शनिवार, 14 जनवरी 2023

श्रीशनिवज्रपंजरकवचम्

 श्रीशनिवज्रपंजरकवचम् 

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श्री गणेशाय नमः ॥


विनियोगः ।

ॐ अस्य श्रीशनैश्चरवज्रपञ्जर कवचस्य कश्यप ऋषिः,

अनुष्टुप् छन्दः, श्री शनैश्चर देवता,

श्रीशनैश्चर प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥


ऋष्यादि न्यासः । 

श्रीकश्यप ऋषयेनमः शिरसि ।

अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे ।

श्रीशनैश्चर देवतायै नमः हृदि ।

श्रीशनैश्चरप्रीत्यर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ॥


ध्यानम् ।

नीलाम्बरो नीलवपुः किरीटी गृध्रस्थितस्त्रासकरो धनुष्मान् ।

चतुर्भुजः सूर्यसुतः प्रसन्नः सदा मम स्याद् वरदः प्रशान्तः ॥ १॥


ब्रह्मा उवाच ॥


श‍ृणुध्वमृषयः सर्वे शनिपीडाहरं महत् ।

कवचं शनिराजस्य सौरेरिदमनुत्तमम् ॥ २॥


कवचं देवतावासं वज्रपंजरसंज्ञकम् ।

शनैश्चरप्रीतिकरं सर्वसौभाग्यदायकम् ॥ ३॥


ॐ श्रीशनैश्चरः पातु भालं मे सूर्यनन्दनः ।

नेत्रे छायात्मजः पातु पातु कर्णौ यमानुजः ॥ ४॥


नासां वैवस्वतः पातु मुखं मे भास्करः सदा ।

स्निग्धकण्ठश्च मे कण्ठं भुजौ पातु महाभुजः ॥ ५॥


स्कन्धौ पातु शनिश्चैव करौ पातु-शुभप्रदः ।

वक्षः पातु यमभ्राता कुक्षिं पात्वसितस्तथा ॥ ६॥


नाभिं ग्रहपतिः पातु मन्दः पातु कटिं तथा ।

ऊरू ममान्तकः पातु यमो जानुयुगं तथा ॥ ७॥


पादौ मन्दगतिः पातु सर्वांगं पातु पिप्पलः ।

अंगोपांगानि सर्वाणि रक्षेन् मे सूर्यनन्दनः ॥ ८॥


इत्येतत् कवचं दिव्यं पठेत् सूर्यसुतस्य यः ।

न तस्य जायते पीडा प्रीतो भवति सूर्यजः ॥ ९॥


व्यय-जन्म-द्वितीयस्थो मृत्युस्थानगतोऽपि वा ।

कलत्रस्थो गतो वापि सुप्रीतस्तु सदा शनिः ॥ १०॥


अष्टमस्थे सूर्यसुते व्यये जन्मद्वितीयगे ।

कवचं पठते नित्यं न पीडा जायते क्वचित् ॥ ११॥


इत्येतत्कवचं दिव्यं सौरेर्यन्निर्मितं पुरा ।

द्वादशाष्टमजन्मस्थदोषान्नाशयते सदा ।

जन्मलग्नस्थितान् दोषान् सर्वान्नाशयते प्रभुः ॥ १२॥


॥ इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे ब्रह्म-नारदसंवादे

शनिवज्रपंजरकवचं सम्पूर्णम् ॥

मंगलवार, 10 जनवरी 2023

गणेश चतुर्थी पूजा

 गणेश चतुर्थी की पूजा  



तिल संकटा चौथ व्रत की विधि

 

भालचंद्र गणेश की पूजा संकट चौथ को की जाती है। प्रात:काल नित्य क्रम से निवृत होकर षोड्शोपचार विधि से गणेश जी की पूजा करें। निम्न श्लोक पढ़कर गणेश जी की वंदना करें। 

 

मं‍त्र: 

गजाननं भूत गणादि सेवितं,कपित्थ जम्बू फल चारू भक्षणम्।

उमासुतं शोक विनाशकारकम्, नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम्॥

 

इसके बाद भालचंद्र गणेश का ध्यान करके पुष्प अर्पित करें। पूरे दिन मन ही मन श्री गणेश जी के नाम का जप करें । सुर्यास्त के बाद स्नान कर के स्वच्छ वस्त्र पहन लें । अब विधिपूर्वक गणेश जी का पूजन करें। एक कलश में जल भर कर रखें। धूप-दीप अर्पित करें। नैवेद्य के रूप में तिल तथा गुड़ के बने हुए लड्डु, ईख, शकरकंद, गुड़ तथा घी अर्पित करें। 

 

यह नैवेद्य रात्रि भर बांस के बने हुए डलिया(टोकरी) से ढंक यथावत् रख दिया जाता है। पुत्रवती स्त्रियां पुत्र की सुख समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं। इस ढंके हुए नैवेद्य को पुत्र ही खोलता है तथा भाई बंधुओं में बांटता है। ऐसी मान्यता है कि इससे भाई-बंधुओं में आपसी प्रेम-भावना की वृद्धि होती है।

 

अलग-अलग राज्यों मे अलग-अलग प्रकार के तिल और गुड़ के लड्डु बनाए जाते हैं। तिल के लड्डु बनाने हेतु तिल को भूनकर,गुड़ की चाशनी में मिलाया जाता है,फिर तिलकूट का पहाड़ बनाया जाता है। तत्पश्चात् गणेश पूजा करके तिलकूट के पहाड़ को तोड़ा जाता है। 

 

