बुधवार, 6 फ़रवरी 2019

रामायण जी की चमत्कारिक चौपाइयां

(((( सफलता के मंत्र ))))
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श्रीरामायण जी की चोपाई के माध्यम से जीवन के कुछ महत्वपूर्ण मंत्र दिए जा रहे है जिनके जाप से शत्-प्रतिशत सफलता मिलती है...
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आप से अनुरोध है इन मंत्रो का जीवन में प्रयोग अवश्य करें प्रभु श्रीराम आप के जीवन को सुखमय बना देगे !!
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रक्षा के लिए....
मामभिरक्षक रघुकुल नायक !
घृत वर चाप रुचिर कर सायक !!
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विपत्ति दूर करने के लिए....
राजिव नयन धरे धनु सायक !
भक्त विपत्ति भंजन सुखदायक !!
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सहायता के लिए....
मोरे हित हरि सम नहि कोऊ !
एहि अवसर सहाय सोई होऊ !!
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सब काम बनाने के लिए....
वंदौ बाल रुप सोई रामू !!
सब सिधि सुलभ जपत जोहि नामू !!
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वश मे करने के लिए....
सुमिर पवन सुत पावन नामू !!
अपने वश कर राखे राम !!
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संकट से बचने के लिए....
दीन दयालु विरद संभारी !!
हरहु नाथ मम संकट भारी !!
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विघ्न विनाश के लिए....
सकल विघ्न व्यापहि नहि तेही !!
राम सुकृपा बिलोकहि जेहि !
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रोग विनाश के लिए....
राम कृपा नाशहि सव रोगा !
जो यहि भाँति बनहि संयोगा !!
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ज्वार ताप दूर करने के लिए....
दैहिक दैविक भोतिक तापा !
राम राज्य नहि काहुहि व्यापा !!
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दुःख नाश के लिए....
राम भक्ति मणि उर बस जाके !
दुःख लवलेस न सपनेहु ताके !
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खोई चीज पाने के लिए....
गई बहोरि गरीब नेवाजू !
सरल सबल साहिब रघुराजू !!
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अनुराग बढाने के लिए....
सीता राम चरण रत मोरे !
अनुदिन बढे अनुग्रह तोरे !!
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घर मे सुख लाने के लिए....
जै सकाम नर सुनहि जे गावहि !
सुख सम्पत्ति नाना विधि पावहिं !!
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सुधार करने के लिए....
मोहि सुधारहि सोई सब भाँती !
जासु कृपा नहि कृपा अघाती !!
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विद्या पाने के लिए....
गुरू गृह पढन गए रघुराई !
अल्प काल विधा सब आई !!
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सरस्वती निवास के लिए....
जेहि पर कृपा करहि जन जानी !
कवि उर अजिर नचावहि बानी !
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निर्मल बुध्दि के लिए....
ताके युग पदं कमल मनाऊँ !!
जासु कृपा निर्मल मति पाऊँ !!
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मोह नाश के लिए....
होय विवेक मोह भ्रम भागा !
तब रघुनाथ चरण अनुरागा !!
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प्रेम बढाने के लिए....
सब नर करहिं परस्पर प्रीती !
चलत स्वधर्म कीरत श्रुति रीती !!
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प्रीती बढाने के लिए....
बैर न कर काह सन कोई !
जासन बैर प्रीति कर सोई !!
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सुख प्रप्ति के लिए....
अनुजन संयुत भोजन करही !
देखि सकल जननी सुख भरहीं !!
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भाई का प्रेम पाने के लिए....
सेवाहि सानुकूल सब भाई !
राम चरण रति अति अधिकाई !!
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बैर दूर करने के लिए....
बैर न कर काहू सन कोई !
राम प्रताप विषमता खोई !!
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मेल कराने के लिए....
गरल सुधा रिपु करही मिलाई !
गोपद सिंधु अनल सितलाई !!
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शत्रु नाश के लिए....
जाके सुमिरन ते रिपु नासा !
नाम शत्रुघ्न वेद प्रकाशा !!
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रोजगार पाने के लिए....
विश्व भरण पोषण करि जोई !
ताकर नाम भरत अस होई !!
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इच्छा पूरी करने के लिए....
राम सदा सेवक रूचि राखी !
वेद पुराण साधु सुर साखी !!
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पाप विनाश के लिए....
पापी जाकर नाम सुमिरहीं !
अति अपार भव भवसागर तरहीं !!
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अल्प मृत्यु न होने के लिए....
अल्प मृत्यु नहि कबजिहूँ पीरा !
सब सुन्दर सब निरूज शरीरा !!
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दरिद्रता दूर के लिए....
नहि दरिद्र कोऊ दुःखी न दीना !
नहि कोऊ अबुध न लक्षण हीना !!
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प्रभु दर्शन पाने के लिए....
अतिशय प्रीति देख रघुवीरा !
प्रकटे ह्रदय हरण भव पीरा !!
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शोक दूर करने के लिए....
नयन बन्त रघुपतहिं बिलोकी !
आए जन्म फल होहिं विशोकी !!
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क्षमा माँगने के लिए....
अनुचित बहुत कहहूँ अज्ञाता !
क्षमहुँ क्षमा मन्दिर दोऊ भ्राता
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 ((((((( जय बिहारी जी की🙏)))))))
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रविवार, 3 फ़रवरी 2019

मौनी अमावस्या विशेष

------------------------------मौनी अमावस्या 2019--------------------------

सनातन परंपरा में माघ मास को अत्यंत पावन मास माना गया है। इस मास में विधि-विधान से स्नान-ध्यान एवं साधना का विशेष महत्व है। वैसे तो इस पूरे मास में ही स्नान-दान का महत्व है लेकिन अमावस्या के दिन इसका अत्यधिक महत्व है। यही कारण है कि इस तिथि पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु सुख-समृद्धि और मोक्ष की कामना लिए पवित्र नदियों में डुबकी लगाते हैं। मौनी अमावस्या के दिन मौन रहकर स्नान करने का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व है :--

मौनी अमावस्या का ज्योतिषीय महत्व :---
मौनी अमावस्या के दिन सूर्य और चंद्रमा मकर राशि में होते हैं। इन तीनों के एक साथ होने का संयोग प्रत्येक वर्ष एक ही दिन होता है। इस शुभ संयोग में किसी पवित्र नदी में मौन धारण करते हुए डुबकी लगाने का विशेष धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व होता है। यही कारण है कि तमाम तीर्थो पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु नदी तीर्थ पर पावन डुबकी लगाने के लिए इकट्ठा होते हैं।
मौन रहने से बढ़ जाता है शुभ फल :---
ज्योतिष में सूर्य को आत्मा तथा चंद्रमा को मन का कारक माना जाता है। चूंकि मन चंद्रमा की तरह चंचल होता है और अक्सर साधना—आराधना के दौरान भटक जाता है। ऐसे में मन को नियंत्रित करना आवश्यक हो जाता है। मन पर नियंत्रण पाकर ही किसी साधना को निर्विघ्न रूप से पूर्ण किया जा सकता है। मन की कामनाएं अक्सर वाणी के द्वारा प्रकट की जाती हैं। ऐसे में मन पर नियंत्रण पाने के लिए माघ मास की अमावस्या के दिन मौन रखकर स्नान करने का विधान बना।

