सोमवार, 24 सितंबर 2018

मेथी के फायदे

**1 महीने पीएं मेथी का पानी, शरीर के हर पार्ट में आएगा ये चमत्कारिक बदलाव*

🌼घर पर आसानी से मिल जाने वाली मेथी में इतने सारे गुण है कि आप सोच भी नहीं सकते है। यह सिर्फ एक मसाला नहीं है बल्कि एक ऐसी दवा है जिसमें हर बीमारी को खत्म करने का दम है। आइए आज हम आपको मेथी के पानी के कुछ चमत्कारिक तरीके बताते हैं।

*करें ये काम*

🌼एक पानी से भरा गिलास ले कर उसमें दो चम्‍मच मेथी दाना डाल कर रातभर के लिये भिगो दें। सुबह इस पानी को छानें और खाली पेट पी जाएं। रातभर मेथी भिगोने से पानी में एंटी इंफ्लेमेटरी और एंटी ऑक्‍सीडेंट गुण बढ जाते हैं। इससे शरीर की तमाम बीमारियां चुटकियों में खत्म हो जाती है। आइए आपको बताते है कि कौन सी है वो खतरनाक 7 बीमारियां जो भग जाएंगी इस पानी को पीने से।

*वजन होगा कम*

🌼यदि आप भिगोई हुई मेथी के साथ उसका पानी भी पियें तो आपको जबरदस्‍ती की भूख नहीं लगेगी। रोज एक महीने तक मेथी का पानी पीने से वजन कम करने में मदद मिलती है।

*गठिया रोग से बचाए*

🌼इसमें एंटीऑक्‍सीडेंट और एंटी इंफ्लेमेटरी गुण होने के नातेए मेथी का पानी गठिया से होने वाले दर्द में भी राहत दिलाती है।

*कोलेस्‍ट्रॉल लेवल घटाए*

🌼बहुत सारी स्‍टडीज़ में प्रूव हुआ है कि मेथी खाने से या उसका पानी पीने से शरीर से खराब कोलेस्‍ट्रॉल का लेवल कम होकर अच्‍छे कोलेस्‍ट्रॉल का लेवल बढ़ता है।

*ब्लड प्रेशर होगा कंट्रोल*

🌼मेथी में एक galactomannan नामक कम्‍पाउंड और पोटैशियम होता है। ये दो सामग्रियां आपके ब्‍लड प्रेशर को कंट्रोल करने में बड़ी ही सहायक होती हैं।

*कैंसर से बचाए*

🌼मेथी में ढेर सारा फाइबर होता है जो कि शरीर से विषैले तत्‍वों को निकाल फेंकती है और पेट के कैंसर से बचाती है।

*किडनी स्‍टोन*

🌼अगर आप भिगोई हुई मेथी का पानी 1 महीने तक हर सुबह खाली पेट पियेंगे आपकी किडनी से स्‍टोन जल्‍द ही निकल जाएंगे।

*मधुमेह*

🌼मेथी में galactomannan होता है जो कि एक बहुत जरुरी फाइबर कम्‍पाउंड है। इससे रक्‍त में शक्‍कर बड़ी ही धीमी गति से घुलती है। इस कारण से मधुमेह नहीं होता।

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शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

पूजा - पाठ में इतनी सावधानी जरूर बरतें

🌿🌸 अति महत्वपूर्ण बातें 🌸🌿

🌸1. घर में सेवा पूजा करने वाले जन भगवान के एक से अधिक स्वरूप की सेवा पूजा कर सकते हैं ।

🌸2. घर में दो शिवलिंग की पूजा ना करें तथा पूजा स्थान पर तीन गणेश जी नहीं रखें।

🌸3. शालिग्राम जी की बटिया जितनी छोटी हो उतनी ज्यादा फलदायक है।

🌸4. कुशा पवित्री के अभाव में स्वर्ण की अंगूठी धारण करके भी देव कार्य सम्पन्न किया जा सकता है।

🌸5. मंगल कार्यो में कुमकुम का तिलक प्रशस्त माना जाता हैं।

🌸6.  पूजा में टूटे हुए अक्षत के टूकड़े नहीं चढ़ाना चाहिए।

🌸7. पानी, दूध, दही, घी आदि में अंगुली नही डालना चाहिए। इन्हें लोटा, चम्मच आदि से लेना चाहिए क्योंकि नख स्पर्श से वस्तु अपवित्र हो जाती है अतः यह वस्तुएँ देव पूजा के योग्य नहीं रहती हैं।

🌸8. तांबे के बरतन में दूध, दही या पंचामृत आदि नहीं डालना चाहिए क्योंकि वह मदिरा समान हो जाते हैं।

🌸9. आचमन तीन बार करने का विधान हैं। इससे त्रिदेव ब्रह्मा-विष्णु-महेश प्रसन्न होते हैं।

🌸10.  दाहिने कान का स्पर्श करने पर भी आचमन के तुल्य माना जाता है।

🌸11. कुशा के अग्रभाग से दवताओं पर जल नहीं छिड़के।

🌸12. देवताओं को अंगूठे से नहीं मले।

🌸13. चकले पर से चंदन कभी नहीं लगावें। उसे छोटी कटोरी या बांयी हथेली पर रखकर लगावें।

🌸15. पुष्पों को बाल्टी, लोटा, जल में डालकर फिर निकालकर नहीं चढ़ाना चाहिए।

🌸16. श्री भगवान के चरणों की चार बार, नाभि की दो बार, मुख की एक बार या तीन बार आरती उतारकर समस्त अंगों की सात बार आरती उतारें।

🌸17. श्री भगवान की आरती समयानुसार जो घंटा, नगारा, झांझर, थाली, घड़ावल, शंख इत्यादि बजते हैं उनकी ध्वनि से आसपास के वायुमण्डल के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। नाद ब्रह्मा होता हैं। नाद के समय एक स्वर से जो प्रतिध्वनि होती हैं उसमे असीम शक्ति होती हैं।

🌸18. लोहे के पात्र से श्री भगवान को नैवेद्य अपर्ण नहीं करें।

🌸19. हवन में अग्नि प्रज्वलित होने पर ही आहुति दें।

🌸20. समिधा अंगुठे से अधिक मोटी नहीं होनी चाहिए तथा दस अंगुल लम्बी होनी चाहिए।

🌸21. छाल रहित या कीड़े लगी हुई समिधा यज्ञ-कार्य में वर्जित हैं।

🌸22.  पंखे आदि से कभी हवन की अग्नि प्रज्वलित नहीं करें।

🌸23. मेरूहीन माला या मेरू का लंघन करके माला नहीं जपनी चाहिए।

🌸24.  माला, रूद्राक्ष, तुलसी एवं चंदन की उत्तम मानी गई हैं।

🌸25. माला को अनामिका (तीसरी अंगुली) पर रखकर मध्यमा (दूसरी अंगुली) से चलाना चाहिए।

🌸26.जप करते समय सिर पर हाथ या वस्त्र नहीं रखें।

🌸27. तिलक कराते समय सिर पर हाथ या वस्त्र रखना चाहिए।

🌸28. माला का पूजन करके ही जप करना चाहिए।

🌸29. ब्राह्मण को या द्विजाती को स्नान करके तिलक अवश्य लगाना चाहिए।

🌸30. जप करते हुए जल में स्थित व्यक्ति, दौड़ते हुए, शमशान से लौटते हुए व्यक्ति को नमस्कार करना वर्जित हैं।

🌸31.  बिना नमस्कार किए आशीर्वाद देना वर्जित हैं।

🌸32.  एक हाथ से प्रणाम नही करना चाहिए।

🌸33.  सोए हुए व्यक्ति का चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए।

🌸34. बड़ों को प्रणाम करते समय उनके दाहिने पैर पर दाहिने हाथ से और उनके बांये पैर को बांये हाथ से छूकर प्रणाम करें।

🌸35. जप करते समय जीभ या होंठ को नहीं हिलाना चाहिए। इसे उपांशु जप कहते हैं। इसका फल सौगुणा फलदायक होता हैं।

🌸36. जप करते समय दाहिने हाथ को कपड़े या गौमुखी से ढककर रखना चाहिए।

🌸37. जप के बाद आसन के नीचे की भूमि को स्पर्श कर नेत्रों से लगाना चाहिए।

🌸38. संक्रान्ति, द्वादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, रविवार और सन्ध्या के समय तुलसी तोड़ना निषिद्ध हैं।

🌸39. दीपक से दीपक को नही जलाना चाहिए।

🌸40. यज्ञ, श्राद्ध आदि में काले तिल का प्रयोग करना चाहिए, सफेद तिल का नहीं।

🌸41. शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाना चाहिए। पीपल की सात परिक्रमा करनी चाहिए। परिक्रमा करना श्रेष्ठ है, किन्तु रविवार को परिक्रमा नहीं करनी चाहिए।

🌸42. कूमड़ा-मतीरा-नारियल आदि को स्त्रियां नहीं तोड़े या चाकू आदि से नहीं काटें। यह उत्तम नही माना गया हैं।

