिवस की महत्ता हजारों गुणा बढ़ जाती है, ऐसी मान्यता है। किसानों में यह लोक विश्वास है कि यदि इस तिथि को चंद्रमा के अस्त होते समय रोहिणी आगे होगी तो फसल के लिए अच्छा होगा और यदि पीछे होगी तो उपज अच्छी नहीं होगी।


20. इस दिन प्राप्त आशीर्वाद बेहद तीव्र फलदायक माने जाते हैं। भविष्य पुराण के अनुसार इस तिथि की गणना युगादि तिथियों में होती है। सतयुग, त्रेता और कलयुग का आरंभ इसी तिथि को हुआ और इसी तिथि को द्वापर युग समाप्त हुआ था।


21.रेणुका के पुत्र परशुराम और ब्रह्मा के पुत्र अक्षय कुमार का प्राकट्य इसी दिन हुआ था। इस दिन श्वेत पुष्पों से पूजन कल्याणकारी माना जाता है।


22.धन और भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति तथा भौतिक उन्नति के लिए इस दिन का विशेष महत्व है। धन प्राप्ति के मंत्र, अनुष्ठान व उपासना बेहद प्रभावी होते हैं। स्वर्ण, रजत, आभूषण, वस्त्र, वाहन और संपत्ति के क्रय के लिए मान्यताओं ने इस दिन को विशेष बताया और बनाया है। बिना पंचांग देखे इस दिन को श्रेष्ठ मुहुर्तों में शुमार किया जाता है।


23.दान करने से जाने-अनजाने हुए पापों का बोझ हल्का होता है और पुण्य की पूंजी बढ़ती है। अक्षय तृतीया के विषय में कहा गया है कि इस दिन किया गया दान खर्च नहीं होता है, यानी आप जितना दान करते हैं उससे कई गुणा आपके अलौकिक कोष में जमा हो जाता है।


24. मृत्यु के बाद जब अन्य लोक में जाना पड़ता है तब उस धन से दिया गया दान विभिन्न रूपों में प्राप्त होता है पुनर्जन्म लेकर जब धरती पर आते हैं तब भी उस कोष में जमा धन के कारण धरती पर भौतिक सुख एवं वैभव प्राप्त होता है। इस दिन स्वर्ण, भूमि, पंखा, जल, सत्तू, जौ, छाता, वस्त्र कुछ भी दान कर सकते हैं। जौ दान करने से स्वर्ण दान का फल प्राप्त होता है।


25. इस तिथि को चारों धामों में से उल्लेखनीय एक धाम भगवान श्री बद्रीनारायण के पट खुलते हैं। अक्षय तृतीया को ही वृंदावन में श्रीबिहारीजी के चरणों के दर्शन वर्ष में एक बार ही होते हैं।

मंगलवार, 11 मई 2021

सोलह माताएं

 गुरुपत्नी , राजपत्नी , देवपत्नी , पुत्रवधु , माता की बहिन , पिता की बहिन , शिष्यपत्नी , भृत्य पत्नी ( नौकर की पत्नी ) , मामी , पिता की पत्नी ( माता और विमाता ) , भाई की पत्नी , सास , बहिन , बेटी , गर्भ में धारण करने वाली ( जन्मदात्री ) तथा इष्टदेवी - ये पुरुष की सोलह माताएं हैं ! 


गुरुपत्नी राजपत्नी देव्पतनी तथा वधु: !

पित्रो: स्वसा शिष्यपत्नी भृत्यपत्नी च मातुली !!

पितृपत्नी भ्रातृपत्नी श्वभृशच भगिनी सुता !

गर्भधात्रीषट्देवी च पुन्सः षोडश मातरः !!


