गुरुवार, 25 मई 2023

बीमा बेचना- सर्वश्रेष्ठ पार्ट टाइम व्यवसाय

 क्यों बीमा बेचना सर्वश्रेष्ठ अंशकालिक व्यवसाय है


 परिचय:

 आज की तेज गति और गतिशील दुनिया में, बहुत से व्यक्ति लचीले और आकर्षक अंशकालिक व्यावसायिक अवसरों की तलाश कर रहे हैं। एक क्षेत्र जो एक संभावित विकल्प के रूप में सामने आता है, वह बीमा बिक्री है। बीमा उद्योग कई लाभ प्रदान करता है, जिसमें लचीले काम के घंटे, उच्च कमाई की क्षमता और लोगों के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डालने की क्षमता शामिल है। इस लेख में, हम उन कारणों की पड़ताल करेंगे कि क्यों बीमा बिक्री को सर्वश्रेष्ठ अंशकालिक व्यवसाय माना जाता है।

 1. लचीलापन: अंशकालिक व्यवसाय के रूप में बीमा बिक्री का एक प्राथमिक लाभ यह है कि यह लचीलापन प्रदान करता है। पारंपरिक 9 से 5 की नौकरियों के विपरीत, बीमा बिक्री पेशेवरों को अपने स्वयं के कार्यक्रम निर्धारित करने की स्वतंत्रता है। यह लचीलापन व्यक्तियों को अपने व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन को प्रभावी ढंग से संतुलित करने की अनुमति देता है। चाहे आपके पास पारिवारिक प्रतिबद्धताएं हों, कोई अन्य नौकरी, या व्यक्तिगत व्यवसाय हों, बीमा बिक्री आपको अपनी शर्तों पर काम करने और अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप एक शेड्यूल बनाने की अनुमति देती है।


 2. कम स्टार्ट-अप लागत: बीमा बेचने का व्यवसाय शुरू करने के लिए अन्य उद्यमशीलता उपक्रमों की तुलना में अपेक्षाकृत कम प्रारंभिक निवेश की आवश्यकता होती है। आमतौर पर, इच्छुक बीमा एजेंटों को एक लाइसेंसिंग पाठ्यक्रम पूरा करने की आवश्यकता होती है, जिसमें अक्सर एक मामूली शुल्क शामिल होता है। इसके अतिरिक्त, बुनियादी कार्यालय उपकरण, जैसे कंप्यूटर, फोन और इंटरनेट कनेक्शन, आरंभ करने के लिए आवश्यक एकमात्र आवश्यक उपकरण हैं। प्रवेश के लिए यह कम बाधा बीमा बिक्री को सीमित पूंजी वाले व्यक्तियों के लिए एक सुलभ अंशकालिक व्यावसायिक अवसर बनाती है।

 3. उच्च आय क्षमता: जबकि बीमा बिक्री को अंशकालिक रूप से आगे बढ़ाया जा सकता है, यह अभी भी महत्वपूर्ण कमाई की क्षमता प्रदान करता है। बीमा एजेंट आम तौर पर उनके द्वारा बेची जाने वाली नीतियों के आधार पर कमीशन कमाते हैं। इसका मतलब यह है कि आप जितनी अधिक पॉलिसी बेचते हैं, आपकी आय की क्षमता उतनी ही अधिक होती है। इसके अतिरिक्त, बीमा एजेंट अक्सर पिछले वर्षों में बेची गई नीतियों के लिए नवीनीकरण कमीशन प्राप्त करते हैं। जैसा कि आप ग्राहक आधार बनाते हैं और दीर्घकालिक संबंध स्थापित करते हैं, आपकी आय तेजी से बढ़ सकती है। कड़ी मेहनत और समर्पण के साथ, बीमा बिक्री आय का एक आकर्षक स्रोत बन सकती है, वित्तीय स्थिरता और विकास की संभावना प्रदान करती है।

 4. बीमा की बढ़ती मांग:

 बीमा आज के समाज में एक मूलभूत आवश्यकता है, जो व्यक्तियों और व्यवसायों को अप्रत्याशित घटनाओं और नुकसान से सुरक्षा प्रदान करता है। लोगों के सामने लगातार बढ़ते जोखिमों और अनिश्चितताओं के साथ, बीमा उत्पादों की मांग में वृद्धि जारी है। यह बढ़ती मांग बीमा एजेंटों के लिए एक विशाल बाजार अवसर पैदा करती है। अंशकालिक बीमा विक्रेता के रूप में, आप इस बाजार में टैप कर सकते हैं और बढ़ती मांग को भुनाने के दौरान उनकी वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए व्यक्तियों और व्यवसायों को मूल्यवान कवरेज समाधान प्रदान कर सकते हैं।

 5. सकारात्मक प्रभाव डालने का अवसर: बीमा बिक्री लोगों के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डालने का एक अनूठा अवसर प्रदान करती है। उन्हें उपयुक्त बीमा कवरेज प्रदान करके, आप व्यक्तियों और व्यवसायों को उनकी संपत्ति की रक्षा करने, उनके प्रियजनों की सुरक्षा करने और भविष्य की योजना बनाने में मदद करते हैं। एक बीमा एजेंट के रूप में, आप एक विश्वसनीय सलाहकार बन जाते हैं, ग्राहकों को बीमा पॉलिसियों की जटिलताओं के माध्यम से मार्गदर्शन करते हैं और उन्हें सूचित निर्णय लेने में मदद करते हैं। दूसरों की मदद करने और उनके जीवन में बदलाव लाने से जो संतुष्टि मिलती है, वह व्यक्तिगत और पेशेवर दोनों तरह से बेहद फायदेमंद हो सकती है।


 निष्कर्ष:

 अंशकालिक व्यावसायिक अवसरों पर विचार करते समय, बीमा बिक्री एक आशाजनक विकल्प के रूप में सामने आती है। अपने लचीले कामकाजी घंटों, कम स्टार्ट-अप लागत, उच्च कमाई की क्षमता, बढ़ती मांग और सकारात्मक प्रभाव डालने के अवसर के साथ, बीमा बिक्री कई तरह के फायदे प्रदान करती है। हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि बीमा बिक्री में सफलता के लिए समर्पण, मजबूत संचार कौशल और लगातार सीखने और बदलती बाजार स्थितियों के अनुकूल होने की इच्छा की आवश्यकता होती है। यदि आपके पास ये गुण हैं और आप एक अंशकालिक व्यावसायिक उद्यम की तलाश कर रहे हैं, तो बीमा बिक्री आपके लिए एकदम उपयुक्त हो सकती है।