🌸43. भोजन प्रसाद को लाघंना नहीं चाहिए।

🌸44.  देव प्रतिमा देखकर अवश्य प्रणाम करें।

🌸45. किसी को भी कोई वस्तु या दान-दक्षिणा दाहिने हाथ से देना चाहिए।

🌸46. एकादशी, अमावस्या, कृृष्ण चतुर्दशी, पूर्णिमा व्रत तथा श्राद्ध के दिन क्षौर-कर्म (दाढ़ी) नहीं बनाना चाहिए ।

🌸47. बिना यज्ञोपवित या शिखा बंधन के जो भी कार्य, कर्म किया जाता है, वह निष्फल हो जाता हैं।

🌸48. यदि शिखा नहीं हो तो स्थान को स्पर्श कर लेना चाहिए।

🌸49. शिवजी की जलहारी उत्तराभिमुख रखें ।

🌸50. शंकर जी को बिल्वपत्र, विष्णु जी को तुलसी, गणेश जी को दूर्वा, लक्ष्मी जी को कमल प्रिय हैं।

🌸51. शंकर जी को शिवरात्रि के सिवाय कुंुकुम नहीं चढ़ती।

🌸52. शिवजी को कुंद, विष्णु जी को धतूरा, देवी जी  को आक तथा मदार और सूर्य भगवानको तगर के फूल नहीं चढ़ावे।

🌸53 .अक्षत देवताओं को तीन बार तथा पितरों को एक बार धोकर चढ़ावंे।

🌸54. नये बिल्व पत्र नहीं मिले तो चढ़ाये हुए बिल्व पत्र धोकर फिर चढ़ाए जा सकते हैं।

🌸55. विष्णु भगवान को चांवल, गणेश जी  को तुलसी, दुर्गा जी और सूर्य नारायण  को बिल्व पत्र नहीं चढ़ावें।

🌸56. पत्र-पुष्प-फल का मुख नीचे करके नहीं चढ़ावें, जैसे उत्पन्न होते हों वैसे ही चढ़ावें।

🌸57.  किंतु बिल्वपत्र उलटा करके डंडी तोड़कर शंकर पर चढ़ावें।

🌸58. पान की डंडी का अग्रभाग तोड़कर चढ़ावें।

🌸59. सड़ा हुआ पान या पुष्प नहीं चढ़ावे।

🌸60. गणेश को तुलसी भाद्र शुक्ल चतुर्थी को चढ़ती हैं।

🌸61. पांच रात्रि तक कमल का फूल बासी नहीं होता है।

🌸62. दस रात्रि तक तुलसी पत्र बासी नहीं होते हैं।

🌸63. सभी धार्मिक कार्यो में पत्नी को दाहिने भाग में बिठाकर धार्मिक क्रियाएं सम्पन्न करनी चाहिए।

🌸64. पूजन करनेवाला ललाट पर तिलक लगाकर ही पूजा करें।

🌸65. पूर्वाभिमुख बैठकर अपने बांयी ओर घंटा, धूप तथा दाहिनी ओर शंख, जलपात्र एवं पूजन सामग्री रखें।

देवयानी

 प्राचीनकाल में देवताओं और राक्षसों के कई युद्ध हुए। इन युद्धों में कभी देवता जीतते और कभी राक्षस। लेकिन एक समय ऐसा आया कि राक्षसों की शक्ति तेजी से बढ़ने लगी। इसका कारण था मृतसंजीवनी विद्या। राक्षसों के गुरु शुक्राचार्य को भगवान शिव के आशीर्वाद से मृतसंजीवनी विद्या का ज्ञान मिल गया था। अब युद्ध में जो राक्षस मर जाते, शुक्राचार्य उन्हें फिर से जीवित कर देते।

देवताओं के लिए यह बड़ी समस्या बन गयी। क्या उपाय किया जाये? देवताओं के गुरु बृहस्पति भी इस विद्या से अनजान थे।  देवगुरु बृहस्पति को एक उपाय सूझा! उन्होंने अपने पुत्र कच से कहा कि वो जाकर गुरु शुक्राचार्य का शिष्य बन जाए और मृतसंजीवनी विद्या सीखने का प्रयास करे।  बृहस्पति जानते थे कि यह कार्य इतना आसान नहीं होगा। उन्होंने अपने पुत्र कच से कहा कि अगर वो किसी प्रकार शुक्राचार्य की सुन्दर पुत्री देवयानी को प्रभावित या आकर्षित कर लेता है तो संभवतः काम आसान हो जाये।

देवयानी और कच : - कच जाकर गुरु शुक्राचार्य का शिष्य बन गया। कच एक तेजस्वी युवक था। देवयानी कच को मन ही मन चाहने लगी पर यह बात उसने किसी से कही नही। इसी बीच राक्षसों को यह बात पता चल गयी कि देवगुरु का पुत्र कच शुक्राचार्य से शिक्षा ले रहा है। राक्षस समझ गये कि कच का उद्देश्य तो मृतसंजीवनी विद्या का ज्ञान पाना है। राक्षसों ने निर्णय लिया कि कच का जीवित रहना विनाशकारी हो सकता है अतः वो चुपचाप कच को मारने की योजना बनाने लगे।

एक दिन राक्षसों ने कच को पकड़कर उसका वध कर दिया। देवयानी ने जब यह जाना तो उसने रो-रोकर पिता से कच को पुनर्जीवित करने की याचना की। शुक्राचार्य देवयानी का कच के प्रति प्रेम समझ गये, हारकर उन्होंने कच को जीवित कर दिया। इस बात से राक्षस चिढ गये, उन्होंने कुछ दिन बाद पुनः कच को मृत्यु के घाट उतार दिया। लेकिन शुक्राचार्य भी क्या करते, पुत्री मोह में उन्हें पुनः कच को जीवित करना पड़ा।

अब तो राक्षस क्रोधित ही हो गये। उन्होंने सोचा जो भी हो जाये कच को रास्ते से हटाना ही होगा। उन्होंने तीसरी बार कच को मार डाला। इस बार राक्षसों ने चालाकी की, राक्षसों ने कच को मारकर उसके शरीर को जला दिया और राख को एक पेय में मिलाकर अपने गुरु शुक्राचार्य को ही पिला दिया। राक्षसों ने सोचा चलो अब तो छुट्टी हो गयी कच की, लेकिन देवयानी ?

देवयानी ने जब कच को कहीं न पाया तो वो समझ गयी कि क्या हुआ होगा? देवयानी ने पुनः अपने पिता शुक्राचार्य से विनती की कि वो कच का पता करें। शुक्राचार्य महान ऋषि थे। उन्होंने अपने तपोबल की शक्ति से कच का आवाहन किया तो उन्हें खुद के पेट से कच की आवाज़ आई। शुक्राचार्य दुविधा में पड़ गये, अगर वो कच को जीवित करते हैं तो वो स्वयं मर जायेंगे। अतः उन्होंने कच की आत्मा को मृतसंजीवनी का ज्ञान दे दिया। कच अपने गुरु शुक्राचार्य का पेट फाड़कर बाहर आ गया और शुक्राचार्य मर गये। कच ने मृतसंजीवनी विद्या का प्रयोग किया और गुरु शुक्राचार्य को जीवित कर दिया।

देवयानी और कच :- कच ने शुक्राचार्य को जीवित करके शिष्य के धर्म को निभाया अतः शुक्राचार्य ने कच को आशीर्वाद दिया। देवयानी कच को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुई और उसने कच से विवाह करने की इच्छा जताई। जवाब में कच ने सत्य का उद्घाटन किया कि यहाँ आने का उसका उद्देश्य (मृतसंजीवनी विद्या का ज्ञान) तो पूरा हो चुका, अब वो वापस देवलोक जा रहा है। इसके साथ ही कच ने यह भी कहा कि चूंकि वो शुक्राचार्य के पेट से निकला है अतः शुक्राचार्य उसके पिता समान हुए. इस प्रकार देवयानी कच की बहन हुई इसलिए वो अपनी बहन से शादी कैसे कर सकता है।

देवयानी को इस बात से गहरा आघात पहुंचा। क्रोध और शोक में देवयानी ने कच को श्राप दिया कि वो कभी भी मृतसंजीवनी विद्या का प्रयोग नही कर पायेगा। कच इस बात से चकित रहा गया, चिढ़कर उसने भी देवयानी को श्राप दिया कि जो जिस भी व्यक्ति से विवाह करेगी उसका चरित्र अच्छा नहीं होगा।

देवयानी और शर्मिष्ठा : - कच के चले जाने के बाद देवयानी व्यथित मन से जीवन व्यतीत करने लगी। एक दिन देवयानी राजकुमारी शर्मिष्ठा के साथ वन में स्नान करने गयी। राजकुमारी शर्मिष्ठा असुर राजा वृषपर्वा की पुत्री थी। राजा वृषपर्वा गुरु शुक्राचार्य का बहुत सम्मान करते थे और उन्हें मुख्य सलाहकार नियुक्त किये थे। इसी कारण देवयानी और शर्मिष्ठा में पहचान और मित्रता थी।

