शनिवार, 20 दिसंबर 2025

शकुन-अपशकुन

 शकुन-अपशकुन की मान्यता क्यों?

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प्राचीन काल से ही भारत में शकुन द्वारा शुभाशुभ विचार करके यात्रा या किसी नवीन कार्य के आरम्भ करने की परंपरा रही है। प्रकृति से प्राप्त संकेत ही शकुन का आधार हैं। अच्छी या बुरी किसी भी महत्वपूर्ण घटना से पूर्व प्रकृति में कुछ विकार उत्पन्न होता है। हमारे ऋषि मुनियों ने इन प्राकृतिक विकारों का अपने अनुभव के आधार पर शुभाशुभ वर्गों में वर्गीकरण किया वास्तव में शकुन स्वयं न तो शुभ हैं न अशुभ , ये केवल इष्ट अथवा अनिष्ट के सूचक मात्र हैं। किसी महत्वपूर्ण कार्य को आरम्भ करते समय या उसके लिए यात्रा पर जाते समय शकुन पर विचार किया जाता है। शुभ शकुन होने पर कार्यसिद्धि तथा अशुभ शकुन होने पर कार्य की हानि का संकेत मिलता है। प्राचीन राजा –महाराजा भी अपने दरबार में विद्वान शकुनी को महत्वपूर्ण स्थान देते थे तथा प्रत्येक कार्य से पूर्व उसका परामर्श लेते थे।


पुराणों में शकुन विचार

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वेदों, स्मृतियों, पुराणादि धर्मशास्त्रों एवं फलित ज्योतिष शास्त्रों तथा धर्मसिन्धु में शुभ-अशुभ शकुनों के विषय में विस्तार से जानकारी दी गई है। शकुन हेतु तुलसीकृत 'रामाज्ञा-प्रश्न' एवं 'रामशलाका' भी प्रसिद्ध हैं। शकुन के संबंध में प्रसिद्ध ग्रंथ वसंतराज शाकुन का कथन है-'शुभाशुभज्ञानविनिर्णयाय हेतुर्नृणां यः शकुन अर्थात् जिन चिह्नों को देखने से 'शुभ-अशुभ' का ज्ञान हो-वह शकुन है। जिस चिह्न संकेत निमित्त द्वारा शुभ जानकारी मिले, वह शुभ शकुन और अशुभ जानकारी मिले, उसे अपशकुन कहते हैं।


भगवान् राम की बारात चढ़ने के समय शकुन होने से मंगल हुआ, ऐसा रामायण में उल्लेख मिलता है।



बनई न वरनत वनी बराता।

होइ सगुन सुन्दर शुभदाता।।

चारा चाषु वाम दिसि लेइ ।

मनहु सकल मंगल कहि देइ।।

दाहिन काग सुखेत सुहावा । 

नकुल दरसु सब काहू पावा ॥ 

सानुकूल बह त्रिबिध बयारी । 

सघट सबाल आव बर नारी ॥ 

लोवा फिरि फिरि दरसु देखावा । 

सुरभी सनमुख सिसुहि पिआवा ॥ मृगमाला फिरि दाहिनि आई । 

मंगल गन जनु दीन्हि देखाई ॥ 

छेमकरी कह छेम बिसेषी । 

स्यामा बाम सुतरु पर देखी ॥ 

सनमुख आयउ दधि अरु मीना। 

कर पुस्तक दुइ बिप्र प्रबीना ॥


-रामचरितमानसाबालकांड 302/24


अग्नि पुराण के अनुसार शकुन दो प्रकार के होते हैं।

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1.दीप्त शकुन

2.शांत शकुन


दीप्त शकुन

〰️〰️〰️〰️काल की सूक्ष्म गति को जानने वाले ऋषि मुनियों ने दीप्त शकुन का फल अशुभ व कार्य नाशक कहा है। दीप्त शकुन के छह भेद कहे गए हैं।


1👉 वेला दीप्त शकुन👉 शकुन का विचार करते समय दिन में विचरने वाले प्राणी रात्री को तथा रात्रिचर प्राणी दिन में शकुन कारक हों तो वेलादीप्त शकुन कहा जाता है। शकुनकालीन लग्न या नक्षत्र पाप ग्रह से पीड़ित हो तो भी वेला दीप्त शकुन होता है।


2👉 दिग्दीप्त शकुन👉 सूर्य जिस दिशा में स्थित हो उसे ज्वलिता ,जिस दिशा से आये हों उसे धूमिता तथा जिस दिशा में जाने वाले हों उसे अन्गारिणी कहते हैं। ये तीनों दिशाएँ दीप्त कही गयी हैं। दीप्त दिशा में होने वाले शकुन को दिग्दीप्त कहा गया है जिसका फल अशुभ व कार्य नाशक होता है।


3👉 देश दीप्त शकुन👉 जंगली पशु-पक्षी का गाँव व शहर में तथा शहर के पालतू पशु-पक्षियों का जंगल में दिखना देश दीप्त शकुन है। शकुन यदि अशुभ स्थान पर दिखाई दे तो भी देश दीप्त शकुन होता है जिस का फल अशुभ कहा गया है।


4👉 क्रिया दीप्तशकुन👉 कोई पुरुष,स्त्री या पशु पक्षी अपने स्वभाव के विरुद्ध आचरण करता हुआ दिखाई दे तो क्रिया दीप्त शकुन कहलाता है।


5👉 रुतदीप्त शकुन👉 फटी हुई ,कर्कश एवम रोने की आवाज का सुनाई देना रुतदीप्त शकुन कहलाता है।


6👉 जाति दीप्त शकुन👉 मांसाहारी प्राणियों का दर्शन जाति दीप्त शकुन कहलाता है जिसका फल कार्य की असफलता का सूचक है।


शांत शकुन

〰️〰️〰️〰️ उपरोक्त सभी दीप्त शकुनों से विपरीत शकुनों वाले सभी शकुन शांत शकुन होते हैं जिनका दर्शन या श्रवण कार्य में सफलता का संकेत देता है। दीप्त व शांत दोनों ही शकुन दिखाई दें तो कठिनता से कार्य सिद्धि समझनी चाहिए।


आगे हम शकुन अपशकुनो के विषय मे विस्तृत रूप से बता रहे है।


छींक संबंधित शकुन अपशकुन

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1- यदि घर से निकलते समय कोई सामने से छींकता है तो कार्य में बाधा आती है।

अगर एक से अधिक बार छींकता है तो कार्य सरलता से संपन्न हो जाता है।


2- किसी मेहमान के जाते समय कोई उसके बाईं ओर छींकता है तो यह अशुभ संकेत है।


3- कोई वस्तु क्रय करते समय यदि छींक आ जाए तो खरीदी गई वस्तु से लाभ होता है।


4- सोने से पूर्व और जागने के तुरंत बाद छींक की ध्वनि सुनना अशुभ माना जाता है।


5- नए मकान में प्रवेश करते समय यदि छींक सुनाई दे तो प्रवेश स्थगित कर देना ही उचित होता है।


6- व्यावसायिक कार्य आरंभ करने से पूर्व छींक आना व्यापार वृद्धि का सूचक होती है।


7- कोई मरीज यदि दवा ले रहा हो और छींक आ जाए तो वह शीघ्र ही ठीक हो जाता है।


8- भोजन से पूर्व छींक की ध्वनि सुनना अशुभ मानी जाती है।


9- यदि कोई व्यक्ति दिन के प्रथम प्रहर में पूर्व दिशा की ओर छींक की ध्वनि सुनता है तो उसे अनेक कष्ट झेलने पड़ते हैं। दूसरे प्रहर में सुनता है तो देह कष्ट, तीसरे प्रहर में सुनता है तो दूसरे के द्वारा स्वादिष्ट भोजन की प्राप्ति और चौथे प्रहर में सुनता है तो किसी मित्र से मिलना होता है।


10- धार्मिक अनुष्ठान या यज्ञादि प्रारंभ करते समय कोई छींकता है तो अनुष्ठान संपूर्ण नहीं होता है।


कौवे से जुड़े शकुन अपशकुन

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1- यदि किसी व्यक्ति के ऊपर कौआ आकर बैठ जाए तो उसेधन व सम्मान की 

हानि होती है। यदि किसी महिला के सिर पर कौआ बैठता है तो उसके पति को गंभीर संकट का सामना करना पड़ता है।


2- यदि बहुत से कौए किसी नगर या गांव में एकत्रित होकर शौर करें तो उस नगर या गांव पर भारी विपत्ति आती है।


3- किसी के भवन पर कौओं का झुण्ड आकर शौर मचाए तो भवन मालिक पर कई संकट एक साथ आ जाते हैं।


4- कौआ यदि यात्रा करने वाले व्यक्ति के सामने आकर सामान्य स्वर में कांव-कांव करें और चला जाए तो कार्य सिद्धि की सूचना देता है।


5- यदि कौआ पानी से भरे घड़े पर बैठा दिखाई दे तो धन-धान्य की वृद्धि करता है।


6- कौआ मुंह में रोटी, मांस आदि का टुकड़ा लाता दिखाई दे तो उसे अभिष्ट फल की प्राप्ति होती है।


7- पेड़ पर बैठा कौआ यदि शांत स्वर में बोलता है तो स्त्री सुख मिलता है।


8- यदि उड़ता हुआ कौआ किसी के सिर पर बीट करे तो उसे रोग व संताप होता है। और यदि हड्डी का टुकड़ा गिरा दे तो उस व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है।


9- यदि कौआ पंख फडफ़ड़ाता हुआ उग्र स्वर में बोलता है तो यह अशुभ संकेत है।


10- यदि कौआ ऊपर मुंह करके पंखों को फडफ़ड़ाता है और कर्कश स्वर में आवाज करता है तो वह मृत्यु की सूचना देता है।


छिपकली से जुड़े शकुन अपशकुन

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घरों में आमतौर पर पाई जाने वाली छिपकली भी जीवन में होने वाली कई घटनाओं के बारे में संकेत करती है।

किसी भी कार्य के वक्त घटित होने वाले प्राकृतिक व अप्राकृतिक तथ्य अच्छे व बुरे फल की भविष्यवाणी करने में सक्षम होते है॥ 


1- अगर छिपकली समागम करती मिले तो किसी पुराने मित्र से मिलन होता है। लड़ती दिखे तो किसी दूसरे से झगड़ा होता है और अलग होती दिखे तो किसी प्रियजन से बिछुडऩे का दु:ख होता है।


2- भोजन करते समय छिपकली का बोलना शुभ फलकारक होता है।


3- नए घर में प्रवेश करते समय गृहस्वामी को छिपकली मरी हुई व मिट्टी लगी हुई दिखाई दे तो उसमें निवास करने वाले लोग रोगी रहेंगे।


4- छिपकली किसी व्यक्ति के सिर अथवा दाहिने हाथ पर गिरे तो सम्मान तो मिलता है किंतु बाएं हाथ पर गिरती है तो धन हानि होती है।


5- यदि छिपकली किसी व्यक्ति के दाई ओर से चढ़कर बाईं ओर उतरती है तो उसे पदोन्नति और धन लाभ मिलता है।


6- यदि छिपकली पेट पर गिरती है तो अनेक प्रकार के उत्पात और छाती पर गिरती है तो सुस्वादु भोजन मिलता है।


7- घुटने पर गिरकर सुख प्राप्ति की सूचना देती है छिपकली।


8- स्त्री की बाईं बांह पर छिपकली गिरे तो सौभाग्य में वृद्धि और दाहिनी बांह पर गिरे तो सौभाग्य की हानि होती है।


9- यदि किसी के दाहिने गाल पर छिपकली गिरे तो उसे भोग-विलास की प्राप्ति होती है। बाएं गाल पर गिरे तो स्वास्थ्य में विकार उत्पन्न होते हैं।


10- यदि छिपकली नाभि पर गिरे तो पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। गुप्त अंगों पर गिरे तो रोग की संभावना होती है।


वर्षा संबंधित शकुन अपशकुन

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मेदिनीय ज्योतिष में भी शकुन अपना विशेष महत्व रखते हैं। वर्षा होगी या नहीं होगी, कम होगी या अधिक होगी इस प्रकार की भविष्य वाणियां भी शकुनों के आधार पर की जाती हैं कुछ उदाहरण निम्न हैं। यदि आसमान बादलों से घिरा हो व पालतू कुत्ता घर से बाहर न जाए, तो वर्षा का सूचक है। यदि आसमान में चील 400 फुट की ऊंचाई पर उड़ रही हो, तो भी वर्षा होने वाली होती है। यदि मकड़ी घर के बाहर जाला बनाए तो वर्षा ऋतु जाने का सूचक है। मेढकों की टर्रराहट वर्षा का संकेत है। मोर का नृत्य तथा शोर भी वर्षा का सूचक है।


