रविवार, 1 सितंबर 2019

गणेश चतुर्थी विशेष

श्री गणेश चतुर्थी एवं श्रीगणेश महोत्सव  2,  से 12 सितंबर 2019 विशेष

सभी सनातन धर्मावलंबी प्रति वर्ष गणपति की स्थापना तो करते है लेकिन हममे से बहुत ही कम लोग जानते है कि आखिर हम गणपति क्यों बिठाते हैं ? आइये जानते है।

हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार, महर्षि वेद व्यास ने महाभारत की रचना की है।
लेकिन लिखना उनके वश का नहीं था।
अतः उन्होंने श्री गणेश जी की आराधना की और गणपति जी से महाभारत लिखने की प्रार्थना की।

गणपती जी ने सहमति दी और दिन-रात लेखन कार्य प्रारम्भ हुआ और इस कारण गणेश जी को थकान तो होनी ही थी, लेकिन उन्हें पानी पीना भी वर्जित था। अतः गणपती जी के शरीर का तापमान बढ़े नहीं, इसलिए वेदव्यास ने उनके शरीर पर मिट्टी का लेप किया और भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गणेश जी की पूजा की। मिट्टी का लेप सूखने पर गणेश जी के शरीर में अकड़न आ गई, इसी कारण गणेश जी का एक नाम पर्थिव गणेश भी पड़ा। महाभारत का लेखन कार्य 10 दिनों तक चला। अनंत चतुर्दशी को लेखन कार्य संपन्न हुआ।
वेदव्यास ने देखा कि, गणपती का शारीरिक तापमान फिर भी बहुत बढ़ा हुआ है और उनके शरीर पर लेप की गई मिट्टी सूखकर झड़ रही है, तो वेदव्यास ने उन्हें पानी में डाल दिया। इन दस दिनों में वेदव्यास ने गणेश जी को खाने के लिए विभिन्न पदार्थ दिए। तभी से गणपती बैठाने की प्रथा चल पड़ी। इन दस दिनों में इसीलिए गणेश जी को पसंद विभिन्न भोजन अर्पित किए जाते हैं।

गणेश चतुर्थी को कुछ स्थानों पर डंडा चौथ के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि गुरु शिष्य परंपरा के तहत इसी दिन से विद्याध्ययन का शुभारंभ होता था। इस दिन बच्चे डण्डे बजाकर खेलते भी हैं। गणेश जी को ऋद्धि-सिद्धि व बुद्धि का दाता भी माना जाता है। इसी कारण कुछ क्षेत्रों में इसे डण्डा चौथ भी कहते हैं।

‬पार्थिव श्रीगणेश पूजन का महत्त्व

अलग अलग कामनाओ की पूर्ति के लिए अलग अलग द्रव्यों से बने हुए गणपति की स्थापना की जाती हैं।

(1) श्री गणेश👉 मिट्टी के पार्थिव श्री गणेश बनाकर पूजन करने से सर्व कार्य सिद्धि होती हे!                       

(2) हेरम्ब👉 गुड़ के गणेश जी बनाकर पूजन करने से लक्ष्मी प्राप्ति होती हे।
                                       
(3) वाक्पति👉 भोजपत्र पर केसर से पर श्री गणेश प्रतिमा चित्र बनाकर।  पूजन करने से विद्या प्राप्ति होती हे।

 (4) उच्चिष्ठ गणेश👉 लाख के श्री गणेश बनाकर पूजन करने से स्त्री।  सुख और स्त्री को पतिसुख प्राप्त होता हे घर में ग्रह क्लेश निवारण होता हे।

(5) कलहप्रिय👉 नमक की डली या। नमक  के श्री गणेश बनाकर पूजन करने से शत्रुओ में क्षोभ उतपन्न होता हे वह आपस ने ही झगड़ने लगते हे।

(6) गोबरगणेश👉 गोबर के श्री गणेश बनाकर पूजन करने से पशुधन में व्रद्धि होती हे और पशुओ की बीमारिया नष्ट होती है (गोबर केवल गौ माता का ही हो)।
                         
(7) श्वेतार्क श्री गणेश👉 सफेद आक मन्दार की जड़ के श्री गणेश जी बनाकर पूजन करने से भूमि लाभ भवन लाभ होता हे।
                     
(8) शत्रुंजय👉 कडूए नीम की की लकड़ी से गणेश जी बनाकर पूजन करने से शत्रुनाश होता हे और युद्ध में विजय होती हे।
                         
(9) हरिद्रा गणेश👉 हल्दी की जड़ से या आटे में हल्दी मिलाकर श्री गणेश प्रतिमा बनाकर पूजन करने से विवाह में आने वाली हर बाधा नष्ठ होती हे और स्तम्भन होता हे।

(10) सन्तान गणेश👉 मक्खन के श्री गणेश जी बनाकर पूजन से सन्तान प्राप्ति के योग निर्मित होते हैं।

(11) धान्यगणेश👉 सप्तधान्य को पीसकर उनके श्रीगणेश जी बनाकर आराधना करने से धान्य व्रद्धि होती हे अन्नपूर्णा माँ प्रसन्न होती हैं।   

(12) महागणेश👉 लाल चन्दन की लकड़ी से दशभुजा वाले श्री गणेश जी प्रतिमा निर्माण कर के पूजन से राज राजेश्वरी श्री आद्याकालीका की शरणागति प्राप्त होती हैं।

गणेश चतुर्थी पूजन

चतुर्थी तिथि 2 सितंबर 2019 04 बजकर 56 मिनट पर आरंभ होकर 3 सितंबर के दिन 01:53 तक रहेगी।

पूजन मुहूर्त

गणपति स्वयं ही मुहूर्त है। सभी प्रकार के विघ्नहर्ता है इसलिए गणेशोत्सव गणपति स्थापन के दिन दिनभर कभी भी स्थापन कर सकते है। सकाम भाव से पूजा के लिए नियम की आवश्यकता पड़ती है इसमें प्रथम नियम मुहूर्त अनुसार कार्य करना है।

