रविवार, 9 मार्च 2025

॥ शिखा बन्धनस्य आवश्यकता॥

 #शिखाविचार


*॥ शिखा बन्धनस्य आवश्यकता॥* 


 *स्नाने दाने जपे होमे सन्ध्यायां देवतार्चने ।* 

 *शिखाग्रन्थिं सदा कुर्यादित्येतन्मनुरब्रवीत् ॥* 

 मनुसंहिता


स्नान, दान, जप, होम और देव पूजन में सर्वदा शिखा बाँधना चाहिए ।


 *॥शिखाबन्धन - विधिः ॥*

 *शिखीवच्छिखया भाव्यं ब्रह्मावर्तनिबद्धया ।* 

 *प्रदक्षिणं द्विरावर्त्य पाशान्तः सम्प्रवेशनात् ॥* 

 *प्रथमं द्विगुणं कृत्वा ब्रह्मावर्त मितीरितम् ।* 

गायत्रीजपनं निबन्धने ॥


 कुर्याच्छिखायाश्च इति कौथुमि:


शिखा को दुगना करके प्रदक्षिण क्रम घुमाकर उसमें ब्रह्मग्रन्थि लगा दे। मयूर के शिखा के समान शिखा होनी चाहिये।

पहले दुगना किया हुआ को ब्रह्मग्रन्थि कहा गया है। गायत्री मन्त्रका जप करते हुए शिखा को बाँधना चाहिये । 


 *विप्रादिकानां खलु मुष्टिमेय-* 

 *केशाः शिखा स्यादधिका न तेन।* 

 *द्विधा त्रिधा वापि विभज्य बन्धो* 

 *ह्यल्पास्ततोऽल्पापि न लम्बितानि ॥* 


 ब्राह्मणों कि शिखा मुष्टि में आने योग्य होनी चाहिये। दुगना या तिगुना करके बाँधना चाहिये। शिखा बहुत अधिक लम्बी और छोटी भी न हो । 


 *गायत्र्या तु शिखां बद्धवा नैर्ऋत्यां ब्रह्मरन्ध्रतः ।* 

 *जूटिकाश्च ततो बद्ध्वा ततः कर्म समारभेत्॥* 

 *निबद्धशिख आसीनो द्विज आचमनं चरेत् ।* 

 *कृत्वोपवीतं सव्येंऽशे वाङ्मनःकायसंयतः ॥* मनुः


गायत्री मन्त्र द्वारा शिखा बाँधकर और ब्रह्मरन्ध्रसे नैऋत्यकोण में जटा बाँधकर शुभ कर्म प्रारम्भ करें । द्विज बैठकर शिखा बाँधकर आचमन करें। पश्चात् वाणी मन और शरीर को संयत कर अपने बायें कन्धे में यज्ञोपपवीत धारण करें। 


 *शिखाबन्धन मन्त्र(वैदिक)* 

 *मानस्तोक इति मन्त्रस्य कुत्स ऋषिः जगती छन्दः एको रुद्रो देवता शिखा बन्धने विनियोगः ।* 


मन्त्रः - *ॐ मानस्तोके तनये मान आयुषिमानो गोषु मानो अश्वेषु रीरिषः । मानोव्वीराननुद्रभामिनो बधीर्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे ॥* 


पौराणिक मन्त्रः -

 *ॐ चिद्रूपिणि महामाये दिव्य तेजः समन्विते ।* 

 *तिष्ठ देवि शिखाबन्धे तेजो वृद्धिं कुरुष्व मे ॥* 


हाथ में जल लेकर 'मानस्तोक से विनियोग' तक पढ़कर जल छोड़कर ‘ॐ मानस्तोके' इत्यादि मन्त्र अथवा 'ॐ चिद्रूपिणि' मन्त्र पढ़कर शिखा को बाँधे ।


 *॥मन्त्रं बिना शिखा बन्धने दोषः॥* 

 *अमन्त्रो दीयते ग्रन्थिर्जपो होमो वृथा भवेत्* ।

 *स्मृत्वोङ्कारञ्च गायत्रीं निबध्नीयाच्छिखां ततः ।* 

नागदेवः


प्रणव और गायत्री मन्त्र पढ़कर शिखा बाँधनी चाहिये । बिना मन्त्र पढ़े शिखा बाँधी गयी हो तो जप होम आदि निष्फल होता है।


 *॥ मुक्त-शिखस्य स्नान- निषेधः॥* 

 *मुक्तकेशैर्न कर्तव्यं प्रेतस्नानं क्वचित् ।* 

 *बिना  स्नानं दानं जपं होमं मुक्तकेशं न  कारयेत् ॥*  वृद्ध वशिष्ठः


खुली हुई शिखा रखकर स्नान, दान, जप, हवन नहीं करना चाहिये । खुली शिखा रखकर जो स्नान किया जाता है, उसे प्रेतस्नान कहते हैं ।


 *॥ कुत्र शिखां न बध्नीयात् ॥* 


 *स्नाने च भोजने चैव तथा मूत्रपुरीषयोः ।* 

 *मैथुने च शवस्कन्धे शिखा षट्सु विसर्जयेत् ॥* 


स्नान, भोजन तथा लघुशंका, पाखाना, मैथुन व मुर्दा ढोने के समय शिखा खोल देनी चाहिए। (मात्र दशगात्र स्नानमें शिखा खोलकर स्नान करना चाहिए)।


 *॥ शिखा - मोचन मन्त्रः ॥* 


 *ब्रह्मपाशसहस्त्रेण रुद्रशूलशतेन च।* 

 *विष्णुचक्रसहस्त्रेण शिखामुक्तिं शिखामुक्तिं करोम्यहम् ॥* 

 *गच्छन्तु सकला देवा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ।* 

 *तिष्ठत्ववाचला लक्ष्मीः शिखामुक्तं करोम्यहम् ॥* 

आह्निकतत्त्वम् ॥


 *॥ मरण-सूतके शिखा-वपन-विचारः ॥* 


 *मुण्डयेत् सर्वगात्राणि कक्षोपस्थशिखां न हि ।* 


कांख, नीचे का बाल (गुह्य स्थान ) व शिखा को छोड़कर मरणाशौच में शिर का बाल, दाढ़ी मूँछ बनवा देना चाहिए। 


 *अशौचान्तकृत्ये सर्वेषां वपनं नखलोमयोः ।* 

 *स्त्रीणां तु मुण्डनं नैव नखच्छेदनकेवलम् ॥* *मुखमूर्ध्निस्थितान् केशान् शिखावर्जन्तु वापयेत् ॥* 

बृहस्पतिः


अशौच के अन्त में सभी लोगों को नख और बालों को बनवाना चाहिए। स्त्रियों का मुण्डन न कराकर केवल नख कटवा दे, तथा पुरुषों शिखा को छोड़कर मूछ, दाढ़ी तथा शिर के बाल बनवा देना चाहिए।


 *॥ ज्ञानतोऽज्ञानतो वा शिखाच्छेदने विचारः ॥* 


 *शिखां छिन्दन्ति ये मोहाद् द्वेषादज्ञानतोऽपि वा ।* *तप्तकृच्छ्रेण शुध्यन्ति त्रयो वर्णा द्विजातयः ॥*


इति हारीतेन शिखा नाशे प्रायश्चित्ताभिधानाच्च । मोहात् — प्रमादात् । द्वेषात् स्त्र्यादिकलहे क्रोधाद्यावेशात् । अज्ञानत: - शिखा - नित्यत्वाज्ञानात्' ।


शिखा को जो मोह (प्रमाद) द्वेष (स्त्री आदि से कलह में क्रोधादि आवेश) अज्ञान (शिखा नित्य ही रखनी चाहिए, ऐसा ज्ञान न होने से) कटवा देते हैं, उनको तप्तकृच्छ्र प्रायश्चित्त हारीत महर्षि ने बतलाया है।


 *।। शिखाऽभावे प्रतिनिधि-विचारः ॥* 


 *शिखानाशे तत्-प्रतिनिधिरुक्तः । काठकगृह्ये । अथ चेत् प्रमादान्निः शिखं वपनं स्यात्तदा कौश शिखां ब्रह्मग्रन्थि-समन्वितां दक्षिण कर्णो परिआशिखा बन्धादवतिष्ठेत्  ।* शिखा के अभाव में कुश की शिखा ब्रह्मग्रन्थियुक्त दहिने कान पर तबतक रखें, जबतक बाँधने योग्य शिखा न बढ़ जाय ।


 *॥ स्त्री-शूद्रयोः शिखा - विचारः ॥* 


 *स्त्री-शूद्रौ तु शिखां छित्वा क्रोधाद् वैराग्यतोऽपि वा ।* *प्राजापत्यं प्रकुर्यातां निष्कृतिर्नाऽन्यथा भवेत् ।।* 

 हारीतः 


 *ततश्च द्विजस्त्रीसच्छूद्रौ देशाचारव्यवस्थया शिखां धारयेताम् ।* 


क्रोध या वैराग्य (क्षणिक वैराग्य) से जो स्त्री व शूद्र शिखा को कटवा देते हैं । उनको प्रायश्चित्त के लिए प्राजापत्य व्रत कराना चाहिए। और कोई उपाय नहीं है। अथवा देशाचार से व्यवस्था करनी चाहिए।


