शनिवार, 9 दिसंबर 2017

भगवान सूर्य के ये 21 नाम

भगवान सूर्य ने श्रीकृष्ण पुत्र साम्ब को अपने 21 नाम बताये जो ‘स्तवराज’ के नाम से भी जाने जाते हैं–

ॐ विकर्तनो विवस्वांश्च मार्तण्डो भास्करो रवि:।
लोकप्रकाशक: श्रीमान् लोकचक्षुर्महेश्वर:।।
लोकसाक्षी त्रिलोकेश: कर्ता हर्ता तमिस्त्रहा।
तपनस्तापनश्चैव शुचि: सप्ताश्ववाहन:।।
गभस्तिहस्तो ब्रह्मा च सर्वदेवनमस्कृत:।। (भविष्यपुराण)

भगवान सूर्य के ये 21 नाम हैं–

विकर्तन (विपत्तियों को नष्ट करने वाला)
विवस्वान् (प्रकाशरूप)
मार्तण्ड
भास्कर
रवि
लोकप्रकाशक
श्रीमान्
लोकचक्षु
ग्रहेश्वर
लोकसाक्षी
त्रिलोकेश
कर्ता
हर्ता
तमिस्त्रहा (अन्धकार को नष्ट करने वाले)
तपन
तापन
शुचि (पवित्रतम)
सप्ताश्ववाहन (जिनका वाहन सात घोड़ों वाला रथ है)
गभस्तिहस्त (किरणें ही जिनके हाथ हैं)
ब्रह्मा
सर्वदेवनमस्कृत।

सदगृहस्थों के लक्षण

सदगृहस्थों के लक्षण बताते हुए महर्षि अत्रि कहते हैं कि
अनसूया, शौच, मंगल, अनायास, अस्पृहा, दम, दान तथा दया

– ये आठ श्रेष्ठ विप्रों तथा सदगृहस्थों के लक्षण हैं। यहाँ इनका संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा हैः

अनसूयाः जो गुणवानों के गुणों का खंडन नहीं करता, स्वल्प
गुण रखने वालों की भी प्रशंसा करता है और दूसरों के दोषों को देखकर उनका परिहास नहीं करता – यह भाव अनसूया कहलाता है।

शौचः अभक्ष्य-भक्षण का परित्याग, निंदित व्यक्तियों का
संसर्ग न करना तथा आचार – (शौचाचार-सदाचार) विचार का परिपालन – यह शौच कहलाता है।

मंगलः श्रेष्ठ व्यक्तियों तथा शास्त्रमर्यादित प्रशंसनीय
आचरण का नित्य व्यवहार, अप्रशस्त (निंदनीय) आचरण का परित्याग –इसे धर्म के तत्त्व को जानने वाले महर्षियों द्वारा ʹ मंगल ʹ नाम से कहा गया है।

अनायासः जिस शुभ अथवा अशुभ कर्म के द्वारा शरीर
पीड़ित होता हो, ऐसे व्यवहार को बहुत अधिक न करना अथवा सहज भाव से आसानीपूर्वक किया जा सके उसे करने का भाव ʹअनायास ʹकहलाता है।

अस्पृहाः स्वयं अपने-आप प्राप्त हुए पदार्थ में सदा संतुष्ट रहना और दूसरे की स्त्री की अभिलाषा नहीं रखना – यह भाव ʹअस्पृहाʹकहलाता है।

दमः जो दूसरे के द्वारा उत्पन्न बाह्य (शारीरिक) अथवा
आध्यात्मिक दुःख या कष्ट के प्रतिकारस्वरूप उस पर न तो कोई कोप करता है और न उसे मारने की चेष्टा करता है अर्थात् कियी भी प्रकार से न तो स्वयं उद्वेग की स्थिति में होता है और न दूसरे को उद्वेलित करता है, उसका यह समता में स्थित रहने का भाव ʹदम ʹ कहलाता है।

दानः ʹप्रत्येक दिन दान देना कर्तव्य है ʹ - यह समझकर अपने स्वल्प में भी अंतरात्मा से प्रसन्न होकर प्रयत्नपूर्वक यत्किंचित देनाʹदान ʹकहलाता है।

