रविवार, 10 मार्च 2019

रुद्राक्ष की सम्पूर्ण जानकारी

🌹🌹🌹🌹*रुद्राक्ष की सम्पूर्ण जानकारी*🚩

रुद्राक्ष एक फल के अंदर निकलने वाला बीज है जिसका पेड़ पहाड़ी क्षत्रों में पाया जाता है
धार्मिक मान्यता के अनुसार जब भगवान शिव ने कठोर तपस्या के बाद अपने नेत्र खोले तो  उनकी आँखों से कुछ आंसू पृथ्वी पर आ गिरे जिनसे रुद्राक्ष के पेड़ की उत्त्पत्ति हुई |

रुद्राक्ष = रूद्र + अक्ष , इन दो शब्दों से मिलकर बना यह शब्द ‘ रुद्राक्ष ‘ भगवान शिव का प्रतीक माना जाता है |  जिसमें रूद्र-  भगवान शिव का ही नाम है और अक्ष का अर्थ आंसू से है | इस प्रकार रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के आंसुओ से हुई
रुद्राक्ष  को धारण करने वाले  व्यक्ति भगवान शिव को प्रिय होते है।

 *रुद्राक्ष कहां पाऐ जाते है*🚩

रुद्राक्ष का पेड़ भारत में हिमालय क्षेत्र में और असम व उत्तरांचल के जंगलो में पाए जाते है
 इसके साथ -साथ नेपाल , मलेशिया और इंडोनेशिया में काफी मात्रा में पायें जाते है
नेपाल और इंडोनेशिया से रुद्राक्ष सबसे अधिक मात्रा मे निर्यात भारत में होता है |

*रुद्राक्ष कितने प्रकार के होते है*🚩

रुद्राक्ष कितने प्रकार के होते है यह सुनिश्चित कर पाना कठिन है  विशेषज्ञों के अनुसार रुद्राक्ष 14 मुखी , 21 मुखी और शिव महापुराण अनुसार रुद्राक्ष 38 मुखी तक होते है
 किन्तु रुद्राक्ष 21 मुखी तक ही देखने को मिलते है
इनमें से एक मुखी और 14 मुखी रुद्राक्ष बहुत ही दुर्लभ होते है और बहुत ही कम मात्रा में होते है
पांच मुखी रुद्राक्ष सबसे अधिक होते है और आसानी से उपलब्ध हो जाते है।

*रुद्राक्ष धारण करने का महत्व*🚩

*धार्मिक महत्व*🚩

 रुद्राक्ष भगवान शिव को बहुत प्रिय होते है अतः इन्हें धारण करने वाले मनुष्य पर हमेशा भगवान शिव की विशेष कृपा बनी रहती है | रुद्राक्ष धारण करने से सभी प्रकार की नकारात्मक उर्जा दूर रहती है | भय आदि से मुक्ति मिलती है | रुद्राक्ष के मुख के आधार पर इसके धार्मिक महत्व को और स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है।

*वैज्ञानिक महत्व* 🚩

रुद्राक्ष को शरीर पर धारण करने के धार्मिक महत्व के साथ -साथ इसके वैज्ञानिक कारण भी है
रुद्राक्ष के रोम छिद्रों से एक अलग प्रकार का स्पदंन होता है जो मानव ह्रदय पर सकारात्मक प्रभाव दिखाता है
रुद्राक्ष के धारण करने से ह्रदय रक्त चाप सामान्य रहता है
 इसके अतिरिक्त मानव मस्तिस्क पर भी रुद्राक्ष से निकलने वाली विशेष तरंगे सकारात्मक प्रभाव दिखाती है
रुद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति तनाव ,चिंता और अवसाद आदि से मुक्त रहता है।

*रुद्राक्ष धारण करने की विधि*🚩

रुद्राक्ष को अधिकतर व्यक्ति इसे बिना किसी पूजन के धारण कर लेते है इस प्रकार रुद्राक्ष धारण करने से उन्हें सिर्फ वैज्ञानिक लाभ प्राप्त होते है रुद्राक्ष को धारण करने की एक विधि होती है आप उसके अनुसार ही रुद्राक्ष धारण करें

रुद्राक्ष के धारण करने से पहले आप इसे 7 दिन तक सरसों के तेल में डुबो कर रखे  रुद्राक्ष को आप  श्रावन मास में किसी भी सोमवार के दिन या आप पूरे श्रावन मास में किसी भी दिन धारण कर सकते है  , शिवरात्रि या किसी भी पूर्णिमा के दिन धारण कर सकते है |

इन पवित्र दिनों में आप रुद्राक्ष  को  पंचामृत *(दूध , शहद , दही , तुलसी  और गंगाजल)*
 से स्नान कराने के पश्चात् गंगाजल से स्नान कराये और   हवन की भभूती से तिलक करने के पश्चात्
*“ॐ तत्पुरुषाय विदमहे महादेवाय धीमहि तन्नो रूद्र: प्रचोदयात ”*
 मंत्र का जाप करते हुए गले में  धारण करना चाहिए
यदि हवन की भभूति उपलब्ध नहीं हो तो कुमकुम से तिलक कर सकते है

इसके अतिरिक्त आप जब भी शिव मंदिर जाते है रुद्राक्ष को शिवलिंग से स्पर्श कराये और प्रत्येक मास में कम से कम  2 सोमवार को इसे पंचामृत और गंगाजल से स्नान अवश्य कराये | और प्रतिदिन पूजा करते समय धूप -दीप दिखाए।

 *रुद्राक्ष धारण करने वाले व्यक्ति को क्या सावधानियां रखनी चाहिए*🚩

रुद्राक्ष को साक्षात् भगवान शिव का ही रूद्र रूप माना जाता है अतः इसे धारण करने वाले व्यक्ति को सैदव पवित्र रहना चाहिए | मांस -मदिरा से बिलकुल दूर रहें | रुद्राक्ष पहनकर किसी भी शवयात्रा या शमशान में न जाये | घर पर कभी  श्यावड या सूतक के दिनों का आभाष होने पर इसे निकालकर पूजा स्थल पर रख दे और बाद में गंगाजल से पवित्र करने के पश्चात् ही धारण करें।

 *रुद्राक्ष के प्रकार और रुद्राक्ष धारण करने के लाभ*

*आज के समय में आपको एक से 14 मुखी तक ही रुद्राक्ष मिल पाएंगे जिनकों धारण करने के लाभ इस प्रकार है*

*एक मुखी रुद्राक्ष*🚩

एक मुखी रुद्राक्ष को साक्षात् भगवान शिव का ही रूप माना गया है
इसकी उत्पत्ति बहुत कम होती है
अतः इसे प्राप्त कर पाना बहुत ही दुर्लभ है
 एक मुखी रुद्राक्ष सूर्य जनित दोषों को समाप्त करता है
इसे धारण करने से नेत्र संबधी रोग , ह्रदय रोग , पेट रोग और हड्डी के रोगों से मुक्ति मिलती है इस धारण करने से सांसारिक , मानसिक ,शारीरिक और देवीय कष्टों से मुक्ति मिलने के साथ -साथ आत्म मनोबल में वृद्धि होती है
राशि अनुसार कर्क , सिंह और मेष राशि के व्यक्ति इसे धारण करें तो उनके लिए यह अधिक उत्तम होता है
असली एक मुखी रुद्राक्ष को प्राप्त कर पाना बहुत ही मुश्किल है अतः किसी विशेषज्ञ द्वारा असली एक मुखी रुद्राक्ष की पहचान करने के पश्चात ही इसे धारण करना चाहिए
ऑनलाइन और ऊँची कीमत पर मिलने वाले रुदाक्ष को उनकी कीमत के आधार पर उनके असली व नकली होने की पहचान कदापि न करें।

*दो मुखी रुद्राक्ष*🚩

दो मुखी रुद्राक्ष को शिव शक्ति का स्वरुप माना जाता है
मष्तिष्क , ह्रदय , फेफड़ों  और नेत्र रोगों में इस रुद्राक्ष को धारण करने से विशेष लाभ  प्राप्त होता है
इसे धारण करने से भगवान अर्धनारीश्वर प्रसन्न होते है
इसे धारण करने से पति – पत्नी के बीच प्रेम भाव बढ़ता है
 गो हत्या के पाप का दोष इस रुद्राक्ष के धारण करने और इसकी नित्य पूजा करने से समाप्त हो जाता है
युवक- युवतियों के विवाह में यदि  विलम्ब हो रहा हो तो  इस रुद्राक्ष के धारण करने से शीघ्र शुभ परिणाम मिलते है
कर्क राशी वालो के लिए यह रुद्राक्ष अत्यधिक लाभकारी है।

*तीन मुखी रुद्राक्ष*🚩

तीन मुखी रुद्राक्ष अग्नि देव का स्वरुप माना गया है इस रुद्राक्ष को धारण करने से स्त्री हत्या जैसे पापों से मुक्ति मिलती है
नीरस बन चुके जीवन में फिर से  नई  उमंग जगाने के साथ -साथ  तीन मुखी रुद्राक्ष पेट से संबधित होने वाली सभी बिमारियों के लिए भी बहुत लाभदायक है।