अक्षय पुण्य के लिए मौन रह कर करें स्नान :---
मान्यता है कि मन और वाणी पर नियंत्रण पाते हुए इस पावन तिथि पर स्नान करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और मोक्ष मिलता है। साथ ही इस दिन किए जाने वाले मौन स्नान से शरीर की सकारात्मक ऊर्जा का ह्रास भी नहीं होता है। मौन साधना से मिलने वाला पुण्य अक्षय रहता है। संतों के अनुसार मौन व्रत के बगैर मौनी अमावस्या पर स्नान करने से श्रद्धालुओं को पूरा पुण्य नहीं मिलता है।
यदि न पहुंच पाएं नदी तीर्थ :---
यदि आप किसी कारण किसी नदी तीर्थ पर जाकर इस पावन तिथि वाले दिन स्नान-ध्यान एवं पूजन करने में असमर्थ हैं तो आप अपने घर में ही इसका पुण्य लाभ पा सकते हैं। मौनी अमावस्या के दिन मां गंगा का ध्यान करते हुए अपने जल के स्नान में गंगाजल और तिल डाल कर मौन रखते हुए स्नान करें और स्नान-ध्यान के पश्चात किसी मंदिर में जाकर अपनी क्षमता के अनुसार दान करें।

मौनी अमावस्या का आध्यात्मिक महत्व :---

कड़ाके की ठंड में धार्मिक नियमों का पालन करते हुए साधना-आराधना का आध्यात्मिक महत्व भी है। विदित हो कि प्रयागराज कुंभ के अधिकांश स्नान पर्व भीषण ठंड में पड़ते हैं। हाड़ कंपा देने वाली सर्दी के मौसम में ये स्नान पर्व हमारे अंदर अदम्य जिजीविषा एवं संकल्प शक्ति का निर्माण करते हैं। इसी प्रकार मौनी अमावस्या पर मौन स्नान का भी अपना महत्व है। मौन रहते हुए अमृत रूपी जल का यह स्नान हमें जीवन की विषमताओं से न घबराने और चुनौतियों का दृढ़ता के साथ सामना करते हुए अपनी साधना-मनोकामना पूर्ण करने का संदेश देता है।

मौनी अमावस्या 2019 का महत्व :----

यूं तो हिंदू धर्म में हर अमावस्या का बेहद ही खास महत्व होता है लेकिन माघ महीने में होने वाली मौनी अमावस्या का तो महत्व ही निराला है। वही अगर ये अमावस्या (New Moon) सोमवार के दिन हो तो इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। वही अगर सोमवार भी हो और साथ ही कुम्भ लगा हो तो फिर इसका महत्व अनन्त गुणा हो जाता है। और इस बार कुछ ऐसा ही हो रहा है। दरअसल मौनी अमावस्या इस बार सोमवार यानि 4 फरवरी को है तो वही इस बार प्रयागराज में कुम्भ भी चल रहा है लिहाज़ा मौनी अमावस्या का महत्व इस बार अनंत हो गया है। चूंकि मौनी अमावस्या पर दान का बहुत ही महत्व होता है लिहाज़ा इस दिन पवित्र नदियों या संगम में स्नान के बाद अपनी इच्छानुसार अन्न, वस्त्र, धन, गौ, भूमि और स्वर्ण दान में दिया जा सकता है।

27 वर्ष बाद मौनी अमावस्या पर फिर से वही योग पड़ रहे हैं जो वर्ष 1992 में पड़े थे। अनेक योगों के पड़ने से पर्व का महत्व और बढ़ गया है।

वर्ष 1992 में तीन फरवरी के दिन मौनी अमावस्या सोमवार को पड़ने के कारण सोमवती हो गई थी। संयोग से उस दिन हरिद्वार अर्द्धकुंभ का प्रमुख स्नान भी था। इसी प्रकार इस बार मौनी अमावस्या चार फरवरी सोमवार को पड़कर सोमवती हुई है और प्रयाग अर्द्धकुंभ का मुख्य स्नान इसी दिन पड़ रहा है।

संयोग यह भी है कि 27 वर्ष पूर्व जो सिद्धी योग था वह योग इस बार सिद्धी के साथ साथ महोदय योग के रूप में भी आ रहा है। सोमवती अमावस्या के दिन चंद्रमा का श्रवण नक्षत्र विद्यमान रहेगा। खास बात यह है कि भगवान सूर्य का प्रवेश इसी नक्षत्र में हो रहा है। सूर्य इस समय मकर राशि में मौजूद हैं। सूर्य के मकर राशि में रहते हुए मौनी अमावस्या का पड़ना अपने आप में एक महायोग है।

बारह महीनों में से चार महीने सबसे पवित्र माने गए हैं। इन चार महीनों में भी माघ का पर्व सबसे पवित्र है। यही कारण है कि इस बार सोमवती अमावस्या के स्नान का पर्व पूर्ण पर्वकाल लेकर आया है। प्रात:काल सूर्योदय से लेकर सायंकाल सूर्यास्त तक पूर्ण मुहूर्त मौजूद रहेगा। इस कारण श्रद्धालु किसी भी समय गंगा में डुबकी लगा सकते हैं।

इस बार की मौनी अमावस्या दरिद्र योग, ग्रहण योग, केमुद्रम योग और शक्त योग लेकर भी आई है। इसका अर्थ है कि जिनकी कुंडली में ये योग हों, गंगा स्नान करने से उनका दुर्योग मिट जाएगा। यह पर्व व्यवसाय, संतान और भौतिक सुख भी लेकर आ रहा है। गंगा आदि पवित्र नदियों में एक भी गोता लगाने के जन्म जमान्तर के पाप मिट जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार इस दिन मौन रहकर तिल, दूध और गुड़ तिल से बनी वस्तुओं का दान करना चाहिए। इस दिन मौन व्रत का विशेष महत्व है। यह पर्व उत्तरायण में पड़ने से और भी अधिक महत्वपूर्ण हो चला है।

चार फरवरी को पड़ रही अमावस्या शुभ फल लेकर आ रही है। लेकिन कहा जाता है कि अमावस्या के दिन नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बहुत ज्यादा होता है। इसलिए इस दिन पूजा, जप-तप करना बहुत ही शुभ माना जाता है। ज्योतिषाचार्यों की मानें तो इस दिन कुछ काम ऐसे हैं जिन्हें नहीं करना चाहिए वरना अशुभ फल मिल सकता है। आगे जानिए...
मौनी अमावस्या के दिन सुबह देर तक नहीं सोना चाहिए। जल्दी उठकर पूजा पाठ करना चाहिए। अमावस्या की रात श्मशान घाट या उसके आस-पास नहीं घूमना चाहिए। इस दिन सुबह जल्दी उठें और मौन रहते हुए पानी में काले तिल डालकर स्नान करें। यह शुभ होता है।
इस दिन स्त्री और पुरुष को शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिए। मौनी अमावस्या पर यौन संबंध बनाने से पैदा होने वाली संतान को जीवन में कई तरह के कष्टों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए इन चीजों से जितना हो सके बचना चाहिए।
मौनी अमावस्या का दिन देवता और पितरों का माना जाता है। इसलिए इस दिन पितरों को खुश करने के लिए जहां तक हो सके अपने गुस्से पर काबू रखें। किसी से बिना वजह गाली गलौज मारपीट न करें। शांत रहकर भगवान का नाम लें।
इस दिन गरीब या जरूरतमंद इंसान को दान करना और उनकी मदद करना शुभ होता है। इसलिए कोई भी ऐसा इंसान दिखे तो उनका अपमान न करें। साथ ही घर के बड़े बुजुर्गों का अपमान भी न करें। ऐसा करने से शनिदेव नाराज हो जाते हैं।

कहा जाता है कि इस दिन बरगद, मेहंदी और पीपल के पेड़ के नीचे जाने से बचना चाहिए। मान्यता है कि इस दिनों पेड़ों पर आत्माओं का वास रहता है और अमावस्या के दिन वो और भी शक्तिशाली हो जाती हैं। इसलिए ऐसे पेड़ों के नीचे न जाएं।