दयाः दूसरे में, अपने बंधुवर्ग में, मित्र में, शत्रु में, तथा द्वेष करने वाले में अर्थात् सम्पूर्ण चराचर संसार में एवं सभी प्राणियों में अपने समान ही सुख-दुःख की प्रतीति करना और सबमें आत्मभाव-परमात्मभाव समझकर सबको अपने ही समान समझकर प्रीति का व्यवहार करना – ऐसा भाव ʹदया कहलाता है।

महर्षि अत्रि कहते हैं, इन लक्षणों से युक्त शुद्ध सदगृहस्थ अपने उत्तम धर्माचरण से श्रेष्ठ स्थान को प्राप्त कर लेता है, पुनः उसका जन्म नहीं होता और वह मुक्त हो
जाता हैः

      यश्चैतैर्लक्षणैर्युक्तो गृहस्थोઽपि भवेद् द्विजः।
          स गच्छति परं स्थानं जायते नेह वै पुनः।।

श्रीकृष्ण की ही पूजा क्यों की जाए

हमारे शास्त्रों में तो ३३ करोड़ देवी देवताअों का वर्णन है, तो श्रीकृष्ण की ही पूजा क्यों की जाए
अापकी बात सही है कि हमें शास्त्रों में जो वर्णित है उसके अनुसार ही कार्य करना चाहिए। यदि अाप शास्त्र ध्यानपूर्वक पढ़ेंगे तो पायेंगे कि श्रीकृष्ण ही वे परम भगवान् हैं जो सभी देवी–देवताअाें के स्रोत हैं अौर जिनकी पूजा सभी देवी–देवता करते हैं। श्रीकृष्ण भगवद्गीता में बताते हैं –
अहमादिर्हि देवानां – मैं ही सभी देवताअों का स्रोत हूॅं। अहं सर्वस्य प्रभवो – मेरे से ही सबकुछ अाता है।

श्रीकृष्ण मूल परम पुरुषोत्तम भगवान् हैं अाैर विष्णु उनके विस्तार हैं। ब्रह्माजी का जन्म गर्भोदकक्षायी विष्णु की नाभि से प्रकट हुए कमल पर होता है। अाैर अन्य सभी देवताअाें की उत्पत्ति ब्रह्माजी से होती है। अथर्व वेद,गोपाल तपनी उपनिषद (१.२४) में कहा गया है,

यो ब्रह्मनं विदधति पूर्वं यो वै, वेदांश्च गपयति स्म कृष्णः – श्रीकृष्ण ही हैं जिन्होंने प्रारम्भ में ब्रह्माजी को वैदिक ज्ञान दिया था।
नारायण उपनिषद में बताया गया है –
नारायणाद् ब्रह्मा जायते, नारायणाद् प्रजापतिः प्रजायते,
नारायणाद् इन्द्रो जायते, नारायणाद् अष्टो वसवो जयन्ते,
नारायणाद् एकादश रुद्र जयन्ते, नारायणाद् द्वादशादित्यः
नारायण से ही ब्रह्माजी का जन्म हुअा, नारायण से सभी प्रजापति उत्पन्न हुए। नारायण से इन्द्र का जन्म हुअा, नारायण से अाठ वसु उत्पन्न हुए, नारायण से ग्यारह रुद्र पैदा हुए, नारायण से बारह अादित्य का जन्म हुअा।

ब्रह्माजी स्वयं कहते हैं –

ईश्वरः परम कृष्ण सच्चिदानंद विग्रह I
अनादिः अादि गोविंद सर्व कारण कारणम् II

भगवान् कृष्ण ही परम नियन्ता हैं अाैर वे सभी के मूल स्रोत एवं सभी कारणो के कारण हैं।जो व्यक्ति परम भगवान् अौर देवताअों को एक ही स्तर पर मानता है उसे शास्त्र पाषण्डी कहते हैं।
रिग वेद (१.२२.२०) में कहा गया है –
ॐ तद् विष्णुं परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः – भगवान् विष्णु के चरण कमल सभी देवताअों के लिए परम वंदनीय हैं।