शनिवार, 8 अप्रैल 2023

वैशाखमास महात्म्य – स्कन्द पुराण से

 वैशाखमास महात्म्य – स्कन्द पुराण से

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वैशाख मास की श्रेष्ठता

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नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तम् ।

देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ।।

अर्थ – भगवान नारायण, नरश्रेष्ठ नर, देवी सरस्वती तथा महर्षि वेदव्यास को नमस्कार करके भगवान की विजय-कथा से परिपूर्ण इतिहास-पुराण आदि का पाठ करना चाहिए।

 

सूतजी कहते हैं – राजा अम्बरीष ने परमेष्ठी ब्रह्मा के पुत्र देवर्षि नारद से पुण्यमय वैशाख मास का माहात्म्य सुना। उस समय आपने यह कहा था कि सब महीनों में वैशाख मास श्रेष्ठ है। इसलिए यह बताने की कृपा करें कि वैशाख मास क्यों भगवान विष्णु को प्रिय है और उस समय कौन-कौन से धर्म भगवान विष्णु के लिए प्रीतिकारक हैं?


नारद जी ने कहा – वैशाख मास को ब्रह्मा जी ने सब मासों में उत्तम सिद्ध किया है। वह माता की भाँति सब जीवों को सदा अभीष्ट वस्तु प्रदान करने वाला है। धर्म, यज्ञ, क्रिया और तपस्या का  सार है। संपूर्ण देवताओं द्वारा पूजित है। जैसे विद्याओं में वेद-विद्या, मन्त्रों में प्रणव, वृक्षों में कल्पवृक्ष, धेनुओं में कामधेनु, देवताओं में विष्णु, वर्णों में ब्राह्मण, प्रिय वस्तुओं में प्राण, नदियों में गंगाजी, तेजों में सूर्य, अस्त्र-शस्त्रों में चक्र, धातुओं में सुवर्ण, वैष्णवों में शिव तथा रत्नों में कौस्तुभमणि है, उसी प्रकार धर्म के साधनभूत महीनों में वैशाख मास सबसे उत्तम है। संसार में इसके समान भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला दूसरा कोई मास नहीं है। जो वैशाख मास में सूर्योदय से पहले स्नान करता है, उससे भगवान विष्णु निरन्तर प्रीति करते हैं। पाप तभी तक गर्जते हैं जब तक जीव वैशाख मास में प्रात: काल जल में स्नान नहीं करता।


राजन् ! वैशाख के महीने में सब तीर्थ आदि देवता बाहर के जल में भी सदैव स्थित रहते हैं भगवान विष्णु की आज्ञा से मनुष्यों का कल्याण करने के लिए वे सूर्योदय से लेकर छ: दण्ड के भीतर तक वहाँ मौजूद रहते हैं। वैशाख के समान कोई मास नहीं है, सतयुग के समान कोई युग नहीं है, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं है और गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं है। जल के समान दान नहीं है, खेती के समान धन नहीं है और जीवन से बढ़कर कोई लाभ नहीं है। उपवास के समान कोई तप नहीं, दान से बढ़कर कोई सुख नहीं, दया के समान धर्म नहीं, धर्म के समान मित्र नहीं, सत्य के समान यश नहीं, आरोग्य के समान उन्नति नहीं, भगवान विष्णु से बढ़कर कोई रक्षक नहीं और वैशाख मास के समान संसार में कोई पवित्र मास नहीं  है। ऎसा विद्वान पुरुषों का मत है।


वैशाख श्रेष्ठ मास है और शेषशायी भगवान विष्णु को सदा प्रिय है। सब दानों से जो पुण्य होता है और सब तीर्थों में जो फल होता है, उसी को मनुष्य वैशाख मास में केवल जलदान करके प्राप्त कर लेता है। जो जलदान में असमर्थ है, ऎसे ऎश्वर्य की अभिलाषा रखने वाले पुरुष को उचित है कि वह दूसरे को प्रबोध करे, दूसरे को जलदान का महत्त्व समझावे। यह सब दानों से बढ़कर हितकारी है। जो मनुष्य वैशाख में सड़क पर यात्रियों के लिए प्याऊ लगाता है वह विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है।

नृपश्रेष्ठ ! प्रपादान (प्याऊ) देवताओं, पितरों तथा ऋषियों को अत्यन्त प्रीति देने वाला है। जिसने प्याऊ लगाकर रास्ते के थके-माँदे मनुष्यों को सन्तुष्ट किया है, उसने ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवताओं को सन्तुष्ट कर लिया है। राजन् ! वैशाख मास में जल की इच्छा रखने वाले को जल, छाया चाहने वाले को छाता और पंखे की इच्छा रखने वाले को पंखा देना चाहिए। राजेन्द्र ! जो प्यास से पीड़ित महात्मा पुरुष के लिए शीतल जल प्रदान करता है, वह उतने ही मात्र से दस हजार राजसूय यज्ञों का फल पाता है। धूप और परिश्रम से पीड़ित ब्राह्मण को जो पंखा डुलाकर हवा करता है, वह उतने ही मात्र से निष्पाप होकर भगवान का पार्षद हो जाता है।

जो मार्ग से थके हुए श्रेष्ठ द्विज को वस्त्र से भी हवा करता है, वह उतने से ही मुक्त हो भगवान विष्णु का सायुज्य परप्त कर लेता है। जो शुद्ध चित्त से ताड़ का पंखा देता है वह सब पापों का नाश करके ब्रह्मलोक को जाता है। जो विष्णुप्रिय वैशाख मास में पादुका दान करता है, वह यमदूतों का तिरस्कार करके विष्णुलोक में जाता है। जो मार्ग में अनाथों के ठहरने के लिए विश्रामशाला बनवाता है, उसके पुण्य-फल का वर्णन किया नहीं जा सकता। मध्याह्न में आये हुए ब्राह्मण अतिथि को यदि कोई भोजन दे तो उसके फल का अन्त नहीं है।   

राजन् ! अन्नदान मनुष्यों को तत्काल तृप्त करने वाला है इसलिए संसार में अन्न के समान कोई दान नहीं है। जो मनुष्य मार्ग के थके हुए ब्राह्मण के लिए आश्रय देता है उसके पुण्यफल का वर्णन किया नहीं जा सकता। भूपाल ! जो अन्नदाता है, वह माता-पिता आदि का भी विस्मरण करा देता है इसलिए तीनों लोकों के निवासी अन्नदान की ही प्रशंसा करते हैं। माता और पिता केवल जन्म के हेतु हैं पर जो अन्न देकर पालन करता है, मनीषी पुरुष इस लोक में उसी को पिता कहते हैं।