जब लडकियाँ स्नान कर रही थीं तो जोर ही हवा चली, जिससे नदी के बाहर रखे उनके सूखे कपड़े इधर-उधर बिखरने लगे। जब देवयानी ने नदी से बाहर आकर कपड़े पहने तो गलती से उसने शर्मिष्ठा के वस्त्र पहन लिए। हवा की वजह से सब कपड़े आपस में मिल गये थे अतः देवयानी से यह भूल हो गयी।

शर्मिष्ठा ने जब यह देखा कि देवयानी ने उसके वस्त्र पहन लिए तो उसने चिढ़कर कहा – राजकुमारी के कपड़े पहनने से तुम राजकुमारी नहीं बन जाओगी, तुम्हारे पिता मेरे पिता के सेवक ही हैं तो तुम भी सेविका ही हो।

देवयानी एक अति सुन्दर युवती थी, राजकुमारी के वस्त्र पहनने से उसकी सुन्दरता और भी बढ़ गयी थी। शर्मिष्ठा भी रूपवती थी पर उसे देवयानी से स्त्रीस्वभाव वश जलन हुई। स्नान करके लौटते समय गुस्से और जलन से भरी शर्मिष्ठा ने देवयानी को एक सूखे कुँए में धकेल दिया और अपनी दसियों के साथ वापस नगर आ गयी।

कुँवा बहुत गहरा नहीं था अतः देवयानी बच तो गयी लेकिन वो उस कुवें से बाहर नही निकल पायी। गिरने से लगी चोट से कराहती देवयानी बचाव की गुहार लगने लगी। संयोगवश उसी जंगल में युवा राजा ययाति शिकार खेल रहे थे।  राजा ययाति महान प्रतापी राजा नहुष के पुत्र थे। जब ययाति कुवें के पास से गुजरे तो उन्होंने देवयानी की करुण पुकार सुनी। राजा ययाति ने देवयानी का हाथ पकड़कर,  कुवें से बाहर निकाल कर उसकी प्राण-रक्षा की।

देवयानी और ययाति :- राजा ययाति एक सुदर्शन पुरुष थे। उनके सुंदर व्यक्तित्व से देवयानी प्रभावित होकर बोली – आपने मेरा हाथ पकड़ा ही है तो अब छोड़िये नहीं, आप मुझे पत्नी रूप में स्वीकार कीजिये। ययाति भी देवयानी के रूप, यौवन पर मुग्ध थे। जब उन्हें पता चला कि देवयानी गुरु शुक्राचार्य की पुत्री है तो वो असमंजस में पड़ गये।  ययाति ने देवयानी से कहा कि यद्यपि वो देवयानी से विवाह करना चाहते हैं पर गुरु शुक्राचार्य को यह सम्बन्ध स्वीकार नहीं होगा। अतः मैं यह विवाह करने में असमर्थ हूँ। यह कहकर दुखी मन से राजा ययाति ने देवयानी से विदा ली।

जीवन में पुनः दूसरी बार देवयानी का तिरस्कार हुआ। अपमान, दुःख-शोक के सागर में डूबी देवयानी वहीँ कुँए के पास बैठकर रोने लगी। उधर जब शाम ढले देवयानी जंगल से वापस नहीं आई तो शुक्राचार्य को चिंता हुई। शुक्राचार्य देवयानी को खोजने निकल पड़े. वन में जब उन्हें देवयानी मिली तो उसकी हालत देखकर उन्हें बहुत दुःख हुआ। देवयानी के कपड़े गंदे, शरीर में चोट लगी और सुन्दर मुख अश्रुओं में डूबा हुआ था।

अपनी प्रिय पुत्री की यह दशा देखकर शुक्राचार्य बहुत दुखी हुए। उन्होंने देवयानी से पूछा कि उसकी इस दयनीय स्थिति के लिए कौन उत्तरदायी है। देवयानी ने राजकुमारी शर्मिष्ठा की बात बताई और कहा कि – राजकुमारी ने मुझे एक सेवक की पुत्री कहा और मेरा अपमान किया। मैं यहाँ से तब तक नहीं हिलूंगी, जब तक राजकुमारी शर्मिष्ठा मेरी दासी नहीं बन जाती। यह एक अवांक्षित इच्छा थी पर गुरु शुक्राचार्य इस स्थिति में अपनी प्रिय पुत्री को न कैसे कहते?

शुक्राचार्य ने राजा वृषपर्वा को संदेश भेजा कि वो उनके राज्य में वापस ही नहीं लौटेंगे अगर देवायनी के इच्छानुसार राजकुमारी शर्मिष्ठा देवयानी की सेविका नहीं बनी तो। राजा वृषपर्वा यह बात जानते थे कि गुरु शुक्राचार्य के बिना असुरों का पतन निश्चित था। राजकुमारी शर्मिष्ठा भी यह बात जानती थी। अतः अपने वंश और राक्षस जाति के लिए उसने आखिरकार देवायनी की सेविका बनना स्वीकार कर लिया।

देवयानी, शर्मिष्ठा और राजा ययाति : - दिन बीतने लगे, एक दिन देवयानी उसी वन में घूम रही थी कि पुनः उसकी मुलाकात राजा ययाति से हो गयी। देवयानी और ययाति दोनों एक दूसरे को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए। इस बार देवयानी ययाति को अपने साथ लेकर पिता शुक्राचार्य के पास पहुंची और ययाति से विवाह करने की इच्छा व्यक्त की।  गुरु शुक्राचार्य ने देवयानी की इच्छा स्वीकार की पर उन्होंने ययाति के सामने शर्त रखी कि जीवन में कभी भी ययाति की वजह से देवयानी के आंख से एक भी अश्रु बहना नहीं चाहिए। ययाति ने यह शर्त सहर्ष मान ली अतः देवयानी और ययाति का विवाह हो गया।

देवयानी से विवाह के बाद राजा ययाति वापस अपने राज्य प्रतिष्ठानपुर (आधुनिक इलाहाबाद शहर) वापस लौट गये और आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे। देवयानी के साथ सेविका राजकुमारी शर्मिष्ठा भी आई थी। दासी होने के बावजूद चूँकि शर्मिष्ठा एक राजकुमारी थी, अतः उसे भी रहने के लिए एक अच्छा महल दे दिया गया था.

एक दिन शर्मिष्ठा अपने उद्यान में घूम रही थी कि उसका सामना उधर से गुजरते राजा ययाति से हो गया। कच के श्राप का असर कहें या शर्मिष्ठा की सुन्दरता या विधि का खेल, राजा ययाति शर्मिष्ठा की सुन्दरता पर मोहित हो गये।

 शर्मिष्ठा भी ययाति की ओर आकर्षित थी। शर्मिष्ठा ने ययाति से विनती की कि वो उसकी भावनाओं का सम्मान करते हुए उससे विवाह कर लें। इच्छा तो ययाति की भी थी पर वो यह जानते थे कि देवयानी को पता चला तो बहुत क्रोधित होगी। देवयानी को कष्ट हुआ तो गुरु शुक्राचार्य का रोष ययाति पर टूटेगा।

शर्मिष्ठा ययाति से कहती है – राजधर्म के अनुसार यह बात जरा भी अनुचित नहीं कि एक राजा एक राजकुमारी से विवाह कर लें अगर दोनों के मन में एक ही भाव हो तो। हम दोनों के मन में एक ही भावना है इसलिए हमें निः संकोच विवाह कर लेना चाहिए। आखिरकार ययाति शर्मिष्ठा की बातों से निरुत्तर हो गये और दोनों ने गुपचुप गंधर्व विवाह कर लिया।

कुछ दिन बाद देवयानी गर्भवती हुई और उसके दो पुत्र हुए – यदु और तुर्वस्तु. उधर शर्मिष्ठा ने भी 3 पुत्रों को जन्म दिया – पुरु, अनु और द्रुह्यु. देवयानी को जब पता चला कि शर्मिष्ठा के पुत्रों के पिता ययाति हैं तो उसने यह बात शुक्राचार्य से बताई। क्रोधित शुक्राचार्य ने राजा ययाति को श्राप दे दिया कि वो तुरंत ही एक वृद्ध पुरुष बन जाये।

शुक्राचार्य का ययाति को श्राप :- देवयानी ने जब देखा कि उसका युवा, सुंदर पति अब एक कुरूप बूढ़ा व्यक्ति हो गया है तो उसे कष्ट हुआ।  देवयानी ने पिता शुक्राचार्य से विनती की कि वो अपना श्राप वापस ले लें। शुक्राचार्य बोले – मेरा श्राप तो वापस नही हो सकता, हाँ अगर ययाति का कोई पुत्र अपनी इच्छा से अपना यौवन ययाति को दे दे तो ययाति फिर से युवा हो जायेगा।