🙏- ब्रह्मवैवर्त्य पुराण🙏

शुक्रवार, 7 मई 2021

वरूथिनी एकादशी


*वरुथिनी एकादशी


वैशाख मास के कृष्णपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है? कृपया उसकी महिमा बताइये।


भगवान श्रीकृष्ण बोले: राजन ! वैशाख कृष्णपक्ष की एकादशी ‘वरुथिनी’ नाम से प्रसिद्ध है। यह इस लोक और परलोक में भी सौभाग्य प्रदान करनेवाली है।


*व्रत कथा*


नर्मदा नदी के तट पर मान्धाता नाम के राजा का राज था। राजा की रुचि हमेशा धार्मिक कार्यों में रहती थी। वह हमेशा पूजा-पाठ में लीन रहते थे। एक बार राजा जंगल में तपस्या में लीन थे तभी एक जंगली भालू आया और राजा का पैर चबाने लगा।


राजा इस घटना से तनिक भी भयभीत नहीं हुए और उनके पैर को चबाते हुए भालू राजा को घसीटकर पास के जंगल में ले गया। तब राजा मान्धाता ने भगवान विष्णु से प्रार्थना करने लगे। राजा की पुकार सुनकर भगवान विष्णु प्रकट ने चक्र से भालू को मार डाला।


राजा का पैर भालू खा चुका था और वह इस बात को लेकर वह बहुत परेशान हो गए। दुखी भक्त को देखकर भगवान विष्णु बोले- 'हे वत्स! शोक मत करो। तुम मथुरा जाओ और वरुथिनी एकादशी का व्रत रखकर मेरी वराह अवतार मूर्ति की पूजा करों। उसके प्रभाव से पुन: सुदृढ़ अंगो वाले हो जाओगे। इस भालू ने तुम्हें जो काटा है, यह तुम्हारे पूर्व जन्म का अपराध था।


भगवान की आज्ञा मानकर राजा ने मथुरा जाकर श्रद्धापूर्वक यह व्रत किया। इसके प्रभाव से वह सुंदर और संपूर्ण अंगो वाला हो गया।


"वरुथिनी" के व्रत से सदा सुख की प्राप्ति और पाप की हानि होती है। "वरुथिनी" के व्रत से ही मान्धाता तथा धुन्धुमार आदि अन्य अनेक राजा स्वर्गलोक को प्राप्त हुए हैं।


जो फल दस हजार वर्षों तक तपस्या करने के बाद मनुष्य को प्राप्त होता है, वही फल इस "वरुथिनी एकादशी" का व्रत रखनेमात्र से प्राप्त हो जाता है।


नृपश्रेष्ठ ! घोड़े के दान से हाथी का दान श्रेष्ठ है। भूमिदान उससे भी बड़ा है। भूमिदान से भी अधिक महत्त्व तिलदान का है। तिलदान से बढ़कर स्वर्णदान और स्वर्णदान से बढ़कर अन्नदान है, क्योंकि देवता, पितर तथा मनुष्यों को अन्न से ही तृप्ति होती है।


विद्वान पुरुषों ने कन्यादान को भी इस दान के ही समान बताया है। कन्यादान के तुल्य ही गाय का दान है, यह साक्षात् भगवान का कथन है। इन सब दानों से भी बड़ा विद्यादान है।


मनुष्य "वरुथिनी एकादशी" का व्रत करके विद्यादान का भी फल प्राप्त कर लेता है। जो लोग पाप से मोहित होकर कन्या के धन से जीविका चलाते हैं, वे पुण्य का क्षय होने पर यात नामक नरक में जाते हैं।


अत: सर्वथा प्रयत्न करके कन्या के धन से बचना चाहिए, उसे अपने काम में नहीं लाना चाहिए। जो अपनी शक्ति के अनुसार अपनी कन्या को आभूषणों से विभूषित करके पवित्र भाव से कन्या का दान करता है, उसके पुण्य की संख्या बताने में चित्रगुप्त भी असमर्थ हैं।


"वरुथिनी एकादशी" करके भी मनुष्य उसी के समान फल प्राप्त करता है।


राजन् ! रात को जागरण करके जो भगवान मधुसूदन का पूजन करते हैं, वे सब पापों से मुक्त हो परम गति को प्राप्त होते हैं। अत: मनुष्यों को पूर्ण प्रयत्न करके इस एकादशी का व्रत करना चाहिए। यमराज से डरनेवाला मनुष्य अवश्य "वरुथिनी एकादशी" का व्रत करे।


राजन् ! इसके पढ़ने और सुनने से सहस्र गौदान का फल मिलता है, और मनुष्य सब पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है।


*एकादशी महारानी की जय।

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

घर में कुत्ता पालें या नहीं?