 

वैशाख स्नान के नियम

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महीरथ नाम का एक राजा था जो सदा कामनाओं में आसक्त और अजितेन्द्रिय था। वह केवल वैशाख स्नान के सुयोग से स्वत: वैकुण्ठधाम को चला गया। वैशाख मास के देवता भगवान मधुसूदन हैं। अतएव वह सफल मास है। वैशाख मास में भगवान की प्रार्थना का मन्त्र इस प्रकार है –

 

मधुसूदन देवेश वैशाखे मेषगे रवौ।

प्रात:स्नानं करिष्यामि निर्विघ्नं कुरु माधव।।

अर्थ – हे मधुसूदन ! हे देवेश्वर माधव ! मैं मेष राशि में सूर्य के स्थित होने पर वैशाख मास में प्रात: स्नान करुँगा, आप इसे निर्विघ्न पूर्ण कीजिए।

 

तत्पश्चात निम्नांकित मन्त्र से अर्घ्य प्रदान करना चाहिए –

वैशाखे मेषगे भानौ प्रात:स्नानपरायण:।

अर्घ्यं तेSहं प्रदास्यामि गृहाण मधुसूदन।।

अर्थ – सूर्य के मेष राशि पर स्थित रहते हुए वैशाख मास में प्रात: स्नान के नियम में संलग्न होकर मैं आपको अर्घ्य देता हूँ। मधुसूदन ! इसे ग्रहण कीजिए।

 

इस प्रकार अर्घ्य समर्पण करके स्नान करें फिर वस्त्रों को पहनकर संध्या तर्पण आदि सब कर्मों को पूरा करके वैशाख मास में विकसित होने वाले पुष्पों से भगवान विष्णु की पूजा करें। उसके बाद वैशाख मास के माहात्म्य को सूचित करने वाली भगवान विष्णु की कथा सुने। ऎसा करने से कोटि जन्मों के पापों से मुक्त होकर मनुष्य मोक्ष को प्राप्त होता है। यह शरीर अपने अधीन है, जल भी अपने अधीन ही है, साथ ही अपनी जिह्वा भी अपने वश में है। अत: इस स्वाधीन शरीर से स्वाधीन जल में स्नान करके स्वाधीन जिह्वा से “हरि” इन दो अक्षरों का उच्चारण करें। जो वैशाख मास में तुलसीदल से भगवान विष्णु की पूजा करता है, वह विष्णु की सायुज्य मुक्ति को पाता है। अत: अनेक प्रकार के भक्तिमार्ग से तथा भाँति-भाँति के व्रतों द्वारा भगवान विष्णु की सेवा तथा उनके सगुण या निर्गुण स्वरूप का अनन्य चित्त से ध्यान करना चाहिए।

 

वैशाख मास में छत्र दान से हेमन्त का उद्धार

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नारदजी कहते हैं – एक समय विदेहराज जनक के घर दोपहर के समय श्रुतदेव नाम से विख्यात एक श्रेष्ठ मुनि पधारे, जो वेदों के ज्ञाता थे। उन्हें देखकर राजा बड़े उल्लास के साथ उठकर खड़े हो गए और मधुपर्क आदि सामग्रियों से उनकी विधिपूर्वक पूजा करके राजा ने उनके चरणोदक को अपने मस्तक पर धारण किया। इस प्रकार स्वागत-सत्कार के पश्चात जब वे आसन पर विराजमान हुए तब विदेहराज के प्रश्न के अनुसार वैशाख मास के माहात्म्य का वर्णन करते हुए वे इस प्रकार बोले।

श्रुतदेव ने कहा – राजन् ! जो लोग वैशाख मास में धूप से सन्तप्त होने वाला माहात्मा पुरुषों के ऊपर छाता लगाते हैं, उन्हें अनन्त पुण्य की प्राप्ति होती है। इस विषय में एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं।

पहले वंग देश में हेमकान्त नाम से विख्यात एक राजा थे। वे कुशकेतु के पुत्र परम बुद्धिमान और शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ थे। एक दिन वे शिकार खेलने में आसक्त होकर एक गहन वन में जा घुसे। वहाँ अनेक प्रकार के मृग और वराह आदि जन्तुओं को मारकर जब वे बहुत थक गए तब दोपहर के समय मुनियों के आश्रम पर आए। उस समय आश्रम पर उत्तम व्रत का पालन करने वाले शतर्चि नाम वाले ऋषि समाधि लगाए बैठे थे, जिन्हें बाहर के कार्यों का कुछ भी ज्ञान नहीं होता था। उन्हें निश्चल बैठे देख राजा को बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने उन महात्माओं को मार डालने का निश्चय किया तब उन ऋषियों के दस हजार शिष्यों ने राजा को मना करते हुए कहा – “ओ खोटी बुद्धिवाले नरेश ! हमारे गुरु लोग इस समय समाधि में स्थित हैं, बाहर कहाँ क्या हो रहा है – इसको ये नहीं जानते इसलिए इन पर तुम्हें क्रोध नहीं करना चाहिए।”

तब राजा ने क्रोध से विह्वल होकर शिष्य़ों से कहा – द्विजकुमारों ! मैं मार्ग से थका-माँदा यहाँ आया हूँ। अत: तुम्हीं लोग मेरा आतिथ्य करो। राजा के ऎसा कहने पर वे शिष्य बोले – “हम लोग भिक्षा माँगकर खाने वाले हैं। गुरुजनों ने हमें किसी के आतिथ्य के लिए आज्ञा नहीं दी है। हम सर्वथा गुरु के अधीन हैं। अत: तुम्हारा आतिथ्य मैसे कर सकते हैं।” शिष्यों का यह कोरा उत्तर पाकर राजा ने उन्हें मारने के लिए धनुष उठाया और इस प्रकार कहा – “मैंने हिंसक जीवों और लुटेरों के भय आदि से जिनकी अनेकों बार रक्षा की है, जो मेरे दिए हुए दानों पर ही पलते हैं, वे आज मुझे ही सिखलाते चले हैं। ये मुझे नहीं जानते, ये सभी कृतघ्न और बड़े अभिमानी हैं। इन आततायियों को मर डालने पर भी मुझे कोई दोष नहीं लगेगा।” ऎसा कहकर वे कुपित हो धनुष से बाण छोड़ने लगे।