भोग में डूबे ययाति का मन यौवन के आनंद से भरा नहीं था। वो बड़े आत्मविश्वास से अपने बड़े पुत्र यदु के पास गया और यौवन देने की बात कही।  यदु ने ययाति को मना कर दिया। इसी प्रकार तुर्वस्तु, अनु, द्रुह्यु ने भी ययाति के आग्रह को ठुकरा दिया। अंत में ययाति ने अपने सबसे छोटे पुत्र पुरु से याचना की,पुरु ने सहर्ष अपने पिता की बात मान ली और यौवन दे दिया।उसी पल ययाति पुनः युवा बन गये और पुरु एक वृद्ध व्यक्ति बन गया।

ययाति ने आनंदपूर्वक 100 साल तक यौवन का उपभोग किया। 100 वर्ष पूरे होने के बाद भी ययाति ने जब अपने को असंतुष्ट पाया तो वह सोच में पड़ गया। उसे समझ आया कि इच्छाओं का कोई अंत नहीं है, लाख मन की कर लो मगर फिर कोई नयी इच्छा पैदा हो जाती है। ऐसे कामनाओं के पीछे भागना व्यर्थ है। अतः ययाति ने अपने पुत्र पुरु के पास वापस जाकर उसे उसका यौवन वापस करने की सोची।

जब पुरु को अपने पिता ययाति की इच्छा पता चली तो उसने कहा – अपने पिता के आज्ञा का पालन तो मेरा कर्तव्य था, आप अगर चाहें तो कुछ समय और आनंद भोग करें, मुझे कोई कष्ट नही है। ययाति ने जब यह बात सुनी तो उन्हें बहुत ग्लानि हुई। ययाति पुरु की उदारता से बहुत प्रभावित हुए और सबसे छोटा होने के बावजूद उन्होंने पुरु को अपना उत्तराधिकारी घोषित का दिया।

ययाति ने पुरु को उसका यौवन वपस लौटा दिया। पुनः वृद्ध रूप में आकर ययाति देवयानी और शर्मिष्ठा के साथ राज्य छोड़कर वानप्रस्थ हो गये।आगे चलकर राजा ययाति के पाँचों पुत्रों ने 5 महानतम वंश का निर्माण किया।

राजा यदु – यदु वंश (यादव)
राजा तुर्वस्तु – यवन वंश (तुर्क)
राजा अनु – म्लेच्छ वंश (ग्रीक)
राजा द्रुह्यु – भोज वंश
राजा पुरु – पौरव वंश या कुरु वंश

बुधवार, 19 सितंबर 2018

पद्मा एकादशी

पद्मा एकादशी (20/09/2017 ब्रहस्पतिवार) व्रत कथा

(एकादशी व्रत की कथा पढ़ऩे वाले तथा श्रवण करने वालों को हजार अशवमेध यज्ञ के बराबर फल प्राप्त होता है)

युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान! भाद्रपद शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? इसकी विधि तथा इसका माहात्म्य कृपा करके कहिए। तब भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि इस पुण्य, स्वर्ग और मोक्ष को देने वाली तथा सब पापों का नाश करने वाली, उत्तम वामन एकादशी का माहात्म्य मैं तुमसे कहता हूँ तुम ध्यानपूर्वक सुनो।

यह पद्मा/परिवर्तिनी एकादशी जयंती एकादशी भी कहलाती है। इसका यज्ञ करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। पापियों के पाप नाश करने के लिए इससे बढ़कर कोई उपाय नहीं। जो मनुष्य इस एकादशी के दिन मेरी (वामन रूप की) पूजा करता है, उससे तीनों लोक पूज्य होते हैं। अत: मोक्ष की इच्छा करने वाले मनुष्य इस व्रत को अवश्य करें।

जो कमलनयन भगवान का कमल से पूजन करते हैं, वे अवश्य भगवान के समीप जाते हैं। जिसने भाद्रपद शुक्ल एकादशी को व्रत और पूजन किया, उसने ब्रह्मा, विष्णु सहित तीनों लोकों का पूजन किया। अत: हरिवासर अर्थात एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। इस दिन भगवान करवट लेते हैं, इसलिए इसको परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं।

यह एकादशी जयंती एकादशी भी कहलाती है। इसका यज्ञ करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। पापियों के पाप नाश करने के लिए इससे बढ़कर कोई उपाय नहीं। जो मनुष्य इस एकादशी के दिन मेरी (वामन रूप की) पूजा करता है, उससे तीनों लोक पूज्य होते हैं।

भगवान के वचन सुनकर युधिष्ठिर बोले कि भगवान! मुझे अतिसंदेह हो रहा है कि आप किस प्रकार सोते और करवट लेते हैं तथा किस तरह राजा बलि बलि को बाँधा और वामन रूप रखकर क्या-क्या लीलाएँ कीं? चातुर्मास के व्रत की क्या ‍विधि है तथा आपके शयन करने पर मनुष्य का क्या कर्तव्य है। सो आप मुझसे विस्तार से बताइए।

श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजन! अब आप सब पापों को नष्ट करने वाली कथा का श्रवण करें। त्रेतायुग में बलि नामक एक दैत्य था। वह मेरा परम भक्त था। विविध प्रकार के वेद सूक्तों से मेरा पूजन किया करता था और नित्य ही ब्राह्मणों का पूजन तथा यज्ञ के आयोजन करता था, लेकिन इंद्र से द्वेष के कारण उसने इंद्रलोक तथा सभी देवताओं को जीत लिया।

इस कारण सभी देवता एकत्र होकर सोच-विचारकर भगवान के पास गए। बृहस्पति सहित इंद्रादिक देवता प्रभु के निकट जाकर और नतमस्तक होकर वेद मंत्रों द्वारा भगवान का पूजन और स्तुति करने लगे। अत: मैंने वामन रूप धारण करके पाँचवाँ अवतार लिया और फिर अत्यंत तेजस्वी रूप से राजा बलि को जीत लिया।

इतनी वार्ता सुनकर राजा युधिष्ठिर बोले कि हे जनार्दन! आपने वामन रूप धारण करके उस महाबली दैत्य को किस प्रकार जीता? श्रीकृष्ण कहने लगे- मैंने (वामन रूपधारी ब्रह्मचारी) बलि से तीन पग भूमि की याचना करते हुए कहा- ये मुझको तीन लोक के समान है और हे राजन यह तुमको अवश्य ही देनी होगी।

राजा बलि ने इसे तुच्छ याचना समझकर तीन पग भूमि का संकल्प मुझको दे दिया और मैंने अपने त्रिविक्रम रूप को बढ़ाकर यहाँ तक कि भूलोक में पद, भुवर्लोक में जंघा, स्वर्गलोक में कमर, मह:लोक में पेट, जनलोक में हृदय, यमलोक में कंठ की स्थापना कर सत्यलोक में मुख, उसके ऊपर मस्तक स्थापित किया।

सूर्य, चंद्रमा आदि सब ग्रह गण, योग, नक्षत्र, इंद्रादिक देवता और शेष आदि सब नागगणों ने विविध प्रकार से वेद सूक्तों से प्रार्थना की। तब मैंने राजा बलि का हाथ पकड़कर कहा कि हे राजन! एक पद से पृथ्वी, दूसरे से स्वर्गलोक पूर्ण हो गए। अब तीसरा पग कहाँ रखूँ?

तब बलि ने अपना सिर झुका लिया और मैंने अपना पैर उसके मस्तक पर रख दिया जिससे मेरा वह भक्त पाताल को चला गया। फिर उसकी विनती और नम्रता को देखकर मैंने कहा कि हे बलि! मैं सदैव तुम्हारे निकट ही रहूँगा। विरोचन पुत्र बलि से कहने पर भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन बलि के आश्रम पर मेरी मूर्ति स्थापित हुई।

इसी प्रकार दूसरी क्षीरसागर में शेषनाग के पष्ठ पर हुई! हे राजन! इस एकादशी को भगवान शयन करते हुए करवट लेते हैं, इसलिए तीनों लोकों के स्वामी भगवान विष्णु का उस दिन पूजन करना चाहिए। ताँबा, चाँदी, चावल और दही का दान करना उचित है। रात्रि को जागरण अवश्य करना चाहिए।

जो विधिपूर्वक इस एकादशी का व्रत करते हैं, वे सब पापों से मुक्त होकर स्वर्ग में जाकर चंद्रमा के समान प्रकाशित होते हैं और यश पाते हैं। जो पापनाशक इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उनको हजार अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। इति शुभम्

पद्मा (जलझूलनी) एकादशी

*20 सितम्बर 2018 वीरवार को  होगी श्री विष्णु के वामन रूप की पूजा*

*जानिए महत्व और पौराणिक व्रतकथा*

युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान! भाद्रपद शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? इसकी विधि तथा इसका माहात्म्य कृपा करके कहिए।

तब भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि इस पुण्य, स्वर्ग और मोक्ष को देने वाली तथा सब पापों का नाश करने वाली, उत्तम वामन एकादशी का माहात्म्य मैं तुमसे कहता हूं तुम ध्यानपूर्वक सुनो।

