मंगलवार, 6 नवंबर 2018

हनुमान जयंती और नरक चतुर्दशी

🔥 *"नरक - चतुर्दशी" एवं* 🔥
      🚩 *"हनुमान - जयंती" पर विशेष* 🚩

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                             *कार्तिक महीने की कृष्ण पक्ष में मनाए जाने वाली पंच पर्व का दूसरा दिन अर्थात कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को "नरक चतुर्दशी" के नाम से जाना जाता है | आज के दिन भगवान श्याम सुंदर कन्हैया ने नरकासुर दैत्य का वध करके उसके कारागार से  सोलह हजार कन्या , युवती एवं नारियों को मुक्त कराकर एक नया जीवन प्रदान किया | प्राचीनकाल में नर्क से मुक्ति पाने के लिए महाराज रंतिदेव ने नरक चतुर्दशी का व्रत करके नर्क जाने से मुक्ति पाई , तभी से इस पृथ्वी लोक में नरक चतुर्दशी का व्रत किया जाने लगा | नरक चतुर्दशी को छोटी दीपावली भी कहते हैं | इसे छोटी दीपावली इसलिए कहा जाता है क्योंकि दीपावली से एक दिन पहले, रात के समय उसी प्रकार दीए के प्रकाश पुंज से रात के तिमिर को दूर भगा दिया जाता है जैसे दीपावली की रात को | यह दीपमालिकायें नरकासुर के वध की प्रसन्नता एवं आततायी के आतंक से छुटकारा मिलने की प्रसन्नता के उपलक्ष्य में सजाई जाती हैं | ऐसी मान्यता है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन प्रातःकाल तेल लगाकर अपामार्ग (चिचड़ी) की पत्तियाँ जल में डालकर स्नान करने से नरक से तो मुक्ति मिलती ही है , साथ ही यदि स्नान के बाद भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण के मन्दिर जाकर दर्शन किया जाय तो रूप में निखार एवं तेज बढता है | इसीलिए इसे "रूपचौदस" भी कहा जाता है |आज के दिन विधि-विधान से पूजा करने वाले व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो स्वर्ग को प्राप्त करते हैं |*

*आज मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त ,अनंत बलवंत हनुमंत लाल जी का जन्मोत्सव भी बड़ी धूमधाम से लोग श्रद्धा एवं भक्ति के साथ मनाते हैं | हनुमान जयंती का पर्व चैत्र मास की पूर्णिमा को भी मनाया जाता है | परंतु महर्षि वाल्मीकि के अनुसार बजरंगबली का जन्म कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी दिन मंगलवार को स्वाति नक्षत्र एवं मेष लग्न में हुआ | बाल्मीकि जी के इस कथन को वायु पुराण में भी समर्थन मिलता है वायु पुराण के अनुसार आज के ही दिन|  हनुमान जी का जन्म हुआ आज नरक चतुर्दशी का व्रत रहने के साथ ही हनुमान जी के प्रति श्रद्धा एवं भक्ति से अनुराग रखते हुए व्रत करके उनका जन्म उत्सव मनाने पर मनुष्य को हनुमान जी की कृपा दृष्टि प्राप्त होती है | तौंतीस करोड़ देवताओं में हनुमान जी को कलयुग का प्रत्यक्ष देवता माना जाता है |  जहां जहां भगवान की कथाएं होती है , जहां भगवान का नाम लिया जाता है हनुमान जी वहां पर बैठकर प्रेम से भगवान्नाम स्मरण का रसपान करते रहते हैं |  मनुष्य को हर प्रकार से अभय दान देने वाले अंजनी पुत्र महाबली हनुमान जी का पूजन श्रद्धा भक्ति के साथ करने से हनुमान जी शीघ्र प्रसन्न होते हैं |  आज मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" देख रहा हूं जगह - जगह पर हनुमान जी का जन्मोत्सव मनाया जा रहा है परंतु उनके बताए आदर्शो पर आज का मनुष्य कदापि नहीं चलना चाहते हैं | आज नौकरों के द्वारा मालिकों से विश्वासघात करना साधारण बात हो गयी है | सेवक का स्वामी के प्रति कैसा आचरण होना चाहिए यदि यह सीखना है तो हनुमान जी के चरित्रों को देखा जा सकता है |*

*नरकासुर का वध एवं हनुमंत लाल जी की जयंती के उपलक्ष्य में दीपदान करके खुशियाँ मनायें |*

🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺

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सभी भगवत्प्रेमियों को *"आज दिवस की मंगलमय कामना*----🙏🏻

