शनिवार, 27 जनवरी 2018

अच्युताष्टकं

अच्युतं केशवं स्वामिनारायणम् कृष्णदामोदरम् वासुदेवम् हरिम्।
श्रीधरं माधवं गोपीकावल्ल्भं जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे ॥१॥

अच्युतं केशवं सत्यभामाधवं माधवं श्रीधरं राधिकाराधितम्।
इन्दिरामन्दिरं चेतसा सुन्दरं देवकीनंदनं नंदजं संदधे ॥२॥

विष्णवे जिष्णवे शंखिने चक्रिणे रुक्मिणीरागिणे जानकीजानये।
बल्लवीवल्लभायाऽर्चितायात्मने कंसविध्वंसिने वंशिने ते नम: ॥३॥

कृष्ण गोविन्द हे राम नारायण श्रीपते वासुदेवाजित श्रीनिधे।
अच्युतानन्त हे माधवाधोक्षज द्वारकानायक द्रोपदीरक्षक ॥४॥

राक्षसक्षोभित: सीतया शोभितो दण्डकारण्यभूपुण्यताकारण:।
लक्ष्मणेनान्वितो वानरै: सेवितोऽगस्त्यसंपूजितो राघव: पातु माम् ॥५॥

धेनुकारिष्टकोऽनिष्टकृद् द्वेषिणां केशिहा कंसह्रद्वंशिकावादक:।
पूतनाकोपक: सूरजाखेलनो बालगोपालक: पातु मां सर्वदा ॥६॥

विद्युदुद्योतवान् प्रस्फुरद्वाससं प्रावृडम्भोदवत् प्रोल्लसद्विग्रहम्।
वन्यया मालया शोभितोरस्थलं लोहिताङ्घ्रिद्वयं वारिजाक्षं भजे ॥७॥

कुञ्चितै: कुन्तलैर्भ्राजमानाननम् रत्नमौलिं लसत् कुंडलं गण्डयो:।
हारकेयूरकं कङ्कणप्रोज्ज्वलं किङ्किणीमञ्जुलं श्यामलं तं भजे ॥८॥

अच्युतस्याष्टकं य: पठेदिष्टदं प्रेमत: प्रत्यहं पूरुष: सस्पृहम्।
वृत्तत: सुन्दरं कर्तृविश्वम्भरं तस्य वश्यो हरिर्जायते सत्वरम् ॥९॥

॥ इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचितं अच्युताष्टकं संपूर्णम् ॥

श्री शिव पंचाक्षरस्तोत्रम

 नागेंद्र्हराय त्रिलोचन भस्मांगरागाय महेश्वराय !
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै 'न' काराय नमः शिवाय !!

हे महेश्वर! आप नागराज को हार स्वरूप धारण करने वाले हैं। हे (तीन नेत्रों वाले) त्रिलोचन आप भष्म से अलंकृत, नित्य (अनादि एवं अनंत) एवं शुद्ध हैं। अम्बर को वस्त्र सामान धारण करने वाले दिग्म्बर शिव, आपके न् अक्षर द्वारा जाने वाले स्वरूप को नमस्कार ।

मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय !
मंदारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै 'म' काराय नमः शिवाय !!

चन्दन से अलंकृत, एवं गंगा की धारा द्वारा शोभायमान नन्दीश्वर एवं प्रमथनाथ के स्वामी महेश्वर आप सदा मन्दार पर्वत एवं बहुदा अन्य स्रोतों से प्राप्त्य पुष्पों द्वारा पुजित हैं। हे म् स्वरूप धारी शिव, आपको नमन है।

शिवाय गौरिवदनाब्जवृन्द -सूर्याय दक्षाध्वरनाश्काय !
श्रीनीलकंठाय वृध्व्जाय तस्मै 'शि'  काराय नमः शिवाय !!
हे धर्म ध्वज धारी, नीलकण्ठ, शि अक्षर द्वारा जाने जाने वाले महाप्रभु, आपने ही दक्ष के दम्भ यज्ञ का विनाश किया था। माँ गौरी के कमल मुख को सूर्य सामान तेज प्रदान करने वाले शिव, आपको नमस्कार है।
वसिष्ठकुम्भोदवगौतामार्य -मुनीन्द्रदेवाचिर्तशेखाय !
चन्द्राकवैश्वानरलोचनाय तस्मै 'व' काराय नमः शिवाय !!