मुहूर्त अनुसार गणेश चतुर्थी के दिन गणपति की पूजा दोपहर के समय करना अधिक शुभ माना जाता है, क्योंकि मान्यता है कि भाद्रपद महीने के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को मध्याह्न के समय गणेश जी का जन्म हुआ था। मध्याह्न यानी दिन का दूसरा प्रहर जो कि सूर्योदय के लगभग 3 घंटे बाद शुरू होता है और लगभग दोपहर 12 से 12:30 तक रहता है। गणेश चतुर्थी पर मध्याह्न काल में अभिजित मुहूर्त के संयोग पर गणेश भगवान की मूर्ति की स्थापना करना अत्यंतशुभ माना जाता है।

पंचांग के अनुसार अभिजित मुहूर्त सुबह लगभग 11.55 से दोपहर 12.45 तक रहेगा। इस समय के बीच श्रीगणेश पूजा आरम्भ कर देनी चाहिये।

पूजा की सामग्री
〰〰〰〰〰
गणेश जी की पूजा करने के लिए चौकी या पाटा, जल कलश, लाल कपड़ा, पंचामृत, रोली, मोली, लाल चन्दन, जनेऊ गंगाजल, सिन्दूर चांदी का वर्क लाल फूल या माला इत्र मोदक या लडडू धानी सुपारी लौंग, इलायची नारियल फल दूर्वा, दूब पंचमेवा घी का दीपक धूप, अगरबत्ती और कपूर की आवस्यकता होती है।

सामान्य पूजा विधि
〰〰〰〰〰〰
सकाम पूजा के लिये स्थापना से पहले संकल्प भी अत्यंत जरूरी है। यहाँ हम संक्षिप्त विधि बता रहे है गणेश पूजन की विस्तृत विधि हमारी अगली पोस्ट ने देख सकते है।

संकल्प विधि
〰〰〰〰
हाथ में पान के पत्ते पर पुष्प, चावल और सिक्का रखकर सभी भगवान को याद करें। अपना नाम, पिता का नाम, पता और गोत्र आदि बोलकर गणपति भगवान को घर पर पधारने का निवेदन करें और उनका सेवाभाव से स्वागत सत्कार करने का संकल्प लें।

भगवान गणेश की पूजा करने लिए सबसे पहले सुबह नहा धोकर शुद्ध लाल रंग के कपड़े पहने। क्योकि गणेश जी को लाल रंग प्रिय है। पूजा करते समय आपका मुंह पूर्व दिशा में या उत्तर दिशा में होना चाहिए। सबसे पहले गणेश जी को पंचामृत से स्नान कराएं। उसके बाद गंगा जल से स्नान कराएं। गणेश जी को चौकी पर लाल कपड़े पर बिठाएं। ऋद्धि-सिद्धि के रूप में दो सुपारी रखें। गणेश जी को सिन्दूर लगाकर चांदी का वर्क लगाएं। लाल चन्दन का टीका लगाएं। अक्षत (चावल) लगाएं। मौली और जनेऊ अर्पित करें। लाल रंग के पुष्प या माला आदि अर्पित करें। इत्र अर्पित करें। दूर्वा अर्पित करें। नारियल चढ़ाएं। पंचमेवा चढ़ाएं। फल अर्पित करें। मोदक और लडडू आदि का भोग लगाएं। लौंग इलायची अर्पित करें। दीपक, अगरबत्ती, धूप आदि जलाएं इससे गणेश जी प्रसन्न होते हैं। गणेश जी की प्रतिमा के सामने  प्रतिदिन गणपति अथर्वशीर्ष व संकट नाशन गणेश आदि स्तोत्रों का पाठ करे।

यह मंत्र उच्चारित करें
〰〰〰〰〰〰
ऊँ वक्रतुण्ड़ महाकाय सूर्य कोटि समप्रभः।
निर्विघ्नं कुरू मे देव, सर्व कार्येषु सर्वदा।।

कपूर जलाकर आरती करें
〰〰〰〰〰〰〰〰
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती पिता महादेवा।। जय गणेश जय गणेश…
एक दन्त दयावंत चार भुजाधारी। माथे सिन्दूर सोहे मूष की सवारी।। जय गणेश जय गणेश…
अंधन को आँख देत कोढ़िन को काया। बाँझन को पुत्र देत निर्धन को माया।। जय गणेश जय गणेश…
हार चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा। लडूवन का भोग लगे संत करे सेवा।। जय गणेश जय गणेश…
दीनन की लाज राखी शम्भु सुतवारी। कामना को पूरा करो जग बलिहारी।। जय गणेश जय गणेश…

चतुर्थी,चंद्रदर्शन और कलंक पौराणिक मान्यता
〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰
2 तारीख को यानी गणेश चतुर्थी के दिन भूलकर भी चंद्र दर्शन न करें वर्ना आपके उपर बड़ा कलंक लग सकता है।
इसके पीछे एक पौराणिक कथा का दृष्टांत है।

एक दिन गणपति चूहे की सवारी करते हुए गिर पड़े तो चंद्र ने उन्हें देख लिया और हंसने लगे। चंद्रमा को हंसी उड़ाते देख गणपति को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने चंद्र को श्राप दिया कि अब से तुम्हें कोई देखना पसंद नहीं करेगा। जो तुम्हे देखेगा वह कलंकित हो जाएगा। इस श्राप से चंद्र बहुुत दुखी हो गए। तब सभी देवताओं ने गणपति की साथ मिलकर पूजा अर्चना कर उनका आवाह्न किया तो गणपति ने प्रसन्न होकर उनसे वरदान मांगने को कहा। तब देवताओं ने विनती की कि आप गणेश को श्राप मुक्त कर दो। तब गणपति ने कहा कि मैं अपना श्राप तो वापस नहीं ले सकता लेकिन इसमें कुछ बदलाव जरूर कर सकता हूं। भगवान गणेश ने कहा कि चंद्र का ये श्राप सिर्फ एक ही दिन मान्य रहेगा। इसलिए चतुर्थी के दिन यदि अनजाने में चंद्र के दर्शन हो भी जाएं तो इससे बचने के लिए छोटा सा कंकर या पत्थर का टुकड़ा लेकर किसी की छत पर फेंके। ऐसा करने से चंद्र दर्शन से लगने वाले कलंक से बचाव हो सकता है। इसलिए इस चतुर्थी को पत्थर चौथ भी कहते है।