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सोमवार, 5 नवंबर 2018

नरक चतुर्दशी

क्यों मनाया जाता है नरक चतुर्दशी (रूप चोदस) का त्यौहार और जानिए इसका महत्व
                               
नरक चतुर्दशी (Narak Chaturdashi) के त्यौहार को रूप चोदस का त्यौहार भी कहा जाता है। कहते है इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर नामक राक्षस का अंत किया था इसलिए इस दिन को नरक चतुर्दशी के रूप में मनाया जाता है और इस त्यौहार को नरक से मुक्ति पाने वाला त्यौहार भी कहा जाता है। यह त्यौहार दिवाली से एक दिन पहले मनाया जाता है। इसलिए इसे रूप चोदस या छोटी दिवाली भी कहा जाता है।

एक पोराणिक कथा के अनुसार इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि को नरकासुर नामक असुर का वध किया था। नरकासुर नाम के असुर ने 16 हजार कन्याओं को बंदी बना कर रखा हुआ था। तब भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर का वध करके सभी कन्याओं को उसके बंधन से मुक्त करवाया। परन्तु समाज में उन कन्याओं को किसी ने स्वीकार नहीं किया। तब भगवान श्री कृष्ण ने समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ मिलकर इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया।

16 हजार कन्याओं को नरकासुर के बंधन से मुक्त करवाने के उपलक्ष्य में नरक चतुर्दशी के दिन दीपदान की परंपरा शुरू हुई।

रंति देव नाम के एक राजा थे जो बहुत ही शांत स्वभाव और पुण्यात्मा थे। उन्होंने अनजाने में भी कोई पाप नहीं किया था। लेकिन जब मृत्यु का समय आया तो उनके समक्ष यमदूत आ खड़े हुए। तब उन्हें पता चला के उनको स्वर्ग लोक नही नरक लोक लेकर जा रहे है।

उन्होंने यमदूत को बोला मैंने तो कभी कोई पाप कर्म नहीं किया फिर आप लोग मुझे लेने क्यों आए हो अथवा मुझे नरक में क्यों लेजाने आये हो। आप मुझ पर कृपा करें और बताएं कि मेरे किस अपराध के कारण मुझे नरक लोक जाना पड़ रहा है।

यह सुनकर यमदूत ने कहा कि हे राजन् एक बार आपके द्वार से एक ब्राह्मण भूखा लौट गया था, यह उसी पाप का कर्मफल है। इसके बाद राजा ने यमदूत से एक वर्ष का समय मांगा। तब यमदूतों ने राजा को उनके स्वभाव के कारण एक वर्ष का समय दे दिया। राजा अपनी भूल सुधारने के लिए ऋषियों और मुनियों के पास पहुंचे और उन्हें अपनी सारी कहानी सुनाकर उनसे इस पाप से मुक्ति का उपाय पूछा।

तब ऋषियों ने उन्हें बताया कि कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन व्रत करें और ब्राह्मणों को भोजन करवा दे। इससे उनके प्रति हुए अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करें। राजा ने वैसा ही किया जैसा ऋषियों ने उन्हें बताया।

इस व्रत के प्रभाव से राजा पाप मुक्त हो गये और एक वर्ष पश्चात् उन्हें विष्णु लोक में स्थान प्राप्त हुआ।

धनतेरस पर ध्यान दें

*धनतेरस पर मां लक्ष्मी और कुबेरजी के साथ ही भगवान धनवंतरि की पूजा की जाती है।*

*भगवान धनवंतरि ब्रह्मांड की सबसे प्राचीन चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद के देव हैं।*

भगवान धनवंतरि को श्रीहरि विष्णु का अवतार माना जाता है। इनकी पूजा से अच्छी सेहत और आरोग्य की प्राप्ति होती है।

*धनतेरस आज, 5 नवंबर को है।*

धनवंतरि जी की पूजा के लिए  मंत्र, पूजा विधि और आरती इस प्रकार है…

*खरीदारी का शुभ मुहूर्त*

सुबह 07:07 से 09:15 बजे तक।
दोपहर 01:00 से 02:30 बजे तक।
शाम 05:35 से 07:30 बजे तक।

*पूजा का शुभ मुहूर्त*

शाम 6:05 से 8:01 बजे तक है।

प्रदोष काल: शाम 5:29 से रात 8:07 बजे तक।

वृषभ काल: शाम 6:05 बजे से रात 8:01 बजे तक।

त्रयोदशी तिथि आरंभ: 5 नवंबर को सुबह 01:24 बजे।

त्रयोदशी तिथि खत्म: 5 नवंबर को रात्रि 11.46 बजे।

*पूजा विधि*

धनतेरस पर भगवान धनवंतरि की पूजा करने के लिए उनकी तस्वीर स्थापित करें।

फिर आचमनी से जल लेकर तीन बार आचमन करें। तस्वीर पर जल छिड़ककर रोली और अक्षत से टीका करें और वस्त्र या कलावा अर्पित करें।

अब सबसे पहले गणपति का मंत्र बोले और उनका ध्यान कर उन्हें प्रणाम करें। क्योंकि गणपति प्रथम पूजनीय हैं और किसी भी पूजा को सफल बनाने के लिए सबसे पहले उनकी पूजा की जाती है।