देवगणो एवं वषिष्ठ, अगस्त्य, गौतम आदि मुनियों द्वार पुजित देवाधिदेव! सूर्य, चन्द्रमा एवं अग्नि आपके तीन नेत्र सामन हैं। हे शिव आपके व् अक्षर द्वारा विदित स्वरूप कोअ नमस्कार है।

यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय !
दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै 'य' काराय नमः शिवाय !!

हे यज्ञस्वरूप, जटाधारी शिव आप आदि, मध्य एवं अंत रहित सनातन हैं। हे दिव्य अम्बर धारी शिव आपके शि अक्षर द्वारा जाने जाने वाले स्वरूप को नमस्कार  है।

पश्चाक्षर्मिन्दम पुण्य य: पठेच्छिवसन्निधौ !
शिवलोकमवाप्नोतिशिवेन सह मोदेते !!
जो कोई शिव के इस पंचाक्षर मंत्र का नित्य ध्यान करता है वह शिव के पून्य लोक को प्राप्त करता है तथा शिव के साथ सुख पुर्वक निवास करता है। 

महाराज मनु



  जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि के आरंभ में देखा कि उनकी मानसिक सृष्टि नहीं बढ़ रही है,  तब अपने शरीर से उन्होंने एक दम्पति को प्रकट किया।

 ब्रह्मा जी के दाहिने अंग से मनु तथा बायें अंग से उनकी पत्नी शतरूपा प्रकट हुईं।

ब्रह्मा जी ने मनु को सृष्टि करने का आदेश दिया। उस समय पृथ्वी जल में डूब गयी थी। मनु ने स्थल की माँग की प्रजा विस्तार के लिए ।

ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर भगवान ने वाराह रूप धारण करके पृथ्वी का उद्धार किया। मनु अपनी पत्नी के साथ तप करने लगे।

तप के द्वारा उन्होंने भगवान को प्रसन्न किया। भगवद्दर्शन करके भगवान की आज्ञा से महाराज मनु ने प्रजा उत्पन्न करना स्वीकार किया।

भगवान का दर्शन हो जाने के पश्चात मनु ने शतरूपा से दो पुत्र तथा तीन कन्याएँ उत्पन्न कीं।महाराज मनु के पुत्र हुए प्रियव्रत एवं उत्तानपाद तथा कन्याएँ हुईं आकूति, देवहूति तथा प्रसूति।

  मनु महाराज की सन्तानों से ही पृथ्वी पर सभी मनुष्य वंश बढ़े।महाराज मनु के प्रथम पुत्र प्रियव्रत जी परम भगवद्भक्त हुए । उन्होंने ने ही इस पृथ्वी को सप्तद्वीपवती बनाया।

दूसरे पुत्र उत्तानपाद जी के पुत्र ध्रुव जी जैसे भक्त श्रेष्ठ हुई। मनु की कन्या आकूति का विवाह महर्षि रुचि से हुआ जिससे भगवान यज्ञ रूप में अवतरित हुए ।

 दूसरी कन्या देवहूति का विवाह महर्षि कर्दम से हुआ,  जिससे भगवान ने कपिलरूप में अवतार लिया।

तीसरी कन्या प्रसूति ब्रह्मा जी के मानसपुत्र दक्ष को विवाही गयीं।

         अपना मन्वन्तरकाल व्यतीत होने पर मनु जी ने राज्य पुत्रों को दे दिया और स्वयं विरक्त होकर पत्नी के साथ तप करने वन में चले गये।

वे द्वादशाक्षर मन्त्र  का निरंतर जप करते और बराबर उनका चित्त भगवान में लगा रहता।उनके मन में केवल एक ही इच्छा थी कि प्रभु का इन चर्मचक्षुओं से साक्षात्कार हो।

          मनु अविचल विश्वास से तपस्या में लगे थे। उनके साथ उनकी साध्वी पत्नी शतरूपा भी तप कर रही थीं।