यह पद्मा/परिवर्तिनी एकादशी, जयंती और जलझूलनी एकादशी भी कहलाती है। इसका व्रत करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। पापियों के पाप नाश करने के लिए इससे बढ़कर कोई उपाय नहीं। जो मनुष्य इस एकादशी के दिन मेरी (वामन रूप की) पूजा करता है, उससे तीनों लोक पूज्य होते हैं। अत: मोक्ष की इच्छा करने वाले मनुष्य इस व्रत को अवश्य करें।


जो कमलनयन भगवान का कमल से पूजन करते हैं, वे अवश्य भगवान के समीप जाते हैं। जिसने भाद्रपद शुक्ल एकादशी को व्रत और पूजन किया, उसने ब्रह्मा, विष्णु सहित तीनों लोकों का पूजन किया। अत: हरिवासर अर्थात एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। इस दिन भगवान करवट लेते हैं, इसलिए इसको परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं।

भगवान के वचन सुनकर युधिष्ठिर बोले कि भगवान! मुझे अतिसंदेह हो रहा है कि आप किस प्रकार सोते और करवट लेते हैं तथा किस तरह राजा बलि को बांधा और वामन रूप रखकर क्या-क्या लीलाएं कीं? चातुर्मास के व्रत की क्या विधि है तथा आपके शयन करने पर मनुष्य का क्या कर्तव्य है। सो आप मुझसे विस्तार से बताइए।


श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजन! अब आप सब पापों को नष्ट करने वाली कथा का श्रवण करें।

त्रेतायुग में बलि नामक एक दैत्य था। वह मेरा परम भक्त था। विविध प्रकार के वेद सूक्तों से मेरा पूजन किया करता था और नित्य ही ब्राह्मणों का पूजन तथा यज्ञ के आयोजन करता था, लेकिन इंद्र से द्वेष के कारण उसने इंद्रलोक तथा सभी देवताओं को जीत लिया।

इस कारण सभी देवता एकत्र होकर सोच-विचारकर भगवान के पास गए। बृहस्पति सहित इंद्रादिक देवता प्रभु के निकट जाकर और नतमस्तक होकर वेद मंत्रों द्वारा भगवान का पूजन और स्तुति करने लगे। अत: मैंने वामन रूप धारण करके पांचवां अवतार लिया और फिर अत्यंत तेजस्वी रूप से राजा बलि को जीत लिया।

इतनी वार्ता सुनकर राजा युधिष्ठिर बोले कि हे जनार्दन! आपने वामन रूप धारण करके उस महाबली दैत्य को किस प्रकार जीता?

श्रीकृष्ण कहने लगे- मैंने (वामन रूपधारी ब्रह्मचारी) बलि से तीन पग भूमि की याचना करते हुए कहा- ये मुझको तीन लोक के समान है और हे राजन यह तुमको अवश्य ही देनी होगी।

राजा बलि ने इसे तुच्छ याचना समझकर तीन पग भूमि का संकल्प मुझको दे दिया और मैंने अपने त्रिविक्रम रूप को बढ़ाकर यहां तक कि भूलोक में पद, भुवर्लोक में जंघा, स्वर्गलोक में कमर, मह:लोक में पेट, जनलोक में हृदय, यमलोक में कंठ की स्थापना कर सत्यलोक में मुख, उसके ऊपर मस्तक स्थापित किया।


सूर्य, चंद्रमा आदि सब ग्रह गण, योग, नक्षत्र, इंद्रादिक देवता और शेष आदि सब नागगणों ने विविध प्रकार से वेद सूक्तों से प्रार्थना की। तब मैंने राजा बलि का हाथ पकड़कर कहा कि हे राजन! एक पद से पृथ्वी, दूसरे से स्वर्गलोक पूर्ण हो गए। अब तीसरा पग कहां रखूं?

तब बलि ने अपना सिर झुका लिया और मैंने अपना पैर उसके मस्तक पर रख दिया जिससे मेरा वह भक्त पाताल को चला गया। फिर उसकी विनती और नम्रता को देखकर मैंने कहा कि हे बलि! मैं सदैव तुम्हारे निकट ही रहूंगा। विरोचन पुत्र बलि से कहने पर भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन बलि के आश्रम पर मेरी मूर्ति स्थापित हुई।

इसी प्रकार दूसरी क्षीरसागर में शेषनाग के पष्ठ पर हुई! हे राजन! इस एकादशी को भगवान शयन करते हुए करवट लेते हैं, इसलिए तीनों लोकों के स्वामी भगवान विष्णु का उस दिन पूजन करना चाहिए। इस दिन तांबा, चांदी, चावल और दही का दान करना उचित है। रात्रि को जागरण अवश्य करना चाहिए।

जो विधिपूर्वक इस एकादशी का व्रत करते हैं, वे सब पापों से मुक्त होकर स्वर्ग में जाकर चंद्रमा के समान प्रकाशित होते हैं और यश पाते हैं। जो पापनाशक इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उनको हजार अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

मंगलवार, 18 सितंबर 2018

कलयुग वर्णन

🥀🥀🥀...कलयुग वर्णन (उत्तरकाण्ड)...🥀🥀🥀

कलिमल ग्रसे धर्म सब
लुप्त भए सदग्रंथ।
दंभिन्ह निज मति कल्पि करि
प्रगट किए बहु पंथ॥ 1क॥

कलियुग के पापों ने सब धर्मों को ग्रस लिया, सद्ग्रंथ लुप्त हो गए, दम्भियों ने अपनी बुद्धि से कल्पना कर-करके बहुत से पंथ प्रकट कर दिए॥1(क)॥

भए लोग सब मोहबस
लोभ ग्रसे सुभ कर्म।
सुनु हरिजान ग्यान निधि
कहउँ कछुक कलिधर्म॥1 ख॥

सभी लोग मोह के वश हो गए, शुभ कर्मों को लोभ ने हड़प लिया। हे ज्ञान के भंडार! हे श्री हरि के वाहन! सुनिए, अब मैं कलि के कुछ धर्म कहता हूँ॥ (1ख)॥

बरन धर्म नहिं आश्रम चारी।
श्रुति बिरोध रत सब नर नारी।
द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन।
कोउ नहिं मान निगम अनुसासन॥

कलियुग में न वर्णधर्म रहता है, न चारों आश्रम रहते हैं। सब पुरुष-स्त्री वेद के विरोध में लगे रहते हैं। ब्राह्मण वेदों के बेचने वाले और राजा प्रजा को खा डालने वाले होते हैं। वेद की आज्ञा कोई नहीं मानता॥2॥

मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा।
पंडित सोइ जो गाल बजावा॥
मिथ्यारंभ दंभ रत जोई।
ता कहुँ संत कहइ सब कोई॥3॥
जिसको जो अच्छा लग जाए, वही मार्ग है। जो डींग मारता है, वही पंडित है। जो मिथ्या आरंभ करता (आडंबर रचता) है और जो दंभ में रत है, उसी को सब कोई संत कहते हैं॥3॥

सोइ सयान जो परधन हारी।
जो कर दंभ सो बड़ आचारी॥
जो कह झूँठ मसखरी जाना।
कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना॥4॥
जो (जिस किसी प्रकार से) दूसरे का धन हरण कर ले, वही बुद्धिमान है। जो दंभ करता है, वही बड़ा आचारी है। जो झूठ बोलता है और हँसी-दिल्लगी करना जानता है, कलियुग में वही गुणवान कहा जाता है॥4॥

निराचार जो श्रुति पथ त्यागी।
कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी॥
जाकें नख अरु जटा बिसाला।
सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला॥5॥
जो आचारहीन है और वेदमार्ग को छोड़े हुए है, कलियुग में वही ज्ञानी और वही वैराग्यवान्‌ है। जिसके बड़े-बड़े नख और लंबी-लंबी जटाएँ हैं, वही कलियुग में प्रसिद्ध तपस्वी है॥5॥

असुभ बेष भूषन धरें
भच्छाभच्छ जे खाहिं।
तेइ जोगी तेइ सिद्ध नर
पूज्य ते कलिजुग माहिं॥6क॥
जो अमंगल वेष और अमंगल भूषण धारण करते हैं और भक्ष्य-भक्ष्य (खाने योग्य और न खाने योग्य) सब कुछ खा लेते हैं वे ही योगी हैं, वे ही सिद्ध हैं और वे ही मनुष्य कलियुग में पूज्य हैं॥6 (क)॥

जे अपकारी चार
तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ।
मन क्रम बचन लबार तेइ
बकता कलिकाल महुँ॥6 ख॥
जिनके आचरण दूसरों का अपकार (अहित) करने वाले हैं, उन्हीं का बड़ा गौरव होता है और वे ही सम्मान के योग्य होते हैं। जो मन, वचन और कर्म से लबार (झूठ बकने वाले) हैं, वे ही कलियुग में वक्ता माने जाते हैं॥6(ख)॥

नारि बिबस नर सकल गोसाईं।
नाचहिं नट मर्कट की नाईं॥
सूद्र द्विजन्ह उपदेसहिं ग्याना।
मेल जनेऊ लेहिं कुदाना॥7॥
हे गोसाईं! सभी मनुष्य स्त्रियों के विशेष वश में हैं और बाजीगर के बंदर की तरह (उनके नचाए) नाचते हैं। ब्राह्मणों को शूद्र ज्ञानोपदेश करते हैं और गले में जनेऊ डालकर कुत्सित दान लेते हैं॥7॥