अब हाथ में फूल और अक्षत लेकर भगवान धनवंतरि का ध्यान करें और प्रणाम करते हुए ये दोनों उन्हें अर्पित कर दें। इसके साथ ही – ‘ओम श्री धनवंतरै नम:’ मंत्र का जप करें।

इसके बाद इस मंत्र द्वारा भगवान धनवंतरि को प्रणाम कर उनकी महिमा का गुणगान करें…

ओम नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धनवंतराये:
अमृतकलश हस्ताय सर्वभय विनाशाय सर्वरोगनिवारणाय।

त्रिलोकपथाय त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णुस्वरूप
श्री धन्वंतरि स्वरूप श्री श्री श्री अष्टचक्र नारायणाय नमः॥

गिरिराज जी का पृथ्वी पर आगमन

🙏🙏

🌹जब भगवान पृथ्वी पर अवतार लेने वाले थे तब भगवान ने गौलोक को नीचे पृथ्वी पर उतरा और गोवर्धन पर्वत ने भारतवर्ष से पश्चिमी  दिशा में शाल्मली द्वीप के भीतर द्रोणाचल की पत्नी के गर्भ से जन्म ग्रहण किया.

🌹एक समय मुनि श्रेष्ठ पुलस्त्य जी तीर्थ यात्रा के लिए भूतल पर भ्रमण करने लगे उन्होंने द्रोणाचल के पुत्र श्यामवर्ण वाले पर्वत गोवर्धन को देखा उन्होंने देखा कि उस पर्वत पर बड़ी शान्ति है जब उन्होंने गोवर्धन कि शोभा देखी तो उन्हें लगा कि यह तो मुमुक्षुओ के लिए मोक्ष प्रद प्रतीत हो रहा  है.

🌹मुनि उसे प्राप्त करने के लिए द्रोणाचल के समीप गए पुलस्त्य जी ने कहा - द्रोण तुम पर्वतों के स्वामी हो मै काशी का निवासी हूँ तुम अपने पुत्र गोवर्धन को मुझे दे दो काशी में साक्षात् विश्वनाथ विराजमान है मै तुम्हारे पुत्र को वहाँ स्थापित करना चाहता हूँ उसके ऊपर रहकर मै तपस्या करूँगा.

🌹पुलस्त्य जी की बात सुनकर द्रोणाचल पुत्र स्नेह में रोने लगे और बोले- मै पुत्र स्नेह से आकुल हूँ फिर भी आपके  श्राप के भय से मै इसे आपको देता हूँ फिर पुत्र से बोले बेटा तुम मुनि के साथ जाओ.

🌹गोवर्धन ने कहा - मुने मेरा शरीर आठ योजन लंबा ,दो योजन चौड़ा है ऐसी दशा में आप मुझे किस प्रकार ले चलोगे.

🌹पुलस्त्य जी ने कहा - बेटा तुम मेरे हाथ पर बैठकर चलो जब तक काशी नहीं आ जाता तब तक मै तुम्हे ढोए चलूँगा.

🌹गोवर्धन ने कहा - मुनि मेरी एक प्रतिज्ञा है आप जहाँ कहि भी भूमि पर मुझे एक बार रख देगे वहाँ की भूमि से मै पुनः उत्थान नहीं करूँगा.

🌹पुलस्त्य जी बोले - में इस शाल्मलद्वीप से लेकर कोसल देश तक तुम्हे कहीं नहीं रखूँगा यह मेरी प्रतिज्ञा है.

🌹इसके बाद पर्वत पाने पिता को प्रणाम करने मुनि की हथेली पर सवार हो गए.पुलस्त्य मुनि चलने लगे. और व्रज मंडल में आ पहुँचे गोवर्धन पर्वत को अपनी पूर्व जन्म की बातो का स्मरण था व्रज में आते ही वे सोचने लगे की यहाँ साक्षात् श्रीकृष्ण अवतार लेगे और सारी लीलाये करेगे. अतः मुझे यहाँ से अन्यत्र नहीं जाना चाहिये. यह यमुना नदी व्रज भूमि गौलोक से यहाँ आये है. और वे अपना भार बढ़ाने लगे.

🌹उस समय मुनि बहुत थक गए थे, उन्हें पहले कही गई बात याद भी नहीं रही. उन्होंने पर्वत को उतार कर व्रज मंडल में रख दिया.थके हुए थे सो जल में स्नान किया.फिर गोवर्धन से कहा - अब उठो ! अधिक भार से संपन्न होने के कारण जब वह दोनों हाथो से भी नहीं उठा. तब उन्होंने अपने तेज से और बल से उठाने का  उपक्रम किया. स्नेह से भी कहते रहे पर वह एक अंगुल भी टस के मस न हुआ.

🌹वे बोले - शीघ्र बताओ ! तुम्हारा क्या प्रयोजन है.