दीर्घकालतक वे केवल जल पीकर रहे और फिर उसे भी छोड़ दिया। वे एक पैर से खड़े होकर भगवान में चित्त लगाये एकाग्र मन से प्रतीक्षा कर रहे थे कि कब वे करुणामय कृपा करते हैं।

अनेक बार ब्रह्मा जी तथा दूसरे देवता मनु के समीप आये और उन्होंने वरदान माँगने को कहा; किन्तु मनु की निष्ठा में अन्तर नहीं पड़ा।

अपने आराध्य को छोड़कर दूसरे से उन्हें कुछ कहना नहीं था।तप करते-करते दम्पति के शरीर अस्थियों के ढाँचेमात्र रह गये; किन्तु उनका मन प्रसन्न था ।

उनके चित्त में खेद का नाम नहीं था।अन्ततः प्रभु द्रवित हुए । आकाशवाणी ने महाराज मनु को वरदान माँगने को कहा।

 वह साधारण आकाशवाणी नहीं थी, उसके कानों में पड़ते ही दोनों के शरीर पुष्ट हो गये।प्राणों में जैसे अमृत संचार हो गया।

मनु ने दणडवत् करके बड़ी श्रद्धा से कहा---'प्रभो ! यदि हम दीनों पर आपका स्नेह है तो आप हमें दर्शन दें।

           भक्तवत्सल भगवान मनु की प्रार्थना सुनकर उनके सम्मुख प्रकट हो गए ।एकटक मनु उस पीताम्बरधारी, सर्वाभरणभूषित मुनिमनहारी दिव्य रूप को देखते रह गये।

 प्रभु अकेले नहीं प्रकट हुए थे, उनके साथ उनकी पराशक्ति भी प्रकट हुयी थीं।भगवान ने प्रकट हो कर फिर वरदान मांगने के लिए कहा।

 महाराज मनु एकटक उस दिव्यरूप को देख रहे थे। नेत्र तृप्त ही नहीं होते थे।हृदय कहता था कि यह रूप सदा नेत्रों के सामने ही रहना चाहिए ।

मनु ने बड़े संकोच से कहा---'दयामय! आप उदार चूड़ामणि हैं। आपके लिए अदेय कुछ भी नहीं है । मेरे मन में एक लालसा है तो सही; किन्तु मुझे बड़ा संकोच हो रहा है ।
          भगवान ने जब बार-बार निःसंकोच माँगने को कहा तब, मनु ने माँगा---'आपके समान पुत्र मुझे प्राप्त हो ।' भगवान हँस पड़े।भला, उनके समान रूप-शील-गुण में दूसरा कोई कहां से आ सकता है।उन्होंने स्वयं मनु का पुत्र होना स्वीकार किया।
           श्रीशतरूपा जी ने भगवान के आग्रह करने पर कहा--'मेरे पतिदेव ने जो वरदान माँगा है, मुझे भी वही अत्यंत प्रिय है ।

प्रभो ! आपके जो अपने जन हैं, जो भक्त आपको परमप्रिय हैं, उनको जो सुख, जो गति, जो भक्ति, जो ज्ञान प्राप्त होता है,  वही आप हमें प्रदान करें।
           मनु ने भगवान से प्रार्थना की---'दयाधाम! मेरा चित्त आपमें वात्सल्यभाव से लगा रहे।मेरा जीवन आपके विना सम्भव न रहे।भगवान ने मनु को आश्वासन दिया।

त्रेता में यही महाराज मनु अयोध्यानरेश दशरथ जी हुए और उनकी पत्नी शतरूपा कौशल्या हुयीं। भगवान ने श्री राम के रूप में अवतार ग्रहण किया।

अपने अंशों के साथ वे महाराज दशरथ के पुत्र बने और उनकी नित्यशक्ति मिथिलाराजकुमारी के रूप में प्रकट होकर महाराज दशरथ की पुत्रवधू बनीं।

द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम्

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥
परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्।
सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥
वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।
हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥
एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः।
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥
एतेशां दर्शनादेव पातकं नैव तिष्ठति।
कर्मक्षयो भवेत्तस्य यस्य तुष्टो महेश्वराः॥:

विशिष्टाद्वैत मत

विशिष्टाद्वैत मत, जिसके प्रतिपादक या संस्थापक श्री रामानुजाचार्य हैं, से श्री वैष्णवों के लिए निम्नांकित संस्कार शास्त्रानुमोदित है !!