भाद्रपद (भादव ) मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी के चन्द्रमा के दर्शन हो जाने से कलंक लगता है। अर्थात् अपकीर्ति होती है। भगवान् श्रीकृष्ण को सत्राजित् ने स्यमन्तक मणि की चोरी लगायी थी।

स्वयं रुक्मिणीपति ने इसे “मिथ्याभिशाप”-भागवत-१०/५६/३१, कहकर मिथ्या कलंक का ही संकेत दिया है। और देवर्षि नारद भी कहते हैं कि –

आपने भाद्रपद के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि के चन्द्रमा का दर्शन किया था जिसके फलस्वरूप आपको व्यर्थ ही कलंक लगा –

त्वया भाद्रपदे शुक्लचतुर्थ्यां चन्द्रदर्शनम् ।
कृतं येनेह भगवन् वृथा शापमवाप्तवान् ।।
–भागवतकी श्रीधरी पर वंशीधरी टीका,स्कन्दपुराण का श्लोक ।

तात्पर्य यह कि भादंव मास की शुक्लचतुर्थी के चन्द्रदर्शन से लगे कलंक का सत्यता से सम्बन्ध हो ही –ऐसा कोई नियम नहीं । किन्तु इसका दर्शन त्याज्य है । तभी तो पूज्यपाद गोस्वामी जी लिखते हैं —

“तजउ चउथि के चंद नाई”-मानस. सुन्दरकाण्ड,३८/६,

स्कन्दमहापुराण में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है कि भादव के शुक्लपक्ष के चन्द्र का दर्शन मैंने गोखुर के जल में किया जिसका परिणाम मुझे मणि की चोरी का कलंक लगा –

मया भाद्रपदे शुक्लचतुर्थ्याम् चन्द्रदर्शनम् ।
गोष्पदाम्बुनि वै राजन् कृतं दिवमपश्यता ।।
यदि भादव के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी का चंद्रमा दिख जाय तो कलंक से कैसे छूटें ?

१-यदि उसके पहले द्वितीया का चंद्र्मा आपने देख लिया है तो चतुर्थी का चन्द्र आपका बाल भी बांका नहीं कर सकता।

२- या भागवत की स्यमन्तक मणि की कथा सुन लीजिए ।

३-अथवा निम्नलिखित मन्त्र का २१ बार जप करलें –

सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः ।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः ।।

४-यदि आप इन उपायों में कोई भी नहीं कर सकते हैं तो एक सरल उपाय बता रहा हूँ उसे सब लोग कर सकते हैं । एक लड्डू किसी भी पड़ोसी के घर पर फेंक दे ।

चंद्र दर्शन से बचने का समय- 08:55 से 21:05 (2 सितंबर 2019)

राशि के अनुसार करें गणेश जी का पूजन
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
गणेशचतुर्थी के दिन सभी लोग को अपने सामर्थ्य एवं श्रद्धा से गणेश जी की पूजा अर्चना करते है। फिर भी राशि स्वामी के अनुसार यदि विशेष पूजन किया जाए तो विशेष लाभ भी प्राप्त होगा।

👉 यदि आपकी राशि मेष एवं बृश्चिक हो तो आप अपने राशि स्वामी का ध्यान करते हुए लड्डु का विशेष भोग लगावें आपके सामथ्र्य का विकास हो सकता है।

👉 आपकी राशि बृष एवं तुला है तो आप भगवान गणेश को लड्डुओं का भोग विशेष रूप से लगावें आपको ऐश्वर्य की प्राप्ति हो सकती है।

👉 मिथुन एवं कन्या राशि वालो को गणेश जी को पान अवश्य अर्पित करना चाहिए इससे आपको विद्या एवं बुद्धि की प्राप्ति होगी।

👉 धनु एवं सिंह राशि वालों को फल का भोग अवश्य लगाना चाहिए ताकि आपको जीवन में सुख, सुविधा एवं आनन्द की प्राप्ति हो सके।

👉 यदि आपकी राशि मकर एवं कुंभ है तो आप सुखे मेवे का भोग लगाये। जिससे आप अपने कर्म के क्षेत्र में तरक्की कर सकें।

👉 सिंह राशि वालों को केले का विशेष भोग लगाना चाहिए जिससे जीवन में तीव्र गति से आगे बढ़ सकें।

👉यदि आपकी राशि कर्क है तो आप
खील एवं धान के लावा और बताशे का भोग लगाए जिससे आपका जीवन सुख-शांति से भरपूर हो

गणेश महोत्सव की तिथियां
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
1- गणेश चतुर्थी व्रत- 2 सितम्बर - सोमवार

2- ऋषि पंचमी- 3 सितम्बर - मंगलवार

3- मोरछठ-चम्पा सूर्य षष्ठी - 4 सितम्बर - बुधवार

4- संतान सप्तमी - 5 सितम्बर - गुरुवार

5- राधाष्टमी - 6 सितम्बर - शुक्रवार

6- मूल दिनरात, श्री हरी जयंती - 7 सितंबर - शनिवार

7- सुंगध धुप दशमी, रामदेव जयंती - 8 सितंबर - रविवार

8- पदमा डोल ग्यारस - 9 सितम्बर - सोमवार

9- भुवनेश्वरी जयंती, श्री वामन जंयती -

10 सितम्बर - मंगलवार प्रदोष व्रत -

11 सितंबर - बुधवार अनंत चतुथदर्शी -

12 सितम्बर - गुरुवार विसर्जन

मंगलवार, 13 अगस्त 2019

भोजन के बाद कतई न करें ये काम

व्यायामं च व्यवायं च धावनं पानमेव च।युद्धं गीतं च पाठं च मुहुर्तं भुक्तवाँस्त्यजेत्।।
भोजन के पश्चात एक मुहुर्तभर ( लगभग पौन घंटा) व्यायाम, मैथुन, दौड़ना, जलपान, मल्लयुद्ध  ,गाना और पढना आदि कर्म नही करना चाहिए ।
भोजनोपरान्त लगभग एक घण्टे की समयावधि मे किसी भी प्रकार का शारीरिक या मानसिक श्रम पाचन प्रक्रिया में बाधा डालता है ।