शास्त्रों में अाैर भी अनेक श्लोक हैं जिनका अध्ययन करने पर यह प्रमाणित हो जाता है कि श्रीकृष्ण या नारायण या विष्णु ही परम भगवान् हैं। अाैर बाकी सभी उनके अाधिपत्य में हैं। श्रीकृष्ण सरकार में उन राजा या प्रधानमंत्री के समान हैं जिनकी अाज्ञानुसार सभी मंत्री अनेक सेवाअाें में सेवारत रहते हैं।
यह भी सर्वविदित है कि जब भी ब्रह्माण में रावण, हिरण्यकाशिपु, कंस इत्यादि जैसे असुरों द्वारा अापदाएॅं अाती हैं तो सभी देवता ब्रह्माजी के नेतृत्व में भगवान् विष्णु की ही शरण लेते हैं।
तो बुद्धिमत्ता क्या परम भगवान् विष्णु की पूजा करने में नहीं है? यदि हम पेड़ की जड़ में पानी डालेंगे तो क्या हमें कुछ अाैर करने की अावश्यकता है?
अब प्रश्न यह उठता है कि यदि भगवान् विष्णु किसी की कोई भी इच्छा पूर्ण करने में सक्षम हैं तो अधिकांश लोग उनकी शरण न लेकर देवताअों की शरण क्यों लेते हैं?
देवता अपने उपासकों को उनकी इच्छानुसार वस्तुएॅं प्रदान करते हैं अौर वे यह नहीं देखते कि वह वस्तु उसके लिए अच्छी है या बुरी। जैसे कि दुकानदार बच्चे को चाॅकलेट बेचते समय यह नहीं सोचता कि यह चाॅकलेट बच्चे के दांतों के लिए अच्छी है या बुरी। किन्तु श्रीकृष्ण उन प्रेमी पिता के समान हैं जो अपने भक्तों को वो ही प्रदान करते है जो उनकी अाध्यात्मिक प्रगति के लिए अच्छा है अर्थात् जो उनके लिए अावश्यक है न कि जो वह चाहता है।लालची लोग शीघ्र ही फल प्राप्त करने हेतु देवताअों की पूजा करते हैं। किन्तु वे यह नहीं सोचते कि देवताअों द्वारा प्रदान किए फल नश्वर हैं अौर थोड़े समय के पश्चात् नष्ट होने वाले हैं।
अज्ञानता अौर भौतिक अासक्तियों के कारण अधिकांश लोग भौतिक सुखों के पीछे ही पागल हैं अौर वे मुक्ति का शाश्वत् अाध्यात्मिक सुख का न तो ज्ञान रखते हैं अौर न ही उसकी अभिलाषा रखते हैं। अौर जन्म–जन्मातंर तक इस भौतिक जगत् में जन्म, मृत्यु, जरा एवं व्याधि सहित अनेक कष्ट भोगते रहते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि देवता जीव को मुक्ति प्रदान नहीं कर सकते, उनके पास इस ब्रह्माण्ड में केवल सीमित अाधिपत्य है। उनकी स्थिति कम्पनी के उस मैनेजर के समान है जिसके पास केवल उसके विभाग का नियन्त्रण है।हिरण्यकाशिपु ने अमरत्व प्राप्त करने के लिए ब्रह्माजी को प्रसन्न करने हेतु हजारों–लाखों वर्षों तक कठोर तपस्या की। किन्तु ब्रह्माजी ने प्रकट होकर कहा, मैं स्वयं ही अमर नहीं हूॅं तो तुम्हें कैसे अमरत्व का वरदान दे सकता हूॅं।मुक्ति प्रदान कर शाश्वत् अाध्यात्मिक सुख तो श्रीकृष्ण ही प्रदान कर सकते हैं, श्वेताश्वर उपनिषद् (३.८) में बताया गया है – तं एव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पंथाः विद्यते अयन्य – केवल उन परम भगवान् को जानने के पश्चात् ही कोई मृत्यु को पार कर दिव्यता को प्राप्त कर सकता है, अौर कोई अन्य उपाय नहीं है।शिवजी भी श्रीकृष्ण की विशेष स्थिति की पुष्टि करते हैं – मुक्ति प्रदाता सर्वेषां विष्णुरेव न संशयः – इसमें कोई संदेह नहीं है कि विष्णु ही सभी को मुक्ति प्रदान कर सकते हैं।तो चुनाव हमें करना होगा क्या हम नश्वर सुख चाहते हैं या शाश्वत् अाध्यात्मिक सुख?