सब नर काम लोभ रत क्रोधी।
देव बिप्र श्रुति संत बिरोधी॥
गुन मंदिर सुंदर पति त्यागी।
भजहिं नारि पर पुरुष अभागी॥8॥
सभी पुरुष काम और लोभ में तत्पर और क्रोधी होते हैं। देवता, ब्राह्मण, वेद और संतों के विरोधी होते हैं। अभागिनी स्त्रियाँ गुणों के धाम सुंदर पति को छोड़कर पर पुरुष का सेवन करती हैं॥8॥

सौभागिनीं बिभूषन हीना।
बिधवन्ह के सिंगार नबीना॥
गुर सिष बधिर अंध का लेखा।
एक न सुनइ एक नहिं देखा॥9॥
सुहागिनी स्त्रियाँ तो आभूषणों से रहित होती हैं, पर विधवाओं के नित्य नए श्रृंगार होते हैं। शिष्य और गुरु में बहरे और अंधे का सा हिसाब होता है। एक (शिष्य) गुरु के उपदेश को सुनता नहीं, एक (गुरु) देखता नहीं (उसे ज्ञानदृष्टि) प्राप्त नहीं है)॥9॥

हरइ सिष्य धन सोक न हरई।
सो गुर घोर नरक महुँ परई॥
मातु पिता बालकन्हि बोलावहिं।
उदर भरै सोइ धर्म सिखावहिं॥10॥
जो गुरु शिष्य का धन हरण करता है, पर शोक नहीं हरण करता, वह घोर नरक में पड़ता है। माता-पिता बालकों को बुलाकर वही धर्म सिखलाते हैं, जिससे पेट भरे॥10॥

ब्रह्म ग्यान बिनु नारि नर
कहहिं न दूसरि बात।
कौड़ी लागि लोभ बस करहिं
बिप्र गुर घात॥11॥

स्त्री-पुरुष ब्रह्मज्ञान के सिवा दूसरी बात नहीं करते, पर वे लोभवश कौड़ियों (बहुत थोड़े लाभ) के लिए ब्राह्मण और गुरु की हत्या कर डालते हैं॥11॥

बादहिं सूद्र द्विजन्ह सन
हम तुम्ह ते कछु घाटि।
जानइ ब्रह्म सो बिप्रबर
आँखि देखावहिं डाटि॥11॥

शूद्र ब्राह्मणों से विवाद करते हैं (और कहते हैं) कि हम क्या तुमसे कुछ कम हैं? जो ब्रह्म को जानता है वही श्रेष्ठ ब्राह्मण है। (ऐसा कहकर) वे उन्हें डाँटकर आँखें दिखलाते हैं॥99 (ख)॥

पर त्रिय लंपट कपट सयाने।
मोह द्रोह ममता लपटाने॥
तेइ अभेदबादी ग्यानी नर।
देखा मैं चरित्र कलिजुग कर॥12॥

जो पराई स्त्री में आसक्त, कपट करने में चतुर और मोह, द्रोह और ममता में लिपटे हुए हैं, वे ही मनुष्य अभेदवादी (ब्रह्म और जीव को एक बताने वाले) ज्ञानी हैं। मैंने उस कलियुग का यह चरित्र देखा॥12॥

आपु गए अरु तिन्हहू घालहिं।
जे कहुँ सत मारग प्रतिपालहिं॥
कल्प कल्प भरि एक एक नरका।
परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका॥13॥

वे स्वयं तो नष्ट हुए ही रहते हैं, जो कहीं सन्मार्ग का प्रतिपालन करते हैं, उनको भी वे नष्ट कर देते हैं। जो तर्क करके वेद की निंदा करते हैं, वे लोग कल्प-कल्पभर एक-एक नरक में पड़े रहते हैं॥13॥

जे बरनाधम तेलि कुम्हारा।
स्वपच किरात कोल कलवारा।
पनारि मुई गृह संपति नासी।
मूड़ मुड़ाइ होहिं संन्यासी॥14॥

तेली, कुम्हार, चाण्डाल, भील, कोल और कलवार आदि जो वर्ण में नीचे हैं, स्त्री के मरने पर अथवा घर की संपत्ति नष्ट हो जाने पर सिर मुँड़ाकर संन्यासी हो जाते हैं॥14॥

ते बिप्रन्ह सन आपु पुजावहिं।
उभय लोक निज हाथ नसावहिं॥
बिप्र निरच्छर लोलुप कामी।
निराचार सठ बृषली स्वामी॥15॥

वे अपने को ब्राह्मणों से पुजवाते हैं और अपने ही हाथों दोनों लोक नष्ट करते हैं। ब्राह्मण अपढ़, लोभी, कामी, आचारहीन, मूर्ख और नीची जाति की व्यभिचारिणी स्त्रियों के स्वामी होते हैं॥15॥

सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना।
बैठि बरासन कहहिं पुराना॥
सब नर कल्पित करहिं अचारा।
जाइ न बरनि अनीति अपारा॥16॥

शूद्र नाना प्रकार के जप, तप और व्रत करते हैं तथा ऊँचे आसन (व्यास गद्दी) पर बैठकर पुराण कहते हैं। सब मनुष्य मनमाना आचरण करते हैं। अपार अनीति का वर्णन नहीं किया जा सकता॥16॥

भए बरन संकर कलि
भिन्न सेतु सब लोग।
करहिं पाप पावहिं दुख
भय रुज सोक बियोग॥17 क॥

कलियुग में सब लोग वर्णसंकर और मर्यादा से च्युत हो गए। वे पाप करते हैं और (उनके फलस्वरूप) दुःख, भय, रोग, शोक और (प्रिय वस्तु का) वियोग पाते हैं॥17(क)॥

श्रुति संमत हरि भक्ति पथ
संजुत बिरति बिबेक।
तेहिं न चलहिं नर मोह बस
कल्पहिं पंथ अनेक॥17 ख॥

वेद सम्मत तथा वैराग्य और ज्ञान से युक्त जो हरिभक्ति का मार्ग है, मोहवश मनुष्य उस पर नहीं चलते और अनेकों नए-नए पंथों की कल्पना करते हैं॥17 (ख)॥

बहु दाम सँवारहिं धाम जती।
बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती॥
तपसी धनवंत दरिद्र गृही।
कलि कौतुक तात न जात कही॥18॥

संन्यासी बहुत धन लगाकर घर सजाते हैं। उनमें वैराग्य नहीं रहा, उसे विषयों ने हर लिया। तपस्वी धनवान हो गए और गृहस्थ दरिद्र। हे तात! कलियुग की लीला कुछ कही नहीं जाती॥18॥

कुलवंति निकारहिं नारि सती।
गृह आनहिं चेरि निबेरि गती॥
सुत मानहिं मातु पिता तब लौं।
अबलानन दीख नहीं जब लौं॥19॥

कुलवती और सती स्त्री को पुरुष घर से निकाल देते हैं और अच्छी चाल को छोड़कर घर में दासी को ला रखते हैं। पुत्र अपने माता-पिता को तभी तक मानते हैं, जब तक स्त्री का मुँह नहीं दिखाई पड़ता॥19॥

ससुरारि पिआरि लगी जब तें।
रिपुरूप कुटुंब भए तब तें॥
नृप पाप परायन धर्म नहीं।
करि दंड बिडंब प्रजा नितहीं॥20॥

जब से ससुराल प्यारी लगने लगी, तब से कुटुम्बी शत्रु रूप हो गए। राजा लोग पाप परायण हो गए, उनमें धर्म नहीं रहा। वे प्रजा को नित्य ही (बिना अपराध) दंड देकर उसकी विडंबना (दुर्दशा) किया करते हैं॥20॥

धनवंत कुलीन मलीन अपी।
द्विज चिन्ह जनेउ उघार तपी॥
नहिं मान पुरान न बेदहि जो।
हरि सेवक संत सही कलि सो॥21॥

धनी लोग मलिन (नीच जाति के) होने पर भी कुलीन माने जाते हैं। द्विज का चिह्न जनेऊ मात्र रह गया और नंगे बदन रहना तपस्वी का। जो वेदों और पुराणों को नहीं मानते, कलियुग में वे ही हरिभक्त और सच्चे संत कहलाते हैं॥21॥

कबि बृंद उदार दुनी न सुनी।
गुन दूषक ब्रात न कोपि गुनी॥
कलि बारहिं बार दुकाल परै।
बिनु अन्न दुखी सब लोग मरै॥22॥

कवियों के तो झुंड हो गए, पर दुनिया में उदार (कवियों का आश्रयदाता) सुनाई नहीं पड़ता। गुण में दोष लगाने वाले बहुत हैं, पर गुणी कोई भी नहीं। कलियुग में बार-बार अकाल पड़ते हैं। अन्न के बिना सब लोग दुःखी होकर मरते हैं॥22॥