 घर में कुत्ता पालना चाहिये या नहीं?

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घर में कुत्ता नहीं रखना चाहिये। कुत्तेका पालन करनेवाला नरकों में जाता है। महाभारत में आया है कि जब पाँचों पाण्डव और द्रौपदी संन्यास लेकर उत्तर की ओर चले तो चलते-चलते भीमसेन आदि सभी गिर गये।

अन्त में जब युधिष्ठिर भी लड़खड़ा गये, तब इन्द्रकी आज्ञा से मातिल रथ लेकर वहाँ आया और युधिष्ठिर से कहा कि आप इसी शरीर से स्वर्ग पधारिए। युधिष्ठिर ने देखा कि एक कुत्ता उनके पास खड़ा है।

उन्होंने कहा कि यह कुत्ता मेरी शरण में आया है, अतः यह भी मेरे साथ स्वर्ग में चलेगा।


इन्द्रने युधिष्ठिरसे कहा‒


स्वर्गे लोके श्ववतां नास्ति धिष्ण्यमिष्टापूर्तं क्रोधवशा हरन्ति ।

ततो विचार्य क्रियतां धर्मराज त्यज श्वानं नात्र नृशंसमस्ति ॥

                                                           (महाभारत, महाप्र॰ ३ । १०)


"धर्मराज ! कुत्ता रखने वालोंके लिये स्वर्गलोक में स्थान नहीं है। उनके यज्ञ करने और कुआँ, बावड़ी आदि बनवानेका जो पुण्य होता है, उसे क्रोधवश नामक राक्षस हर लेते हैं। इसलिये सोच-विचारकर काम करो और इस कुत्तेको छोड़ दो। ऐसा करने में कोई निर्दयता नहीं है ।"


तात्पर्य है कि गृहस्थ को घर में कुत्ता नहीं रखना चाहिये। महाभारत में आया है‒


भिन्नभाण्डं च खट्‌वां च कुक्कुटं शुनकं तथा ।

अप्रशस्तानि सर्वाणि यश्च वृक्षो गृहेरुहः ॥

भिन्नभाण्डे कलिं प्राहुः खट्वायां तु धनक्षयः ।

कुक्कुटे शुनके चैव हविर्नाश्नन्ति देवताः ।

वृक्षमूले ध्रुवं सत्त्वं तस्माद् वृक्ष न रोपयेत् ॥

                              (महाभारत, अनु॰ १२७ । १५-१६)


"घरमें फूटे बर्तन, टूटी खाट, मुर्गा, कुत्ता और अश्वत्थादि वृक्ष का होना अच्छा नहीं माना गया है। फूटे बर्तन में कलियुग का वास कहा गया है। टूटी खाट रहने से धन की हानि होती है। मुर्गे और कुत्ते के रहने पर देवता उस घर में हविष्य ग्रहण नहीं करते तथा मकान के अन्दर कोई बड़ा वृक्ष(पीपल आदि) होने पर उसकी जड़ के भीतर साँप, बिच्छू आदि जन्तुओं का रहना अनिवार्य हो जाता है, इसलिये घरके भीतर पेड़ न लगाये ।"


कुत्ता महान अशुद्ध, अपवित्र होता है। उसके खान-पान से, स्पर्श से, उसके जगह-जगह बैठने से गृहस्थ के खान-पान में, रहन-सहन में अशुद्धि, अपवित्रता आती है और अपवित्रता का फल भी अपवित्र (नरक आदि) ही होता है।


मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

वसंत पंचमी पर पूजन विधि

 बसंत पंचमी की तिथि पूजा विधि, शुभ मुहूर्त व महत्व

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बसंत पंचमी भारतीय संस्कृति में एक बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाने वाला त्यौहार है जिसमे हमारी परम्परा, भौगौलिक परिवर्तन , सामाजिक कार्य तथा आध्यात्मिक पक्ष सभी का सम्मिश्रण है, हिन्दू पंचांग के अनुसार माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को बसंत पंचमी का त्यौहार मनाया जाता है वास्तव में भारतीय गणना के अनुसार वर्ष भर में पड़ने वाली छः ऋतुओं (बसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर) में बसंत को ऋतुराज अर्थात सभी ऋतुओं का राजा माना गया है और बसंत पंचमी के दिन को बसंत ऋतु का आगमन माना जाता है इसलिए बसंत पंचमी ऋतू परिवर्तन का दिन भी है जिस दिन से प्राकृतिक सौन्दर्य निखारना शुरू हो जाता है पेड़ों पर नयी पत्तिया कोपले और कालिया खिलना शुरू हो जाती हैं पूरी प्रकृति एक नवीन ऊर्जा से भर उठती है।


बसंत पंचमी को विशेष रूप से सरस्वती जयंती के रूप में मनाया जाता है यह माता सरस्वती का प्राकट्योत्सव है इसलिए इस दिन विशेष रूप से माता सरस्वती की पूजा उपासना कर उनसे विद्या बुद्धि प्राप्ति की कामना की जाती है इसी लिए विद्यार्थियों के लिए बसंत पंचमी का त्यौहार बहुत विशेष होता है।


बसंत पंचमी का त्यौहार बहुत ऊर्जामय ढंग से और विभिन्न प्रकार से पूरे भारत वर्ष में मनाया जाता है इस दिन पीले वस्त्र पहनने और खिचड़ी बनाने और बाटने की प्रथा भी प्रचलित है तो इस दिन बसंत ऋतु के आगमन होने से आकास में रंगीन पतंगे उड़ने की परम्परा भी बहुत दीर्घकाल से प्रचलन में है।


बसंत पंचमी के दिन का एक और विशेष महत्व भी है बसंत पंचमी को मुहूर्त शास्त्र के अनुसार एक स्वयं सिद्ध मुहूर्त और अनसूज साया भी माना गया है अर्थात इस दिन कोई भी शुभ मंगल कार्य करने के लिए पंचांग शुद्धि की आवश्यकता नहीं होती इस दिन नींव पूजन, गृह प्रवेश, वाहन खरीदना, व्यापार आरम्भ करना, सगाई और विवाह आदि मंगल कार्य किये जा सकते है।


माता सरस्वती को ज्ञान, सँगीत, कला, विज्ञान और शिल्प-कला की देवी माना जाता है।


भक्त लोग, ज्ञान प्राप्ति और सुस्ती, आलस्य एवं अज्ञानता से छुटकारा पाने के लिये, आज के दिन देवी सरस्वती की उपासना करते हैं। कुछ प्रदेशों में आज के दिन शिशुओं को पहला अक्षर लिखना सिखाया जाता है। दूसरे शब्दों में वसन्त पञ्चमी का दिन विद्या आरम्भ करने के लिये काफी शुभ माना जाता है इसीलिये माता-पिता आज के दिन शिशु को माता सरस्वती के आशीर्वाद के साथ विद्या आरम्भ कराते हैं। सभी विद्यालयों में आज के दिन सुबह के समय माता सरस्वती की पूजा की जाती है।


वसन्त पञ्चमी का दिन हिन्दु कैलेण्डर में पञ्चमी तिथि को मनाया जाता है। जिस दिन पञ्चमी तिथि सूर्योदय और दोपहर के बीच में व्याप्त रहती है उस दिन को सरस्वती पूजा के लिये उपयुक्त माना जाता है। हिन्दु कैलेण्डर में सूर्योदय और दोपहर के मध्य के समय को पूर्वाह्न के नाम से जाना जाता है।


ज्योतिष विद्या में पारन्गत व्यक्तियों के अनुसार वसन्त पञ्चमी का दिन सभी शुभ कार्यो के लिये उपयुक्त माना जाता है। इसी कारण से वसन्त पञ्चमी का दिन अबूझ मुहूर्त के नाम से प्रसिद्ध है और नवीन कार्यों की शुरुआत के लिये उत्तम माना जाता है।