गणेश पूजन के बाद चंद्रमा को कलश से अर्घ्य अर्पित करें। धूप-दीप दिखाएं। चंद्र देव से अपने घर-परिवार की सुख और शांति के लिए प्रार्थना करें। इसके बाद एकाग्रचित होकर कथा सुनें अथवा सुनाएं। सभी उपस्थित जनों में प्रसाद बांट दें।


तिल चौथ की कहानी 

 

एक शहर में देवरानी-जेठानी रहती थी। जेठानी अमीर थी और देवरानी गरीब थी। देवरानी गणेश जी की भक्त थी। देवरानी का पति जंगल से लकड़ी काट कर बेचता था और अक्सर बीमार रहता था। देवरानी, जेठानी के घर का सारा काम करती और बदले में जेठानी बचा हुआ खाना, पुराने कपड़े आदि उसको दे देती थी। इसी से देवरानी का परिवार चल रहा था। 

 

माघ महीने में देवरानी ने तिल चौथ का व्रत किया। 5 आने का तिल व गुड़ लाकर तिलकुट्टा बनाया। पूजा करके तिल चौथ की कथा (तिल चौथ की कहानी) सुनी और तिलकुट्टा छींके में रख दिया और सोचा की चांद उगने पर पहले तिलकुट्टा और उसके बाद ही कुछ खाएगी।

 

कथा सुनकर वह जेठानी के यहां चली गई। खाना बनाकर जेठानी के बच्चों से खाना खाने को कहा तो बच्चे बोले मां ने व्रत किया हैं और मां भूखी हैं। जब मां खाना खायेगी हम भी तभी खाएंगे। जेठजी को खाना खाने को कहा तो जेठजी बोले 'मैं अकेला नही खाऊंगा, जब चांद निकलेगा तब सब खाएंगे तभी मैं भी खाऊंगा' जेठानी ने उसे कहा कि आज तो किसी ने भी अभी तक खाना नहीं खाया तुम्हें कैसे दे दूं? तुम सुबह सवेरे ही बचा हुआ खाना ले जाना। 

 

देवरानी के घर पर पति, बच्चे सब आस लगाए बैठे थे कि आज तो त्योहार हैं इसलिए कुछ पकवान आदि खाने को मिलेगा। परन्तु जब बच्चों को पता चला कि आज तो रोटी भी नहीं मिलेगी तो बच्चे रोने लगे। उसके पति को भी बहुत गुस्सा आया कहने लगा सारा दिन काम करके भी दो रोटी नहीं ला सकती तो काम क्यों करती हो ? पति ने गुस्से में आकर पत्नी को कपड़े धोने के धोवने से मारा। धोवना हाथ से छूट गया तो पाटे से मारा। वह बेचारी गणेश जी को याद करती हुई रोते-रोते पानी पीकर सो गई। 

 

उस दिन गणेश जी देवरानी के सपने में आए और कहने लगे-- धोवने मारी, पाटे मारी सो रही है या जाग रही है... . 

 

वह बोली-'कुछ सो रही हूं, कुछ जाग रही हूं... 

 

गणेश जी बोले- भूख लगी हैं, कुछ खाने को दे'


देवरानी बोली 'क्या दूं , मेरे घर में तो अन्न का एक दाना भी नहीं हैं.. जेठानी बचा खुचा खाना देती थी आज वह भी नहीं मिला। पूजा का बचा हुआ तिल कुट्टा छींके में पड़ा हैं वही खा लो। 

तिलकुट्टा खाने के बाद गणेश जी बोले- 'धोवने मारी, पाटे मारी निमटाई लगी है, कहां निमटे... 

वह बोली, यह पड़ा घर, जहां इच्छा हो वहां निमट लो...  

फिर गणेश जी बच्चे की तरह बोले अब कहां पोंछू

नींद में मग्न अब देवरानी को बहुत गुस्सा आया कि कब से तंग किए जा रहे हैं, सो बोली,' मेरे सर पर पोंछो और कहा पोछोंगे...  

 

सुबह जब देवरानी उठी तो यह देखकर हैरान रह गई कि पूरा घर हीरे-मोती से जगमगा रहा है, सिर पर जहां विनायक जी पोंछनी कर गए थे वहां हीरे के टीके व बिंदी जगमगा रहे थे। 

 

उस दिन देवरानी, जेठानी के यहां काम करने नहीं गई। बड़ी देर तक राह देखने के बाद जेठानी ने बच्चों को देवरानी को बुलाने भेजा। जेठानी ने सोचा कल खाना नहीं दिया इसीलिए शायद देवरानी बुरा मान गई है। बच्चे बुलाने गए और बोले चाची चलो मां ने बुलाया है सारा काम पड़ा है। देवरानी ने जवाब दिया अब उसकी जरूरत नहीं है। घर में सब भरपूर है गणेश जी के आशीष से... 

 

बच्चो ने घर जाकर मां को बताया कि चाची का तो पूरा घर हीरे मोतियों से जगमगा रहा है। जेठानी दौड़ती हुई देवरानी के पास आई और पूछा कि यह सब हुआ कैसे?  देवरानी ने उसके साथ जो हुआ वो सब कह डाला। 

 

घर लौटकर जेठानी अपने पति से कहा कि आप मुझे धोवने और पाटे से मारो। उसका पति बोला कि भलीमानस मैंने कभी तुम पर हाथ भी नहीं उठाया। मैं तुम्हे धोवने और पाटे से कैसे मार सकता हूँ। वह नहीं मानी और जिद करने लगी। मजबूरन पति को उसे मारना पड़ा।

 

उसने ढ़ेर सारा घी डालकर चूरमा बनाया और छीकें में रखकर और सो गई। रात को चौथ विनायक जी सपने में आए कहने लगे, भूख लगी है, क्या खाऊं...  