अनजाने में किये हुये पाप का प्रायश्चित कैसे होता है


धनके लिये झूठ, कपट, बेईमानी आदि करनेसे जितनी हानि होती है, उतना लाभ होता ही नहीं अर्थात् उतना धन आता ही नहीं और जितना धन आता है, उतना पूरा-का-पूरा काम आता ही नहीं । अतः थोड़ेसे लाभके लिये इतनी अधिक हानि करना कहाँकी बुद्धिमानी है ?
अन्यायपूर्वक कमाया हुआ धन हमारे काम आ जाय‒यह नियम नहीं है; परन्तु उसका दण्ड भोगना पड़ेगा‒यह नियम है ।
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श्रीमद्भागवत जी के षष्ठम स्कन्ध में , महाराज राजा परीक्षित जी ,श्री शुकदेव जी से ऐसा प्रश्न कर लिए ।

बोले भगवन - आपने  पञ्चम स्कन्ध में जो नरको का वर्णन  किया ,उसको सुनकर तो गुरुवर  रोंगटे खड़े जाते हैं।

प्रभूवर मैं आपसे ये पूछ रहा हूँ की यदि  कुछ पाप हमसे अनजाने में हो जाते हैं ,जैसे चींटी मर गयी,हम लोग स्वास लेते हैं तो कितने जीव श्वासों के माध्यम से मर जाते हैं। भोजन बनाते समय लकड़ी जलाते हैं ,उस लकड़ी में भी कितने जीव मर जाते हैं । और ऐसे कई पाप हैं जो अनजाने हो जाते हैं ।

तो उस पाप से मुक्ती का क्या उपाय है  भगवन ।
आचार्य शुकदेव जी ने कहा राजन ऐसे पाप से मुक्ती के लिए रोज प्रतिदिन पाँच प्रकार के यज्ञ  करने चाहिए ।

महाराज परीक्षित जी ने कहा, भगवन एक यज्ञ यदि कभी करना पड़ता है तो सोंचना पड़ता है ।आप पाँच यज्ञ रोज कह रहे हैं ।
यहां पर आचार्य शुकदेव जी हम सभी मानव के  कल्याणार्थ कितनी सुन्दर बात बता रहे हैं ।

बोले राजन  पहली यज्ञ है -जब घर में रोटी बने तो पहली रोटी  गऊ ग्रास के लिए निकाल देना चाहिए ।

दूसरी यज्ञ है राजन -चींटी को दस पाँच ग्राम आटा रोज वृक्षों की जड़ो के पास डालना चाहिए।

तीसरी यज्ञ है राजन्-पक्षियों को अन्न रोज डालना चाहिए ।

चौथी यज्ञ है राजन् -आँटे की गोली बनाकर रोज जलाशय में मछलियो को डालना चाहिए ।

पांचवीं यज्ञ है राजन् भोजन बनाकर अग्नि भोजन , रोटी बनाकर उसके टुकड़े करके उसमे घी चीनी मिलाकर
अग्नि को भोग लगाओ।
 राजन् अतिथि सत्कार  खूब करें, कोई भिखारी आवे तो उसे जूठा अन्न कभी भी भिक्षा में न दे ।

राजन् ऐसा करने से अनजाने में किये हुए पाप से मुक्ती मिल जाती है ।
हमे उसका दोष नहीं लगता ।उन पापो का फल हमे नहीं भोगना पड़ता।

राजा ने पुनः पूछ लिया ,भगवन यदि
गृहस्त में रहकर ऐसी यज्ञ न हो पावे तो और कोई उपाय हो सकता है क्या।

तब यहां पर श्री शुकदेव जी कहते हैं
राजन् 

    कर्मणा  कर्मनिर्हांरो न ह्यत्यन्तिक इष्यते।
अविद्वदधिकारित्वात् प्रायश्चितं विमर्शनम् ।।

नरक से मुक्ती पाने के लिए हम प्रायश्चित करें। कोई ब्यक्ति तपस्या के द्वारा प्रायश्चित करता है।कोई ब्रह्मचर्य पालन करके प्रायश्चित करता है।कोई ब्यक्ति यम,नियम,आसन के द्वारा प्रायश्चित करता है।लेकिन मैं तो ऐसा मानता हूँ राजन्!