🌹गोवर्धन पर्वत बोला - मुनि इसमें मेरा दोष नहीं है मैंने तो आपसे पहले ही कहा था अब में यहाँ से नहीं उठुगा यह उत्तर सुनकर मुनि क्रोध में जलने लगे और उन्होंने गोवर्धन को श्राप दे दिया.

🌹पुलस्त्य जी बोले - तू बड़ा ढीठ है, इसलिए तू प्रतिदिन तिल-तिल  क्षीण होता चला जायेगा.

🌹यो कहकर पुलस्त्य जी काशी चले गए और उसी दिन से गोवर्धन पर्वत प्रतिदिन तिल तिल क्षीण होते चले जा रहे है.

🌹जैसे यह गौलोक धाम में उत्सुकता पूर्वक बढने लगे थे उसी तरह यहाँ भी बढे तो वह पृथ्वी को ढक देगे यह सोचकर मुनि ने उन्हें प्रतिदिन क्षीण होने का श्राप दे दिया.

🌹जब तक इस भूतल पर भागीरथी गंगा और गोवर्धन पर्वत है, तब तक कलिकाल का प्रभाव नहीं बढ़ेगा.

🙏गिरिराज धरण हम तेरी शरण🙏

🙌"जय जय श्री राधे"🙌

रविवार, 4 नवंबर 2018

गूगल से अनजान खतरा

आज आपको कोई भी जानकारी चाहिये आपके पास एक बहुप्रचलित माध्यम है जिसका नाम है गूगल | गूगल पक आप जो चाहें वो जानकारी कुछ सेकेंड्स में प्राप्त कर सकते हैं |लोगों का मानना है कि गूगल की वजह से जिंदगी आसान हो गयी है | गूगल ने सूचना क्रांति को शिखर पक पहुचाया है| जीवन का हर क्षेत्र आज गूगल के बिना अधूरा लगता है | जिस दिन गूगल ना चले उस दिन लगता है जैसे दुनिया थम गयी हो|
निस्संदेह गूगल ने मानव जीवन को नये बदलाव और नये आयाम दिये हैं|
आइये समझते हैं कि गूगल क्या है और इसका मानव जीवन पर प्रभाव का असर क्या है |
 गूगल अमेरिका की एक मल्टीनेशनल कंपनी है जो इंटरनेट से संबंधित प्रोडेक्ट और सेवायें तैयार करती है तथा ग्राहकों को उपलब्ध कराती है | जिसका सबसे लोकप्रिय उत्पाद है गूगल सर्च इंजन जिसकी लोकप्रियता आज किसी से छुपी नही है गूगल सर्च इंजन दुनिया का सबसे ज्यादा प्रयोग किया जाने वाला उत्पाद है |
  दुनिया में कोई भी वैज्ञानिक खोज मानव मात्र के कल्याण के लिए होता है अगर उसका सदुपयोग किया जाये तो| उदाहरण के लिए एक लुटेरा चाकू से किसी की हत्या कर देता है और उसी चाकू से एक डॉक्टर किसी की जान बचाता है | जैसा कि हमें बचपन से पढाया जा रहा है कि विज्ञान वरदान भी अभिशाप भी |यह निर्भर करता है उसके उपयोग पर|
  आज हम बात करेंगे हमारी सनातन सभ्यता पर गूगल का प्रभाव कैसा है | दुनिया में सबसे ज्यादा आघात हमारी सभ्यता पर हुये हैं फिर भी हमारी सभ्यता अभी तक जीवंत है | आखिर ऐसा कौन सा कारण है कि तमाम आघातो को सहकर हम अभी तक बचे हुये हैं जबकि दुनियां की तमाम सभ्यतायें परम्परायें विलुप्त हो गई | अगर सावधानी से विचार करें तो केवल एक ही कारण रहा वह है हमारी सहनशीलता और सत्य को अनवरत धारण करने की क्षमता | हमारे यहाँ ज्ञान विज्ञान की स्वस्थ परंपरा रही जिसमें गुरू योग्य शिष्य को ही गूढ ज्ञान कंठस्थ कराता है हमारे यहाँ पुस्तकों में लिखी विद्या और दूसरों के हाथ में गये धन को महत्व नही दिया गया| हमारी पूंजी हमारे शास्त्र हैं जिनका हमारे त्यागी तपस्वी परोपकारी महर्षियों मुनियों ने अपने आत्मचिंतन की आग में परिपाक करके जन साधारण को जीवन शैली के रूप में प्रदान किया | और सभ्यताओं में लोग शास्त्र पढते हैं हमारी सभ्यता में लोग शास्त्र जीते हैं |
 गूगल से आने वाले समय में सबसे बड़ा खतरा यह है कि गूगल सारे ज्ञान विज्ञान का एकमात्र संग्रहालय बन जायेगा जिसके दुरूपयोग की संभावना बहुत ज्यादा है | गूगल अपने ऊपर लोगों की निर्भरता का दुरूपयोग कर सकता है | गूगल क्योंकि लोग उसपर यकीन करते हैं अपनी व्याख्या दे सकता है जिसपर लोग ऑख मूदकर विश्वास करेंगे |
 ईमानदारी से कहूं तो गूगल नवसाम्राज्यवाद का जीवंत उदाहरण है जिसके द्वारा दुनिया की बौद्धिकता और तर्क क्षमता पर प्रहार करके पंगु करने का प्रयास किया जा रहा है | हर वैज्ञानिक खोज का सावधानी से और समझदारी से उपयोग करें | जय हिंद |