रविवार, 27 जनवरी 2019

पीपल पूजन से पहले रखें सावधानी

पीपल पूजन से पहले रखें सावधानी, अनजाने में पाप के भागीदार तो नहीं बन रहे?
हमारे शास्त्रों के अनुसार कल्पवृक्ष के नीचे खड़े होकर जिस वस्तु की भी कामना की जाती है वह अवश्य पूरी हो जाती है। कलियुग में लोगों के लिए कल्पवृक्ष तो सुलभ नहीं है परंतु सर्वदेवमय वृक्ष पीपल (अश्वत्थ) पर सच्चे भाव से संकल्प लेकर नियमित रूप से जल चढ़ाने, पूजा एवं अर्चना करने से मनुष्य वह सब कुछ सरलता से पा सकता है जिसे पाने की उसकी इच्छा हो।
इसीलिए पीपल को कलियुग का कल्पवृक्ष माना जाता है। पीपल एकमात्र पवित्र देववृक्ष है जिसमें सभी देवताओं के साथ ही पितरों का भी वास रहता है।

श्रीमद्भगवदगीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि ‘अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणाम, मूलतो ब्रहमरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे, अग्रत: शिवरूपाय अश्वत्थाय नमो नम:’ अर्थात मैं वृक्षों में पीपल हूं।

पीपल के मूल में ब्रह्मा जी, मध्य में विष्णु जी तथा अग्र भाग में भगवान शिव जी साक्षात रूप से विराजित हैं। स्कंदपुराण के अनुसार पीपल के मूल में विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में भगवान श्री हरि और फलों में सभी देवताओं का वास है।
भारतीय जन जीवन में वनस्पतियों और वृक्षों में भी देवत्व की अवधारणा की गई है और धार्मिक दृष्टि से पीपल को देवता मान कर पूजन किया जाता है। किसी भी धार्मिक कार्य को पूर्ण करने के लिए पीपल पर जल चढ़ाने की परम्परा है क्योंकि पूजन के समय सभी देवताओं की पूजा पीपल पर जल चढ़ाने से ही पूर्ण होती है और हवन यज्ञ के माध्यम से वनस्पतियों को प्रफुल्लित करने की कामना भी की जाती है। पीपल को जल से सींचने से सभी पापों का जहां नाश हो जाता है वहीं पितर भी प्रसन्न होकर जीव पर कृपा करते हैं।

वैज्ञानिक दृष्टि से पीपल : विश्व भर के सभी वृक्ष दिन में आक्सीजन छोड़ते हैं तथा कार्बनडाइआक्साईड ग्रहण करते हैं और रात को सभी वृक्ष कार्बन-डाइआक्साईड छोड़ते हैं तथा आक्सीजन लेते हैं, इसी कारण यह धारणा है कि रात को कभी भी पेड़ों के निकट नहीं सोना चाहिए।
वैज्ञानिकों के अनुसार पीपल का पेड़ ही एकमात्र ऐसा वृक्ष है जो कभी कार्बन डाईआक्साइड नहीं छोड़ता वह रात दिन के 24 घंटों में सदा ही आक्सीजन छोड़ता है इसलिए यह मानव उपकारी वृक्ष है।

क्या है पुण्यफल : पीपल के पेड़ का सिंचन, पूजन और परिक्रमा करने से जहां जीव की सभी कामनाओं की पूर्ति होती है वहीं शत्रुओं का नाश भी होता है। यह सुख सम्पत्ति, धन-धान्य, ऐश्वर्य, संतान सुख तथा सौभाग्य प्रदान करने वाला है। इसकी पूजा करने से ग्रह पीड़ा, पितरदोष, काल सर्प योग, विष योग तथा अन्य ग्रहों से उत्पन्न दोषों का निवारण हो जाता है।

अमावस्या और शनिवार को पीपल के पेड़ के नीचे हनुमान जी की पूजा-अर्चना करते हुए हनुमान चालीसा का पाठ करने से कष्ट निवृत्ति होती है। प्रात: काल नियम से पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर जप, तप एवं प्रभु नाम का सिमरण करने से जीव को शारीरिक एवं मानसिक लाभ प्राप्त होता है।
पीपल के पेड़ के नीचे वैसे तो प्रतिदिन सरसों के तेल का दीपक जलाना उत्तम कर्म है परंतु यदि किसी कारणवश ऐसा संभव न हो तो शनिवार की रात को पीपल की जड़ के पास दीपक जरूर जलाएं क्योंकि इससे घर में सुख समृद्धि और खुशहाली आती है, कारोबार में सफलता मिलती है, रुके हुए काम बनने लगते हैं।

तांबे के लोटे में जल भरकर भगवान विष्णु जी के अष्टभुज रूप का स्मरण करते हुए पीपल की जड़ में जल चढ़ाना चाहिए। वृक्ष की पांच परिक्रमाएं नियम से करनी चाहिएं। जो लोग पीपल के वृक्ष का रोपण करते हैं उनके पितृ नरक से छूटकर मोक्ष को प्राप्त करते हैं।
क्या न करें :  शास्त्रानुसार शनिवार को पीपल पर लक्ष्मी जी का वास माना जाता है तथा उस दिन जल चढ़ाना जहां श्रेष्ठ है वहीं रविवार को पीपल पर जल चढ़ाना निषेध है। शास्त्रों के अनुसार रविवार को पीपल पर जल चढ़ाने से जीव दरिद्रता को प्राप्त करते हैं।

पीपल के वृक्ष को कभी काटना नहीं चाहिए। ऐसा करने से पितरों को कष्ट मिलते हैं तथा वंशवृद्धि की हानि होती है। किसी विशेष प्रयोजन से विधिवत नियमानुसार पूजन करने तथा यज्ञादि पवित्र कार्यों के लक्ष्य से पीपल की लकड़ी काटने पर दोष नहीं लगता।

शुक्रवार, 25 जनवरी 2019

हिदु धर्म और पीपल

!!! हिदु धर्म और पीपल !!!


पीपल को वृक्षों का राजा कहते है। इसकी वंदना में एक श्लोक देखिए:-

मूलम् ब्रह्मा, त्वचा विष्णु,
सखा शंकरमेवच ।
पत्रे-पत्रेका सर्वदेवानाम,
वृक्षराज नमोस्तुते ।।

हिदु धर्म में पीपल के पेड़ का बहुत महत्व माना गया है। शास्त्रों के अनुसार इस वृक्ष में सभी देवी-देवताओं और हमारे पितरों का वास भी माना गया है।

पीपल वस्तुत: भगवान विष्णु का जीवन्त और पूर्णत:मूर्तिमान स्वरूप ही है। भगवान श्रीकृष्ण ने भी कहा है की वृक्षों में मैं पीपल हूँ।

पुराणो में उल्लेखित है कि,

मूलतः ब्रह्म रूपाय मध्यतो विष्णु रुपिणः।
अग्रतः शिव रुपाय अश्वत्त्थाय नमो नमः।।

अर्थात्, इसके मूल में भगवान ब्रह्म, मध्य में भगवान श्री विष्णु तथा अग्रभाग में भगवान शिव का वास होता है।

शास्त्रों के अनुसार पीपल की विधि पूर्वक पूजा-अर्चना करने से समस्त देवता स्वयं ही पूजित हो जाते हैं।

कहते है पीपल से बड़ा मित्र कोई भी नहीं है, जब आपके सभी रास्ते बंद हो जाएँ, आप चारो ओर से अपने को परेशानियों से घिरा हुआ समझे, आपकी परछांई भी आपका साथ ना दे, हर काम बिगड़ रहे हो तो,

आप पीपल के शरण में चले जाएँ, उनकी पूजा अर्चना करे , उनसे मदद की याचना करें, नि:संदेह कुछ ही समय में आपके घोर से घोर कष्ट दूर जो जायेंगे।

धर्म शास्त्रों के अनुसार हर व्यक्ति को जीवन में पीपल का पेड़ अवश्य ही लगाना चाहिए । पीपल का पौधा लगाने वाले व्यक्ति को जीवन में किसी भी प्रकार संकट नहीं रहता है।

