मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

वसंत पंचमी पर पूजन विधि

 बसंत पंचमी की तिथि पूजा विधि, शुभ मुहूर्त व महत्व

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बसंत पंचमी भारतीय संस्कृति में एक बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाने वाला त्यौहार है जिसमे हमारी परम्परा, भौगौलिक परिवर्तन , सामाजिक कार्य तथा आध्यात्मिक पक्ष सभी का सम्मिश्रण है, हिन्दू पंचांग के अनुसार माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को बसंत पंचमी का त्यौहार मनाया जाता है वास्तव में भारतीय गणना के अनुसार वर्ष भर में पड़ने वाली छः ऋतुओं (बसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर) में बसंत को ऋतुराज अर्थात सभी ऋतुओं का राजा माना गया है और बसंत पंचमी के दिन को बसंत ऋतु का आगमन माना जाता है इसलिए बसंत पंचमी ऋतू परिवर्तन का दिन भी है जिस दिन से प्राकृतिक सौन्दर्य निखारना शुरू हो जाता है पेड़ों पर नयी पत्तिया कोपले और कालिया खिलना शुरू हो जाती हैं पूरी प्रकृति एक नवीन ऊर्जा से भर उठती है।


बसंत पंचमी को विशेष रूप से सरस्वती जयंती के रूप में मनाया जाता है यह माता सरस्वती का प्राकट्योत्सव है इसलिए इस दिन विशेष रूप से माता सरस्वती की पूजा उपासना कर उनसे विद्या बुद्धि प्राप्ति की कामना की जाती है इसी लिए विद्यार्थियों के लिए बसंत पंचमी का त्यौहार बहुत विशेष होता है।


बसंत पंचमी का त्यौहार बहुत ऊर्जामय ढंग से और विभिन्न प्रकार से पूरे भारत वर्ष में मनाया जाता है इस दिन पीले वस्त्र पहनने और खिचड़ी बनाने और बाटने की प्रथा भी प्रचलित है तो इस दिन बसंत ऋतु के आगमन होने से आकास में रंगीन पतंगे उड़ने की परम्परा भी बहुत दीर्घकाल से प्रचलन में है।


बसंत पंचमी के दिन का एक और विशेष महत्व भी है बसंत पंचमी को मुहूर्त शास्त्र के अनुसार एक स्वयं सिद्ध मुहूर्त और अनसूज साया भी माना गया है अर्थात इस दिन कोई भी शुभ मंगल कार्य करने के लिए पंचांग शुद्धि की आवश्यकता नहीं होती इस दिन नींव पूजन, गृह प्रवेश, वाहन खरीदना, व्यापार आरम्भ करना, सगाई और विवाह आदि मंगल कार्य किये जा सकते है।


माता सरस्वती को ज्ञान, सँगीत, कला, विज्ञान और शिल्प-कला की देवी माना जाता है।


भक्त लोग, ज्ञान प्राप्ति और सुस्ती, आलस्य एवं अज्ञानता से छुटकारा पाने के लिये, आज के दिन देवी सरस्वती की उपासना करते हैं। कुछ प्रदेशों में आज के दिन शिशुओं को पहला अक्षर लिखना सिखाया जाता है। दूसरे शब्दों में वसन्त पञ्चमी का दिन विद्या आरम्भ करने के लिये काफी शुभ माना जाता है इसीलिये माता-पिता आज के दिन शिशु को माता सरस्वती के आशीर्वाद के साथ विद्या आरम्भ कराते हैं। सभी विद्यालयों में आज के दिन सुबह के समय माता सरस्वती की पूजा की जाती है।


वसन्त पञ्चमी का दिन हिन्दु कैलेण्डर में पञ्चमी तिथि को मनाया जाता है। जिस दिन पञ्चमी तिथि सूर्योदय और दोपहर के बीच में व्याप्त रहती है उस दिन को सरस्वती पूजा के लिये उपयुक्त माना जाता है। हिन्दु कैलेण्डर में सूर्योदय और दोपहर के मध्य के समय को पूर्वाह्न के नाम से जाना जाता है।


ज्योतिष विद्या में पारन्गत व्यक्तियों के अनुसार वसन्त पञ्चमी का दिन सभी शुभ कार्यो के लिये उपयुक्त माना जाता है। इसी कारण से वसन्त पञ्चमी का दिन अबूझ मुहूर्त के नाम से प्रसिद्ध है और नवीन कार्यों की शुरुआत के लिये उत्तम माना जाता है।


वसन्त पञ्चमी के दिन किसी भी समय सरस्वती पूजा की जा सकती है परन्तु पूर्वाह्न का समय पूजा के लिये श्रेष्ठ माना जाता है। सभी विद्यालयों और शिक्षा केन्द्रों में पूर्वाह्न के समय ही सरस्वती पूजा कर माता सरस्वती का आशीर्वाद ग्रहण किया जाता है।


नीचे सरस्वती पूजा का जो मुहूर्त दिया गया है उस समय पञ्चमी तिथि और पूर्वाह्न दोनों ही व्याप्त होते हैं। इसीलिये वसन्त पञ्चमी के दिन सरस्वती पूजा इसी समय के दौरान करना श्रेष्ठ है।


सरस्वती, बसंतपंचमी पूजा

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1. प्रात:काल स्नाना करके पीले वस्त्र धारण करें। 


2. मां सरस्वती की प्रतिमा को सामने रखें तत्पश्चात कलश स्थापित कर प्रथम पूज्य गणेश जी का पंचोपचार विधि पूजन उपरांत सरस्वती का ध्यान करें 


ध्यान मंत्र 

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या कुन्देन्दु तुषारहार धवला या शुभ्रवस्त्रावृता। 

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।। 

या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता। 

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ।। 

शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमांद्यां जगद्व्यापनीं । 

वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यांधकारपहाम्।। 

हस्ते स्फाटिक मालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम् । 

वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्।।2।।


3. मां की पूजा करते समय सबसे पहले उन्हें आचमन व स्नान कराएं। 

4. माता का श्रंगार कराएं ।

5. माता श्वेत वस्त्र धारण करती हैं इसलिए उन्हें श्वेत वस्त्र पहनाएं। 

6. प्रसाद के रुप में खीर अथवा दुध से बनी मिठाईयों का भोग लगाएं। 

7. श्वेत फूल माता को अर्पण करें।

8. तत्पश्चात नवग्रह की विधिवत पूजा करें। 


बसंत पंचमी पर मां सरस्वती की पूजा के साथ सरस्वती चालीसा पढ़ना और कुछ मंत्रों का जाप आपकी बुद्धि प्रखर करता है। अपनी सुविधानुसार आप ये मंत्र 11, 21 या 108 बार जाप कर सकते हैं।


निम्न मंत्र या इनमें किसी भी एक मंत्र का यथा सामर्थ्य जाप करें

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1. सरस्वती महाभागे विद्ये कमललोचने

विद्यारूपा विशालाक्षि विद्यां देहि नमोस्तुते॥


2. या देवी सर्वभूतेषू, मां सरस्वती रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।


3. ऐं ह्रीं श्रीं वाग्वादिनी सरस्वती देवी मम जिव्हायां।

सर्व विद्यां देही दापय-दापय स्वाहा।।


4. एकादशाक्षर सरस्वती मंत्र

ॐ ह्रीं ऐं ह्रीं सरस्वत्यै नमः।


5. वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।

मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणी विनायकौ।।


6. सरस्वत्यै नमो नित्यं भद्रकाल्यै नमो नम:।

वेद वेदान्त वेदांग विद्यास्थानेभ्य एव च।।

सरस्वति महाभागे विद्ये कमललोचने।

विद्यारूपे विशालाक्षी विद्यां देहि नमोस्तुते।।


7. प्रथम भारती नाम, द्वितीय च सरस्वती

तृतीय शारदा देवी, चतुर्थ हंसवाहिनी

पंचमम् जगतीख्याता, षष्ठम् वागीश्वरी तथा

सप्तमम् कुमुदीप्रोक्ता, अष्ठमम् ब्रह्मचारिणी

नवम् बुद्धिमाता च दशमम् वरदायिनी

एकादशम् चंद्रकांतिदाशां भुवनेशवरी

द्वादशेतानि नामानि त्रिसंध्य य: पठेनर:

जिह्वाग्रे वसते नित्यमं

ब्रह्मरूपा सरस्वती सरस्वती महाभागे

विद्येकमललोचने विद्यारूपा विशालाक्षि

विद्या देहि नमोस्तुते”


8. स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए।


जेहि पर कृपा करहिं जन जानि।

कवि उर अजिर नचावहिं वानी॥

मोरि सुधारहिं सो सब भांति।

जासु कृपा नहिं कृपा अघाति॥


9. गुरु गृह पढ़न गए रघुराई।

अलप काल विद्या सब पाई॥


माँ सरस्वती चालीसा

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दोहा 

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जनक जननि पदम दुरज, निजब मस्तक पर धारि।

बन्दौं मातु सरस्वती, बुद्धि बल दे दातारि।।

पूर्ण जगत में व्याप्त तव, महिमा अमित अनंतु।

दुष्टजनों के पाप को, मातु तुही अब हन्तु।।


चौपाई

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जय श्रीसकल बुद्धि बलरासी।जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी।।

जय जय जय वीणाकर धारी।करती सदा सुहंस सवारी।।

रूप चतुर्भुज धारी माता।सकल विश्व अन्दर विख्याता।।

जग में पाप बुद्धि जब होती।तबही धर्म की फीकी ज्योति।।

तबहि मातु का निज अवतारा।पाप हीन करती महितारा।।

बाल्मीकि  जी  था  हत्यारा।तव   प्रसाद   जानै   संसारा।।

रामचरित जो रचे बनाई । आदि कवि की पदवी पाई।।

कालीदास जो भये विख्याता । तेरी कृपा दृष्टि से माता।।

तुलसी सूर आदि विद्वाना । भये जो और ज्ञानी नाना।।

तिन्ह न और रहेउ अवलम्बा । केवल कृपा आपकी अम्बा।।

करहु कृपा सोई मातु भवानी।दुखित दीन निज दासहि जानी।।

पुत्र  करई  अपराध  बहूता । तेहि  न  धरई  चित  माता।।

राखु लाज जननि अब मेरी।विनय करऊ भांति बहुतेरी।।

मैं अनाथ तेरी अवलंबा । कृपा करउ जय जय जगदंबा।।

मधुकैटभ जो अति बलवाना । बाहुयुद्ध विष्णु से ठाना।।

समर हजार पांच में घोरा।फिर भी मुख उनसे नहीं मोरा।।

मातु सहाय कीन्ह तेहि काला।बुद्धि विपरीत भई खलहाला।।

तेहि ते मृत्यु भई खल केरी । पुरवहु मातु मनोरथ मेरी।।

चण्ड मुण्ड जो थे विख्याता । क्षण महु संहारे उन माता।।

रक्त बीज से समरथ पापी । सुर मुनि हृदय धरा सब कांपी।।

काटेउ सिर जिम कदली खम्बा।बार बार बिनवऊं जगदंबा।।

जगप्रसिद्ध जो शुंभ निशुंभा।क्षण में बांधे ताहि तूं अम्बा।।

भरत-मातु बुद्धि फेरेऊ जाई । रामचन्द्र बनवास कराई।।

एहि विधि रावन वध तू कीन्हा।सुर नर मुनि सबको सुख दीन्हा।।

को समरथ तव यश गुण गाना।निगम अनादि अनंत बखाना।।

विष्णु रूद्र जस कहिन मारी।जिनकी हो तुम रक्षाकारी।।

रक्त दन्तिका और शताक्षी।नाम अपार है दानव भक्षी।।

दुर्गम काज धरा पर कीन्हा।दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा।।

दुर्ग आदि हरनी तू माता । कृपा करहु जब जब सुखदाता।।

नृप  कोपित को मारन चाहे । कानन  में घेरे  मृग  नाहै।।

सागर मध्य पोत के भंजे । अति तूफान नहिं कोऊ संगे।।

भूत प्रेत बाधा या दु:ख में।हो दरिद्र अथवा संकट में।।

नाम जपे मंगल सब होई।संशय इसमें करई न कोई।।

पुत्रहीन जो आतुर भाई । सबै छांड़ि पूजें एहि भाई।।

करै पाठ नित यह चालीसा । होय पुत्र सुन्दर गुण ईसा।।

धूपादिक नैवेद्य चढ़ावै।संकट रहित अवश्य हो जावै।।

भक्ति मातु की करैं हमेशा।निकट न आवै ताहि कलेशा।।

बंदी  पाठ  करें  सत  बारा । बंदी  पाश  दूर  हो  सारा।।

रामसागर बांधि हेतु भवानी।कीजे कृपा दास निज जानी।।


दोहा 

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मातु सूर्य कान्ति तव, अंधकार मम रूप।

डूबन से रक्षा कार्हु परूं न मैं भव कूप।।

बलबुद्धि विद्या देहु मोहि, सुनहु सरस्वती मातु।

रामसागर अधम को आश्रय तू ही दे दातु।।


माँ सरस्वती वंदना

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वर दे, वीणावादिनि वर दे !