कुत्ते के द्वारा शुभाशुभ शकुन विचारने का नियम

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कुत्ता आज के जमाने में प्रत्येक घर में मिल जाता है,और सभी को पता है कि कुत्ता की अतीन्द्रिय जागृत होती है,किसी भी होनी अनहोनी को वह जानता है,अद्र्श्य आत्मा को देखने और किसी भी बदलाव को सूंघ कर जान लेने की क्षमता कुत्ते के अन्दर होती है,कुत्ते को दरवेश का दर्जा दिया गया है,समय असमय को बताने में कुत्ता अपनी भाषा में इन्सान को बताने की कोशिश करता है,और जो कुत्ते की भाषा को समझते है,वे अनहोनियों से बचे रहते है,और जो मूर्ख होते है,और अपने को जबरदस्ती हानि की तरफ़ ले जाना चाहते है वे उसकी भाषा को बकवास कह कर टाल देते है,कुत्ता अगर यात्रा के शुरु करते ही किसी कचडे पर पेशाब करता है,तो जान लीजिये कि यात्रा या शुरु किया जाने वाला कार्य सफ़ल है,यदि किसी सूखी लकडी पर पेशाब करता है,तो भौतिक धन की प्राप्ति होती है,अगर कुत्ता कांटेदार झाड पर,पत्थर या राख पर पेशाब करने के बाद काम शुरु करने वाले के आगे चल दे तो वह कार्य खराब हो जाता है,यदि कुत्ता किसी कपडे को लाकर सामने खडा हो तो समझना चाहिये कि कार्य सफ़ल है,यदि कुत्ता कार्य शुरु करने वाले के पैर चाटे,कान फ़डफ़डाये,अथवा काटने को दौडे तो समझना चाहिये कि सामने काफ़ी बाधायें आ रही है,यदि कुत्ता यात्रा के समय या काम शुरु करने के समय अपने शरीर को खुजलाना चालू कर दे तो जान लेना चाहिये के वह कार्य करने अथवा यात्रा पर जाने से मना कर रहा है।


यदि कुत्ता किसी कार्य को शुरु करते वक्त या यात्रा पर जाते वक्त चारों पैर ऊपर की तरफ़ करके सोये तो भी कार्य या यात्रा नही करनी चाहिये,यदि गली मोहल्ले के आवारा कुत्ते किसी भी समय ऊपर की तरफ़ मुंह करके रोना चालू करें तो समझना चाहिये कि उस गली या मोहल्ले के प्रमुख व्यक्ति पर कोई मुशीबत आने वाली है,यात्रा करने के साथ या काम करने के साथ कुत्ते आपस में लड पडें तो भी काम या यात्रा में विघ्न पैदा होता है,कुत्ते के कान फ़डफ़डाने का समय सभी कामों के लिये त्यागने में ही भलाई होती है,कुत्ता अगर बैचैन होकर इधर उधर भागना चालू करे,तो समझना चाहिये कि कोई आकस्मिक मुसीबत आ रही है, किसी बात को सोचने के पहले या धन खर्च करते वक्त अगर कुत्ता अपनी पूंछ को पकडने की कोशिश करता है,तो मान लेना चाहिये कि आपने अपने भविष्य के लिये नही सोचा है और खर्च करने के बाद पछताना पडेगा, कुत्ता अगर सुबह के समय लान या बगीचे में घास खा रहा हो तो समझ लेना चाहिये कि घर के अन्दर जो खाना बना है उसमे किसी प्रकार इन्फ़ेक्सन है, कुत्ता अगर जूता लेकर भाग रहा हो तो समझना चाहिये कि वह बाहर जाने से रोक रहा है, लडकी के अपने ससुराल जाने के वक्त अगर कुत्ता रोना चालू कर दे तो समझना चाहिये कि लडकी को ससुराल से वापस आने में संदेह है।


कुत्ता अगर मालिक के पैर के पास जाकर सोना चालू कर दे तो समझना चाहिये कि घर में किसी सदस्य के आने का संकेत है, कुत्ता अगर अपने खुद के पैर चाटना चालू करे तो यात्राओं की शुरुआत समझनी चाहिये, कुत्ता अगर एकान्त में बैठना चालू कर दे और बुलाने से आने में आनाकानी करे तो समझना चाहिये कि घर मे किसी सदस्य के लम्बी बीमारी में जाने का संकेत है, कुत्ता अगर पूंछ नीचे डालकर मुख्य दरवाजे के पास कुछ खोजने का प्रयत्न कर रहा हो तो समझना चाहिये कि कोई कर्जा मांगने वाला आ रहा है,कुत्ता अगर भोजन करते वक्त बार बार बाहर और अन्दर भाग रहा हो तो समझना चाहिये कि भोजन और कोई करने आने वाला है।


कुछ अन्य ”शुुभ शकुुन” की विस्तृत व्याख्या👉

〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ ”ब्राह्मण, घोड़ा, हाथी, न्योला, बाज, मोर। दूध, फल, फूल व वेद ध्वनि का सोर॥ अन्न, सिंहासन, जल, कलश, पशु एक बधन्त। न्योला चापा, मछली और अग्नि प्रज्वलंत॥ छाता, वैश्या, पगड़ी, अंजन, ऐना, शस्त्र। कन्या, रत्न, स्त्री, धोबी धोया वस्त्र॥ घृत मिट्टी अस्त्र शहद, मदिरा वस्त्र श्वेत। गोरोचन सरसों अमिष, गन्ना खज्जन भेद॥ बिन रोदन मुर्दा मिले, पालकी भरदुल गीत। ध्वज अकुंश बकरा पडे़, सम्मुख अपना गीत॥ बालक संग स्त्री मिले, नौ बेटा बैल सफेद। साधु सुधा सुरतर-पड़े, सम्मुख चारों वेद ॥ कूड़ा से भरी टोकरी जो सम्मुख पडंत। पाछे घट खाली पड़े, निश्चय काज बनंत। । प्रिय वाणी कानों पड़े, सम्मुख वाहन भार। कह कवि ये शुभ शकुन यात्रा चलती बार॥ 


अर्थात्👉 ब्राह्मण, घोड़ा, हाथी, न्योला, बाज, मोर, दूध, दही, फल, फूल, कमल, वेदध्वनि, अन्न, सिंहासन, जल से भरा कलश, बंधा हुआ एक पशु, न्योला, चापा (चाहा पक्ष) मछली, प्रज्वलित अग्नि, छाता, वैश्या, पनाली, अंजन, ऐना, शस्त्र, रत्न, स्त्री, कन्या, धुले हुए वस्त्र सहित धोबी, घी, मिट्टी, सरसों, मांस, गन्ना, खज्जन पक्ष, रोदन रहित मुर्दा, पालकी, भारद्वाज पक्षी, ध्वजा, अंकुश, बकरा, अपना प्रिय मित्र, बच्चे के सहित स्त्री, गाय या गोह के सहित बछड़ा, सफेद बैल, साधु, अमृत, कल्पवृक्ष चारों वेद, शहद, शराब, गोरोचन आदि में से कुछ भी सम्मुख पड़े या कूड़े से भरी टोकरी, प्रिय वाणी या सामान से लदा वाहन यदि यात्रा के वक्त सम्मुख पड़ जाए तो निश्चय ही इच्छा पूर्ति का संकेत करते हैं। खाली घड़ा पीठ पीछे हो तो अच्छा हे ।

ये शुभ शकुन हैं। 


”नीलकण्ठ छिक्कर-पिक्कर वानर कौवी भालु। जै कुकर दाएं पड़े तो सिद्ध होय सब काजु॥ अर्थात् नीलकण्ठ छिक्कर नामक विशेष मृग, पिक्कर पक्षी, कौवी (स्त्री संज्ञक) भालू व कुत्ता यदि दाएं हाथ पर पड़े तो कार्य सिद्ध होता है। मृग बाएं ते दाहिने जो आवे तत्काल। बाएं गर्दभ रेकंजा सिद्धि होय सब काज॥ अर्थात् यदि हिरण बायीं तरफ से रास्ता काटकर दायीं तरफ आ जाए या बायीं तरफ गधा बोलना प्रारंभ कर दे तो शुभ शकुन है। 


शुभ और अशुभ शुकुन

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खड़ा कोबरा, सूकरा, जाहक, कछुआ, गोह। ये शब्द कानों पड़े निश्चय कारज होय॥ पर दर्शन हो जाएं तो महाअशुभ होय। अतिहि कु शकुन जानिये काट सके ना कोय॥ अर्थात् यदि खरगोश, सर्प, सूअर, जाहक, पशु, कछुआ व गोह के शब्द कानों में पड़े तो अत्यंत शुभ शकुन समझें। परंतु यदि ये प्रत्यक्ष सामने पड़ जाएं तो महा अशुभ हैं। बानर, भालु दर्शन भले, नाम के सुनते हानि। कह कवि विचार के तब आगे करौ पदान॥ 


अर्थात् यदि वानर भालू यात्रा आरंभ वक्त आगे जाए तो उत्तम शकुन है परंतु यदि इनका नाम कानों में पड़े तो अपशकुन का द्योतक है।


अपशकुन विचार

〰️〰️〰️〰️〰️” दांए गर्दभ शब्द हो, सम्मुख काला धान्य। टूटी खाट आगे मिले तो बहुत हानि॥ कूकूर लोटे भुम्म पर, अथवा मारे कान। पांच भैंस सम्मुख पड़ें, निश्चय होवे धन॥ एक अजाः नौ स्त्री, बिल्ली दो लड़न्त। छह कुत्ता आगे पड़ें, नहीं बात में तंत॥ तीन गाय दो बानिया, एक बछड़ा एक शूद्र। हाथी सात सम्मुख पडं़े, निश्चय बिगड़े बुद्धि॥ भैंसा पर बैठा हुआ, मनुष्य सम्मुख होय। निश्चय हानि होयेगी, बचा सके ना कोय ॥ जननी का तिरस्कार होय या हो अकाल वृष्टि। क्षत्री चार सम्मुख पडे, निश्चय महाअनिष्ट ॥ तीन विप्र बैरागिया, सन्यासी केश खुलंत। भगवा व स्त्री सम्मुख पड़े, निश्चय कारण अंत॥ बंध्या, रजः, रजस्वला, भूसा हड्डी चामं। अंधा, बहरा, कूबड़ा विधवा लगड़ा पांव ॥ ईंधन लक्कड़ उन्मादिया, भैंसा दो लड़ंत। गुंड, मट्ठा, कीचड़ पड़े सम्मुख छींक हुवंत ॥ हिजड़ा विष्ठा तेल जो, मालिश तेल मनुष्य। अंग भंग नंगा पतित रोगी पूरा सुस्त॥ गंजा भिजे वस्त्र सों, चर्बी शत्रु सांप। नमक औषधि गिरगिरा कुटंबी झगड़े आप ॥ कटु बचन सम्मुख पड़े, जौ यात्रा चलती बार। कह कवि हानि महा बिगड़े सारे काज॥ 


अर्थात्👉

〰️〰️〰️ यदि यात्रा के समय गधा दायीं तरफ बोले या कोई सामने से टूटी खाट लाता हुआ मिले कारज भंग होता है। यदि कुत्ता भूमि पर लेटे या कान फड़फड़ाये, पांच भैंस सामने आये, एक बकरी नौ स्त्री, दो बिल्ली लड़ती हुई, छः कुत्ते, तीन गाय, दो वैश्य, एक बैल एक शूद्र, सात हाथी, या भैंसे पर बैठा हुआ व्यक्ति यदि सम्मुख पड़े तो अपशकुन का सूचक है।

यात्रा में चलते समय जननी का तिरस्कार करे या अकाल वर्षा हो, चार क्षत्रिय, तीन ब्राह्मण बैरागी, सन्यासी, खुले केशों वाला गेरूरा वस्त्र धारण करने वाला सम्मुख पड़ जाए तो अपशकुन है। इसी प्रकार बांझ औरत, स्त्री का रज, रजोवती स्त्री, भूसा, हड्डी, चमड़ा, अंधा, बहरा, कूबड़ा, विधवा स्त्री, जलाने वाली लकड़ी, उपला, पागल, गुड़, मट्ठा कीचड़ सामने आये, दो भैंसे लड़ते हुए, नपुसंक, विष्ठा, तेल मालिश किये आदमी, अंग भंग, नंगा नीच पुरुष, दीर्घ रोगी, गंजा भीगे वस्त्रों में, चर्बी, सर्प, शत्रु, नमक, औषधि, गिरगिट सामने आ जाए, अपने ही कुटुंबी सामने लड़ते हों, सामने कोई छींक दे या यात्रा के वक्त अप्रिय बचन सुनाई पड़ें तो अपशकुन कुुछ अन्य शकुुन अपशकुुन जो पशु पक्षियों द्वारा होते हैैं शकुनों में कौवा, छिपकली व अन्य पशु पक्षियों का विचार किया जाता है। काक स्पर्श व छिपकली के गिरने को अशुभ समझा गया है। यदि कौआ अचानक शोरगुल करे या किसी के सिर पर बैठे तो आर्थिक हानि दर्शाता है। यदि स्त्री के सिर पर बैठे तो पति को वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। संध्या के समय मुर्गों की ध्वनियां महामारी दर्शाती हैं। जब मछलियां जल की सतह पर छलांग मारें, मेढक टर्र-टर्र करे, बिल्ली भूमि खोदे, चीटियां अपने अंडों को स्थानांतरित करें, सांपों का जोड़ा व पशु आकाश की ओर देखे, पालतू पशु बाहर जाने से घबराएं तो तुरंत ही वर्षा होती है यदि रात्रि में दीपकीट दिखाई दे, कीड़े या सरीसृप घास के ऊपर बैठें तो भी तत्काल वर्षा होती है। यदि वर्षा ऋतु के दौरान सायंकाल में गीदड़ों की चिल्लाहट सुनाई दे तो बिल्कुल वर्षा नहीं होती। मांसभक्षी पशु-पक्षी, का दिखाई देना अशुभ व शाकाहारी पशु, पक्षी प्रायः शुभ शकुन का संकेत देते हैं। ज्योतिष में शकुनों अपशकुनों का विशेष विचार प्रश्न आदि में किया जाता है।