जेठानी ने कहा, हे गणेश जी महाराज, मेरी देवरानी के यहां तो आपने सूखा तिलकुट्टा खाया था, मैने तो झरते घी का चूरमा बनाकर आपके लिए छींके में रखा हैं, फल और मेवे भी रखे हैं जो चाहें खा लीजिए...

 

बालस्वरूप गणेश जी बोले अब निपटे कहां...  

 

जेठानी बोली, उसके यहां  तो टूटी फूटी झोपड़ी थी मेरे यहां तो कंचन के महल हैं जहां चाहो निपटो...  

 

फिर गणेश जी ने पूछा, अब पोंछू कहां... 

 

जेठानी बोली, मेरे ललाट पर बड़ी सी बिंदी लगाकर पोंछ लो... 

 

धन की भूखी जेठानी सुबह बहुत जल्दी उठ गई। सोचा घर हीरे-जवाहरात से भर चूका होगा पर देखा तो पूरे घर में गन्दगी फैली हुई थी। तेज बदबू आ रही थी। उसके सिर पर भी बहुत सी गंदगी लगी हुई थी। उसने कहा 'हे गणेश जी महाराज, यह आपने क्या किया... 

 

मुझसे रूठे और देवरानी पर टूटे। जेठानी ने घर और की सफाई करने की बहुत ही कोशिश करी परन्तु गंदगी और ज्यादा फैलती गई। जेठानी के पति को मालूम चला तो वह भी बहुत गुस्सा हुआ और बोला तेरे पास इतना सब कुछ था फिर भी तेरा मन नहीं भरा। 

 

परेशान होकर चौथ के गणेशजी से मदद की विनती करने लगी। गणेश जी ने कहा, देवरानी से जलन के कारण तूने जो किया था यह उसी का फल है। अब तू अपने धन में से आधा उसे दे देगी तभी यह सब साफ होगा... 

 

उसने आधा धन बांट दिया किन्तु मोहरों की एक हांडी चूल्हे के नीचे गाढ़ रखी थी। उसने सोचा किसी को पता नहीं चलेगा और उसने उस धन को नहीं बांटा । उसने कहा 'हे श्री गणेश जी, अब तो अपना यह बिखराव समेटो, वे बोले, पहले चूल्हे के नीचे गाढ़ी हुई मोहरों की हांडी सहित ताक में रखी दो सुई के भी दो हिस्से कर कर। इस प्रकार ‍ग जानन ने बाल स्वरूप में आकर सुई जैसी छोटी चीज का भी बंटवारा किया और अपनी माया समेटी।

 

हे गणेश जी महाराज, जैसी आपने देवरानी पर कृपा की वैसी सब पर करना। कहानी कहने वाले, सुनने वाले व हुंकारा भरने वाले सब पर कृपा करना।  किन्तु जेठानी को जैसी सजा दी वैसी किसी को मत देना। 

 

बोलो गणेश जी महाराज की जय !!!

 

चौथ माता की जय !!!


🙏🏻🌹जय श्री महाकाल जी 🙇🏻‍♂️💐

गुरुवार, 29 दिसंबर 2022

शयन विधान

 💐 *शयन विधान*💐


सूर्यास्त के एक प्रहर (लगभग 3 घंटे) के बाद ही शयन करना।



🌻सोने की मुद्राऐं:  

           उल्टा सोये भोगी, 

           सीधा सोये योगी,

           बाऐं सोये निरोगी,

           दांऐं सोये रोगी।


🌻शास्त्रीय विधान भी है। 


आयुर्वेद में ‘वामकुक्षि’ की     बात आती हैं,   


बायीं करवट सोना स्वास्थ्य के लिये हितकर हैं।


शरीर विज्ञान के अनुसार चित सोने से रीढ़ की हड्डी को नुकसान और औधा या ऊल्टा सोने से आँखे बिगडती है।


सोते समय कितने गायत्री मंन्त्र /नवकार मंन्त्र गिने जाए :-


"सूतां सात, उठता आठ”सोते वक्त सात भय को दूर करने के लिए सात मंन्त्र गिनें और उठते वक्त आठ कर्मो को दूर करने के लिए आठ मंन्त्र गिनें।


"सात भय:-" 

इहलोक,परलोक,आदान,

अकस्मात ,वेदना,मरण ,

अश्लोक (भय)


🌻दिशा घ्यान:- 


*दक्षिणदिशा (South) में पाँव रखकर कभी सोना नहीं । यम और दुष्टदेवों का निवास है ।कान में हवा भरती है । मस्तिष्क  में रक्त का संचार कम को जाता है स्मृति- भ्रंश,मौत व असंख्य बीमारियाँ होती है।


✌यह बात वैज्ञानिकों ने एवं वास्तुविदों ने भी जाहिर की है।


*1:- पूर्व ( E ) दिशा में मस्तक रखकर सोने से विद्या की प्राप्ति होती है।


2:-दक्षिण ( S ) में मस्तक रखकर सोने से धनलाभ व आरोग्य लाभ होता है ।


*3:-पश्चिम( W ) में मस्तक रखकर सोने से प्रबल चिंता होती है ।

 

4:-उत्तर ( N ) में मस्तक रखकर  सोने से मृत्यु और हानि होती है ।


*अन्य धर्गग्रंथों में शयनविधि में और भी बातें सावधानी के तौर पर बताई गई है ।


विशेष शयन की सावधानियाँ:- 

पण्डित राजकुमार शर्मा 8742867070

*1:-मस्तक और पाँव की तरफ दीपक रखना नहीं। दीपक बायीं या दायीं और कम से कम 5 हाथ दूर होना चाहिये।