रविवार, 11 अगस्त 2019

पुत्रदा एकादशी

*पुत्रदा एकादशी व्रत कथा*
 
युधिष्ठिर ने पूछा : मधुसूदन ! श्रावण के शुक्लपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है ? कृपया मेरे सामने उसका वर्णन कीजिये ।

भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! प्राचीन काल की बात है । द्वापर युग के प्रारम्भ का समय था । माहिष्मतीपुर में राजा महीजित अपने राज्य का पालन करते थे किन्तु उन्हें कोई पुत्र नहीं था, इसलिए वह राज्य उन्हें सुखदायक नहीं प्रतीत होता था । अपनी अवस्था अधिक देख राजा को बड़ी चिन्ता हुई । उन्होंने प्रजावर्ग में बैठकर इस प्रकार कहा: ‘प्रजाजनो ! इस जन्म में मुझसे कोई पातक नहीं हुआ है । मैंने अपने खजाने में अन्याय से कमाया हुआ धन नहीं जमा किया है । ब्राह्मणों और देवताओं का धन भी मैंने कभी नहीं लिया है । पुत्रवत् प्रजा का पालन किया है । धर्म से पृथ्वी पर अधिकार जमाया है । दुष्टों को, चाहे वे बन्धु और पुत्रों के समान ही क्यों न रहे हों, दण्ड दिया है । शिष्ट पुरुषों का सदा सम्मान किया है और किसीको द्वेष का पात्र नहीं समझा है । फिर क्या कारण है, जो मेरे घर में आज तक पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ? आप लोग इसका विचार करें ।’

राजा के ये वचन सुनकर प्रजा और पुरोहितों के साथ ब्राह्मणों ने उनके हित का विचार करके गहन वन में प्रवेश किया । राजा का कल्याण चाहनेवाले वे सभी लोग इधर उधर घूमकर ॠषिसेवित आश्रमों की तलाश करने लगे । इतने में उन्हें मुनिश्रेष्ठ लोमशजी के दर्शन हुए ।

लोमशजी धर्म के त्तत्त्वज्ञ, सम्पूर्ण शास्त्रों के विशिष्ट विद्वान, दीर्घायु और महात्मा हैं । उनका शरीर लोम से भरा हुआ है । वे ब्रह्माजी के समान तेजस्वी हैं । एक एक कल्प बीतने पर उनके शरीर का एक एक लोम विशीर्ण होता है, टूटकर गिरता है, इसीलिए उनका नाम लोमश हुआ है । वे महामुनि तीनों कालों की बातें जानते हैं ।

उन्हें देखकर सब लोगों को बड़ा हर्ष हुआ । लोगों को अपने निकट आया देख लोमशजी ने पूछा : ‘तुम सब लोग किसलिए यहाँ आये हो? अपने आगमन का कारण बताओ । तुम लोगों के लिए जो हितकर कार्य होगा, उसे मैं अवश्य करुँगा ।’

प्रजाजनों ने कहा : ब्रह्मन् ! इस समय महीजित नामवाले जो राजा हैं, उन्हें कोई पुत्र नहीं है । हम लोग उन्हींकी प्रजा हैं, जिनका उन्होंने पुत्र की भाँति पालन किया है । उन्हें पुत्रहीन देख, उनके दु:ख से दु:खित हो हम तपस्या करने का दृढ़ निश्चय करके यहाँ आये है । द्विजोत्तम ! राजा के भाग्य से इस समय हमें आपका दर्शन मिल गया है । महापुरुषों के दर्शन से ही मनुष्यों के सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं । मुने ! अब हमें उस उपाय का उपदेश कीजिये, जिससे राजा को पुत्र की प्राप्ति हो ।


उनकी बात सुनकर महर्षि लोमश दो घड़ी के लिए ध्यानमग्न हो गये । तत्पश्चात् राजा के प्राचीन जन्म का वृत्तान्त जानकर उन्होंने कहा : ‘प्रजावृन्द ! सुनो । राजा महीजित पूर्वजन्म में मनुष्यों को चूसनेवाला धनहीन वैश्य था । वह वैश्य गाँव-गाँव घूमकर व्यापार किया करता था । एक दिन ज्येष्ठ के शुक्लपक्ष में दशमी तिथि को, जब दोपहर का सूर्य तप रहा था, वह किसी गाँव की सीमा में एक जलाशय पर पहुँचा । पानी से भरी हुई बावली देखकर वैश्य ने वहाँ जल पीने का विचार किया । इतने में वहाँ अपने बछड़े के साथ एक गौ भी आ पहुँची । वह प्यास से व्याकुल और ताप से पीड़ित थी, अत: बावली में जाकर जल पीने लगी । वैश्य ने पानी पीती हुई गाय को हाँककर दूर हटा दिया और स्वयं पानी पीने लगा । उसी पापकर्म के कारण राजा इस समय पुत्रहीन हुए हैं । किसी जन्म के पुण्य से इन्हें निष्कण्टक राज्य की प्राप्ति हुई है ।’

प्रजाजनों ने कहा : मुने ! पुराणों में उल्लेख है कि प्रायश्चितरुप पुण्य से पाप नष्ट होते हैं, अत: ऐसे पुण्यकर्म का उपदेश कीजिये, जिससे उस पाप का नाश हो जाय ।

लोमशजी बोले : प्रजाजनो ! श्रावण मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी होती है, वह ‘पुत्रदा’ के नाम से विख्यात है । वह मनोवांछित फल प्रदान करनेवाली है । तुम लोग उसीका व्रत करो ।

यह सुनकर प्रजाजनों ने मुनि को नमस्कार किया और नगर में आकर विधिपूर्वक ‘पुत्रदा एकादशी’ के व्रत का अनुष्ठान किया । उन्होंने विधिपूर्वक जागरण भी किया और उसका निर्मल पुण्य राजा को अर्पण कर दिया । तत्पश्चात् रानी ने गर्भधारण किया और प्रसव का समय आने पर बलवान पुत्र को जन्म दिया ।

इसका माहात्म्य सुनकर मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है तथा इहलोक में सुख पाकर परलोक में स्वर्गीय गति को प्राप्त होता है ।

शनिवार, 3 अगस्त 2019

यक्ष - युधिष्ठिर संवाद

कुल सौ प्रश्न किए थे यक्ष ने युधिष्ठिर से, लेकिन क्या आप इन प्रश्नों के जवाब जानते हैं?