उल्लेखनीय है कि किसी काम की सफलता के लिए मन में उत्साह, आशा, धैर्य और पूर्ण आत्मविश्वास होना ही चाहिए। इसमें कमी आने से अपेक्षित एकाग्रता, श्रमशीलता एवं तत्परता घट जाएगी परिणामस्वरूप सफलता की संभावना में भी कमी आएगी। शुभ-अशुभ शकुनों में विश्वास करने से हाने जीवन मे हिने वाली घटनाओं का पूर्वाभास हो जाता है वही मन मे वहम होना एक नुकसान भी है मन अकारण ही आशंकित और आतंकित हो जाता है, जिससे असफलता के बीज पनपने लगते हैं और भली प्रकार प्रयास न कर पाने के कारण सफलता नहीं मिलती। स्मरणीय है कि अपशकुन हमें तभी याद आते हैं, जब हमको किसी कार्य में असफलता मिलती है। यदि पहले ही उस विषय मे विचार किया जाए तो शायद कार्य असफलता हो ही ना सफलता या असफलता का मिलना हमारी योग्यता या अयोग्यता का भी परिचायक है। हिन्दुओं में आज तक पुरुष के दाहिने और स्त्रियों के बाएं अंग फड़कने को शकुन मानते हैं और पुरुष के बाएं और स्त्रियों के दाएं अंग फड़कने को अपशकुन समझते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह नाड़ियों में रक्तप्रवाह के कारण ही अंगों में फड़कन महसूस होती है, जिसका किसी शकुन अपशकुन के साथ कोई संबंध नहीं होता। छींक आना शरीर-विज्ञान के मतानुसार एक सहज और स्वाभाविक प्रक्रिया है, जो श्वास नली में अवरोध आने पर उत्पन्न होती है, जिसके परिणामस्वरूप आया अवरोध एकाएक दूर हो जाता है। इसके अलावा हानिकारक वायुमंडल के कण जब नाक के अंदर और श्वास नली में जमा होकर अवरोध पैदा करते हैं तो छींक रूपी प्राकृतिक उपाय से शरीर की रक्षा ही होती है। यदि यह हानिकारक गंदगी छींक के माध्यम से बाहर न हो तो मानसिक तनाव, चक्कर आना जैसे बुरे प्रभाव शरीर पर पड़ते हैं। इसलिए छींक आना स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभप्रद ही है। इसी प्रकार आंख का फड़कना शुभ या अशुभ माना जाता है, जो शरीर विज्ञान के अनुसार रक्त की अनियमितता के परिणामस्वरूप उत्पन्न होता है । रक्त प्रवाह में रुकावट और उसका दूर होना ही फड़कन का अनुभव देता है। इसलिए विज्ञान को मानने वाले जहां तक हो सके, इन अपशकुनों के चक्कर में पड़ने से बचने और कर्म में विश्वास करने की सलाह देते है जबकि कुछ ज्योतिष एवं शकुन शास्त्र के ग्रंथो और हमारी पौराणिक धार्मिक मान्यताओं अनुसार व्यक्ति के जीवन मे हर छोटी से बड़ी घटना भविष्य में होने वाली किसी न किसी अन्य घटना से जुड़ी है वैज्ञानिक मान्यता से चलने वाले लोग इन्हें भले ही पाखंड या अंध विश्वास कहे लेकिन हमारी निजी सोच एव अनुभव के आधार पर ये सभी शकुन अपशकुन किसी विशेष परिस्थिति में ही क्यो घटित होते है हर समय क्यो नही ये सबसे बड़ा विचारणीय विषय है। 


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बुधवार, 5 नवंबर 2025

स्वप्नसंकेत

 स्वप्नसंकेत ---

ज्योतिष के अनुसार रात्रि नींद में दिखाई देने वाले हर स्वप्न का एक ख़ास संकेत एवं संभावित फल कितनी जल्दी मिलेगा, यह स्वप्न रात्रि के किस पहर में देखा गया है इस पर आधारित है सामान्यत: ब्राह्मवेला में देखे गए स्वप्न जल्दी फलीभूत होते हैं।


      ~रात्रि स्वप्न~ ~ फल~

1- आंखों में काजल लगाना- शारीरिक कष्ट होना

2- स्वयं के कटे हाथ देखना- किसी निकट परिजन की मृत्यु

3- सूखा हुआ बगीचा देखना- कष्टों की प्राप्ति

4- मोटा बैल देखना- अनाज सस्ता होगा

5- पतला बैल देखना - अनाज महंगा होगा

6- भेडिय़ा देखना- दुश्मन से भय

7- राजनेता की मृत्यु देखना- देश में समस्या होना

8- पहाड़ हिलते हुए देखना- किसी बीमारी का प्रकोप होना

9- पूरी खाना- प्रसन्नता का समाचार मिलना

10- तांबा देखना- गुप्त रहस्य पता लगना


11- पलंग पर सोना- गौरव की प्राप्ति

12- थूक देखना- परेशानी में पडऩा

13- हरा-भरा जंगल देखना- प्रसन्नता मिलेगी

14- स्वयं को उड़ते हुए देखना- किसी मुसीबत से छुटकारा

15- छोटा जूता पहनना- किसी स्त्री से झगड़ा

16- स्त्री से मैथुन करना- धन की प्राप्ति

17- किसी से लड़ाई करना- प्रसन्नता प्राप्त होना

18- लड़ाई में मारे जाना- राज प्राप्ति के योग

19- चंद्रमा को टूटते हुए देखना- कोई समस्या आना

20- चंद्रग्रहण देखना- रोग होना


21- चींटी देखना- किसी समस्या में पढऩा

22- चक्की देखना- शत्रुओं से हानि

23- दांत टूटते हुए देखना- समस्याओं में वृद्धि

24- खुला दरवाजा देखना- किसी व्यक्ति से मित्रता होगी

25- बंद दरवाजा देखना- धन की हानि होना

26- खाई देखना- धन और प्रसिद्धि की प्राप्ति

27- धुआं देखना- व्यापार में हानि

28- भूकंप देखना- संतान को कष्ट

29- सुराही देखना- बुरी संगति से हानि

30- चश्मा लगाना- ज्ञान बढऩा


31- दीपक जलाना- नए अवसरों की प्राप्ति

32- आसमान में बिजली देखना- कार्य-व्यवसाय में स्थिरता

33- मांस देखना- आकस्मिक धन लाभ

34- विदाई समारोह देखना- धन-संपदा में वृद्धि

35- टूटा हुआ छप्पर देखना- गड़े धन की प्राप्ति के योग

36- पूजा-पाठ करते देखना- समस्याओं का अंत

37- शिशु को चलते देखना- रुके हुए धन की प्राप्ति

38- फल की गुठली देखना- शीघ्र धन लाभ के योग

39- दस्ताने दिखाई देना- अचानक धन लाभ

40- शेरों का जोड़ा देखना- दांपत्य जीवन में अनुकूलता


41- मैना देखना- उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति

42- सफेद कबूतर देखना- शत्रु से मित्रता होना

43- बिल्लियों को लड़ते देखना- मित्र से झगड़ा

44- सफेद बिल्ली देखना- धन की हानि

45- मधुमक्खी देखना- मित्रों से प्रेम बढऩा

46- खच्चर दिखाई देना- धन संबंधी समस्या

47- रोता हुआ सियार देखना- दुर्घटना की आशंका

48- समाधि देखना- सौभाग्य की प्राप्ति

49- गोबर दिखाई देना- पशुओं के व्यापार में लाभ

50- चूड़ी दिखाई देना- सौभाग्य में वृद्धि


51- दियासलाई जलाना- धन की प्राप्ति

52- सीना या आंख खुजाना- धन लाभ

53- सूखा जंगल देखना- परेशानी होना

54- मुर्दा देखना- बीमारी दूर होना

55- आभूषण देखना- कोई कार्य पूर्ण होना

56- जामुन खाना- कोई समस्या दूर होना

57- जुआ खेलना- व्यापार में लाभ

58- धन उधार देना- अत्यधिक धन की प्राप्ति 

59- चंद्रमा देखना- सम्मान मिलना

60- चील देखना- शत्रुओं से हानि


61- स्वयं को दिवालिया घोषित करना- व्यवसाय चौपट होना

62- चिडिय़ा को रोते देखता- धन-संपत्ति नष्ट होना

63- चावल देखना- किसी से शत्रुता समाप्त होना

64- चांदी देखना- धन लाभ होना

65- दलदल देखना- चिंताएं बढऩा

66- कैंची देखना- घर में कलह होना

67- सुपारी देखना- रोग से मुक्ति

68- लाठी देखना- यश बढऩा

69- खाली बैलगाड़ी देखना- नुकसान होना

70- खेत में पके गेहूं देखना- धन लाभ होना


71- फल-फूल खाना- धन लाभ होना

72- सोना मिलना- धन हानि होना

73- शरीर का कोई अंग कटा हुआ देखना- किसी परिजन की मृत्यु के योग

74- कौआ देखना- किसी की मृत्यु का समाचार मिलना

75- धुआं देखना- व्यापार में हानि

76- चश्मा लगाना- ज्ञान में बढ़ोत्तरी

77- भूकंप देखना- संतान को कष्ट

78- रोटी खाना- धन लाभ और राजयोग

79- पेड़ से गिरता हुआ देखना- किसी रोग से मृत्यु होना


80- श्मशान में शराब पीना- शीघ्र मृत्यु होना

81- रुई देखना- निरोग होने के योग

82- कुत्ता देखना- पुराने मित्र से मिलन

83- सफेद फूल देखना- किसी समस्या से छुटकारा

84- उल्लू देखना- धन हानि होना

85- सफेद सांप काटना- धन प्राप्ति

86- लाल फूल देखना- भाग्य चमकना

87- नदी का पानी पीना- सरकार से लाभ

88- धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाना- यश में वृद्धि व पदोन्नति

