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दुर्गाद्वात्रिंशन्नाममाला

||दुर्गाद्वात्रिंशन्नाममाला|| दुर्गा दुर्गार्तिशमनी दुर्गापद्विनिवारिणी। दुर्गमच्छेदिनी दुर्गसाधिनी दुर्गनाशिनी || दुर्गतोद्धारिणी दुर्गानिहन्त्री दुर्गमापहा। दुर्गमज्ञानदा दुर्गदैत्यलोकदवानला॥ दुर्गमा दुर्गमालोका दुर्गमात्मस्वरुपिणी। दुर्गमार्गप्रदा दुर्गमविद्या दुर्गमाश्रिता॥ दुर्गमज्ञानसंस्थाना दुर्गमध्यानभासिनी। दुर्गमोहा दुर्गमगा दुर्गमार्थंस्वरुपिणी॥ दुर्गमासुरसंहन्त्री दुर्गमायुधधारिणी। दुर्गमाङ्गी दुर्गमता दुर्गम्या दुर्गमेश्र्वरी॥ दुर्गभीमा दुर्गभामा दुर्गभा दुर्गदारिणी। नामावलिमिमां यस्तु दुर्गाया मम मानवः॥ पठेत् सर्वभयान्मुक्तो भविष्यति न संशयः॥ ॥इति दुर्गाद्वात्रिंशन्नाममाला संपूर्णा॥

श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्

||श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्|| ईश्वर उवाच: शतनाम प्रवक्ष्यामि श्रृणुष्व कमलानने। यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा प्रीता भवेत् सती॥१॥ ॐ सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचनी। आर्या दुर्गा जया चाद्या त्रिनेत्रा शूलधारिणी॥२॥ पिनाकधारिणी चित्रा चण्डघण्टा महातपाः। मनो बुद्धिरहंकारा चित्तरुपा चिता चितिः॥३॥ सर्वमन्त्रमयी सत्ता सत्यानन्दस्वरुपिणी। अनन्ता भाविनी भाव्या भव्याभव्या सदागतिः॥४॥ शाम्भवी देवमाता च चिन्ता रत्नप्रिया सदा। सर्वविद्या दक्षकन्या दक्षयज्ञविनाशिनी॥५॥ अपर्णानेकवर्णा च पाटला पाटलावती। पट्टाम्बरपरीधाना कलमञ्जीररञ्जिनी॥६॥ अमेयविक्रमा क्रूरा सुन्दरी सरसुन्दरी। वनदुर्गा च मातङ्गी मतङ्गीमुनिपूजिता॥७॥ ब्राह्मी माहेश्वरी चैन्द्री कौमारी वैष्णवी तथा। चामुण्डा चैव वाराही लक्ष्मीश्च पुरुषाकृतिः॥८॥ विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया नित्या च बुद्धिदा। बहुला बहुलप्रेमा सर्ववाहनवाहना॥९॥ निशुम्भशुम्भहननी महिषासुरमर्दिनी। मधुकैटभहन्त्री चण्डमुण्डविनाशिनी॥१०॥ सर्वासुरविनाशा च सर्वदानवघातिनी। सर्वशास्त्रमयी चैव सर्वास्त्रधारिणी तथा॥११॥ अनेकशस्त्रहस्ता च अनेकास्त्रस्य धा...