   केचित् केवलया भक्त्या  वासुदेव
परायणः  ।

राजन्  केवल हरी नाम संकीर्तन से ही
जाने और अनजाने में किये हुए को नष्ट करने की सामर्थ्य है ।

इस लिए हे राजन् !----- सुनिए

स्वास स्वास पर कृष्ण भजि बृथा स्वास जनि खोय।
न जाने या स्वास की आवन होय न होय। ।
राजन् किसी को पता नही की जो स्वास अंदर जा रही है वो लौट कर वापस आएगी की नही ।

इस लिए सदैव हरी का जपते रहो ।

मैं तो जी महराज आप सबसे यह निवेदन 🙏🏻करना चाहूँगा की, भगवान  राम और कृष्ण के नाम को जपने के लिए कोई भी नियम की जरूरत नही होती है।

कहीं भी कभी भी  किसी भी समय सोते जागते उठते बैठते गोविन्द का नाम रटते रहो।

      जय श्री कृष्णा राधे राधे कृष्णा

कर्मफल का विधान


भगवान ने नारद जी से कहा आप भ्रमण करते रहते हो कोई ऐसी घटना बताओ जिसने तम्हे असमंजस मे डाल दिया हो...
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नारद जी ने कहा प्रभु अभी मैं एक जंगल से आ रहा हूं, वहां एक गाय दलदल में फंसी हुई थी। कोई उसे बचाने वाला नहीं था।
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तभी एक चोर उधर से गुजरा, गाय को फंसा हुआ देखकर भी नहीं रुका, उलटे उस पर पैर रखकर दलदल लांघकर निकल गया।
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आगे जाकर उसे सोने की मोहरों से भरी एक थैली मिल गई।
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थोड़ी देर बाद वहां से एक वृद्ध साधु गुजरा। उसने उस गाय को बचाने की पूरी कोशिश की।
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पूरे शरीर का जोर लगाकर उस गाय को बचा लिया लेकिन मैंने देखा कि गाय को दलदल से निकालने के बाद वह साधु आगे गया तो एक गड्ढे में गिर गया और उसे चोट लग गयी ।
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भगवान बताइए यह कौन सा न्याय है।
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भगवान मुस्कुराए, फिर बोले नारद यह सही ही हुआ।
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जो चोर गाय पर पैर रखकर भाग गया था, उसकी किस्मत में तो एक खजाना था लेकिन उसके इस पाप के कारण उसे केवल कुछ मोहरे ही मिलीं।
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वहीं उस साधु को गड्ढे में इसलिए गिरना पड़ा क्योंकि उसके भाग्य में मृत्यु लिखी थी लेकिन गाय के बचाने के कारण उसके पुण्य बढ़ गए और उसकी मृत्यु एक छोटी सी चोट में बदल गई।
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इंसान के कर्म से उसका भाग्य तय होता है। अब नारद जी संतुष्ट थे |
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सार :- सदा अच्छे कर्म मे ही प्रवत्त रहना चाहिए ।
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  जय जय श्री राधे

तुलसीदास के नन्दनंदन

तुलसीदास जी ने भगवान नंदनन्दन श्यामसुंदर की एक झाँकी राम जी में देखी।श्री कृष्ण जी की जो लालित्यमयी झाँकी है उनमें मोरपंख जरूर रहता है और गोस्वामी तुलसीदास जी पुष्पवाटिका प्रसंग में श्रीमद्भागवत महापुराण के रास पंचाध्यायी को पाँच दोहों में रखते हैं, पाँच दोहों में पुष्पवाटिका प्रसंग, पाँच अध्यायों में रासपंचाध्यायी ।

रासपंचाध्यायी का पहला श्लोक - भगवान अपनी- शरदोत्फुल्लमल्लिका वीतछान्तंमनश्चक्रे योगमायामताश्रितः -- बड़ा कल्याणकारी अक्षर है रासपंचाध्यायी से शुरुआत होती है; क्योंकि जीव का कल्याण करना है और रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी जब पुष्पवाटिका प्रसंग को रखते हैं, तो वह कहते हैं -- वे भी वहाँ से शुरू करते हैं ---

भूप बाग वर देखिय जाई।
जहँ वसन्त ऋतु रही लुभाई।

        जहाँ वसन्त ऋतु रही लोभाई और  रासपंचाध्यायी में -- सहचर्खिणीनां मुदगात्रचामृजन् प्रिया प्रियायाः इव दीर्घदर्शनः।