89- कोयला देखना- व्यर्थ विवाद में फंसना

90- जमीन पर बिस्तर लगाना- दीर्घायु और सुख में वृद्धि


91- घर बनाना- प्रसिद्धि मिलना

92- घोड़ा देखना- संकट दूर होना

93- घास का मैदान देखना- धन लाभ के योग

94- दीवार में कील ठोकना- किसी बुजुर्ग व्यक्ति से लाभ

95- दीवार देखना- सम्मान बढऩा

96- बाजार देखना- दरिद्रता दूर होना

97- मृत व्यक्ति को पुकारना- विपत्ति एवं दु:ख मिलना

98- मृत व्यक्ति से बात करना- मनचाही इच्छा पूरी होना

99- मोती देखना- पुत्री प्राप्ति

100- लोमड़ी देखना- किसी घनिष्ट व्यक्ति से धोखा मिलना


101- अनार देखना- धन प्राप्ति के योग

102- गड़ा धन दिखाना- अचानक धन लाभ

103- सूखा अन्न खाना- परेशानी बढऩा

104- अर्थी देखना- बीमारी से छुटकारा

105- झरना देखना- दु:खों का अंत होना

106- बिजली गिरना- संकट में फंसना

107- चादर देखना- बदनामी के योग

108- जलता हुआ दीया देखना- आयु में वृद्धि

109- धूप देखना- पदोन्नति और धनलाभ

110- रत्न देखना- व्यय एवं दु:ख


111- चेक लिखकर देना- विरासत में धन मिलना

112- कुएं में पानी देखना- धन लाभ

113- आकाश देखना - पुत्र प्राप्ति

114- अस्त्र-शस्त्र देखना- मुकद्में में हार

115- इंद्रधनुष देखना - उत्तम स्वास्थ्य

116- कब्रिस्तान देखना- समाज में प्रतिष्ठा

117- कमल का फूल देखना- रोग से छुटकारा

118- सुंदर स्त्री देखना- प्रेम में सफलता

119- चूड़ी देखना- सौभाग्य में वृद्धि

120- कुआं देखना- सम्मान बढऩा


121- गुरु दिखाई देना - सफलता मिलना

122- गोबर देखना- पशुओं के व्यापार में लाभ

123- देवी के दर्शन करना- रोग से मुक्ति

124- चाबुक दिखाई देना- झगड़ा होना

125- चुनरी दिखाई देना- सौभाग्य की प्राप्ति

126- छुरी दिखना- संकट से मुक्ति

127- बालक दिखाई देना- संतान की वृद्धि

128- बाढ़ देखना- व्यापार में हानि

129- जाल देखना- मुकद्में में हानि

130- जेब काटना- व्यापार में घाटा


131- चंदन देखना- शुभ समाचार मिलना

132- जटाधारी साधु देखना- अच्छे समय की शुरुआत

133- स्वयं की मां को देखना- सम्मान की प्राप्ति

134- फूलमाला दिखाई देना- निंदा होना

135- जुगनू देखना- बुरे समय की शुरुआत

136- टिड्डी दल देखना- व्यापार में हानि

137- डाकघर देखना - व्यापार में उन्नति

138- डॉक्टर को देखना- स्वास्थ्य संबंधी समस्या

139- ढोल दिखाई देना- किसी दुर्घटना की आशंका

140- सांप दिखाई देना- धन लाभ


141- तपस्वी दिखाई देना- दान करना

142- तर्पण करते हुए देखना- परिवार में किसी बुुजुर्ग की मृत्यु

143- डाकिया देखना - दूर के रिश्तेदार से मिलना

144- तमाचा मारना- शत्रु पर विजय

145- उत्सव मनाते हुए देखना- शोक होना

146- दवात दिखाई देना- धन आगमन

147- नक्शा देखना- किसी योजना में सफलता

148- नमक देखना- स्वास्थ्य में लाभ

149- कोर्ट-कचहरी देखना- विवाद में पडऩा

150- पगडंडी देखना- समस्याओं का निराकरण


151- त्रिशूल देखना- शत्रुओं से मुक्ति

152- तारामंडल देखना- सौभाग्य की वृद्धि

153- ताश देखना- समस्या में वृद्धि

154- तीर दिखाई देना- लक्ष्य की ओर बढऩा

155- सूखी घास देखना- जीवन में समस्या

156- भगवान शिव को देखना- विपत्तियों का नाश

157- किसी रिश्तेदार को देखना- उत्तम समय की शुरुआत

158- दंपत्ति को देखना- दांपत्य जीवन में अनुकूलता

159- शत्रु देखना- उत्तम धनलाभ

160- दूध देखना- आर्थिक उन्नति


161- मंदिर देखना- धार्मिक कार्य में सहयोग करना

162- नदी देखना- सौभाग्य वृद्धि

163- नाच-गाना देखना- अशुभ समाचार मिलने के योग

164- नीलगाय देखना- भौतिक सुखों की प्राप्ति

165- नेवला देखना- शत्रुभय से मुक्ति

166- पगड़ी देखना- मान-सम्मान में वृद्धि

167- पूजा होते हुए देखना- किसी योजना का लाभ मिलना

168- फकीर को देखना- अत्यधिक शुभ फल

169- गाय का बछड़ा देखना- कोई अच्छी घटना होना

170- वसंत ऋतु देखना- सौभाग्य में वृद्धि


171- बिल्वपत्र देखना- धन-धान्य में वृद्धि

172- स्वयं की बहन देखना- परिजनों में प्रेम बढऩा

173- भाई को देखना- नए मित्र बनना

174- भीख मांगना- धन हानि होना

175- शहद देखना- जीवन में अनुकूलता

176- स्वयं की मृत्यु देखना- भयंकर रोग से मुक्ति

177- रुद्राक्ष देखना- शुभ समाचार मिलना

178- पैसा दिखाई देना- धन लाभ

179- स्वर्ग देखना- भौतिक सुखों में वृद्धि

180- पत्नी को देखना- दांपत्य में प्रेम बढऩा


181- स्वस्तिक दिखाई देना- धन लाभ होना

182- हथकड़ी दिखाई देना- भविष्य में भारी संकट

183- मां सरस्वती के दर्शन- बुद्धि में वृद्धि

184- कबूतर दिखाई देना- रोग से छुटकारा

185- कोयल देखना- उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति

186- अजगर दिखाई देना- व्यापार में हानि

187- कौआ दिखाई देना- बुरी सूचना मिलना

188- छिपकली दिखाई देना- घर में चोरी होना

189- चिडिय़ा दिखाई देना- नौकरी में पदोन्नति

190- तोता दिखाई देना- सौभाग्य में वृद्धि


191- भोजन की थाली देखना- धनहानि के योग

192- इलाइची देखना - मान-सम्मान की प्राप्ति

193- खाली थाली देखना- धन प्राप्ति के योग

194- गुड़ खाते हुए देखना- अच्छा समय आने के संकेत

195- शेर दिखाई देना- शत्रुओं पर विजय

196- हाथी दिखाई देना- ऐेश्वर्य की प्राप्ति

197- कन्या को घर में आते देखना- मां लक्ष्मी की कृपा मिलना

198- सफेद बिल्ली देखना- धन की हानि

199- दूध देती भैंस देखना- उत्तम अन्न लाभ के योग

200- चोंच वाला पक्षी देखना- व्यवसाय में लाभ


201- अंगूठी पहनना- सुंदर स्त्री प्राप्त करना

202- आकाश में उडऩा- लंबी यात्रा करना

203- आकाश से गिरना- संकट में फंसना

204- आम खाना- धन प्राप्त होना

205- अनार का रस पीना- प्रचुर धन प्राप्त होना

206- ऊँट को देखना- धन लाभ

207- ऊँट की सवारी- रोगग्रस्त होना

208- सूर्य देखना- खास व्यक्ति से मुलाकात

209- आकाश में बादल देखना- जल्दी तरक्की होना

210- घोड़े पर चढऩा- व्यापार में उन्नति होना


211- घोड़े से गिरना- व्यापार में हानि होना

212- आंधी-तूफान देखना- यात्रा में कष्ट होना

213- दर्पण में चेहरा देखना- किसी स्त्री से प्रेम बढऩा

214- ऊँचाई से गिरना- परेशानी आना

215- बगीचा देखना- खुश होना

216- बारिश होते देखना- घर में अनाज की कमी

217- सिर के कटे बाल देखना- कर्ज से छुटकारा

218- बर्फ देखना- मौसमी बीमारी होना

219- बांसुरी बजाना- परेशान होना

220- स्वयं को बीमार देखना- जीवन में कष्ट


221- बाल बिखरे हुए देखना- धन की हानि

222- सुअर देखना- शत्रुता और स्वास्थ्य संबंधी समस्या

223- बिस्तर देखना- धनलाभ और दीर्घायु होना

224- बुलबुल देखना- विद्वान व्यक्ति से मुलाकात

225- भैंस देखना- किसी मुसीबत में फंसना

226- बादाम खाना- धन की प्राप्ति

227- अंडे खाना- पुत्र प्राप्ति

228- स्वयं के सफेद बाल देखना- आयु बढ़ेगी

229- बिच्छू देखना- प्रतिष्ठा प्राप्त होगी

230- पहाड़ पर चढऩा- उन्नति मिलेगी


231- फूल देखना- प्रेमी से मिलन

232- शरीर पर गंदगी लगाना- धन प्राप्ति के योग

233- पिंजरा देखना- कैद होने के योग

234- पुल पर चलना- समाज हित में कार्य करना

235- प्यास लगना- लोभ बढऩा

236- पान खाना- सुंदर स्त्री की प्राप्ति

237- पानी में डूबना- अच्छा कार्य करना

238- तलवार देखना- शत्रु पर विजय

239- हरी सब्जी देखना- प्रसन्न होना

240- तेल पीना- किसी भयंकर रोग की आशंका


241- तिल खाना- दोष लगना

242- तोप देखना- शत्रु नष्ट होना

243- तीर चलाना- इच्छा पूर्ण होना

244- तीतर देखना- सम्मान में वृद्धि

245- स्वयं को हंसते हुए देखना- किसी से विवाद होना

246- स्वयं को रोते हुए देखना- प्रसन्नता प्राप्त होना

247- तरबूज खाते हुए देखना- किसी से दुश्मनी होगी

248- तालाब में नहाना- शत्रु से हानि

249- जहाज देखना- दूर की यात्रा होगी

250- झंडा देखना- धर्म में आस्था बढ़ेगी

251- धनवान व्यक्ति देखना- धन प्राप्ति के योग


बुधवार, 22 अक्टूबर 2025

किस महीने में क्या खाए और क्या नहीं खाए

 *आयुर्वेद के अनुसार किस महीने में क्या खाए और क्या नहीं खाए जिससे रहे निरोगी काया*


मौसम के अनुकूल अगर आप भोजन करते है। या फिर खाना-पीना खाते है तो अक्सर आप बड़े-बुजुर्गों के मुख ये शब्द जरूर सुने होंगे। चौते गुड़, वैशाखे तेल, जेठ के पंथ, अषाढ़े बेल। सावन साग, भादो मही, कुवांर करेला, कार्तिक दही। अगहन जीरा, पूसै धना, माघै मिश्री, फाल्गुन चना। जो कोई इतने परिहरै, ता घर बैद पैर नहिं धरै। अर्थात इस दोहा के माध्यम से बताया गया है कि जो आदमी इन चीजों पर अमल करेगा यानी कि नहीं खाएगा। वह इंसान कभी बीमार नहीं होगा। चिकित्सक-वैद्य के पास नहीं जाना पड़ेगा।


हिन्दू धर्मशास्त्र के जानकार आज भी कहते है कि आयुर्वेद में भोजन के संबंध में बहुत कुछ लिखा है। जैसे किस सप्ताह में क्या खाना है क्या नहीं। किस तिथि को क्या खाना चाहिए अथवा क्या नहीं। किस महीने में क्या भोजन सही है और क्या नहीं। दरअसल, इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी है। प्रत्येक सप्ताह, तिथि या महीने में मौसम में बदलाव होता है। इस बदलाव को समझकर ही खाना जरूरी है।


*किस माह में क्या खाएं?*

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जिस तरह पूर्वजों को बताया गया है कि चैत चना, बैसाखे बेल, जैठे शयन, आषाढ़े खेल, सावन हर्रे, भादो तिल। कुवार मास गुड़ सेवै नित, कार्तिक मूल, अगहन तेल, पूस करे दूध से मेल। माघ मास घी-खिचड़ी खाय, फागुन उठ नित प्रात नहाय। इस तरह खानें के नियम बताए गए है।


हिन्दू माह बताते हैं मौसम में बदलाव

उल्लेखनीय है कि हिन्दू माह ही मौसम के बदलाव को प्रदर्शित करते हैं अंग्रेजी माह नहीं। अक्सर हम आप जब रात में दही की डिमांड घर में करते है तो माताएं देने से मना कर देती है। न मानने पर डांट का भी सामना करना पड़ता है। इसीलिए रात को दही नहीं खाना चाहिए। वहीं देखते है अज्ञान आदमी भी दूध के साथ नमक नहीं खाता है। क्योंकि उसको भी मालुम है कि दूध के साथ नमक नहीं शक्कर मिलाकर खाना चाहिए।


*ऐसे समझे किस माह में क्या न खाएं?*


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- *चैत्र माह: चैत्र माह में गुड़ खाना मना है। चना खा सकते हैं।*


- *वैशाख: तेल व तली-भुनी चीजों से परहेज करना चाहिए। बेल खा सकते हैं।*


- *ज्येष्ठ: इस माह भी बेल खाना मना है। इन महीनों में गर्मीं का प्रकोप रहता है अत: ज्यादा घूमना-फिरना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। अधिक से अधिक शयन करना चाहिए।*


*आषाढ़: आषाढ़ में पका बेल न खाना मना है। इस माह में हरी सब्जियों के सेवन से भी बचें। लेकिन इस माह में खूब खेल खेलना चाहिए। कसरत करना चाहिए।*


- *श्रावण: सावन माह में साग खाना मना है। साग अर्थात हरी पत्तेदार सब्जियां और दूध व दूध से बनी चीजों को भी खाने से मना किया गया है। इस माह में हर्रे खाना चाहिए जिसे हरिद्रा या हरडा कहते हैं।*


- *भाद्रपद: भादो माह में दही खाना मना है। इन दो महीनों में छाछ, दही और इससे बनी चीजें नहीं खाना चाहिए। भादो में तिल का उपयोग करना चाहिए।*


- *आश्विन: क्वार माह में करेला खाना मना है। इस माह में नित्य गुड़ खाना चाहिए।*


- *कार्तिक: कार्तिक माह में बैंगन, दही और जीरा बिल्कुल भी नहीं खाना मना है। इस माह में मूली खाना चाहिए।*


- *मार्गशीर्ष: अगहन में भोजन में जीरे का उपयोग नहीं करना चाहिए। तेल का उपयोग कर सकते हैं।*


- *पौष: पूस मास में दूध पी सकते हैं लेकिन धनिया नहीं खाना चाहिए क्योंकि धनिए की प्रवृति ठंडी मानी गई है और सामान्यत: इस मौसम में बहुत ठंड होती है। इस मौसम में दूध पीना चाहिए।*


- माघ: माघ माह में मूली और धनिया खाना मना है। मिश्री नहीं खाना चाहिए। इस माह में घी-खिचड़ी खाना चाहिए।*