ताप: पुण्ड्रं तथा नाम मन्त्रो यागश्च पञ्चमः !!
अमी पञ्चैव संस्काराः परमैकान्तिनो मताः !!

पंचसंस्कर वो संस्कार है, जो भगवन की शरणागति ग्रहण करते हुए, आचार्य अपने शिष्यों को ताप ,उर्ध्वपुण्ड्र, नाम, अष्टाक्षरी मन्त्र तथा यज्ञ कार्य सम्पादन करके करवाते हैं !!

(१) ताप : आचार्य दीक्षा देते समय चाँदी के बने हुए शँख-चक्र की मुद्राओ को अग्नि में तपा कर, दोनों बहुमूल में क्रमशः अंकित करते हैं, इसे ताप संस्कार कहा जाता है !!

(२) उर्ध्वपुण्ड्र : शरणागति ग्रहण करने वाले को ललाट पर पाशा तथा श्री चूर्ण से  उर्ध्वपुण्ड्र तिलक लगाया जाता है !!

(३) नामकरण : दीक्षा ग्रहण करने वाले व्यक्ति के नाम के प्रथम अक्षर का आधार लेकर, एक सांप्रदायिक नाम दिया जाता है, इसे ही नामकरण संस्कार कहा जाता है !!

(४) मन्त्र – इस मे आचार्य शिष्य के दायें कान मे “ॐ नमो नारायणाय “ यह अष्टाक्षरी मन्त्र प्रदान करते हैं, और यही गुरुमंत्र है ! इस के बाद द्वय मन्त्र दिया जाता है –

श्रीमन्नारायणस्य चरणौ शरणं प्रपद्ये !! श्रीमते नारायणाय नमः !!

अन्त मे चरम दिया जाता है -

सर्वधर्मान परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज !!
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः !!

(५) याग – इसके बाद पंच भू संस्कार से संस्कारित वेदी पर पुरुष सूक्त तथा श्री सूक्त से हवन कराया जाता है !!

यही पंच संस्कार कहे जाते है, जो वैष्णव दीक्षा ग्रहण करते समय योग्य आचार्य के द्वारा सम्पन्न किया जाता है !!

तदुपरान्त आचार्य अपने शिष्यों को उपदेश देते है, की मॉस मदिरा इत्यादि का सेवन नहीं करना चाहिए, श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी के उपदेशो का पूर्ण निष्ठां से पालन करते हुए जीवन बिताना चाहिए ! अपने सम्प्रदाय के मत का पूर्णतः पालन करना चाहिये, अपने आचार्य एवं पूर्वाचार्य के उपदेशो का पालन करना चाहिए ! भगवान एवं भागवतो का सदैव आदर करना चाहिए !!