शनिवार, 3 नवंबर 2018

सूर्य और सात घोडो का रहस्य!

 धर्म में देवी-देवताओं तथा उनसे जुड़ी कहानियों का इतिहास काफी बड़ा है या यूं कहें कि कभी ना खत्म होने वाला यह इतिहास आज विश्व में अपनी एक अलग ही पहचान बनाए हुए है। विभिन्न देवी-देवताओं का चित्रण, उनकी वेश-भूषा और यहां तक कि वे किस सवारी पर सवार होते थे यह तथ्य भी काफी रोचक हैं।

सूर्य रथ....
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हिन्दू धर्म में विघ्नहर्ता गणेश जी की सवारी काफी प्यारी मानी जाती है। गणेश जी एक मूषक यानि कि चूहे पर सवार होते हैं जिसे देख हर कोई अचंभित होता है कि कैसे महज एक चूहा उनका वजन संभालता है। गणेश जी के बाद यदि किसी देवी या देवता की सवारी सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है तो वे हैं सूर्य भगवान।

क्यों जुते हैं सात घोड़े....
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सूर्य भगवान सात घोड़ों द्वारा चलाए जा रहे रथ पर सवार होते हैं। सूर्य भगवान जिन्हें आदित्य, भानु और रवि भी कहा जाता है, वे सात विशाल एवं मजबूत घोड़ों पर सवार होते हैं। इन घोड़ों की लगाम अरुण देव के हाथ होती है और स्वयं सूर्य देवता पीछे रथ पर विराजमान होते हैं।

सात की खास संख्या....
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लेकिन सूर्य देव द्वारा सात ही घोड़ों की सवारी क्यों की जाती है? क्या इस सात संख्या का कोई अहम कारण है? या फिर यह ब्रह्मांड, मनुष्य या सृष्टि से जुड़ी कोई खास बात बताती है। इस प्रश्न का उत्तर पौराणिक तथ्यों के साथ कुछ वैज्ञानिक पहलू से भी बंधा हुआ है।

कश्यप और अदिति की संतानें...
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सूर्य भगवान से जुड़ी एक और खास बात यह है कि उनके 11 भाई हैं, जिन्हें एकत्रित रूप में आदित्य भी कहा जाता है। यही कारण है कि सूर्य देव को आदित्य के नाम से भी जाना जाता है। सूर्य भगवान के अलावा 11 भाई ( अंश, आर्यमान, भाग, दक्ष, धात्री, मित्र, पुशण, सवित्र, सूर्या, वरुण, वमन, ) सभी कश्यप तथा अदिति की संतान हैं।

वर्ष के 12 माह के समान....
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पौराणिक इतिहास के अनुसार कश्यप तथा अदिति की 8 या 9 संतानें बताई जाती हैं लेकिन बाद में यह संख्या 12 बताई गई। इन 12 संतानों की एक बात खास है और वो यह कि सूर्य देव तथा उनके भाई मिलकर वर्ष के 12 माह के समान हैं। यानी कि यह सभी भाई वर्ष के 12 महीनों को दर्शाते हैं।

सूर्यदेव की दो पत्नियां....
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सूर्य देव की दो पत्नियां – संज्ञा एवं छाया हैं जिनसे उन्हें संतान प्राप्त हुई थी। इन संतानों में भगवान शनि और यमराज को मनुष्य जाति का न्यायाधिकारी माना जाता है। जहां मानव जीवन का सुख तथा दुख भगवान शनि पर निर्भर करता है वहीं दूसरी ओर शनि के छोटे भाई यमराज द्वारा आत्मा की मुक्ति की जाती है। इसके अलावा यमुना, तप्ति, अश्विनी तथा वैवस्वत मनु भी भगवान सूर्य की संतानें हैं। आगे चलकर मनु ही मानव जाति का पहला पूर्वज बने।

सूर्य भगवान का रथ....
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सूर्य भगवान सात घोड़ों वाले रथ पर सवार होते हैं। इन सात घोड़ों के संदर्भ में पुराणों तथा वास्तव में कई कहानियां प्रचलित हैं। उनसे प्रेरित होकर सूर्य मंदिरों में सूर्य देव की विभिन्न मूर्तियां भी विराजमान हैं लेकिन यह सभी उनके रथ के साथ ही बनाई जाती हैं।