*चार मुखी रुद्राक्ष*🚩

चार मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से संतान प्राप्ति होते है
यह रुद्राक्ष बुद्धि को तीव्र करता है शरीर के रोगों को भी दूर करने में भी सहायक सिद्ध होता है
इस रुद्राक्ष को धारण करने से वाणी में मिठास और दूसरों को अपना बनाने की कला विकसित होती है
वेदों और धार्मिक ग्रंथो के अध्यन में भी सफलता प्राप्त होती है शिवमहापुराण  के अनुसार इस रुद्राक्ष को लम्बे समय तक धारण करने से और भगवान शिव के बीज मंत्रो का पाठ करने से जीव हत्या के पाप से भी मुक्ति मिल सकती है ।

 *पांच मुखी रुद्राक्ष*🚩

पंच मुखी रुद्राक्ष को सर्वगुण संपन्न कहा गया है
यह भगवान शिव का सबसे प्रिय रुद्राक्ष है   इसे सभी रुद्राक्षो में सबसे अधिक शुभ और पुण्य प्रदान करने वाला माना गया है |इसका अधिपति गृह बृहस्पति है  इसलिए बृहस्पति गृह के प्रतिकूल होने के कारण आने वाली समस्याएं  इस रुद्राक्ष के धारण करने से स्वतः दूर हो जाती है पांच मुखी रुद्राक्ष के धारण करने से जीवन में सुख -शांति और प्रसद्धि प्राप्त होती है
पंचमुखी रुद्राक्ष कालाग्नि के नाम से विख्यात है पंचमुखी रुद्राक्ष में पंचदेवों का निवास माना गया है |

पंचमुखी रुद्राक्ष के धारण करने से रक्तचाप और मधुमेह सामान्य रहता है
पेट के रोगों में भी यह रुद्राक्ष लाभ पहुंचाता है
मन में आने वाले गलत विचारो को नियंत्रित कर मानसिक रूप से स्वस्थ बनाता है
 राशि के अनुसार मेष , कर्क , सिंह , वृश्चिक , धनु और मीन राशी वालों के लिए यह अत्यंत लाभकारी है।

*छह मुखी रुद्राक्ष*🚩

छह मुखी रुद्राक्ष को भगवान शिव पुत्र कार्तिकेय का स्वरुप माना गया है
 शिव महापुराण अनुसार इस रुद्राक्ष को विधिवत धारण करने और नियमित पूजा करने से ब्रह्म हत्या के पाप से सभी मुक्ति मिल सकती है
इस रुद्राक्ष को धारण करने से बुद्धि का विकास होने के साथ -साथ  नेतृत्व करने की क्षमता भी विकसित होती है  शरीर में आने वाले रोगों को भी दूर कर स्वस्थ जीवन प्रदान करता है
इस रुद्राक्ष को विधिवत पूजन कर धारण करने से भगवान कार्तिकेय की विशेष कृपा प्राप्त होती है जिसके फलस्वरूप जीवन में आने वाले सभी कष्ट स्वतः ही दूर होने लगते है | इस रुद्राक्ष के प्रधान देव शुक्र देव को माना गया है।

*सात मुखी रुद्राक्ष*🚩


सात मुखी रुद्राक्ष सप्त ऋषियों का प्रतिनिधित्त्व करता है
माँ लक्ष्मी की विशेष कृपा इस रुद्राक्ष को धारण करने वाले व्यक्ति पर हमेशा बनी रहती है
 घर में धन की वृद्धि होती है
सात मुखी रुद्राक्ष पर शनिदेव का प्रभाव माना गया है | इसलिए इसको धारण करने पर शनिदेव प्रसन्न होकर अपनी विशेष कृपा बनाये रखते है
 सप्तमुखी होने के कारण यह रुद्राक्ष शरीर में सप्धातुओं की रक्षा करता है और इम्यून सिस्टम को भी मजबूत करता है
जो व्यक्ति मानसिक बीमारी या जोड़ो के दर्द से परेशान है उन्हें इस रुद्राक्ष को अवश्य धारण करना चाहिए |

*आठ मुखी रुद्राक्ष*🚩


आठ मुखी रुद्राक्ष भैरो देव जी का स्वरुप माना गया  है
और इसके प्रधान देव श्री गणेश जी है | इसे धारण करने से अष्टदेवियों का आशीर्वाद प्राप्त होता है
इसे धारण करने से इन्द्रियों को नियंत्रित करने की शक्ति जागृत होती है
इस रुद्राक्ष को धारण करने से बुद्धि , ज्ञान, धन और यश की प्राप्ति होती है
इस रुद्राक्ष के धारण करने से और विधिवत पूजन करने से  पर स्त्री भोग के पाप से मुक्ति मिलती है यह रुद्राक्ष जीवन की हर मुश्किलों को दूर कर रिद्धि -सिद्धि प्रदान करता है
आठ मुखी रुद्राक्ष राहू गृह से सम्बंधित है
अगर आपकी कुंडली में राहू दोष होने के कारण कठिनाइयाँ आ रही है तो इस रुद्राक्ष को अवश्य धारण करें।

*नौ मुखी रुद्राक्ष*🚩

नौ मुखी रुद्राक्ष को माँ भगवती की नौ शक्तियों  का प्रतीक माना गया है
इसके साथ -साथ कपिलमुनि और भैरोदेव की भी कृपा इस रुद्राक्ष पर है
इस रुद्राक्ष को धारण करने से शक्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है
 इस रुद्राक्ष का प्रधान गृह केतु है अतः यह  केतु गृह के कारण जीवन में आने वाले प्रतिकूल प्रभावों को कम करता है
इस रुद्राक्ष को धारण करने से कीर्ति , मान -सम्मान में वृद्धि होती है और मन को शांति मिलती है
माँ नवदुर्गा का स्वरुप होने के कारण यह रक्षा कवच का कार्य करता है
जो माँ दुर्गा की पूजा करते है उन्हें इस रुद्राक्ष को अवश्य धारण करना चाहिये।

*दस मुखी रुद्राक्ष*🚩

इस रुद्राक्ष को भगवान विष्णु का स्वरुप माना गया है
इस रुद्राक्ष के धारण करने से उपरी बाधाएं , भूत-प्रेत  जैसी नकारात्मक शक्तियां शरीर से दूर रहती है
तंत्र – मंत्र और साधनाएं करने वाले जातक को इस रुद्राक्ष को अवश्य धारण करना चाहिए
पेट के रोगों में , गठिया ,दमा और नेत्र रोगों में यह रुद्राक्ष विशेष लाभ पहुंचाता है।

*ग्यारह मुखी रुद्राक्ष*🚩

ग्यारह मुखी रुद्राक्ष को भगवान शिव के 11 रुद्रों का प्रतीक माना गया है
भगवान शिव के 11वे अवतार हनुमान जी की विशेष कृपा इस रुद्राक्ष को धारण करने पर बनी रहती है व्यापार में उन्नत्ति प्राप्त करने के लिए इस रुद्राक्ष को अवश्य धारण करना चाहिए इस रुद्राक्ष के धारण करने पर अकाल मृत्यु का भय नही रहता धार्मिक अनुष्ठान , यज्ञ -हवन आदि धार्मिक कार्यों में यह रुद्राक्ष सफलता प्रदान करता है

*बारह मुखी रुद्राक्ष*🚩

बारह मुखी रुद्राक्ष को भगवान महाविष्णु का स्वरुप माना गया है
इस रुद्राक्ष को धारण करने से असाध्य से असाध्य रोग भी ठीक हो जाते है इस रुद्राक्ष के धारण करने से ह्रदय , मष्तिस्क और उदर रोगों में लाभ प्राप्त होता है  गोवध और रत्नों की चोरी करने जैसे महापापों में इस रुद्राक्ष द्वारा मुक्ति प्राप्त होती है | यह रुद्राक्ष सभी प्रकार की दुर्घटनाओ से आपको बचाता है

*तेरह  मुखी रुद्राक्ष*🚩

तेरह मुखी रुद्राक्ष को स्वर्ग के राजा इन्द्रदेव का स्वरुप माना गया है
इसके साथ -साथ इसे धारण करने पर कामदेव का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है इस धारण करने से वशीकरण और किसी को अपनी तरफ आकर्षित करने का गुण भी आता है
जिनके जीवन में प्रेम और ग्रहस्थ सुख की कमी हो उन्हें इस रुद्राक्ष को अवश्य धारण करना चाहिए
सभी ग्रहों के प्रभाव को अपने अनुकूल बनाने के लिए भी इस रुद्राक्ष को धारण किया जा सकता है

*चौदह मुखी रुद्राक्ष*🚩

चौदह मुखी रुद्राक्ष को साक्षात् हनुमान जी का स्वरुप माना गया है इसलिए हनुमान जी की उपासना करने वाले जातक को इस रुद्राक्ष को अवश्य धारण करना चाहिए
भूत – प्रेत और उपरी बाधाएं इस रुद्राक्ष के धारण करने स्वतः अपना स्थान छोड़ देती है
यह रुद्राक्ष व्यक्ति को उर्जावान और निरोगी बनाता है इस रुद्राक्ष के धारण करने से साधना में सिद्धि शीघ्र प्राप्त होती है