अर्चाविग्रह की पूजा विधि

अर्चाविग्रह की पूजा विधि श्रीमद् भागवत (*स्कन्ध ११ अध्याय २७*) में भगवान् कृष्ण, उद्धव के पूछने पर अर्चविग्रह की नियत तथा विशिष्ट विधि का वर्णन इस प्रकार करते हैं : भगवान् के अर्चविग्रह रूप का आठ प्रकारों में अर्थात “पत्थर, काष्ठ, धातु, मिटटी, चित्र, बालू, मन या रत्न” में प्रकट होना बतलाया गया है | समस्त जीवों के शरण रूप भगवान् का अर्चविग्रह दो प्रकारों से स्थापित किया जा सकता है, अस्थायी अथवा स्थायी रूप से | किन्तु हे उद्धव, स्थायी अर्चविग्रह का आवाहन हो चुकने पर उसका विसर्जन नही किया जा सकता | जो अर्चविग्रह अस्थायी रूप से स्थापित किया गया हो उसका आवाहन और विसर्जन विकल्प रूप में किया जा सकता है किन्तु ये दोनों अनुष्ठान तब अवश्य करने चाहिए जब अर्चविग्रह को जमीन पर अंकित किया गया हो | अर्चविग्रह को जल से स्नान कराना चाहिए यदि वह मिटटी या काष्ठ से न बनाया गया हो | ऐसा होने पर जल के बिना ही ठीक से सफाई करनी चाहिए | हे उद्धव! मनुष्य को चाहिए कि उत्तम से उत्तम साज Prabhupada_Installationसामग्री भेंट करके मेरे अर्चविग्रह रूप में मेरी पूजा करे | किन्तु भौतिक इच्छा से पूर्णतया मुक्त भक...

राधा जी के सोलह नाम

ब्रह्मवैवर्त पुराण में नारद जी द्वारा राधा जी के 16 नाम बताये गये हैं! आप सभी भक्तों के दर्शनार्थ उन नामों का अर्थ इस प्रकार है - १.राधा---राधेत्येवं च संसिद्धौ राकारो दानवाचकः स्वयं निर्वाणदात्री या सा राधा परिकीर्तिता २. रासेश्वरी --रासेसेश्वरस्यपत्नीयं तेन रासेश्वरी स्मृता रासे च वासो यस्याश्च तेन सा रासवासिनी ३. रासवासिनी -रासेसेश्वरस्य पत्नीयं तेन रासेश्वरी स्मृता रासे च वासो यस्याश्च तेन सा रासवासिनी ४. रसिकेश्वरी -सर्वासां रसिकानां च देवीनामीश्वरी परा प्रवदन्ति पुरा सन्तस्तेन तां रसिकेश्वरीम् ५. कृष्णप्राणाधिका-प्राणाधिका प्रेयसी सा कृष्णस्य परमात्मनः कृष्णप्राणाधिकासा च कृष्णेन परिकीर्तिता ६. कृष्णप्रिया -कृष्णास्यातिप्रिया कान्ता कृष्णो वास्याः प्रियः सदा सर्वैर्देवगणैरुक्ता तेन कृष्णप्रिया स्मृता ७. कृष्णस्वरूपिणी -कृष्णरूपं संनिधातुं या शक्ता चावलीलया सर्वांशैः कृष्णसदृशी तेन कृष्णस्वरूपिणी ८. कृष्ण वामाङ्ग सम्भूता -वामाङ्गार्धेन कृष्णस्य या सम्भूता परा सती कृष्ण वामाङ्ग सम्भूता तेन कृष्णेन कीर्तिता ९. परमान्दरूपिणी -परमानन्दराशिश्च स्वयं मूर्तिमती सती श्रुतिभिः क...

युद्ध के दौरान अपने पुत्र के हाथों मारे गए थे अर्जुन, जानें रहस्य

अर्जुन महाराज पाण्डु एवं रानी कुंती के तीसरे पुत्र थे। ये महाभारत के मुख्य पात्र में से एक व द्रोणाचार्य के शिष्य थे। इनकी माता कुंती का एक नाम पृथा था, जिस कारण अर्जुन 'पार्थ' भी कहलाए। बहुत से लोगों को पता होगा कि अर्जुन की मृत्यु स्वर्ग की यात्रा के दौरान हुई थी। परंतु इसके पहले भी एक बार अर्जुन की मृत्यु हुई और वे पुनः जीवित हुए, इसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। तो आईए आज हम आपको महायोद्धा अर्जुन से जुड़ी इस पूरी कहानी के बारे में बताएं- अश्वमेध यज्ञ महाभारत युद्घ के समाप्त होने के उपरांत एक दिन महर्षि वेदव्यास जी और श्री कृष्ण के कहने पर पांडवों ने अश्वमेध यज्ञ करने का विचार बनाया। शुभ मुहूर्त देखकर यज्ञ का शुभारंभ किया गया और अर्जुन को रक्षक बना कर घोड़ा छोड़ दिया। वह घोड़ा जहां भी जाता, अर्जुन उसके पीछे जाते। अनेक राजाओं ने पांडवों की अधीनता स्वीकार कर ली वहीं कुछ ने मैत्रीपूर्ण संबंधों के आधार पर पांडवों को कर देने की बात मान ली। मणिपुर का राजा था अर्जुन का पुत्र किरात, मलेच्छ व यवन आदि देशों के राजाओं द्वारा यज्ञ को घोड़े में रोकना चाहा तो अर्जुन ने उनके साथ...