कोणार्क मंदिर...
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विशाल रथ और साथ में उसे चलाने वाले सात घोड़े तथा सारथी अरुण देव, यह किसी भी सूर्य मंदिर में विराजमान सूर्य देव की मूर्ति का वर्णन है। भारत में प्रसिद्ध कोणार्क का सूर्य मंदिर भगवान सूर्य तथा उनके रथ को काफी अच्छे से दर्शाता है।

सात से कम या ज्यादा क्यों नहीं...
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लेकिन इस सब से हटकर एक सवाल काफी अहम है कि आखिरकार सूर्य भगवान द्वारा सात ही घोड़ों की सवारी क्यों की जाती हैं। यह संख्या सात से कम या ज्यादा क्यों नहीं है। यदि हम अन्य देवों की सवारी देखें तो श्री कृष्ण द्वारा चालए गए अर्जुन के रथ के भी चार ही घोड़े थे, फिर सूर्य भगवान के सात घोड़े क्यों? क्या है इन सात घोड़ों का इतिहास और ऐसा क्या है इस सात संख्या में खास जो सूर्य देव द्वारा इसका ही चुनाव किया गया।

सात घोड़े और सप्ताह के सात दिन....
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सूर्य भगवान के रथ को संभालने वाले इन सात घोड़ों के नाम हैं - गायत्री, भ्राति, उस्निक, जगति, त्रिस्तप, अनुस्तप और पंक्ति। कहा जाता है कि यह सात घोड़े एक सप्ताह के सात दिनों को दर्शाते हैं। यह तो महज एक मान्यता है जो वर्षों से सूर्य देव के सात घोड़ों के संदर्भ में प्रचलित है लेकिन क्या इसके अलावा भी कोई कारण है जो सूर्य देव के इन सात घोड़ों की तस्वीर और भी साफ करता है।

सात घोड़े रोशनी को भी दर्शाते हैं...
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पौराणिक दिशा से विपरीत जाकर यदि साधारण तौर पर देखा जाए तो यह सात घोड़े एक रोशनी को भी दर्शाते हैं। एक ऐसी रोशनी जो स्वयं सूर्य देवता यानी कि सूरज से ही उत्पन्न होती है। यह तो सभी जानते हैं कि सूर्य के प्रकाश में सात विभिन्न रंग की रोशनी पाई जाती है जो इंद्रधनुष का निर्माण करती है।

बनता है इंद्रधनुष....
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यह रोशनी एक धुर से निकलकर फैलती हुई पूरे आकाश में सात रंगों का भव्य इंद्रधनुष बनाती है जिसे देखने का आनंद दुनिया में सबसे बड़ा है।

प्रत्येक घोड़े का रंग भिन्न...
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सूर्य भगवान के सात घोड़ों को भी इंद्रधनुष के इन्हीं सात रंगों से जोड़ा जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि यदि हम इन घोड़ों को ध्यान से देखें तो प्रत्येक घोड़े का रंग भिन्न है तथा वह एक-दूसरे से मेल नहीं खाता है। केवल यही कारण नहीं बल्कि एक और कारण है जो यह बताता है कि सूर्य भगवान के रथ को चलाने वाले सात घोड़े स्वयं सूरज की रोशनी का ही प्रतीक हैं।

पौराणिक गाथा से इतर....
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यदि आप किसी मंदिर या पौराणिक गाथा को दर्शाती किसी तस्वीर को देखेंगे तो आपको एक अंतर दिखाई देगा। कई बार सूर्य भगवान के रथ के साथ बनाई गई तस्वीर या मूर्ति में सात अलग-अलग घोड़े बनाए जाते हैं, ठीक वैसा ही जैसा पौराणिक कहानियों में बताया जाता है लेकिन कई बार मूर्तियां इससे थोड़ी अलग भी बनाई जाती हैं।

अलग-अलग घोड़ों की उत्पत्ति....
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कई बार सूर्य भगवान की मूर्ति में रथ के साथ केवल एक घोड़े पर सात सिर बनाकर मूर्ति बनाई जाती है। इसका मतलब है कि केवल एक शरीर से ही सात अलग-अलग घोड़ों की उत्पत्ति होती है। ठीक उसी प्रकार से जैसे सूरज की रोशनी से सात अलग रंगों की रोशनी निकलती है। इन दो कारणों से हम सूर्य भगवान के रथ पर सात ही घोड़े होने का कारण स्पष्ट कर सकते हैं।

सारथी अरुण...
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पौराणिक तथ्यों के अनुसार सूर्य भगवान जिस रथ पर सवार हैं उसे अरुण देव द्वारा चलाया जाता है। एक ओर अरुण देव द्वारा रथ की कमान तो संभाली ही जाती है लेकिन रथ चलाते हुए भी वे सूर्य देव की ओर मुख कर के ही बैठते है !