- *फाल्गुन: फागुन माह में सुबह जल्दी उठना चाहिए। इस माह में में चना खाना मना।*

सोमवार, 6 अक्टूबर 2025

🌕 शरद पूर्णिमा 2025: धन, सुख और सौभाग्य के लिए प्रभावी उपाय व टोटके

🌕 शरद पूर्णिमा 2025: धन, सुख और सौभाग्य के लिए प्रभावी उपाय व टोटके
शरद पूर्णिमा हिन्दू पंचांग की अत्यंत शुभ रात मानी जाती है। इस दिन चंद्रमा पूर्ण तेजस के साथ आकाश में उदित होता है और उसकी चाँदनी में दिव्यता का अद्भुत संगम होता है। शास्त्रों के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात माता लक्ष्मी की रात्रि मानी जाती है और इस दिन किए गए उपाय शीघ्र फलदायी होते हैं।
यह दिन धन प्राप्ति, स्वास्थ्य और मानसिक शांति के लिए सर्वोत्तम माना गया है।
🌼 शरद पूर्णिमा के प्रभावी उपाय और टोटके
1. लक्ष्मी पूजन और पीपल वृक्ष की आराधना
सुबह-सुबह स्नान करके पीपल के पेड़ के नीचे माता लक्ष्मी का पूजन करें और उन्हें घर में निवास के लिए आमंत्रित करें। इससे लक्ष्मी कृपा घर में बनी रहती है।
2. भगवान विष्णु और महालक्ष्मी की पूजा
रात में भगवान विष्णु के साथ महालक्ष्मी की पूजा करें। यदि ब्राह्मण के माध्यम से पूजा कराई जाए तो इसका प्रभाव अधिक होता है।
3. चंद्रमा को दूध-चावल से अर्घ्य दें
चंद्र उदय के बाद कच्चे दूध, चावल और चीनी के मिश्रण से चंद्रमा को अर्घ्य दें। मंत्र जप करें – “ओम स्त्रां स्त्रीं स्त्रों सः चंद्रमसे नमः।” यह उपाय धन संबंधी बाधाओं को दूर करता है।
4. साबूदाने की खीर का भोग
माँ लक्ष्मी को साबूदाने की खीर में मिश्री डालकर भोग लगाएं और प्रसाद रूप में बांटें। यह उपाय धन आगमन के मार्ग खोलता है।
5. कौड़ियों का उपाय
11 कौड़ियों पर हल्दी से तिलक करें और उन्हें लाल कपड़े में बांधकर तिजोरी में रखें। हर पूर्णिमा पर इन कौड़ियों को दुबारा पूजें। इससे घर में धन वृद्धि होती है।
6. हनुमान मंदिर में दीपदान
चमेली तेल का दीपक जलाकर हनुमान चालीसा का पाठ करें। यह मनोबल बढ़ाता है और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करता है।
7. दांपत्य जीवन में सौहार्द के नियम
पूर्णिमा और अमावस्या के दिन शारीरिक संबंध बनाने से बचें। यह वैवाहिक सुख को स्थायी बनाता है।
8. चंद्र दर्शन और त्राटक विधि
चंद्रमा को लगातार 15 मिनट देखने से आंखों की ज्योति बढ़ती है और एकाग्रता प्राप्त होती है।
9. आम पत्तों का तोरण
घर के मुख्य दरवाजे पर आम के पत्तों से तोरण बांधने से शुभ ऊर्जा आती है।
10. खीर दान से मानसिक शांति
पूर्णिमा के दिन स्वयं के हाथों से बनी खीर गरीबों को खिलाएं, इससे मानसिक तनाव कम होता है।
11. शिवलिंग अभिषेक
शहद, दूध, बेलपत्र और चंदन से शिवलिंग का अभिषेक करें। यह परिवार से कलह और दरिद्रता को दूर करता है।
12. सात्विक आहार और संयम
इस दिन जुआ, शराब या क्रोध से परहेज करें। बुजुर्गों और महिलाओं से मधुर व्यवहार रखें।
13. गर्भवती महिलाओं के लिए लाभदायक चाँदनी
पूर्णिमा की चाँदनी गर्भ पुष्ट करती है। गर्भवती महिला कुछ समय के लिए चाँदनी में अवश्य बैठें।
14. घर के दरवाजे पर शुभ चिन्ह बनाएं
हल्दी के जल से “ॐ” और “स्वस्तिक” प्रतीक बनाना शुभता का प्रतीक है।
15. शिवलिंग के पास दीपक जलाना
रात में मंदिर में दीपक जलाएं और “ॐ रुद्राय नमः” मंत्र का जप करें। इससे दुःख और बाधाएँ दूर होती हैं।

गुरुवार, 18 सितंबर 2025

यज्ञादि में त्याज्य पदार्थ

 🔥 यज्ञादि में त्याज्य पदार्थ 🔥


यज्ञ कर्म में भावदुष्ट  - क्रियादुष्ट  - कालदुष्ट  - संसर्गदुष्ट  तथा जातिदुष्ट -- इन पदार्थों का त्याग करना चाहिए ।


१-- भावदुष्ट :--

       " रूपतो गन्धतो वापि यच्चाभक्ष्यैः समं भवेत् ।

         भावदुष्टं   च    तत्प्रोक्तं    मुनिभिर्धर्मपारगैः ।। "

जो पदार्थ रूप से अथवा गंध से भी अभक्ष्य पदार्थों के सदृश हो - उसे धर्म के पारङ्गत मुनियों ने " भावदुष्ट " कहा है ।


२-- क्रियादुष्ट :--

        " आरनालं  च   मद्यं  च   करनिर्मथितं  दधि ।

           हस्तदत्तं  च  लवणं   क्षीरं  घृतपयांसि  च ।।

           हस्तेनोद्धृत्य तोयं च  पीतं वक्त्रेण वैकदा । 

           शब्देन पीतं भुक्तं च गव्यं ताम्रेण संयुक्तम् ।।

           क्षीरं च  लवणोन्मिश्रं  क्रियादुष्टमिहोच्यते ।। "

आरनल ( काञ्जिक ) - मद्य - हाथ से मथा हुआ दही - हाथ से हाथ में दिया गया नमक - दूध - घी और जल - हाथ से उठाकर  मुहँ से एक बार पिया गया जल - बोलते हुए पीया और खाया गया - ताँबे के पात्र से संयुक्त गोदुग्ध तथा नमक मिला हुआ दूध  -- ये सब " क्रियादुष्ट " कहे जाते हैं ।


३-- कालदुष्ट :--

           " एकादश्यां तु  यच्चान्नं यच्चान्नं राहुदर्शने ।

             सूतके मृतके चान्नं शुष्कं  पर्युषितं तथा ।।

             अनिर्दशाहगोक्षीरं षष्ठ्यां तैलं तथापि च ।

             नदीष्वसमुद्रगासु   सिहंकर्कटयोर्जलम् ।।

             निःशेषजलवाप्यादौ यत्प्रविष्टं नवोदकम् ।

             नातीतपञ्चरात्रं   तत्कालदुष्टमिहोच्यते ।। "

एकादशी के दिन अन्न  ( भात - रोटी - पुडी आदि ) - ग्रहण के समय अन्न - जननाशौच तथा मरणाशौच में अन्न - सूखा अन्न - बासी अन्न - नई ब्यायी गौ का दश दिन बीतने के पहले का दूध - षष्ठी तिथि में तेल - श्रावण और भाद्रपद महीनों में उन नदियों का जल जो समुद्रगामिनी नहीं हैं - निःशेष जल वाली ( सूखी ) बावड़ी आदि में प्रविष्ट नूतन जल जब तक पांच रातें न बीतें  - तब तक वे सब " कालदुष्ट " कहे जाते हैं ।


४-- संसर्गदुष्ट :--

         " शैवापाषण्डपतितैर्विकर्मस्थैर्निरीश्वरैः ।

           अवैष्णवबैर्द्विजैः     शूद्रेर्हरिवासरभोक्तृभिः ।

           श्व - काकसूकरोष्ट्रद्यैरूदक्यासूतिकादिभिः।।

           पुंश्चलीभिश्च      नारीभिर्वृषलीपतिभिस्तथा ।

           दृष्टं   स्पृष्टं   च   दत्तं  च   भुक्तशेषं  तथैव  ।।

           अभक्ष्याणां   च   संयुक्तं   संसर्गदुष्टमुच्यते ।। "

शैवों ( कापिलाकादि ) - पाखण्डियों ( वेदविरूद्ध आचरण करने वाले ) - पतित ( स्वधर्मभ्रष्ट ) पुरूषों - कर्मभ्रष्ट ( विकर्मस्थ  ) - नास्तिक  - अवैष्णव द्विजों - शूद्रों और एकादशी के दिन अन्नभोजी पुरूषों से - कुत्ते  - कौए - सुअर - ऊँट आदि से तथा रजस्वला - सूतिका - व्याभिचारी स्त्री और पुरुष के द्वारा देखा गया - छुआ गया - दिया गया तथा उन के भोजन से बचा हुआ एवं अभक्ष्य ( प्याज - लहसुन ) आदि से संयुक्त अन्न " संसर्गदुष्ट " कहलाता है ।


५-- जातिदुष्ट :--

          " बिम्बं शिग्रुं च कालिङ्गं तिलपिष्टं च  मूलकम् ।

            कोशातकीमलाबुं   च  तथा  कट्फलमेव च ।।

            वालिका    नारिकेलादि   जातिदुष्टमिहोच्यते ।

            एवं सर्वाण्यभक्ष्याणि तत्सङ्गान्यपि सन्त्यजेत्।। "

बिम्बफल ( कुन्दरू ) - शिग्रु ( सहिजन) - कालिङ्ग ( सफेद पेठा - कुम्हडा ) - तिलपिष्ट ( तिल की खली ) - शलगम - तोरई  - तुम्बा  - कायफल  - वालिका  - नारिका ( निलिका  ) इत्यादि " जातिदुष्ट " कहे गए हैं ।

                 इस प्रकार के सब अभक्ष्यों का एवं उनसे संसृष्ट वस्तुओं का भी यज्ञादि में त्याग करना चाहिए ।


                   🚩 हर हर महादेव 🚩।।वशिष्ठ।।

शुक्रवार, 22 अगस्त 2025

घर के प्रेत या पितर रुष्ट होने के लक्षण और उपाय

 घर के प्रेत या पितर रुष्ट होने के लक्षण और उपाय

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बहुत जिज्ञासा होती है आखिर ये पितृदोष है क्या? पितृ -दोष शांति के सरल उपाय पितृ या पितृ गण कौन हैं ?आपकी जिज्ञासा को शांत करती विस्तृत प्रस्तुति।


पितृ गण हमारे पूर्वज हैं जिनका ऋण हमारे ऊपर है ,क्योंकि उन्होंने कोई ना कोई उपकार हमारे जीवन के लिए किया है मनुष्य लोक से ऊपर पितृ लोक है,पितृ लोक के ऊपर सूर्य लोक है एवं इस से भी ऊपर स्वर्ग लोक है।


 आत्मा जब अपने शरीर को त्याग कर सबसे पहले ऊपर उठती है तो वह पितृ लोक में जाती है ,वहाँ हमारे पूर्वज मिलते हैं अगर उस आत्मा के अच्छे पुण्य हैं तो ये हमारे पूर्वज भी उसको प्रणाम कर अपने को धन्य मानते हैं की इस अमुक आत्मा ने हमारे कुल में जन्म लेकर हमें धन्य किया इसके आगे आत्मा अपने पुण्य के आधार पर सूर्य लोक की तरफ बढती है।


वहाँ से आगे ,यदि और अधिक पुण्य हैं, तो आत्मा सूर्य लोक को भेज कर स्वर्ग लोक की तरफ चली जाती है,लेकिन करोड़ों में एक आध आत्मा ही ऐसी होती है ,जो परमात्मा में समाहित होती है  जिसे दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता  मनुष्य लोक एवं पितृ लोक में बहुत सारी आत्माएं पुनः अपनी इच्छा वश ,मोह वश अपने कुल में जन्म लेती हैं।


पितृ दोष क्या होता है?

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 हमारे ये ही पूर्वज सूक्ष्म व्यापक शरीर से अपने परिवार को जब देखते हैं ,और महसूस करते हैं कि हमारे परिवार के लोग ना तो हमारे प्रति श्रद्धा रखते हैं और न ही इन्हें कोई प्यार या स्नेह है और ना ही किसी भी अवसर पर ये हमको याद करते हैं,ना ही अपने ऋण चुकाने का प्रयास ही करते हैं तो ये आत्माएं दुखी होकर अपने वंशजों को श्राप दे देती हैं,जिसे "पितृ- दोष" कहा जाता है।


पितृ दोष एक अदृश्य बाधा है .ये बाधा पितरों द्वारा रुष्ट होने के कारण होती है पितरों के रुष्ट होने के बहुत से कारण हो सकते हैं ,आपके आचरण से,किसी परिजन द्वारा की गयी गलती से ,श्राद्ध आदि कर्म ना करने से ,अंत्येष्टि कर्म आदि में हुई किसी त्रुटि के कारण भी हो सकता है।


इसके अलावा मानसिक अवसाद,व्यापार में नुक्सान ,परिश्रम के अनुसार फल न मिलना , विवाह या वैवाहिक जीवन में समस्याएं,कैरिअर में समस्याएं या संक्षिप्त में कहें तो जीवन के हर क्षेत्र में व्यक्ति और उसके परिवार को बाधाओं का सामना करना पड़ता है पितृ दोष होने पर अनुकूल ग्रहों की स्थिति ,गोचर ,दशाएं होने पर भी शुभ फल नहीं मिल पाते,कितना भी पूजा पाठ ,देवी ,देवताओं की अर्चना की जाए ,उसका शुभ फल नहीं मिल पाता।


पितृ दोष दो प्रकार से प्रभावित करता है


1.अधोगति वाले पितरों के कारण

2.उर्ध्वगति वाले पितरों के कारण


अधोगति वाले पितरों के दोषों का मुख्य कारण परिजनों द्वारा किया गया गलत आचरण,की अतृप्त इच्छाएं ,जायदाद के प्रति मोह और उसका गलत लोगों द्वारा उपभोग होने पर,विवाहादिमें परिजनों द्वारा गलत निर्णय .परिवार के किसी प्रियजन को अकारण कष्ट देने पर पितर क्रुद्ध हो जाते हैं ,परिवार जनों को श्राप दे देते हैं और अपनी शक्ति से नकारात्मक फल प्रदान करते हैं।


उर्ध्व गति वाले पितर सामान्यतः पितृदोष उत्पन्न नहीं करते ,परन्तु उनका किसी भी रूप में अपमान होने पर अथवा परिवार के पारंपरिक रीति-रिवाजों का निर्वहन नहीं करने पर वह पितृदोष उत्पन्न करते हैं।


इनके द्वारा उत्पन्न पितृदोष से व्यक्ति की भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति बिलकुल बाधित हो जाती है ,फिर चाहे कितने भी प्रयास क्यों ना किये जाएँ ,कितने भी पूजा पाठ क्यों ना किये जाएँ,उनका कोई भी कार्य ये पितृदोष सफल नहीं होने देता। पितृ दोष निवारण के लिए सबसे पहले ये जानना ज़रूरी होता है कि किस गृह के कारण और किस प्रकार का पितृ दोष उत्पन्न हो रहा है ?