 *रुद्राक्ष की पहचान*🚩

यदि आप किसी मंदिर या मठ से रुद्राक्ष की माला खरीदते हैं तो आप को किसी ज्योतिषाचार्य से जांच कराने की जरूरत नहीं, आप खुद कर सकते हैं असली रुद्राक्ष की पहचान
 आजकल किसी भी शहर के बाजार में रुद्राक्ष आसानी से मिल जाता है,
लेकिन उसकी पहचान करना ग्राहकों के लिए थोड़ा कठिन काम होता है
 ज्यादातर लोग रुद्राक्ष खरीदने के बाद या तो किसी ज्योतिषाचार्य की शरण  लेते हैं या फिर घर के बुजुर्गों से असली, नकली के बारे में पूछते हैं
लेकिन आप स्वयं बिना किसी से पूछे असली और नकली रुद्राक्ष में भेद कर सकते हैं वह भी किसी लैब या ज्योतिषाचार्य की मदद लिए बगैर

कई लोग लाभ के लालच में कैमिकल का इस्तेमाल कर इसका रंग रूप असली रूद्राक्ष जैसा कर देते है व इसके ऊपर धारिया बना कर मंहगे भाव में बेच देते है। कई बार दो रुद्राक्षों को बड़ी सफाई से जोड़ कर बेचा जाता है। आपने देखा होगा कि कई रूद्राक्षों पर गणेश, सर्प, शिवलिंग की आकृति बना कर भी लाभ कमाया जाता है।

रूद्राक्ष का उपयोग केवल धारण करने में ही नहीं होता है अपितु हम रूद्राक्ष के माध्यम से किसी भी प्रकार के रोग कुछ ही समय में पूर्णरूप से मुक्ति प्राप्त कर सकते है
ज्योतिष के आधार पर किसी भी ग्रह की शांति के लिए रत्न धारण करने की सलाह दी जाती है।  रूद्राक्ष की महिमा का वर्णन शिवपुराण, रूद्रपुराण, लिंगपुराण श्रीमद्भागवत गीता में पूर्ण रूप से मिलता है
जो आदमी अध्यात्मिक विश्वास में रुद्राक्ष खरीदता है अगर उसे ऐसा रुद्राक्ष मिल जाये तो उसे कोई लाभ नही बल्कि उसके अध्यात्मिक मन के साथ धोखा होता है। आप ने कभी भी कोई रुद्राक्ष लेना तो विश्वसनीय स्थान से ही खरीदे
परन्तु आप भी अपने ढंग से जान सकते है असली और नकली रुद्राक्ष कैसे होते है

 *कैसे करें असली रुद्राक्ष की पहचान*🚩

1.रुद्राक्ष की पहचान के लिए रुद्राक्ष को कुछ घंटे के लिए पानी में उबालें यदि रुद्राक्ष का रंग न निकले या उस पर किसी प्रकार का कोई असर न हो, तो वह असली होगा
इसके अलावा आप रुद्राक्ष को पानी में डाल दें अगर वह डूब जाता है तो असली नहीं नहीं नकली

2. रुद्राक्ष सरसों के तेल मे डालने पर रुद्राक्ष अपने रंग से गहरा दिखे तो समझो वो एक दम असली है

3. प्रायः गहरे रंग के रूद्राक्ष को अच्छा माना जाता है और हल्के रंग वाले को नहीं
असलियत में रूद्राक्ष का छिलका उतारने के बाद उस पर रंग चढ़ाया जाता है
बाजार में मिलने वाली रूद्राक्ष की मालाओं को पिरोने के बाद पीले रंग से रंगा जाता है
 रंग कम होने से कभी- कभी हल्का रह जाता है
काले और गहरे भूरे रंग के दिखने वाले रूद्राक्ष प्रायः इस्तेमाल किए हुए होते हैं,
ऐसा रूद्राक्ष के तेल या पसीने के संपर्क में आने से होता है

4.   रूद्राक्ष की पहचान के लिए उसे सुई से कुरेदें। अगर रेशा निकले तो असली और न निकले तो नकली होगा

5. नकली रूद्राक्ष के उपर उभरे पठार एकरूप हों तो वह नकली रूद्राक्ष है। असली रूद्राक्ष की उपरी सतह कभी भी एकरूप नहीं होगी
जिस तरह दो मनुष्यों के फिंगरप्रिंट एक जैसे नहीं होते उसी तरह दो रूद्राक्षों के उपरी पठार समान नहीं होते
हां नकली रूद्राक्षों में कितनों के ही उपरी पठार समान हो सकते हैं

6. यदि रुद्राक्ष को 2 ताम्बे के सिक्को के बीच रखा जाये फिर सिक्के को ऊपर से दबाने पर यदि यह नाचने लगे तो वह असली होता है
क्योंकी रुद्राक्ष मे चुंबकत्व होता है

नाम जप महिमा

श्री रामचरितमानस के अनुसार नामजपकी महिमा...

कलियुगमें जितने भी साधनामार्ग है उसमें सबसे सहज मार्ग है भक्तियोग, और भक्तियोग अंतर्गत नामसंकीर्तनयोग अनुसार साधना करना इस युगकी सर्वश्रेष्ट साधनामार्ग है। संत तुलसीदासने श्री रामचरितमानसमें नामके महिमाका गुणगान किया है।

 संत जिस देवी या देवताके स्वरूपकी आराधना कर आध्यात्मिक प्रगति कर आत्मज्ञानी बनते हैं उसी आराध्यके नामकी गुणगान कर उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।

अध्यात्मशास्त्र अनुसार हमारे सूक्ष्म पिंडमें जिस सूक्ष्म तत्त्वकी कमी होती है, जब हम उस तत्त्वकी पूर्ति हेतु उस आराध्यके नामका जप करते हैं तो हमारी आध्यात्मिक प्रगति करते हैं द्रुत गतिसे होती है | जब तक हमने गुरुमंत्र नहीं मिला हो हमें आप कुलदेवता का जप करना चाहिए और यदि कुलदेवताका नाम नहीं पता हो तो या तो ‘श्री कुलदेवतायै नमः’ का जप करना चाहिए या अपने इष्टदेवताका जप करना चाहिए।

 यदि घरमें पितृ दोष हो तो एक घंटे ‘श्री गुरुदेव दत्त’ का जप करना चाहिए और शेष समय अपने कुलदेवताका या इष्टदेवताका मंत्र जपना चाहिए। ५० % से अधिक आध्यात्मिक स्तरके साधक उच्च कोटिके देवता जैसे राम, कृष्ण, दत्त, शिव, दुर्गा, गणपति या हनुमानका जप कर सकते हैं।

संत तुलसीदासजीने अत्यधिक शृंगारयुक्त एवं भावपूर्ण शब्दोंमें अपने आराध्य प्रभु श्रीरामके नामकी महिमाका वर्णन किया है | उनकेद्वारा की गयी नामकी महिमाका वर्णन ‘नाम’ रूपी तत्त्वका वर्णन समझ सकते हैं।

 इसी संदर्भमें प्रस्तुत है बालकांडसे उद्धृत कुछ दोहे,,,,

श्री नाम वंदना और नाम महिमा!!!!!!!!

*नाम प्रसाद संभु अबिनासी। साजु अमंगल मंगल रासी॥
सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी। नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी॥

भावार्थ:-नाम ही के प्रसाद से शिवजी अविनाशी हैं और अमंगल वेष वाले होने पर भी मंगल की राशि हैं। शुकदेवजी और सनकादि सिद्ध, मुनि, योगी गण नाम के ही प्रसाद से ब्रह्मानन्द को भोगते हैं॥

*नारद जानेउ नाम प्रतापू। जग प्रिय हरि हरि हर प्रिय आपू॥
नामु जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू। भगत सिरोमनि भे प्रहलादू॥

भावार्थ:-नारदजी ने नाम के प्रताप को जाना है। हरि सारे संसार को प्यारे हैं, (हरि को हर प्यारे हैं) और आप (श्री नारदजी) हरि और हर दोनों को प्रिय हैं। नाम के जपने से प्रभु ने कृपा की, जिससे प्रह्लाद, भक्त शिरोमणि हो गए॥

*ध्रुवँ सगलानि जपेउ हरि नाऊँ। पायउ अचल अनूपम ठाऊँ॥
सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू॥

भावार्थ:-ध्रुवजी ने ग्लानि से (विमाता के वचनों से दुःखी होकर सकाम भाव से) हरि नाम को जपा और उसके प्रताप से अचल अनुपम स्थान (ध्रुवलोक) प्राप्त किया। हनुमान्‌जी ने पवित्र नाम का स्मरण करके श्री रामजी को अपने वश में कर रखा है॥

*अपतु अजामिलु गजु गनिकाऊ। भए मुकुत हरि नाम प्रभाऊ॥
कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई। रामु न सकहिं नाम गुन गाई॥

भावार्थ:-नीच अजामिल, गज और गणिका (वेश्या) भी श्री हरि के नाम के प्रभाव से मुक्त हो गए। मैं नाम की बड़ाई कहाँ तक कहूँ, राम भी नाम के गुणों को नहीं गा सकते॥

*नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु।
जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु॥

भावार्थ:-कलियुग में राम का नाम कल्पतरु (मन चाहा पदार्थ देने वाला) और कल्याण का निवास (मुक्ति का घर) है, जिसको स्मरण करने से भाँग सा (निकृष्ट) तुलसीदास तुलसी के समान (पवित्र) हो गया॥

*चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका। भए नाम जपि जीव बिसोका॥
बेद पुरान संत मत एहू। सकल सुकृत फल राम सनेहू॥

भावार्थ:-(केवल कलियुग की ही बात नहीं है,) चारों युगों में, तीनों काल में और तीनों लोकों में नाम को जपकर जीव शोकरहित हुए हैं। वेद, पुराण और संतों का मत यही है कि समस्त पुण्यों का फल श्री रामजी में (या राम नाम में) प्रेम होना है॥

*ध्यानु प्रथम जुग मख बिधि दूजें। द्वापर परितोषत प्रभु पूजें॥
कलि केवल मल मूल मलीना। पाप पयोनिधि जन मन मीना॥

भावार्थ:-पहले (सत्य) युग में ध्यान से, दूसरे (त्रेता) युग में यज्ञ से और द्वापर में पूजन से भगवान प्रसन्न होते हैं, परन्तु कलियुग केवल पाप की जड़ और मलिन है, इसमें मनुष्यों का मन पाप रूपी समुद्र में मछली बना हुआ है (अर्थात पाप से कभी अलग होना ही नहीं चाहता, इससे ध्यान, यज्ञ और पूजन नहीं बन सकते)॥

*नाम कामतरु काल कराला। सुमिरत समन सकल जग जाला॥
राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता॥

भावार्थ:-ऐसे कराल (कलियुग के) काल में तो नाम ही कल्पवृक्ष है, जो स्मरण करते ही संसार के सब जंजालों को नाश कर देने वाला है। कलियुग में यह राम नाम मनोवांछित फल देने वाला है, परलोक का परम हितैषी और इस लोक का माता-पिता है (अर्थात परलोक में भगवान का परमधाम देता है और इस लोक में माता-पिता के समान सब प्रकार से पालन और रक्षण करता है।)॥

*नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू॥
कालनेमि कलि कपट निधानू। नाम सुमति समरथ हनुमानू॥

भावार्थ:-कलियुग में न कर्म है, न भक्ति है और न ज्ञान ही है, राम नाम ही एक आधार है। कपट की खान कलियुग रूपी कालनेमि के (मारने के) लिए राम नाम ही बुद्धिमान और समर्थ श्री हनुमान्‌जी हैं॥

*राम नाम नरकेसरी कनककसिपु कलिकाल।
जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल॥

भावार्थ:-राम नाम श्री नृसिंह भगवान है, कलियुग हिरण्यकशिपु है और जप करने वाले जन प्रह्लाद के समान हैं, यह राम नाम देवताओं के शत्रु (कलियुग रूपी दैत्य) को मारकर जप करने वालों की रक्षा करेगा॥

*भायँ कुभायँ अनख आलस हूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥
सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा। करउँ नाइ रघुनाथहि माथा॥

भावार्थ:-अच्छे भाव (प्रेम) से, बुरे भाव (बैर) से, क्रोध से या आलस्य से, किसी तरह से भी नाम जपने से दसों दिशाओं में कल्याण होता है। उसी (परम कल्याणकारी) राम नाम का स्मरण करके और श्री रघुनाथजी को मस्तक नवाकर मैं रामजी के गुणों का वर्णन करता हूँ॥

।। राम सिया राम सिया राम जय जय राम।।

शनिवार, 9 मार्च 2019

गजेंद्र मोक्ष स्त्रोत्र" हिंदी अनुवाद सहित


श्री शुक उवाच – श्री शुकदेव जी ने कहा

एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि ।
जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम ॥१॥

बुद्धि के द्वारा रीति से निश्चय करके तथा मन को हृदय देश में स्थिर करके वह गजराज अपने पूर्व जन्म में सीखकर कण्ठस्थ किये हुए सर्वश्रेष्ठ एवं बार बार दोहराने योग्य निम्नलिखित स्तोत्र का मन ही मन पाठ करने लगा।

गजेन्द्र उवाच गजराज ने (मन ही मन) कहा :–

ऊं नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम ।
पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ॥२॥

जिनके प्रवेश करने पर (जिनकी चेतना को पाकर) ये जड शरीर और मन आदि भी चेतन बन जाते हैं (चेतन की भांति व्यवहार करने लगते हैं), ‘ओम’ शब्द के द्वारा लक्षित तथा सम्पूर्ण शरीर में प्रकृति एवं पुरुष रूप से प्रविष्ट हुए उन सर्व समर्थ परमेश्वर को हम मन ही मन नमन करते हैं ॥

यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयं ।
योस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम ॥३॥

जिनके सहारे यह विश्व टिका है, जिनसे यह निकला है , जिन्होने इसकी रचना की है और जो स्वयं ही इसके रूप में प्रकट हैं – फिर भी जो इस दृश्य जगत से एवं इसकी कारणभूता प्रकृति से सर्वथा परे (विलक्षण ) एवं श्रेष्ठ हैं – उन अपने आप – बिना किसी कारण के – बने हुए भगवान की मैं शरण लेता हूं ॥

यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं
क्कचिद्विभातं क्क च तत्तिरोहितम ।
अविद्धदृक साक्ष्युभयं तदीक्षते
स आत्ममूलोवतु मां परात्परः ॥४॥

अपने संकल्प शक्ति के द्वारा अपने ही स्वरूप में रचे हुए और इसीलिये सृष्टिकाल में प्रकट और प्रलयकाल में उसी प्रकार अप्रकट रहने वाले इस शास्त्र प्रसिद्ध कार्य कारण रूप जगत को जो अकुण्ठित दृष्टि होने के कारण साक्षी रूप से देखते रहते हैं उनसे लिप्त नही होते, वे चक्षु आदि प्रकाशकों के भी परम प्रकाशक प्रभु मेरी रक्षा करें ॥

कालेन पंचत्वमितेषु कृत्स्नशो
लोकेषु पालेषु च सर्व हेतुषु ।
तमस्तदाsssसीद गहनं गभीरं
यस्तस्य पारेsभिविराजते विभुः ॥५॥

समय के प्रवाह से सम्पूर्ण लोकों के एवं ब्रह्मादि लोकपालों के पंचभूत में प्रवेश कर जाने पर तथा पंचभूतों से लेकर महत्वपर्यंत सम्पूर्ण कारणों के उनकी परमकरुणारूप प्रकृति में लीन हो जाने पर उस समय दुर्ज्ञेय तथा अपार अंधकाररूप प्रकृति ही बच रही थी। उस अंधकार के परे अपने परम धाम में जो सर्वव्यापक भगवान सब ओर प्रकाशित रहते हैं वे प्रभु मेरी रक्षा करें ॥

न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु-
र्जन्तुः पुनः कोsर्हति गन्तुमीरितुम ।
यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो
दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु ॥६॥

भिन्न भिन्न रूपों में नाट्य करने वाले अभिनेता के वास्तविक स्वरूप को जिस प्रकार साधारण दर्शक नही जान पाते , उसी प्रकार सत्त्व प्रधान देवता तथा ऋषि भी जिनके स्वरूप को नही जानते , फिर दूसरा साधारण जीव तो कौन जान अथवा वर्णन कर सकता है – वे दुर्गम चरित्र वाले प्रभु मेरी रक्षा करें ।

दिदृक्षवो यस्य पदं सुमंगलम
विमुक्त संगा मुनयः सुसाधवः ।
चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वने
भूतत्मभूता सुहृदः स मे गतिः ॥७॥

आसक्ति से सर्वदा छूटे हुए , सम्पूर्ण प्राणियों में आत्मबुद्धि रखने वाले , सबके अकारण हितू एवं अतिशय साधु स्वभाव मुनिगण जिनके परम मंगलमय स्वरूप का साक्षात्कार करने की इच्छा से वन में रह कर अखण्ड ब्रह्मचार्य आदि अलौकिक व्रतों का पालन करते हैं , वे प्रभु ही मेरी गति हैं ।

न विद्यते यस्य न जन्म कर्म वा
न नाम रूपे गुणदोष एव वा ।
तथापि लोकाप्ययाम्भवाय यः
स्वमायया तान्युलाकमृच्छति ॥८॥

जिनका हमारी तरह कर्मवश ना तो जन्म होता है और न जिनके द्वारा अहंकार प्रेरित कर्म ही होते हैं, जिनके निर्गुण स्वरूप का न तो कोई नाम है न रूप ही, फिर भी समयानुसार जगत की सृष्टि एवं प्रलय (संहार) के लिये स्वेच्छा से जन्म आदि को स्वीकार करते हैं ।।

तस्मै नमः परेशाय ब्राह्मणेsनन्तशक्तये ।
अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्य कर्मणे ॥९॥

उन अन्नतशक्ति संपन्न परं ब्रह्म परमेश्वर को नमस्कार है । उन प्राकृत आकाररहित एवं अनेको आकारवाले अद्भुतकर्मा भगवान को बारंबार नमस्कार है

नम आत्म प्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने ।
नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ॥१०॥

स्वयं प्रकाश एवं सबके साक्षी परमात्मा को नमस्कार है । उन प्रभु को जो नम, वाणी एवं चित्तवृत्तियों से भी सर्वथा परे हैं, बार बार नमस्कार है ॥

सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता ।
नमः केवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥११॥