सुनु खगेस कलि कपट
हठ दंभ द्वेष पाषंड।
मान मोह मारादि मद
ब्यापि रहे ब्रह्मंड॥23 क॥

हे पक्षीराज गरुड़जी! सुनिए कलियुग में कपट, हठ (दुराग्रह), दम्भ, द्वेष, पाखंड, मान, मोह और काम आदि (अर्थात्‌ काम, क्रोध और लोभ) और मद ब्रह्माण्डभर में व्याप्त हो गए (छा गए)॥23 (क)॥

तामस धर्म करिहिं नर
जप तप ब्रत मख दान।
देव न बरषहिं धरनी
बए न जामहिं धान॥23 ख॥

मनुष्य जप, तप, यज्ञ, व्रत और दान आदि धर्म तामसी भाव से करने लगे। देवता (इंद्र) पृथ्वी पर जल नहीं बरसाते और बोया हुआ अन्न उगता नहीं॥23 (ख)॥

अबला कच भूषन भूरि छुधा।
धनहीन दुखी ममता बहुधा॥
सुख चाहहिं मूढ़ न धर्म रता।
मति थोरि कठोरि न कोमलता॥24॥

स्त्रियों के बाल ही भूषण हैं (उनके शरीर पर कोई आभूषण नहीं रह गया) और उनको भूख बहुत लगती है (अर्थात्‌ वे सदा अतृप्त ही रहती हैं)। वे धनहीन और बहुत प्रकार की ममता होने के कारण दुःखी रहती हैं। वे मूर्ख सुख चाहती हैं, पर धर्म में उनका प्रेम नहीं है। बुद्धि थोड़ी है और कठोर है, उनमें कोमलता नहीं है॥24॥

नर पीड़ित रोग न भोग कहीं।
अभिमान बिरोध अकारनहीं॥
लघु जीवन संबदु पंच दसा।
कलपांत न नास गुमानु असा॥25॥

मनुष्य रोगों से पीड़ित हैं, भोग (सुख) कहीं नहीं है। बिना ही कारण अभिमान और विरोध करते हैं। दस-पाँच वर्ष का थोड़ा सा जीवन है, परंतु घमंड ऐसा है मानो कल्पांत (प्रलय) होने पर भी उनका नाश नहीं होगा॥25॥

कलिकाल बिहाल किए मनुजा।
नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा॥
नहिं तोष बिचार न सीतलता।
सब जाति कुजाति भए मगता॥26॥

कलिकाल ने मनुष्य को बेहाल (अस्त-व्यस्त) कर डाला। कोई बहिन-बेटी का भी विचार नहीं करता। (लोगों में) न संतोष है, न विवेक है और न शीतलता है। जाति, कुजाति सभी लोग भीख माँगने वाले हो गए॥26॥

इरिषा परुषाच्छर लोलुपता।
भरि पूरि रही समता बिगता॥
सब लोग बियोग बिसोक हए।
बरनाश्रम धर्म अचार गए॥27॥

ईर्षा (डाह), कडुवे वचन और लालच भरपूर हो रहे हैं, समता चली गई। सब लोग वियोग और विशेष शोक से मरे पड़े हैं। वर्णाश्रम धर्म के आचरण नष्ट हो गए॥27॥

दम दान दया नहिं जानपनी।
जड़ता परबंचनताति घनी॥
तनु पोषक नारि नरा सगरे।
परनिंदक जे जग मो बगरे॥28॥

इंद्रियों का दमन, दान, दया और समझदारी किसी में नहीं रही। मूर्खता और दूसरों को ठगना, यह बहुत अधिक बढ़ गया। स्त्री-पुरुष सभी शरीर के ही पालन-पोषण में लगे रहते हैं। जो पराई निंदा करने वाले हैं, जगत्‌ में वे ही फैले हैं॥28॥

सुनु ब्यालारि काल कलि
मल अवगुन आगार।
गुनउ बहुत कलिजुग कर
बिनु प्रयास निस्तार॥29 क॥
हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी! सुनिए, कलिकाल पाप और अवगुणों का घर है, किंतु कलियुग में एक गुण भी बड़ा है कि उसमें बिना ही परिश्रम भवबंधन से छुटकारा मिल जाता है॥29 (क)॥

कृतजुग त्रेताँ द्वापर
पूजा मख अरु जोग।
जो गति होइ सो कलि
हरि नाम ते पावहिं लोग॥29 ख॥

सत्ययुग, त्रेता और द्वापर में जो गति पूजा, यज्ञ और योग से प्राप्त होती है, वही गति कलियुग में लोग केवल भगवान्‌ के नाम से पा जाते हैं॥29(ख)॥

कृतजुग सब जोगी बिग्यानी।
करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी॥
त्रेताँ बिबिध जग्य नर करहीं।
प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं॥30॥

सत्ययुग में सब योगी और विज्ञानी होते हैं। हरि का ध्यान करके सब प्राणी भवसागर से तर जाते हैं। त्रेता में मनुष्य अनेक प्रकार के यज्ञ करते हैं और सब कर्मों को प्रभु को समर्पण करके भवसागर से पार हो जाते हैं॥30॥

द्वापर करि रघुपति पद पूजा।
नर भव तरहिं उपाय न दूजा॥
कलिजुग केवल हरि गुन गाहा।
गावत नर पावहिं भव थाहा॥31॥

द्वापर में श्री रघुनाथजी के चरणों की पूजा करके मनुष्य संसार से तर जाते हैं, दूसरा कोई उपाय नहीं है और कलियुग में तो केवल श्री हरि की गुणगाथाओं का गान करने से ही मनुष्य भवसागर की थाह पा जाते हैं॥31॥

कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना।
एक अधार राम गुन गाना॥
सब भरोस तजि जो भज रामहि।
प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि॥32॥

कलियुग में न तो योग और यज्ञ है और न ज्ञान ही है। श्री रामजी का गुणगान ही एकमात्र आधार है। अतएव सारे भरोसे त्यागकर जो श्री रामजी को भजता है और प्रेमसहित उनके गुणसमूहों को गाता है,॥32॥

सोइ भव तर कछु संसय नाहीं।
नाम प्रताप प्रगट कलि माहीं॥
कलि कर एक पुनीत प्रतापा।
मानस पुन्य होहिं नहिं पापा॥33॥

वही भवसागर से तर जाता है, इसमें कुछ भी संदेह नहीं। नाम का प्रताप कलियुग में प्रत्यक्ष है। कलियुग का एक पवित्र प्रताप (महिमा) है कि मानसिक पुण्य तो होते हैं, पर (मानसिक) पाप नहीं होते॥34॥

कलिजुग सम जुग आन नहिं
जौं नर कर बिस्वास।
गाइ राम गुन गन बिमल
भव तर बिनहिं प्रयास॥35 क॥

यदि मनुष्य विश्वास करे, तो कलियुग के समान दूसरा युग नहीं है, (क्योंकि) इस युग में श्री रामजी के निर्मल गुणसमूहों को गा-गाकर मनुष्य बिना ही परिश्रम संसार (रूपी समुद्र) से तर जाता है॥35 (क)॥

प्रगट चारि पद धर्म के
कलि महुँ एक प्रधान।
जेन केन बिधि दीन्हें
दान करइ कल्यान॥35 ख॥

धर्म के चार चरण (सत्य, दया, तप और दान) प्रसिद्ध हैं, जिनमें से कलि में एक (दान रूपी) चरण ही प्रधान है। जिस किसी प्रकार से भी दिए जाने पर दान कल्याण ही करता है॥35(ख)॥

नित जुग धर्म होहिं सब केरे।
हृदयँ राम माया के प्रेरे॥
सुद्ध सत्व समता बिग्याना।
कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना॥36॥

श्री रामजी की माया से प्रेरित होकर सबके हृदयों में सभी युगों के धर्म नित्य होते रहते हैं। शुद्ध सत्त्वगुण, समता, विज्ञान और मन का प्रसन्न होना, इसे सत्ययुग का प्रभाव जानें॥36॥

सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा।
सब बिधि सुख त्रेता कर धर्मा॥
बहु रज स्वल्प सत्व कछु तामस।
द्वापर धर्म हरष भय मानस॥37॥

सत्त्वगुण अधिक हो, कुछ रजोगुण हो, कर्मों में प्रीति हो, सब प्रकार से सुख हो, यह त्रेता का धर्म है। रजोगुण बहुत हो, सत्त्वगुण बहुत ही थोड़ा हो, कुछ तमोगुण हो, मन में हर्ष और भय हो, यह द्वापर का धर्म है॥37॥

तामस बहुत रजोगुन थोरा।
कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा॥
बुध जुग धर्म जानि मन माहीं।
तजि अधर्म रति धर्म कराहीं॥38॥

तमोगुण बहुत हो, रजोगुण थोड़ा हो, चारों ओर वैर-विरोध हो, यह कलियुग का प्रभाव है। पंडित लोग युगों के धर्म को मन में ज्ञान (पहचान) कर, अधर्म छोड़कर धर्म में प्रीति करते हैं॥38॥