पीपल का पौधा लगाने के बाद उसे रविवार को छोड़कर नियमित रूप से जल भी अवश्य ही अर्पित करना चाहिए।

जैसे-जैसे यह वृक्ष बढ़ेगा आपके घर में सुख-समृद्धि भी बढ़ती जाएगी।  पीपल का पेड़ लगाने के बाद बड़े होने तक इसका पूरा ध्यान भी अवश्य ही रखना चाहिए, लेकिन ध्यान रहे कि, पीपल को आप अपने घर से दूर लगाएं, घर पर पीपल की छाया भी नहीं पड़नी चाहिए।

मान्यता है कि, यदि कोई व्यक्ति पीपल के वृक्ष के नीचे शिवलिंग स्थापित करता है तो उसके जीवन से बड़ी से बड़ी परेशानियां भी दूर हो जाती है।

पीपल के नीचे शिवलिंग स्थापित करके उसकी नित्य पूजा भी अवश्य ही करनी चाहिए। इस उपाय से जातक को सभी भौतिक सुख सुविधाओं की प्राप्ति होती है।

सावन मास की अमवस्या की समाप्ति और सावन के सभी शनिवार को पीपल की विधि पूर्वक पूजा करके इसके नीचे भगवान हनुमान जी की पूजा अर्चना / आराधना करने से घोर से घोर संकट भी दूर हो जाते है।

यदि पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर रविवार को छोड़कर नित्य हनुमान चालीसा का पाठ किया जाए तो यह चमत्कारी फल प्रदान करने वाला उपाय है।

पीपल के नीचे बैठकर पीपल के ११ पत्ते तोड़ें और उन पर चन्दन से भगवान श्रीराम का नाम लिखें। फिर इन पत्तों की माला बनाकर उसे प्रभु हनुमानजी को अर्पित करें, सारे संकटो से रक्षा होगी।

*** पीपल के चमत्कारी उपाय !

शास्त्रानुसार प्रत्येक पूर्णिमा पर प्रातः १० बजे पीपल वृक्ष पर मां लक्ष्मी का फेरा लगता है।

इसलिए जो व्यक्ति आर्थिक रूप से मजबूत होना चाहते है वो, इस समय पीपल के वृक्ष पर फल, फूल, मिष्ठान चढ़ाते हुए धूप अगरबती जलाकर मां लक्ष्मी की उपासना करें, और माता लक्ष्मी के किसी भी मंत्र की एक माला भी जपे ।

इससे जातक को अपने किये गए कार्यों के सर्वश्रेष्ठ फल मिलते है और वह धीरे धीरे आर्थिक रूप से सक्षम हो जाता है ।

पीपल को विष्णु भगवान से वरदान प्राप्त है कि, जो व्यक्ति शनिवार को पीपल की पूजा करेगा, उस पर लक्ष्मी की अपार कृपा रहेगी और उसके घर का ऐश्वर्य कभी नष्ट नहीं होगा।

व्यापार में वृद्धि हेतु प्रत्येक शनिवार को एक पीपल का पत्ता लेकर उस पर चन्दन से स्वस्तिक बना कर उसे अपने व्यापारिक स्थल की अपनी गद्दी / बैठने के स्थान के नीचे रखे । इसे हर शनिवार को बदल कर अलग रखते रहे ।

ऐसा ७ शनिवार तक लगातार करें फिर ८ वें शनिवार को इन सभी पत्तों को किसी सुनसान जगह पर डाल दें और मन ही मन अपनी आर्थिक समृद्धि के लिए प्रार्थना करते रहे, शीघ्र पीपल की कृपा से आपके व्यापार में बरकत होनी शुरू हो जाएगी ।

जो मनुष्य पीपल के वृक्ष को देखकर प्रणाम करता है, उसकी आयु बढ़ती है | जो इसके नीचे बैठकर धर्म-कर्म करता है, उसका कार्य पूर्ण हो जाता है।

*** पीपल के वृक्ष को काटना !

जो मूर्ख मनुष्य पीपल के वृक्ष को काटता है, उसे इससे होने वाले पाप से छूटने का कोई उपाय नहीं है। (पद्म पुराण, खंड ७ अ १२)

हर रविवार पीपल के नीचे देवताओं का वास न होकर दरिद्रा का वास होता है। अत: इस दिन पीपल की पूजा वर्जित मानी जाती है

यदि पीपल के वृक्ष को काटना बहुत जरूरी हो तो उसे रविवार को ही काटा जा सकता है।

*** शनि दोष में पीपल !

शनि की साढ़ेसाती और ढय्या के बुरे प्रभावों को दूर कर, शुभ प्रभावों को प्राप्त करने के लिए हर जातक को प्रति शनिवार को पीपल की पूजा करना श्रेष्ठ उपाय है।

यदि रोज (रविवार को छोड़कर) पीपल पर पश्चिममुखी होकर जल चढ़ाया जाए तो शनि दोष की शांति होती है l

शनिवार की सुबह गुड़, मिश्रित जल चढ़ाकर, धूप अगरबत्ती जलाकर उसकी सात परिक्रमा करनी चाहिए, एवं संध्या के समय पीपल के वृक्ष के नीचे कड़वे तेल का दीपक भी अवश्य ही जलाना चाहिए। इस नियम का पालन करने से पीपल की अदृश्य शक्तियां उस जातक की सदैव मदद करती है।

ब्रह्म पुराण' के ११८ वें अध्याय में शनिदेव कहते हैं-

'मेरे दिन अर्थात् शनिवार को जो मनुष्य नियमित रूप से पीपल के वृक्ष का स्पर्श करेंगे, उनके सब कार्य सिद्ध होंगे तथा  उन्हें ग्रहजन्य पीड़ा नहीं होगी।'

शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष का दोनों हाथों से स्पर्श करते हुए 'ॐ नमः शिवाय।' का १०८ बार जप करने से दुःख, कठिनाई एवं ग्रहदोषों का प्रभाव शांत हो जाता है।

हर शनिवार को पीपल की जड़ में जल चढ़ाने और दीपक जलाने से अनेक प्रकार के कष्टों का निवारण होता है ।

*** ग्रहों के दोषों में पीपल !

ज्योतिष शास्त्र में पीपल से जुड़े हुए कई आसान किन्तु अचूक उपाय बताए गए हैं, जो हमारे समस्त ग्रहों के दोषों को दूर करते हैं। जो किसी भी राशि के लोग आसानी से कर सकते हैं। इन उपायों को करने के लिए हमको अपनी किसी ज्योतिष से कुंडली का अध्ययन करवाने की भी आवश्यकता नहीं है।

पीपल का पेड़ रोपने और उसकी सेवा करने से पितृ दोष में कमी होती है । शास्त्रों के अनुसार पीपल के पेड़ की सेवा मात्र से ही न केवल पितृ दोष वरन जीवन के सभी परेशानियाँ स्वत: कम होती जाती है

पीपल में प्रतिदिन (रविवार को छोड़कर) जल अर्पित करने से कुंडली के समस्त अशुभ ग्रह योगों का प्रभाव समाप्त हो जाता है। पीपल की परिक्रमा से कालसर्प जैसे ग्रह योग के बुरे प्रभावों से भी छुटकारा मिल जाता है। (पद्म पुराण)

*** असाध्य रोगो में पीपल !

पीपल की सेवा से असाध्य से असाध्य रोगो में भी चमत्कारी लाभ होता देखा गया है ।

यदि कोई व्यक्ति किसी भी रोग से ग्रसित है, वह नित्य पीपल की सेवा करके अपने बाएं हाथ से उसकी जड़ छूकर उनसे अपने रोगो को दूर करने की प्रार्थना करें तो जातक के रोग शीघ्र ही दूर होते है। उस पर दवाइयों का जल्दी / तेज असर होता है ।