विवेकी पुरुष के द्वारा सत्त्वगुणविशिष्ट निवृत्तिधर्म के आचरण से प्राप्त होने योग्य, मोक्ष सुख की अनुभूति रूप प्रभु को नमस्कार है ॥

नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुण धर्मिणे ।
निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥१२॥

सत्त्वगुण को स्वीकार करके शान्त , रजोगुण को स्वीकर करके घोर एवं तमोगुण को स्वीकार करके मूढ से प्रतीत होने वाले, भेद रहित, अतएव सदा समभाव से स्थित ज्ञानघन प्रभु को नमस्कार है ॥

क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे ।
पुरुषायात्ममूलय मूलप्रकृतये नमः ॥१३॥

शरीर इन्द्रीय आदि के समुदाय रूप सम्पूर्ण पिण्डों के ज्ञाता, सबके स्वामी एवं साक्षी रूप आपको नमस्कार है । सबके अन्तर्यामी , प्रकृति के भी परम कारण, किन्तु स्वयं कारण रहित प्रभु को नमस्कार है ॥

सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे ।
असताच्छाययोक्ताय सदाभासय ते नमः ॥१४॥

सम्पूर्ण इन्द्रियों एवं उनके विषयों के ज्ञाता, समस्त प्रतीतियों के कारण रूप, सम्पूर्ण जड-प्रपंच एवं सबकी मूलभूता अविद्या के द्वारा सूचित होने वाले तथा सम्पूर्ण विषयों में अविद्यारूप से भासने वाले आपको नमस्कार है ॥

नमो नमस्ते खिल कारणाय
निष्कारणायद्भुत कारणाय ।
सर्वागमान्मायमहार्णवाय
नमोपवर्गाय परायणाय ॥१५॥

सबके कारण किंतु स्वयं कारण रहित तथा कारण होने पर भी परिणाम रहित होने के कारण, अन्य कारणों से विलक्षण कारण आपको बारम्बार नमस्कार है । सम्पूर्ण वेदों एवं शास्त्रों के परम तात्पर्य , मोक्षरूप एवं श्रेष्ठ पुरुषों की परम गति भगवान को नमस्कार है ॥

गुणारणिच्छन्न चिदूष्मपाय
तत्क्षोभविस्फूर्जित मान्साय ।
नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम-
स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ॥१६॥

जो त्रिगुणरूप काष्ठों में छिपे हुए ज्ञानरूप अग्नि हैं, उक्त गुणों में हलचल होने पर जिनके मन में सृष्टि रचने की बाह्य वृत्ति जागृत हो उठती है तथा आत्म तत्त्व की भावना के द्वारा विधि निषेध रूप शास्त्र से ऊपर उठे हुए ज्ञानी महात्माओं में जो स्वयं प्रकाशित हो रहे हैं उन प्रभु को मैं नमस्कार करता हूँ ॥

मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय
मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोsलयाय ।
स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत-
प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते ॥१७॥

मुझ जैसे शरणागत पशुतुल्य (अविद्याग्रस्त) जीवों की अविद्यारूप फाँसी को सदा के लिये पूर्णरूप से काट देने वाले अत्याधिक दयालू एवं दया करने में कभी आलस्य ना करने वाले नित्यमुक्त प्रभु को नमस्कार है । अपने अंश से संपूर्ण जीवों के मन में अन्तर्यामी रूप से प्रकट रहने वाले सर्व नियन्ता अनन्त परमात्मा आप को नमस्कार है ॥

आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तै-
र्दुष्प्रापणाय गुणसंगविवर्जिताय ।
मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभाविताय
ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय ॥१८॥

शरीर, पुत्र, मित्र, घर, संपंत्ती एवं कुटुंबियों में आसक्त लोगों के द्वारा कठिनता से प्राप्त होने वाले तथा मुक्त पुरुषों के द्वारा अपने हृदय में निरन्तर चिन्तित ज्ञानस्वरूप , सर्वसमर्थ भगवान को नमस्कार है ॥

यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामा
भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति।
किं त्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययं
करोतु मेदभ्रदयो विमोक्षणम ॥१९॥

जिन्हे धर्म, अभिलाषित भोग, धन तथा मोक्ष की कामना से भजने वाले लोग अपनी मनचाही गति पा लेते हैं अपितु जो उन्हे अन्य प्रकार के अयाचित भोग एवं अविनाशी पार्षद शरीर भी देते हैं वे अतिशय दयालु प्रभु मुझे इस विपत्ती से सदा के लिये उबार लें ॥

एकान्तिनो यस्य न कंचनार्थ
वांछन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः ।
अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमंगलं
गायन्त आनन्न्द समुद्रमग्नाः ॥२०॥

जिनके अनन्य भक्त -जो वस्तुतः एकमात्र उन भगवान के ही शरण है-धर्म , अर्थ आदि किसी भी पदार्थ को नही चाह्ते, अपितु उन्ही के परम मंगलमय एवं अत्यन्त विलक्षण चरित्रों का गान करते हुए आनन्द के समुद्र में गोते लगाते रहते हैं ॥

तमक्षरं ब्रह्म परं परेश-
मव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम।
अतीन्द्रियं सूक्षममिवातिदूर-
मनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे ॥२१॥

उन अविनाशी, सर्वव्यापक, सर्वश्रेष्ठ, ब्रह्मादि के भी नियामक, अभक्तों के लिये प्रकट होने पर भी भक्तियोग द्वारा प्राप्त करने योग्य, अत्यन्त निकट होने पर भी माया के आवरण के कारण अत्यन्त दूर प्रतीत होने वाले , इन्द्रियों के द्वारा अगम्य तथा अत्यन्त दुर्विज्ञेय, अन्तरहित किंतु सबके आदिकारण एवं सब ओर से परिपूर्ण उन भगवान की मैं स्तुति करता हूँ ॥

यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः ।
नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः ॥२२॥

ब्रह्मादि समस्त देवता, चारों वेद तथा संपूर्ण चराचर जीव नाम और आकृति भेद से जिनके अत्यन्त क्षुद्र अंश के द्वारा रचे गये हैं ॥

यथार्चिषोग्नेः सवितुर्गभस्तयो
निर्यान्ति संयान्त्यसकृत स्वरोचिषः ।
तथा यतोयं गुणसंप्रवाहो
बुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः ॥२३॥

जिस प्रकार प्रज्ज्वलित अग्नि से लपटें तथा सूर्य से किरणें बार बार निकलती है और पुनः अपने कारण मे लीन हो जाती है उसी प्रकार बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ और नाना योनियों के शरीर – यह गुणमय प्रपंच जिन स्वयंप्रकाश परमात्मा से प्रकट होता है और पुनः उन्ही में लीन हो जात है ॥

स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यंग
न स्त्री न षण्डो न पुमान न जन्तुः ।
नायं गुणः कर्म न सन्न चासन
निषेधशेषो जयतादशेषः ॥२४॥

वे भगवान न तो देवता हैं न असुर, न मनुष्य हैं न तिर्यक (मनुष्य से नीची – पशु , पक्षी आदि किसी) योनि के प्राणी है । न वे स्त्री हैं न पुरुष और नपुंसक ही हैं । न वे ऐसे कोई जीव हैं, जिनका इन तीनों ही श्रेणियों में समावेश हो सके । न वे गुण हैं न कर्म, न कार्य हैं न तो कारण ही । सबका निषेध हो जाने पर जो कुछ बच रहता है, वही उनका स्वरूप है और वे ही सब कुछ है । ऐसे भगवान मेरे उद्धार के लिये आविर्भूत हों ॥

जिजीविषे नाहमिहामुया कि-
मन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या ।
इच्छामि कालेन न यस्य विप्लव-
स्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम ॥२५॥

मैं इस ग्राह के चंगुल से छूट कर जीवित नही रहना चाहता; क्योंकि भीतर और बाहर – सब ओर से अज्ञान से ढके हुए इस हाथी के शरीर से मुझे क्या लेना है । मैं तो आत्मा के प्रकाश को ढक देने वाले उस अज्ञान की निवृत्ति चाहता हूँ, जिसका कालक्रम से अपने आप नाश नही होता , अपितु भगवान की दया से अथवा ज्ञान के उदय से होता है ॥

सोsहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम ।
विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोस्मि परं पदम ॥२६॥

इस प्रकार मोक्ष का अभिलाषी मैं विश्व के रचियता, स्वयं विश्व के रूप में प्रकट तथा विश्व से सर्वथा परे, विश्व को खिलौना बनाकर खेलने वाले, विश्व में आत्मरूप से व्याप्त , अजन्मा, सर्वव्यापक एवं प्राप्त्य वस्तुओं में सर्वश्रेष्ठ श्री भगवान को केवल प्रणाम ही करता हूं, उनकी शरण में हूँ ।।

योगरन्धित कर्माणो हृदि योगविभाविते ।
योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोsस्म्यहम ॥२७॥

जिन्होने भगवद्भक्ति रूप योग के द्वारा कर्मों को जला डाला है, वे योगी लोग उसी योग के द्वारा शुद्ध किये हुए अपने हृदय में जिन्हे प्रकट हुआ देखते हैं उन योगेश्वर भगवान को मैं नमस्कार करता हूँ ॥

नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग-
शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय।
प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये
कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ॥२८॥

जिनकी त्रिगुणात्मक (सत्त्व-रज-तमरूप ) शक्तियों का रागरूप वेग असह्य है, जो सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयरूप में प्रतीत हो रहे हैं, तथापि जिनकी इन्द्रियाँ विषयों में ही रची पची रहती हैं-ऐसे लोगों को जिनका मार्ग भी मिलना असंभव है, उन शरणागतरक्षक एवं अपारशक्तिशाली आपको बार बार नमस्कार है ॥

नायं वेद स्वमात्मानं यच्छ्क्त्याहंधिया हतम ।
तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोsस्म्यहम ॥२९॥

जिनकी अविद्या नामक शक्ति के कार्यरूप अहंकार से ढंके हुए अपने स्वरूप को यह जीव जान नही पाता, उन अपार महिमा वाले भगवान की मैं शरण आया हूँ ॥

श्री शुकदेव उवाच – श्री शुकदेवजी ने कहा –

एवं गजेन्द्रमुपवर्णितनिर्विशेषं
ब्रह्मादयो विविधलिंगभिदाभिमानाः ।
नैते यदोपससृपुर्निखिलात्मकत्वात
तत्राखिलामर्मयो हरिराविरासीत ॥३०॥

जिसने पूर्वोक्त प्रकार से भगवान के भेदरहित निराकार स्वरूप का वर्णन किया था , उस गजराज के समीप जब ब्रह्मा आदि कोई भी देवता नही आये, जो भिन्न भिन्न प्रकार के विशिष्ट विग्रहों को ही अपना स्वरूप मानते हैं, तब सक्षात श्री हरि- जो सबके आत्मा होने के कारण सर्वदेवस्वरूप हैं-वहाँ प्रकट हो गये ॥

तं तद्वदार्त्तमुपलभ्य जगन्निवासः
स्तोत्रं निशम्य दिविजैः सह संस्तुवद्भि : ।
छन्दोमयेन गरुडेन समुह्यमान –
श्चक्रायुधोsभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः ॥३१॥

उपर्युक्त गजराज को उस प्रकार दुःखी देख कर तथा उसके द्वारा पढी हुई स्तुति को सुन कर सुदर्शनचक्रधारी जगदाधार भगवान इच्छानुरूप वेग वाले गरुड जी की पीठ पर सवार होकर स्तवन करते हुए देवताओं के साथ तत्काल उस स्थान अपर पहुँच गये जहाँ वह हाथी था ।

सोsन्तस्सरस्युरुबलेन गृहीत आर्त्तो
दृष्ट्वा गरुत्मति हरि ख उपात्तचक्रम ।
उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छा –
न्नारायण्खिलगुरो भगवान नम्स्ते ॥३२॥

सरोवर के भीतर महाबली ग्राह के द्वारा पकडे जाकर दुःखी हुए उस हाथी ने आकाश में गरुड की पीठ पर सवार चक्र उठाये हुए भगवान श्री हरि को देखकर अपनी सूँड को -जिसमें उसने (पूजा के लिये) कमल का एक फूल ले रक्खा था-ऊपर उठाया और बडी ही कठिनाई से “सर्वपूज्य भगवान नारायण आपको प्रणाम है” यह वाक्य कहा ॥

तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य
सग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार ।
ग्राहाद विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रं
सम्पश्यतां हरिरमूमुचदुस्त्रियाणाम ॥३३॥

उसे पीडित देख कर अजन्मा श्री हरि एकाएक गरुड को छोडकर नीचे झील पर उतर आये । वे दया से प्रेरित हो ग्राहसहित उस गजराज को तत्काल झील से बाहर निकाल लाये और देवताओं के देखते देखते चक्र से मुँह चीर कर उसके चंगुल से हाथी को उबार लिया ॥

                        "जय श्रीहरि"

पूजा से सम्बंधित तीस आवश्यक नियम

सुखी और समृद्धिशाली जीवन के लिए देवी-देवताओं के पूजन की परंपरा काफी पुराने समय से चली आ रही है। आज भी बड़ी संख्या में लोग इस परंपरा को निभाते हैं।

पूजन से हमारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, लेकिन पूजा करते समय कुछ खास नियमों का पालन भी किया जाना चाहिए। अन्यथा पूजन का शुभ फल पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं हो पाता है। यहां 30  ऐसे नियम बताए जा रहे हैं जो सामान्य पूजन में भी ध्यान रखना चाहिए। इन बातों का ध्यान रखने पर बहुत ही जल्द शुभ फल प्राप्त हो सकते हैं।

ये नियम इस प्रकार हैं…

1. सूर्य, गणेश, दुर्गा, शिव और विष्णु, ये पंचदेव कहलाते हैं, इनकी पूजा सभी कार्यों में अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए। प्रतिदिन पूजन करते समय इन पंचदेव का ध्यान करना चाहिए। इससे लक्ष्मी कृपा और समृद्धि प्राप्त होती है।

2. शिवजी, गणेशजी और भैरवजी को तुलसी नहीं चढ़ानी चाहिए।

3. मां दुर्गा को दूर्वा (एक प्रकार की घास) नहीं चढ़ानी चाहिए। यह गणेशजी को विशेष रूप से अर्पित की जाती है।

4. सूर्य देव को शंख के जल से अर्घ्य नहीं देना चाहिए।

5. तुलसी का पत्ता बिना स्नान किए नहीं तोड़ना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति बिना नहाए ही तुलसी के पत्तों को तोड़ता है तो पूजन में ऐसे पत्ते भगवान द्वारा स्वीकार नहीं किए जाते हैं।

6. शास्त्रों के अनुसार देवी-देवताओं का पूजन दिन में पांच बार करना चाहिए। सुबह 5 से 6 बजे तक ब्रह्म मुहूर्त में पूजन और आरती होनी चाहिए। इसके बाद प्रात: 9 से 10 बजे तक दूसरी बार का पूजन। दोपहर में तीसरी बार पूजन करना चाहिए। इस पूजन के बाद भगवान को शयन करवाना चाहिए। शाम के समय चार-पांच बजे पुन: पूजन और आरती। रात को 8-9 बजे शयन आरती करनी चाहिए। जिन घरों में नियमित रूप से पांच बार पूजन किया जाता है, वहां सभी देवी-देवताओं का वास होता है और ऐसे घरों में धन-धान्य की कोई कमी नहीं होती है।

7. प्लास्टिक की बोतल में या किसी अपवित्र धातु के बर्तन में गंगाजल नहीं रखना चाहिए। अपवित्र धातु जैसे एल्युमिनियम और लोहे से बने बर्तन। गंगाजल तांबे के बर्तन में रखना शुभ रहता है।

8. स्त्रियों को और अपवित्र अवस्था में पुरुषों को शंख नहीं बजाना चाहिए। यह इस नियम का पालन नहीं किया जाता है तो जहां शंख बजाया जाता है, वहां से देवी लक्ष्मी चली जाती हैं।

9. मंदिर और देवी-देवताओं की मूर्ति के सामने कभी भी पीठ दिखाकर नहीं बैठना चाहिए।

10. केतकी का फूल शिवलिंग पर अर्पित नहीं करना चाहिए।

11. किसी भी पूजा में मनोकामना की सफलता के लिए दक्षिणा अवश्य चढ़ानी चाहिए। दक्षिणा अर्पित करते समय अपने दोषों को छोड़ने का संकल्प लेना चाहिए। दोषों को जल्दी से जल्दी छोड़ने पर मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होंगी।

12. दूर्वा (एक प्रकार की घास) रविवार को नहीं तोडऩी चाहिए।

13. मां लक्ष्मी को विशेष रूप से कमल का फूल अर्पित किया जाता है। इस फूल को पांच दिनों तक जल छिड़क कर पुन:  चढ़ा सकते हैं।

14. शास्त्रों के अनुसार शिवजी को प्रिय बिल्व पत्र छह माह तक बासी नहीं माने जाते हैं। अत: इन्हें जल छिड़क कर पुन: शिवलिंग पर अर्पित किया जा सकता है।

15. तुलसी के पत्तों को 11 दिनों तक बासी नहीं माना जाता है। इसकी पत्तियों पर हर रोज जल छिड़कर पुन: भगवान को अर्पित किया जा सकता है।

16. आमतौर पर फूलों को हाथों में रखकर हाथों से भगवान को अर्पित किया जाता है। ऐसा नहीं करना चाहिए। फूल चढ़ाने के लिए फूलों को किसी पवित्र पात्र में रखना चाहिए और इसी पात्र में से लेकर देवी-देवताओं को अर्पित करना चाहिए।

17. तांबे के बर्तन में चंदन, घिसा हुआ चंदन या चंदन का पानी नहीं रखना चाहिए।

18. हमेशा इस बात का ध्यान रखें कि कभी भी दीपक से दीपक नहीं जलाना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति दीपक से दीपक जलते हैं, वे रोगी होते हैं।

19. बुधवार और रविवार को पीपल के वृक्ष में जल अर्पित नहीं करना चाहिए।

20. पूजा हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख रखकर करनी चाहिए। यदि संभव हो सके तो सुबह 6 से 8 बजे के बीच में पूजा अवश्य करें।