प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव

        भारत में भर दे !


काट अंध-उर के बंधन-स्तर

बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर;

कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर

        जगमग जग कर दे !


नव गति, नव लय, ताल-छंद नव

नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव;

नव नभ के नव विहग-वृंद को

        नव पर, नव स्वर दे !


वर दे, वीणावादिनि वर दे।


कुछ क्षेत्रों में देवी की पूजा कर प्रतिमा को विसर्जित भी किया जाता है। विद्यार्थी मां सरस्वती की पूजा कर गरीब बच्चों में कलम व पुस्तकों का दान करें। संगीत से जुड़े व्यक्ति अपने साज पर तिलक लगा कर मां की आराधना करें व मां को बांसुरी भेंट करें।


पूजा समय

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पंचमी तिथि आरंभ👉  16/फरवरी/2021 को 03.36 बजे प्रातः  से


पंचमी तिथि समाप्त👉 17/फरवरी/2021 को 05.46  प्रातः बजे तक


सरस्वती पूजा का मुहूर्त सुबह 07:06 से मध्यान 12:53 तक का है और इस मुहूर्त की अवधि 5 घंटे 46 मिनट तक रहेगी दोपहर तक इस पूजन को क‍िया जा सकता है। बसंत पंचमी के पूरे दिन आप अपने किसी भी नए कार्य का आरम्भ कर सकते हैं ये एक स्वयं सिद्ध और श्रेष्ठ मुहूर्त होता है।


सरस्वती स्तोत्रम्

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श्वेतपद्मासना देवि श्वेतपुष्पोपशोभिता। 


श्वेताम्बरधरा नित्या श्वेतगन्धानुलेपना॥ 


श्वेताक्षी शुक्लवस्रा च श्वेतचन्दन चर्चिता। 


वरदा सिद्धगन्धर्वैर्ऋषिभिः स्तुत्यते सदा॥  


स्तोत्रेणानेन तां देवीं जगद्धात्रीं सरस्वतीम्। 


ये स्तुवन्ति त्रिकालेषु सर्वविद्दां लभन्ति ते॥ 


या देवी स्तूत्यते नित्यं ब्रह्मेन्द्रसुरकिन्नरैः। 


सा ममेवास्तु जिव्हाग्रे पद्महस्ता सरस्वती॥ 

॥इति श्रीसरस्वतीस्तोत्रं संपूर्णम्॥ 


बसन्त पंचमी कथा

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सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने जीवों, खासतौर पर मनुष्य योनि की रचना की। अपनी सर्जना से वे संतुष्ट नहीं थे। उन्हें लगता था कि कुछ कमी रह गई है जिसके कारण चारों ओर मौन छाया रहता है। विष्णु से अनुमति लेकर ब्रह्मा ने अपने कमण्डल से जल छिड़का, पृथ्वी पर जलकण बिखरते ही उसमें कंपन होने लगा। इसके बाद वृक्षों के बीच से एक अद्भुत शक्ति का प्राकट्य हुआ। यह प्राकट्य एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री का था जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया। पवन चलने से सरसराहट होने लगी। तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा। सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं। बसन्त पंचमी के दिन को इनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं। ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है-


प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु।


अर्थात ये परम चेतना हैं। सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। हममें जो आचार और मेधा है उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं। इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है। पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण ने सरस्वती से ख़ुश होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी और यूं भारत के कई हिस्सों में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी जो कि आज तक जारी है।


गुरुवार, 4 फ़रवरी 2021

ऋणमोचक मंगल स्तोत्र

 ऋणमोचक मंगल स्तोत्र ::-



यदि आपके ऊपर ऋण वा कर्ज का बोझ अधिक बढ़ गया है और आप उस कर्ज को चाह कर भी नहीं उतार पा रहे है तब यदि आप ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का नियमित पाठ करते है तो निश्चित ही धीरे धीरे आपका ऋण उतर जाएगा। जैसा की आप जानते है मंगल का सम्बन्ध हनुमानजी से है और हनुमानजी सर्वबाधामुक्ति प्रदाता है यह श्लोक भी हनुमान जी की ही आराधना के रूप में प्रतिष्ठित है।


*कैसे आरम्भ करे ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का पाठ*


इस पाठ को प्रारम्भ करने के लिए सर्वप्रथम आपको किसी शुभ तिथि का चयन भारतीय पञ्चाङ्गानुसार कर लेना चाहिए। यह पाठ मंगलवार को ही शुरू करना चाहिए अन्य दिन को नही। इस पाठ को करने से पूर्व लाल वस्त्र बिछाकर मंगल यन्त्र व महावीर हनुमान जी को स्थापित करना चाहिए , सिंदूर व चमेली के तेल का चोला अर्पित कर अपने बाये हाथ की तरफ देशी घी का दीप व दाहिने हाथ की तरफ तिल के तेल का दीप स्थापित करना चाहिए। इसके बाद हनुमान जी को गुड़, चने व बेसन का भोग लगाना चाहिए।

मंगल देव (मंगल यन्त्र को प्राण प्रतिष्ठित कर) व हनुमान जी के सामने ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का पाठ, लाल वस्त्र धारण कर के हीआरम्भ करना चाहिए। यह पाठ अपनी श्रद्धा अनुसार 1, 3, 5, 9 , अथवा 11 पाठ 43 दिन तक नित्य करना चाहिए | इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से निश्चित ही कर्ज, ऋण व आर्थिक बाधा से मुक्ति मिलती है |


*ऋणमोचक मंगल स्तोत्र*


मङ्गलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रदः।

स्थिरासनो महाकयः सर्वकर्मविरोधकः ॥1॥


लोहितो लोहिताक्षश्च सामगानां कृपाकरः।

धरात्मजः कुजो भौमो भूतिदो भूमिनन्दनः॥2॥


अङ्गारको यमश्चैव सर्वरोगापहारकः।

व्रुष्टेः कर्ताऽपहर्ता च सर्वकामफलप्रदः॥3॥


एतानि कुजनामनि नित्यं यः श्रद्धया पठेत्।

ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्नुयात्॥4॥


धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम्।

कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम्॥5॥


स्तोत्रमङ्गारकस्यैतत्पठनीयं सदा नृभिः।

न तेषां भौमजा पीडा स्वल्पाऽपि भवति क्वचित्॥6॥


अङ्गारक महाभाग भगवन्भक्तवत्सल।

त्वां नमामि ममाशेषमृणमाशु विनाशय॥7॥


ऋणरोगादिदारिद्रयं ये चान्ये ह्यपमृत्यवः।

भयक्लेशमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा॥ 8 ||


अतिवक्त्र दुरारार्ध्य भोगमुक्त जितात्मनः।

तुष्टो ददासि साम्राज्यं रुश्टो हरसि तत्ख्शणात्॥9॥


विरिंचिशक्रविष्णूनां मनुष्याणां तु का कथा।

तेन त्वं सर्वसत्त्वेन ग्रहराजो महाबलः॥10॥


पुत्रान्देहि धनं देहि त्वामस्मि शरणं गतः।

ऋणदारिद्रयदुःखेन शत्रूणां च भयात्ततः॥11॥


एभिर्द्वादशभिः श्लोकैर्यः स्तौति च धरासुतम्।

महतिं श्रियमाप्नोति ह्यपरो धनदो युवा॥12॥


|| इति श्री ऋणमोचक मङ्गलस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ||

रविवार, 24 जनवरी 2021

देवी तारा के विभिन्न स्वरूपो का वर्णन

 देवी तारा के विभिन्न स्वरूपो का वर्णन

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सर्वविघ्नों का नाश करने वाली ‘महाविद्या तारा’, स्वयं भगवान शिव को अपना स्तन दुग्ध पान कराकर हलाहल की पीड़ा से मुक्त करने वाली है।

देवी महा-काली ने हयग्रीव नमक दैत्य के वध हेतु नीला वर्ण धारण किया तथा उनका वह उग्र स्वरूप उग्र तारा के नाम से विख्यात हुआ। ये देवी या शक्ति, प्रकाश बिंदु के रूप में आकाश के तारे के समन विद्यमान हैं, फलस्वरूप देवी तारा नाम से विख्यात हैं। शक्ति का यह स्वरूप सर्वदा मोक्ष प्रदान करने वाली तथा अपने भक्तों को समस्त प्रकार के घोर संकटों से मुक्ति प्रदान करने वाली हैं। देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध ‘मुक्ति’ से हैं, फिर वह जीवन और मरण रूपी चक्र हो या अन्य किसी प्रकार के संकट मुक्ति हेतु

भगवान शिव द्वारा, समुद्र मंथन के समय हलाहल विष का पान करने पर, उनके शारीरिक पीड़ा (जलन) के निवारण हेतु, इन्हीं ‘देवी तारा’ ने माता के स्वरूप में शिव जी को अपना अमृतमय दुग्ध स्तन पान कराया था। जिसके कारण भगवान शिव को समस्त प्रकार के शारीरिक पीड़ा से मुक्ति मिली, देवी, जगत-जननी माता के रूप में और घोर से घोर संकटों कि मुक्ति हेतु प्रसिद्ध हुई। देवी तारा के भैरव, हलाहल विष का पान करने वाले अक्षोभ्य शिव हुए, जिनको उन्होंने अपना दुग्ध स्तन पान कराया। जिस प्रकार इन महा शक्ति ने, भगवान शिव के शारीरिक कष्ट का निवारण किया, वैसे ही देवी अपने उपासकों के घोर कष्टों और संकट का निवारण करने में समर्थ हैं तथा करती हैं।

मुख्यतः देवी की आराधना-साधना मोक्ष प्राप्त करने हेतु, वीरा-चार या तांत्रिक पद्धति से की जाती हैं, परन्तु भक्ति भाव युक्त सधाना ही सर्वोत्तम हैं, देवी, के परम भक्त बामा खेपा ने यह सिद्ध भी किया।

संपूर्ण ब्रह्माण्ड में जो भी ज्ञान इधर उधर फैला हुआ हैं, उनके एकत्रित होने पर इन्हीं देवी के रूप का निर्माण होता हैं तथा वह समस्त ज्ञान इन्हीं देवी का मूल स्वरूप ही हैं, कारणवश इनका एक नाम नील-सरस्वती भी हैं।

देवी का निवास स्थान घोर महा-श्मशान हैं, जहाँ सर्वदा चिता जलती रहती हो तथा ज्वलंत चिता के ऊपर, देवी नग्न अवस्था या बाघाम्बर पहन कर खड़ी हैं। देवी, नर खप्परों तथा हड्डियों के मालाओं से अलंकृत हैं तथा सर्पों को आभूषण के रूप में धारण करती हैं। तीन नेत्रों वाली देवी उग्र तारा स्वरूप से अत्यंत ही भयानक प्रतीत होती हैं।


प्रथम "उग्र तारा"👉 अपने उग्र तथा भयानक रूप हेतु जानी जाती हैं। देवी का यह स्वरूप अत्यंत उग्र तथा भयानक हैं, ज्वलंत चिता के ऊपर, शव रूपी शिव या चेतना हीन शिव के ऊपर, देवी प्रत्यालीढ़ मुद्रा में खड़ी हैं। देवी उग्र तारा, तमो गुण सम्पन्न हैं तथा अपने साधकों-भक्तों के कठिन से कठिन परिस्थितियों में पथ प्रदर्शित तथा छुटकारा पाने में सहायता करती हैं।