यदि किसी बीमार व्यक्ति का रोग ठीक ना हो रहा हो तो उसके तकिये के नीचे पीपल की जड़ रखने से बीमारी जल्दी ठीक होती है ।

नि:संतान दंपती संतान प्राप्ति हेतु पीपल के एक पत्ते को प्रतिदिन सुबह लगभग एक घंटे पानी में रखे, बाद में उस पत्ते को पानी से निकालकर किसी पेड़ के नीचे रख दें और पति पत्नी उस जल का सेवन करें तो शीघ्र संतान प्राप्त होती है ।

ऐसा लगभग २-३ माह तक लगातार करना चाहिए |

                              

गुरुवार, 24 जनवरी 2019

नरक

गरुड़ पुराण में वर्णन है 36 नर्क का, जानिए किसमें कैसे दी जाती है सजा
हिंदू धर्म ग्रंथों में लिखी अनेक कथाओं में स्वर्ग और नर्क के बारे में बताया गया है। पुराणों के अनुसार स्वर्ग वह स्थान होता है जहां देवता रहते हैं और अच्छे कर्म करने वाले इंसान की आत्मा को भी वहां स्थान मिलता है, इसके विपरीत बुरे काम करने वाले लोगों को नर्क भेजा जाता है, जहां उन्हें सजा के तौर पर गर्म तेल में तला जाता है और अंगारों पर सुलाया जाता है।
यह भी पढ़े- गरुड़ पुराण- इन 5 कामों से कम होती है उम्र
हिंदू धर्म के पौराणिक ग्रंथों में 36 तरह के मुख्य नर्कों का वर्णन किया गया है। अलग-अलग कर्मों के लिए इन नर्कों में सजा का प्रावधान भी माना गया है। गरूड़ पुराण, अग्रिपुराण, कठोपनिषद जैसे प्रामाणिक ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। आज हम आपको उन नर्कों के बारे में संक्षिप्त रूप से बता रहे हैं-
1. महावीचि- यह नर्क पूरी तरह रक्त यानी खून से भरा है और इसमें लोहे के बड़े-बड़े कांटे हैं। जो लोग गाय की हत्या करते हैं, उन्हें इस नर्क में यातना भुगतनी पड़ती है।
2. कुंभीपाक- इस नर्क की जमीन गरम बालू और अंगारों से भरी है। जो लोग किसी की भूमि हड़पते हैं या ब्राह्मण की हत्या करते हैं। उन्हें इस नर्क में आना पड़ता है।
3. रौरव- यहां लोहे के जलते हुए तीर होते हैं। जो लोग झूठी गवाही देते हैं उन्हें इन तीरों से बींधा जाता है।
4. मंजूष- यह जलते हुए लोहे जैसी धरती वाला नर्क है। यहां उनको सजा मिलती है, जो दूसरों को निरपराध बंदी बनाते हैं या कैद में रखते हैं।
5. अप्रतिष्ठ- यह पीब, मूत्र और उल्टी से भरा नर्क है। यहां वे लोग यातना पाते हैं, जो ब्राह्मणों को पीड़ा देते हैं या सताते हैं।
6. विलेपक- यह लाख की आग से जलने वाला नर्क है। यहां उन ब्राह्मणों को जलाया जाता है, जो शराब पीते हैं।
7. महाप्रभ- इस नर्क में एक बहुत बड़ा लोहे का नुकीला तीर है। जो लोग पति-पत्नी में फूट डालते हैं, पति-पत्नी के रिश्ते तुड़वाते हैं वे यहां इस तीर में पिरोए जाते हैं।
8. जयंती- यहां जीवात्माओं को लोहे की बड़ी चट्टान के नीचे दबाकर सजा दी जाती है। जो लोग पराई औरतों के साथ संभोग करते हैं, वे यहां लाए जाते हैं।
9. शाल्मलि- यह जलते हुए कांटों से भरा नर्क है। जो औरत कई पुरुषों से संभोग करती है व जो व्यक्ति हमेशा झूठ व कड़वा बोलता है, दूसरों के धन और स्त्री पर नजर डालता है। पुत्रवधू, पुत्री, बहन आदि से शारीरिक संबंध बनाता है व वृद्ध की हत्या करता है, ऐसे लोगों को यहां लाया जाता है।
10. महारौरव- इस नर्क में चारों तरफ आग ही आग होती है। जैसे किसी भट्टी में होती है। जो लोग दूसरों के घर, खेत, खलिहान या गोदाम में आग लगाते हैं, उन्हें यहां जलाया जाता है।
11. तामिस्र- इस नर्क में लोहे की पट्टियों और मुग्दरों से पिटाई की जाती है। यहां चोरों को यातना मिलती है।
12. महातामिस्र- इस नर्क में जौंके भरी हुई हैं, जो इंसान का रक्त चूसती हैं। माता, पिता और मित्र की हत्या करने वाले को इस नर्क में जाना पड़ता है।
13. असिपत्रवन- यह नर्क एक जंगल की तरह है, जिसके पेड़ों पर पत्तों की जगह तीखी तलवारें और खड्ग हैं। मित्रों से दगा करने वाला इंसान इस नर्क में गिराया जाता है।
14. करम्भ बालुका- यह नर्क एक कुएं की तरह है, जिसमें गर्म बालू रेत और अंगारे भरे हुए हैं। जो लोग दूसरे जीवों को जलाते हैं, वे इस कुएं में गिराए जाते हैं।
15. काकोल- यह पीब और कीड़ों से भरा नर्क है। जो लोग छुप-छुप कर अकेले ही मिठाई खाते हैं, दूसरों को नहीं देते, वे इस नर्क में लाए जाते हैं।
16. कुड्मल- यह मूत्र, पीब और विष्ठा (उल्टी) से भरा है। जो लोग दैनिक जीवन में पंचयज्ञों ( ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ, पितृयज्ञ, मनुष्य यज्ञ) का अनुष्ठान नहीं करते वे इस नर्क में आते हैं।
17. महाभीम- यह नर्क बदबूदार मांस और रक्त से भरा है। जो लोग ऐसी चीजें खाते हैं, जिनका शास्त्रों ने निषेध बताया है, वो लोग इस नर्क में गिरते हैं।
18. महावट- इस नर्क में मुर्दे और कीड़े भरे हैं, जो लोग अपनी लड़कियों को बेचते हैं, वे यहां लाए जाते हैं।
19. तिलपाक- यहां दूसरों को सताने, पीड़ा देने वाले लोगों को तिल की तरह पेरा जाता है। जैसे तिल का तेल निकाला जाता है, ठीक उसी तरह।
20. तैलपाक- इस नर्क में खौलता हुआ तेल भरा है। जो लोग मित्रों या शरणागतों की हत्या करते हैं, वे यहां इस तेल में तले जाते हैं।
21. वज्रकपाट- यहां वज्रों की पूरी श्रंखला बनी है। जो लोग दूध बेचने का व्यवसाय करते हैं, वे यहां प्रताड़ना पाते हैं।
22. निरुच्छवास- इस नर्क में अंधेरा है, यहां वायु नहीं होती। जो लोग दिए जा रहे दान में विघ्न डालते हैं वे यहां फेंके जाते हैं।
23. अंगारोपच्य- यह नर्क अंगारों से भरा है। जो लोग दान देने का वादा करके भी दान देने से मुकर जाते हैं। वे यहां जलाए जाते हैं।
24. महापायी- यह नर्क हर तरह की गंदगी से भरा है। हमेशा असत्य बोलने वाले यहां औंधे मुंह गिराए जाते हैं।
25. महाज्वाल- इस नर्क में हर तरफ आग है। जो लोग हमेशा ही पाप में लगे रहते हैं वे इसमें जलाए जाते हैं।
26. गुड़पाक- यहां चारों ओर गरम गुड़ के कुंड हैं। जो लोग समाज में वर्ण संकरता फैलाते हैं, वे इस गुड़ में पकाए जाते हैं।
27. क्रकच- इस नर्क में तीखे आरे लगे हैं। जो लोग ऐसी महिलाओं से संभोग करते हैं, जिसके लिए शास्त्रों ने निषेध किया है, वे लोग इन्हीं आरों से चीरे जाते हैं।
28. क्षुरधार- यह नर्क तीखे उस्तरों से भरा है। ब्राह्मणों की भूमि हड़पने वाले यहां काटे जाते हैं।
29. अम्बरीष- यहां प्रलय अग्रि के समान आग जलती है। जो लोग सोने की चोरी करते हैं, वे इस आग में जलाए जाते हैं।
30. वज्रकुठार- यह नर्क वज्रों से भरा है। जो लोग पेड़ काटते हैं वे यहां लंबे समय तक वज्रों से पीटे जाते हैं।
31. परिताप- यह नर्क भी आग से जल रहा है। जो लोग दूसरों को जहर देते हैं या मधु (शहद) की चोरी करते हैं, वे यहां जलाए जाते हैं।
32. काल सूत्र- यह वज्र के समान सूत से बना है। जो लोग दूसरों की खेती नष्ट करते हैं। वे यहां सजा पाते हैं।
33. कश्मल- यह नर्क नाक और मुंह की गंदगी से भरा होता है। जो लोग मांसाहार में ज्यादा रुचि रखते हैं, वे यहां गिराए जाते हैं।
34. उग्रगंध- यह लार, मूत्र, विष्ठा और अन्य गंदगियों से भरा नर्क है। जो लोग पितरों को पिंडदान नहीं करते, वे यहां लाए जाते हैं।
35. दुर्धर- यह नर्क जौक और बिच्छुओं से भरा है। सूदखोर और ब्याज का धंधा करने वाले इस नर्क में भेजे जाते हैं।
36. वज्रमहापीड- यहां लोहे के भारी वज्र से मारा जाता है। जो लोग सोने की चोरी करते हैं, किसी प्राणी की हत्या कर उसे खाते हैं, दूसरों के आसन, शय्या और वस्त्र चुराते हैं, जो दूसरों के फल चुराते हैं, धर्म को नहीं मानते ऐसे सारे लोग यहां लाए जाते हैं।
नमः शिवाय