वाणासुर वध

ठाकुर श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध के एक विवाह की कथा श्री शुकदेव जी महाराज से सुनने के पश्चात् राजा परीक्षित ने पूछा - हे मुनीश्वर! मैंने सुना है कि अनिरुद्ध जी ने बाणासुर की पुत्री ऊषा से विवाह किया था और इस सब लीला-प्रसंग में भगवान श्रीकृष्ण और शंकर जी का बहुत बड़ा घमासान युद्ध हुआ था। आप कृपा करके यह वृत्तांत भी विस्तार से सुनाइए। श्री शुकदेव जी महाराज कहते हैं - हे राजन! दैत्यराज बलि की कथा तो तुम सुन ही चुके हो, उन्हीं के सौ पुत्रों में ज्येष्ठ था यह औरसपुत्र - बाणासुर। सदा शिवभक्ति में रत रहने वाला, अपनी बात का धनी, उदारता और बुद्धिमत्ता से भरा हुआ, अटल-प्रतिज्ञ बाणासुर का समाज में बड़ा आदर था, जो कि परम सुंदर नगरी शोणितपुर में राज्य करता था। एक बार भगवान शंकर को तांडव करते समय इसने अपनी हज़ार भुजाओं से विभिन्न प्रकार के वाद्य-यंत्र बजाकर भक्तवत्सल और शरणागतरक्षक आशुतोष भगवान को प्रसन्न कर लिया और भोलेनाथ बोले - “तुम्हारी जो इच्छा हो, मुझसे माँग लो” तो बाणासुर ने कहा, ‘हे प्रभु! आप मेरे नगर की रक्षा करते हुए यहीं रहा करें।’ राजन! एक बार का प्रसंग, बाणासुर अपने बल-पौरुष के म...

नवरात्रि विशेष -जरूर पढ़े

१८ मार्च २०१८ रविवार के शुभ मुहूर्त जैसे घटस्थापन, कलश-पूजन श्रीदुर्गा पूजादि करना चा‍हिए। १८ मार्च २०१८ रविवार घटता हुआ मुहूर्त समय.. ०६:२३ से ०७:४५ अवधि .. १ घण्टे २२ मिनट.. प्रतिपदा की तारीख प्रारम्भ... १७ मार्च २०१८ को १८:४१ बजे। प्रतिपदा तिथि समाप्ति १८ मार्च २०१८ को १८:३१ बजे। नवरात्रका प्रयोग प्रारम्भ करनेके पहले सुगन्धयुक्त तैलके उद्वर्तनादिसे मङ्गलस्त्रान करके नित्यकर्म करे और स्थिर शान्तिके पवित्र स्थानमें शुभ मृत्तिकाकी वेदी बनाये । उसमें जौ और गेहूँ – इन दोनोंको मिलाकर बोये । वहीं सोने, चाँदी, ताँबे या मिट्टीके कलशको यथाविधि स्थापन करके गणेशादिका पूजन और पुण्याहवाचन करे और पीछे देवी ( या देव ) के समीप शुभासनपर पूर्व या उत्तर मुख बैठकर.... “मम महामायाभगवती वा मायाधिपति भगवत प्रीतये आयुर्बलवित्तारोयसमादरादिप्राप्तये वा नवरात्रव्रतमहं करिष्ये । यह संकल्प करके मण्डलके मध्यमें रखे हु‌ए कलशपर सोने, चाँदी, धातु, पाषाण, मृत्तिका या चित्रमय मूर्ति विराजमान करे और उसका आवाहन आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्त्रान, वस्त्र, गन्ध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, आचमन, ताम्बू...