2:-सोते समय मस्तक दिवार से कम से कम 3 हाथ दूर होना चाहिये।


*3:-संध्याकाल में निद्रा नहीं लेनी।


4:-शय्या पर बैठे-बैठे निद्रा नहीं लेनी।


*5:-द्वार के उंबरे/ देहरी/थलेटी/चौकट पर मस्तक रखकर नींद न लें।


6:-ह्रदय पर हाथ रखकर,छत के पाट या बीम के नीचें और पाँव पर पाँव चढ़ाकर निद्रा न लें।


*7:-सूर्यास्त के पहले सोना नहीं।


7:-पाँव की और शय्या ऊँची हो  तो  अशुभ  है।  केवल चिकित्स  उपचार हेतु छूट हैं ।


*8:- शय्या पर बैठकर खाना-पीना अशुभ है। (बेड टी पीने वाले सावधान)


9:- सोते सोते पढना नहीं।


10:-सोते-सोते तंम्बाकू चबाना नहीं। (मुंह में गुटखा रखकर सोने वाले चेत जाएँ )


*11:-ललाट पर तिलक रखकर सोना अशुभ है (इसलिये सोते वक्त तिलक मिटाने का कहा जाता है। )


 12:-शय्या पर बैठकर सरोता से सुपारी के टुकड़े करना अशुभ हैं।


🙏🏼 प्रत्येक व्यक्ति यह ज्ञान को प्राप्त कर सके इसलिए शेयर अवश्य करें |  👍🌺 ʝaɨ sɦʀɛɛ ɢaռɛsɦa🌺🙏🙏

बुधवार, 28 दिसंबर 2022

अथ सर्वव्याधिहर वा रोगनाशनवैष्णवकवचम्

 ॥ अथ सर्वव्याधिहर वा रोगनाशनवैष्णवकवचम् ॥

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जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है सभी व्याधियों और रोग का नाश करने वाला वैष्णव कवच अर्थात् भगवान विष्णु के सभी अवतारों से रोग मुक्ति की प्रार्थना!


मनुष्य के रोगों का मूल कारण पिछले पाप कर्म फल, पथ्य-अपथ्य का विचार किये बिना भोजन करना, विपरीत जीवन शैली, काम, क्रोध, लोभ, मद (अहं), मोह, मत्सर हैं। 


अतः आरोग्य चाहने वाला किसी निरापद चिकित्सीय पद्धति का आश्रय लेकर उसके साथ में इस कवच का पाठ करके औषधी का सेवन करे तो रोगनाश का प्रतिशत अवश्य बढ़ जाता है। 