वसन्त पञ्चमी के दिन किसी भी समय सरस्वती पूजा की जा सकती है परन्तु पूर्वाह्न का समय पूजा के लिये श्रेष्ठ माना जाता है। सभी विद्यालयों और शिक्षा केन्द्रों में पूर्वाह्न के समय ही सरस्वती पूजा कर माता सरस्वती का आशीर्वाद ग्रहण किया जाता है।


नीचे सरस्वती पूजा का जो मुहूर्त दिया गया है उस समय पञ्चमी तिथि और पूर्वाह्न दोनों ही व्याप्त होते हैं। इसीलिये वसन्त पञ्चमी के दिन सरस्वती पूजा इसी समय के दौरान करना श्रेष्ठ है।


सरस्वती, बसंतपंचमी पूजा

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1. प्रात:काल स्नाना करके पीले वस्त्र धारण करें। 


2. मां सरस्वती की प्रतिमा को सामने रखें तत्पश्चात कलश स्थापित कर प्रथम पूज्य गणेश जी का पंचोपचार विधि पूजन उपरांत सरस्वती का ध्यान करें 


ध्यान मंत्र 

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या कुन्देन्दु तुषारहार धवला या शुभ्रवस्त्रावृता। 

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।। 

या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता। 

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ।। 

शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमांद्यां जगद्व्यापनीं । 

वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यांधकारपहाम्।। 

हस्ते स्फाटिक मालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम् । 

वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्।।2।।


3. मां की पूजा करते समय सबसे पहले उन्हें आचमन व स्नान कराएं। 

4. माता का श्रंगार कराएं ।

5. माता श्वेत वस्त्र धारण करती हैं इसलिए उन्हें श्वेत वस्त्र पहनाएं। 

6. प्रसाद के रुप में खीर अथवा दुध से बनी मिठाईयों का भोग लगाएं। 

7. श्वेत फूल माता को अर्पण करें।

8. तत्पश्चात नवग्रह की विधिवत पूजा करें। 


बसंत पंचमी पर मां सरस्वती की पूजा के साथ सरस्वती चालीसा पढ़ना और कुछ मंत्रों का जाप आपकी बुद्धि प्रखर करता है। अपनी सुविधानुसार आप ये मंत्र 11, 21 या 108 बार जाप कर सकते हैं।


निम्न मंत्र या इनमें किसी भी एक मंत्र का यथा सामर्थ्य जाप करें

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1. सरस्वती महाभागे विद्ये कमललोचने

विद्यारूपा विशालाक्षि विद्यां देहि नमोस्तुते॥


2. या देवी सर्वभूतेषू, मां सरस्वती रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।


3. ऐं ह्रीं श्रीं वाग्वादिनी सरस्वती देवी मम जिव्हायां।

सर्व विद्यां देही दापय-दापय स्वाहा।।


4. एकादशाक्षर सरस्वती मंत्र

ॐ ह्रीं ऐं ह्रीं सरस्वत्यै नमः।


5. वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।

मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणी विनायकौ।।


6. सरस्वत्यै नमो नित्यं भद्रकाल्यै नमो नम:।

वेद वेदान्त वेदांग विद्यास्थानेभ्य एव च।।

सरस्वति महाभागे विद्ये कमललोचने।

विद्यारूपे विशालाक्षी विद्यां देहि नमोस्तुते।।


7. प्रथम भारती नाम, द्वितीय च सरस्वती

तृतीय शारदा देवी, चतुर्थ हंसवाहिनी

पंचमम् जगतीख्याता, षष्ठम् वागीश्वरी तथा

सप्तमम् कुमुदीप्रोक्ता, अष्ठमम् ब्रह्मचारिणी

नवम् बुद्धिमाता च दशमम् वरदायिनी

एकादशम् चंद्रकांतिदाशां भुवनेशवरी

द्वादशेतानि नामानि त्रिसंध्य य: पठेनर:

जिह्वाग्रे वसते नित्यमं

ब्रह्मरूपा सरस्वती सरस्वती महाभागे

विद्येकमललोचने विद्यारूपा विशालाक्षि

विद्या देहि नमोस्तुते”