 *_॥ शिखा-प्रमाणम् ॥_*


   *चतुरङ्गुल-विस्तारं शिखा-मूलं द्विजन्मनः ।* 

 *राज्ञः पञ्चाङ्गुलं न्यासं वैश्यानां वै तथैव च ॥* 

 *स्थापयेयुः शिरोमध्ये शिखां सर्वे   द्विजातयः ।* *स्वऋष्युक्त-स्थले वाऽपि खल्वाटस्य न चोदितः ॥* 

 भारद्वाज - स्मृति ॥ 


ब्राह्मण के लिए शिखा का मूल चार अङ्गुल एवं क्षत्रिय वैश्य के लिए पांच अङ्गुल रहना चाहिए। अपने ऋषियों द्वारा कहे गये स्थल पर सभी द्विजातीय शिर के मध्य में शिखा रखें। जिसके शिर पर बाल नहीं उनके लिए नियम नहीं हैं । (विशेष - शिखा के अभाव में प्रतिनिधि विचार में कहा गया है ।)


 *॥ शूद्र-शिखा बन्धनस्य- मन्त्रः॥* 


 *ब्रह्मवाणीसहस्राणि शिववाणी तथैव च।* 

 *विष्णोर्नामसहस्रेण शिखाबन्धं करोम्यहम् ॥* 

आह्निकतत्त्वे ॥


 *ब्रह्मवाणी-* इस मन्त्र को पढ़कर समयानुसार शूद्रशिखा को बाँधे।


 *॥ अथोपनयने शिखा रहित क्षौर- विचारः ॥* 


 *'ब्राह्मणान् भोजयेत्तञ्च पर्य्युप्त-शिरसम् अलङ्कृतमानयन्ति । पारस्कर गृह्यसूत्रम् - अत्र कर्काचार्य:- पर्युप्तं शिरोऽस्य इति पर्युप्त-शिराः तम् आनयन्ति जयरामाचार्य्यः - " तत्र कुमारं पर्युप्तशिरसंमुण्डित-मुण्डम् भोजयेत्, "परिपूर्वी वपतिर्मुण्डने "* 


यज्ञोपवीत में शिखा रहित क्षौर विचार - उपर्युक्त वचन पारस्कर गृहसूत्र के भाष्यकार कर्काचार्यादि के वचनानुसार उपनयन में शिखा छोड़कर शिर का क्षौर कराना चाहिए ।


 *॥ ब्रह्मचारि क्षौर-विचारः ॥* 


 *मुण्डो वा जटिलो वा स्यादथवास्याच्छिखाजट : ' ॥* 


 *मुण्ड  - मुण्डित - मस्तकः । मनुः ॥ .

 *जटिल  - शिरः - केश- जटावान् वा ।

 *शिखा जट:* - शिखैव या जटा जाता यस्य वा । ।


ब्रह्मचारी मस्तक के सभी बाल तथा दाढ़ी मूँछ के सभी बाल बनवावें । अथवा शिर के सभी बाल रखवाकर जटाधारी रहें । अथवाशिखा ही जटा रखे, शेष बनवा दें। तीन प्रकार का विधान ही ब्रह्मचारियों के लिए है ।


 *मासि मासि गृहस्थस्य पक्षे पक्षे च यज्वनः ।* 

 *ऋतावृतौ यतीनां तु यथेष्टं ब्रह्मचारिणाम् ॥* 

वशिष्ठः ॥


गृहस्थों का एक-एक मासों में (शुभ मुर्हत ) अग्निहोत्री को अमावास्या और पूर्णिमा, यति लोगों का प्रत्येक ऋतुओं में तथा ब्रह्मचारी को अपने इच्छानुसार समय से क्षौर कराना चाहिए ।


 *॥ गृहस्थ- क्षौर-विचारः ॥* 


 *गृहस्थानां क्षौरे वर्ज्यकालाः* 


 *कुम्भे कर्कटके वापि कन्यायां कार्मुके रवौ ।* 

 *रोम - खण्डं गृहस्थस्य पितॄन् प्राशयते यमः ' ॥*  

सुमन्तुः


सूर्य के कुम्भ, कर्क, कन्या, धनु राशिस्थ होने पर गृहस्थों को बाल नहीं बनवाना चाहिए, क्योंकि उन कटे बालों को यमराज पितरों के मुख में डाल देते हैं । उक्त वचन का बाधक वचन-


 *कुम्भे पादं  धनुष्यर्थं कर्के पादत्रयन्तथा ।* 

 *सर्वांकन्यां परित्यज्य क्षौरकर्मविधीयते ॥* 

सुमन्तुः


पाठान्तरम्--

 *सर्वां कन्यां परित्यज्य अर्द्धकर्कटकं त्यजेत् ।* 

 *धनुः कुम्भौ त्रिधा कृत्वा पूर्वभागं परित्यजेत् ॥* 


कुम्भ के प्रथम पाद, धनु के दो पाद, कर्क के तीन पाद तथा कन्या के चारों पादों को छोड़कर बाल बनवाना चाहिए । कुछ विद्वानों का मत है कि यह जीवत्पितृ विषयक नहीं है। पाठान्तर - 

कन्या के चारों पाद, कर्क दो पाद, धनु व कुम्भ के चार पादों में तीन भाग करके पूर्व भाग छोड़कर बाल बनवाना चाहिए। न्यायविदोंका मत है कि - सर्व साधारण के लिए उक्त नियम है।


 *मासे मासे गृहस्थानां पक्षे पक्षे च यज्वनाम् ।* 

 *ऋतावृतौ यतीनां क्षौरकर्मविधीयते ॥*

गृहस्थों को प्रत्येक मासों ( शुभ मुहूर्त) अग्रिहोत्रादि कर्ताओं को प्रत्येक पक्षों यतियों को प्रत्येक ऋतुओं (दो-दो मासों) में क्षौर कराना शास्त्र सम्मत है ।


 *॥ वानप्रस्थ क्षौर-विचारः ॥* 


 *होमस्त्रिषवणस्त्रानं जटावल्कलधारणम् ।* 

 *वन्यस्नेहनिषेवित्वं वानप्रस्थ विधिस्त्वयम् ॥* 


अग्निहोत्र होम, त्रिकालस्नान, जटावल्कल धारण वन के इंगुदि आदि फलों के तेल का सेवन करना वानप्रस्थ का यही नियम है। 

व्यास उवाच-

 *जटाश्च विभृयान्नित्यं नखरोमाणि नो त्यजेत् ।* 

 *स्वाध्यायं सर्वदा कुर्यात् नियच्छेद्वाचमन्यतः ' ॥* 

व्यास का वचन-

नित्य जटा का धारण नख रोम को न कटावें । नित्य स्वाध्याय करें, विधि से अतिरिक्त वाणी पर संयम रखें। (भागवत सप्तम् स्कन्ध, १२ अध्याय, २१ श्लोक व एकादश स्कन्द १८ अध्याय ३ श्लोक देखें)

बुधवार, 19 फ़रवरी 2025

कर्मचण्डाल

 *कन्या के पिता से धन लेकर विवाह करनेवाले को "कर्मचण्डाल" कहते हैं।* 

    *स्कन्दपुराण के, रेवाखण्ड के,50 वें ,अध्याय के, 30 वें,33 वें 34 वें और 35 वें श्लोक में,कन्यादान के महत्त्व के साथ साथ, कन्यादान के साथ साथ,कन्या के पिता से धन की याचना करनेवाले की "कर्मचण्डाल" संज्ञा देते हुए, उनके यहां भोजन करने तक का निषेध करते हुए, भगवान शिव ने, महाराज उत्तानपाद से कहा कि -* 


 *सर्वेषामेव दानानां,कन्यादानं विशिष्यते।* 

 *यो दद्यात् परया भक्त्याभिगम्य तनयां निजाम्।।30।।* 


 *भगवान शिव ने कहा कि - हे राजन्! किसी धर्मात्मा का सत्कर्म करते रहना,दान देना, परोपकार करना आदि परमधर्म है।* 

 *धर्म पालन के कारण ही तो, मनुष्य को "धर्मात्मा,धर्मज्ञ, धर्मपालक" आदि शब्दों से उसके गुणों को जाना जाता है।* 


 *सर्वेषामेव दानानां कन्यादानं विशिष्यते।* 

     सभी प्रकार के दानों में, कन्यादान, विशिष्ट दान है। कन्यादान से ही,कुल गोत्र की रक्षा होती है। कुल वृद्धि होती है। माता पिता के पुत्र उत्पत्ति की सार्थकता होती है। यदि किसी गृहस्थ के, पुत्र का विवाह ही नहीं हो,उसको कोई कन्यादान ही न करे, तो उस वंश का उच्छेदन हो जाता है।

वंश की समाप्ति से रक्षा करनेवाला,कन्यापिता, श्रेष्ठ होता है। पुत्र के पिता से,कन्या पिता श्रेष्ठ होता है। क्यों कि - दान देनेवाला ही श्रेष्ठ होता है। दानग्रहीता पुरुष, श्रेष्ठ नहीं होता है।

कन्या के पिता को,कुलीन,सुशील,समान आयु वाले,गुणवाले, बुद्धिमान व्यक्ति को,अच्छे लग्न मुहूर्त में,कन्या दान करना चाहिए।

 

*यो दद्यात् परया भक्त्याभिगम्य तनयां निजाम्।।* 

    कन्या के पिता को,ऐसी भावना करना चाहिए कि - भगवान ने,किसी अच्छे कुलीन वंश की रक्षा के लिए,मुझे कन्या प्रदान की है। ऐसी परा भक्ति से युक्त होकर कन्यादान करना चाहिए। 

अब 33 वें श्लोक में, *"कन्यादान"* का माहात्म्य देखिए!