बेचारे शिष्य आश्रम छोड़कर भय से भाग चले। भागने पर भी हेमकान्त ने उनका पीछा किया और तीन सौ शिष्यों को मर गिराया। शिष्यों के भाग जाने पर आश्रम पर जो कुछ सामग्री थी उसे राजा के पापात्मा सैनिकों ने लूट लिया। राजा के अनुमोदन से ही उन्होंने वहाँ इच्छानुसार भोजन किया। तत्पश्चात दिन बीतते-बीतते राजा सेना के साथ अपनी पुरी में आ गए। राजा कुशकेतु ने जब अपने पुत्र का यह अन्यायपूर्ण कार्य सुना तब उसे राज्य करने के अयोग्य जानकर उसकी निन्दा करते हुए उसे देश निकाला दे दिया। पिता के त्याग देने पर हेमकान्त घने वन में चला गया। वहाँ उसने बहुत वर्षों तक निवास किया। ब्रह्महत्या उसका सदा पीछा करती रहती थी इसलिए वह कहीं भी स्थिरतापूर्वक रह नहीं पाता था।

इस प्रकार उस दुष्टात्मा के अठ्ठाईस वर्ष व्यतीत हो गए। एक दिन वैशाख मास में जब दोपहर का समय हो रहा था, महामुनि त्रित तीर्थयात्रा के प्रसंग से उस वन में आए। वे धूप से अत्यन्त संतप्त और तृषा से बहुत पीड़ित थे इसलिए किसी वृक्षहीन प्रदेश में मूर्च्छित होकर गिर पड़े। दैवयोग से हेमकान्त उधर आ निकला, उसने मुनि को प्यास से पीड़ित, मूर्च्छित और थका-माँदा देख उन पर बड़ी दया की। उसने पलाश के पत्तों से छत्र बनाकर उनके ऊपर आती हुई धूप का निवारण किया। वह स्वयं मुनि के मस्तक पर छाता लगाए खड़ा हुआ और तूँबी में रखा हुआ जल उनके मुँह में डाला।

इस उपचार से मुनि को चेत(होश) हो आया और उन्होंने क्षत्रिय के दिए हुए पत्ते के छाते को लेकर अपनी व्याकुलता दूर की। उनकी इन्द्रियों में कुछ शक्ति आई और वे धीरे-धीरे किसी गाँव में पहुँच गए। उस पुण्य के प्रभाव से हेमकान्त की तीन सौ ब्रह्महत्याएँ नष्ट हो गईं। इसी समय यमराज के दूत हेमकान्त को लेने के लिए वन में आए। उन्होंने उसके प्राण लेने के लिए संग्रहणी रोग पैदा किया। उस समय प्राण छूटने की पीड़ा से छटपटाते हुए हेमकान्त ने तीन अत्यन्त भयंकर यमदूतों को देखा जिनके बाल ऊपर की ओर उठे हुए थे। उस समय अपने कर्मों को याद करके वह चुप हो गया। छत्र-दान के प्रभाव से उसको विष्णु भगवान का स्मरण हुआ।

उसके स्मरण करने पर महाविष्णु ने विष्वक् सेन से कहा – “तुम शीघ्र जाओ, यमदूतों को रोकों, हेमकान्त की रक्षा करो। अब यह निष्पाप और मेरा भक्त हो गया है। उसे नगर में ले जाकर उसके पिता को सौंप दो। साथ ही मेरे कहने से कुशकेतु को यह समझाओ कि तुम्हारे पुत्र ने अपराधी होने पर भी वैशाख मास में छत्र-दान करके एक मुनि की रक्षा की है। अत: वह पाररहित हो गया है। इस पुण्य के प्रभाव से वह मन और इन्द्रियों को अपने वश में रखने वाला दीर्घायु, शूरता और उदारता आदि गुणों से युक्त तथा तुम्हारे समान गुणवान हो गया है। इसलिए अपने महाबली पुत्र को तुम राज्य का भार सँभालने के लिए नियुक्त करो। भगवान विष्णु ने तुम्हें ऎसी ही आज्ञा दी है। इस प्रकार राजा को आदेश देकर हेमकान्त को उनके अधीन करके यहाँ लौट आओ।”

भगवान विष्णु का यह आदेश पाकर महाबली विष्वक् सेन ने हेमकान्त के पास आकर यमदूतों को रोका और अपने कल्याणमय हाथों से उसके सब अंगों में स्पर्श किया। भगवद्भक्त के स्पर्श से हेमकान्त की सारी व्याधि क्षण भर में दूर हो गई। तदनन्तर विष्वक् सेन उसके साथ राजा की पुरी में गए। उन्हें देखकर महाराज कुशकेतु ने आश्चर्ययुक्त हो भक्तिपूर्वक मस्तक झुकाकर पृथ्वी पर साष्टांग प्रणाम किया और भगवान के पार्षद का अपने घर में प्रवेश कराया। वहाँ नाना प्रकार के स्तोत्रों से उनकी स्तुति तथा वैभवों से उनका पूजन किया। तत्पश्चात महाबली विष्वक्  सेन ने अत्यन्त प्रसन्न होकर राजा को हेमकान्त के विषय में भगवान विष्णु ने जो संदेश दिया था, वह सब कह सुनाया। उसे सुनकर कुशकेतु ने पुत्र को राज्य पर बिठा दिया और स्वयं विष्वक् सेन की आज्ञा लेकर पत्नी सहित वन को प्रस्थान किया।

तदनन्तर महामना विष्वक् सेन हेमकान्त से पूछकर और उसकी प्रशंसा करके श्वेतद्वीप में भगवान विष्णु के समीप चले गए तब से राजा हेमकान्त वैशाख मास में बताए हुए भगवान की प्रसन्नता को बढ़ाने वाले शुभ धर्मों का प्रति वर्ष पालन करने लगे। वे ब्राह्मणभक्त, धर्मनिष्ठ, शान्त, जितेन्द्रिय, सब प्राणियों के प्रति दयालु और संपूर्ण यज्ञों की दीक्षा में स्थित रहकर सब प्रकार की संपदाओं से संपन्न हो गए। उन्होंने पुत्र-पौत्र आदि के साथ समस्त भोगों का उपभोग करके भगवान विष्णु का लोक प्राप्त किया। वैशाख मास सुख से साध्य, अतिशय पुण्य प्रदान करने वाला है। पापरूपी ईंधन को अग्नि की भाँति जलाने वाला, परम सुलभ तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष – चारों पुरुषार्थों को देने वाला है।

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शनिवार, 1 अप्रैल 2023

सर्वरोग निवारक श्रीहनुमद्वडवानलस्तोत्रम्

 श्रीहनुमद्वडवानलस्तोत्रम् 

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सर्वरोगनिवारक, धन प्रदायक, सर्वशत्रु शमनकर्ता, राजभय निवारक, तंत्र-मंत्र-यंत्र भय निवारक, भूत-प्रेत-शाकिनी-डाकिनी आदि से रक्षा देने वाला, नवग्रह पीड़ा शांत करने वाला, अनेकों लाभ देने वाला विभीषण कृत हनुमान स्तोत्र।।