यह तब की बात है जब पाण्डव अपने तेरह वर्ष के अज्ञातवास पर थे, और इस दौरान वे घने जंगलों में वास कर रहे थे। सभी भाई पेड़ की छाया में बैठकर विश्राम कर रहे थे कि अचानक हैरान और परेशान एक मुनि उनके पास पहुंचे। उन्होंने बताया कि एक हिरण उनके हाथों से यज्ञ की लकड़ी लेकर भाग गया, उन्हें वह वापस चाहिए।

पांचों भाइयों ने मुनि की सहायता करने हेतु उस हिरण की खोज आरंभ कर दी। खोज करते हुए वे सभी काफी आगे निकल गए, गर्मी का समय था तो वे काफी थक भी गए। अब उन्हें इस तपती गर्मी में अपनी प्यास बुझाने के लिए पानी चाहिए था, लेकिन दूर-दूर तक उन्हें कोई जलाशय ना दिखा।

अंतत: पानी खोजने का काम सबसे छोटे भाई सहदेव को सौंपा गया। कुछ दूर चलने पर सहदेव को एक जलाशय दिखाई दिया। वह वहां पहुंचा और उसने देखा कि जलाशय में बेहद ठंडा पानी है, पानी साथ ले जाने की बजाय सबसे पहले अपनी प्यास बुझाने के लिए सहदेव पानी पीने के लिए जैसे ही आगे बढ़ा तो एक आवाज़ सुनाई दी।

यह आवाज़ अदृश्य यक्ष की थी जो चाहता था कि सहदेव पहले उसके प्रश्नों का उत्तर दे और फिर पानी पीये। लेकिन सहदेव ने यक्ष की एक ना सुनी और जैसे ही पानी अपने होठों से लगाया वह चक्कर खाकर गिर गया। यक्ष ने उसे मूर्छित कर दिया....

जब काफी देर तक सहदेव ना लौटा तो अन्य भाईयों को चिंता होने लगी। फिर एक-एक करके क्रमानुसार नकुल, अर्जुन और भीम सभी उस जलाशय पर पहुंचे और यक्ष की चेतावनी सुने बिना पानी पी लिया और बदले में यक्ष ने उन्हें मूर्छित कर दिया।

अब बचे थे युधिष्ठिर... सभी भाई कब से निकले थे लेकिन वापस ना लौटे। अब आखिरकार युधिष्ठिर ने सबको खोजने का फैसला किया और निकल पड़े। जब वे जलाशय के पास पहुंचे तो उन्होंने देखा कि उनके चारो भाई जमीन पर गिरे हुए हैं, लेकिन क्यों, इस बात से अनजान थे युधिष्ठिर।

उन्होंने अपने सामने शीतल जल का जलाशय देखा, और कुछ भी अन्य करने से पहले अपनी प्यास बुझाने के लिए जैसे ही आगे बढ़े तो उन्हें एक आवाज़ सुनाई दी। यक्ष ने उन्हें चेतावनी दी कि वे पहले उसके प्रश्नों का उत्तर दें, तभी वह उन्हें पानी पीने देगा।

कुछ धैर्य दिखाते हुए युधिष्ठिर मान गए और कहा कि पूछो तुम्हें क्या पूछना है। युधिष्ठिर के आग्रह पर यक्ष ने उनसे कुल सौ सवाल पूछे लेकिन यहां हम आपके सामने कुछ गिने-चुने सवाल रखने जा रहे हैं। साथ ही जानिए इन सवालों पर युधिष्ठिर का क्या जवाब था....

यक्ष ने अपना पहला सवाल किया... उसने युधिष्ठिर से पूछा कि कौन हूं मैं?

 जिस पर जवाब आया कि ‘तुम न शरीर हो, न इन्द्रियां, न मन, न बुद्धि। तुम शुद्ध चेतना हो, वह चेतना जो सर्वसाक्षी है।

अगला प्रश्न... यक्ष - जीवन का उद्देश्य क्या है?

 युधिष्ठिर - जीवन का उद्देश्य उसी चेतना को जानना है जो जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है। उसे जानना ही मोक्ष है।

यक्ष - जन्म का कारण क्या है?

 युधिष्ठिर - अतृप्त वासनाएं, कामनाएं और कर्मफल ये ही जन्म का कारण हैं। फिर अगला प्रश्न... यक्ष - जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त कौन है? युधिष्ठिर - जिसने स्वयं को, उस आत्मा को जान लिया वह जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है।

इन सवालों के बाद भी यक्ष नहीं रुके, वे एक के बाद एक सवाल करते रहे, तब तक जब तक आगे से कोई जवाब ना आए। उनका अगला सवाल था कि वासना और जन्म का सम्बन्ध क्या है?

जिस पर जवाब आया कि ‘जैसी वासनाएं वैसा ही जन्म होता है। यदि वासनाएं पशु जैसी तो पशु योनि में जन्म। यदि वासनाएं मनुष्य जैसी तो मनुष्य योनि में जन्म’।

यक्ष – संसार में दुःख क्यों है?

 युधिष्ठिर – लालच, स्वार्थ, भय संसार के दुःख का कारण हैं।

 यक्ष – तो फिर ईश्वर ने दुःख की रचना क्यों की?

युधिष्ठिर – ईश्वर ने संसार की रचना की और मनुष्य ने अपने विचार और कर्मों से दुःख और सुख की रचना की।

यक्ष – क्या ईश्वर है? कौन है वह? क्या रूप है उसका? क्या वह स्त्री है या पुरुष?

युधिष्ठिर – हे यक्ष! कारण के बिना कार्य नहीं। यह संसार उस कारण के अस्तित्व का प्रमाण है। तुम हो इसलिए वह भी है उस महान कारण को ही अध्यात्म में ईश्वर कहा गया है। वह न स्त्री है न पुरुष।

यक्ष – उसका स्वरूप क्या है?

युधिष्ठिर – वह सत्-चित्-आनन्द है, वह अनाकार ही सभी रूपों में अपने आप को स्वयं को व्यक्त करता है।

 यक्ष – वह अनाकार स्वयं करता क्या है?

 युधिष्ठिर – वह ईश्वर संसार की रचना, पालन और संहार करता है।ईश्वर की रचना किसने की?