श्रीमद्भागवत में लिखते हैं ।

ऐसा लगता है, मानो कि प्रकृति वसन्त ऋतु नंदनन्दन श्यामसुंदर के दिव्य दर्शन करने के लिए जैसे प्रियतमा प्रिय के दर्शन करने के लिए ठहर जाती है, अवरुद्ध हो जाती है, ऐसे ही वसन्त ऋतु नंदनन्दन श्यामसुंदर की दिव्य लीला का अवलोकन  करने के लिए ठहर गयी और यहाँ पर -- जहँ वसन्त ऋतु रही लुभाई।वहाँ वर्ण बीच में कहते हैं -

वर्हापीड़ंनटवरविपुहु कर्णयोकर्णिकारं।
दिभ्रविवासः कनककपिसन् वैजयन्तीसनालयः।।

          नंदनन्दन श्यामसुंदर की बड़ी प्यारी छवि है ।वर्य माने मोर, आपीड माने उसका पक्ष-- मोर के पंख को धारण किए हुए प्रभु नंदनन्दन श्यामसुंदर विराजमान हैं, मोर का पंख धारण किया है और यहाँ --

मोरपंख सिर  सोहत नीके।
गुच्छ बीच बिच कुसुम कली के।।

         गोस्वामी तुलसीदास जी बहुत प्यारा मोर का पंख धारण करवाते हैं ।एक मोर नृत्य कर रहा है, उसका पंख गिरा और लक्ष्मण जी महाराज ने राम जी के सिर पर रख दिया ।

तो इस प्रकार से राम जी के चरित्र के अलावा किसी अन्य अवतार की लालित्यमयी लीला की छटा मेरे मन को भा गई, मेरे मन को अच्छी लगी, तो वह भी मैंने इसमें उतार दी है ।श्री कृष्ण जी को भी उन्होंने राम में ही दर्शन करा दिया ।अब उस छवि का दर्शन करो।पुष्प वाटिका में तो ऐसा लगता है कि प्रभु श्री राम जी, और उन्होंने एक मंत्र है श्री चैतन्य महाप्रभु जी का महामन्त्र, बहुत लोककल्याण हुआ ; क्योंकि वे कहते हैं -- हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।

कलियुग केवल हरिगुन गाहा।
गावत नर पाबैं भव थाहा।।

          तो बहुत महान मंत्र है ।सोलह अक्षर का महामंत्र है, इसमें कोई शक नहीं, पर एक सज्जन ने मुझे जो अर्थ बताया, वह मुझे बहुत अद्भुत लगा।

उन्होंने कहा कि इसमें जो -- हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे है, यह तो कृष्ण जी के लिए है और हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे -- तो इसमें जो हरे राम है, वह राम जी के लिए नहीं, बलराम जी के लिए है, तो हमने कहा -- धन्य है आपकी भावना को।हमारे संतों ने तो, अभी आप कितने भी रामानंद सम्प्रदायों में चले जायँ, वहाँ श्री कृष्ण जी विराजमान हैं और आरती क्या होती है?

  श्री रामचंद्र कृपालु भज मन हरण भव भय दारुणं।श्रीमद्भागवत में जब नंदनन्दन श्यामसुंदर ने सत्ताइस दिन तक युद्ध किया जाम्बवंत जी के साथ में, अट्ठाइसवें दिन एक मुष्टिका का प्रहार किया ।तो जाम्बवंत जी ने क्या प्रार्थना की? ---

यस्येषुवित कलितरोक्षपटाक्षमोक्षै।
वर्त्माविशुतछवितनिकृतलोब्धिः।
रक्षाकृतःशेषउज्ज्वलतःकलंकः।

          माने वे कहते हैं कि मुझे श्री राम जी का दर्शन हो जाय।सामने खड़े हैं श्री कृष्ण और वे गीत गा रहे हैं भगवान राम के।श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में जब द्रौपदी ने श्रीकृष्ण की पट्टमहिषियों से पूछा -- आपको कैसे सौभाग्य मिला द्वारिकाधीश को अपना पति बनाने का?