★ इस स्तोत्र के पाठ से पहले और बाद में एक-एक बार श्रीरामरक्षा स्तोत्र या हनुमान कवच का पाठ अवश्य कर लेना चाहिए, सूक्ष्म जगत के आक्रमण से सुरक्षा हेतु यह आवश्यक है। 


बाकी हनुमान जी की पूजा सम्बन्धी विधि-निषेध का पालन करते हुए इसका पाठ करें। सर्वविध लाभ होगा। 


★ यदि किसी आवेश का अनुभव करें तो 15 मिनट ""सीताराम"" जप करें। 


श्रीगणेशाय नमः ।

ॐ अस्य श्रीहनुमद्वडवानलस्तोत्रमन्त्रस्य

श्रीरामचन्द्र ऋषिः, श्रीवडवानलहनुमान् देवता,

(श्रीहनुमान् वडवानल देवता)

ह्रां बीजं, ह्रीं शक्तिः, सौं कीलकं, मम समस्तविघ्नदोषनिवारणार्थे,

सर्वशत्रुक्षयार्थे, सकलराजकुलसंमोहनार्थे,

मम समस्तरोगप्रशमनार्थे, आयुरारोग्यैश्वर्याभिवृद्ध्यर्थे,

समस्तपापक्षयार्थे, श्रीसीतारामचन्द्रप्रीत्यर्थे

हनुमद्वडवानलस्तोत्रजपे विनियोगः (सङ्कल्पः) ॥


अथ ध्यानम् ।

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।

वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥


ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्री महाहनुमते प्रकटपराक्रम

सकलदिङ्मण्डलयशोवितानधवलीकृतजगत्त्रितय वज्रदेह

रुद्रावतार लङ्कापुरीदहन उमा-अमल-मन्त्र (उमा-अर्गल-मन्त्र)

उदधिबन्धन दशशिरःकृतान्तक सीताश्वसन वायुपुत्र

अञ्जनीगर्भसम्भूत श्रीरामलक्ष्मणानन्दकर कपिसैन्यप्राकार

सुग्रीवसाह्यरण पर्वतोत्पाटन कुमारब्रह्मचारिन् गभीरनाद

सर्वपापग्रहवारण सर्वज्वरोच्चाटन डाकिनीविध्वंसन

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महावीरवीराय सर्वदुःखनिवारणाय

ग्रहमण्डलसर्वभूतमण्डलसर्वपिशाचमण्डलोच्चाटन

भूतज्वरएकाहिकज्वरद्व्याहिकज्वरत्र्याहिकज्वरचातुर्थिकज्वर-

सन्तापज्वरविषमज्वरतापज्वरमाहेश्वरवैष्णवज्वरान् छिन्धि छिन्धि

यक्षब्रह्मराक्षसभूतप्रेतपिशाचान् उच्चाटय उच्चाटय (स्वाहा) ।


ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्रीमहाहनुमते

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः आं हां हां हां हां ॐ सौं एहि एहि एहि

ॐ हं ॐ हं ॐ हं ॐ हं ॐ नमो भगवते श्रीमहाहनुमते

श्रवणचक्षुर्भूतानां शाकिनीडाकिनीनां विषमदुष्टानां

सर्वविषं हर हर आकाशभुवनं भेदय भेदय

छेदय छेदय मारय मारय शोषय शोषय मोहय मोहय

ज्वालय ज्वालय प्रहारय प्रहारय सकलमायां भेदय भेदय (स्वाहा) ।


ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महाहनुमते सर्वग्रहोच्चाटन

परबलं क्षोभय क्षोभय सकलबन्धनमोक्षणं कुरु कुरु

शिरःशूलगुल्मशूलसर्वशूलान्निर्मूलय निर्मूलय

नागपाशानन्तवासुकितक्षककर्कोटककालियान्

यक्षकुलजलगतबिलगतरात्रिञ्चरदिवाचर सर्वान्निर्विषं

(यक्षकुलजगत् रात्रिञ्चर दिवाचर सर्पान्निर्विषं)

कुरु कुरु स्वाहा ॥


राजभयचोरभयपरमन्त्रपरयन्त्रपरतन्त्रपरविद्याश्छेदय छेदय

स्वमन्त्रस्वयन्त्रस्वतन्त्रस्वविद्याः प्रकटय प्रकटय

सर्वारिष्टान्नाशय नाशय सर्वशत्रून्नाशय नाशय

असाध्यं साधय साधय हुं फट् स्वाहा ॥


॥ इति श्रीविभीषणकृतं हनुमद्वडवानलस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

बुधवार, 22 मार्च 2023

सनातन संस्कृति और जल

 विश्वजल दिवस विशेष

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पानी से जुड़ी बुरी आदतें आपके लिए बन सकती हैं जहर

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पानी के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। कहते हैं शरीर को स्वस्थ रखने के लिए दिनभर में कम से कम आठ से दस गिलास पानी जरूर पीना चाहिए। पानी पीना फायदेमंद तो होता ही है लेकिन तब जब सही मात्रा में और सही तरीके से पीया जाए। अगर पानी को गलत तरीके से पीया जाए या गलत समय में अधिक मात्रा में पीया जाए तो वह शरीर को नुकसान पहुंचा सकता है, ऐसा आयुर्वेद में वर्णित है।


आयुर्वेद को जीवन का विज्ञान माना जाता है,भोजन से लेकर जीवनशैली तक की चर्चाएं इस शास्त्र में समाहित हैं। आज हम आयुर्वेदिक ग्रन्थ अष्टांग संग्रह (वाग्भट्ट) में बताए गए पानी पीने के कुछ कायदों से आपको रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। चलिए जानते हैं पानी कब, कैसे और कितना पीना चाहिए……


1. भक्तस्यादौ जलं पीतमग्निसादं कृशा अङ्गताम!!


खाना खाने से पहले यदि पानी पिया जाए तो यह जल अग्निमांद (पाचन क्रिया का मंद हो जाना) यानी डायजेशन में दिक्कत पैदा करता है।*


2. अन्ते करोति स्थूल्त्वमूध्र्वएचामाशयात कफम!


खाना खाने के बाद पानी पीने से शरीर में भारीपन और आमाशय के ऊपरी भाग में कफ की बढ़ोतरी होती है। सरल शब्दों में कहा जाए तो खाने के तुरंत बाद अधिक मात्रा में पानी पीने से मोटापा बढ़ता है व कफ संबंधी समस्याएं भी परेशान कर सकती हैं।


3. प्रयातिपित्तश्लेष्मत्वम्ज्वरितस्य विशेषत:!!