यक्ष – यदि ईश्वर ने संसार की रचना की तो फिर ईश्वर की रचना किसने की?

 युधिष्ठिर – वह अजन्मा अमृत और अकारण है।

यक्ष – भाग्य क्या है?

 युधिष्ठिर – हर क्रिया, हर कार्य का एक परिणाम है। परिणाम अच्छा भी हो सकता है, बुरा भी हो सकता है। यह परिणाम ही भाग्य है। आज का प्रयत्न कल का भाग्य है।

यक्ष – सुख और शान्ति का रहस्य क्या है?

 युधिष्ठिर – सत्य, सदाचार, प्रेम और क्षमा सुख का कारण हैं। असत्य, अनाचार, घृणा और क्रोध का त्याग शान्ति का मार्ग है।

यक्ष – चित्त पर नियंत्रण कैसे संभव है?

 युधिष्ठिर – इच्छाएं, कामनाएं चित्त में उद्वेग उत्पन्न करती हैं। इच्छाओं पर विजय चित्त पर विजय है।

यक्ष – सच्चा प्रेम क्या है?

 युधिष्ठिर – स्वयं को सभी में देखना सच्चा प्रेम है। स्वयं को सर्वव्याप्त देखना सच्चा प्रेम है। स्वयं को सभी के साथ एक देखना सच्चा प्रेम है।

यक्ष – तो फिर मनुष्य सभी से प्रेम क्यों नहीं करता?

युधिष्ठिर – जो स्वयं को सभी में नहीं देख सकता वह सभी से प्रेम नहीं कर सकता।

 यक्ष – आसक्ति क्या है?

युधिष्ठिर – प्रेम में मांग, अपेक्षा, अधिकार आसक्ति है।

यक्ष – बुद्धिमान कौन है?

युधिष्ठिर – जिसके पास विवेक है।

यक्ष – नशा क्या है?

युधिष्ठिर – आसक्ति।

 यक्ष – चोर कौन है?

युधिष्ठिर – इन्द्रियों के आकर्षण, जो इन्द्रियों को हर लेते हैं चोर हैं।

यक्ष – जागते हुए भी कौन सोया हुआ है?

 युधिष्ठिर – जो आत्मा को नहीं जानता वह जागते हुए भी सोया है।

यक्ष – कमल के पत्ते में पड़े जल की तरह अस्थायी क्या है?

युधिष्ठिर – यौवन, धन और जीवन।

यक्ष – नरक क्या है?

 युधिष्ठिर – इन्द्रियों की दासता नरक है।

यक्ष – मुक्ति क्या है?

युधिष्ठिर – अनासक्ति ही मुक्ति है।

 यक्ष – दुर्भाग्य का कारण क्या है?

युधिष्ठिर – मद और अहंकार।

यक्ष – सौभाग्य का कारण क्या है?

युधिष्ठिर – सत्संग और सबके प्रति मैत्री भाव।

 यक्ष – सारे दुःखों का नाश कौन कर सकता है?

युधिष्ठिर – जो सब छोड़ने को तैयार हो।

यक्ष – मृत्यु के समान यातना कौन देता है?

 युधिष्ठिर – गुप्त रूप से किया गया अपराध।

 यक्ष – दिन-रात किस बात का विचार करना चाहिए?

 युधिष्ठिर – सांसारिक सुखों की क्षण-भंगुरता का।

यक्ष – संसार को कौन जीतता है?

युधिष्ठिर – जिसमें सत्य और श्रद्धा है।

यक्ष – भय से मुक्ति कैसे संभव है?

युधिष्ठिर – वैराग्य से।

यक्ष – मुक्त कौन है?

युधिष्ठिर – जो अज्ञान से परे है।

यक्ष – अज्ञान क्या है?

 युधिष्ठिर – आत्मज्ञान का अभाव अज्ञान है।

 यक्ष – दुःखों से मुक्त कौन है?

 युधिष्ठिर – जो कभी क्रोध नहीं करता।

 यक्ष – वह क्या है जो अस्तित्व में है और नहीं भी?

 युधिष्ठिर – माया।

यक्ष – माया क्या है?

युधिष्ठिर – नाम और रूपधारी नाशवान जगत।

 यक्ष – परम सत्य क्या है?

युधिष्ठिर – ब्रह्म।…!

फिर वापस जाग गए सभी भाई

युधिष्ठिर द्वारा जैसे ही सभी प्रश्नों का उत्तर दे दिया गया तब यक्ष ने उन्हें कहा कि वह उनके सभी भाईयों को जीवित कर देगा। और यह कहते हुए अन्य चार पांडव वापस जीवित हो गए।

गुरुवार, 25 जुलाई 2019

कभी भी भगवान शिव को ये 6 वस्तुएं नहीं चढ़ानी चाहिए।

हिन्दू धर्म में सभी देवी-देवताओं को प्रसन्न करने, उनकी आराधना करने के विशिष्ट तरीकों का वर्णन उपलब्ध हैं। कुछ ऐसी सामग्रियां और विधियां होती हैं जो विशिष्ट आराध्य देव को बहुत पसंद होती हैं, उनकी पूजा में उन सामग्रियों की उपलब्धता मनवांछित फल प्रदान करती हैं। लेकिन कुछ ऐसी सामग्रियां भी होती हैं जिनका प्रयोग करना उलटा परिणाम प्रदान कर सकता है। जहां कुछ चीजें आराध्य देवी-देवताओं को पसंद आती हैं वहीं कुछ उन्हें कतई नापसंद होती हैं, ऐसे में अगर उन्हें वे अर्पित की जाएं या उनकी पूजा में उन सामग्रियों का प्रयोग किया जाए तो यह समस्या का कारण बन सकता है।

भगवान शिव जिन्हें भोलेनाथ भी कहा जाता है और विनाशक भी। जहां वे अपने भक्तों से बहुत ही जल्दी प्रसन्न होते हैं तो क्रोध के कारण बहुत जल्दी रौद्र रूप भी धारण कर लेते हैं। भगवान शिव को भांग- धतूरे का चढ़ावा बहुत पसंद है, पर कुछ ऐसी सामग्रियां भी हैं जिनका उपयोग शिव आराधना के दौरान बिल्कुल नहीं करना चाहिए। शिवपुराण के अनुसार शिव भक्तों को कभी भी भगवान शिव को ये 6 वस्तुएं नहीं चढ़ानी चाहिए।