21. पूजा करते समय आसन के लिए ध्यान रखें कि बैठने का आसन ऊनी होगा तो श्रेष्ठ रहेगा।

22. घर के मंदिर में सुबह एवं शाम को दीपक अवश्य जलाएं। एक दीपक घी का और एक दीपक तेल का जलाना चाहिए।

23. पूजन-कर्म और आरती पूर्ण होने के बाद उसी स्थान पर खड़े होकर 3 परिक्रमाएं अवश्य करनी चाहिए।

24. रविवार, एकादशी, द्वादशी, संक्रान्ति तथा संध्या काल में तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ना चाहिए।

25. भगवान की आरती करते समय ध्यान रखें ये बातें- भगवान के चरणों की चार बार आरती करें, नाभि की दो बार और मुख की एक या तीन बार आरती करें। इस प्रकार भगवान के समस्त अंगों की कम से कम सात बार आरती करनी चाहिए।

26. पूजाघर में मूर्तियाँ 1 ,3 , 5 , 7 , 9 ,11 इंच तक की होनी चाहिए, इससे बड़ी नहीं तथा खड़े हुए गणेश जी,सरस्वतीजी, लक्ष्मीजी, की मूर्तियाँ घर में नहीं होनी चाहिए।

27. गणेश या देवी की प्रतिमा तीन तीन, शिवलिंग दो,शालिग्राम दो,सूर्य प्रतिमा दो,गोमती चक्र दो की संख्या में कदापि न रखें।

28. अपने मंदिर में सिर्फ प्रतिष्ठित मूर्ति ही रखें उपहार,काँच, लकड़ी एवं फायबर की मूर्तियां न रखें एवं खण्डित, जलीकटी फोटो और टूटा काँच तुरंत हटा दें। शास्त्रों के अनुसार खंडित मूर्तियों की पूजा वर्जित की गई है। जो भी मूर्ति खंडित हो जाती है, उसे पूजा के स्थल से हटा देना चाहिए और किसी पवित्र बहती नदी में प्रवाहित कर देना चाहिए। खंडित मूर्तियों की पूजा अशुभ मानी गई है। इस संबंध में यह बात ध्यान रखने योग्य है कि सिर्फ शिवलिंग कभी भी, किसी भी अवस्था में खंडित नहीं माना जाता है।

29.  मंदिर के ऊपर भगवान के वस्त्र, पुस्तकें एवं आभूषण आदि भी न रखें मंदिर में पर्दा अति आवश्यक है अपने पूज्य माता –पिता तथा पित्रों का फोटो मंदिर में कदापि न रखें,उन्हें घर के नैऋत्य कोण में स्थापित करें।

30. विष्णु की चार, गणेश की तीन,सूर्य की सात, दुर्गा की एक एवं शिव की आधी परिक्रमा कर सकते हैं।

रविवार, 3 मार्च 2019

बारह महाजन

स्वयम्भुर्नारद:शम्भु कुमार: कपिलोमनु: 

प्रह्लादोजनको भीष्मो बलिर्वैयासकिर्वयम। 

ये12 महाजन हैं-स्वयंभू, शंभु, नारद, सनत कुमार, कपिल, मनु, जनक, भीष्म, बली, व्यास जी, प्रह्लाद और यमराज। 

बुधवार, 6 फ़रवरी 2019

रामायण जी की चमत्कारिक चौपाइयां

(((( सफलता के मंत्र ))))
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श्रीरामायण जी की चोपाई के माध्यम से जीवन के कुछ महत्वपूर्ण मंत्र दिए जा रहे है जिनके जाप से शत्-प्रतिशत सफलता मिलती है...
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आप से अनुरोध है इन मंत्रो का जीवन में प्रयोग अवश्य करें प्रभु श्रीराम आप के जीवन को सुखमय बना देगे !!
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रक्षा के लिए....
मामभिरक्षक रघुकुल नायक !
घृत वर चाप रुचिर कर सायक !!
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विपत्ति दूर करने के लिए....
राजिव नयन धरे धनु सायक !
भक्त विपत्ति भंजन सुखदायक !!
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सहायता के लिए....
मोरे हित हरि सम नहि कोऊ !
एहि अवसर सहाय सोई होऊ !!
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सब काम बनाने के लिए....
वंदौ बाल रुप सोई रामू !!
सब सिधि सुलभ जपत जोहि नामू !!
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वश मे करने के लिए....
सुमिर पवन सुत पावन नामू !!
अपने वश कर राखे राम !!
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संकट से बचने के लिए....
दीन दयालु विरद संभारी !!
हरहु नाथ मम संकट भारी !!
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विघ्न विनाश के लिए....
सकल विघ्न व्यापहि नहि तेही !!
राम सुकृपा बिलोकहि जेहि !
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रोग विनाश के लिए....
राम कृपा नाशहि सव रोगा !
जो यहि भाँति बनहि संयोगा !!
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ज्वार ताप दूर करने के लिए....
दैहिक दैविक भोतिक तापा !
राम राज्य नहि काहुहि व्यापा !!
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दुःख नाश के लिए....
राम भक्ति मणि उर बस जाके !
दुःख लवलेस न सपनेहु ताके !
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खोई चीज पाने के लिए....
गई बहोरि गरीब नेवाजू !
सरल सबल साहिब रघुराजू !!
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अनुराग बढाने के लिए....
सीता राम चरण रत मोरे !
अनुदिन बढे अनुग्रह तोरे !!
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घर मे सुख लाने के लिए....
जै सकाम नर सुनहि जे गावहि !
सुख सम्पत्ति नाना विधि पावहिं !!
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सुधार करने के लिए....
मोहि सुधारहि सोई सब भाँती !
जासु कृपा नहि कृपा अघाती !!
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विद्या पाने के लिए....
गुरू गृह पढन गए रघुराई !
अल्प काल विधा सब आई !!
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सरस्वती निवास के लिए....
जेहि पर कृपा करहि जन जानी !
कवि उर अजिर नचावहि बानी !
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निर्मल बुध्दि के लिए....
ताके युग पदं कमल मनाऊँ !!
जासु कृपा निर्मल मति पाऊँ !!
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मोह नाश के लिए....
होय विवेक मोह भ्रम भागा !
तब रघुनाथ चरण अनुरागा !!
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प्रेम बढाने के लिए....
सब नर करहिं परस्पर प्रीती !
चलत स्वधर्म कीरत श्रुति रीती !!
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प्रीती बढाने के लिए....
बैर न कर काह सन कोई !
जासन बैर प्रीति कर सोई !!
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सुख प्रप्ति के लिए....
अनुजन संयुत भोजन करही !
देखि सकल जननी सुख भरहीं !!
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भाई का प्रेम पाने के लिए....
सेवाहि सानुकूल सब भाई !
राम चरण रति अति अधिकाई !!
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बैर दूर करने के लिए....
बैर न कर काहू सन कोई !
राम प्रताप विषमता खोई !!
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मेल कराने के लिए....
गरल सुधा रिपु करही मिलाई !
गोपद सिंधु अनल सितलाई !!
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शत्रु नाश के लिए....
जाके सुमिरन ते रिपु नासा !
नाम शत्रुघ्न वेद प्रकाशा !!
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रोजगार पाने के लिए....
विश्व भरण पोषण करि जोई !
ताकर नाम भरत अस होई !!
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इच्छा पूरी करने के लिए....
राम सदा सेवक रूचि राखी !
वेद पुराण साधु सुर साखी !!
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पाप विनाश के लिए....
पापी जाकर नाम सुमिरहीं !
अति अपार भव भवसागर तरहीं !!
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अल्प मृत्यु न होने के लिए....
अल्प मृत्यु नहि कबजिहूँ पीरा !
सब सुन्दर सब निरूज शरीरा !!
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दरिद्रता दूर के लिए....
नहि दरिद्र कोऊ दुःखी न दीना !
नहि कोऊ अबुध न लक्षण हीना !!
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प्रभु दर्शन पाने के लिए....
अतिशय प्रीति देख रघुवीरा !
प्रकटे ह्रदय हरण भव पीरा !!
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शोक दूर करने के लिए....
नयन बन्त रघुपतहिं बिलोकी !
आए जन्म फल होहिं विशोकी !!
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क्षमा माँगने के लिए....
अनुचित बहुत कहहूँ अज्ञाता !
क्षमहुँ क्षमा मन्दिर दोऊ भ्राता
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 ((((((( जय बिहारी जी की🙏)))))))
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रविवार, 3 फ़रवरी 2019

मौनी अमावस्या विशेष

------------------------------मौनी अमावस्या 2019--------------------------

सनातन परंपरा में माघ मास को अत्यंत पावन मास माना गया है। इस मास में विधि-विधान से स्नान-ध्यान एवं साधना का विशेष महत्व है। वैसे तो इस पूरे मास में ही स्नान-दान का महत्व है लेकिन अमावस्या के दिन इसका अत्यधिक महत्व है। यही कारण है कि इस तिथि पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु सुख-समृद्धि और मोक्ष की कामना लिए पवित्र नदियों में डुबकी लगाते हैं। मौनी अमावस्या के दिन मौन रहकर स्नान करने का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व है :--