द्वितीय "नील सरस्वती"👉  इस स्वरूप में देवी संपूर्ण ब्रह्माण्ड के समस्त ज्ञान कि ज्ञाता हैं। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में जो भी ज्ञान इधर-उधर बिखरा हुआ पड़ा हैं, उन सब को एकत्रित करने पर जिस ज्ञान की उत्पत्ति होती हैं, वे ये देवी नील सरस्वती ही हैं। इस स्वरूप में देवी राजसिक या रजो गुण सम्पन्न हैं। देवी परम ज्ञानी हैं, अपने असाधारण ज्ञान के परिणाम स्वरूप, ज्वलंत चिता के शव को शिव स्वरूप में परिवर्तित करने में समर्थ हैं।


तृतीय👉 "एकजटा" यह देवी का तीसरे स्वरूप या नाम हैं, पिंगल जटा जुट वाली यह देवी सत्व गुण सम्पन्न हैं तथा अपने भक्त को मोक्ष प्रदान करती हैं मोक्ष दात्री हैं। ज्वलंत चिता में सर्वप्रथम देवी, उग्र तारा के रूप में खड़ी हैं, द्वितीय नील सरस्वती, शव को जीवित कर शिव बनाने में सक्षम हैं तथा तीसरे स्वरूप में देवी एकजटा जीवित शिव को अपने पिंगल जटा में धारण करती हैं या मोक्ष प्रदान करती हैं। देवी अपने भक्तों को मृत्युपरांत, अपनी जटाओं में विराजित अक्षोभ्य शिव के साथ स्थान प्रदान करती हैं या कहे तो मोक्ष प्रदान करती हैं।


देवी अन्य आठ स्वरूपों में ‘अष्ट तारा’ समूह का निर्माण करती है तथा विख्यात हैं,


१. तारा, २. उग्र तारा, ३. महोग्र तारा, ४. वज्र तारा, ५. नील तारा, ६. सरस्वती, ७. कामेश्वरी, ८. भद्र काली-चामुंडा।


सभी स्वरूप गुण तथा स्वभाव से भिन्न-भिन्न है तथा भक्तों की समस्त प्रकार के मनोकामनाओं को पूर्ण करने में समर्थ, सक्षम हैं।


देवी उग्र तारा के स्वरूप का वर्णन।

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देवी तारा, प्रत्यालीढ़ मुद्रा (जैसे की एक वीर योद्धा, अपने दाहिने पैर आगे किये युद्ध लड़ने हेतु उद्धत हो) धारण कर, शव या चेतना रहित शिव के ऊपर पर आरूढ़ हैं। देवी के मस्तक पंच कपालों से सुसज्जित हैं, नव-यौवन संपन्न हैं, नील कमल के समान तीन नेत्रों से युक्त, उन्नत स्तन मंडल और नूतन मेघ के समान कांति वाली हैं। विकट दन्त पंक्ति तथा घोर अट्टहास करने के कारण देवी का स्वरूप अत्यंत उग्र प्रतीत होता हैं। देवी का स्वरूप बहुत डरावना और भयंकर हैं तथा वास्तविक रूप से देवी, चिता के ऊपर जल रही शव पर आरूढ़ हैं तथा इन्होंने अपना बायाँ पैर शव रूपी शिव के छाती पर रखा हैं। देवी घोर नील वर्ण की हैं, महा-शंख (मानव कपाल) की माला धारण किये हुए हैं, वह छोटे कद की हैं तथा कही-कही देवी अपनी लज्जा निवारण हेतु बाघाम्बर भी धारण करती हैं। देवी के आभूषण तथा पवित्र यज्ञोपवीत सर्प हैं, साथ ही रुद्राक्ष तथा हड्डियों की बानी हुई आभूषणों को धारण करती हैं। वह अपनी छोटी लपलपाती हुई जीभ मुंह से बाहर निकले हुए तथा अपने विकराल दन्त पंक्तियों से दबाये हुए हैं। देवी के शरीर से सर्प लिपटे हुए हैं, सिर के बाल चारों ओर उलझे-बिखरे हुए भयंकर प्रतीत होते हैं। देवी चार हाथों से युक्त हैं तथा नील कमल, खप्पर (मानव खोपड़ी से निर्मित कटोरी), कैंची और तलवार धारण करती हैं। देवी, ऐसे स्थान पर निवास करती हैं जहाँ सर्वदा ही चिता जलती रहती हैं तथा हड्डियाँ, खोपड़ी इत्यादि इधर-उधर बिखरी पड़ी हुई होती हैं, सियार, गीदड़, कुत्ते इत्यादि हिंसक जीव इनके चारों ओर देखे जाते हैं।

देवी तारा के प्रादुर्भाव से सम्बंधित कथा।

स्वतंत्र तंत्र के अनुसार, देवी तारा की उत्पत्ति मेरु पर्वत के पश्चिम भाग में, चोलना नदी के तट पर हुई। हयग्रीव नाम के दैत्य के वध हेतु देवी महा-काली ने ही, नील वर्ण धारण किया था। महाकाल संहिता के अनुसार, चैत्र शुक्ल अष्टमी तिथि में ‘देवी तारा’ प्रकट हुई थीं, इस कारण यह तिथि तारा-अष्टमी कहलाती हैं, चैत्र शुक्ल नवमी की रात्रि तारा-रात्रि कहलाती हैं।

एक और देवी तारा के उत्पत्ति संदर्भ कथा ‘तारा-रहस्य नमक तंत्र’ ग्रन्थ से प्राप्त होता हैं; जो भगवान विष्णु के अवतार, श्री राम द्वारा लंका-पति दानव राज दशानन रावण का वध के समय से हैं।

सर्वप्रथम स्वर्ग-लोक के रत्नद्वीप में वैदिक कल्पोक्त तथ्यों तथा वाक्यों को देवी काली के मुख से सुनकर, शिव जी अपनी पत्नी पर बहुत प्रसन्न हुए। शिव जी ने महाकाली से पूछा, आदि काल में अपने भयंकर मुख वाले रावण का विनाश किया, तब आश्चर्य से युक्त आप का वह स्वरूप ‘तारा’ नाम से विख्यात हुआ। उस समय, समस्त देवताओं ने आप की स्तुति की थी तथा आप अपने हाथों में खड़ग, नर मुंड, वार तथा अभय मुद्रा धारण की हुई थी, मुख से चंचल जिह्वा बहार कर आप भयंकर रुपवाली प्रतीत हो रही थी। आप का वह विकराल रूप देख सभी देवता भय से आतुर हो काँप रहे थे, आपके विकराल भयंकर रुद्र रूप को देखकर, उन्हें शांत करने के निमित्त ब्रह्मा जी आप के पास गए थे। समस्त देवताओं को ब्रह्मा जी के साथ देखकर देवी, लज्जित हो आप खड़ग से लज्जा निवारण की चेष्टा करने लगी। रावण वध के समय आप अपने रुद्र रूप के कारण नग्न हो गई थी तथा स्वयं ब्रह्मा जी ने आपकी लज्जा निवारण हेतु, आपको व्याघ्र चर्म प्रदान किया था। इसी रूप में देवी ‘लम्बोदरी’ के नाम से विख्यात हुई। तारा-रहस्य तंत्र के अनुसार, भगवान राम केवल निमित्त मात्र ही थे, वास्तव में भगवान राम की विध्वंसक शक्ति देवी तारा ही थी, जिन्होंने लंका पति रावण का वध किया।


देवी तारा से सम्बंधित अन्य तथ्य

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सर्वप्रथम वशिष्ठ मुनि ने देवी तारा कि आराधना की थी, परिणाम स्वरूप देवी ’वशिष्ठाराधिता’ के नाम से भी जानी जाती हैं। सर्वप्रथम मुनि-राज ने देवी तारा की उपासना वैदिक पद्धति से कि, परन्तु वे देवी की कृपा प्राप्त करने में सफल नहीं हो सके। अलौकिक शक्तियों से उन्हें ज्ञात हुआ की देवी की आराधना का क्रम चीन देश में रहने वाले भगवान बुद्ध को ज्ञात हैं, वे उन के पास जाये तथा साधना का सही क्रम, पद्धति जानकर देवी तारा की उपासना करें। तदनंतर वशिष्ठ मुनि ने चीन देश की यात्रा की तथा भगवान बुद्ध से आराधना का सही क्रम ज्ञात किया, जिसे चिनाचार पद्धति, वीर साधना या आगमोक्ता पद्धति (तंत्र) कहा गया। भगवान बुद्ध के आदेश अनुसार उन्होंने चिनाचार पद्धति से देवी की आराधना की तथा देवी कृपा लाभ करने में सफल हुए। (बंगाल प्रान्त के बीरभूम जिले में वह स्थान आज भी विद्यमान हैं, जहाँ मुनिराज ने देवी की आराधना की थी, जिसे जगत-जननी तारा माता के सिद्ध पीठ ‘तारा पीठ’ के नाम से जाना जाता हैं।)

‘तारा’ नाम के रहस्य से ज्ञात होता हैं, ये तारने वाली हैं, मोक्ष प्रदाता हैं। जीवन तथा मृत्यु के चक्र से तारने हेतु, यह नाम ‘तारा’ देवी के नाम-रहस्य को उजागर करता हैं। महाविद्याओं में देवी दूसरे स्थान पर विद्यमान हैं तथा देवी अपने भक्तों को ‘वाक्-शक्ति’ प्रदान करने तथा भयंकर विपत्तिओ से अपने भक्तों की रक्षा करने में समर्थ हैं। शत्रु नाश, भोग तथा मोक्ष, वाक् शक्ति प्राप्ति हेतु देवी कि साधना विशेष लाभकारी सिद्ध होती हैं। 


सामान्यतः तंत्रोक्त पद्धति से साधना करने पर ही देवी की कृपा प्राप्त की जा सकती हैं।

देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध श्मशान भूमि से हैं, जो उनका निवास स्थान हैं। साथ ही श्मशान से सम्बंधित समस्त वस्तुओं-तत्वों जैसे मृत देह, हड्डी, चिता, चिता-भस्म, भूत, प्रेत, कंकाल, खोपड़ी, उल्लू, कुत्ता, लोमड़ी इत्यादि से देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। गुण तथा स्वभाव से देवी तारा, महा-काली से युक्त हैं।


देवी उग्र तारा, अपने भक्तों के जीवन में व्याप्त हर कठिन परिस्थितियों से रक्षा करती हैं। देवी के साधक नाना प्रकार के सिद्धियों के युक्त होते हैं, गद्ध-पद्ध-मयी वाणी साधक के मुख का कभी परित्याग नहीं करती हैं, त्रिलोक मोहन, सुवक्ता, विद्याधर, समस्त जगत को क्षुब्ध तथा हल-चल पैदा करने में साधक पूर्णतः समर्थ होता हैं। कुबेर के धन के समान धनवान, निश्चल भाव से लक्ष्मी वास तथा काव्य-आगम आदि शास्त्रों में शुक देव तथा देवगुरु बृहस्पति के तुल्य हो जाते हैं, मूर्ख हो या जड़ वह बृहस्पति के समान हो जाता हैं। साधक ब्रह्म-वेत्ता होने का सामर्थ्य रखता हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव के की साम्यता को प्राप्त कर, समस्त पाशों से मुक्त हो ब्रह्मरूप मोक्ष पद को प्राप्त करते हैं। पशु भय वाले इस संसार से मुक्ति लाभ करता हैं या अष्ट पाशों (घृणा, लज्जा, भय, शंका, जुगुप्सा, कुल, शील तथा जाति) में बंधे हुए पशु आचरण से मुक्त हो, मोक्ष (तारिणी पद) को प्राप्त करने में समर्थ होता हैं।