बुधवार, 23 जनवरी 2019

माघ स्नान का महत्व

.                       "माघ स्नान माहात्म्य"


          'पद्म पुराण' के उत्तर खण्ड में माघ मास के माहात्म्य का वर्णन करते हुए कहा गया है कि व्रत, दान व तपस्या से भी भगवान श्रीहरि को उतनी प्रसन्नता नहीं होती, जितनी माघ मास में ब्राह्ममुहूर्त में उठकर स्नानमात्र से होती है।

               व्रतैर्दानस्तपोभिश्च  न  तथा  प्रीयते  हरिः।
               माघमज्जनमात्रेण यथा प्रीणाति केशवः।।

          अतः सभी पापों से मुक्ति व भगवान की प्रीति प्राप्त करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को माघ-स्नान व्रत करना चाहिए। इसका प्रारम्भ पौष की पूर्णिमा से होता है।
          माघ मास की ऐसी विशेषता है कि इसमें जहाँ कहीं भी जल हो, वह गंगाजल के समान होता है। इस मास की प्रत्येक तिथि पर्व हैं। कदाचित् अशक्तावस्था में पूरे मास का नियम न ले सकें तो शास्त्रों ने यह भी व्यवस्था की है तीन दिन अथवा एक दिन अवश्य माघ-स्नान व्रत का पालन करें। इस मास में स्नान, दान, उपवास और भगवत्पूजा अत्यन्त फलदायी है।
          माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी 'षटतिला एकादशी' के नाम से जानी जाती है। इस दिन काले तिल तथा काली गाय के दान का भी बड़ा माहात्म्य है।
1. तिल मिश्रित जल से स्नान, 2. तिल का उबटन, 3. तिल से हवन, 4. तिलमिश्रित जल का पान व तर्पण, 5. तिलमिश्रित भोजन, 6. तिल का दान। ये छः कर्म पाप का नाश करने वाले हैं।
          माघ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या 'मौनी अमावस्या' के रूप में प्रसिद्ध है। इस पवित्र तिथि पर मौन रहकर अथवा मुनियों के समान आचरणपूर्वक स्नान दान करने का विशेष महत्त्व है।
          अमावस्या के दिन (04 फरवरी) सोमवार का योग होने पर उस दिन देवताओं को भी दुर्लभ हो ऐसा पुण्यकाल होता है, क्योंकि गंगा, पुष्कर एवं दिव्य अंतरिक्ष और भूमि के जो सब तीर्थ हैं, वे 'सोमवती (दर्श) अमावस्या' के दिन के जप, ध्यान, पूजन करने पर विशेष धर्मलाभ प्रदान करते हैं।
          मंगलवारी चतुर्थी, रविवारी सप्तमी, बुधवारी अष्टमी, सोमवारी अमावस्या, ये चार तिथियाँ सूर्यग्रहण के बराबर कही गयी हैं। इनमें किया गया स्नान, दान व श्राद्ध अक्षय होता है।
          माघ शुक्ल पंचमी अर्थात् 'वसंत पंचमी' को माँ सरस्वती का आविर्भाव-दिवस माना जाता है। इस दिन (10 फरवरी) प्रातः सरस्वती-पूजन करना चाहिए। पुस्तक और लेखनी (कलम) में भी देवी सरस्वती का निवास स्थान माना जाता है, अतः उनकी भी पूजा की जाती है।
          शुक्ल पक्ष की सप्तमी को 'अचला सप्तमी' कहते हैं। षष्ठी के दिन एक बार भोजन करके सप्तमी (12 फऱवरी) को सूर्योदय से पूर्व स्नान करने से पापनाश, रूप, सुख-सौभाग्य और सदगति प्राप्त होती है।
          ऐसे तो माघ की प्रत्येक तिथि पुण्यपर्व है, तथापि उनमें भी माघी पूर्णिमा का धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्त्व है। इस दिन (19 फरवरी) स्नानादि से निवृत्त होकर भगवत्पूजन, श्राद्ध तथा दान करने का विशेष फल है। जो इस दिन भगवान शिव की विधिपूर्वक पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल पाकर भगवान विष्णु के लोक में प्रतिष्ठित होता है।
          माघी पूर्णिमा के दिन तिल, सूती कपड़े, कम्बल, रत्न, पगड़ी, जूते आदि का अपने वैभव के अनुसार दान करके मनुष्य स्वर्गलोक में सुखी होता है। 'मत्स्य पुराण' के अनुसार इस दिन जो व्यक्ति 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' का दान करता है, उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है

यज्ञ - पात्र

यज्ञ-पात्र

(श्री पं. दौलत राम जी गौड़, वेदाचार्य, बनारस)
श्रौत-स्मार्त यज्ञों में विविध प्रयोजनों के लिये विभिन्न यज्ञ पात्रों की आवश्यकता होती है। जिस प्रकार कुँड मंडप आदि को विधि पूर्वक निर्धारित माप के अनुसार बनाया जाता है, उसी प्रकार इन यज्ञ पात्रों को निश्चित वृक्षों के काष्ठ से, निर्धारित माप एवं आकार का बनाया जाता है। विधि पूर्वक बने यज्ञ पात्रों का होना यज्ञ की सफलता के लिये आवश्यक है। नीचे कुछ यज्ञ पात्रों का परिचय दिया जा रहा है। इनका उपयोग विभिन्न यज्ञों में, विभिन्न शाखाओं एवं सूत्र-ग्रन्थों के आधार पर दिया जाता है।