जन्म पत्रिका और पितृ दोष जन्म पत्रिका में लग्न ,पंचम ,अष्टम और द्वादश भाव से पितृदोष का विचार किया जाता है। पितृ दोष में ग्रहों में मुख्य रूप से सूर्य, चन्द्रमा, गुरु, शनि और राहू -केतु की स्थितियों से पितृ दोष का विचार किया जाता है।


इनमें से भी गुरु ,शनि और राहु की भूमिका प्रत्येक पितृ दोष में महत्वपूर्ण होती है इनमें सूर्य से पिता या पितामह , चन्द्रमा से माता या मातामह ,मंगल से भ्राता या भगिनी और शुक्र से पत्नी का विचार किया जाता है।


अधिकाँश लोगों की जन्म पत्रिका में मुख्य रूप से क्योंकि गुरु ,शनि और राहु से पीड़ित होने पर ही पितृ दोष उत्पन्न होता है ,इसलिए विभिन्न उपायों को करने के साथ साथ व्यक्ति यदि पंचमुखी ,सातमुखी और आठ मुखी रुद्राक्ष भी धारण कर ले , तो पितृ दोष का निवारण शीघ्र हो जाता है।


पितृ दोष निवारण के लिए इन रुद्राक्षों को धारण करने के अतिरिक्त इन ग्रहों के अन्य उपाय जैसे मंत्र जप और स्तोत्रों का पाठ करना भी श्रेष्ठ होता है।


विभिन्न ऋण और पितृ दोष

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हमारे ऊपर मुख्य रूप से 5 ऋण होते हैं जिनका कर्म न करने(ऋण न चुकाने पर ) हमें निश्चित रूप से श्राप मिलता है ,ये ऋण हैं : मातृ ऋण ,पितृ ऋण ,मनुष्य ऋण ,देव ऋण और ऋषि ऋण।


मातृ ऋण👉  माता एवं माता पक्ष के सभी लोग जिनमेंमा,मामी ,नाना ,नानी ,मौसा ,मौसी और इनके तीन पीढ़ी के पूर्वज होते हैं ,क्योंकि माँ का स्थान परमात्मा से भी ऊंचा माना गया है अतः यदि माता के प्रति कोई गलत शब्द बोलता है ,अथवा माता के पक्ष को कोई कष्ट देता रहता है,तो इसके फलस्वरूप उसको नाना प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते हैं। इतना ही नहीं ,इसके बाद भी कलह और कष्टों का दौर भी परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी चलता ही रहता है।


पितृ ऋण👉  पिता पक्ष के लोगों जैसे बाबा ,ताऊ ,चाचा, दादा-दादी और इसके पूर्व की तीन पीढ़ी का श्राप हमारे जीवन को प्रभावित करता है पिता हमें आकाश की तरह छत्रछाया देता है,हमारा जिंदगी भर पालन -पोषण करता है ,और अंतिम समय तक हमारे सारे दुखों को खुद झेलता रहता है।


पर आज के के इस भौतिक युग में पिता का सम्मान क्या नयी पीढ़ी कर रही है ?पितृ -भक्ति करना मनुष्य का धर्म है ,इस धर्म का पालन न करने पर उनका श्राप नयी पीढ़ी को झेलना ही पड़ता है ,इसमें घर में आर्थिक अभाव,दरिद्रता ,संतानहीनता ,संतान को विभिन्न प्रकार के कष्ट आना या संतान अपंग रह जाने से जीवन भर कष्ट की प्राप्ति आदि।


देव ऋण👉 माता-पिता प्रथम देवता हैं,जिसके कारण भगवान गणेश महान बने |इसके बाद हमारे इष्ट भगवान शंकर जी ,दुर्गा माँ ,भगवान विष्णु आदि आते हैं ,जिनको हमारा कुल मानता आ रहा है ,हमारे पूर्वज भी भी अपने अपने कुल देवताओं को मानते थे , लेकिन नयी पीढ़ी ने बिलकुल छोड़ दिया है इसी कारण भगवान /कुलदेवी /कुलदेवता उन्हें नाना प्रकार के कष्ट /श्राप देकर उन्हें अपनी उपस्थिति का आभास कराते हैं।


ऋषि ऋण👉 जिस ऋषि के गोत्र में पैदा हुए ,वंश वृद्धि की ,उन ऋषियों का नाम अपने नाम के साथ जोड़ने में नयी पीढ़ी कतराती है ,उनके ऋषि तर्पण आदि नहीं करती है  इस कारण उनके घरों में कोई मांगलिक कार्य नहीं होते हैं,इसलिए उनका श्राप पीडी दर पीढ़ी प्राप्त होता रहता है।


मनुष्य ऋण👉  माता -पिता के अतिरिक्त जिन अन्य मनुष्यों ने हमें प्यार दिया ,दुलार दिया ,हमारा ख्याल रखा ,समय समय पर मदद की गाय आदि पशुओं का दूध पिया जिन अनेक मनुष्यों ,पशुओं ,पक्षियों ने हमारी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मदद की ,उनका ऋण भी हमारे ऊपर हो गया।


लेकिन लोग आजकल गरीब ,बेबस ,लाचार लोगों की धन संपत्ति हरण करके अपने को ज्यादा गौरवान्वित महसूस करते हैं। इसी कारण देखने में आया है कि ऐसे लोगों का पूरा परिवार जीवन भर नहीं बस पाता है,वंश हीनता ,संतानों का गलत संगति में पड़ जाना,परिवार के सदस्यों का आपस में सामंजस्य न बन पाना ,परिवार कि सदस्यों का किसी असाध्य रोग से ग्रस्त रहना इत्यादि दोष उस परिवार में उत्पन्न हो जाते हैं।


ऐसे परिवार को पितृ दोष युक्त या शापित परिवार कहा जाता है रामायण में श्रवण कुमार के माता -पिता के श्राप के कारण दशरथ के परिवार को हमेशा कष्ट झेलना पड़ा,ये जग -ज़ाहिर है इसलिए परिवार कि सर्वोन्नती के पितृ दोषों का निवारण करना बहुत आवश्यक है।


पितृों के रूष्‍ट होने के लक्षण

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पितरों के रुष्ट होने के कुछ असामान्‍य लक्षण जो मैंने अपने निजी अनुभव के आधार एकत्रित किए है वे क्रमशः इस प्रकार हो सकते है।


खाने में से बाल निकलना

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अक्सर खाना खाते समय यदि आपके भोजन में से बाल निकलता है तो इसे नजरअंदाज न करें


बहुत बार परिवार के किसी एक ही सदस्य के साथ होता है कि उसके खाने में से बाल निकलता है, यह बाल कहां से आया इसका कुछ पता नहीं चलता। यहां तक कि वह व्यक्ति यदि रेस्टोरेंट आदि में भी जाए तो वहां पर भी उसके ही खाने में से बाल निकलता है और परिवार के लोग उसे ही दोषी मानते हुए उसका मजाक तक उडाते है।


बदबू या दुर्गंध

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कुछ लोगों की समस्या रहती है कि उनके घर से दुर्गंध आती है, यह भी नहीं पता चलता कि दुर्गंध कहां से आ रही है। कई बार इस दुर्गंध के इतने अभ्‍यस्‍त हो जाते है कि उन्हें यह दुर्गंध महसूस भी नहीं होती लेकिन बाहर के लोग उन्हें बताते हैं कि ऐसा हो रहा है अब जबकि परेशानी का स्रोत पता ना चले तो उसका इलाज कैसे संभव है


पूर्वजों का स्वप्न में बार बार आना

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मेरे एक मित्र ने बताया कि उनका अपने पिता के साथ झगड़ा हो गया है और वह झगड़ा काफी सालों तक चला पिता ने मरते समय अपने पुत्र से मिलने की इच्छा जाहिर की परंतु पुत्र मिलने नहीं आया, पिता का स्वर्गवास हो गया हुआ। कुछ समय पश्चात मेरे मित्र मेरे पास आते हैं और कहते हैं कि उन्होंने अपने पिता को बिना कपड़ों के देखा है ऐसा स्‍वप्‍न पहले भी कई बार आ चुका है।


शुभ कार्य में अड़चन

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कभी-कभी ऐसा होता है कि आप कोई त्यौहार मना रहे हैं या कोई उत्सव आपके घर पर हो रहा है ठीक उसी समय पर कुछ ना कुछ ऐसा घटित हो जाता है कि जिससे रंग में भंग डल जाता है। ऐसी घटना घटित होती है कि खुशी का माहौल बदल जाता है। मेरे कहने का तात्‍पर्य है कि शुभ अवसर पर कुछ अशुभ घटित होना पितरों की असंतुष्टि का संकेत है।


घर के किसी एक सदस्य का कुंवारा रह जाना

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बहुत बार आपने अपने आसपास या फिर रिश्‍तेदारी में देखा होगा या अनुभव किया होगा कि बहुत अच्‍छा युवक है, कहीं कोई कमी नहीं है लेकिन फिर भी शादी नहीं हो रही है। एक लंबी उम्र निकल जाने के पश्चात भी शादी नहीं हो पाना कोई अच्‍छा संकेत नहीं है। यदि घर में पहले ही किसी कुंवारे व्यक्ति की मृत्यु हो चुकी है तो उपरोक्त स्थिति बनने के आसार बढ़ जाते हैं। इस समस्‍या के कारण का भी पता नहीं चलता।


मकान या प्रॉपर्टी की खरीद-फरोख्त में दिक्कत आना

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आपने देखा होगा कि कि एक बहुत अच्छी प्रॉपर्टी, मकान, दुकान या जमीन का एक हिस्सा किन्ही कारणों से बिक नहीं पा रहा यदि कोई खरीदार मिलता भी है तो बात नहीं बनती। यदि कोई खरीदार मिल भी जाता है और सब कुछ हो जाता है तो अंतिम समय पर सौदा कैंसिल हो जाता है। इस तरह की स्थिति यदि लंबे समय से चली आ रही है तो यह मान लेना चाहिए कि इसके पीछे अवश्य ही कोई ऐसी कोई अतृप्‍त आत्‍मा है जिसका उस भूमि या जमीन के टुकड़े से कोई संबंध रहा हो।


संतान ना होना

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मेडिकल रिपोर्ट में सब कुछ सामान्य होने के बावजूद संतान सुख से वंचित है हालांकि आपके पूर्वजों का इस से संबंध होना लाजमी नहीं है परंतु ऐसा होना बहुत हद तक संभव है जो भूमि किसी निसंतान व्यक्ति से खरीदी गई हो वह भूमि अपने नए मालिक को संतानहीन बना देती है


उपरोक्त सभी प्रकार की घटनाएं या समस्याएं आप में से बहुत से लोगों ने अनुभव की होंगी इसके निवारण के लिए लोग समय और पैसा नष्ट कर देते हैं परंतु समस्या का समाधान नहीं हो पाता। क्या पता हमारे इस लेख से ऐसे ही किसी पीड़ित व्यक्ति को कुछ प्रेरणा मिले इसलिए निवारण भी स्पष्ट कर रहा हूं।


पितृ-दोष कि शांति के उपाय 

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1👉 सामान्य उपायों में षोडश पिंड दान ,सर्प पूजा ,ब्राह्मण को गौ -दान ,कन्या -दान,कुआं ,बावड़ी ,तालाब आदि बनवाना ,मंदिर प्रांगण में पीपल ,बड़(बरगद) आदि देव वृक्ष लगवाना एवं विष्णु मन्त्रों का जाप आदि करना ,प्रेत श्राप को दूर करने के लिए श्रीमद्द्भागवत का पाठ करना चाहिए।


2👉 वेदों और पुराणों में पितरों की संतुष्टि के लिए मंत्र ,स्तोत्र एवं सूक्तों का वर्णन है जिसके नित्य पठन से किसी भी प्रकार की पितृ बाधा क्यों ना हो ,शांत हो जाती है  अगर नित्य पठन संभव ना हो , तो कम से कम प्रत्येक माह की अमावस्या और आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या अर्थात पितृपक्ष में अवश्य करना चाहिए।

वैसे तो कुंडली में किस प्रकार का पितृ दोष है उस पितृ दोष के प्रकार के हिसाब से पितृदोष शांति करवाना अच्छा होता है।


3👉 भगवान भोलेनाथ की तस्वीर या प्रतिमा के समक्ष बैठ कर या घर में ही भगवान भोलेनाथ का ध्यान कर निम्न मंत्र की एक माला नित्य जाप करने से समस्त प्रकार के पितृ- दोष संकट बाधा आदि शांत होकर शुभत्व की प्राप्ति होती है |मंत्र जाप प्रातः या सायंकाल कभी भी कर सकते हैं :


मंत्र : "ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय च धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात।


4👉 अमावस्या को पितरों के निमित्त पवित्रता पूर्वक बनाया गया भोजन तथा चावल बूरा ,घी एवं एक रोटी गाय को खिलाने से पितृ दोष शांत होता है।


5👉 अपने माता -पिता ,बुजुर्गों का सम्मान,सभी स्त्री कुल का आदर /सम्मान करने और उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते रहने से पितर हमेशा प्रसन्न रहते हैं।


6👉 पितृ दोष जनित संतान कष्ट को दूर करने के लिए "हरिवंश पुराण " का श्रवण करें या स्वयं नियमित रूप से पाठ करें।


7👉  प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती या सुन्दर काण्ड का पाठ करने से भी इस दोष में कमी आती है।


8👉 सूर्य पिता है अतः ताम्बे के लोटे में जल भर कर ,उसमें लाल फूल ,लाल चन्दन का चूरा ,रोली आदि डाल कर सूर्य देव को अर्घ्य देकर ११ बार "ॐ घृणि सूर्याय नमः " मंत्र का जाप करने से पितरों की प्रसन्नता एवं उनकी ऊर्ध्व गति होती है।