केवल एक ही पहिया....
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रथ के नीचे केवल एक ही पहिया लगा है जिसमें 12 तिल्लियां लगी हुई हैं। यह काफी आश्चर्यजनक है कि एक बड़े रथ को चलाने के लिए केवल एक ही पहिया मौजूद है, लेकिन इसे हम भगवान सूर्य का चमत्कार ही कह सकते हैं। कहा जाता है कि रथ में केवल एक ही पहिया होने का भी एक कारण है।

पहिया एक वर्ष को दर्शाता है...
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यह अकेला पहिया एक वर्ष को दर्शाता है और उसकी 12 तिल्लियां एक वर्ष के 12 महीनों का वर्णन करती हैं। एक पौराणिक उल्लेख के अनुसार सूर्य भगवान के रथ के समस्त 60 हजार वल्खिल्या जाति के लोग जिनका आकार केवल मनुष्य के हाथ के अंगूठे जितना ही है, वे सूर्य भगवान को प्रसन्न करने के लिए उनकी पूजा करते हैं। इसके साथ ही गांधर्व और पान्नग उनके सामने गाते हैं औरअप्सराएं उन्हें खुश करने के लिए नृत्य प्रस्तुत करती हैं।

ऋतुओं का विभाजन...
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कहा जाता है कि इन्हीं प्रतिक्रियाओं पर संसार में ऋतुओं का विभाजन किया जाता है। इस प्रकार से केवल पौराणिक रूप से ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों से भी जुड़ा है भगवान सूर्य का यह विशाल रथ।
✏️ऊँ घृणि: सुर्य आदित्योम् ️✏️
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विवाहिता स्त्री को गुरू करना चाहिये या नहीं ?

विवाहिता स्त्री को गुरू करना चाहिये या नहीं ? आइए इसके बारे में हमारे शास्त्र क्या कहते हैं ,देखें। पति प्रतिकूल जनम जहँ जाई। बिधवा होइ पाइ तरुनाई॥

गुरूग्निद्विर्जातिनां वर्णाणां ब्रह्मणो गुरूः।
पतिरेकोगुरू स्त्रीणां सर्वस्याम्यगतो गुरूः।।
(पदम पुं . स्वर्ग खं 40-75)_

अर्थ : *अग्नि ब्राह्मणो का गुरू है।अन्य वर्णो का ब्राह्मण गुरू है। एक मात्र उनका पति ही स्त्रीयों का गुरू है, तथा अतिथि सब का गुरू है।

पतिर्बन्धु गतिर्भर्ता दैवतं गुरूरेव च।
सर्वस्याच्च परः स्वामी न गुरू स्वामीनः परः।।
(ब्रह्मवैवतं पु. कृष्ण जन्म खं 57-11)

अर्थ > *स्त्रियों का सच्चा बन्धु पति है, पति ही उसकी गति है। पति ही उसका एक मात्र देवता है। पति ही उसका स्वामी है और स्वामी से ऊपर उसका कोई गुरू नहीं।।

भर्ता देवो गुरूर्भता धर्मतीर्थव्रतानी च।
तस्मात सर्वं परित्यज्य पतिमेकं समर्चयेत्।।
(स्कन्द पु. काशी खण्ड पूर्व 30-48)

अर्थ > *स्त्रियों के लिए पति ही इष्ट देवता है। पति ही गुरू है। पति ही धर्म है, तीर्थ और व्रत आदि है। स्त्री को पृथक कुछ करना अपेक्षित नहीं है।

दुःशीलो दुर्भगो वृध्दो जड़ो रोग्यधनोSपि वा।
पतिः स्त्रीभिर्न हातव्यो लोकेप्सुभिरपातकी।।
(श्रीमद् भा. 10-29-25)

अर्थ > *पतिव्रता स्त्री को पति के अलावा और किसी को पूजना नहीं चाहिए, चाहे पति बुरे स्वभाव वाला हो, भाग्यहीन, वृध्द, मुर्ख, रोगी या निर्धन हो। पर वह पातकी न होना चाहिए।

रामचरितमानस के अरण्यकांड में माता अनसूयाजी ने मातासीता को पतिव्रतधर्म का उपदेश देते हुये कहा था, पढ़े भावार्थ सहित।

*मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी॥
अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही॥

भावार्थ:-हे राजकुमारी! सुनिए- माता, पिता, भाई सभी हित करने वाले हैं, परन्तु ये सब एक सीमा तक ही (सुख) देने वाले हैं, परन्तु हे जानकी! पति तो (मोक्ष रूप) असीम (सुख) देने वाला है। वह स्त्री अधम है, जो ऐसे पति की सेवा नहीं करती॥

* धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥
बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अंध बधिर क्रोधी अति दीना॥