1.अन्तर्धानकट:—वारण काष्ठ का आधा अंगुल मोटा, बारह अंगुल का अर्द्ध चन्द्राकार पात्र। गार्हपत्य कुण्ड के ऊपर पत्नी संयाज के समय देव पत्नियों को आढ़ करने के लिए इसका उपयोग होता है।

2. पशु-रशना:—तीन मुख वाली बारह हाथ की पशु बाँधने की रस्सी।

3. मयूख:—गूलर का एक अंगुल मोटा, बारह अंगुल का वत्स-बन्धन के लिये शकु मयूख होता है।

4. वसा हवनी:—पाक भाण्ड स्थित स्नेह-वसा हवन करने का जूहू सदृश घाऊ का स्रुक।

5. वेद:—दर्शपूर्णमासादि में 50 कुशाओं से रचित वेणी सदृश कुशमुष्टि।

6. कर्पूर:—चातुर्मास्यादि यज्ञ में बड़े गर्त्तवाला धान भूँजने का पात्र।

7. अनुष्टुव्धि:—जुहू सदृश पीपल का स्रुक।

8. विष्टुति:—उद्गाता द्वारा साम मन्त्रों की गिनती के लिये, नीचे चतुरस्र ऊपर गोल, दश अंगुल की शलाका।

9. पूर्ण पात्र:—दर्शादि इष्टि में यजमान के मुख धोने के लिये जल रखने की स्मार्त प्रोक्षणी।

10. शराव:—पायस रखने के लिए मृत्तिका का बड़े मुख एवं छोटे गर्त्त वाला पात्र।

11. उशकट:—सोम को रखने के लिए वारण काष्ठ का ढाई हाथ लम्बा त्रिकोण, डेढ़ हाथ चौड़ा दो हाथ ऊँचा शकट, जिसमें एक हाथ ऊँचे दो चक्र हों।

12. परिप्लवा:—कलश से सोमरस निकालने वाला काष्ठ का बना स्रुक, दस अंगुल लंबा हंसमुख सदृश नालीदार पाँच अंगुल गोलाई में बना हुआ।

13. पशुकुम्भी:—पशु श्रवण के लिये तैजस पात्र।

14. मुसल:—खैर काष्ठ का बना, मध्य में कुछ मोटा दस अंगुल का मूसल।

15. ऋतुग्रह पात्र:—काष्मरी या पीपल का बना प्रोक्षणी पात्र जिसमें हंसमुख सदृश नलिका होती हैं।

16. आज्यस्थाली:—घृत गर्म करने का मृण्मय पात्र

17. उपवेष:—अंगारों को दूर करने के लिये वारण काष्ठ का बना हाथ के सदृश पाँच अँगुल बना हुआ दण्ड।

18. स्थाली:—सोमरस रखने की सरामयी थाली।

19. इडापात्री:— ब्रह्मा, होता, अध्वर्यु, अग्नीत् और यजमान के भाग रखा जाने वाला पात्र।

20. मेक्षण:—चरू इष्टि में इससे चरू का ग्रहण और होम होता है।

21. पृषदाज्य ग्रहणी:—पीपल का स्रुक, जिससे दधि मिश्रित घी ग्रहण किया जाता है।

22. प्रचरणी:—सोम यान में वैकंगत काष्ठ का बना जुहू सदृश स्रुक जिसका होम करने में उपयोग होता है।

23. परशु:—खदिर काष्ठ का बना हुआ परशु।

24. अग्निहोत्र हवणी:—श्रौत अग्निहोत्र में वंक काष्ठ का बना, जुहू के सदृश बाहुमात्र लंबा स्रुक।

25. अभ्रि:—वारण काष्ठ की बनी नुकीली अभ्रि का वेदी खनन में उपयोग होता है।

26. दोहन पात्र:—वैकंकत का प्रणाली रहित सदंड प्रोक्षणी पात्र सदृश आकार होता है।

27. दर्वी:—दंड सहित कलछी ही दर्वी है।

28. अधिषवण-फलक:—वारण काष्ठ के बने सोमलता कूटने का एक हाथ लम्बा, बारह अंगुल चौड़ा दो काष्ठ फलक होते हैं।

29. असिद:—कुशा काटने के लिये खैर का छुरा।

30. अन्वाहार्य पात्र:—दर्शपूर्ण-मास में, ब्रह्मा, होता, अध्वर्यु और अग्नीघ्र को दक्षिणा में दिया जाने वाला ओदन जिस पात्र में पकाया जाता है।

31—ग्रावा:- पत्थर का बना सोलह अंगुल का मूसल, जिससे सोम लता कूटी जाती है।

32—उपभृत:- पीपल की जुहू सदृश स्रुक उपभृत होती है।

33—उत्पवन पात्र:- प्रोक्षणी पात्र सदृश होता है।

34—उपाँश सवन:- उपाँश नामक सोमलता को जिस पाषाण से कूटा जाता है।

35—उलूखल:- पलास,खैर, धारण का जानु प्रमाण ऊखल।

36—एक धन:- सोमरस को बढ़ाने वाले जल।

37—मूरशल:- वारण, पलास, खैर का दश अंगुल का मूरशल।

38—जुहू:- श्रौत कर्म में जिस स्रुक से हवन किया जाता है।

39—चमस:- चौकोर प्रणीता पात्र सदृश सोमरस को रखने, होम करने, और पानी के लिये चमस होते हैं। से दस भाँति के होते हैं।

40—यजमानाभिषेकासन्दी:- वाजपेय यज्ञ में यजमान को बैठने के लिये मूञ्ज की बिनी हुई एक हाथ लम्बी चौड़ी चतुष्कोण:- लघु खाट।

41—यूपरशना:- आठ हाथ लम्बी दूनी कुश की रस्सी, यूप में लपेटने के लिये यूपरशना होती है।

42—शृतावदान:- पितृ यज्ञ में पक्व पुरोडाश तोड़ने के लिये विकंकत-काष्ठ का होता है।

43—वूते भृत:- सोम रस धारण करने वाले स्वर्ण या मृण्मय-कलश।

44—पुरोडाश पात्री:- वारण काष्ठ की पुरोडाश के स्थान में प्रयुक्त होने वाली पात्री।

45—पिन्वन:- वारण का स्रुक मुख सदृश बना बिना दंड का पात्र।

46—पान्तेजन कलश:- पशु अंगों को प्रक्षालन करने का जल जिस कलश में रखा जाता है।

47—परिशास:- कलछी मुख के सदृश महावीर पात्र को पकड़ने लायक गूलर के बने पात्र।

48—सन्नहन:- इध्म और वर्हि बाँधने के लिये कुशा की वेण्याकार गूँथी रस्सी।

49—होतृ सदन:- वरना काष्ठ की बनी होता के बैठने की पीठ।

50—सोमासन्दी:- गूलरकी बनी चार पाँवों वाली मुञ्ज की रस्सी से बीनी हुई सोम रखने के लिए बनी आसन्दी

51—सोम पर्याणहन:- वस्त्र से बन्धे सोम को ढाँकने का वस्त्र।

52—संभरणी:- वारण काष्ठ का बना सोम रखने का कटोरा।

53—शंकु:- गूलर का दश अंगुल लम्बा अग्निष्टोमादि यज्ञ में दीक्षिता पत्नी के कन्डूवनादि में उपयुक्त होने वाला।

54—उदत्रवन:- सोम याग में अम्भृण पात्रों से जल निकालने के लिये मिट्टी का पात्र (पुरवा)

55—उपयमनी:- उदुम्बर की दो हाथ लम्बी, स्रुकी के मुख से दूने मुख की, जुहू सदृश स्रुक।