देवी काली तथा तारा में समानतायें।

देवी काली ही, नील वर्ण धारण करने के कारण ‘तारा’ नाम से जानी जाती हैं तथा दोनों का घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। जैसे दोनों शिव रूपी शव पर प्रत्यालीढ़ मुद्रा धारण किये हुए आरूढ़ हैं, अंतर केवल देवी काली शव रूपी शिव पर आरूढ़ हैं तथा देवी तारा जलती हुई चिता पर आरूढ़ हैं। दोनो। दोनों का निवास स्थान श्मशान भूमि हैं, दोनों देवियों की जिह्वा मुंह से बाहर हैं तथा भयंकर दन्त-पंक्ति से दबाये हुए हैं, दोनों रक्त प्रिया हैं, भयानक तथा डरावने स्वरूप वाली हैं, भूत-प्रेतों से सम्बंधित हैं, दोनों देवियों का वर्ण गहरे रंग का हैं एक गहरे काले वर्ण की हैं तथा दूसरी गहरे नील वर्ण की। दोनों देवियाँ नग्न विचरण करने वाली हैं, कही-कही देवी काली कटे हुई हाथों की करधनी धारण करती हैं, नर मुंडो की माला धारण करती हैं वही देवी तारा व्यग्र चर्म धारण करती हैं तथा नर खप्परों की माला धारण करती हैं। दोनों की साधना तंत्रानुसार पंच-मकार विधि से की जाती हैं, सामान्यतः दोनों एक ही हैं इनमें बहुत काम भिन्नताएं दिखते हैं। दोनों देवियों का वर्णन शास्त्रानुसार शिव पत्नी के रूप में किया गया हैं तथा दोनों के नाम भी एक जैसे ही हैं जैसे, हर-वल्लभा, हर-प्रिया, हर-पत्नी इत्यादि, ‘हर’ भगवान शिव का एक नाम हैं। परन्तु देवी तारा ने, भगवान शिव को बालक रूप में परिवर्तित कर, अपना स्तन दुग्ध पान कराया था। समुद्र मंथन के समय कालकूट विष का पान करने के परिणाम स्वरूप, भगवान शिव के शरीर में जलन होने लगी तथा वे तड़पने लगे, देवी ने उन के शारीरिक कष्ट को शांत करने हेतु अपने अमृतमय स्तन दुग्ध पान कराया। देवी काली के सामान ही देवी तारा का सम्बन्ध निम्न तत्वों से हैं।


श्मशान वासिनी👉 तामसिक, विध्वंसक प्रवृत्ति से सम्बंधित रखने वाले देवी देवता मुख्यतः श्मशान भूमि में वास करते हैं। व्यवहारिक दृष्टि से श्मशान वह स्थान हैं, जहाँ शव के दाह का कार्य होता हैं। परन्तु आध्यात्मिक या दार्शनिक दृष्टि से श्मशान का अभिप्राय कुछ और ही हैं, यह वह स्थान हैं जहाँ ‘पंच या पञ्च महाभूत’ या देह में विद्यमान स्थूल तत्त्व, चिद्-ब्रह्म में विलीन होते हैं। आकाश, पृथ्वी, जल, वायु तथा अग्नि इन महा भूतों से संसार के समस्त जीवों के देह का निर्माण होता हैं, समस्त जीव शरीर या देह इन्हीं पंच महाभूतों का मिश्रण हैं। श्मशान वह स्थान हैं जहाँ पञ्च भूत या तत्त्व के मिश्रण से निर्मित देह, अपने-अपने तत्त्व में विलीन हो जाते हैं। तामसी गुण से सम्बद्ध रखने वाले देवी-देवता, श्मशान भूमि को इसी कारण-वश अपना निवास स्थान बनाते हैं। देवी काली, तारा, भैरवी इत्यादि देवियाँ श्मशान भूमि को अपना निवास स्थान बनती हैं, इसका एक और महत्त्वपूर्ण कारण हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से श्मशान विकार रहित हृदय या मन का प्रतिनिधित्व करता हैं, मानव देह कई प्रकार के विकारों का स्थान हैं, काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, स्वार्थ इत्यादि, अतः देवी उसी स्थान को अपना निवास स्थान बनती हैं जहाँ इन विकारों या व्यर्थ के आचरणों का दाह होता हैं। मन या हृदय भी वह स्थान हैं या कहें तो वह श्मशान हैं, जहाँ इन समस्त विकारों का दाह होता हैं अतः देवी काली-तारा अपने उपासकों के विकार शून्य हृदय पर ही वास करती हैं।


चिता👉  मृत देह के दाह संस्कार हेतु, लकड़ियों के ढेर के ऊपर शव को रख कर जला देना, चिता कहलाता हैं। साधक को अपने श्मशान रूपी हृदय में सर्वदा ज्ञान रूपी अग्नि जलाये रखना चाहिए, ताकि अज्ञान रूपी अंधकार को दूर किया जा सके।


देवी का आसन👉  देवी शव रूपी शिव पर विराजमान हैं या कहे तो शव को अपना आसन बनाती हैं, जिसके परिणाम स्वरूप ही शव में चैतन्य का संचार होता हैं। बिना शक्ति के शिव, शव के ही सामान हैं, चैतन्य हीन हैं। देवी की कृपा लाभ से ही, देह पर प्राण रहते हैं।


करालवदना या घोररूपा👉  देवी काली, तारा घनघोर या अत्यंत काले वर्ण की हैं तथा स्वरूप से भयंकर और डरावनी हैं। परन्तु देवी के साधक या देवी जिन के हृदय में स्थित हैं, उन्हें डरने के आवश्यकता नहीं हैं, स्वयं काल या यम भी देवी से भय-भीत रहते हैं।


पीनपयोधरा👉  देवी काली-तारा के स्तन बड़े तथा उन्नत हैं, यहाँ तात्पर्य हैं कि देवी प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से तीनों लोकों का पालन करती हैं। अपने अमृतमय दुग्ध को आहार रूप में दे कर देवी अपने साधक को कृतार्थ करती हैं।


प्रकटितरदना👉 देवी काली-तारा के विकराल दन्त पंक्ति बहार निकले हुए हैं तथा उन दाँतो से उन्होंने अपने जिह्वा को दबा रखा हैं। यहाँ देवी रजो तथा तमो गुण रूपी जिह्वा को, सत्व गुण के प्रतीक उज्ज्वल दाँतो से दबाये हुए हैं।


मुक्तकेशी👉  देवी के बाल, घनघोर काले बादलों की तरह बिखरे हुए हैं और ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे कोई भयंकर आँधी आने वाली हो।

संक्षेप में देवी तारा से सम्बंधित मुख्य तथ्य।


मुख्य नाम : तारा।

अन्य नाम : उग्र तारा, नील सरस्वती, एकजटा।


भैरव : अक्षोभ्य शिव, बिना किसी क्षोभ के हलाहल विष का पान करने वाले।


भगवान विष्णु के २४ अवतारों से सम्बद्ध : भगवान राम।


कुल : काली कुल।


दिशा : ऊपर की ओर।


स्वभाव : सौम्य उग्र, तामसी गुण सम्पन्न।

वाहन : गीदड़।


सम्बंधित तीर्थ स्थान या मंदिर : तारापीठ, रामपुरहाट, बीरभूम, पश्चिम बंगाल, भारत; सुघंधा, बांग्लादेश तथा सासाराम, बिहार, भारत।


कार्य : मोक्ष दात्री, भव-सागर से तारने वाली, जन्म तथा मृत्यु रूपी चक्र से मुक्त करने वाली।


शारीरिक वर्ण : नीला।


द्वितीय महाविद्या तारा की कृपा से सभी शास्त्रों का पांडित्य, कवित्व प्राप्त होता हैं, साधक बृहस्पति के समान ज्ञानी हो जाता हैं। वाक् सिद्धि प्रदान करने से ये नील सरस्वती कही जाती हैं, सुख, मोक्ष प्रदान करने तथा उग्र आपत्ति हरण करने के कारण इन्हें ताराणी भी कहा जाता हैं।

देवी की साधना एकलिंग शिव मंदिर (पाँच कोस क्षेत्र के मध्य एक शिव-लिंग), श्मशान भूमि, शून्य गृह, चौराहे, शवासन, मुंडों के आसन, गले तक जल में खड़े हो कर, वन में करने का शास्त्रों में विधान हैं। इन स्थानों पर देवी की साधना शीघ्र फल प्रदायक होती हैं, विशेषकर सर्व शास्त्र वेत्ता होकर परलोक में ब्रह्म निर्वाण प्राप्त करता हैं।

मत्स्य सूक्त के अनुसार कोमलासन (जिसका मुंडन संस्कार न हुआ हो या छः से दस मास के भीतर के गर्भच्युत मृत बालक), कम्बल का आसन, कुशासन अथवा विशुद्ध आसन पर बैठ कर ही देवी तारा की आराधना करना उचित हैं। नील तंत्र के अनुसार पाँच वर्ष तक के बालक का मृत देह भी कोमलासन की श्रेणी में आता हैं, कृष्ण मृग या मृग तथा व्याघ्र चर्म आसन पूजा में विहित हैं।

लक्ष्मी, सरस्वती, रति, प्रीति, कीर्ति, शांति, तुष्टि, पुष्टि रूपी आठ शक्तियां नील सरस्वती की पीठ शक्ति मानी जाती हैं, देवी का वाहन शव हैं।

ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर, सदाशिव तथा परमशिव को षट्-शिव (६ शिव) कहा जाता हैं।

तारा, उग्रा, महोग्रा, वज्रा, काली, सरस्वती, कामेश्वरी तथा चामुंडा ये अष्ट तारा नाम से विख्यात हैं। देवी के मस्तक में स्थित अक्षोभ्य शिव अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं।

महा-शंख माला जो मनुष्य के ललाट के हड्डियों से निर्मित होती हैं तथा जिस में ५० मणियाँ होती हैं, से देवी की साधना करने का विधान हैं। कान तथा नेत्र के बीज के भाग को या ललाट का भाग महा-शंख कहलाता हैं, इस माला का स्पर्श तुलसी, गोबर, गंगा-जल तथा शाल-ग्राम से कभी नहीं करना चाहिये।

देवी की कृपा से साधक प्राण ज्ञान प्राप्त करने के साथ-साथ भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त करता है

गृहस्थ साधक को सदा ही देवी की सौम्य रूप में साधना पूजा करनी चाहिए

देवी अज्ञान रुपी शव पर विराजती हैं और ज्ञान की खडग से अज्ञान रुपी शत्रुओं का नाश करती हैं

लाल व नीले फूल और नारियल चौमुखा दीपक चढाने से देवी होतीं हैं प्रसन्न

देवी के भक्त को ज्ञान व बुद्धि विवेक में तीनो लोकों में कोई नहीं हरा पता!

माँ तारा की कृपा से साधक प्राण ज्ञान प्राप्त करने के साथ-साथ भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त करता है

गृहस्थ साधक को सदा ही देवी की सौम्य रूप में साधना पूजा करनी चाहिए

देवी अज्ञान रुपी शव पर विराजती हैं और ज्ञान की खडग से अज्ञान रुपी शत्रुओं का नाश करती हैं

महाविद्या तारा के मन्त्र से होता है बड़े से बड़े दुखों का नाश देवी माँ का स्वत: सिद्ध महामंत्र है।


1.👉 बिल्व पत्र, भोज पत्र और घी से हवन करने पर लक्ष्मी की प्राप्ति होती है

2.👉मधु. शर्करा और खीर से होम करने पर वशीकरण होता है 

3.👉घृत तथा शर्करा युक्त हवन सामग्री से होम करने पर आकर्षण होता है।

4.👉 काले तिल व खीर से हवन करने पर शत्रुओं का स्तम्भन होता है।


विशेष पूजा सामग्रियां-पूजा में जिन सामग्रियों के प्रयोग से देवी की विशेष कृपा मिलाती है। सफेद या नीला कमल का फूल चढ़ाना,रुद्राक्ष से बने कानों के कुंडल चढ़ाना, अनार के दाने प्रसाद रूप में चढ़ाना, शंख को देवी पूजा में रखना

भोजपत्र पर ह्रीं लिख करा चढ़ाना, दूर्वा,अक्षत,रक्तचंदन,पंचगव्य,पञ्चमेवा व पंचामृत चढ़ाएं, पूजा में उरद की दाल व लौंग काली मिर्च का चढ़ावे के रूप प्रयोग करें।


भृंगी की कथा

 भृंगी की कथा

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महादेव के गणों मे एक हैं भृंगी। एक महान शिवभक्त के रुप में भृंगी का नाम अमर है। कहते हैं जहां शिव होंगे वहां गणेश, नंदी, श्रृंगी, भृंगी, वीरभद्र का वास स्वयं ही होगा। शिव-शिवा के साथ उनके ये गण अवश्य चलते हैं। इनमें से सभी प्रमुख गणों के बारे में तो कहानियां प्रचलित हैं। जैसे दक्ष यज्ञध्वंस के लिए वीरभद्र उत्पन्न हुए। 