आयुर्वेद के अनुसार बुखार से पीड़ित व्यक्ति प्यास लगने पर ज्यादा मात्रा में पानी पीने से बेहोशी, बदहजमी, अंगों में भारीपन, मितली, सांस व जुकाम जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।


4. आमविष्टबध्यो :कोश्नम निष्पिपासोह्यप्यप: पिबेत!


आमदोष के कारण होने वाली समस्याओं जैसे अजीर्ण और कब्ज जैसी स्थितियों में प्यास न लगने पर भी गुनगुना) पानी पीते रहना चाहिए।


5. मध्येमध्यान्ग्तामसाम्यं धातूनाम जरणम सुखम!!


खाने के बीच में थोड़ी मात्रा में पानी पीना शरीर के लिए अच्छा होता है। आयुर्वेद के अनुसार खाने के बीच में पानी पीने से शरीर की धातुओं में समानता आती है और खाना बेहतर ढंग से पचता है।


6. अतियोगेसलिलं तृषय्तोपि प्रयोजितम!


प्यास लगने पर एकदम ज्यादा मात्रा में पानी पीना भी शरीर के लिए बहुत नुकसानदायक होता है। ऐसा करने से पित्त और कफ दोष से संबंधित बीमारियां होने की संभावना बढ़ जाती है।


7. यावत्य: क्लेदयन्त्यन्नमतिक्लेदोह्य ग्निनाशन:!!


पानी उतना ही पीना चाहिए जो अन्न का पाचन करने में जरूरी हो, दरअसल अधिक पानी पीने से भी डायजेशन धीमा हो जाता है। इसलिए खाने की मात्रा के अनुसार ही पानी पीना शरीर के लिए उचित रहता है।


8. बिबद्ध : कफ वाताभ्याममुक्तामाशाया बंधन:!


*पच्यत* क्षिप्रमाहार:कोष्णतोयद्रवी कृत:!!

कफ और वायु के कारण जो भोजन नहीं पचा है उसे शरीर से बाहर कर देता है। गुनगुना पानी उसे आसानी से पचा देता है।


(सभी सन्दर्भ सूत्र अष्टांग संग्रह अध्याय 6 के 41-42,33-34 एवं 36-37 से लिए गए हैं)


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सोमवार, 20 मार्च 2023

Investment opportunities in India

 निवेश के बारे में जानें


निवेश विकल्प अवलोकन


निवेश वित्तीय योजना का एक अनिवार्य हिस्सा है। यह आपके पैसे को बढ़ाने और भविष्य के लिए संपत्ति बनाने का एक तरीका है। बाजार में कई निवेश विकल्प उपलब्ध हैं, और सही विकल्प चुनना एक कठिन काम हो सकता है। यहां, हम विभिन्न निवेश विकल्पों पर चर्चा करेंगे जो आपको एक सूचित निर्णय लेने में मदद कर सकते हैं।


स्टॉक्स:


स्टॉक या शेयर सबसे लोकप्रिय निवेश विकल्पों में से एक हैं। जब आप कोई शेयर खरीदते हैं तो आप कंपनी के शेयरधारक बन जाते हैं। एक शेयरधारक के रूप में, आप कंपनी के एक हिस्से के मालिक हैं और आपको कुछ मामलों पर वोट देने का अधिकार है। शेयर अच्छा रिटर्न दे सकते हैं, लेकिन इनमें जोखिम भी अधिक होता है। बाजार की स्थितियों और कंपनी के प्रदर्शन के आधार पर शेयरों के मूल्य में उतार-चढ़ाव हो सकता है। इसलिए, स्टॉक में निवेश करने से पहले पूरी तरह से शोध करना आवश्यक है।


बांड:


बांड कंपनियों, सरकारों या नगर पालिकाओं द्वारा जारी किए गए ऋण साधन हैं। जब आप एक बांड खरीदते हैं, तो आप जारीकर्ता को एक विशिष्ट अवधि के लिए धन उधार देते हैं। जारीकर्ता आपको बांड पर ब्याज देता है, और अवधि के अंत में, मूल राशि आपको वापस कर दी जाती है। बांड को शेयरों की तुलना में कम जोखिम भरा माना जाता है और यह आय का एक स्थिर स्रोत प्रदान कर सकता है। हालांकि, बांड पर रिटर्न शेयरों की तुलना में कम है और मुद्रास्फीति आपके निवेश की क्रय शक्ति को कम कर सकती है।


म्यूचुअल फंड्स:


म्युचुअल फंड कई निवेशकों से स्टॉक, बॉन्ड या अन्य संपत्तियों में निवेश करने के लिए एकत्र किए गए धन का एक पूल है। जब आप म्यूचुअल फंड में निवेश करते हैं, तो आप फंड का एक हिस्सा खरीदते हैं। फंड का प्रबंधन एक पेशेवर फंड मैनेजर द्वारा किया जाता है जो विविधीकरण प्रदान करने और जोखिम प्रबंधन के लिए विभिन्न संपत्तियों में पैसा निवेश करता है। म्युचुअल फंड अच्छा रिटर्न दे सकते हैं, लेकिन वे फीस और खर्च के साथ भी आते हैं। म्यूचुअल फंड में निवेश करने से पहले फंड के प्रॉस्पेक्टस को पढ़ना और फीस को समझना जरूरी है।


एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड (ईटीएफ):


ईटीएफ म्युचुअल फंड के समान हैं, लेकिन वे एक्सचेंज पर शेयरों की तरह व्यापार करते हैं। जब आप ईटीएफ खरीदते हैं, तो आप फंड के एक हिस्से के मालिक होते हैं, और शेयर का मूल्य फंड द्वारा धारित अंतर्निहित परिसंपत्तियों पर आधारित होता है। ईटीएफ म्युचुअल फंड की तुलना में विविधीकरण, कम शुल्क और अधिक लचीलापन प्रदान कर सकते हैं। हालांकि, ईटीएफ भी जोखिम के साथ आते हैं, और शेयरों के मूल्य में बाजार की स्थितियों के आधार पर उतार-चढ़ाव हो सकता है।


रियल एस्टेट:


रियल एस्टेट एक और लोकप्रिय निवेश विकल्प है। आप संपत्ति खरीदकर या रियल एस्टेट निवेश ट्रस्ट (आरईआईटी) में निवेश करके रियल एस्टेट में निवेश कर सकते हैं। जब आप एक संपत्ति खरीदते हैं, तो आप किराये की आय अर्जित कर सकते हैं और संपत्ति के मूल्य में वृद्धि से लाभ प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि, रियल एस्टेट निवेश महंगा हो सकता है और इसके लिए बड़ी मात्रा में पूंजी की आवश्यकता होती है। रियल एस्टेट में निवेश करने के लिए आरईआईटी एक अधिक सुलभ तरीका है। आरईआईटी ऐसी कंपनियां हैं जो आय-सृजन करने वाली संपत्तियों का स्वामित्व और संचालन करती हैं। जब आप आरईआईटी में निवेश करते हैं, तो आप कंपनी के एक हिस्से के मालिक होते हैं, और आप किराये की आय का एक हिस्सा अर्जित करते हैं और संपत्तियों के मूल्य में वृद्धि करते हैं।


क्रिप्टोकरेंसी:


क्रिप्टोकरेंसी डिजिटल या वर्चुअल टोकन हैं जो लेनदेन को सुरक्षित करने और नई इकाइयों के निर्माण को नियंत्रित करने के लिए क्रिप्टोग्राफी का उपयोग करते हैं। बिटकॉइन, एथेरियम और लिटकोइन जैसी क्रिप्टोकरेंसी ने हाल के वर्षों में लोकप्रियता हासिल की है। क्रिप्टोकरेंसी उच्च रिटर्न प्रदान कर सकती हैं, लेकिन वे उच्च जोखिम के साथ भी आती हैं। क्रिप्टोकरेंसी के मूल्य में बाजार की स्थितियों और नियामक परिवर्तनों के आधार पर उतार-चढ़ाव हो सकता है। निवेश करने से पहले क्रिप्टोकरेंसी से जुड़े जोखिमों को समझना महत्वपूर्ण है।


माल:


जिंस कच्चे माल या प्राथमिक कृषि उत्पाद हैं जिनका बाजारों में कारोबार होता है। सोना, चांदी, तेल और गेहूं जैसी वस्तुएं आपके पोर्टफोलियो को विविधीकरण प्रदान कर सकती हैं। जब आप वस्तुओं में निवेश करते हैं, तो आप कीमतों में उतार-चढ़ाव और मुद्रास्फीति की हेजिंग से लाभ उठा सकते हैं। हालांकि, वस्तुएं अस्थिर हो सकती हैं, और आपूर्ति और मांग कारकों के आधार पर उनके मूल्य में उतार-चढ़ाव हो सकता है।


जमा प्रमाणपत्र (सीडी):


डिपॉजिट सर्टिफिकेट या सीडी बैंकों या क्रेडिट यूनियनों द्वारा दी जाने वाली फिक्स्ड टर्म डिपॉजिट हैं। जब आप एक सीडी में निवेश करते हैं, तो आप एक विशिष्ट अवधि के लिए अपना पैसा खाते में रखने के लिए सहमत होते हैं। अवधि जितनी लंबी होगी, ब्याज दर उतनी ही अधिक होगी। सीडी को कम जोखिम वाला निवेश माना जाता है क्योंकि उन्हें एफडीआईसी या एनसीयूए द्वारा एक निश्चित राशि तक बीमाकृत किया जाता है। हालांकि, सीडी अन्य निवेश विकल्पों की तुलना में कम रिटर्न प्रदान करते हैं, और यदि आप अवधि समाप्त होने से पहले अपना पैसा वापस ले लेते हैं, तो आपको दंड का सामना करना पड़ सकता है।


वार्षिकियां बीमा कंपनियों द्वारा पेश किए जाने वाले वित्तीय उत्पाद हैं जो एकमुश्त या आवधिक भुगतान के बदले आय का एक नियमित प्रवाह प्रदान करते हैं। वार्षिकियां तय या परिवर्तनीय हो सकती हैं, और अनुबंध की शर्तों के आधार पर रिटर्न भिन्न हो सकते हैं। वार्षिकियां सेवानिवृत्ति आय और कर लाभ प्रदान कर सकती हैं, लेकिन वे शुल्क और व्यय के साथ भी आती हैं। निवेश करने से पहले वार्षिकी से जुड़े नियमों और शुल्क को समझना महत्वपूर्ण है।


पीयर-टू-पीयर लेंडिंग:


पीयर-टू-पीयर लेंडिंग या पी2पी लेंडिंग उधार देने का एक रूप है जो व्यक्तियों को एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से अन्य व्यक्तियों या व्यवसायों को पैसा उधार देने की अनुमति देता है। 

शुक्रवार, 17 मार्च 2023

माँ लक्ष्मी की कृपा हेतु उपाय

 अगर पानी है महालक्ष्मी की कृपा तो पढ़ें ये स्तोत्र


शुक्रवार का दिन देवी लक्ष्मी का दिन माना जाता है। मान्यता है कि शुक्रवार के दिन विधि-विधान से मां लक्ष्मी की पूजा करने से वह प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों पर धन की वर्षा करती हैं। अगर आप आर्थिक तंगी से परेशान हैं, तो शुक्रवार के दिन मां लक्ष्मी की पूजा जरूर करें। इस दिन लक्ष्मी देवी की विशेष पूजा और व्रत रखने का विधान है।



हिन्दूधर्म में देवी लक्ष्मी धन, सम्पदा और समृद्धि की देवी मानी जाती हैं। ऐसा माना जाता है कि शुक्रवार के दिन देवी लक्ष्मी की विशेष पूजा करने से मनचाहा फल मिलता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवराज इन्द्र ने महालक्ष्मी कृपा प्रार्थना स्तोत्र की रचना की थी। इस स्त्रोत का पाठ करने से धन- वैभव, सौभाग्य, आरोग्य, ऐश्वर्य, शील, विद्या, विनय, ओज की प्राप्ति होती है। लोग महालक्ष्मी की कृपा पाने के लिए महालक्ष्मी कृपा प्रार्थना स्तोत्र का जाप करते हैं....