56—इध्म:- पलाश की एक हाथ लम्बी, सीधी, सुन्दर त्वचा सहित,एक शाखा वाली समिधा।

57—वर्हि:- असंस्कृत तथा असंख्यात कुशा।

58—सम्भरण पात्र:- वाजपेय यज्ञ में हवन किये जाने वाले सत्रह प्रकार के अन्नों को जिस पात्र में रखा जाता है।

59—वाजिन भाण्ड:- फटे दूध के द्रव भाग (वाजिन) को जिस भाण्ड में रखा जाता है।

60—उपसर्जनी पात्र:- यजमान के लिये गार्हपत्य अग्नि में जल को इस पात्र में गर्म किया जाता है।

61—रौहिणकपाल:- मृत्तिका का वना पकाया पात्र जो रौहिणक पुरोडाश पकाने के लिये बनाया जाता है।

62—योक्त्र:- दर्शपूर्ण मासादि यज्ञ में यजमान पत्नी के कटि प्रदेश में बाँधने के लिये तीन लड़ी, मुञ्ज की बनी वेणी सदृश रस्सी।

63—उद्गात्रासन्दी:- गवामयन यज्ञ में उद्गाता बैठने के एक हाथ लम्बी चौड़ी मुञ्ज से बिनी भीढ।

64—विघन:- पीपल का एक हाथ का शंकु।

65—विकंकत शकल:- विकंकत काष्ठ की दश अँगुल समिधा।

66—दंड:- सोमयाग में यजमान तथा मैत्रावरुण के लिये मुख तक लम्बाई का गूलर का बना दंड।

67—दधि धर्म:- प्रर्ग्वयमें दस अंगुल का दधि को ग्रहण तथा हवन के लिये गूलर का बना पात्र।

68—दारुपात्री:- कात्यायनों की इड़ापात्री।

69—धवित्:- मृगचर्म से बना पंखा।

70—धृष्टि—अंगार-भस्मादि हटाने के लिये विकेकत काष्ठ का बना पात्र।

71—कृष्ण विषाणा-कृष्ण मृग का शृंग।

72—वाजिनचमस-फटे दूध के द्रव भाग को रखने का प्रणीता सदृश पात्र।

73—गलप्राही- ताँबा या पीतल की एक हाथ की संड़सी।

74—स्रुक-विकंकत काष्ठ का बना बाहु प्रमाण लंबा हवन करने का हंसमुख सदृश चोंचदार पात्र।

75—यूप-खैर का बना लंबा शंकु। इसकी लंबाई भिन्न भिन्न यज्ञों में भिन्न भिन्न रखी जाती है।

76—ग्रह-विकंकत काष्ठ का बना उलूखल सदृश सोमरस तथा होमोपयोगी वस्तु रखने का पात्र।

77—स्फ्य-अग्रवेदी को खोदने रेखा करने के लिये एक हाथ लंबा चार अँगुल चौड़ा खैर काष्ठ का वज्र-दंड।

78—स्रुक—होम करने के लिये खैर काण्ड का बना गोल छिद्र संयुक्त एक हाथ लंबा पात्र।

79—ऋतु पात्र ग्रह कार्ष्मय:—पीपल के प्रोक्षणी पात्र सदृश दोनों तरफ हंसमुख सदृश सोमरस ग्रहण करने का पात्र।

80—प्रोक्षणधानी:- जुहू के सदृश बना स्रुक।

81—शूल—वारण काष्ठ का बना, अभ्रि सदृश शूल होता है।

82—प्राशिब्रहरण:- ब्रह्मा को हुत शेव, इस चार अँगुल लम्बे चौड़े वारण काष्ठ से बने चौकोर पात्र द्वारा दिया जाता है।

83—निश्रेणी:- वाजपेय यज्ञ में सत्रह हाथ यूप से ऊपर जाने के लिये धारण काष्ठ से बनी सीढ़ी।

84—नेत्र:- सन और गौपुच्छ के बालों से बनाई गयी चार हाथ की तीन लड़ वाली गूँथी हुई वेणी।

85—निदान:—सोमयाग में गौ तथा बछड़े को बाँधने के लिये बनी रस्सी।

86—चात्र उपमन्थ:- अरणि मन्थन के लिये आठ अँगुल का बना काष्ठ शंकु।

87—वषाल:- सोमयाग में पलास का दश अँगुल लम्बा एक अँगुल गोल-आर पार छिद्र वाला पात्र विशेष।

88—शम्या:- दर्शपूर्ण मासादि में सिल लोटी के कुट्टन आदि में प्रयुक्त होने वाला पात्र विशेष।

89—षडवत्तपात्र:- अग्नीघ्र ऋत्विक् को भाग देने के लिये वारण काष्ठ का बना एक विशेष प्रकार का पात्र।

90—सगर्त्तपुरोडाशपात्री:- सर्वहुत पुरोडाश के स्थापन और होमादि में प्रयुक्त होने वाला पात्र।

91—स्वरु:- पशुलला स्पर्श एवं होमादि में प्रयुक्त होने वाला दश अँगुल का खड्गाकार पात्र।

92—स्थूण:- गौ बाँधने के लिये बनी खूँटी।

93—सोमोपनहन:- सोमलता बाँधे जाने वाले दौहरे चौहरे वस्त्र।

94—दृषत उपला:- पुरोडाश के पोषण में प्रयुक्त होने वाले दश अँगुल लम्बे आठ अँगुल चौड़े पाषाण।

95—करम्भ पात्री:- दक्षिणाग्नि में पक्व सत्तु तथा दधि रखने का छोटे छोटे गोल पात्र।

96—पञ्चविलापात्री:- कृष्ण यजुर्वेदियों के काम आने वाला पात्र विशेष।

97—पिशीलक:- चातुर्मासान्तर्गत गृहमेधि में उपयोग होने वाला पायस रखने का धातु का बड़े मुख वाला पात्र।

98—परिवेचन घट:- आपस्तम्ब के लिये आधवनीय सदृश कलश।

99—त्रिविला पात्री:- वारण काष्ठ से बना एक विशिष्ट भाँति का बना पात्र।

100—दशा पवित्र:- जीवित भेड़ के ऊनों से बना सोमरस छानने के लिये बना हुआ छन्ना।

101—कूर्च:- सायं-प्रातः अग्निहोत्र के समय स्रुक रखने का वारण काष्ठ से बना पात्र विशेष।

102—ओबिली:- मन्थन दण्ड को दबाने के लिये खैर काष्ठ का बना उपमन्थ।

103-समित्:—पलासादि की दश अँगुल लम्बी सुन्दर अविशाखा लकड़ी।

104-महावीर:—सोमयाग में दीपक रखने के लिये मृत्तिका से बना एक विशिष्ट पात्र।

105—मेखला-यजमान के कटि प्रदेश में बाँधने के लिये चार हाथ की मुञ्ज से वेणी सदृश गुँथी रस्सी।

106—तानूनस्र चमस:- इष्टि के अनन्तर सोलहों ऋत्विक् जिस घृत का स्पर्श कर परस्पर अद्रोह की शपथ लेते हैं उस घी को रखने का पात्र।

107—धर्मासन्दी:- धर्म सम्बन्धी सभी पात्रों को रखने के लिये तीन हाथ ऊँचा गूलर का बना आसन विशेष।

108-ध्रवा—करण काष्ठ का बना जुहू के सदृश बाहुप्रमाण स्रुक, जो यज्ञ के अन्त तक रखी जाती है।

पितृपक्ष में परान्न से बचें

 गरुड़ पुराणोक्त पितृपक्ष परान्न निषेध कथा सनातन धर्म में 16 दिनों का पितृपक्ष वर्ष का सबसे सूक्ष्म और संवेदनशील समय माना गया है। गरुड़ पुरा...