8. स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए।


जेहि पर कृपा करहिं जन जानि।

कवि उर अजिर नचावहिं वानी॥

मोरि सुधारहिं सो सब भांति।

जासु कृपा नहिं कृपा अघाति॥


9. गुरु गृह पढ़न गए रघुराई।

अलप काल विद्या सब पाई॥


माँ सरस्वती चालीसा

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दोहा 

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जनक जननि पदम दुरज, निजब मस्तक पर धारि।

बन्दौं मातु सरस्वती, बुद्धि बल दे दातारि।।

पूर्ण जगत में व्याप्त तव, महिमा अमित अनंतु।

दुष्टजनों के पाप को, मातु तुही अब हन्तु।।


चौपाई

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जय श्रीसकल बुद्धि बलरासी।जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी।।

जय जय जय वीणाकर धारी।करती सदा सुहंस सवारी।।

रूप चतुर्भुज धारी माता।सकल विश्व अन्दर विख्याता।।

जग में पाप बुद्धि जब होती।तबही धर्म की फीकी ज्योति।।

तबहि मातु का निज अवतारा।पाप हीन करती महितारा।।

बाल्मीकि  जी  था  हत्यारा।तव   प्रसाद   जानै   संसारा।।

रामचरित जो रचे बनाई । आदि कवि की पदवी पाई।।

कालीदास जो भये विख्याता । तेरी कृपा दृष्टि से माता।।

तुलसी सूर आदि विद्वाना । भये जो और ज्ञानी नाना।।

तिन्ह न और रहेउ अवलम्बा । केवल कृपा आपकी अम्बा।।

करहु कृपा सोई मातु भवानी।दुखित दीन निज दासहि जानी।।

पुत्र  करई  अपराध  बहूता । तेहि  न  धरई  चित  माता।।

राखु लाज जननि अब मेरी।विनय करऊ भांति बहुतेरी।।

मैं अनाथ तेरी अवलंबा । कृपा करउ जय जय जगदंबा।।

मधुकैटभ जो अति बलवाना । बाहुयुद्ध विष्णु से ठाना।।

समर हजार पांच में घोरा।फिर भी मुख उनसे नहीं मोरा।।

मातु सहाय कीन्ह तेहि काला।बुद्धि विपरीत भई खलहाला।।

तेहि ते मृत्यु भई खल केरी । पुरवहु मातु मनोरथ मेरी।।

चण्ड मुण्ड जो थे विख्याता । क्षण महु संहारे उन माता।।

रक्त बीज से समरथ पापी । सुर मुनि हृदय धरा सब कांपी।।

काटेउ सिर जिम कदली खम्बा।बार बार बिनवऊं जगदंबा।।

जगप्रसिद्ध जो शुंभ निशुंभा।क्षण में बांधे ताहि तूं अम्बा।।

भरत-मातु बुद्धि फेरेऊ जाई । रामचन्द्र बनवास कराई।।

एहि विधि रावन वध तू कीन्हा।सुर नर मुनि सबको सुख दीन्हा।।

को समरथ तव यश गुण गाना।निगम अनादि अनंत बखाना।।

विष्णु रूद्र जस कहिन मारी।जिनकी हो तुम रक्षाकारी।।

रक्त दन्तिका और शताक्षी।नाम अपार है दानव भक्षी।।

दुर्गम काज धरा पर कीन्हा।दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा।।

दुर्ग आदि हरनी तू माता । कृपा करहु जब जब सुखदाता।।

नृप  कोपित को मारन चाहे । कानन  में घेरे  मृग  नाहै।।

सागर मध्य पोत के भंजे । अति तूफान नहिं कोऊ संगे।।

भूत प्रेत बाधा या दु:ख में।हो दरिद्र अथवा संकट में।।

नाम जपे मंगल सब होई।संशय इसमें करई न कोई।।

पुत्रहीन जो आतुर भाई । सबै छांड़ि पूजें एहि भाई।।

करै पाठ नित यह चालीसा । होय पुत्र सुन्दर गुण ईसा।।

धूपादिक नैवेद्य चढ़ावै।संकट रहित अवश्य हो जावै।।

भक्ति मातु की करैं हमेशा।निकट न आवै ताहि कलेशा।।

बंदी  पाठ  करें  सत  बारा । बंदी  पाश  दूर  हो  सारा।।

रामसागर बांधि हेतु भवानी।कीजे कृपा दास निज जानी।।


दोहा 

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मातु सूर्य कान्ति तव, अंधकार मम रूप।

डूबन से रक्षा कार्हु परूं न मैं भव कूप।।

बलबुद्धि विद्या देहु मोहि, सुनहु सरस्वती मातु।

रामसागर अधम को आश्रय तू ही दे दातु।।


माँ सरस्वती वंदना

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वर दे, वीणावादिनि वर दे !