हरिरुवाच :-

सर्वव्याधिहरं वक्ष्ये वैष्णवं कवचं शुभम् ।

येन रक्षा कृता शम्भोर्दैत्यान्क्षपयतः पुरा॥१॥

पाठ भेद :- 

सर्वव्याधिहरं वक्ष्ये वैष्णवं कवचं शुभम् ।

येन रक्षा कृता शम्भोर्नात्र कार्या विचारणा॥१.१॥

प्रणम्य देवमीशानमजं नित्यमनामयम् ।

देवं सर्वेश्वरं विष्णुं सर्वव्यापिनमव्ययम् ॥२॥

बध्नाम्यहं प्रतिसरं नमस्कृत्य जनार्दनम् । 

अमोघाप्रतिमं सर्वं सर्वदुःखनिवारणम्॥३॥

पाठ भेद :-

बध्नाम्यहं प्रतीकारं नमस्कृत्य जनार्दनम् ।

अमोघाप्रतिमं सर्वं सर्वदुःखनिवारणम्॥३.१॥

विष्णुर्मामग्रतः पातु कृष्णो रक्षतु पृष्ठतः ।

हरिर्मे रक्षतु शिरो हृदयञ्च जनार्दनः॥४॥

मनो मम हृषीकेशो जिह्वां रक्षतु केशवः ।

प्रातु नेत्रे वासुदेवः श्रोत्रे सङ्कर्षणो विभुः॥५॥

प्रद्युम्नः पातु मे घ्राणमनिरुद्धस्तु चर्म च ।

वनमाली गलस्यान्तं श्रीवत्सो रक्षतामधः॥६॥

पार्श्वं रक्षतु मे चक्रं वामं दैत्यनिवारणम् ।

दक्षिणन्तु गदादेवी सर्वासुरनिवारिणी॥७॥

उदरं मुसलं पातु पृष्ठं मे पातु लाङ्गलम् ।

ऊर्ध्वं रक्षतु मे शार्ङ्गं जङ्घे रक्षतु नन्दकः॥८॥

पार्ष्णी रक्षतु शङ्खश्च पद्मं मे चरणावुभौ ।

सर्वकार्यार्थसिद्ध्यर्थं पातु मां गरुडः सदा॥९॥

वराहो रक्षतु जले विषमेषु च वामनः ।

अटव्यां नारसिंहश्च सर्वतः पातु केशवः॥१०॥

हिरण्यगर्भो भगवान्हिरण्यं मे प्रयच्छतु ।

साङ्ख्याचार्यस्तु कपिलो धातुसाम्यं करोतु मे॥११॥

श्वेतद्वीपनिवासी च श्वेतद्वीपं नयत्वजः ।

सर्वान्सूदयतां शत्रून्मधुकैटभमर्दनः ॥१२॥

पाठ भेद :-

श्वेतद्वीपनिवासी च श्वेतद्वीपं नयत्वजः।

सर्वान्सूदनः शत्रून्मधुकैटभमर्दनः ॥१२.१॥

सदाकर्षतु विष्णुश्च किल्बिषं मम विग्रहात् ।

हंसो मत्स्यस्तथा कूर्मः पातु मां सर्वतो दिशम्॥१३॥

त्रिविक्रमस्तु मे देवः सर्वपापानि कृन्ततु । 

तथा नारायणो देवो बुद्धिं पालयतां मम ॥ १४॥

पाठ भेद :-

त्रिविक्रमस्तु मे देवः सर्वपापान्निगृह्णतु । 

तथा नारायणो देवो बुद्धिं पालयतां मम ॥१४.१॥

शेषो मे निर्मलं ज्ञानं करोत्वज्ञाननाशनम् ।

वडवामुखो नाशयतां कल्मषं यत्कृतं मया ॥१५॥

पद्भ्यां ददातु परमं सुखं मूर्ध्नि मम प्रभुः ।

दत्तात्रेयः प्रकुरुतां सपुत्रपशुबान्धवम् ॥ १६॥

पाठ भेद :-

पद्भ्यां ददातु परमं सुखं मूर्ध्नि मम प्रभुः।

दत्तात्रेयः कलयतु सपुत्रपशुबान्धवम् ॥१६.१॥

सर्वानरीन्नाशयतु रामः परशुना मम ।

रक्षोघ्नस्तु दशरथिः पातु नित्यं महाभुजः॥१७॥

शत्रून्हलेन मे हन्याद्रमो यादवनन्दनः।

प्रलम्बकेशिचाणूरपूतनाकंसनाशनः।

कृष्णस्य यो बालभावःस मे कामान्प्रयच्छतु॥१८॥

अन्धकारतमोघोरं पुरुषं कृष्णपिङ्गलम् ।

पश्यामि भयसन्त्रस्तः पाशहस्तमिवान्तकम्॥१९॥

ततोऽहं पुण्डरीकाक्षमच्युतं शरणं गतः ।

धन्योऽहं निर्भयो नित्यं यस्य मे भगवान्हरिः॥२०॥

ध्यात्वा नारायणं देवं सर्वोपद्रवनाशनम् ।

वैष्णवं कवचं बद्ध्वा विचरामि महीतले॥२१॥

अप्रधृष्योऽस्मि भूतानां सर्वदेवमयो ह्यहम् ।

स्मरणाद्देवदेवस्य विष्णोरमिततेजसः॥२२॥

सिद्धिर्भवतु मे नित्यं यथा मन्त्रमुदाहृतम् ।

यो मां पश्यति चक्षुर्भ्यां यञ्चः पश्यामि चक्षुषा ।

सर्वेषां पापदुष्टानां विष्णुर्बध्नातु चक्षुषी॥२३॥

वासुदेवस्य यच्चक्रं तस्य चक्रस्य ये त्वराः ।

ते हि छिन्दन्तु पापान्मे मम हिंसन्तु हिंसकान्॥२४॥

पाठ भेद :- 

वासुदेवस्य यच्चक्रं तस्य चक्रस्य ये त्वराः ।

ते हि छिन्दन्तु पापानि मम हिंसन्तु हिंसकान्॥२४.१॥

राक्षसेषु पिशाचेषु कान्तारेष्वटवीषु च ।

विवादे राजमार्गेषु द्यूतेषु कलहेषु च॥२५॥

नदीसन्तारणे घोरे सम्प्राप्ते प्राणसंशये ।

अग्निचौरनिपातेषु सर्वग्रहनिवारणे॥२६॥

विद्युत्सर्पविषोद्वेगे रोगे वै विघ्नसङ्कटे ।

जप्यमेतज्जपेन्नित्यं शरीरे भयमागते॥२७॥

अयं भगवतो मन्त्रो मन्त्राणां परमो महान् ।

विख्यातं कवचं गुह्यं सर्पपापप्रणाशनम् ।

स्वमायाकृतिनिर्माणं कल्पान्तगहनं महत्॥२८॥

ॐ अनाद्यन्त जगद्बीज पद्मनाभ नमोऽस्तु ते ।

ॐ कालाय स्वाहा । ॐ कालपुरुषाय स्वाहा । 

ॐ कृष्णाय स्वाहा । ॐ कृष्णरूपाय स्वाहा । 

ॐ चण्डाय स्वाहा । ॐ चण्डरूपाय स्वाहा ।

ॐ प्रचण्डाय स्वाहा । ॐ प्रचण्डरूपाय स्वाहा । 

ॐ सर्वाय स्वाहा । ॐ सर्वरूपाय स्वाहा । 

ॐ नमो भुवनेशाय त्रिलोकधात्रे इह विटि

सिविटि सिविटि स्वाहा । 

ॐ नमः अयोखेतये ये ये संज्ञापय (संज्ञायापात्र)

दैत्यदानवयक्षराक्षसभूतपिशाचकूष्माण्डान्तापस्मार

कच्छर्दनदुर्धराणा-मेकाहिकद्व्याहिकत्र्याहिकचातुर्थिक मौहूर्तिकदिनज्वररात्रिज्वरसन्ध्याज्वरसर्वज्वरादीनां