कथा सुनने के चार लाभ है


भागवत की कथा अर्थात भगवान की कथा तो है ही पर भगवान की कथा बिना भक्तो की कथा के अधूरी है इसलिए हर शास्त्र में पुराण में भगवान की कथा के साथ साथ भक्तो की कथा भी आती है.नवधा भक्ति में सबसे पहली भक्ति श्रवण ही है.जो हम कानो से सुनते है वही हमारे ह्रदय में प्रवेश करता है,और फिर वही हम बोलते है.यदि हम कथा सुनते है तो मुख से कथा ही निकलेगी.
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"जिन्ह हरि कथा सुनी नहीं काना, श्रवण रन्ध्र अहि भवन समाना”
संतजन कथा सुनने के चार लाभ बताते है-
१. - तृष्णा रहित वृति
२. - अन्तः करण की शुद्धि
३. - अनन्य भक्ति
४. - भक्तो से प्रीति
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१. तृष्णा रहित वृति - यदि कथा ईमानदारी से कही और सुनी जाए तो दोनों कहने और सुनने वाले को पाने की अभिलाषा नहीं रह जाती.इसलिए सुनने वह ये निश्चय करके कथा में बैठे कि कथा मनोरजन नहीं है,मनो मंथन है.कथा एक आईना है,जिसमे हम स्वयं को देखने आये है,सामान्य आईना सिर्फ बाहरी रूप रंग दिखाता है और कथा आतंरिक भावों को दिखाती है,कि हम वास्तव में क्या है.
और सुनानेवाले अर्थात वक्ता कथा को व्यापार या रोजी रोटी का साधन न समझे.सुनने वाला तो एक ही काम कर रहा है केवल सुन ही रहा है पर वक्ता दो काम एक साथ कर रहा है एक तो सुना रहा है साथ साथ सुन भी रहा है.जब ऐसी ईमानदारी रखेगे तो फिर तृष्णा रहित वृति हो जाती है
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२. अन्तःकरण की शुद्धि - सत्संग कथा झाड़ू है जैसे खुला मैदान है दो तीन बार झाड़ू लगा दो सब साफ़ हो जाता है,इसलिए अपने अतः करण में सत्संग की झाड़ू लगाते रहो,जैसे यदि हम कुछ दिनों के लिए कही बाहर जाते है और लौट कर आने पर हम देखते है कि जब हम गए थे तब सब खिडकी दरवाजे बंद करके गए थे फिर भी धूल कैसे आ गई.
इसी तरह यदि कोई संत ही क्यों न हो यदि उसने सत्संग के दरवाजे बंद कर दिए तो उनके अंदर भी मैल ,धूल जमा हो जाती है.इसलिए जैसे घर को साफ रखने के लिए बार बार झाड़ू लगाते है वैसे ही अंत करण को शुद्ध रखने के लिए कथा रूपी,सत्संग रूपी झाड़ू लगाते रहिये.
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३. अनन्य भक्ति - जब किसी के बारे में सुनते रहते है जिसे हमने कभी नहीं देखा तो बार बार उसके बारे में सुनते रहने से स्वतः ही हमारे अंदर उसके लिए प्रेम जाग्रत हो जाता है.इसी तरह जब हम बार बार कथा सुनते है तो ठाकुर जी के चरणों में हमारी स्वतः ही भक्ति जाग्रत हो जाती है.जैसे लोभी को धन कामी को स्त्री ऐसे ही हमें श्यामा श्याम प्यारे लगने लगते है.
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४. भक्तो से प्रीति - भक्त तो भगवान से सदा ही प्रार्थना करता है कि हे नाथ ऐसे विषयी पुरुष जो केवल स्त्री धन पुत्र आदि में लगे हुए है का संग भी स्वप्न में भी न हो हमारा कोई अपराध को तो सूली पर चढा दो ,हलाहल विष पिला दो ,हाथी के नीचे कुचलवा दो, सिह को खिला दो, इतना होने पर भी दुःख नहीं मिलेगा पर जो संत से विमुख है,हरि से विमुख है ,गुरु से विमुख है जो भगवान और भक्तो से प्रेम न करता हो, उनसे हमारा कोई सम्बन्ध ना हो.
!! जय जय श्री राधे 🌹🌹।।

नाग देवताओं का वर्णन

पुराणों में उपलब्ध है अनेक नाग देवताओं का वर्णन। वेद एवं पुराणों के अनुसार नागों की उत्पत्ति महर्षि कश्यप की पत्नी कद्रू से हुई है। इसलिए इन्हें ‘काद्रवेया महाबलाः’ भी कहा गया है। ये अदिति देवी के सौतेले पुत्र और आदित्यों के भाई हैं। अतएव सुस्पष्टतः नाग देवताओं में परिगणित हैं। इनका निवास स्थान पाताल कहा गया है। इसे ही नागलोक भी कहा जाता है। नागलोक की राजधानी के रूप में भोगवतीपुरी का उल्लेख मिलता है। कथासरित्सागर का प्रायः एक चतुर्थांश इस नागलोक और वहां के निवासियों की कथाओं से संबद्ध है। नाग कन्याओं का सौन्दर्य देवियों एवं अप्सराओं के समान ही कहा गया है। इसीलिए गोस्वामी तुलसीदास जी ने बल देकर रावण की स्त्रियों के निर्देशक दोहे का अंत नाग कुमारि पर ही किया है।