प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव

        भारत में भर दे !


काट अंध-उर के बंधन-स्तर

बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर;

कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर

        जगमग जग कर दे !


नव गति, नव लय, ताल-छंद नव

नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव;

नव नभ के नव विहग-वृंद को

        नव पर, नव स्वर दे !


वर दे, वीणावादिनि वर दे।


कुछ क्षेत्रों में देवी की पूजा कर प्रतिमा को विसर्जित भी किया जाता है। विद्यार्थी मां सरस्वती की पूजा कर गरीब बच्चों में कलम व पुस्तकों का दान करें। संगीत से जुड़े व्यक्ति अपने साज पर तिलक लगा कर मां की आराधना करें व मां को बांसुरी भेंट करें।


पूजा समय

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पंचमी तिथि आरंभ👉  16/फरवरी/2021 को 03.36 बजे प्रातः  से


पंचमी तिथि समाप्त👉 17/फरवरी/2021 को 05.46  प्रातः बजे तक


सरस्वती पूजा का मुहूर्त सुबह 07:06 से मध्यान 12:53 तक का है और इस मुहूर्त की अवधि 5 घंटे 46 मिनट तक रहेगी दोपहर तक इस पूजन को क‍िया जा सकता है। बसंत पंचमी के पूरे दिन आप अपने किसी भी नए कार्य का आरम्भ कर सकते हैं ये एक स्वयं सिद्ध और श्रेष्ठ मुहूर्त होता है।


सरस्वती स्तोत्रम्

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श्वेतपद्मासना देवि श्वेतपुष्पोपशोभिता। 


श्वेताम्बरधरा नित्या श्वेतगन्धानुलेपना॥ 


श्वेताक्षी शुक्लवस्रा च श्वेतचन्दन चर्चिता। 


वरदा सिद्धगन्धर्वैर्ऋषिभिः स्तुत्यते सदा॥  


स्तोत्रेणानेन तां देवीं जगद्धात्रीं सरस्वतीम्। 


ये स्तुवन्ति त्रिकालेषु सर्वविद्दां लभन्ति ते॥ 


या देवी स्तूत्यते नित्यं ब्रह्मेन्द्रसुरकिन्नरैः। 


सा ममेवास्तु जिव्हाग्रे पद्महस्ता सरस्वती॥ 

॥इति श्रीसरस्वतीस्तोत्रं संपूर्णम्॥ 


बसन्त पंचमी कथा

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सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने जीवों, खासतौर पर मनुष्य योनि की रचना की। अपनी सर्जना से वे संतुष्ट नहीं थे। उन्हें लगता था कि कुछ कमी रह गई है जिसके कारण चारों ओर मौन छाया रहता है। विष्णु से अनुमति लेकर ब्रह्मा ने अपने कमण्डल से जल छिड़का, पृथ्वी पर जलकण बिखरते ही उसमें कंपन होने लगा। इसके बाद वृक्षों के बीच से एक अद्भुत शक्ति का प्राकट्य हुआ। यह प्राकट्य एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री का था जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया। पवन चलने से सरसराहट होने लगी। तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा। सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं। बसन्त पंचमी के दिन को इनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं। ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है-


प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु।


अर्थात ये परम चेतना हैं। सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। हममें जो आचार और मेधा है उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं। इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है। पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण ने सरस्वती से ख़ुश होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी और यूं भारत के कई हिस्सों में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी जो कि आज तक जारी है।