 

*येनात्र दुहिता दत्ता प्राणेभ्योऽपि गरीयसी।* 

 *तेन सर्वमिदं दत्तं त्रैलोक्यं सचराचरम्।।33।।* 

       भगवान शिव ने कहा कि - हे उत्तानपाद! कन्या का पिता,जब अपनी प्राणों से भी अधिक प्रियतमा कन्या का दान,किसी पुरुष को करता है,तो उसने क्या दान नहीं कर दिया।

 *अर्थात - सर्वस्व दान कर दिया।*             


 *"प्राणेभ्योऽपि गरीयसी" अर्थात प्राणों से भी अधिक,गरीयसी अर्थात प्रिय।* 

माता पिता के यहां,जब कन्या का जन्म होता है तो,पिता को,कन्या ही, पुत्र से अधिक प्रिय होती है। 

 *कन्यादान लेनेवाले, पुरुष को,कन्या के माता पिता की इस सद्भावना को समझना चाहिए।* 

 

*तेन सर्वमिदं दत्तम्।* 

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जिन माता पिता ने, कन्यादान किया है,समझिए कि - *उसने "सर्वं दत्तम्",* सबकुछ दान कर दिया है। सर्वस्वदान ही कन्यादान है,तथा कन्यादान ही सर्वदान है। 

 

*त्रैलोक्यं सचराचरम्।* 

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जो शरीरधारी हैं,उनको चर शब्द से कहा जाता। वस्तुओं को अचर कहा जाता है। जिसने अपनी कन्या का दान किया है,समझिए कि - उसने तीनों लोकों का सम्पूर्ण दान कर दिया है।

अति आत्मीयता से पालित पोषित,शील,सदाचार आदि गुणों से युक्त कन्या का दान सर्वस्वदान है।

माता पिता,कन्या के धर्म और शरीर, दोनों के सतर्क प्रहरी हैं। शिक्षा और सद्गुणों के दाता गुरु हैं। जन्मदाता पालक जनक हैं। 

 *कन्यादान गृहीता पुरुष को,कन्यापिता की सद्भावना का, तथा उनकी आत्मीयता का, और कन्यादान के महत्त्व का आत्मबोध करना चाहिए।* 


जो पुरुष,कन्या के माता पिता की, सेवा भावना को नहीं समझते हैं,तथा कन्यादान का माहात्म्य नहीं समझते हैं,ऐसे लोभी स्त्री पुरुषों की निंदा करते हुए, उनको दोषयुक्त बताते हुए, 34 वें श्लोक भगवान शिव ने कहा कि -


 *य:कन्यार्थं धनं लब्ध्वा भिक्षते चैव तद्धनम्।* 

 *स भवेत् कर्मचाण्डाल:काष्ठकीलो भवेन्मृत:।34।।* 

भगवान शिव ने कहा कि - हे राजन! जो पुरुष,या पुरुष के माता पिता,कन्या के साथ साथ, कन्या के पिता से,धन की याचना करते हैं,उनको "कर्मचण्डाल" शब्द से कहा जाता है।

 

*भिक्षते चैव तद्धनम्।।* 

 *भिक्षते अर्थात मांगता है। याचना करता है।* 

पुरुष या पुरुष के माता पिता,जब किसी कन्या के पिता से कहते हैं कि - *"इतना धन देंगे,तो हम विवाह करेंगे"* ऐसा कहनेवाले को *"भिक्षुक"* शब्द से कहना चाहिए था। 

 *किन्तु,वह तो भिक्षुक से भी पतित व्यक्ति है।* 

इसीलिए, भगवान शिव ने कहा कि -

 *स भवेत् कर्मचाण्डाल:।* 

 *कन्या के पिता से धन लेकर,कन्या को स्वीकार करनेवाला"कर्मचण्डाल" कहा जाता है।* 

 *जिस व्यक्ति के किए गए,किसी भी कर्म को,देवता और पितरगण, स्वीकार नहीं करते हैं,ऐसे व्यक्ति को* *"कर्मचण्डाल* शब्द से कहा जाता है।

धन लेकर कन्यादान स्वीकार करनेवाले परिवार के द्वारा किए गए,किसी भी श्राद्ध ,यज्ञ, दान, तप, हवन आदि सत्कर्म को देवता और पितर ग्रहण नहीं करते हैं। ये बहुत अधिक दोष है। 


अब 35 वें श्लोक में, आचार्यों को भी ऐसे गृहस्थों के यहां भोजन का निषेध करते हुए भगवान शिव ने कहा कि - 

 *गृहेऽपि तस्य योऽश्नीयात् जिह्वालौल्यात् कथञ्चन।* 

 *चान्द्रायणेन शुद्ध्येत तप्तकृच्छ्रेण वा पुनः।।35।।* 


 *गृहेऽपि तस्य योऽश्नीयात्।* 

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धन लेकर कन्या लेनेवाले घर में आचार्यो को भोजन नहीं करना चाहिए। *यदि, कोई व्यक्ति या आचार्य भोजन कर भी लेता है तो, उनका धनदोष का फल, भोजन करनेवाले को भी भोगना पड़ता है।* 

 *जिह्वा लौल्यात् कथञ्चन।* 

*******************

 *कथंचन अर्थात यदि कभी जैसे तैसे।* *जिह्वालौल्यात् अर्थात जिह्वा के चंचलता के कारण,* स्वादिष्ट भोजन के लोभ से भी कोई,इनके यहां भोजन कर लेता है तो,उसको प्रायश्चित्त करना चाहिए। क्या प्रायश्चित्त है, तो सुनिए!


 *चान्द्रायणेन शुद्ध्येत।।* 

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 *जो सभी व्रतों में अतिक्लिष्ट चांद्रायण व्रत है। इस व्रत करके ही भोजन करनेवाला, शुद्ध होता है।* 

यदि चांद्रायण व्रत नहीं कर सकते हैं तो ---

 *तप्तकृच्छ्रेण वा पुनः!* 

 *भोजन करनेवाले को "तप्तकृच्छ्र" अर्थात घोर तप जप करना होगा,तब भोजनकर्ता शुद्ध होगा।* 

 *कर्मचण्डाल का अन्न खानेवाले के पितर और देवता भी पूजा श्राद्ध आदि स्वीकार नहीं करते हैं।* 

आजकल, स्त्री पुरुष पूछते हैं कि - हमारी पूजा उपासना का फल क्यों नहीं मिलता है? अरे भाई! अपने दोषों को तो देखिए! कोई न कोई अवश्य ही दोष होगा। निज दोषों के कारण ही, सत्कर्म का फल प्राप्त नहीं होता है। मंत्र और विधि, शास्त्र वेद पुराण असत्य नहीं होते हैं। न ही इनमें कोई दोष हैं।


 *मनुष्य,अपने दोषों के कारण ही दुखी होता है। अधिक लोभ, अधिक मोह,तथा अधिक काम क्रोध ही तो दुखदायी हैं।* 

 *धर्म से ही इन दोषों का नियन्त्रण होता है। अन्य कोई उपाय नहीं है।* 

 *दहेज लेना तो,कन्या के भ्राता का अंश तथा कन्या के माता पिता का अंश लेना है।* 

 *दहेज लोभी लोग कन्या के पिता से इतना अधिक धन ले लेते हैं कि - उसके शेष पुत्र पुत्री की व्यवस्था में अव्यवस्था हो जाती है। किसी को कष्ट देकर धन लेनेवाले सुखी कैसे हो सकते हैं!* 

प्रतिलिपी💐




  नारायण

🪷🌷🪷

                        🚩 हर हर महादेव 🚩

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2025

सुख सौभाग्य दायक शिव पूजन के मंत्र एवं अभिषेक विधि

 सुख सौभाग्य दायक शिव पूजन के मंत्र एवं अभिषेक विधि

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शिव पुराण संहिता में कहा है कि सर्वज्ञ शिव ने संपूर्ण देहधारियों के सारे मनोरथों की सिद्धि के लिए इस 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का प्रतिपादन किया है। यह आदि षड़क्षर मंत्र संपूर्ण विद्याओं का बीज है। जैसे वट बीज में महान वृक्ष छिपा हुआ है, उसी प्रकार अत्यंत सूक्ष्म होने पर भी यह मंत्र महान अर्थ से परिपूर्ण है।


भगवान शिव को नमस्कार करने का मंत्र

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नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शन्कराय च मयस्करय च नमः शिवाय च शिवतराय च।। ईशानः सर्वविध्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रम्हाधिपतिर्ब्रम्हणोधपतिर्ब्रम्हा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम।। तत्पुरषाय विद्म्हे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात।।