मां पार्वती ने श्रीगणेश को उत्पन्न किया। नंदी तो शिव के वाहन हैं जो धर्म के अवतार हैं। शिलाद मुनि के पुत्र के रूप में जन्म लेकर शिवजीके वाहन बने नंदी। आपने यह सब कथाएं खूब सुनी होंगी पर क्या प्रमुख शिवगण भृंगी की कथा सुनी है?भृंगी की खास बात यह हैं कि उनके तीन पैर हैं। शिव विवाह के लिए चलीबारात में उनका जिक्र मिलता हैं  बिनु पद होए कोई.. बहुपद बाहू” (यानी शिवगणों में कई बिना पैरों के थे और किसी के पास कई पैर थे) ये पद तुलसीदासजी ने भृंगी के लिए ही लिखा है।भृंगी के तीन पैर कैसे हुए? इसके पीछे एक कथा है जो हमें बताती है कि उमा-शंकर के बीच का प्रेम कितना गहरा है। 


ये दोनों वस्तुत: एक ही हैं। दरअसल भृंगी की एक अनुचित जिद ही वजह से सदाशिव और जगदंबा को अर्द्धनारीश्वर रुप धारण करना पड़ा।भृंगी महान शिवभक्त थे। सदाशिव के चरणों में उनकी अत्य़धिक प्रीति थी। उन्होंने स्वप्न में भी शिव के अतिरिक्त किसी का ध्यान नहीं किया था। यहां तक कि वह जगद्जननी मां पार्वती को भी सदाशिव से अलग मानते थे। शिवस्य चरणम् केवलम्” के भाव में हमेशा रहते थे। उनकी बुद्धि यह स्वीकार ही नहीं करती थी कि शिव और पार्वती में कोई भेद नहीं है।


एक बार सदाशिव के परम भक्त श्रृंगी ऋषि कैलाश पर अपने आराध्य की परिक्रमा करने पहुंचे। सदैव की तरह महादेव के बाईं जंघा पर आदिशक्तिजगदंबा विराजमान थीं। महादेव समाधि में थे और जगदंबा चैतन्य थीं। जगदंबा के नेत्र खुले थे।


भृंगी तो आए थे शिवजी की परिक्रमा करने। शिवजी तो ध्यानमग्न थे। शिवप्रेम में भृंगी मतवाले हो रहे थे। वह सिर्फ शिवजी की परिक्रमा करना चाहते थे क्योंकि ब्रह्मचर्य की उनकी परिभाषा अलग थी। पर क्या करें, पार्वतीजी तो शिवजी के वामांग में विराजमान हैं। भृंगी अपना उतावनापन रोक ही नहीं पाए। साहस इतना बढ़ गया कि उन्होंने जगदंबा से अनुरोध कर दिया कि वह शिवजी से अलग होकर बैठें ताकि मैं शिवजी की परिक्रमा कर सकूं।


जगदंबा समझ गईं कि यह है तो तपस्वी लेकिन इसे ज्ञान नहीं हुआ है। अभी यह अधूरा ज्ञान का है इसलिए उन्होंने भृंगी की बात को अनसुना किया। भृंगी तो हठ में थे, कुछ भी सुनने-समझने को तैयार ही नहीं। फिर से पार्वतीजी से कहा कि आपकुछ देर के लिए हट जाएं, मैं परिक्रमा कर लूं।मां पार्वती ने इसपर आपत्ति जताई और कहा कि अनुचित बात बंद करो. 


जगदंबा महादेव की शक्ति हैं. वह सदाशिव से पृथक होने को कैसे तैयार होतीं! माता ने भृंगी को कई तरह से समझाया, प्रकृति और पुरुष के संबंधों की व्याख्या की। वेदों का उदाहरण दिया परंतु भृंगी भी वैसे ही हठी। हठी की बुद्धि तो वैसे भी आधी हो जाती है।माता द्वारा दिए ज्ञान-उपदेश उनके विवेक में उतरे ही नहीं। उनकी बुद्धि सृष्टि के इस रहस्य को समझने के लिए तैयार ही नहीं हुई। उन्होंने सिर्फ शिव की परिक्रमा करने की ठान रखी थी। माता ने सोचा इस अज्ञानी को कुछ भी समझाने का लाभ नहीं। इसे अनदेखा ही कर देना चाहिए। माता शिवजी से अलग न हुईं।


भृंगी ने भी हठ ही पाल रखा था। अपने मन की करने के लिए एक योजना बना ली। भृंगी ने सर्प का रुप धारण किया और शिवजी की परिक्रमा करने लगे।


सरकते हुए वह जगदंबा और महादेव के बीच से निकलने का यत्न करने लगे। उनकी इस धृष्टता का परिणाम हुआ कि शिवजी की समाधि भंग हो गई। उन्होंने समझ लिया कि मूर्ख जगदंबा को मेरे वाम अंग पर देखकर विचलित है। वह दोनों में भेद कर रहा है। इसे सांकेतिक रूप से समझाने के लिए शिवजी ने तत्काल अर्द्धनारीश्वर स्वरुप धारण कर लिया। जगदंबा अब उन्हीं में विलीन हो गईं थी। 


शिवजी दाहिने भाग से पुरुष रूप में और बाएं भाग से स्त्रीरूप में दिखने लगे।अब तो भृंगी की योजना पर पानी फिरने लगा। हठी का हठ तो भगवान से भी ऊपर जाने लगता है। भृंगी ने इतने पर भी हिम्मत नहीं हारी। उन्हें तो बस शिवजी की ही परिक्रमा करनी थी। अपनी जिद पूरी करने की लिए एक और मूर्खतापूर्ण प्रयास किया। अब भृंगी ने चूहे का रुप धारण कर लिया।


चूहे के रूप में प्रभु के अर्द्धनारीश्वर रुप को कुतरकर एक दूसरे से अलग करने की कोशिश में जुट गए। अब यह तो अति थी। शिवभक्त भृंगी की धृष्टता को लगातार सहन करती आ रही जगदंबा का धैर्य चूक गयी|


उन्होंने भृंगी को श्राप दिया- “हे भृंगी तू सृष्टि के आदि नियमों का उल्लंघन कर रहा है। यदि तू मातृशक्ति का सम्मान करने में अपनी हेठी समझता है तो अभी इसी समय तेरे शरीर से तेरी माता का अंश अलग हो जाएगा।


यह श्राप सुनकर स्वयं महादेव भी व्याकुल हो उठे। भृंगी की बुद्धि भले ही हर गई थी पर महादेव जानते थे कि इस श्राप का मतलब कितना गंभीर है। 


*शरीर विज्ञान की तंत्रोक्त व्याख्या के मुताबिक इंसान के शरीर में हड्डियां और पेशियां पिता से मिलती हैं, जबकि रक्त और मांसमाता के अंश से प्राप्त होता है।*


फिर क्या था, भृंगी की तो दुर्गति हो गई। उनके शरीर से तत्काल रक्त और मांस अलग हो गया। शरीर में बची रह गईं तो सिर्फ हड्डियां और मांसपेशियां। मृत्यु तो हो नहीं सकती थी क्योंकि वो अविमुक्त कैलाश के क्षेत्र में थे और स्वयं सदाशिव और महामाया उनके सामने थे।


उनके प्राण हरने के लिए यमदूत वहां पहुंचने का साहस ही नहीं कर सकते थे। असह्य पीड़ा से भृंगी बेचैन होने लगे। ये शाप भी आदिशक्ति जगदंबा का दिया हुआ था। उन्होंने ये शाप भृंगी की भेदबुद्धि को सही रास्ते पर लाने के लिए दिया था। इसलिए महादेव भी बीच में नहीं पड़े।


इस शाप का लाभ यह हुआ कि भृंगी असहनीय पीड़ा में पड़कर समझ गए कि पितृशक्ति किसी भी सूरत में मातृशक्ति से परे नहीं है। माता और पितामिलकर ही इस शरीर का निर्माण करते हैं। इसलिए दोनों ही पूज्य हैं।इसके बाद भृंगी ने असह्य पीड़ा से तड़पते हुए जगदंबा की अभ्यर्थना की। माता तो माता होती है। उन्होंने तुरंत उनपर कृपा की और पीड़ा समाप्त कर दी। माता ने अपना शाप वापस लेने का उपक्रम शुरू किया लेकिन धन्य थे भक्त भृंगी भी। उन्होंने माता को शाप वापस लेने से रोका।


भृंगी ने कहा- माता मेरी पीड़ा दूर करके आपने मेरे उपर बड़ी कृपा की है। परंतु मुझे इसी स्वरुप में रहने दीजिए। मेरा यह स्वरूप संसार के लिए एक उदाहरण होगा। इस सृष्टि में फिर से कोई मेरी तरह भ्रम का शिकार होकर माता और पिता को एक दूसरे से अलग समझने की भूल न करेगा। मैंने इतना अपराध किया फिर भी आपने मेरे ऊपर अनुग्रह किया। अब मैं एक जीवंत उदाहरण बनकर सदैव आपके आसपास ही रहूंगा।


भक्त की यह बात सुनकर महादेव और जगदंबा दोनों पुलकित हो गए। अर्द्धनारीश्वर स्वरुप धारण किए हुए मां जगदंबा और पिता महादेव ने तुरंत भृंगी को अपने गणों में प्रमुख स्थान दिया। भृंगी चलने-फिरने में समर्थ हो सकें इसलिए उन्हें तीसरा पैर भी दिया। तीसरे पैर से वह अपने भार को संभालकर शिव-पार्वती के साथ चलते हैं।अर्धनारीश्वर भगवान ने कहा- हे भृंगी तुम सदा हमारे साथ रहोगे। 


तुम्हारी उपस्थिति इस जगत को संदेश होगी कि हर जीव में जितना अंश पुरूष है उतनी ही अंश है नारी। नारी और पुरुष में भेद करने वाले की गति तुम्हारे जैसे हो जाती है। पुरुष और स्त्री मिलकर संसार को आगे बढ़ाएं, दोनों बराबर अंश के योगी हैं यही सिद्ध करने को मैंने अर्धनारीश्वर रूप धरा है। स्त्री-पुरुष दोनों का अपना स्थान, अपना अस्तित्व है। इसे नकारने वाले को शिव-शिवा दोनों में से किसी की भी कृपा प्राप्त नहीं होती। वह जीव मृत्युलोक में सदा शिव-शिवा की कृपा के लिए तरसता ही विदा हो जाएगा।


भृंगी को वो पद प्राप्त हुआ, जिसे हासिल करने के लिए इंद्रादि बड़े-बड़े देवता भी लालायित रहते हैं। संसार को मैथुनी सृष्टि की व्यवस्था शिवजी ने दी है। 


इसके लिए उन्होंने सबसे पहले ब्रह्मा को अपना अर्धनारीश्वर स्वरूप दिखाया। उसे देखकर ही ब्रह्मा ने नारी की कल्पना की। नारी और पुरुष के संयोग से सृष्टि रचना की व्यवस्था दी। अर्थात नर-नारी मिलकर सूक्ष्म ब्रह्मा की तरह सृष्टिकर्ता हो जाते हैं। फिर शिव ने जगदंबा के साथ विवाह व्यवस्था दी। सर्वप्रथम विवाह शिव-जगदंबा का ही है।

गुरुवार, 21 जनवरी 2021

कैसे बनें भगवान विष्णु तिरुपति बालाजी?