9👉 अमावस्या वाले दिन अवश्य अपने पूर्वजों के नाम दुग्ध ,चीनी ,सफ़ेद कपडा ,दक्षिणा आदि किसी मंदिर में अथवा किसी योग्य ब्राह्मण को दान करना चाहिए।


10👉 पितृ पक्ष में पीपल की परिक्रमा अवश्य करें अगर १०८ परिक्रमा लगाई जाएँ ,तो पितृ दोष अवश्य दूर होगा।


विशिष्ट उपाय :

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1👉 किसी मंदिर के परिसर में पीपल अथवा बड़ का वृक्ष लगाएं और रोज़ उसमें जल डालें ,उसकी देख -भाल करें ,जैसे-जैसे वृक्ष फलता -फूलता जाएगा,पितृ -दोष दूर होता जाएगा,क्योकि इन वृक्षों पर ही सारे देवी -देवता ,इतर -योनियाँ ,पितर आदि निवास करते हैं।


2👉 यदि आपने किसी का हक छीना है,या किसी मजबूर व्यक्ति की धन संपत्ति का हरण किया है,तो उसका हक या संपत्ति उसको अवश्य लौटा दें।


3👉 पितृ दोष से पीड़ित व्यक्ति को किसी भी एक अमावस्या से लेकर दूसरी अमावस्या तक अर्थात एक माह तक किसी पीपल के वृक्ष के नीचे सूर्योदय काल में एक शुद्ध घी का दीपक लगाना चाहिए,ये क्रम टूटना नहीं चाहिए।


एक माह बीतने पर जो अमावस्या आये उस दिन एक प्रयोग और करें 

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इसके लिए किसी देसी गाय या दूध देने वाली गाय का थोडा सा गौ -मूत्र प्राप्त करें उसे थोड़े  जल में मिलाकर इस जल को पीपल वृक्ष की जड़ों में डाल दें इसके बाद पीपल वृक्ष के नीचे ५ अगरबत्ती ,एक नारियल और शुद्ध घी का दीपक लगाकर अपने पूर्वजों से श्रद्धा पूर्वक अपने कल्याण की कामना करें,और घर आकर उसी दिन दोपहर में कुछ गरीबों को भोजन करा दें ऐसा करने पर पितृ दोष शांत हो जायेगा।


4👉 घर में कुआं हो या पीने का पानी रखने की जगह हो ,उस जगह की शुद्धता का विशेष ध्यान रखें,क्योंके ये पितृ स्थान माना जाता है  इसके अलावा पशुओं के लिए पीने का पानी भरवाने तथा प्याऊ लगवाने अथवा आवारा कुत्तों को जलेबी खिलाने से भी पितृ दोष शांत होता है।


5 👉  अगर पितृ दोष के कारण अत्यधिक परेशानी हो,संतान हानि हो या संतान को कष्ट हो तो किसी शुभ समय अपने पितरों को प्रणाम कर उनसे प्रण होने की प्रार्थना करें और अपने द्वारा जाने-अनजाने में किये गए अपराध / उपेक्षा के लिए क्षमा याचना करें ,फिर घर अथवा शिवालय में पितृ गायत्री मंत्र का सवा लाख विधि से जाप कराएं जाप के उपरांत दशांश हवन के बाद संकल्प ले की इसका पूर्ण फल पितरों को प्राप्त हो ऐसा करने से पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं ,क्योंके उनकी मुक्ति का मार्ग आपने प्रशस्त किया होता है।


6👉 पितृ दोष की शांति हेतु ये उपाय बहुत ही अनुभूत और अचूक फल देने वाला देखा गया है,वोह ये कि- किसी गरीब की कन्या के विवाह में गुप्त रूप से अथवा प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक सहयोग करना |(लेकिन ये सहयोग पूरे दिल से होना चाहिए ,केवल दिखावे या अपनी बढ़ाई कराने के लिए नहीं )|इस से पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं ,क्योंकि इसके परिणाम स्वरुप मिलने वाले पुण्य फल से पितरों को बल और तेज़ मिलता है ,जिस से वह ऊर्ध्व लोकों की ओरगति करते हुए पुण्य लोकों को प्राप्त होते हैं.|


7👉 अगर किसी विशेष कामना को लेकर किसी परिजन की आत्मा पितृ दोष उत्पन्न करती है तो तो ऐसी स्थिति में मोह को त्याग कर उसकी सदगति के लिए "गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र " का पाठ करना चाहिए।


8👉 पितृ दोष दूर करने का अत्यंत सरल उपाय : इसके लिए सम्बंधित व्यक्ति को अपने घर के वायव्य कोण (N -W )में नित्य सरसों का तेल में बराबर मात्रा में अगर का तेल मिलाकर दीपक पूरे पितृ पक्ष में नित्य लगाना चाहिए+दिया पीतल का हो तो ज्यादा अच्छा है ,दीपक कम से कम 10 मिनट नित्य जलना आवश्यक है।


इन उपायों के अतिरिक्त वर्ष की प्रत्येक अमावस्या को दोपहर के समय गूगल की धूनी पूरे घर में सब जगह घुमाएं ,शाम को आंध्र होने के बाद पितरों के निमित्त शुद्ध भोजन बनाकर एक दोने में साड़ी सामग्री रख कर किसी बबूल के वृक्ष अथवा पीपल या बड़ किजद में रख कर आ जाएँ,पीछे मुड़कर न देखें। नित्य प्रति घर में देसी कपूर जाया करें। ये कुछ ऐसे उपाय हैं,जो सरल भी हैं और प्रभावी भी,और हर कोई सरलता से इन्हें कर पितृ दोषों से मुक्ति पा सकता है। लेकिन किसी भी प्रयोग की सफलता आपकी पितरों के प्रति श्रद्धा के ऊपर निर्भर करती है।


पितृदोष निवारण के लिए करें विशेष उपाय (नारायणबलि-नागबलि)

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अक्सर हम देखते हैं कि कई लोगों के जीवन में परेशानियां समाप्त होने का नाम ही नहीं लेती। वे चाहे जितना भी समय और धन खर्च कर लें लेकिन काम सफल नहीं होता। ऐसे लोगों की कुंडली में निश्चित रूप से पितृदोष होता है।


यह दोषी पीढ़ी दर पीढ़ी कष्ट पहुंचाता रहता है, जब तक कि इसका विधि-विधानपूर्वक निवारण न किया जाए। आने वाली पीढ़ीयों को भी कष्ट देता है। इस दोष के निवारण के लिए कुछ विशेष दिन और समय तय हैं जिनमें इसका पूर्ण निवारण होता है। श्राद्ध पक्ष यही अवसर है जब पितृदोष से मुक्ति पाई जा सकती है। इस दोष के निवारण के लिए शास्त्रों में नारायणबलि का विधान बताया गया है। इसी तरह नागबलि भी होती है।


क्या है नारायणबलि और नागबलि

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नारायणबलि और नागबलि दोनों विधि मनुष्य की अपूर्ण इच्छाओं और अपूर्ण कामनाओं की पूर्ति के लिए की जाती है। इसलिए दोनों को काम्य कहा जाता है। नारायणबलि और नागबलि दो अलग-अलग विधियां हैं। नारायणबलि का मुख्य उद्देश्य पितृदोष निवारण करना है और नागबलि का उद्देश्य सर्प या नाग की हत्या के दोष का निवारण करना है। इनमें से कोई भी एक विधि करने से उद्देश्य पूरा नहीं होता इसलिए दोनों को एक साथ ही संपन्न करना पड़ता है।


इन कारणों से की जाती है नारायणबलि पूजा

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जिस परिवार के किसी सदस्य या पूर्वज का ठीक प्रकार से अंतिम संस्कार, पिंडदान और तर्पण नहीं हुआ हो उनकी आगामी पीढि़यों में पितृदोष उत्पन्न होता है। ऐसे व्यक्तियों का संपूर्ण जीवन कष्टमय रहता है, जब तक कि पितरों के निमित्त नारायणबलि विधान न किया जाए।प्रेतयोनी से होने वाली पीड़ा दूर करने के लिए नारायणबलि की जाती है।परिवार के किसी सदस्य की आकस्मिक मृत्यु हुई हो। आत्महत्या, पानी में डूबने से, आग में जलने से, दुर्घटना में मृत्यु होने से ऐसा दोष उत्पन्न होता है।


क्यों की जाती है यह पूजा...?

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शास्त्रों में पितृदोष निवारण के लिए नारायणबलि-नागबलि कर्म करने का विधान है। यह कर्म किस प्रकार और कौन कर सकता है इसकी पूर्ण जानकारी होना भी जरूरी है। यह कर्म प्रत्येक वह व्यक्ति कर सकता है जो अपने पितरों का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहता है। जिन जातकों के माता-पिता जीवित हैं वे भी यह विधान कर सकते हैं।संतान प्राप्ति, वंश वृद्धि, कर्ज मुक्ति, कार्यों में आ रही बाधाओं के निवारण के लिए यह कर्म पत्नी सहित करना चाहिए। यदि पत्नी जीवित न हो तो कुल के उद्धार के लिए पत्नी के बिना भी यह कर्म किया जा सकता है।यदि पत्नी गर्भवती हो तो गर्भ धारण से पांचवें महीने तक यह कर्म किया जा सकता है। घर में कोई भी मांगलिक कार्य हो तो ये कर्म एक साल तक नहीं किए जा सकते हैं। माता-पिता की मृत्यु होने पर भी एक साल तक यह कर्म करना निषिद्ध माना गया है।


कब नहीं की जा सकती है नारायणबलि-नागबलि

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नारायणबलि गुरु, शुक्र के अस्त होने पर नहीं किए जाने चाहिए। लेकिन प्रमुख ग्रंथ निर्णण सिंधु के मतानुसार इस कर्म के लिए केवल नक्षत्रों के गुण व दोष देखना ही उचित है। नारायणबलि कर्म के लिए धनिष्ठा पंचक और त्रिपाद नक्षत्र को निषिद्ध माना गया है।धनिष्ठा नक्षत्र के अंतिम दो चरण, शततारका, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद एवं रेवती, इन साढ़े चार नक्षत्रों को धनिष्ठा पंचक कहा जाता है। कृतिका, पुनर्वसु, विशाखा, उत्तराषाढ़ा और उत्तराभाद्रपद ये छह नक्षत्र त्रिपाद नक्षत्र माने गए हैं। इनके अलावा सभी समय यह कर्म किया जा सकता है।


पितृपक्ष सर्वाधिक श्रेष्ठ समय

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नारायणबलि- नागबलि के लिए पितृपक्ष सर्वाधिक श्रेष्ठ समय बताया गया है। इसमें किसी योग्य पुरोहित से समय निकलवाकर यह कर्म करवाना चाहिए। यह कर्म गंगा तट अथवा अन्य किसी नदी सरोवर के किनारे में भी संपन्न कराया जाता है। संपूर्ण पूजा तीन दिनों की होती है।


रविवार, 9 मार्च 2025

॥ शिखा बन्धनस्य आवश्यकता॥

 #शिखाविचार


*॥ शिखा बन्धनस्य आवश्यकता॥* 


 *स्नाने दाने जपे होमे सन्ध्यायां देवतार्चने ।* 

 *शिखाग्रन्थिं सदा कुर्यादित्येतन्मनुरब्रवीत् ॥* 

 मनुसंहिता


स्नान, दान, जप, होम और देव पूजन में सर्वदा शिखा बाँधना चाहिए ।


 *॥शिखाबन्धन - विधिः ॥*

 *शिखीवच्छिखया भाव्यं ब्रह्मावर्तनिबद्धया ।* 

 *प्रदक्षिणं द्विरावर्त्य पाशान्तः सम्प्रवेशनात् ॥* 

 *प्रथमं द्विगुणं कृत्वा ब्रह्मावर्त मितीरितम् ।* 

गायत्रीजपनं निबन्धने ॥


 कुर्याच्छिखायाश्च इति कौथुमि:


शिखा को दुगना करके प्रदक्षिण क्रम घुमाकर उसमें ब्रह्मग्रन्थि लगा दे। मयूर के शिखा के समान शिखा होनी चाहिये।

पहले दुगना किया हुआ को ब्रह्मग्रन्थि कहा गया है। गायत्री मन्त्रका जप करते हुए शिखा को बाँधना चाहिये । 


 *विप्रादिकानां खलु मुष्टिमेय-* 

 *केशाः शिखा स्यादधिका न तेन।* 

 *द्विधा त्रिधा वापि विभज्य बन्धो* 

 *ह्यल्पास्ततोऽल्पापि न लम्बितानि ॥* 


 ब्राह्मणों कि शिखा मुष्टि में आने योग्य होनी चाहिये। दुगना या तिगुना करके बाँधना चाहिये। शिखा बहुत अधिक लम्बी और छोटी भी न हो । 


 *गायत्र्या तु शिखां बद्धवा नैर्ऋत्यां ब्रह्मरन्ध्रतः ।* 

 *जूटिकाश्च ततो बद्ध्वा ततः कर्म समारभेत्॥* 

 *निबद्धशिख आसीनो द्विज आचमनं चरेत् ।* 

 *कृत्वोपवीतं सव्येंऽशे वाङ्मनःकायसंयतः ॥* मनुः


गायत्री मन्त्र द्वारा शिखा बाँधकर और ब्रह्मरन्ध्रसे नैऋत्यकोण में जटा बाँधकर शुभ कर्म प्रारम्भ करें । द्विज बैठकर शिखा बाँधकर आचमन करें। पश्चात् वाणी मन और शरीर को संयत कर अपने बायें कन्धे में यज्ञोपपवीत धारण करें। 