शनि या राहु आदि ग्रह पीड़ा शांति के लिए शिव गायत्री मंत्र 

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ॐ तत्पुरुषाय विद्महे। महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात।।


महामृत्युंजय प्रभावशाली मंत्र

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ॐ ह्रौं जूं सः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। सः जूं ह्रौं ॐ ॥


इस मंत्र से शिव पूजा कर दूर करें पैसों की परेशानी 

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मन्दारमालाङ्कुलितालकायै कपालमालांकितशेखराय।

दिव्याम्बरायै च दिगम्बराय नम: शिवायै च नम: शिवाय।।

श्री अखण्डानन्दबोधाय शोकसन्तापहा​रिणे।

सच्चिदानन्दस्वरूपाय शंकराय नमो नम:॥


शास्त्रों में मनोरथ पूर्ति व संकट मुक्ति के लिए अलग-अलग तरह की धारा से शिव का अभिषेक करना शुभ बताया गया है। अलग-अलग धाराओं से शिव अभिषेक का फल- जब किसी का मन बेचैन हो, निराशा से भरा हो, परिवार में कलह हो रहा हो, अनचाहे दु:ख और कष्ट मिल रहे हो तब शिव लिंग पर दूध की धारा चढ़ाना सबसे अच्छा उपाय है। इसमें भी शिव मंत्रों का उच्चारण करते रहना चाहिए।


👉 वंश की वृद्धि के लिए शिवलिंग पर शिव सहस्त्रनाम बोलकर घी की धारा अर्पित करें।


👉 शिव पर जलधारा से अभिषेक मन की शांति के लिए श्रेष्ठ मानी गई है।


👉 भौतिक सुखों को पाने के लिए इत्र की धारा से शिवलिंग का अभिषेक करें।


👉 बीमारियों से छुटकारे के लिए शहद की धारा से शिव पूजा करें।


👉 गन्ने के रस की धारा से अभिषेक करने पर हर सुख और आनंद मिलता है।


👉 सभी धाराओं से श्रेष्ठ है गंगाजल की धारा। शिव को गंगाधर कहा जाता है। शिव को गंगा की धार बहुत प्रिय है। गंगा जल से शिव अभिषेक करने पर चारों पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है। इससे अभिषेक करते समय महामृत्युंजय मन्त्र जरुर बोलना चाहिए।


शिव पंचाक्षर स्त्रोत

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नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागाय महेश्वराय|

नित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मे "न" काराय नमः शिवायः॥


हे महेश्वर! आप नागराज को हार स्वरूप धारण करने वाले हैं। हे (तीन नेत्रों वाले) त्रिलोचन आप भष्म से अलंकृत, नित्य (अनादि एवं अनंत) एवं शुद्ध हैं। अम्बर को वस्त्र सामान धारण करने वाले दिग्म्बर शिव, आपके न् अक्षर द्वारा जाने वाले स्वरूप को नमस्कार।


मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय।

मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मे "म" काराय नमः शिवायः॥


चन्दन से अलंकृत, एवं गंगा की धारा द्वारा शोभायमान नन्दीश्वर एवं प्रमथनाथ के स्वामी महेश्वर आप सदा मन्दार पर्वत एवं बहुदा अन्य स्रोतों से प्राप्त्य पुष्पों द्वारा पुजित हैं। हे म् स्वरूप धारी शिव, आपको नमन है।


शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।

श्री नीलकंठाय वृषभद्धजाय तस्मै "शि" काराय नमः शिवायः॥


हे धर्म ध्वज धारी, नीलकण्ठ, शि अक्षर द्वारा जाने जाने वाले महाप्रभु, आपने ही दक्ष के दम्भ यज्ञ का विनाश किया था। माँ गौरी के कमल मुख को सूर्य सामान तेज प्रदान करने वाले शिव, आपको नमस्कार है।


वषिष्ठ कुभोदव गौतमाय मुनींद्र देवार्चित शेखराय।

चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय तस्मै "व" काराय नमः शिवायः॥


देवगणो एवं वषिष्ठ, अगस्त्य, गौतम आदि मुनियों द्वार पुजित देवाधिदेव! सूर्य, चन्द्रमा एवं अग्नि आपके तीन नेत्र सामन हैं। हे शिव आपके व् अक्षर द्वारा विदित स्वरूप कोअ नमस्कार है।


यज्ञस्वरूपाय जटाधराय पिनाकस्ताय सनातनाय|

दिव्याय देवाय दिगंबराय तस्मै "य" काराय नमः शिवायः॥


हे यज्ञस्वरूप, जटाधारी शिव आप आदि, मध्य एवं अंत रहित सनातन हैं। हे दिव्य अम्बर धारी शिव आपके शि अक्षर द्वारा जाने जाने वाले स्वरूप को नमस्कार है।


पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेत शिव सन्निधौ|

शिवलोकं वाप्नोति शिवेन सह मोदते॥


जो कोई शिव के इस पंचाक्षर मंत्र का नित्य ध्यान करता है वह शिव के पून्य लोक को प्राप्त करता है तथा शिव के साथ सुख पुर्वक निवास करता है।


लिंगाष्टकम

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ब्रह्ममुरारिसुरार्चित लिगं निर्मलभाषितशोभित लिंग |

जन्मजदुःखविनाशक लिंग तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥


मैं उन सदाशिव लिंग को प्रणाम करता हूँ जिनकी ब्रह्मा, विष्णु एवं देवताओं द्वारा अर्चना की जाति है, जो सदैव निर्मल भाषाओं द्वारा पुजित हैं तथा जो लिंग जन्म-मृत्यू के चक्र का विनाश करता है (मोक्ष प्रदान करता है)


देवमुनिप्रवरार्चित लिंगं, कामदहं करुणाकर लिंगं|

रावणदर्पविनाशन लिंगं तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥


देवताओं और मुनियों द्वारा पुजित लिंग, जो काम का दमन करता है तथा करूणामयं शिव का स्वरूप है, जिसने रावण के अभिमान का भी नाश किया, उन सदाशिव लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।


सर्वसुगंन्धिसुलेपित लिंगं, बुद्धिविवर्धनकारण लिंगं।

सिद्धसुरासुरवन्दित लिंगं, तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥


सभी प्रकार के सुगंधित पदार्थों द्वारा सुलेपित लिंग, जो कि बुद्धि का विकास करने वाल है तथा, सिद्ध- सुर (देवताओं) एवं असुरों सबों के लिए वन्दित है, उन सदाशिव लिंक को प्रणाम।


कनकमहामणिभूषित लिंगं, फणिपतिवेष्टितशोभित लिंगं।

दक्षसुयज्ञविनाशन लिंगं, 

तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥


स्वर्ण एवं महामणियों से विभूषित, एवं सर्पों के स्वामी से शोभित सदाशिव लिंग जो कि दक्ष के यज्ञ का विनाश करने वाल है ; आपको प्रणाम।


कुंकुमचंदनलेपित लिंगं,

पंङ्कजहारसुशोभित लिंगं।

संञ्चितपापविनाशिन लिंगं, 

तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥


कुंकुम एवं चन्दन से शोभायमान, कमल हार से शोभायमान सदाशिव लिंग जो कि सारे संञ्चित पापों से मुक्ति प्रदान करने वाला है, उन सदाशिव लिंग को प्रणाम।


देवगणार्चितसेवित लिंग, 

भवैर्भक्तिभिरेवच लिंगं।

दिनकरकोटिप्रभाकर लिंगं,

तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥


आप सदाशिव लिंग को प्रणाम जो कि सभी देवों एवं गणों द्वारा शुद्ध विचार एवं भावों द्वारा पुजित है तथा जो करोडों सूर्य सामान प्रकाशित हैं।


अष्टदलोपरिवेष्टित लिंगं, 

सर्वसमुद्भवकारण लिंगं|

अष्टदरिद्रविनाशित लिंगं, 

तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं॥


आठों दलों में मान्य, एवं आठों प्रकार के दरिद्रता का नाश करने वाले सदाशिव लिंग सभी प्रकार के सृजन के परम कारण हैं आप सदाशिव लिंग को प्रणाम।


सुरगुरूसुरवरपूजित लिंगं, 

सुरवनपुष्पसदार्चित लिंगं।

परात्परं परमात्मक लिंगं, 

ततप्रणमामि सदाशिव लिंगं।।


दवताओं एवं देव गुरू द्वारा स्वर्ग के वाटिका के पुष्पों से पुजित परमात्मा स्वरूप जो कि सभी व्याख्याओं से परे है उन सदाशिव लिंग को प्रणाम।

सोमवार, 17 फ़रवरी 2025

तिरुपति बालाजी

 "तिरुपति बालाजी"

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 "कर्ज में डूबे भगवान"

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           एक बार भृगु ऋषि ने जानना चाहा कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कौन सबसे श्रेष्ठ है ? वह बारी-बारी से सबके पास गये। ब्रह्मा और महेश ने भृगु को पहचाना तक नही, न ही आदर किया। इसके बाद भृगु विष्णु के यहाँँ गये। विष्णु भगवान विश्राम कर रहे थे और माता लक्ष्मी उनके पैर दबा रही थी। भृगु ने पहुँचते ही न कुछ कहा, न सुना और भगवान विष्णु की छाती पर पैर से प्रहार कर दिया। लक्ष्मी जी यह सब देखकर चकित रह गयी किन्तु विष्णु भगवान ने भृगु का पैर पकडकर विनीत भाव से कहा ”मुनिवर ! आपके कोमल पैर में चोट लगी होगी। इसके लिए क्षमा करें।“