 कैसे बने भगवान विष्णु तिरुपति बालाजी 

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  एक बार समस्त देवताओं ने मिलकर एक यज्ञ करने का निश्चय किया । यज्ञ की तैयारी पूर्ण हो गयी । तभी वेद ने एक प्रश्न किया तो एक व्यवहारिक समस्या आ खड़ी हुई । ऋषि-मुनियों द्वारा किए जाने वाले यज्ञ की हविष्य तो देवगण ग्रहण करते थे । लेकिन देवों द्वारा किए गए यज्ञ की पहली आहूति किसकी होगी ? यानी सर्वश्रेष्ठ देव का निर्धारण जरुरी था, जो फिर अन्य सभी देवों को यज्ञ भाग प्रदान करे ।


  ब्रह्मा-विष्णु-महेश परम् अात्मा हैं । इनमें से श्रेष्ठ कौन है ? इसका निर्णय आखिर हो तो कैसे ? भृगु ने इसका दायित्व सम्भाला । वह देवों की परीक्षा लेने चले । ऋषियों से विदा लेकर वह सर्व प्रथम अपने पिता ब्रह्मदेव के पास पहुँचे ।


  ब्रह्मा जी की परीक्षा लेने के लिए भृगु ने उन्हें प्रणाम नहीं किया । इससे ब्रह्मा जी अत्यन्त कुपित हुए और उन्हें शिष्टता सिखाने का प्रयत्न किया । भृगु को गर्व था कि वह तो परीक्षक हैं, परीक्षा लेने आए हैं । पिता-पुत्र का आज क्या रिश्ता ? भृगु ने ब्रह्म देव से अशिष्टता कर दी । ब्रह्मा जी का क्रोध बढ़ गया और अपना कमण्डल लेकर पुत्र को मारने भागे । भृगु किसी तरह वहाँ से जान बचाकर भाग चले आए ।


  इसके बाद वह शिव जी के लोक कैलाश गए । भृगु ने फिर से धृष्टता की । बिना कोई सूचना का शिष्टाचार दिखाए या शिव गणों से आज्ञा लिए सीधे वहाँ पहुँच गए, जहाँ शिव जी माता पार्वती के साथ विश्राम कर रहे थे । आए तो आए, साथ ही अशिष्टता का आचरण भी किया । शिव जी शांत रहे, पर भृगु न समझे । शिव जी को क्रोध आया तो उन्होंने अपना त्रिशूल उठाया । भृगु वहाँ से भागे । 


  अन्त में वह भगवान विष्णु के पास क्षीर सागर पहुंचे । श्री हरि शेष शय्या पर लेटे निद्रा में थे और देवी लक्ष्मी उनके चरण दबा रही थीं । महर्षि भृगु दो स्थानों से अपमानित करके भगाए गए थे । उनका मन बहुत दुखी था । विष्णु जी को सोता देख । उन्हें न जाने क्या हो गया और उन्होंने विष्णु जी को जगाने के लिए उनकी छाती पर एक लात जमा दी ।


  विष्णु जी जाग उठे और भृगु से बोले  "हे ब्राह्मण देवता ! मेरी छाती वज्र समान कठोर है और आपका शरीर तप के कारण दुर्बल है, कहीं आपके पैर में चोट तो नहीं आयी ? आपने मुझे सावधान करके कृपा की है । आपका चरण चिह्न मेरे वक्ष पर सदा अंकित रहेगा ।"


  भृगु को बड़ा आश्चर्य हुआ । उन्होंने तो भगवान की परीक्षा लेने के लिए यह अपराध किया था । परन्तु भगवान तो दण्ड देने के बदले मुस्करा रहे थे । उन्होंने निश्चय किया कि श्रीहरि जैसी विनम्रता किसी में नहीं । वास्तव में विष्णु ही सबसे बड़े देवता हैं । लौट करके उन्होंने सभी ऋषियों को पूरी घटना सुनायी । सभी ने एक मत से यह निर्णय किया कि भगवान विष्णु को ही यज्ञ का प्रधान देवता समझकर मुख्य भाग दिया जाएगा ।


  लेकिन लक्ष्मी जी ने भृगु को अपने पति की छाती पर लात मारते देखा तो उन्हें बड़ा क्रोध आया । परन्तु उन्हें इस बात पर क्षोभ था कि श्रीहरि ने उद्दण्ड को दण्ड देने के स्थान पर उसके चरण पकड़ लिए और उल्टे क्षमा मांगने लगे ! क्रोध से तमतमाई महालक्ष्मी को लगा कि वह जिस पति को संसार का सबसे शक्तिशाली समझती है, वह तो निर्बल हैं । यह धर्म की रक्षा करने के लिए अधर्मियों एवं दुष्टों का नाश कैसे करते होंगे ?


  महालक्ष्मी ग्लानि में भर गई और मन श्रीहरि से उचाटन हो गया । उन्होंने श्रीहरि और बैकुण्ठ लोक दोनों के त्याग का निश्चय कर लिया । स्त्री का स्वाभिमान उसके स्वामी के साथ बंधा होता है । उनके समक्ष कोई स्वामी पर प्रहार कर गया और स्वामी ने प्रतिकार भी न किया, यह बात मन में कौंधती रही । यह स्थान वास के योग्य नहीं । पर, त्याग कैसे करें ? श्रीहरि से ओझल होकर रहना कैसे होगा ? वह उचित समय की प्रतीक्षा करने लगीं ।


  श्रीहरि ने हिरण्याक्ष के कोप से मुक्ति दिलाने के लिए वराह अवतार लिया और दुष्टों का संहार करने लगे । महालक्ष्मी के लिए यह समय उचित लगा । उन्होंने बैकुण्ठ का त्याग कर दिया और पृथ्वी पर एक वन में तपस्या करने लगीं ।

 तप करते-करते उन्होंने अपना शरीर छोड़ दिया । विष्णु जी वराह अवतार का अपना कार्य पूर्ण कर वैकुण्ठ लौटे तो महालक्ष्मी नहीं मिलीं । वह उन्हें खोजने लगे ।


  श्रीहरि ने उन्हें तीनों लोकों में खोजा किन्तु तप करके माता लक्ष्मी ने भ्रमित करने की अनुपम शक्ति प्राप्त कर ली थी । उसी शक्ति से उन्होंने श्री हरि को भ्रमित रखा । आख़िर श्रीहरि को पता लग ही गया । लेकिन तब तक वह शरीर छोड़ चुकीं थीं । दिव्य दृष्टि से उन्होंने देखा कि लक्ष्मी जी ने चोलराज के घर में जन्म लिया है । श्रीहरि ने सोचा कि उनकी पत्नी ने उनका त्याग सामर्थ्यहीन समझने के भ्रम में किया है, इसलिए वह उन्हें पुनः प्राप्त करने के लिए अलौकिक शक्तियों का प्रयोग नहीं करेंगे ।


  महालक्ष्मी ने मानव रुप धरा है तो अपनी प्रिय पत्नी को प्राप्त करने के लिए वह भी साधारण मानवों के समान व्यवहार करेंगे और महालक्ष्मी जी का हृदय और विश्वास जीतेंगे । भगवान ने श्रीनिवास का रुप धरा और पृथ्वी लोक पर चोलनरेश के राज्य में निवास करते हुए महालक्ष्मी से मिलन के लिए उचित अवसर की प्रतीक्षा करने लगे ।


  राजा आकाशराज निःसंतान थे । उन्होंने शुकदेव जी की आज्ञा से सन्तान प्राप्ति यज्ञ किया । यज्ञ के बाद यज्ञशाला में ऋषियों ने राजा को हल जोतने को कहा गया । राजा ने हल जोता तो हल का फल किसी वस्तु से टकराया । राजा ने उस स्थान को खोदा तो एक पेटी के अन्दर सहस्रदल कमल पर एक छोटी-सी कन्या विराजमान थी । वह महालक्ष्मी ही थीं । राजा के मन की मुराद पूरी हो गई थी । चूंकि कन्या कमल के फूल में मिली थी, इसलिए उसका नाम रखा गया "पदमावती" ।


  पदमावती नाम के अनुरुप ही रुपवती और गुणवती थी । साक्षात लक्ष्मी का अवतार । पद्मावती विवाह के योग्य हुई । एक दिन वह बाग में फूल चुन रही थी । उस वन में श्रीनिवास (बालाजी) आखेट के लिए गए थे । उन्होंने देखा कि एक हाथी एक युवती के पीछे पड़ा है और डरा रहा है । राजकुमारी के सेवक भाग खड़े हुए । श्रीनिवास ने तीर चलाकर हाथी को रोका और पदमावती की रक्षा की । श्रीनिवास और पदमावती ने एक-दूसरे को देखा और रीझ गए । दोनों के मन में परस्पर अनुराग पैदा हुआ । लेकिन दोनों बिना कुछ कहे अपने-अपने घर लौट गए ।


  श्रीनिवास घर तो लौट आए, लेकिन मन पदमावती में ही बस गया । वह पदमावती का पता लगाने के लिए उपाय सोचने लगे । उन्होंने ज्योतिषी का रुप धरा और भविष्य बांचने के बहाने पदमावती को ढूंढने निकल पड़े । धीरे-धीरे ज्योतिषी श्रीनिवास की ख्याति पूरे चोल राज में फैल गयी । 


  पदमावती के मन में श्रीनिवास के लिए प्रेम जागृत हुआ । वह भी उनसे मिलने को व्याकुल थीं । किन्तु कोई पता-ठिकाना न होने के कारण उनका मन चिंतित था । इस चिन्ता और प्रेम विरह में उन्होंने भोजन-श्रृंगार आदि का त्याग कर दिया । इसके कारण उसका शरीर कृशकाय होता चला गया । राजा से पुत्री की यह दशा देखी नहीं जा रही थी, वह चिंतित थे । ज्योतिषी की प्रसिद्धि की सूचना राजा को हुई ।


  राजा ने ज्योतिषी श्रीनिवास को बुलाया और सारी बात बताकर अपनी कन्या की दशा का कारण बताने को कहा । श्रीनिवास राजकुमारी का हाल समझने पहुंचे तो पदमावती को देखकर प्रसन्न हो गए । उनका उपक्रम सफल हुआ । उन्होंने परदमावती का हाथ अपने हाथ में लिया । कुछ देर तक पढने का स्वांग करने के बाद बोले - "महाराज ! आपकी पुत्री प्रेम के विरह में जल रही है । आप इनका शीघ्र विवाह कर दें तो ये स्वस्थ हो जायेंगी ।"


  पदमावती ने अब श्रीनिवास की ओर देखा । देखते ही पहचान लिया । उनके मुख पर प्रसन्नता के भाव आए और वह हँसीं । काफी दिनों बाद पुत्री को प्रसन्न देख राजा को लगा कि ज्योतिषी का अनुमान सही है । राजा ने श्रीनिवास से पूछा - "ज्योतिषी महाराज ! यदि आपको यह पता है कि मेरी पुत्री प्रेम के विरह में पीड़ित है तो आपको यह भी सूचना होगी कि मेरी पुत्री को किससे प्रेम है ? उसका विवाह करने को तैयार हूँ, आप उसका परिचय दें ?


  श्रीनिवास ने कहा - "महाराज ! आपकी पुत्री एक दिन वन में फूल चुनने गई थी । एक हाथी ने उन पर हमला किया तो आपके सैनिक और दासियां भाग खड़ी हुईं । राजकुमारी के प्राण एक धनुर्धर ने बचाए थे ।"


  राजा ने कहा - "हाँ, मेरे सैनिकों ने बताया था कि एक दिन ऐसी घटना हुई थी । एक वीर पुरुष ने उसके प्राण बचाए थे । लेकिन मेरी पुत्री के प्रेम से उस घटना का क्या तात्पर्य है ?"


  श्रीनिवास ने बताया - "महाराज ! आपकी पुत्री को अपनी जान बचाने वाले उसी युवक से प्रेम हुआ है ।" राजा के पूछने पर श्रीनिवास ने कहा - "वह कोई साधारण युवक नहीं, बल्कि शंख चक्रधारी स्वयं भगवान विष्णु ही हैं । इस समय बैकुण्ठ को छोड़कर मानव रुप में श्रीनिवास के नाम से पृथ्वी पर वास कर रहे हैं । आप अपनी पुत्री का विवाह उनसे करें । मैं इसकी सारी व्यवस्था करा दूंगा ।" यह बात सुनकर राजा प्रसन्न हो गए कि स्वयं विष्णु उनके जमाई बनेंगे ।


  श्रीनिवास और पदमावती का विवाह तय हो गया । श्रीनिवास रुप में श्रीहरि ने शुकदेव के माध्यम से समस्त देवी-देवताओं को अपने विवाह की सूचना भिजवा दी । शुकदेव की सूचना से सभी देवी-देवता अत्यंत प्रसन्न हुए । देवी-देवता श्रीनिवास जी से मिलने औऱ बधाई देने पृथ्वी पर पहुंचे ।


  परन्तु श्रीनिवास जी को खुशी के बीच एक चिंता भी होने लगी । देवताओं ने पूछा - "भगवन ! संसार की चिंता हरने वाले आप इस उत्सव के मौके पर इतने चिंतातुर क्यों हैं ?"