लूताकीटकण्टकपूतनाभुजङ्गस्थावरजङ्गमविषादीनामिदं 

शरीरं मम पथ्यं त्वं कुरु स्फुट स्फुट स्फुट प्रकोट लफट

विकटदंष्ट्रः पूर्वतो रक्षतु । ॐ है है है है दिनकर्सहस्र-

कालसमाहतो जय पश्चिमतो रक्ष । ॐ निवि निवि 

प्रदीप्तज्वलनज्वालाकार महाकपिल उत्तरतो रक्ष ।

ॐ विलि विलि मिलि मिलि गरुडि गरुडि 

गौरीगान्धारीविषमोहविषमविषमां

महोहयतु स्वाहा दक्षिणतो रक्ष । मां पश्य 

सर्वभूतभयोपद्रवेभ्यो रक्ष रक्ष जय जय

विजय तेन हीयते रिपुत्रासाहङ्कृतवाद्यतोभय रुदय 

वोभयोऽभयं दिशतु च्युतः तदुदरमखिलं विशन्तु

युगपरिवर्तसहस्रसङ्ख्येयोऽस्तमलमिव प्रविशन्ति रश्मयः।

वासुदेवसङ्कर्षणप्रद्युम्नश्चानिरुद्धकः।

सर्वज्वरान्मम घ्नन्तु विष्णुर्नारायणो हरिः॥२९॥


॥ इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये 

आचारकाण्डे वैष्णवकवचकथनं नाम 

चतुर्नवत्युत्तरशततमोऽध्यायः॥

शनिवार, 10 दिसंबर 2022

श्रीदत्तात्रेयसहस्रनामस्तोत्रम्

 श्रीदत्तात्रेयसहस्रनामस्तोत्रम् 🌹🌿

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निखिलागमतत्त्वज्ञ ब्रह्मज्ञानपरायण ।

वदास्माकं मुक्त्युपायं सूत सर्वोपकारकम् ॥ १॥


सर्वदेवेषु को देवः सद्यो मोक्षप्रदो भवेत् ।

को मनुर्वा भवेत्तस्य सद्यः प्रीतिकरो ध्रुवम् ॥ २॥


सूत उवाच -

निगमागमतत्त्वज्ञो ह्यवधूतश्चिदम्बरः ।

भक्तवात्सल्यप्रवणो दत्त एव हि केवलः ॥ ३॥


सदा प्रसन्नवदनो भक्तचिन्तैकतत्परः ।

तस्य नामान्यनन्तानि वर्तन्तेऽथाप्यदः परम् ॥ ४॥


दत्तस्य नामसाहस्रं तस्य प्रीतिविवर्धनम् ।

यस्त्विदं पठते नित्यं दत्तात्रेयैकमानसः ॥ ५॥


मुच्यते सर्वपापेभ्यः स सस्द्यो नात्र संशयः ।

अन्ते तद्धाम संयाति पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥ ६॥


(अस्य श्रीमद्दत्तात्रेयसहस्रनामकस्य तु ।

ऋषिर्ब्रह्म विनिरिर्दिष्टोनुष्टुप्छन्दं प्रकीर्तिम् ॥


दत्तात्रेयोऽस्यदेवता दत्तात्रेयात्मतारकम् ।

दाकारंरेफसंयुक्तं दत्तबीजमुदाहृतम् ॥


द्रामित्यादि त्रिभिः प्रोक्तं बीजं शक्तिश्च कीलकम् ।

षाअॅऊघर्फु? बीजसंयुक्तैं षडङ्गन्यास ईरितः ॥ ??

पीताम्बरालङ्कृत पृष्ठभागं भस्मावगुण्ठामलरुक्मदेहम् ।

विद्युत्रभापिङ्गजटाभिरामं श्रीदत्तयोगीशमहं भजामि ॥)


अस्य श्रीमद्दत्तात्रेयसहस्रनामस्तोत्रमन्त्रस्य अवधूत ऋषिः ।

अनुष्टुप्छन्दः । दिगम्बरो देवता । ॐ बीजम् । ह्रीं शक्तिः ।

क्रौं कीलकम् । श्रीदत्तात्रेयप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥


अथ ध्यानम् -

दिगम्बरं भस्मविलेपिताङ्गं बोधात्मकं मुक्तिकरं पर्सन्नम् ।

निर्मानसं श्यामतनुं भजेऽहं दत्तात्रेयं ब्रह्मसमाधियुक्तम् ॥


अथ सहस्रनामस्तोत्रम् ।

दत्तात्रेयो महोयोगी योगेशश्चामरप्रभुम् ।

मुनिर्दिगम्बरो बालो मायामुक्तो मदापहः ॥ १॥


अवधूतो महानाथः शङ्करोऽमरवल्लभः ।

महादेवश्चादिदेवः पुराणप्रभुरीश्वरः ॥ २॥


सत्त्वकृत्सत्त्वभृद्भावः सत्त्वात्मा सत्त्वसागरः ।

सत्त्ववित्सत्त्वसाक्षी च सत्त्वसाध्योऽमराधिपः ॥ ३॥


भूतकृद्भूतभृच्चैव भूतात्मा भूतसम्भवः ।

भूतभावो भवो भूतवित्तथा भूतकारणः ॥ ४॥


भूतसाक्षी प्रभूतिश्च भूतानां परमा गतिः ।

भूतसङ्गविहीनात्मा भूतात्मा भूतशङ्करः ॥ ५॥


भूतनाथो महानाथश्चादिनाथो महेश्वरः ।

सर्वभूतनिवासात्मा भूतसन्तापनाशनः ॥ ६॥


सर्वात्मा सर्वभृत्सर्वः सर्वज्ञः सर्वनिर्णयः ।

सर्वसाक्षी बृहद्भानुः सर्ववित्सर्वमङ्गलः ॥ ७॥


शान्तः सत्यः समः पूर्णो ह्येकाकी कमलापतिः ।

रामो रामप्रियश्चैव विरामो रामकारणम् ॥ ८॥


शुद्धात्मा पावनोऽनन्तः प्रतीतः परमार्थभृत् ।

हंससाक्षी विभुश्चैव प्रभुः प्रलय इत्यपि ॥ ९॥


सिद्धात्मा परमात्मा च सिद्धानां परमा गतिः ॥


सिद्धिसिद्धस्तथा साध्यः साधनो ह्युत्तमस्तथा ॥ १०॥


सुलक्षणः सुमेधावी विद्यावान्विगतान्तरः ।

विज्वरश्च महाबाहुर्बहुलानन्दवर्धनः ॥ ११॥


अव्यक्तपुरुषः प्राज्ञः परज्ञः परमार्थदृक् ।

परापरविनिर्मुक्तो युक्तस्तत्त्वप्रकाशवान् ॥ १२॥


दयावान्भगवान्भावी भावात्मा भावकारणः ।

भवसन्तापनाशश्च पुष्पवान्पण्डितो बुधः ॥ १३॥


प्रत्यक्षवस्तुर्विश्वात्मा प्रत्यग्ब्रह्म सनातनः ।

प्रमाणविगतश्चैव प्रत्याहारनियोजकः ॥ १४॥


प्रणवः प्रणवातीतः प्रमुखः प्रलयात्मकः ।

मृत्युञ्जयो विविक्तात्मा शङ्करात्मा परो वपुः ॥ १५॥


परमस्तनुविज्ञेयः परमात्मनि संस्थितः ।

प्रबोधकलनाधारः प्रभावप्रवरोत्तमः ॥ १६॥


चिदम्बरश्चिद्विलासश्चिदाकाशश्चिदुत्तमः ।

चित्तचैतन्यचित्तात्मा देवानां परमा गतिः ॥ १७॥


अचेत्यश्चेतनाधारश्चेतनाचित्तविक्रमः ।

चित्तात्मा चेतनारूपो लसत्पङ्कजलोचनः ॥ १८॥


परब्रह्म परं ज्योतिः परं धाम परन्तपः ।

परं सूत्रं परं तन्त्रं पवित्रं परमोहवान् ॥ १९॥


क्षेत्रज्ञः क्षेत्रगः क्षेत्रः क्षेत्राधारः पुरञ्जनः ।

क्षेत्रशून्यो लोकसाक्षी क्षेत्रवान्बहुनायकः ॥ २०॥


योगेन्दो योगपूज्यश्च योग आत्मविदां शुचिः ।

योगमायाधरः स्थाणुरचलः कमलापतिः ॥ २१॥


योगेशो योगनिर्माता योगज्ञानप्रकाशनः ।

योगपालो लोकपालः संसारतमनाशनः ॥ २२॥


गुह्यो गुह्यतमो गुप्तो मुक्तो युक्तः सनातनः ।

गहनो गगनाकारो गम्भीरो गणनायकः ॥ २३॥


गोविन्दो गोपतिर्गोप्ता गोभागो भावसंस्थितः ।

गोसाक्षी गोतमारिश्च गान्धारो गगनाकृतिः ॥ २४॥


योगयुक्तो भोगयुक्तः शङ्कामुक्तसमाधिमान् ।

सहजः सकलेशानः कार्तवीर्यवरप्रदः ॥ २५॥


सरजा विरजाः पुंसो पावनः पापनाशनः । पुमान्

परावरविनिर्मुक्तः परञ्ज्योतिः पुरातनः ॥ २६॥


नानाज्योतिरनेकात्मा स्वयञ्ज्योतिः सदाशिवः ।

दिव्यज्योतिर्मयश्चैव सत्यविज्ञानभास्करः ॥ २७॥


नित्यशुद्धः परः पूर्णः प्रकाशः प्रकटोद्भवः ।

प्रमादविगतश्चैव परेशः परविक्रमः ॥ २८॥


योगी योगो योगपश्च योगाभ्यासप्रकाशनः ।

योक्ता मोक्ता विधाता च त्राता पाता निरायुध्यः ॥ २९॥


नित्यमुक्तो नित्ययुक्तः सत्यः सत्यपराक्रमः ।

सत्त्वशुद्धिकरः सत्त्वस्तथा सत्त्वम्भृतां गतिः ॥ ३०॥


श्रीधरः श्रीवपुः श्रीमान् श्रीनिवासोऽमरार्चितः ।

श्रीनिधिः श्रीपतिः श्रेष्ठः श्रेयस्कश्चरमाश्रयः ॥ ३१॥


त्यागी त्यागार्थसम्पन्नस्त्यागात्मा त्यागविग्रहः ।

त्यागलक्षणसिद्धात्मा त्यागज्ञस्त्यागकारणः ॥ ३२॥


भोगो भोक्ता तथा भोग्यो भोगसाधनकारणः ।