           लक्ष्मी जी को भगवान विष्णु की इस विन्रमता पर बड़ा क्रोध आया। वह भगवान विष्णु से नाराज होकर भू-लोक में आ गयीं तथा कोल्हापुर में रहने लगीं। लक्ष्मी जी के चले जाने से विष्णु भगवान को लगा कि उनका श्री और वैभव ही नष्ट हो गया और उनका मन बड़ा अशान्त रहने लगा। लक्ष्मी जी को ढूँढ़ने के लिए वह श्रीनिवास के नाम से भू-लोक आये। घूमते घुमाते वेंकटचल पर्वत क्षेत्र में बकुलामाई के आश्रम में पहुँचे। बकुलामाई ने उनकी बड़ी आवाभगत की। उन्हें आश्रम में ही रहने को कहा।


           एक दिन जंगल में एक मतवाला हाथी आ गया। आश्रमवासी डरकर इधर उधर भागने लगे। श्री निवास ने यह देखा तो धनुष बाण लेकर हाथी का पीछा किया। हाथी डरकर भागा और घने जंगल में अदृश्य हो गया। श्री निवास उसका पीछा करते-करते थक गये थे। वह एक सरोवर के किनारे वृक्ष की छाया में लेट गये और उन्हें हल्की सी झपकी आ गयी। थोड़ी देर में शोर सुनकर वह जागे तो देखा कि चार-छ युवतियाँ उन्हें घेरे खडी है। श्रीनिवास को जागा हुआ देखकर वे डपटकर बोली, “यह हमारी राजकुमारी पद्मावती का सुरक्षित उपवन है और यहाँँ पुरुषों का आना मना है। तुम यहाँ कैसे और क्यों आये हो ?”


           श्रीनिवास कुछ जवाब दे इससे पहले ही उनकी दृष्टि वृक्ष की ओट से झांकती राजकुमारी की ओर गयी। श्रीनिवास पद्मावती को एकटक देखते रह गये। थोडा संयत होकर कहा, “देवियों ! मुझे पता नही था, मैं शिकार का पीछा करता हुआ यहाँँ आया था। थक जाने पर मुझे नींद आ गयी इसलिए क्षमा करें।“ श्रीनिवास आश्रम में तो लौट आये किन्तु बड़े उदास रहने लगे। एक दिन बकुलामाई ने बड़े प्यार से उनकी उदासी का कारण पूछा तो श्रीनिवास ने पद्मावती से भेंट होने की सारी कहानी कह सुनाई फिर कहा, “उसके बिना मै नही रह सकता।“


           बकुलामाई बोली, “ऐसा सपना मत देखो। कहाँ वह प्रतापी चोल नरेश आकाशराज की बेटी और कहाँ तुम आश्रम में पलने वाले एक कुल गोत्रहीन युवक।” श्रीनिवास बोले, “माँ ! एक उपाय है तुम मेरा साथ दो तो सब सम्भव है।“ बकुलामाई ने श्रीनिवास का सच्चा प्यार देखकर हाँ कर दी। श्रीनिवास ज्योतिष जानने वाली औरत का वेश बनाकर राजा आकाश की राजधानी नारायणपुर पहुँचे। उसकी चर्चा सुन पद्मावती ने भी उस औरत को महल बुलाकर अपना हाथ दिखाया।


           राजकुमारी के हस्त रेखा देखकर वह बोली, “राजकुमारी ! कुछ दिन पहले तुम्हारी भेंट तुम्हारे सुरक्षित उद्यान में किसी युवक से हुयी थी। तुम दोनों की दृष्टि मिली थी। उसी युवक से तुम्हारी शादी का योग बनता है।” पद्मावती की माँ धरणा देवी ने पूछा, “यह कैसे हो सकता है ?” ज्योतिषी औरत बोली, “ऐसा ही योग है। ग्रह कहते है कोई औरत अपने बेटे के लिए आपकी बेटी माँगने स्वयं आयेगी।”


           दो दिन बाद सचमुच ही बकुलामाई एक तपस्विनी के वेश में राजमहल आयी। उसने अपने युवा बेटे के साथ पद्मावती के विवाह की चर्चा की। राजा आकाश में बकुलामाई को पहचान लिया। उन्होंने पूछा “वह युवक है कौन ?” बकुलामाई बोली, “उसका नाम श्री निवास है। वह चन्द्र वंश में पैदा हुआ है। मेरे आश्रम में रह रहा है। मुझे माँ की तरह मानता है।”


           राजा आकाश ने कुछ सोचकर उत्तर देने के लिए कहा। बकुलामाई के चले जाने पर आकाश ने राज पुरोहित को बुलाकर सारी बात बताई। राज पुरोहित ने गणना की। फिर सहमति देते हुए कहा, ”महाराज ! श्रीनिवास में विष्णु जैसा देवगुण है लक्ष्मी जैसी आपकी बेटी के लिए यह बड़ा सुयोग्य है।”


           राजा आकाश ने तुरन्त बकुलामाई के यहाँ अपनी स्वीकृति के साथ विवाह की लग्न पत्रिका भेज दी। बकुलामाई ने सुना तो वह चिंतित हो उठी। श्री निवास से बोली, “बेटा ! अब तक तो विवाह की ही चिंता थी। अब पैसे न होने की चिंता है। मैं वराहस्वामी के पास जाती हूँ। उनसे पूछती हूँ कि क्या किया जाए ?”


           बकुलामाई श्रीनिवास को लेकर वराहस्वामी के पास गयी और श्रीनिवास के विवाह के लिए धन की समस्या बताई तो वराह स्वामी ने आठों दिग्पालों, इन्द्र, कुबेर, ब्रह्मा, शंकर आदि देवताओ को अपने आश्रम में बुलवाया और फिर श्रीनिवास को बुलाकर कहा, “तुम स्वयं इन्हें अपनी समस्या बताओ।”


           श्रीनिवास ने देवताओ से कहा, “मैं चोल नरेश राजा आकाश की बेटी पद्मावती से विवाह करना चाहता हूँ। मेरी हैसियत राजा के अनुरूप नही है मेरे पास धन नही है, मै क्या करूँ ?”


           इन्द्र ने कुबेर से कहा, “कुबेर ! इस काम के लिए तुम श्रीनिवासन को ऋण दे दो।” कुबेर ने कहा, “ऋण तो दे दूँगा पर उसे यह वापस कब और कैसे करेंगे, इसका निर्णय होना चाहिये ?” श्रीनिवास बोले, “इसकी चिन्ता मत कीजिये। कलियुग के अन्त तक मैं सब ऋण चुका दूँगा।”


           कुबेर ने स्वीकार कर लिया। सब देवताओं की साक्षी में श्रीनिवास के ऋण पत्र लिख दिया। उस धन से श्री निवास और पद्मावती का विवाह बड़ी धूमधाम से हुआ। तभी नारद ने कोल्हापुर जाकर लक्ष्मी को बताया, “विष्णु ने श्रीनिवास के रूप में पद्मावती से विवाह कर लिया है। दोनों वेंकटाचलम् पर्वत पर रह रहे हैं।”


           यह सुनकर लक्ष्मी जी को बड़ा दुःख हुआ। वह सीधे वेंकटाचलम पहुँची। विष्णु जी की सेवा में लगी पद्मावती को भला बुरा कहने लगी, “श्रीनिवास ! विष्णु रूप मेरे पति हैं। तूने इनके साथ विवाह क्यों किया ?”


           दोनों ने वाक् युद्ध होने लगा तो श्री निवास को बड़ा दुःख हुआ। वे पीछे हटे और पत्थर की मूर्ति के रूप में बदल गये। जब दोनों देवियों ने यह देखा तो उन्हें बड़ा दुःख हुआ कि श्रीनिवास तो अब किसी के न रहे।


           इतने में शिला विग्रह से आवाज आयी, “देवियों मै इस स्थान पर वेंकटेश्वर स्वामी के नाम से, अपने भक्तों का अभीष्ट पूरा करता रहूँगा। उनसे प्राप्त चढावे के धन द्वारा कुबेर के कर्ज का ब्याज चुकाता रहूँगा इसलिए तुम दोनों मेरे लिए आपस में झगड़ा मत करो।”


           यह वाणी सुनते ही लक्ष्मी जी और पद्मावती दोनों ने सिर झुका लिया। लक्ष्मी कोल्हापुर आकर महालक्ष्मी के रूप में प्रतिष्ठित हो गयी और पद्मावती तिरुनाचुर में शिला विग्रह हो गयी। आज भी तिरुपति क्षेत्र में तिरुमला पहाडी पर भगवान वेंकटेश्वर स्वामी के दर्शन हेतु भक्तगणों से इसी भाव से शुल्क लिया जाता है। उनकी पूजा पुष्प मिष्टान आदि से न होकर धन द्रव्य से होती है। इसी धन से भगवान श्री कृष्ण वेंकटेश्वर स्वामी कुबेर का कर्ज चुका रहे है।                    