  श्रीनिवास जी ने कहा - "चिंता की बात तो है ही, धन का अभाव । महालक्ष्मी ने मुझे त्याग दिया, इस कारण धनहीन हो चुका हूँ । स्वयं महालक्ष्मी ने तप से शरीर त्याग मानव रुप लिया है और पिछली स्मृतियों को गुप्त कर लिया है । इस कारण उन्हें यह सूचना नहीं है कि वह महालक्ष्मी का स्वरुप हैं । वह तो स्वयं को राजकुमारी पदमावती ही मानती हैं । मैंने निर्णय किया है कि जब तक उनका प्रेम पुनः प्राप्त नहीं करता, अपनी माया का उन्हें आभास नहीं कराउंगा । इस कारण मैं एक साधारण मनुष्य का जीवन व्यतीत कर रहा हूँ। और वह हैं, राजकुमारी । राजा की पुत्री से शादी करने और घर बसाने के लिए धन, वैभव और ऐश्वर्य की जरुरत है । वह मैं कहां से लाऊं ?"


   स्वयं नारायण को धन की कमी सताने लगी । मानव रुप में आए प्रभु को भी विवाह के लिए धन की आवश्यकता हुई । यही तो ईश्वर की लीला है । जिस रुप में रहते हैं, उस योनि के जीवों के सभी कष्ट सहते हैं । श्रीहरि विवाह के लिए धन का प्रबंध कैसे हो ? इस बात से चिंतित हैं । देवताओं ने जब यह सुना तो उन्हें आश्चर्य हुआ । देवताओं ने कहा - "कुबेर, आवश्यकता के बराबर धन की व्यवस्था कर देंगे ।"


  देवताओं ने कुबेर का आह्वान किया तो कुबेर प्रकट हुए । कुबेर ने कहा - "यह तो मेरे लिए प्रसन्नता की बात है कि आपके लिए कुछ कर सकूं ।  प्रभु ! आपके लिए धन का तत्काल प्रबंध करता हूँ । कुबेर का कोष आपकी कृपा से ही रक्षित है ।"


  श्रीहरि ने कुबेर से कहा - "यक्षराज कुबेर ! आपको भगवान भोलेनाथ ने जगत और देवताओं के धन की रक्षा का दायित्व सौंपा है । उसमें से धन मैं अपनी आवश्यकता के हिसाब से लूंगा अवश्य, पर मेरी एक शर्त भी होगी ।"


  श्रीहरि कुबेर से धन प्राप्ति की शर्त रख रहे हैं, यह सुनकर सभी देवता आश्चर्य में पड़ गए । श्रीहरि ने कहा - "ब्रह्मा जी और शिव जी साक्षी रहें । कुबेर से धन ऋण के रुप में लूंगा, जिसे भविष्य में ब्याज सहित चुकाऊंगा ।"


  श्रीहरि की बात से कुबेर समेत सभी देवता विस्मय में एक-दूसरे को देखने लगे । कुबेर बोले - "भगवन ! मुझसे कोई अपराध हुआ तो उसके लिए क्षमा कर दें । पर, ऐसी बात न कहें । आपकी कृपा से विहीन होकर मेरा सारा कोष नष्ट हो जाएगा ।"


  श्रीहरि ने कुबेर को निश्चिंत करते हुए कहा - "आपसे कोई अपराध नहीं हुआ । मैं मानव की कठिनाई का अनुभव करना चाहता हूँ । मानव रुप में उन कठिनाइयों का सामना करुँगा, जो मानव को आती हैं । धन की कमी और ऋण का बोझ सबसे बड़ा होता है ।"


  कुबेर ने कहा - "प्रभु ! यदि आप मानव की तरह ऋण पर धन लेने की बात कर रहे हैं तो फिर आपको मानव की तरह यह भी बताना होगा कि ऋण चुकाएंगे कैसे ? मानव को ऋण प्राप्त करने के लिए कई शर्तें झेलनी पड़ती हैं ।"


  श्रीनिवास ने कहा - "कुबेर ! यह ऋण मैं नहीं, मेरे भक्त चुकाएंगे । लेकिन मैं उनसे भी कोई उपकार नहीं लूंगा । मैं अपनी कृपा से उन्हें धनवान बनाऊंगा । कलियुग में पृथ्वी पर मेरी पूजा धन, ऐश्वर्य और वैभव से परिपूर्ण देवता के रुप में होगी । मेरे भक्त मुझसे धन, वैभव और ऐश्वर्य की मांग करने आएंगे । मेरी कृपा से उन्हें यह प्राप्त होगा, बदले में भक्तों से मैं दान प्राप्त करूंगा जो चढ़ावे के रुप में होगा । मैं इस तरह आपका ऋण चुकाता रहूंगा ।"


  कुबेर ने कहा - "भगवन ! कलियुग में मानव जाति धन के विषय में बहुत विश्वास के योग्य नहीं रहेगी । उन पर आवश्यकता से अधिक विश्वास करना क्या उचित होगा ?"


  श्रीनिवास जी बोले - "शरीर त्यागने के बाद तिरुपति के तिरुमाला पर्वत पर बाला जी के नाम से लोग मेरी पूजा करेंगे । मेरे भक्तों की अटूट श्रद्धा होगी । वह मेरे आशीर्वाद से प्राप्त धन में मेरा हिस्सा रखेंगे । इस रिश्ते में न कोई दाता है और न कोई याचक । हे कुबेर ! कलियुग के आखिरी तक भगवान बाला जी धन, ऐश्वर्य और वैभव के देवता बने रहेंगे । मैं अपने भक्तों को धन से परिपूर्ण करूंगा तो मेरे भक्त दान से न केवल मेरे प्रति अपना ऋण उतारेंगे, बल्कि मेरा ऋण उतारने में भी मदद करेंगे । इस तरह कलियुग की समाप्ति के बाद मैं आपका मूलधन लौटा दूंगा ।"


  कुबेर ने श्रीहरि द्वारा भक्त और भगवान के बीच एक ऐसे रिश्ते की बात सुनकर उन्हें प्रणाम किया और धन का प्रबंध कर दिया । भगवान श्रीनिवास और कुबेर के बीच हुए समझौते के साक्षी स्वयं ब्रह्मा और शिव जी हैं । दोनों वृक्ष रुप में साक्षी बन गए । आज भी पुष्करणी तीर्थ के किनारे ब्रह्मा और शिव जी बरगद के पेड़ के रुप में साक्षी बनकर खड़े हैं ।


  ऐसा कहा जाता है कि निर्माण कार्य के लिए स्थान बनाने के लिए इन दोनों पेड़ों को जब काटा जाने लगा तो उनमें से खून की धारा फूट पड़ी । पेड़ काटना बन्द करके उसकी देवता की तरह पूजा होने लगी ।


  इस तरह भगवान श्रीनिवास (बाला जी) और पदमावती (महालक्ष्मी) का विवाह पूरे धूमधाम से हुआ । जिसमें सभी देवगण पधारे । भक्त मन्दिर में दान देकर भगवान पर चढ़ा ऋण उतार रहे हैं, जो कलियुग के अन्त तक जारी रहेगा ।


रविवार, 10 जनवरी 2021

भगवान विष्णु के तीन नाम करते हैं रोगों का नाश



सभी रसायन हम करी नहीं नाम सम कोय।

रंचक घट मैं संचरै, सब तन कंचन होय।।


सारा संसार आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक रोगों से ग्रस्त है। कभी-कभी सभी प्रकार की दवाएं कर लेने पर भी रोग मिटता नहीं, डॉक्टर भी रोग को पहचान नहीं पाते हैं। ऐसी स्थिति में भगवान का नाम-जप ही वह रसायन (औषधि) है जो मनुष्य के शारीरिक व मानसिक रोगों का नाश कर काया को कंचन की तरह बना देता है। जैसे भगवान में अनन्त चमत्कार हैं, अनन्त शक्तियां हैं; वैसे ही अनन्त शक्तियों से भरे उनके नाम जादू की पिटारी हैं जो लौकिक रोगों की तो बात ही क्या, भयंकर भवरोग को भी मिटा देते हैं।


भगवान धन्वन्तरि समुद्र-मंथन से प्रकट हुए। उन्होंने देवताओं व ऋषियों को औषधि, रोग-निदान और उपचार आदि के बारे में बताया। सभी रोगों पर समान और सफल रूप से कार्य करने वाली महौषधि (सबसे बड़ी दवा) के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा–


*अच्युतानन्तगोविन्द नामोच्चारण भेषजात्।*

*नश्यन्ति सकला रोगा: सत्यं सत्यं वदाम्यहम्।।*


अर्थात्–‘अच्युत, अनन्त, गोविन्द–इन नामों के उच्चारणरूपी औषधि से समस्त रोग दूर हो जाते हैं, यह मैं सत्य-सत्य कहता हूँ।’


इस श्लोक में ‘सत्य’ शब्द दो बार कहा गया है जिसका अर्थ है यह बात अटल सत्य है कि श्रद्धा और विश्वास के साथ इस श्लोक का जप करने से सभी प्रकार के रोग दूर हो जाते हैं। रोग-निवारक औषधि के रूप में भगवान विष्णु के तीन नामों का यह श्लोक बहुत चमत्कारी है। इस श्लोक में भगवान के तीन नामों–‘अच्युत’, ‘अनन्त’ और ‘गोविन्द’ का उल्लेख किया गया है। यदि संस्कृत में इस श्लोक का जप करने में असुविधा हो तो भगवान के केवल इन तीन नामों का जप किया जा सकता है।


भगवान विष्णु के तीन नाम हैं अमोघ मन्त्र

‘अच्युत’, ‘अनन्त’ और ‘गोविन्द’ ये भगवान विष्णु के तीन नाम अमोघ मन्त्र हैं। इन नामों के शुरु में ‘ॐ’ (प्रणव) और अंत में ‘नम:’ लगा कर इनका जप करना चाहिए–


*ॐ अच्युताय नम:*

*ॐ अनन्ताय, नम:*

*ॐ गोविन्दाय नम:*


इस तीन नामरूपी मन्त्र का एकाग्रचित्त होकर जप करने से विष, रोग और अग्नि से होने वाली अकालमृत्यु का भय नहीं होता है। सभी प्रकार के रोगों से तथा शारीरिक व मानसिक कष्टों से मुक्ति मिल जाती है। इन नामों के जप करते रहने से कार्यों में सफलता मिलती है। भगवान विष्णु के इन नामों का जप उठते-बैठते, चलते-फिरते, सोते-जागते सब समय किया जा सकता है–


साँस साँस सुमिरन करौ, यह उपाय अति नीक।


संजीवनी बूटी है भगवन्नाम!!!!!!!


भगवान की भक्ति संजीवनी बूटी और श्रद्धा पथ्य है। जिस प्रकार असाध्य रोगों की शान्ति संजीवनी बूटी से ही हो पाती है, उसी प्रकार शारीरिक व मानसिक रोगों का नाश भगवान की आराधना व नाम-जप से हो जाता है। वेदव्यासजी ने कहा है–’सब रोगों की शान्ति के लिए भगवान विष्णु का ध्यान, पूजन व जप सर्वोत्तम औषधि है।’


भगवन्नाम-स्मरण से रोग कैसे दूर हो जाते हैं?

भगवन्नाम-स्मरण से रोग कैसे दूर हो जाते हैं?–इसका उत्तर कर्मसिद्धान्त में छुपा है। शास्त्रों के अनुसार पूर्वजन्म के शुभ-अशुभ कर्मों के अनुसार ही हमें जीवन में सुख-दु:ख, रोक-शोक तथा दरिद्रता आदि प्राप्त होते है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा है–


करम प्रधान बिस्व करि राखा।

जो जस करइ सो तस फलु चाखा।।


हमारे शरीर में जो भी रोग होते हैं, उनका कारण हमारे पूर्वजन्म में या इस जन्म में किए हुए पापकर्म ही होते हैं। भगवान के नाम-जप से पाप नष्ट होने लगते हैं और इसी कारण पापजन्य रोग भी दूर होने लगते हैं। प्रारब्धजन्य रोग के मिटने में दवाई तो केवल नाममात्र काम करती है। मूल में तो प्रारब्ध समाप्त होते ही रोग भी मिट जाता है। संसार में कोई रोग ऐसा नहीं है जो प्रारब्ध-कर्म के क्षय होने पर ठीक न हो। इसीलिए शास्त्रों में प्रतिदिन भगवन्नाम-जप करने को कहा जाता है।


नाम-त्रय-मन्त्र की महिमा!!!!!!!