भावार्थ:-धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री- इन चारों की विपत्ति के समय ही परीक्षा होती है। वृद्ध, रोगी, मूर्ख, निर्धन, अंधा, बहरा, क्रोधी और अत्यन्त ही दीन-॥

*ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना। नारि पाव जमपुर दुख नाना॥
एकइ धर्म एक ब्रत नेमा। कायँ बचन मन पति पद प्रेमा॥

भावार्थ:-ऐसे भी पति का अपमान करने से स्त्री यमपुर में भाँति-भाँति के दुःख पाती है। शरीर, वचन और मन से पति के चरणों में प्रेम करना स्त्री के लिए, बस यह एक ही धर्म है, एक ही व्रत है और एक ही नियम है॥

*जग पतिब्रता चारि बिधि अहहीं। बेद पुरान संत सब कहहीं॥
उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं॥

भावार्थ:-जगत में चार प्रकार की पतिव्रताएँ हैं। वेद, पुराण और संत सब ऐसा कहते हैं कि उत्तम श्रेणी की पतिव्रता के मन में ऐसा भाव बसा रहता है कि जगत में (मेरे पति को छोड़कर) दूसरा पुरुष स्वप्न में भी नहीं है॥

*मध्यम परपति देखइ कैसें। भ्राता पिता पुत्र निज जैसें॥
धर्म बिचारि समुझि कुल रहई। सो निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कहई॥

भावार्थ:-मध्यम श्रेणी की पतिव्रता पराए पति को कैसे देखती है, जैसे वह अपना सगा भाई, पिता या पुत्र हो (अर्थात समान अवस्था वाले को वह भाई के रूप में देखती है, बड़े को पिता के रूप में और छोटे को पुत्र के रूप में देखती है।) जो धर्म को विचारकर और अपने कुल की मर्यादा समझकर बची रहती है, वह निकृष्ट (निम्न श्रेणी की) स्त्री है, ऐसा वेद कहते हैं॥

*बिनु अवसर भय तें रह जोई। जानेहु अधम नारि जग सोई॥
पति बंचक परपति रति करई। रौरव नरक कल्प सत परई॥

भावार्थ:-और जो स्त्री मौका न मिलने से या भयवश पतिव्रता बनी रहती है, जगत में उसे अधम स्त्री जानना। पति को धोखा देने वाली जो स्त्री पराए पति से रति करती है, वह तो सौ कल्प तक रौरव नरक में पड़ी रहती है॥

*छन सुख लागि जनम सत कोटी। दुख न समुझ तेहि सम को खोटी॥
बिनु श्रम नारि परम गति लहई। पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई॥

भावार्थ:-क्षणभर के सुख के लिए जो सौ करोड़ (असंख्य) जन्मों के दुःख को नहीं समझती, उसके समान दुष्टा कौन होगी। जो स्त्री छल छोड़कर पतिव्रत धर्म को ग्रहण करती है, वह बिना ही परिश्रम परम गति को प्राप्त करती है॥

*पति प्रतिकूल जनम जहँ जाई। बिधवा होइ पाइ तरुनाई॥

भावार्थ:-किन्तु जो पति के प्रतिकूल चलती है, वह जहाँ भी जाकर जन्म लेती है, वहीं जवानी पाकर (भरी जवानी में) विधवा हो जाती है॥

* सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ।
जसु गावत श्रुति चारि अजहुँ तुलसिका हरिहि प्रिय॥

भावार्थ:-स्त्री जन्म से ही अपवित्र है, किन्तु पति की सेवा करके वह अनायास ही शुभ गति प्राप्त कर लेती है। (पतिव्रत धर्म के कारण ही) आज भी 'तुलसीजी' भगवान को प्रिय हैं और चारों वेद उनका यश गाते हैं॥

वेदों, पुराणों, भागवत आदि शास्त्रो ने स्त्री को बाहर का गुरू न करने के लिए कहा यह शास्त्रों के उपरोक्त श्लोकों से ज्ञात होता है। *आज हर स्त्री बाहर के गुरूओं के पीछे पागलों की तरह पड जाती हैं तथा उनके पीछे अपने पति की कड़े परिश्रम की कमाई लुटाती फिरती हैं।

आज सत्संग आध्यात्मिक ज्ञान की जगह न होकर व्यापारिक स्थलबन गया है।इसलिए सावधान हो जाइये।

गुरू करने से पहले देख लो कि वह गुरू जिन शास्त्रों का सहारा लेकर हमें ज्ञान दे रहा है, वह स्वयं उस पर कितना चल रहा है? हिन्दू धर्म में पति के रहते किसी को गुरु बनाने की इजाजत नहीं है। आप कोई भी समागम देख लो,  औरतो ने ही भीड़ लगाई हुई है। बाबा की सेवा करके मोक्ष प्राप्त करना है बस..!!

खुद फैसला कीजिये । बदलाव कहाँ चहिये ।।

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