                    "जय जय श्री राधे"

मंगलवार, 28 जनवरी 2025

त्रिशंकु की स्वर्गयात्रा

 त्रिशंकु की स्वर्गयात्रा

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इक्ष्वाकु वंश में त्रिशंकु नाम के एक राजा हुये। त्रिशंकु की इच्छा सशरीर स्वर्ग जाने की थी 


अपनी वार्ता जारी रखते हुये मिथिला के राजपुरोहित शतानन्द जी ने कहा, "इस बीच इक्ष्वाकु वंश में त्रिशंकु नाम के एक राजा हुये। त्रिशंकु की इच्छा सशरीर स्वर्ग जाने की थी अतः इसके लिए उन्होंने वशिष्ठ जी से यज्ञ करने के लिए कहा। वशिष्ठ जी ने बताया कि कि मुझमें इतनी सामर्थ्य नहीं है कि मैं किसी व्यक्ति को शरीर सहित स्वर्ग भेज सकूँ। वशिष्ठ जी के असमर्थता प्रकट करने पर त्रिशंकु ने यही प्रार्थना वशिष्ठ जी के पुत्रों से भी की जो दक्षिण प्रान्त में घोर तपस्या कर रहे थे। इस पर वशिष्ठ जी के पुत्रों ने कहा कि 'अरे मूर्ख! जिस काम को हमारे पिता नहीं कर सके तू उसे हम से कराना चाहता है। ऐसा प्रतीत होता है कि तू हमारे पिता का अपमान करने के लिये यहाँ आया है।' उनके इस प्रकार कहने से त्रिशंकु ने क्रोधित होकर वशिष्ठ जी के पुत्रों को अपशब्द कहे। वशिष्ठ जी के पुत्रों ने रुष्ट होकर त्रिशंकु को चाण्डाल हो जाने का शाप दे दिया।


"शाप के कारण त्रिशंकु का सुन्दर शरीर काला पड़ गया। सिर के बाल चाण्डालों जैसे छोटे छोटे हो गये। गले में हड्डियों की माला पड़ गई। हाथ पैरों में लोहे की कड़े पड़ गये। त्रिशंकु का ऐसा वेश देखकर उनके मन्त्री तथा दरबारी उनका साथ छोड़कर चले गये। फिर भी उन्होंने सशरीर स्वर्ग जाने की इच्छा का परित्याग नहीं किया। वे विश्वामित्र के पास जाकर बोले कि ऋषिराज! आप महान तपस्वी हैं। मेरी सशरीर स्वर्ग जाने की इच्छा को पूर्ण करके मुझे कृतार्थ कीजिये। विश्वामित्र ने कहा कि राजन्! तुम मेरी शरण में आये हो। मैं तुम्हारी इच्छा अवश्य पूर्ण करूँगा। इतना कहकर विश्वामित्र ने अपने उन चारों पुत्रों को बुलाया जो दक्षिण प्रान्त में अपनी पत्नी के साथ तपस्या करते हुये उन्हें प्राप्त हुये थे और उनसे यज्ञ की सामग्री एकत्रित करने के लिये कहा। उन्होंने अपने शिष्यों के द्वारा वशिष्ठ के पुत्रों सहित वन में रहने वाले सब ऋषि-मुनियों को यज्ञ में सम्मिलित होने के लिये निमन्त्रण भी भिजवा दिया।


"शिष्यों ने लौटकर बताया कि सब ऋषि-मुनियों ने निमन्त्रण स्वीकार कर लिया है किन्तु वशिष्ठ जी के पुत्रों ने यह कहकर निमन्त्रण अस्वीकार कर दिया कि जिस यज्ञ में यजमान चाण्डाल और पुरोहित क्षत्रिय हो उस यज्ञ का भाग हम स्वीकार नहीं कर सकते। यह सुनकर विश्वामित्र जी ने क्रुद्ध होकर कहा कि उन्होंने अकारण ही मेरा अपमान किया है। मैं उन्हें शाप देता हूँ कि उन सबका नाश हो। आज ही वे सब कालपाश में बँध कर यमलोक को जायें और सात सौ वर्षों तक चाण्डाल योनि में विचरण करें। उन्हें खाने के लिये केवल कुत्ते का माँस मिले और सदैव कुरूप बने रहें। इस प्रकार शाप देकर वे यज्ञ की तैयारी में लग गये।"


शतानन्द जी ने आगे कहा, "हे राघव! विश्वामित्र के शाप से वशिष्ठ जी के पुत्र यमलोक सिधार गये। वशिष्ठ जी के पुत्रों के परिणाम से भयभीत सभी ऋषि मुनियों ने यज्ञ में विश्वामित्र का साथ दिया। यज्ञ की समाप्ति पर विश्वामित्र ने सब देवताओं को नाम ले लेकर अपने यज्ञ भाग ग्रहण करने के लिये आह्वान किया किन्तु कोई भी देवता अपना भाग लेने नहीं आया। इस पर क्रुद्ध होकर विश्वामित्र ने अर्ध्य हाथ में लेकर कहा कि 'हे त्रिशंकु! मैं तुझे अपनी तपस्या के बल से स्वर्ग भेजता हूँ' इतना कह कर विश्वामित्र ने मन्त्र पढ़ते हुये आकाश में जल छिड़का और राजा त्रिशंकु शरीर सहित आकाश में चढ़ते हुये स्वर्ग जा पहुँचे। त्रिशंकु को स्वर्ग में आया देख इन्द्र ने क्रोध से कहा कि 'रे मूर्ख! तुझे तेरे गुरु ने शाप दिया है इसलिये तू स्वर्ग में रहने योग्य नहीं है'।


इन्द्र के ऐसा कहते ही त्रिशंकु सिर के बल पृथ्वी पर गिरने लगे और विश्वामित्र से अपनी रक्षा की प्रार्थना करने लगे। विश्वामित्र ने उन्हें वहीं ठहरने का आदेश दिया और वे अधर में ही सिर के बल लटक गये। त्रिशंकु की पीड़ा की कल्पना करके विश्वामित्र ने उसी स्थान पर अपनी तपस्या के बल से स्वर्ग की सृष्टि कर दी और नये तारे तथा दक्षिण दिशा में सप्तर्षि मण्डल बना दिया। इसके बाद उन्होंने नये इन्द्र की सृष्टि करने का विचार किया जिससे इन्द्र सहित सभी देवता भयभीत होकर विश्वामित्र से अनुनय विनय करने लगे। वे बोले कि हमने त्रिशंकु को केवल इसलिये लौटा दिया था कि वे गुरु के शाप के कारण स्वर्ग में नहीं रह सकते थे।


इन्द्र की बात सुन कर विश्वामित्र जी बोले कि मैंने इसे स्वर्ग भेजने का वचन दिया है इसलिये मेरे द्वारा बनाया गया यह स्वर्ग मण्डल हमेशा रहेगा और त्रिशंकु सदा इस नक्षत्र मण्डल में अमर होकर राज्य करेगा। इससे सन्तुष्ट होकर इन्द्रादि देवता अपने अपने स्थानों को वापस चले गये।


।। जय जय सियाराम ।।

सूतक और पातक

 क्या होता है सूतक और पातक, क्यों इनके नियमों का पालन करना है जरूरी?



सनातन धर्म में सूतक और पातक दोनों ही विशेष अवधारणाएँ हैं जो शुद्धि और अशुद्धि के संदर्भ में उपयोग की जाती हैं। ये अवधारणाएँ विभिन्न धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक नियमों का पालन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।


सूतक:

सूतक का संबंध अशुद्धि की अवधि से है जो किसी विशेष घटना के बाद लगती है। यह मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है:

1. **जन्म सूतक**: किसी परिवार में बच्चे के जन्म के बाद लगने वाली अशुद्धि की अवधि को जन्म सूतक कहा जाता है। यह अवधि सामान्यतः दस दिनों तक रहती है, लेकिन विभिन्न समुदायों में इसका समय भिन्न हो सकता है। इस दौरान परिवार के सदस्य कुछ धार्मिक कृत्यों से परहेज करते हैं।


2. **मृत्यु सूतक**: किसी परिवार के सदस्य की मृत्यु के बाद लगने वाली अशुद्धि की अवधि को मृत्यु सूतक कहा जाता है। यह अवधि भी सामान्यतः तेरह दिनों की होती है, लेकिन इसके नियम और अवधि भी विभिन्न समुदायों में अलग-अलग हो सकती है। इस अवधि के दौरान परिवार के सदस्य विभिन्न धार्मिक और सामाजिक कृत्यों में भाग नहीं लेते हैं।


पातक:

पातक का संबंध पाप या दोष से है, जो किसी अनुचित या अधार्मिक कार्य को करने से उत्पन्न होता है। 

 बुरे कर्मों या पाप के कारण होने वाली नैतिक और धार्मिक अशुद्धि, जिससे मुक्त होने के लिए प्रायश्चित करना पड़ता है।


सूतक का सम्बन्ध "जन्म के" निमित्त से हुई अशुद्धि से है !