1. केतकी के फूल
पौराणिक कथा के अनुसार केतकी फूल ने ब्रह्मा जी के झूठ में साथ दिया था, जिससे नाराज होकर भोलनाथ ने केतकी के फूल को श्राप दिया और कहा कि शिवलिंग पर कभी केतकी के फूल को अर्पित नहीं किया जाएगा। इसी श्राप के बाद से शिव को केतकी के फूल अर्पित नहीं किए जाते हैं।

2. तुलसी की पत्ती
यूं तो तुलसी की पत्तियां पूजा में काम आती हैं, लेकिन भगवान शिव की पूजा के लिए इनका इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। भगवान शिव ने तुलसी के पति असुर जालंधर का वध किया था। इसलिए उन्होंने स्वयं भगवान शिव को अपने अलौकिक और दैवीय गुणों वाले पत्तों से वंचित कर दिया।

3. शंख से जल
दैत्य शंखचूड़ के अत्याचारों से देवता परेशान थे। भगवान शंकर ने त्रिशूल से उसका वध कि या था, जिसके बाद उसका शरीर भस्म हो गया,उस भस्म से शंख की उत्पत्ति हुई थी। शिवजी ने शंखचूड़ का वध किया इसलिए कभी भी शंख से शिवजी को जल अर्पित नहीं किया जाता है।

4. कुमकुम या सिंदूर
सिंदूर, विवाहित स्त्रियों का गहना माना गया है। स्त्रियां अपने पति की लंबे और स्वस्थ जीवन की कामना हेतु अपनी मांग में सिंदूर लगाती हैं और भगवान को भी अर्पित करती हैं। लेकिन शिव तो विनाशक हैं, यही वजह है कि सिंदूर से भगवान शिव की सेवा नहीं की जाती है।

5. नारियल का पानी
शिवलिंग पर नारियल अर्पित किया जाता है लेकिन इससे अभिषेक नहीं करना चाहिए। देवताओं को चढ़ाया जाने वाले प्रसाद ग्रहण करना आवश्यक होता है लेकिन शिवलिंग का अभिषेक जिन पदार्थों से होता है उन्हें ग्रहण नहीं किया जाता। इसलिए शिव पर नारियल का जल नहीं चढ़ाना चाहिए।

6. हल्दी ना चढ़ाएं
शिवजी के अतिरिक्त लगभग सभी देवी- देवताओं को पूजन में हल्दी गंध और औषधि के रूप में प्रयोग की जाती है। शास्त्रों के अनुसार शिवलिंग पुरुष तत्व का प्रतीक है और हल्दी स्त्रियोचित वस्तु है। स्त्रियोचित यानी स्त्रियों संबंधित। इसी वजह से शिवलिंग पर हल्दी नहीं चढ़ाई जाती है।

मंगलवार, 9 जुलाई 2019

शिव मानस पूजा स्तुति

शिव मानस पूजा स्तुति,,,आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा रचित दिव्य मंत्रावली

आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा रचित शिव मानस पूजा शिव की एक अनूठी स्तुति है। इस स्तुति में मात्र कल्पना से शिव को सामग्री अर्पित की गई है और पुराण कहते हैं कि ‍साक्षात शिव ने इस पूजा को स्वीकार किया था।

 यह स्तुति भगवान भोलेनाथ की महान उदारता को प्रस्तुत करती है। इस स्तुति को पढ़ते हुए भक्तों द्वारा शिवशंकर को श्रद्धापूर्वक मानसिक रूप से समस्त पंचामृत दिव्य सामग्री समर्पित की जाती है।

हम कल्पना में ही उन्हें रत्नजडित सिहांसन पर आसीन करते हैं, दिव्य वस्त्र, भोजन तथा आभूषण आदि अर्पण करते हैं। पाठकों के लिए प्रस्तुत है हिन्दी अनुवाद सहित शिव मानस पूजा-

-रत्नैः कल्पितमानसं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं।
नाना रत्न विभूषितम्‌ मृग मदामोदांकितम्‌ चंदनम॥
जाती चम्पक बिल्वपत्र रचितं पुष्पं च धूपं तथा।
दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितम्‌ गृह्यताम्‌॥1॥

हिन्दी भावार्थ - मैं अपने मन में ऐसी भावना करता हूं कि हे पशुपति देव! संपूर्ण रत्नों से निर्मित इस सिंहासन पर आप विराजमान होइए। हिमालय के शीतल जल से मैं आपको स्नान करवा रहा हूं। स्नान के उपरांत रत्नजड़ित दिव्य वस्त्र आपको अर्पित है। केसर-कस्तूरी में बनाया गया चंदन का तिलक आपके अंगों पर लगा रहा हूं। जूही, चंपा, बिल्वपत्र आदि की पुष्पांजलि आपको समर्पित है। सभी प्रकार की सुगंधित धूप और दीपक मानसिक प्रकार से आपको दर्शित करवा रहा हूं, आप ग्रहण कीजिए।

-सौवर्णे नवरत्न खंडरचिते पात्र घृतं पायसं।
भक्ष्मं पंचविधं पयोदधि युतं रम्भाफलं पानकम्‌॥
शाका नाम युतं जलं रुचिकरं कर्पूर खंडौज्ज्वलं।
ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु॥2॥

भावार्थ : मैंने नवीन स्वर्णपात्र, जिसमें विविध प्रकार के रत्न जड़ित हैं, में खीर, दूध और दही सहित पांच प्रकार के स्वाद वाले व्यंजनों के संग कदलीफल, शर्बत, शाक, कपूर से सुवासित और स्वच्छ किया हुआ मृदु जल एवं ताम्बूल आपको मानसिक भावों द्वारा बनाकर प्रस्तुत किया है। हे कल्याण करने वाले! मेरी इस भावना को स्वीकार करें।

-छत्रं चामर योर्युगं व्यंजनकं चादर्शकं निर्मलं।
वीणा भेरि मृदंग काहलकला गीतं च नृत्यं तथा॥
साष्टांग प्रणतिः स्तुति-र्बहुविधा ह्येतत्समस्तं ममा।
संकल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो॥3॥