काल धर्म नहिं ब्यापहिं ताही।
रघुपति चरन प्रीति अति जाही॥
नट कृत बिकट कपट खगराया।
नट सेवकहि न ब्यापइ माया॥39॥

जिसका श्री रघुनाथजी के चरणों में अत्यंत प्रेम है, उसको कालधर्म (युगधर्म) नहीं व्यापते। हे पक्षीराज! नट (बाजीगर) का किया हुआ कपट चरित्र (इंद्रजाल) देखने वालों के लिए बड़ा विकट (दुर्गम) होता है, पर नट के सेवक (जंभूरे) को उसकी माया नहीं व्यापती॥39॥

हरि माया कृत दोष गुन
बिनु हरि भजन न जाहिं।
भजिअ राम तजि काम सब
अस बिचारि मन माहिं॥40 क॥
श्री हरि की माया के द्वारा रचे हुए दोष और गुण श्री हरि के भजन बिना नहीं जाते। मन में ऐसा विचार कर, सब कामनाओं को छोड़कर (निष्काम भाव से) श्री रामजी का भजन करना चाहिए॥40(क)॥

पितृपक्ष_विशेष

*पितृपक्ष  25  सितंम्बर से शुरूश्राद्ध कर्म: कब,*
 भारतीय शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि पितृगण पितृपक्ष में पृथ्वी पर आते हैं और 15 दिनों तक पृथ्वी पर रहने के बाद अपने लोक लौट जाते हैं। शास्त्रों में बताया गया है कि पितृपक्ष के दौरान पितृ अपने परिजनों के आस-पास रहते हैं इसलिए इन दिनों कोई भी ऐसा काम नहीं करें जिससे पितृगण नाराज हों। पितरों को खुश रखने के लिए पितृ पक्ष में कुछ बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। पितृ पक्ष के दौरान , जामाता, भांजा, मामा, गुरु, नाती को भोजन कराना चाहिए। इससे पितृगण अत्यंत प्रसन्न होते हैं भोजन करवाते समय भोजन का पात्र दोनों हाथों से पकड़कर लाना चाहिए अन्यथा भोजन का अंश राक्षस ग्रहण कर लेते हैं जिससे ब्राह्मणों द्वारा अन्न ग्रहण करने के बावजूद पितृगण भोजन का अंश ग्रहण नहीं करते हैं।
पितृ पक्ष में द्वार पर आने वाले किसी भी जीव-जंतु को मारना नहीं चाहिए बल्कि उनके योग्य भोजन का प्रबंध करना चाहिए। हर दिन भोजन बनने के बाद एक हिस्सा निकालकर गाय, कुत्ता, कौआ अथवा बिल्ली को देना चाहिए। मान्यता है कि इन्हें दिया गया भोजन सीधे पितरों को प्राप्त हो जाता है। शाम के समय घर के द्वार पर एक दीपक जलाकर पितृगणों का ध्यान करना चाहिए।

हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार जिस तिथि को जिसके पूर्वज गमन करते हैं, उसी तिथि को उनका श्राद्ध करना चाहिए। इस पक्ष में जो लोग अपने पितरों को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर श्राद्ध करते हैं, उनके समस्त मनोरथ पूर्ण होते हैं। जिन लोगों को अपने परिजनों की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती, उनके लिए पितृ पक्ष में कुछ विशेष तिथियां भी निर्धारित की गई हैं, जिस दिन वे पितरों के निमित्त श्राद्ध कर सकते हैं।
आश्विन कृष्ण प्रतिपदा: इस तिथि को नाना-नानी के श्राद्ध के लिए सही बताया गया है। इस तिथि को श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है। यदि नाना-नानी के परिवार में कोई श्राद्ध करने वाला न हो और उनकी मृत्युतिथि याद न हो, तो आप इस दिन उनका श्राद्ध कर सकते हैं। पंचमी: जिनकी मृत्यु अविवाहित स्थिति में हुई हो, उनका श्राद्ध इस तिथि को किया जाना चाहिए।
 नवमी: सौभाग्यवती यानि पति के रहते ही जिनकी मृत्यु हो गई हो, उन स्त्रियों का श्राद्ध नवमी को किया जाता है। यह तिथि माता के श्राद्ध के लिए भी उत्तम मानी गई है। इसलिए इसे मातृनवमी भी कहते हैं। मान्यता है कि इस तिथि पर श्राद्ध कर्म करने से कुल की सभी दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध हो जाता है।

एकादशी और द्वादशी: एकादशी में वैष्णव संन्यासी का श्राद्ध करते हैं। अर्थात् इस तिथि को उन लोगों का श्राद्ध किए जाने का विधान है, जिन्होंने संन्यास लिया हो।
चतुर्दशी: इस तिथि में शस्त्र, आत्म-हत्या, विष और दुर्घटना यानि जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो उनका श्राद्ध किया जाता है जबकि बच्चों का श्राद्ध कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को करने के लिए कहा गया है।
सर्वपितृमोक्ष अमावस्या: किसी कारण से पितृपक्ष की अन्य तिथियों पर पितरों का श्राद्ध करने से चूक गए हैं या पितरों की तिथि याद नहीं है, तो इस तिथि पर सभी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है। शास्त्र अनुसार, इस दिन श्राद्ध करने से कुल के सभी पितरों का श्राद्ध हो जाता है। यही नहीं जिनका मरने पर संस्कार नहीं हुआ हो, उनका भी अमावस्या तिथि को ही श्राद्ध करना चाहिए। बाकी तो जिनकी जो तिथि हो, श्राद्धपक्ष में उसी तिथि पर श्राद्ध करना चाहिए। यही उचित भी है।

पिंडदान करने के लिए सफेद या पीले वस्त्र ही धारण करें। जो इस प्रकार श्राद्धादि कर्म संपन्न करते हैं, वे समस्त मनोरथों को प्राप्त करते हैं और अनंत काल तक स्वर्ग का उपभोग करते हैं। विशेष: श्राद्ध कर्म करने वालों को निम्न मंत्र तीन बार अवश्य पढ़ना चाहिए। यह मंत्र ब्रह्मा जी द्वारा रचित आयु, आरोग्य, धन, लक्ष्मी प्रदान करने वाला अमृतमंत्र है-
 *देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिश्च एव च। नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव भवन्त्युत !!*
(वायु पुराण) ।।
श्राद्ध सदैव दोपहर के समय ही करें। प्रातः एवं सायंकाल के समय श्राद्ध निषेध कहा गया है। हमारे धर्म-ग्रंथों में पितरों को देवताओं के समान संज्ञा दी गई है। ‘सिद्धांत शिरोमणि’ ग्रंथ के अनुसार चंद्रमा की ऊध्र्व कक्षा में पितृलोक है जहां पितृ रहते हैं। पितृ लोक को मनुष्य लोक से आंखों द्वारा नहीं देखा जा सकता। जीवात्मा जब इस स्थूल देह से पृथक होती है उस स्थिति को मृत्यु कहते हैं। यह भौतिक शरीर 27 तत्वों के संघात से बना है। स्थूल पंच महाभूतों एवं स्थूल कर्मेन्द्रियों को छोड़ने पर अर्थात मृत्यु को प्राप्त हो जाने पर भी 17 तत्वों से बना हुआ सूक्ष्म शरीर विद्यमान रहता है।

हिंन्दु मान्यताओं के अनुसार एक वर्ष तक प्रायः सूक्ष्म जीव को नया शरीर नहीं मिलता। मोहवश वह सूक्ष्म जीव स्वजनों व घर के आसपास घूमता रहता है। श्राद्ध कार्य के अनुष्ठान से सूक्ष्म जीव को तृप्ति मिलती है इसीलिए श्राद्ध कर्म किया जाता है।

ऐसा कुछ भी नहीं है कि इस अनुष्ठान में जो भोजन खिलाया जाता है वही पदार्थ ज्यों का त्यों उसी आकार, वजन और परिमाण में मृतक पितरों को मिलता है। वास्तव में श्रद्धापूर्वक श्राद्ध में दिए गए भोजन का सूक्ष्म अंश परिणत होकर उसी अनुपात व मात्रा में प्राणी को मिलता है जिस योनि में वह प्राणी है।
पितृ लोक में गया हुआ प्राणी श्राद्ध में दिए हुए अन्न का स्वधा रूप में परिणत हुए को खाता है। यदि शुभ कर्म के कारण मर कर पिता देवता बन गया तो श्राद्ध में दिया हुआ अन्न उसे अमृत में परिणत होकर देवयोनि में प्राप्त होगा। गंधर्व बन गया हो तो वह अन्न अनेक भोगों के रूप में प्राप्त होता है। पशु बन जाने पर घास के रूप में परिवर्तित होकर प्राप्त होता है
*🔥🌺जय राम जी की🌺🔥*

पितृपक्ष में परान्न से बचें

 गरुड़ पुराणोक्त पितृपक्ष परान्न निषेध कथा सनातन धर्म में 16 दिनों का पितृपक्ष वर्ष का सबसे सूक्ष्म और संवेदनशील समय माना गया है। गरुड़ पुरा...