जन्म के अवसर पर जो नाल काटा जाता है और जन्म होने की प्रक्रिया में अन्य प्रकार की जो हिंसा होती है, उसमे लगने वाले दोष/पाप के प्रायश्चित स्वरुप "सूतक" माना जाता है !


जन्म के बाद नवजात की पीढ़ियों को हुई अशुचिता :-

3 पीढ़ी तक - 10 दिन

4 पीढ़ी तक - 10 दिन

5 पीढ़ी तक - 6 दिन


ध्यान दें :- एक रसोई में भोजन करने वालों के पीढ़ी नहीं गिनी जाती ... वहाँ पूरा 10 दिन का सूतक माना है !

प्रसूति (नवजात की माँ) को 45 दिन का सूतक रहता है !

प्रसूति स्थान 1 माह तक अशुद्ध है ! इसीलिए कई लोग जब भी अस्पताल से घर आते हैं तो स्नान करते हैं !


अपनी पुत्री :-

पीहर में जनै तो हमे 3 दिन का,

ससुराल में जन्म दे तो उन्हें 10 दिन का सूतक रहता है ! और हमे कोई सूतक नहीं रहता है !


नौकर-चाकर :-

अपने घर में जन्म दे तो 1 दिन का,

बाहर दे तो हमे कोई सूतक नहीं ! पालतू पशुओं का :-

घर के पालतू गाय, भैंस, घोड़ी, बकरी इत्यादि को घर में बच्चा होने पर हमे 1 दिन का सूतक रहता है !

किन्तु घर से दूर-बाहर जन्म होने पर कोई सूतक नहीं रहता !

बच्चा देने वाली गाय, भैंस और बकरी का दूध, क्रमशः 12 दिन, 10 दिन और 6 दिन तक "अभक्ष्य/अशुद्ध" रहता है !


पातक :-

पातक का सम्बन्ध "मरण के" निम्मित से हुई अशुद्धि से है !

मरण के अवसर पर दाह-संस्कार इत्यादि में जो हिंसा होती है, उसमे लगने वाले दोष/पाप के प्रायश्चित स्वरुप "पातक" माना जाता है !


मरण के बाद हुई अशुचिता :-

3 पीढ़ी तक - 12 दिन

4 पीढ़ी तक - 10 दिन

5 पीढ़ी तक - 6 दिन


ध्यान दें :- जिस दिन मृत्यु होती है, उस दिन से पातक के दिनों की गणना होती है।

यदि घर का कोई सदस्य बाहर/विदेश में है, तो जिस दिन उसे सूचना मिलती है, उस दिन से शेष दिनों तक उसके पातक लगता है !


अगर 12 दिन बाद सूचना मिले तो स्नान-मात्र करने से शुद्धि हो जाती है !

किसी स्त्री के यदि गर्भपात हुआ हो तो, जितने माह का गर्भ पतित हुआ, उतने ही दिन का पातक मानना चाहिए !

घर का कोई सदस्य मुनि-आर्यिका-तपस्वी बन गया हो तो, उसे घर में होने वाले जन्म-मरण का सूतक-पातक नहीं लगता है ! किन्तु स्वयं उसका ही मरण हो जाने पर उसके घर वालों को 1 दिन का पातक लगता है !


किसी अन्य की शवयात्रा में जाने वाले को 1 दिन का, मुर्दा छूने वाले को 3 दिन और मुर्दे को कन्धा देने वाले को 8 दिन की अशुद्धि जाननी चाहिए !

घर में कोई आत्मघात कर ले तो 6 महीने का पातक मानना चाहिए !


यदि कोई स्त्री अपने पति के मोह/निर्मोह से जल मरे, बालक पढाई में फेल होकर या कोई अपने ऊपर दोष देकर मरता है तो इनका पातक बारह पक्ष याने 6 महीने का होता है !


उसके अलावा भी कहा है कि :-

जिसके घर में इस प्रकार अपघात होता है, वहाँ छह महीने तक कोई बुद्धिमान मनुष्य भोजन अथवा जल भी ग्रहण नहीं करता है ! वह मंदिर नहीं जाता और ना ही उस घर का द्रव्य मंदिर जी में चढ़ाया जाता है ! 

(क्रियाकोष १३१९-१३२०)

अनाचारी स्त्री-पुरुष के हर समय ही पातक रहता है। 

सूतक-पातक की अवधि में "देव-शास्त्र-गुरु" का पूजन, प्रक्षाल, आहार आदि धार्मिक क्रियाएं वर्जित होती हैं !


इन दिनों में मंदिर के उपकरणों को स्पर्श करने का भी निषेध है !

यहाँ तक की गुल्लक में रुपया डालने का भी निषेध बताया है !


सूतक-पातक के नियम : --

1. सूतक और पातक में अन्य व्यक्तियों को स्पर्श न करें।

2. कोई भी धर्मकृत्य अथवा मांगलिक कार्य न करें तथा सामाजिक कार्य में भी सहभागी न हों।

3. अन्यों की पंगत में भोजन न करें।

4. किसी के घर न जाएं और ना ही किसी भी प्रकार का भ्रमण करें। घर में ही रहकर नियमों का पालन करें।

5. किसी का जन्म हुआ है तो शुद्धि का ध्यान रखते हुए भगवान का भजन करें और यदि कोई मर गया है तो गरुड़ पुराण सुनकर समय गुजारें।

6. सूतक या पातक काल समाप्त होने पर स्नान तथा पंचगव्य (गाय के दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर का मिश्रण) सेवन कर शुद्ध हो जाएं।

7. सूतक पातक की अवधि में देव शास्त्र गुरु, पूजन प्राक्षाल, आहार आदि धार्मिक क्रियाएं वर्जित होती है।

8. जिस व्यक्ति या परिवार के घर में सूतक-पातक रहता है, उस व्यक्ति और परिवार के सभी सदस्यों को कोई छूता भी नहीं है। वहां का अन्न-जल भी ग्रहण नहीं करता है। वह परिवार भी मंदिर सहित किसी के घर नहीं जा सकता है और न किसी का भोग, पानी या प्रसाद नही ग्रहण करना चाहिए ।

यह सूतक-पातक आर्ष-ग्रंथों से मान्य है !


कहीं कहीं लोग सूतक-पातक के दिनों में मंदिर ना जाकर इसकी समाप्ति के बाद मंदिर से गंधोदक लाकर शुद्धि के लिए घर-दुकान में छिड़कते हैं, ऐसा करके नियम से घोर पाप का बंध करते हैं !

इन्हे समझना इसलिए ज़रूरी है, ताकि अब आगे घर-परिवार में हुए जन्म-मरण के अवसरों पर अनजाने से भी कहीं दोष का उपार्जन न हो। 

जीवन अगर खुशियों से भरा है तो वह बहुत छोटा लगता है, ऐसा लगता है यह सफर कितनी जल्दी समाप्त होने जा रहा है। वहीं अगर सिर्फ गम के साये में ही समय बीत रहा हो तो एक-एक दिन भी बोझिल हो जाता है और ऐसा लगता है ना जाने यह सफर अचानक इतना लंबा कैसे हो गया। 


 अंधविश्वास या व्यवहारिक

अकसर इसे एक अंधविश्वास मान लिया जाता है जबकि इसके पीछे छिपे बड़े ही प्रैक्टिकल कारण की तरफ ध्यान नहीं दिया जाता। 

 पहले के दौर में संयुक्त परिवारों का चलन ज्यादा था। घर की महिलाओं को हर हालत में पारिवारिक सदस्यों की जरूरतों को पूरा करना होता था। लेकिन बच्चे को जन्म देने के बाद महिलाओं का शरीर बहुत कमजोर हो जाता है।

 स्त्री को आराम देना

उन्हें हर संभव आराम की जरूरत होती है जो उस समय संयुक्त परिवार में मिलना मुश्किल हो सकता था, इसलिए सूतक के नाम पर इस समय उन्हें आराम दिया जाता था ताकि वे अपने दर्द और थकान से बाहर निकल पाएं।


संक्रमण का खतरा

 जब बच्चे का जन्म होता है तो उसके शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास भी नहीं हुआ होता। वह बहुत ही जल्द संक्रमण के दायरे में आ सकता है, इसलिए 10-30 दिनों की समयावधि में उसे बाहरी लोगों से दूर रखा जाता था, उसे घर से बाहर नहीं लेकर जाया जाता था। बाद में जरूर सूतक को एक अंधविश्वास मान लिया गया लेकिन इसका मौलिक उद्देश्य स्त्री के शरीर को आराम देना और शिशु के स्वास्थ्य का ख्याल रखने से ही था।

 बच्चे का शरीर

आज के समय में वे बच्चे जो जन्म के समय काफी कमजोर होते हैं उन्हें डॉक्टर इंक्यूबेटर में रखते हैं ताकि वे बाहरी वातावरण के लिए शारीरिक तौर पर तैयार हो जाएं। 


 मृत्यु के पश्चात सूतक

जिस तरह जन्म के समय परिवार के सदस्यों पर सूतक लग जाता है उसी तरह परिवार के लिए सदस्य की मृत्यु के पश्चात सूतक का साया लग जाता है, जिसे ‘पातक’ कहा जाता है। इस समय भी परिवार का कोई सदस्य ना तो मंदिर या किसी अन्य धार्मिक स्थल जा सकता है और ना ही किसी धार्मिक कार्य का हिस्सा बन सकता है।