  तो जाम्बवती जी कहती हैं कि मेरे पिताजी के साथ में उनका युद्ध हुआ और अट्ठाइसमें दिन इन्होंने छक्के छुड़ा दिए और उसके बाद मेरे पिताजी समझ गये कि ये तो साक्षात् श्री राम जी हैं और प्रभु श्री राम जी मान करके उन्होंने मेरा हाथ स्वयं इनके हाथ में दे दिया ।आँखें बंद करके बोलीं-- मैं बड़ी सौभाग्यशालिनी हूँ कि सीतापति श्री राम हमें प्रियतम के रूप में मिले।कोई भेद ही नहीं है ।

श्रीमद् भागवत के हर एक स्कंध में श्री राम जी को बड़े आदर और श्रद्धा के साथ स्मरण किया गया है ।

इसलिए भेदभाव अगर हम फैलाएँगे तो निश्चित रूप से न तो हम अपना कल्याण करते हैं, न उपासकों का कल्याण करते हैं, न भारतीय संस्कृति का कल्याण करते हैं, न देश का कल्याण करते हैं और न समाज का कल्याण करते हैं ।

जगदम्बा सीता जी

उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीं।
सर्वश्रेयस्करींसीतां नतोऽहम् रामवल्लभाम्।।

उपजहिं जासु अंस ते नाना।
संभु विरंचि विष्णु भगवाना।।
उपजहिं जासु अंश गुण खानी।
अगनित लक्ष्मि उमा ब्रह्माणी।।

जनकसुता जग जननि जानकी।
अतिशय प्रिय करुणानिधान की।
ताके जुग पद कमल मनावउँ।
जासु कृपा निर्मल मति पावउँ।।

           अक्सर, अन्य रामायणों के आधार पर लोग यह कहते हैं कि श्री  किशोरी जी लक्ष्मी जी की अवतार हैं, पर वे तीनों देवियों के ही अलग अलग विभाग हैं ।

यहाँ गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज जानकी जी में ही तीनों विभाग समाहित बता रहे हैं ।उद्भव, स्थिति, संहारकारिणीं --- वे सृजन की भी कारण हैं, वे पालन पोषण की भी कारण हैं और संहार की भी कारण हैं ।उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीं--

 जीव मात्र के समस्त प्रकार के क्लेशों का हरण करने वाली हैं जानकी जी ।पूज्य स्वामी करपात्री जी महाराज ने तो यहाँ तक लिखा ।कहते हैं कि एक संत ने कहा कि हे माँ भगवती जानकी जी राम जी तो कम से कम एक शर्त रखते हैं ।कहते हैं कि जो एक बार चरणों में आ करके कह दे कि मैं तुम्हारा हूँ, मैं उसे अभय प्रदान कर देता हूँ, मुक्ति के द्वार खोल देता हूँ ।

लेकिन जानकी जी का दरबार तो राम जी से भी आगे है, न तो विभीषण जी ने आकर सिर झुकाया, न कागभुसुण्डि जी ने और न जयन्त ने, फिर भी माता जानकी जी ने उनके ऊपर करुणा की वर्षा कर दी और वात्सल्यता की कृपा की।

इसलिए उनका दरबार करुणामय राम जी से भी आगे है ।जिस समय पर हनुमन्तलाल जी महाराज रावण वध के बाद विजय का संदेश लेकर जानकी जी के पास पहुँचे, उस समय जितनी भी निशाचरियाँ थीं, वे माता जानकी के पास थीं ।

हनुमानजी महाराज ने राम जी की विजय का संदेश सुनाया और उन निशाचरियों को देखकर हनुमन्तलाल जी महाराज दाँत किटकिटाने लगे।

जानकी जी ने कहा -- हनुमान ! कुछ चाहिए?

क्या दूँ तुम्हें?

 हनुमानजी ने कहा --- आज्ञा दे दो आप।

••••

 कौन सी आज्ञा?

 कहा -- जिस समय मैं पहली बार यहाँ पर आया था, इन निशाचरियों को आपको सताते देखा था मैंने ।मेरा मन कर रहा है कि अगर आपकी आज्ञा हो तो इनकी चोटी पकड़कर खींचूँ, इनको मैं दण्डित करूँ ।

माता जानकी के आँखों में आँसू आ गये।उन्होंने कृपामयी दृष्टि से उनको देखा और कहा -- बेटा हनुमान ! इनका कोई कसूर नहीं है।

ये वेचारी विवश थीं ।रावण के हाथों ये विवश थीं ।उसमें ये दण्ड की नहीं, कृपा की पात्र हैं ।

कितनी करुणामयी हैं माता जानकी जी?

पितृपक्ष में परान्न से बचें

 गरुड़ पुराणोक्त पितृपक्ष परान्न निषेध कथा सनातन धर्म में 16 दिनों का पितृपक्ष वर्ष का सबसे सूक्ष्म और संवेदनशील समय माना गया है। गरुड़ पुरा...