 *शिखाबन्धन मन्त्र(वैदिक)* 

 *मानस्तोक इति मन्त्रस्य कुत्स ऋषिः जगती छन्दः एको रुद्रो देवता शिखा बन्धने विनियोगः ।* 


मन्त्रः - *ॐ मानस्तोके तनये मान आयुषिमानो गोषु मानो अश्वेषु रीरिषः । मानोव्वीराननुद्रभामिनो बधीर्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे ॥* 


पौराणिक मन्त्रः -

 *ॐ चिद्रूपिणि महामाये दिव्य तेजः समन्विते ।* 

 *तिष्ठ देवि शिखाबन्धे तेजो वृद्धिं कुरुष्व मे ॥* 


हाथ में जल लेकर 'मानस्तोक से विनियोग' तक पढ़कर जल छोड़कर ‘ॐ मानस्तोके' इत्यादि मन्त्र अथवा 'ॐ चिद्रूपिणि' मन्त्र पढ़कर शिखा को बाँधे ।


 *॥मन्त्रं बिना शिखा बन्धने दोषः॥* 

 *अमन्त्रो दीयते ग्रन्थिर्जपो होमो वृथा भवेत्* ।

 *स्मृत्वोङ्कारञ्च गायत्रीं निबध्नीयाच्छिखां ततः ।* 

नागदेवः


प्रणव और गायत्री मन्त्र पढ़कर शिखा बाँधनी चाहिये । बिना मन्त्र पढ़े शिखा बाँधी गयी हो तो जप होम आदि निष्फल होता है।


 *॥ मुक्त-शिखस्य स्नान- निषेधः॥* 

 *मुक्तकेशैर्न कर्तव्यं प्रेतस्नानं क्वचित् ।* 

 *बिना  स्नानं दानं जपं होमं मुक्तकेशं न  कारयेत् ॥*  वृद्ध वशिष्ठः


खुली हुई शिखा रखकर स्नान, दान, जप, हवन नहीं करना चाहिये । खुली शिखा रखकर जो स्नान किया जाता है, उसे प्रेतस्नान कहते हैं ।


 *॥ कुत्र शिखां न बध्नीयात् ॥* 


 *स्नाने च भोजने चैव तथा मूत्रपुरीषयोः ।* 

 *मैथुने च शवस्कन्धे शिखा षट्सु विसर्जयेत् ॥* 


स्नान, भोजन तथा लघुशंका, पाखाना, मैथुन व मुर्दा ढोने के समय शिखा खोल देनी चाहिए। (मात्र दशगात्र स्नानमें शिखा खोलकर स्नान करना चाहिए)।


 *॥ शिखा - मोचन मन्त्रः ॥* 


 *ब्रह्मपाशसहस्त्रेण रुद्रशूलशतेन च।* 

 *विष्णुचक्रसहस्त्रेण शिखामुक्तिं शिखामुक्तिं करोम्यहम् ॥* 

 *गच्छन्तु सकला देवा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ।* 

 *तिष्ठत्ववाचला लक्ष्मीः शिखामुक्तं करोम्यहम् ॥* 

आह्निकतत्त्वम् ॥


 *॥ मरण-सूतके शिखा-वपन-विचारः ॥* 


 *मुण्डयेत् सर्वगात्राणि कक्षोपस्थशिखां न हि ।* 


कांख, नीचे का बाल (गुह्य स्थान ) व शिखा को छोड़कर मरणाशौच में शिर का बाल, दाढ़ी मूँछ बनवा देना चाहिए। 


 *अशौचान्तकृत्ये सर्वेषां वपनं नखलोमयोः ।* 

 *स्त्रीणां तु मुण्डनं नैव नखच्छेदनकेवलम् ॥* *मुखमूर्ध्निस्थितान् केशान् शिखावर्जन्तु वापयेत् ॥* 

बृहस्पतिः


अशौच के अन्त में सभी लोगों को नख और बालों को बनवाना चाहिए। स्त्रियों का मुण्डन न कराकर केवल नख कटवा दे, तथा पुरुषों शिखा को छोड़कर मूछ, दाढ़ी तथा शिर के बाल बनवा देना चाहिए।


 *॥ ज्ञानतोऽज्ञानतो वा शिखाच्छेदने विचारः ॥* 


 *शिखां छिन्दन्ति ये मोहाद् द्वेषादज्ञानतोऽपि वा ।* *तप्तकृच्छ्रेण शुध्यन्ति त्रयो वर्णा द्विजातयः ॥*


इति हारीतेन शिखा नाशे प्रायश्चित्ताभिधानाच्च । मोहात् — प्रमादात् । द्वेषात् स्त्र्यादिकलहे क्रोधाद्यावेशात् । अज्ञानत: - शिखा - नित्यत्वाज्ञानात्' ।


शिखा को जो मोह (प्रमाद) द्वेष (स्त्री आदि से कलह में क्रोधादि आवेश) अज्ञान (शिखा नित्य ही रखनी चाहिए, ऐसा ज्ञान न होने से) कटवा देते हैं, उनको तप्तकृच्छ्र प्रायश्चित्त हारीत महर्षि ने बतलाया है।


 *।। शिखाऽभावे प्रतिनिधि-विचारः ॥* 


 *शिखानाशे तत्-प्रतिनिधिरुक्तः । काठकगृह्ये । अथ चेत् प्रमादान्निः शिखं वपनं स्यात्तदा कौश शिखां ब्रह्मग्रन्थि-समन्वितां दक्षिण कर्णो परिआशिखा बन्धादवतिष्ठेत्  ।* शिखा के अभाव में कुश की शिखा ब्रह्मग्रन्थियुक्त दहिने कान पर तबतक रखें, जबतक बाँधने योग्य शिखा न बढ़ जाय ।


 *॥ स्त्री-शूद्रयोः शिखा - विचारः ॥* 


 *स्त्री-शूद्रौ तु शिखां छित्वा क्रोधाद् वैराग्यतोऽपि वा ।* *प्राजापत्यं प्रकुर्यातां निष्कृतिर्नाऽन्यथा भवेत् ।।* 

 हारीतः 


 *ततश्च द्विजस्त्रीसच्छूद्रौ देशाचारव्यवस्थया शिखां धारयेताम् ।* 


क्रोध या वैराग्य (क्षणिक वैराग्य) से जो स्त्री व शूद्र शिखा को कटवा देते हैं । उनको प्रायश्चित्त के लिए प्राजापत्य व्रत कराना चाहिए। और कोई उपाय नहीं है। अथवा देशाचार से व्यवस्था करनी चाहिए।


 *_॥ शिखा-प्रमाणम् ॥_*


   *चतुरङ्गुल-विस्तारं शिखा-मूलं द्विजन्मनः ।* 

 *राज्ञः पञ्चाङ्गुलं न्यासं वैश्यानां वै तथैव च ॥* 

 *स्थापयेयुः शिरोमध्ये शिखां सर्वे   द्विजातयः ।* *स्वऋष्युक्त-स्थले वाऽपि खल्वाटस्य न चोदितः ॥* 

 भारद्वाज - स्मृति ॥ 


ब्राह्मण के लिए शिखा का मूल चार अङ्गुल एवं क्षत्रिय वैश्य के लिए पांच अङ्गुल रहना चाहिए। अपने ऋषियों द्वारा कहे गये स्थल पर सभी द्विजातीय शिर के मध्य में शिखा रखें। जिसके शिर पर बाल नहीं उनके लिए नियम नहीं हैं । (विशेष - शिखा के अभाव में प्रतिनिधि विचार में कहा गया है ।)


 *॥ शूद्र-शिखा बन्धनस्य- मन्त्रः॥* 


 *ब्रह्मवाणीसहस्राणि शिववाणी तथैव च।* 

 *विष्णोर्नामसहस्रेण शिखाबन्धं करोम्यहम् ॥* 

आह्निकतत्त्वे ॥


 *ब्रह्मवाणी-* इस मन्त्र को पढ़कर समयानुसार शूद्रशिखा को बाँधे।


 *॥ अथोपनयने शिखा रहित क्षौर- विचारः ॥* 


 *'ब्राह्मणान् भोजयेत्तञ्च पर्य्युप्त-शिरसम् अलङ्कृतमानयन्ति । पारस्कर गृह्यसूत्रम् - अत्र कर्काचार्य:- पर्युप्तं शिरोऽस्य इति पर्युप्त-शिराः तम् आनयन्ति जयरामाचार्य्यः - " तत्र कुमारं पर्युप्तशिरसंमुण्डित-मुण्डम् भोजयेत्, "परिपूर्वी वपतिर्मुण्डने "* 


यज्ञोपवीत में शिखा रहित क्षौर विचार - उपर्युक्त वचन पारस्कर गृहसूत्र के भाष्यकार कर्काचार्यादि के वचनानुसार उपनयन में शिखा छोड़कर शिर का क्षौर कराना चाहिए ।


 *॥ ब्रह्मचारि क्षौर-विचारः ॥* 


 *मुण्डो वा जटिलो वा स्यादथवास्याच्छिखाजट : ' ॥* 


 *मुण्ड  - मुण्डित - मस्तकः । मनुः ॥ .

 *जटिल  - शिरः - केश- जटावान् वा ।

 *शिखा जट:* - शिखैव या जटा जाता यस्य वा । ।


ब्रह्मचारी मस्तक के सभी बाल तथा दाढ़ी मूँछ के सभी बाल बनवावें । अथवा शिर के सभी बाल रखवाकर जटाधारी रहें । अथवाशिखा ही जटा रखे, शेष बनवा दें। तीन प्रकार का विधान ही ब्रह्मचारियों के लिए है ।


 *मासि मासि गृहस्थस्य पक्षे पक्षे च यज्वनः ।* 

 *ऋतावृतौ यतीनां तु यथेष्टं ब्रह्मचारिणाम् ॥* 

वशिष्ठः ॥


गृहस्थों का एक-एक मासों में (शुभ मुर्हत ) अग्निहोत्री को अमावास्या और पूर्णिमा, यति लोगों का प्रत्येक ऋतुओं में तथा ब्रह्मचारी को अपने इच्छानुसार समय से क्षौर कराना चाहिए ।


 *॥ गृहस्थ- क्षौर-विचारः ॥* 


 *गृहस्थानां क्षौरे वर्ज्यकालाः* 


 *कुम्भे कर्कटके वापि कन्यायां कार्मुके रवौ ।* 

 *रोम - खण्डं गृहस्थस्य पितॄन् प्राशयते यमः ' ॥*  

सुमन्तुः


सूर्य के कुम्भ, कर्क, कन्या, धनु राशिस्थ होने पर गृहस्थों को बाल नहीं बनवाना चाहिए, क्योंकि उन कटे बालों को यमराज पितरों के मुख में डाल देते हैं । उक्त वचन का बाधक वचन-


 *कुम्भे पादं  धनुष्यर्थं कर्के पादत्रयन्तथा ।* 

 *सर्वांकन्यां परित्यज्य क्षौरकर्मविधीयते ॥* 

सुमन्तुः


पाठान्तरम्--

 *सर्वां कन्यां परित्यज्य अर्द्धकर्कटकं त्यजेत् ।* 

 *धनुः कुम्भौ त्रिधा कृत्वा पूर्वभागं परित्यजेत् ॥* 


कुम्भ के प्रथम पाद, धनु के दो पाद, कर्क के तीन पाद तथा कन्या के चारों पादों को छोड़कर बाल बनवाना चाहिए । कुछ विद्वानों का मत है कि यह जीवत्पितृ विषयक नहीं है। पाठान्तर - 

कन्या के चारों पाद, कर्क दो पाद, धनु व कुम्भ के चार पादों में तीन भाग करके पूर्व भाग छोड़कर बाल बनवाना चाहिए। न्यायविदोंका मत है कि - सर्व साधारण के लिए उक्त नियम है।


 *मासे मासे गृहस्थानां पक्षे पक्षे च यज्वनाम् ।* 

 *ऋतावृतौ यतीनां क्षौरकर्मविधीयते ॥*

गृहस्थों को प्रत्येक मासों ( शुभ मुहूर्त) अग्रिहोत्रादि कर्ताओं को प्रत्येक पक्षों यतियों को प्रत्येक ऋतुओं (दो-दो मासों) में क्षौर कराना शास्त्र सम्मत है ।


 *॥ वानप्रस्थ क्षौर-विचारः ॥* 


 *होमस्त्रिषवणस्त्रानं जटावल्कलधारणम् ।* 

 *वन्यस्नेहनिषेवित्वं वानप्रस्थ विधिस्त्वयम् ॥* 


अग्निहोत्र होम, त्रिकालस्नान, जटावल्कल धारण वन के इंगुदि आदि फलों के तेल का सेवन करना वानप्रस्थ का यही नियम है। 

व्यास उवाच-

 *जटाश्च विभृयान्नित्यं नखरोमाणि नो त्यजेत् ।* 

 *स्वाध्यायं सर्वदा कुर्यात् नियच्छेद्वाचमन्यतः ' ॥* 

व्यास का वचन-

नित्य जटा का धारण नख रोम को न कटावें । नित्य स्वाध्याय करें, विधि से अतिरिक्त वाणी पर संयम रखें। (भागवत सप्तम् स्कन्ध, १२ अध्याय, २१ श्लोक व एकादश स्कन्द १८ अध्याय ३ श्लोक देखें)

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