▪️पद्मपुराण में एक कथा है कि समुद्र-मंथन के समय सबसे पहले कालकूट नामक महाभयंकर विष प्रकट हुआ जो प्रलयकाल की अग्नि के समान था। उसे देखते ही सभी देवता और दानव भय के मारे भागने लगे। भगवान शंकर ने देवताओं और दानवों से कहा–’तुम लोग इस विष से भय न करो। इस कालकूट नामक महाभयंकर विष को मैं अपना आहार बना लूंगा।’


उनकी बात सुनकर सभी देवता भगवान शंकर के चरणों में गिर गए। शंकरजी ने सर्वदु:खहारी भगवान नारायण का ध्यान और तीन नामरूपी (नामत्रय) महामन्त्र का जप करते हुए उस महाभयंकर विष को पीकर कण्ठ में धारण कर लिया और ‘नीलकण्ठ’ बनकर संसार को भस्मीभूत होने से बचा लिया।


▪️ ऐसा कहा जाता है कि देवी ललिता के साथ युद्ध में असुर भंडासुर ने रोगिनी-अस्त्र का प्रयोग किया। इस अस्त्र के प्रभाव से सारी सेना विभिन्न रोगों से ग्रस्त हो जाती है।


 रोगिनी-अस्त्र के बचाव के लिए देवी ललिता ने नामत्रय मन्त्र का प्रयोग किया था।


दृढ़ विश्वास, श्रद्धा, भगवान में सच्ची प्रीति तथा आस्तिक भावना धारण करने से भगवान अवश्य ही अपने भक्तों का कष्ट निवारण करते हैं। प्रभु पर सब कुछ छोड़ देने से मनुष्य निश्चिन्त हो जाता है और उसके सारे कष्टों का अंत हो जाता है। केवल विश्वास करने भर की देर है–


अनाथ कौन है यहां, त्रिलोकनाथ साथ हैं।

दयालु दीनबंधु के बड़े विशाल हाथ हैं।।

सोमवार, 4 जनवरी 2021

इन लोगों से कभी झगड़ा ना करें ‌

 *भूलकर कर भी इन लोगों से विवाद नहीं करना चाहिए*


मनु स्‍मृति में कहा गया है : -

**ऋत्विक्पुरोहिताचार्यैर्मातुलातिथिसंश्रितैः। बालवृद्धातुरैर्वैधैर्ज्ञातिसम्बन्धिबांन्धवैः।। 

मातापितृभ्यां यामीभिर्भ्रात्रा पुत्रेण भार्यया। 

दुहित्रा दासवर्गेण विवादं न समाचरेत्।।**



अर्थात : - यज्ञ करने वाले ब्राह्मण, पुरोहित, शिक्षा देने वाले आचार्य, अतिथि, माता-पिता, मामा आदि सगे संबंधी, भाई-बहन, पुत्र-पुत्री, पत्नी, पुत्रवधू, दामाद, गृह सेवक यानी नौकर से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। 


यज्ञ करने वाला : - यज्ञ करने वाला ब्राह्मण सदैव सम्मान करने योग्य होता है। यदि उससे किसी प्रकार की कोई चूक हो जाए तो भी उसके साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। यदि आप ऐसा करेंगे तो इससे आपकी प्रतिष्ठा ही धूमिल होगी। अतः यज्ञ करने वाले वाले ब्राह्मण से वाद-विवाद न करने में ही भलाई है।


पुरोहित : - यज्ञ, पूजन आदि धार्मिक कार्यों को संपन्न करने के लिए हमारे कुल में योग्य व विद्वान ब्राह्मण को नियुक्त किया जाता है, जिसे पुरोहित कहा जाता है। भूल कर भी कभी पुरोहित से विवाद नहीं करना चाहिए। पुरोहित के माध्यम से ही पूजन आदि शुभ कार्य संपन्न होते हैं, जिसका पुण्य यजमान (यज्ञ करवाने वाला) को प्राप्त होता है। पुरोहित से वाद-विवाद करने पर वह आपका काम बिगाड़ सकता है, जिसका दुष्परिणाम यजमान को भुगतना पड़ सकता है। इसलिए पुरोहित से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।


आचार्य : - प्राचीनकाल में उपनयन संस्कार के बाद बच्चों को शिक्षा के लिए गुरुकुल भेजा जाता था, जहां आचार्य उन्हें पढ़ाते थे। वर्तमान में उन आचार्यों का स्थान स्कूल टीचर्स ने ले लिया है। मनु स्मृति के अनुसार आचार्य यानी स्कूल टीचर्स से भी कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। वह यदि दंड भी दें तो उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। आचार्य (टीचर्स) हमेशा अपने छात्रों का भला ही सोचते हैं। इनसे वाद-विवाद करने पर विद्यार्थी का भविष्य भी खतरे में पड़ सकता है।


अतिथि : - हिंदू धर्म में अतिथि यानी मेहमान को भगवान की संज्ञा दी गई है इसलिए कहा जाता है मेहमान भगवान के समान होता है। उसका आवभगत ठीक तरीके से करनी चाहिए। भूल से भी कभी अतिथि के साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। अगर कोई अनजान व्यक्ति भी भूले-भटके हमारे घर आ जाए तो उसे भी मेहमान ही समझना चाहिए और यथासंभव उसका सत्कार करना चाहिए। अतिथि से वाद-विवाद करने पर आपकी सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस लग सकती है।


माता : - माता ही शिशु की सबसे प्रथम शिक्षक होती है। माता 9 महीने शिशु को अपने गर्भ में धारण करती है और जीवन का प्रथम पाठ पढ़ाती है। यदि वृद्धावस्था या इसके अतिरिक्त भी कभी माता से कोई भूल-चूक हो जाए तो उसे प्यार से समझा देना चाहिए न कि उसके साथ वाद-विवाद करना चाहिए। माता का स्थान गुरु व भगवान से ही ऊपर माना गया है। इसलिए माता सदैव पूजनीय होती हैं। अतः माता के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।


पिता : - पिता हमारे द्वितीय शिक्षक होते है, जन्म से लेकर युवावस्था तक हमारा पालन-पोषण करते हैं। पिता भी माता के ही समान पूज्यनीय होते हैं। हम जब भी किसी मुसीबत में फंसते हैं, तो सबसे पहले पिता को ही याद करते हैं और पिता हमें उस समस्या का समाधान भी सूझाते हैं। वृद्धावस्था में भी पिता अपने अनुभव के आधार पर हमारा मार्गदर्शन करते हैं। इसलिए पिता के साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।


सगे संबंधी : - हमारे सगे संबंधी जैसे- मामा-मामी, नाना-नानी, चाचा-चाची, ताऊ-ताईजी, बुआ-फूफाजी, मौसा-मौसी, ये सभी वो लोग होते हैं, जो बचपन से ही हम पर स्नेह रखते हैं। बचपन में कभी न कभी ये भी हमारी जरूरतें पूरी करते हैं। इसलिए ये सभी सम्मान करने योग्य हैं। इनसे वाद-विवाद करने पर समाज में हमें सभ्य नहीं समझा जाएगा और हमारी प्रतिष्ठा को भी ठेस लग सकती है। इसलिए भूल कर भी कभी मामा आदि सगे-संबंधियों से वाद-विवाद नहीं करना चाहिए। यदि ऐसी स्थिति बने तो भी समझा-बूझाकर इस मामले को सुलझा लेना चाहिए।


भाई : - हिंदू धर्म के अनुसार बड़ा भाई पिता के समान तथा छोटा भाई पुत्र के समान होता है। बड़ा भाई सदैव मार्गदर्शक बन कर हमें सही रास्ते पर चलने के प्रेरित करता है और यदि भाई छोटा है तो उसकी गलतियां माफ कर देने में ही बड़प्पन है। विपत्ति आने पर भाई ही भाई की मदद करता है। बड़ा भाई अगर परिवार रूपी वटवृक्ष का तना है तो छोटा भाई उस वृक्ष की शाखाएं। इसलिए भाई छोटा हो या बड़ा उससे किसी भी प्रकार का वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।


बहन : - भारतीय सभ्यता में बड़ी बहन को माता तथा छोटी बहन को पुत्री माना गया है। बड़ी बहन अपने छोटे भाई-बहनों को माता के समान स्नेह करती है। छोटे भाई-बहनों पर जब भी विपत्ति आती है, बड़ी बहन हर कदम पर उनका साथ देती है। छोटी बहन पुत्री के समान होती है। परिवार में जब भी कोई शुभ प्रसंग आता है, छोटी बहन ही उसे खास बनाती है। छोटी बहन जब घर में होती है तो घर का वातावरण सुखमय हो जाता है। इसलिए मनु स्मृति में कहा गया है कि बहन के साथ कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।


पुत्र : - हिंदू धर्म ग्रंथों में पुत्र को पिता का स्वरूप माना गया है यानी पुत्र ही पिता के रूप में पुनः जन्म लेता है। शास्त्रों में कहा गया है- "पुं नाम नरक त्रायेताति इति पुत्रः" अर्थात पुत्र ही पिता को पुं नामक नरक से मुक्ति दिलाता है इसलिए उसे पुत्र कहते हैं। पुत्र द्वारा पिंडदान, तर्पण आदि करने पर ही पिता की आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है। पुत्र यदि धर्म के मार्ग पर चलने वाला हो तो वृद्धावस्था में माता-पिता का सहारा बनता है और पूरे परिवार का मार्गदर्शन करता है। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पुत्र से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।


पुत्री : - भारतीय संस्कृति में पुत्री को लक्ष्मी का रूप माना जाता है कहते हैं कि भगवान जिस पर प्रसन्न होता है, उसे ही पुत्री प्रदान करता है। संभव है कि पुत्र वृद्धावस्था में माता-पिता का पालन-पोषण न करे, लेकिन पुत्री सदैव अपने माता-पिता का साथ निभाती है। परिवार में होने वाले हर मांगलिक कार्यक्रम की रौनक पुत्रियों से ही होती है। विवाह के बाद भी पुत्री अपने माता-पिता के करीब ही होती है। इसलिए पुत्री से कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।


पत्नी : - हिंदू धर्म में पत्नी को अर्धांगिनी कहा जाता है, जिसका अर्थ है पति के शरीर का आधा अंग। किसी भी शुभ कार्य व पूजन आदि में पत्नी का साथ में होना अनिवार्य माना गया है, उसके बिना पूजा अधूरी ही मानी जाती है। पत्नी ही हर सुख-दुख में पति का साथ निभाती है। वृद्धावस्था में यदि पुत्र आदि रिश्तेदार साथ न हो तो भी पत्नी कदम-कदम पर साथ चलती है। इसलिए मनु स्मृति के अनुसार पत्नी से भी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।


पुत्रवधू : - भारतीय संस्कृति के अनुसार पुत्रवधू को भी पुत्री के समान ही समझना चाहिए। पुत्रियों के अभाव में पुत्रवधू से ही घर में रौनक रहती है। कुल की मान-मर्यादा भी पुत्रवधू के ही हाथों में होती है। परिवार के सदस्यों व अतिथियों की सेवा भी पुत्रवधू ही करती है। पुत्रवधू से ही वंश आगे बढ़ता है। इसलिए यदि पुत्रवधू से कभी कोई चूक भी हो जाए तो भी उसके साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।


नौकर : - मनु स्मृति के अनुसार नौकर से भी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए क्योंकि वह आपकी एवं आपके परिवार की गुप्त बातें जानता है। वाद-विवाद करने पर वह उन्‍हें सार्वजनिक कर सकता है। इसलिए नौकर से भी कभी वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।


दामाद : - धार्मिक ग्रंथों में दामाद को पुत्र के समान माना गया है। पुत्र के न होने पर दामाद ही सभी जिम्मेदारी निभाता है तथा उत्तर कार्य (पिंडदान, तर्पण, श्राद्ध आदि) करने का अधिकारी भी होता है। दामाद से इसलिए भी विवाद नहीं करना चाहिए क्योंकि इसका असर आपकी पुत्री के दाम्पत्य जीवन पर भी पढ़ सकता है।

पितृपक्ष में परान्न से बचें

 गरुड़ पुराणोक्त पितृपक्ष परान्न निषेध कथा सनातन धर्म में 16 दिनों का पितृपक्ष वर्ष का सबसे सूक्ष्म और संवेदनशील समय माना गया है। गरुड़ पुरा...