श्री लक्ष्मी स्तोत्र:


नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते ।

शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तुते ॥ 1॥


नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयङ्करि ।

सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तुते ॥ 2॥


सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयङ्करि ।

सर्वदुःखहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तुते ॥ 3॥


सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्तिमुक्तिप्रदायिनि ।

मन्त्रपूते सदा देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तुते ॥ 4॥


आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्तिमहेश्वरि ।

योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मि नमोऽस्तुते ॥ 5॥


स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्तिमहोदरे ।

महापापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तुते ॥ 6॥


पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्मस्वरूपिणि ।

परमेशि जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोऽस्तुते ॥ 7॥

शुक्रवार, 3 मार्च 2023

होलाष्टक विचार

🔥🔥🔥होलाष्टक विचार 🔥🔥🔥
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विपाशेरावती तीरे 
               शुतुद्रयाश्च त्रिपुष्करे।
विवाहादि शुभे नेष्टं-
            होलिकाप्राग्दिनाष्टकम् ।।

होलाष्टक के शाब्दिक अर्थ पर जायें, तो होला + अष्टक अर्थात होली से पूर्व के आठ दिन, जो दिन होता है, वह होलाष्टक कहलाता है। सामान्य रुप से देखा जाये तो होली एक  दिन का पर्व न होकर पूरे नौ दिनों का त्यौहार है। 

होलाष्टक के समय शुभ कार्य वर्जित होते है यह फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी को लगता है होलाष्टक फिर आठ दिनों तक रहता है इस वर्ष होलाष्ट आठ की जगह नौ दिन तक रहेगा इसमें सभी शुभ मांगलिक कार्य रोक दिए जाते है यह दुलहंडी पर रंग खेलकर खत्म होता है।

फाल्गुन शुक्ल अष्टमी पर 2 डंडे स्थापित किए जाते हैं। जिनमें एक को होलिका तथा दूसरे को प्रह्लाद माना जाता है। इससे पूर्व इस स्थान को गंगा जल से शुद्ध किया जाता है  फिर हर दिन इसमे गोबर के उपल , लकड़ी घास और जलने में सहायक चीजे डालकर इसे बड़ा किया जाता है।

पौराणिक कथाओ एवं शास्त्रों में बताया गया है की होलाष्टक के दिन ही कामदेव ने शिव तपस्या को भंग किया था इस कारण शिव जी अत्यंत क्रोधित हो गये थे उन्होंने अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया था हालाकि कामदेव ने देवताओ की इच्छा और उनके अच्छे के लिए शिव को तपस्या से उठाया था।

कामदेव के भस्म होने से समस्त संसार शोक में डूब गया उनकी पत्नी रति ने शिव से विनती की वे उन्हें फिर से पुनर्जीवित कर दे तब भगवान भोलेनाथ से द्वापर में उन्हें फिर से जीवन देने की बात कही।

एक दूसरी कथा के अनुसार राजा हरिण्यकशिपु ने अपने पुत्र भक्त प्रह्लाद को भगवद् भक्ति से हटाने और हरिण्यकशिपु को ही भगवान की तरह पूजने के लिये अनेक यातनाएं दी लेकिन जब किसी भी तरकीब से बात नहीं बनी तो होली से ठीक आठ दिन पहले उसने प्रह्लाद को मारने के प्रयास आरंभ कर दिये थे। लगातार आठ दिनों तक जब भगवान अपने भक्त की रक्षा करते रहे तो होलिका के अंत से यह सिलसिला थमा। इसलिये आज भी भक्त इन आठ दिनों को अशुभ मानते हैं। उनका यकीन है कि इन दिनों में शुभ कार्य करने से उनमें विघ्न बाधाएं आने की संभावनाएं अधिक रहती हैं।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार होलाष्टक मे सभी शुभ कार्य करना वर्जित रहते हैं, क्योकी इन आठ दिवस 8 ग्रह उग्र रहते है। इन आठ दिवसो मे अष्टमी को चन्द्रमा,नवमी को सूर्य,दशमी को शनि,एकादशी को शुक्र,द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मगल, और पूर्णिमा को राहू उग्र रहते हैं। इसलिये इस अवधि में शुभ कार्य करने वर्जित है

होलाष्टक में न करें ये कार्य
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1. विवाह:👉 होली से पूर्व के 8 दिनों में भूलकर भी विवाह न करें। यह समय शुभ नहीं माना जाता है, जब तक कि कोई विशेष योग आदि न हो।

2. नामकरण एवं मुंडन संस्कार:👉 
होलाष्टक के समय में अपने बच्चे का नामकरण या मुंडन संस्कार कराने से बचें।

3. भवन निर्माण:👉 होलाष्टक के समय में किसी भी भवन का निर्माण कार्य प्रारंभ न कराएं। होली के बाद नए भवन के निर्माण का शुभारंभ कराएं।

4. हवन-यज्ञ:👉 होलाष्टक में कोई यज्ञ या हवन अनुष्ठान करने की सोच रहे हैं, तो उसे होली बाद कराएं। इस समय काल में कराने से आपको उसका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होगा।

5. नौकरी:👉 होलाष्टक के समय में नई नौकरी ज्वॉइन करने से बचें। अगर होली के बाद का समय मिल जाए तो अच्छा होगा। अन्यथा किसी ज्योतिषाचार्य से मुहूर्त दिखा लें।

6. भवन, वाहन आदि की खरीदारी:👉 संभवत हो तो होलाष्टक के समय में भवन, वाहन आदि की खरीदारी से बचें। शगुन के तौर पर भी रुपए आदी न दें।

होलाष्टक में पूजा-अर्चना की के लिए किसी भी प्रकार की मनाही नही होती। होलाष्टक के समय में अपशकुन के कारण मांगलिक कार्यों पर रोक होती है। हालांकि होलाष्टक में भगवान की पूजा-अर्चना की जाती है। इस समय में आप अपने ईष्ट देव की पूजा-अर्चना, भजन, आरती आदि करें, इससे आपको शुभ फल की प्राप्ति होगी।
परंतु सकाम (किसी कामना से किये जाने वाले यज्ञादि कर्म) किसी भी प्रकार का हवन, यज्ञ कर्म भी इन दिनों में नहीं किये जाते।

7.👉 सनातन हिंदू धर्म में 16 प्रकार के संस्कार बताये जाते हैं इनमें से किसी भी संस्कार को संपन्न नहीं करना चाहिये। हालांकि दुर्भाग्यवश इन दिनों किसी की मौत होती है तो उसके अंत्येष्टि संस्कार के लिये भी शांति पूजन करवाया जाता है।

होलाष्टक  कब है  ?
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होलाष्टक कल 27 फरवरी को लगेगा और 07 मार्च 2023 तक रहेगा इस आठ दिन के समय में कोई मांगलिक कार्य , गृह प्रवेश करना वर्जित होगा व्यक्ति को नए रोजगार और नया व्यवसाय भी नही शुरू करना चाहिए।
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पितृपक्ष में परान्न से बचें

 गरुड़ पुराणोक्त पितृपक्ष परान्न निषेध कथा सनातन धर्म में 16 दिनों का पितृपक्ष वर्ष का सबसे सूक्ष्म और संवेदनशील समय माना गया है। गरुड़ पुरा...