भगवान विष्णु की शैय्या नागराज अनंत की बनी हुई है। भगवान शंकर एवं श्रीगणेशजी भी सितसर्पविभूषित हैं। भगवान सूर्य के रथ में बारहों मास बारह नाग बदल-बदलकर उनके रथ का वहन करते हैं। ऐसा प्रायः सभी पुराणों में निर्दिष्ट है। इस प्रकार से देवताओं ने भी सर्प नाग को धारण किया है, जिससे वे देवरूप हैं। सर्प-नाग वायु-पान ‘नीलमतपुराण’ और कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ के अनुसार कश्मीर की संपूर्ण भूमि नीलनाग की ही देन है। अब भी वहां के अनंतनाग आदि शहर इस तथ्य को पुष्ट करते हैं। यहां नाग देवता का सर्वाधिक सम्मान होता है। प्रारंभिक प्रातः स्मरणीय पवित्र नागों की गणना इस प्रकार है-
अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम्।
शंखपालं धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा।।
सायंकाले पठेन्नित्यं प्रातःकाले विशेषतः।
तस्य विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत्।।

अनंत, वासुकि, शेष, पद्मनाभ, कम्बल, शंखपाल, धृतराष्ट्र, तक्षक और कालिय- ये नाग देवता हैं। ये प्रातः सायं नित्य स्मरणीय हैं। इनका स्मरण करने से मनुष्य को नाग विष का भय नहीं रहता और सर्वत्र विजय प्राप्त होती है। भारतीय ऋषि-मुनियों ने नागोपासना पर अनके व्रत-पूजा आदि निबंध ग्रंथों की रचना की है। प्रत्येक ग्राम-नगर में नाग का स्थान होता है। श्रावण मास में नागपंचमी व्रत किया जाता है। संध्या पूजा के उपरांत नागों के नमस्कार करने की परम्परा इस प्रकार है-

जरत्कारुर्जगद्गौरी मनसा सिद्धयोगिनी।
वैष्णवी नागभगिनी शैवी नागेश्वरी तथा।।
जरात्कारुप्रियास्तीकमाता विषहरेति च।
महाज्ञानयुता चैव सा देवी विश्वपूजिता।।
द्वादशैतानि नामानि पूजाकाले तु यः पठेत्।
तस्य नागभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत्।।

उपर्युक्त पौराणिक मंत्र परम उपयोगी एवं उपादेय है। समस्त प्राणियों के कुलकुण्डहर में निवास करने वाली कुण्डलिनी शक्ति को भी सर्पिणी का ही रूप बताया गया है। भारत में शयनकाल के समय नाग देवताओं के स्मरण करने की प्रथा है। इन नाग देवता के उच्चारण मात्र से सर्प और उपसर्प भी घर में नहीं रहते। वे जनमेजय के यज्ञ में आस्तीक मुनि से वचनबद्ध हैं। आज भी इस मंत्र जप से सर्प-नाग देवता चारपाई पर नहीं चढ़ते। उनके मंत्र से सर्प का विष उतर जाता है और मनुष्य स्वस्थ हो जाता है। मंत्र इस प्रकार है-

सर्पापसर्प भद्रं ते गच्छ सर्प महाविष।
जनमेजयस्य यज्ञान्ते आस्तीकवचनं स्मर।।
आस्तीकस्य वचः श्रुत्वा यः सर्पो न निवर्तते।
शतधा भिधते मूर्ध्नी शिंशपावृक्षको यथा ||

नाग देवता की पूजा का प्रत्यक्ष प्रमाण तथा उसके महत्व के संदर्भ में एक सत्कथा उद्धृत की जाती है-