गुरुवार, 4 फ़रवरी 2021

ऋणमोचक मंगल स्तोत्र

 ऋणमोचक मंगल स्तोत्र ::-



यदि आपके ऊपर ऋण वा कर्ज का बोझ अधिक बढ़ गया है और आप उस कर्ज को चाह कर भी नहीं उतार पा रहे है तब यदि आप ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का नियमित पाठ करते है तो निश्चित ही धीरे धीरे आपका ऋण उतर जाएगा। जैसा की आप जानते है मंगल का सम्बन्ध हनुमानजी से है और हनुमानजी सर्वबाधामुक्ति प्रदाता है यह श्लोक भी हनुमान जी की ही आराधना के रूप में प्रतिष्ठित है।


*कैसे आरम्भ करे ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का पाठ*


इस पाठ को प्रारम्भ करने के लिए सर्वप्रथम आपको किसी शुभ तिथि का चयन भारतीय पञ्चाङ्गानुसार कर लेना चाहिए। यह पाठ मंगलवार को ही शुरू करना चाहिए अन्य दिन को नही। इस पाठ को करने से पूर्व लाल वस्त्र बिछाकर मंगल यन्त्र व महावीर हनुमान जी को स्थापित करना चाहिए , सिंदूर व चमेली के तेल का चोला अर्पित कर अपने बाये हाथ की तरफ देशी घी का दीप व दाहिने हाथ की तरफ तिल के तेल का दीप स्थापित करना चाहिए। इसके बाद हनुमान जी को गुड़, चने व बेसन का भोग लगाना चाहिए।

मंगल देव (मंगल यन्त्र को प्राण प्रतिष्ठित कर) व हनुमान जी के सामने ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का पाठ, लाल वस्त्र धारण कर के हीआरम्भ करना चाहिए। यह पाठ अपनी श्रद्धा अनुसार 1, 3, 5, 9 , अथवा 11 पाठ 43 दिन तक नित्य करना चाहिए | इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से निश्चित ही कर्ज, ऋण व आर्थिक बाधा से मुक्ति मिलती है |


*ऋणमोचक मंगल स्तोत्र*


मङ्गलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रदः।

स्थिरासनो महाकयः सर्वकर्मविरोधकः ॥1॥


लोहितो लोहिताक्षश्च सामगानां कृपाकरः।

धरात्मजः कुजो भौमो भूतिदो भूमिनन्दनः॥2॥


अङ्गारको यमश्चैव सर्वरोगापहारकः।

व्रुष्टेः कर्ताऽपहर्ता च सर्वकामफलप्रदः॥3॥


एतानि कुजनामनि नित्यं यः श्रद्धया पठेत्।

ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्नुयात्॥4॥


धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम्।

कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम्॥5॥


स्तोत्रमङ्गारकस्यैतत्पठनीयं सदा नृभिः।

न तेषां भौमजा पीडा स्वल्पाऽपि भवति क्वचित्॥6॥


अङ्गारक महाभाग भगवन्भक्तवत्सल।

त्वां नमामि ममाशेषमृणमाशु विनाशय॥7॥


ऋणरोगादिदारिद्रयं ये चान्ये ह्यपमृत्यवः।

भयक्लेशमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा॥ 8 ||


अतिवक्त्र दुरारार्ध्य भोगमुक्त जितात्मनः।

तुष्टो ददासि साम्राज्यं रुश्टो हरसि तत्ख्शणात्॥9॥


विरिंचिशक्रविष्णूनां मनुष्याणां तु का कथा।

तेन त्वं सर्वसत्त्वेन ग्रहराजो महाबलः॥10॥


पुत्रान्देहि धनं देहि त्वामस्मि शरणं गतः।

ऋणदारिद्रयदुःखेन शत्रूणां च भयात्ततः॥11॥


एभिर्द्वादशभिः श्लोकैर्यः स्तौति च धरासुतम्।

महतिं श्रियमाप्नोति ह्यपरो धनदो युवा॥12॥


|| इति श्री ऋणमोचक मङ्गलस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ||

पितृपक्ष में परान्न से बचें

 गरुड़ पुराणोक्त पितृपक्ष परान्न निषेध कथा सनातन धर्म में 16 दिनों का पितृपक्ष वर्ष का सबसे सूक्ष्म और संवेदनशील समय माना गया है। गरुड़ पुरा...