 स्नान का महत्व

यह भी मात्र अंधविश्वास ना होकर बहुत साइंटिफिक कहा जा सकता है क्योंकि या तो किसी लंबी और घातक बीमारी या फिर एक्सिडेंट की वजह से या फिर वृद्धावस्था के कारण व्यक्ति की मृत्यु होती है। 


कारण चाहे कुछ भी हो लेकिन इन सभी की वजह से संक्रमण फैलने की संभावनाएं बहुत हद तक बढ़ जाती हैं। इसलिए ऐसा कहा जाता है कि दाह-संस्कार के पश्चात स्नान आवश्यक है ताकि श्मशान घाट और घर के भीतर मौजूद कीटाणुओं से मुक्ति मिल सके।


 प्राचीन ऋषि-मुनि

प्राचीन भारत के ऋषि-मुनियों और ज्ञानियों ने बिना किसी ठोस कारण के कोई भी नियम नहीं बनाए। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र की जांच और उसे गहराई से समझने के बाद ही दिशा-निर्देश दिए गए, जो बेहद व्यवहारिक हैं। परंतु आज के दौर में उनकी व्यवहारिकता को समाप्त कर उन्हें मात्र एक अंधविश्वास की तरह अपना लिया गया है।


शुक्रवार, 24 जनवरी 2025

देवीपार्वती के 108 नाम और इनका अर्थ

 देवीपार्वती के 108 नाम और इनका अर्थ

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देवी पार्वती विभिन्न नामों से जानी जाता है और उनमें से हर एक नाम का एक निश्चित अर्थ और महत्व है। देवी पार्वती से 108 नाम जुड़े हुए है । भक्त बालिकाओं के नाम के लिए इस नाम का उपयोग करते है। 


1 . आद्य - इस नाम का मतलब प्रारंभिक वास्तविकता है।

2 . आर्या - यह देवी का नाम है

3 . अभव्या - यह भय का प्रतीक है।

4 . अएंदरी - भगवान इंद्र की शक्ति।

5 . अग्निज्वाला - यह आग का प्रतीक है।

6 . अहंकारा - यह गौरव का प्रतिक है ।

7 . अमेया - नाम उपाय से परे का प्रतीक है।

8 . अनंता - यह अनंत का एक प्रतीक है।

9 . अनंता - अनंत

10 अनेकशस्त्रहस्ता - इसका मतलब है कई हतियारो को रखने वाला ।

11 . अनेकास्त्रधारिणी - इसका मतलब है कई हतियारो को रखने वाला ।

12 . अनेकावारना - कई रंगों का व्यक्ति ।

13 . अपर्णा – एक व्यक्ति जो उपवास के दौरान कुछ नहि कहता है यह उसका प्रतिक है ।

14 . अप्रौधा – जो व्यक्ति उम्र नहि करता यह उसका प्रतिक है ।

15 . बहुला - विभिन्न रूपों ।

16 . बहुलप्रेमा - हर किसी से प्यार ।

17 . बलप्रदा - यह ताकत का दाता का प्रतीक है ।

18 . भाविनी - खूबसूरत औरत ।

19 . भव्य – भविष्य ।

20 . भद्राकाली - काली देवी के रूपों में से एक ।

21 . भवानी - यह ब्रह्मांड की निवासी है ।

22 . भवमोचनी - ब्रह्मांड की समीक्षक ।

23 . भवप्रीता - ब्रह्मांड में हर किसी से प्यार पाने वाली ।

24 . भव्य - यह भव्यता का प्रति है ।

25 . ब्राह्मी - भगवान ब्रह्मा की शक्ति ।

26 . ब्रह्मवादिनी – हर जगह उपस्तित ।

27 . बुद्धि - ज्ञानी

28 . बुध्हिदा - ज्ञान की दातरि ।

29 . चामुंडा - राक्षसों चंदा और मुंडा की हत्या करने वलि देवि ।

30 . चंद्रघंटा - ताकतवर घंटी

31 . चंदामुन्दा विनाशिनी - देवी जिसने चंदा और मुंडा की हत्या की ।

32 . चिन्ता - तनाव ।

33 . चिता - मृत्यु - बिस्तर ।

34 . चिति - सोच मन ।

35 . चित्रा - सुरम्य ।

36 . चित्तरूपा - सोच या विचारशील राज्य ।

37 . दक्शाकन्या - यह दक्षा की बेटी का नाम है ।

38 . दक्शायाज्नाविनाशिनी - दक्षा के बलिदान को टोकनेवाला ।

39 . देवमाता - देवी माँ ।

40 . दुर्गा - अपराजेय ।

41 . एककन्या - बालिका ।

42 . घोररूपा - भयंकर रूप ।

43 . ज्ञाना - ज्ञान ।

44 . जलोदरी - ब्रह्मांड मेइन वास करने वाली ।

45 . जया - विजयी

46 कालरात्रि - देवी जो कालि है और रात के समान है ।

47 . किशोरी - किशोर

48 . कलामंजिराराजिनी - संगीत पायल ।

49 . कराली - हिंसक

50 . कात्यायनी - बाबा कत्यानन इस नाम को पूजते है ।

51 . कौमारी - किशोर ।

52 . कोमारी - सुंदर किशोर ।

53 . क्रिया - लड़ाई ।

54 . क्र्रूना - क्रूर ।

55 . लक्ष्मी - धन की देवी ।

56 . महेश्वारी - भगवान शिव की शक्ति ।

57 . मातंगी - मतंगा की देवी ।

58 . मधुकैताभाहंत्री - देवी जिसने राक्षसों मधु और कैताभा को आर दिया ।

59 . महाबला - शक्ति ।

60 . महातपा - तपस्या ।

61 . महोदरी - एक विशाल पेट में ब्रह्मांड में रखते हुए ।

62 . मनः - मन ।

63 . मतंगामुनिपुजिता - बाबा मतंगा द्वारा पूजी जाती है ।

64 . मुक्ताकेशा - खुले बाल ।

65 . नारायणी - भगवान नारायण विनाशकारी विशेषताएँ ।

66 . निशुम्भाशुम्भाहनानी - देवी जिसने भाइयो शुम्भा निशुम्भा को मारा ।

67 . महिषासुर मर्दिनी - महिषासुर राक्षस को मार डाला जो देवी ने ।

68 नित्या - अनन्त ।

69 . पाताला - रंग लाल ।

70 . पातालावती - लाल और सफ़द पहेने वाली ।

71 . परमेश्वरी - अंतिम देवी ।

72 . पत्ताम्बरापरिधान्ना - चमड़े से बना हुआ कपडा ।

73 . पिनाकधारिणी - शिव का त्रिशूल ।

74 . प्रत्यक्ष – असली ।

75 . प्रौढ़ा - पुराना ।

76 . पुरुषाकृति - आदमी का रूप लेने वाला ।

77 . रत्नप्रिया - सजी

78 . रौद्रमुखी - विनाशक रुद्र की तरह भयंकर चेहरा ।

79 . साध्वी - आशावादी ।

80 . सदगति - मोक्ष कन्यादान ।

81 . सर्वास्त्रधारिणी - मिसाइल हथियारों के स्वामी ।

82 . सर्वदाना वाघातिनी - सभी राक्षसों को मारने के लिए योग्यता है जिसमें ।

83 . सर्वमंत्रमयी - सोच के उपकरण ।

84 . सर्वशास्त्रमयी - चतुर सभी सिद्धांतों में ।

85 . सर्ववाहना - सभी वाहनों की सवारी ।

86 . सर्वविद्या - जानकार ।

87 . सती - जो महिला जिसने अपने पति के अपमान पर अपने आप को जला दिया ।

89 . सत्ता - सब से ऊपर ।

90 . सत्य - सत्य ।

91 . सत्यानादास वरुपिनी - शाश्वत आनंद ।

92 . सावित्री - सूर्य भगवान सवित्र की बेटी ।

93 . शाम्भवी - शंभू की पत्नी ।

94 . शिवदूती - भगवान शिव के राजदूत ।

95 . शूलधारिणी – व्यक्ति जो त्र्सिहुल धारण करता है ।

96 . सुंदरी - भव्य ।

97 . सुरसुन्दरी - बहुत सुंदर ।

98 . तपस्विनी - तपस्या में लगी हुई ।

99 . त्रिनेत्र - तीन आँखों का व्यक्ति ।

100 . वाराही – जो व्यक्ति वाराह पर सवारी करता हियो ।

101 . वैष्णवी - अपराजेय ।

102 . वनदुर्गा - जंगलों की देवी ।

103 . विक्रम - हिंसक ।

104 . विमलौत्त्त्कार्शिनी - प्रदान करना खुशी ।

105 . विष्णुमाया - भगवान विष्णु का मंत्र ।

106 . वृधामत्ता - पुराना है , जो माँ ।

107 . यति - दुनिया त्याग जो व्यक्ति एक ।

108 . युवती - औरत ।

देवी पार्वती यह सभी नाम पूजा करने के लिए और उनके आशीर्वाद पाने के लिए , लिए जाते है।



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