राजस्थान के बाड़मेर जिला के अन्तर्गत बायतु ग्राम है। वहां एक खीमसींग नाम के राजपूत सपत्नीक रहते थे। वहां रहते हुए उन्हें चालीस वर्ष बीत गये। संतान प्राप्ति न होने के कारण वे ग्राम का परित्याग कर अपने खेत में झोंपड़ी बनाकर रहने लगे। एक दिन खीमसींग को अपने घर के पीछे एक श्वेत नाग दिखाई दिया। पहले तो उन्हें कुछ घबराहट हुई, फिर बाद में उनके मन में आया कि यह सफेद नाग कोई देवता है, अतएव इसका स्वागत करना चाहिए। उन्होंने एक दूध भरा कटोरा नाग के समीप रखा। नाग देवता सब दूध पी गये। बाद में अपने बिल में प्रवेश कर गये। दूसरे दिन भी ऐसा हुआ। इस प्रकार पूरा वर्ष बीत गया। एक दिन नाग देवता ने स्वप्न में प्रकट होकर कहा- तुम लोग चिंतित न हो। मेरी उपासना से तुम्हारा उभय लोकों में कल्याण होगा। तत्पश्चात सभी प्रकार से संपन्न खीमसींग विधिवत् नाग देवता की उपासना में लग गये।

इधर तेजोशाह नाम का एक संतानहीन धनवान व्यापारी मैत्री के कारण वहां खीमसींग से मिलने के लिये आया करता था। प्रसंगवशात् संततिहीनता की चर्चा चलने पर खीमसींग ने उसे भी नाग देवता की उपासना करने का परामर्श दिया। तेजोशाह ने नाग के निवास स्थान पर जाकर निवेदन किया कि यदि उसे पुत्र होगा तो वह खीमसींग और उसके अतिथियों के भोजन वस्त्र आदि का आजीवन व्यय करेगा और नाग देवता का एक सुंदर मंदिर भी बनवाएगा। यह बात उसने अपनी पत्नी से कही और उसे नित्य नागदेव को दूध भोग लगाने का निर्देश दिया। वह वैसा ही करने लगी।

एक दिन संयोग से 200 वैरागी वैष्णव खीमसींग की कुटिया पर आये। पूर्वप्रतिज्ञा के अनुसार जब उनके भोजन आदि की व्यवस्था के लिये वे तेजोशाह के पास गये और अन्न आदि की व्यवस्था करने के लिये उचित द्रव्य मांगा, किंतु तेजोशाह ने कुछ कृपणता दिखलायी। निराश होकर खीमसींग अपनी पत्नी सहित आत्महत्या के विचार से नाग से डंसवाने के लिए उसके बिल के पास गये। संयोगवश उन्हें वहां से एक सुवर्णवलय प्राप्त हो गया। उसे लेकर वे पुनः सेठ के पास गये तथा समुचित भोजनोपयोगी अन्न एवं दक्षिणा द्रव्य को लाकर वैष्णवों को पास उपस्थित किया। वैष्णव समुदाय भी भोजन आदि से संतुष्ट हो यथास्थान चला गया। कुछ दिनों के पश्चात ही नाग देवता की कृपा से तेजोशाह को एक पुत्र की प्राप्ति हुई। तत्पश्चात प्रसन्न होकर उसने नाग देवता के स्थान पर एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया। इस मंदिर में जाने पर अब भी सर्वविष शांत हो जाता है और भक्तों की अभिलाषा पूर्ण होती है।

इस प्रकार की अनेक घटनाएं अन्य देश-प्रदेशों में भी होती रहती हैं। नागों की पूजा प्रायः सभी पर्वतीय क्षेत्रों में विशेष रूप से होती है। इनमें कश्मीर प्रधान है। भारत वर्ष में नागों से संबंधित विस्तृत साहित्य प्राप्त होता है। गरुडपुराण, भविष्यपुराण, आयुर्वेद के चरक, सुश्रुत, भावप्रकाश आदि ग्रंथों में एतत्संबंधी सभी प्रकार के विषयों का संग्रह हुआ है। समग्र भारत में इनकी पूजा एक विशिष्ट देवता के रूप में किये जाने की सुदीर्घ परम्परा है।

पितृपक्ष में परान्न से बचें

 गरुड़ पुराणोक्त पितृपक्ष परान्न निषेध कथा सनातन धर्म में 16 दिनों का पितृपक्ष वर्ष का सबसे सूक्ष्म और संवेदनशील समय माना गया है। गरुड़ पुरा...