मौनी अमावस्या का ज्योतिषीय महत्व :---
मौनी अमावस्या के दिन सूर्य और चंद्रमा मकर राशि में होते हैं। इन तीनों के एक साथ होने का संयोग प्रत्येक वर्ष एक ही दिन होता है। इस शुभ संयोग में किसी पवित्र नदी में मौन धारण करते हुए डुबकी लगाने का विशेष धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व होता है। यही कारण है कि तमाम तीर्थो पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु नदी तीर्थ पर पावन डुबकी लगाने के लिए इकट्ठा होते हैं।
मौन रहने से बढ़ जाता है शुभ फल :---
ज्योतिष में सूर्य को आत्मा तथा चंद्रमा को मन का कारक माना जाता है। चूंकि मन चंद्रमा की तरह चंचल होता है और अक्सर साधना—आराधना के दौरान भटक जाता है। ऐसे में मन को नियंत्रित करना आवश्यक हो जाता है। मन पर नियंत्रण पाकर ही किसी साधना को निर्विघ्न रूप से पूर्ण किया जा सकता है। मन की कामनाएं अक्सर वाणी के द्वारा प्रकट की जाती हैं। ऐसे में मन पर नियंत्रण पाने के लिए माघ मास की अमावस्या के दिन मौन रखकर स्नान करने का विधान बना।

अक्षय पुण्य के लिए मौन रह कर करें स्नान :---
मान्यता है कि मन और वाणी पर नियंत्रण पाते हुए इस पावन तिथि पर स्नान करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और मोक्ष मिलता है। साथ ही इस दिन किए जाने वाले मौन स्नान से शरीर की सकारात्मक ऊर्जा का ह्रास भी नहीं होता है। मौन साधना से मिलने वाला पुण्य अक्षय रहता है। संतों के अनुसार मौन व्रत के बगैर मौनी अमावस्या पर स्नान करने से श्रद्धालुओं को पूरा पुण्य नहीं मिलता है।
यदि न पहुंच पाएं नदी तीर्थ :---
यदि आप किसी कारण किसी नदी तीर्थ पर जाकर इस पावन तिथि वाले दिन स्नान-ध्यान एवं पूजन करने में असमर्थ हैं तो आप अपने घर में ही इसका पुण्य लाभ पा सकते हैं। मौनी अमावस्या के दिन मां गंगा का ध्यान करते हुए अपने जल के स्नान में गंगाजल और तिल डाल कर मौन रखते हुए स्नान करें और स्नान-ध्यान के पश्चात किसी मंदिर में जाकर अपनी क्षमता के अनुसार दान करें।

मौनी अमावस्या का आध्यात्मिक महत्व :---

कड़ाके की ठंड में धार्मिक नियमों का पालन करते हुए साधना-आराधना का आध्यात्मिक महत्व भी है। विदित हो कि प्रयागराज कुंभ के अधिकांश स्नान पर्व भीषण ठंड में पड़ते हैं। हाड़ कंपा देने वाली सर्दी के मौसम में ये स्नान पर्व हमारे अंदर अदम्य जिजीविषा एवं संकल्प शक्ति का निर्माण करते हैं। इसी प्रकार मौनी अमावस्या पर मौन स्नान का भी अपना महत्व है। मौन रहते हुए अमृत रूपी जल का यह स्नान हमें जीवन की विषमताओं से न घबराने और चुनौतियों का दृढ़ता के साथ सामना करते हुए अपनी साधना-मनोकामना पूर्ण करने का संदेश देता है।

मौनी अमावस्या 2019 का महत्व :----

यूं तो हिंदू धर्म में हर अमावस्या का बेहद ही खास महत्व होता है लेकिन माघ महीने में होने वाली मौनी अमावस्या का तो महत्व ही निराला है। वही अगर ये अमावस्या (New Moon) सोमवार के दिन हो तो इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। वही अगर सोमवार भी हो और साथ ही कुम्भ लगा हो तो फिर इसका महत्व अनन्त गुणा हो जाता है। और इस बार कुछ ऐसा ही हो रहा है। दरअसल मौनी अमावस्या इस बार सोमवार यानि 4 फरवरी को है तो वही इस बार प्रयागराज में कुम्भ भी चल रहा है लिहाज़ा मौनी अमावस्या का महत्व इस बार अनंत हो गया है। चूंकि मौनी अमावस्या पर दान का बहुत ही महत्व होता है लिहाज़ा इस दिन पवित्र नदियों या संगम में स्नान के बाद अपनी इच्छानुसार अन्न, वस्त्र, धन, गौ, भूमि और स्वर्ण दान में दिया जा सकता है।

27 वर्ष बाद मौनी अमावस्या पर फिर से वही योग पड़ रहे हैं जो वर्ष 1992 में पड़े थे। अनेक योगों के पड़ने से पर्व का महत्व और बढ़ गया है।

वर्ष 1992 में तीन फरवरी के दिन मौनी अमावस्या सोमवार को पड़ने के कारण सोमवती हो गई थी। संयोग से उस दिन हरिद्वार अर्द्धकुंभ का प्रमुख स्नान भी था। इसी प्रकार इस बार मौनी अमावस्या चार फरवरी सोमवार को पड़कर सोमवती हुई है और प्रयाग अर्द्धकुंभ का मुख्य स्नान इसी दिन पड़ रहा है।

संयोग यह भी है कि 27 वर्ष पूर्व जो सिद्धी योग था वह योग इस बार सिद्धी के साथ साथ महोदय योग के रूप में भी आ रहा है। सोमवती अमावस्या के दिन चंद्रमा का श्रवण नक्षत्र विद्यमान रहेगा। खास बात यह है कि भगवान सूर्य का प्रवेश इसी नक्षत्र में हो रहा है। सूर्य इस समय मकर राशि में मौजूद हैं। सूर्य के मकर राशि में रहते हुए मौनी अमावस्या का पड़ना अपने आप में एक महायोग है।

बारह महीनों में से चार महीने सबसे पवित्र माने गए हैं। इन चार महीनों में भी माघ का पर्व सबसे पवित्र है। यही कारण है कि इस बार सोमवती अमावस्या के स्नान का पर्व पूर्ण पर्वकाल लेकर आया है। प्रात:काल सूर्योदय से लेकर सायंकाल सूर्यास्त तक पूर्ण मुहूर्त मौजूद रहेगा। इस कारण श्रद्धालु किसी भी समय गंगा में डुबकी लगा सकते हैं।

इस बार की मौनी अमावस्या दरिद्र योग, ग्रहण योग, केमुद्रम योग और शक्त योग लेकर भी आई है। इसका अर्थ है कि जिनकी कुंडली में ये योग हों, गंगा स्नान करने से उनका दुर्योग मिट जाएगा। यह पर्व व्यवसाय, संतान और भौतिक सुख भी लेकर आ रहा है। गंगा आदि पवित्र नदियों में एक भी गोता लगाने के जन्म जमान्तर के पाप मिट जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार इस दिन मौन रहकर तिल, दूध और गुड़ तिल से बनी वस्तुओं का दान करना चाहिए। इस दिन मौन व्रत का विशेष महत्व है। यह पर्व उत्तरायण में पड़ने से और भी अधिक महत्वपूर्ण हो चला है।

चार फरवरी को पड़ रही अमावस्या शुभ फल लेकर आ रही है। लेकिन कहा जाता है कि अमावस्या के दिन नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बहुत ज्यादा होता है। इसलिए इस दिन पूजा, जप-तप करना बहुत ही शुभ माना जाता है। ज्योतिषाचार्यों की मानें तो इस दिन कुछ काम ऐसे हैं जिन्हें नहीं करना चाहिए वरना अशुभ फल मिल सकता है। आगे जानिए...
मौनी अमावस्या के दिन सुबह देर तक नहीं सोना चाहिए। जल्दी उठकर पूजा पाठ करना चाहिए। अमावस्या की रात श्मशान घाट या उसके आस-पास नहीं घूमना चाहिए। इस दिन सुबह जल्दी उठें और मौन रहते हुए पानी में काले तिल डालकर स्नान करें। यह शुभ होता है।
इस दिन स्त्री और पुरुष को शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिए। मौनी अमावस्या पर यौन संबंध बनाने से पैदा होने वाली संतान को जीवन में कई तरह के कष्टों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए इन चीजों से जितना हो सके बचना चाहिए।
मौनी अमावस्या का दिन देवता और पितरों का माना जाता है। इसलिए इस दिन पितरों को खुश करने के लिए जहां तक हो सके अपने गुस्से पर काबू रखें। किसी से बिना वजह गाली गलौज मारपीट न करें। शांत रहकर भगवान का नाम लें।
इस दिन गरीब या जरूरतमंद इंसान को दान करना और उनकी मदद करना शुभ होता है। इसलिए कोई भी ऐसा इंसान दिखे तो उनका अपमान न करें। साथ ही घर के बड़े बुजुर्गों का अपमान भी न करें। ऐसा करने से शनिदेव नाराज हो जाते हैं।

कहा जाता है कि इस दिन बरगद, मेहंदी और पीपल के पेड़ के नीचे जाने से बचना चाहिए। मान्यता है कि इस दिनों पेड़ों पर आत्माओं का वास रहता है और अमावस्या के दिन वो और भी शक्तिशाली हो जाती हैं। इसलिए ऐसे पेड़ों के नीचे न जाएं।

पितृपक्ष में परान्न से बचें

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