हे भगवन, आपके ऊपर छत्र लगाकर चंवर और पंखा झल रहा हूं। निर्मल दर्पण, जिसमें आपका स्वरूप सुंदरतम व भव्य दिखाई दे रहा है, भी प्रस्तुत है। वीणा, भेरी, मृदंग, दुन्दुभि आदि की मधुर ध्वनियां आपकी प्रसन्नता के लिए की जा रही हैं। स्तुति का गायन, आपके प्रिय नृत्य को करके मैं आपको साष्टांग प्रणाम करते हुए संकल्प रूप से आपको समर्पित कर रहा हूं। प्रभो! मेरी यह नाना विधि स्तुति की पूजा को कृपया ग्रहण करें।

आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं।
पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः॥
संचारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो।
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम्‌॥4॥

-हे शंकरजी, मेरी आत्मा आप हैं। मेरी बुद्धि आपकी शक्ति पार्वतीजी हैं। मेरे प्राण आपके गण हैं। मेरा यह पंच भौतिक शरीर आपका मंदिर है। संपूर्ण विषय भोग की रचना आपकी पूजा ही है। मैं जो सोता हूं, वह आपकी ध्यान समाधि है। मेरा चलना-फिरना आपकी परिक्रमा है। मेरी वाणी से निकला प्रत्येक उच्चारण आपके स्तोत्र व मंत्र हैं। इस प्रकार मैं आपका भक्त जिन-जिन कर्मों को करता हूं, वह आपकी आराधना ही है।

-कर चरण कृतं वाक्कायजं कर्मजं वा श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम्‌।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व जय जय करणाब्धे श्री महादेव शम्भो॥5॥

हे परमेश्वर! मैंने हाथ, पैर, वाणी, शरीर, कर्म, कर्ण, नेत्र अथवा मन से अभी तक जो भी अपराध किए हैं। वे विहित हों अथवा अविहित, उन सब पर आपकी क्षमापूर्ण दृष्टि प्रदान कीजिए। हे करुणा के सागर भोले भंडारी श्री महादेवजी, आपकी जय हो। जय हो।

इस अत्यंत सुंदर भावनात्मक स्तुति को हम बिना किसी साधन और सुविधा के कर सकते हैं। मानसिक पूजा शास्त्रों में श्रेष्ठतम पूजा के रूप में वर्णित है।

इस शिव मानस पूजा को आप अपनी सुविधानुसार कहीं भी और कभी भी कर सकते हैं। बस तन और मन की शुद्धता अनिवार्य है।मन से शिव-पार्वती के सुंदर स्वरूप की कल्पना कीजिए और समस्त सामग्री इन मंत्रों से अर्पित कीजिए, भगवान भोलेनाथ की यह पूजा चमत्कारिक रूप से ‍भाग्य चमकाती है।

शुक्रवार, 5 जुलाई 2019

श्रीजगन्नाथाष्टकम्

श्रीजगन्नाथाष्टकम् 


कदाचित् कालिन्दी_तट_विपिन_सङ्गीत_तरलो
मुदाभीरी_नारी_वदन_कमलास्वाद_मधुपः ।
रमा_शम्भु_ब्रह्मामर_पति_गणेशार्चित_पदो
जगन्नाथः स्वामी नयन_पथ_गामी भवतु मे ॥१॥

भुजे सव्ये वेणुं शिरसि शिखि_पिच्छं कटितटे
दुकूलं नेत्रान्ते सहचर_कटाक्षं च विदधत् ।
सदा श्रीमद्वृन्दावन_वसति_लीला_परिचयो
जगन्नाथः स्वामी नयन_पथ_गामी भवतु मे ॥२॥

महाम्भोधेस्तीरे कनक_रुचिरे नील_शिखरे
वसन् प्रासादान्तः सहज_वलभद्रेण बलिना ।
सुभद्रा_मध्यस्थः सकल_सुर_सेवावसर_दो
जगन्नाथः स्वामी नयन_पथ_गामी भवतु मे ॥३॥

कृपा_पारावारः सजल_जलद_श्रेणि_रुचिरो
रमा_वाणी_रामः स्फुरदमल_पंकेरुह_मुखः ।
सुरेन्द्रैराराध्यः श्रुति_गण_शिखा_गीत_चरितो
जगन्नाथः स्वामी नयन_पथ_गामी भवतु मे ॥४॥

रथारूढो गच्छन् पथि मिलित_भूदेव पटलैः
स्तुति_प्रादुर्भावं प्रति_पदमुपाकर्ण्य सदयः ।
दया_सिन्धुर्बन्धुः सकल_जगतां सिन्धु_सुतया
जगन्नाथः स्वामी नयन_पथ_गामी भवतु मे ॥५॥

परंब्रह्मापीडः कुवलय_दलोत्फुल्ल_नयनो
निवासी नीलाद्रौ निहित_चरणोऽनन्त_शिरसि ।
रसानन्दी राधा_सरस_वपुरालिङ्गन_सुखो
जगन्नाथः स्वामी नयन_पथ_गामी भवतु मे ॥६॥

न वै याचे राज्यं न च कनक_माणिक्य_विभवं
न याचेऽहं रम्यां सकल_जन_काम्यां वरवधूम् ।
सदा काले काले प्रमथ_पतिना गीत_चरितो
जगन्नाथः स्वामी नयन_पथ_गामी भवतु मे ॥७॥

हर त्वं संसारं द्रुततरमसारं सुरपते
हर त्वं पापानां विततिमपरां यादवपते ।
अहो दीनेऽनाथे निहित_चरणो निश्चितमिदं
जगन्नाथः स्वामी नयन_पथ_गामी भवतु मे ॥८॥

जगन्नाथाष्टकं पुण्यं यः पठेत् प्रयतः शुचि ।
सर्वपाप_विशुद्धात्मा विष्णुलोकं स गच्छति ॥९॥

पितृपक्ष में परान्न से बचें

 गरुड़ पुराणोक्त पितृपक्ष परान्न निषेध कथा सनातन धर्म में 16 दिनों का पितृपक्ष वर्ष का सबसे सूक्ष्म और संवेदनशील समय माना गया है। गरुड़ पुरा...