भोगी भोगार्थसम्पन्नो भोगज्ञानप्रकाशनः ॥ ३३॥


केवलः केशवः कृष्णः कंवासाः कमलालयः ।

कमलासनपूज्यश्च हरिरज्ञानखण्डनः ॥ ३४॥


महात्मा महदादिश्च महेशोत्तमवन्दितः ।

मनोबुद्धिविहीनात्मा मानात्मा मानवाधिपः ॥ ३५॥


भुवनेशो विभूतिश्च धृतिर्मेधा स्मृतिर्दया ।

दुःखदावानलो बुद्धः प्रबुद्धः परमेश्वरः ॥ ३६॥


कामहा क्रोधहा चैव दम्भदर्पमदापहः ।

अज्ञानपतिमिरारिश्च भवारिर्भुवनेश्वरः ॥ ३७॥


रूपकुद्रूपभृद्रूपी रूपात्मा रूपकारणः ।

रूपज्ञो रूपसाक्षी च नामरूपो गुणान्तकः ॥ ३८॥


अप्रमेयः प्रमेयश्च प्रमाणं प्रणवाश्रयः ।

प्रमाणरहितोऽचिन्त्यश्चेतनाविगतोऽजरः ॥ ३९॥


अक्षरोऽक्षरमुक्तश्च विज्वरो ज्वरनाशनः ।

विशिष्टो वित्तशास्त्री च दृष्टो दृष्टान्तवर्जितः ॥ ४०॥


गुणेशो गुणकायश्च गुणात्मा गणभावनः ।

अनन्तगुणसम्पन्नो गुणगर्भो गुणाधिपः ॥ ४१॥


गणेशो गुणनाथश्च गुणात्मा गणभावनः ।

गणबन्धुर्विवेकात्मा गुणयुक्तः पराक्रमी ॥ ४२॥


अतर्क्यः क्रतुरग्निश्च कृतज्ञः सफलाश्रयः ।

यज्ञश्च यज्ञफल्दो यज्ञ इज्योऽमरोत्तमः ॥ ४३॥


हिरण्यगर्भः श्रीगर्भः खगर्भः कुणपेश्वरः ।

मायागर्भो लोकगर्भः स्वयम्भूर्भुवनान्तकः ॥ ४४॥


निष्पापो निबिडो नन्दी बोधी बोधसमाश्रयः ।

बोधात्मा बोधनात्मा च भेदवैतण्डखण्डनः ॥ ४५॥


स्वाभाव्यो भावनिर्मुक्तो व्यक्तोऽव्यक्तसमाश्रयः ।

नित्यतृप्तो निराभासो निर्वाणः शरणः सुहृत् ॥ ४६॥


गुह्येशो गुणगम्भीरो गुणदोषनिवारणः ।

गुणसङ्गविहीनश्च योगारेर्दर्पनाशनः ॥ ४७॥


आनन्दः परमानन्दः स्वानन्दसुखवर्धनः ।

सत्यानन्दश्चिदानन्दः सर्वानन्दपरायणः ॥ ४८॥


सद्रूपः सहजः सत्यः स्वानन्दः सुमनोहरः ।

सर्वः सर्वान्तरश्चैव पूर्वात्पूर्वतरस्तथा ॥ ४९॥


खमयः खपरः खादिः खम्ब्रह्म खतनुः खगः ।

खवासाः खविहीनश्च खनिधिः खपराश्रयः ॥ ५०॥


अनन्तश्चादिरूपश्च सूर्यमण्डलमध्यगः ।

अमोघः परमामोघः परोक्षः वरदः कविः ॥ ५१॥


विश्वचक्षुर्विश्वसाक्षी विश्वबाहुर्धनेश्वरः ।

धनञ्जयो महातेजास्तेजिष्ठस्तैजसः सुखी ॥ ५२॥


ज्योतिर्ज्योतिर्मयो जेता ज्योतिषां ज्योतिरात्मकः ।

ज्योतिषामपि ज्योतिश्च जनको जनमोहनः ॥ ५३॥


जितेन्द्रियो जितक्रोधो जितात्मा जितमानसः ।

जितसङ्गो जितप्राणो जितसंसारवासनः ॥ ५४॥


निर्वासनो निरालम्बो निर्योगक्षेमवर्जितः ।

निरीहो निरहङ्कारो निराशीर्निरुपाधिकः ॥ ५५॥


नित्यबोधो विविक्तात्मा विशुद्धोत्तमगौरवः ।

विद्यार्थी परमार्थी च श्रद्धार्थी साधनात्मकः ॥ ५६॥


प्रत्याहारी निराहारी सर्वाहारपरायणः ।

नित्यशुद्धो निराकाङ्क्षी पारायणपरायणः ॥ ५७॥


अणोरणुतरः सूक्ष्मः स्थूलः स्थूलतरस्तथा ।

एकस्तथाऽनेकरूपो विश्वरूपः सनातनः ॥ ५८॥


नैकरूपो विरूपात्मा नैकबोधमयोऽपि च ।

नैकनाममयश्चैव नैकविद्याविवर्धनः ॥ ५९॥


एकश्चैकान्तिकश्चैव नानाभावविवर्जितः ।

एकाक्षरस्तथा बीजः पूर्णबिम्बः सनातनः ॥ ६०॥


मन्त्रवीर्यो मन्त्रबीजः शास्त्रवीर्यो जगत्पतिः ।

नानावीर्यधरश्चैव शक्रेशः पृथिवीपतिः ॥ ६१॥


प्राणेशः प्राणदः प्राणः प्राणायामपरायणः ।

प्राणपञ्चकनिर्मुक्तः कोशपञ्चकवर्जितः ॥ ६२॥


निश्चलो निष्कलोऽसङ्गो निष्प्रपञ्चो निरामयः ।

निराधारो निराकारो निर्विकारो निरञ्जनः ॥ ६३॥


निष्प्रतीतो निराभासो निरासक्तो निराकुलः ।

निष्ठासर्वगतश्चैव निरारम्भो निराश्रयः ॥ ६४॥


निरन्तरः सत्त्वगोप्ता शान्तो दान्तो महामुनिः ।

निःशब्दः सुकृतः स्वस्थः सत्यवादी सुरेश्वरः ॥ ६५॥


ज्ञानदो ज्ञानविज्ञानी ज्ञानात्माऽऽनन्दपूरितः ।

ज्ञानयज्ञविदां दक्षो ज्ञानाग्निर्ज्वलनो बुधः ॥ ६६॥


दयावान्भवरोगारिश्चिकित्साचरमागतिः ।

चन्द्रमण्डलमध्यस्थश्चन्द्रकोटिसुशीतलः ॥ ६७॥


यन्तकृत्परमो यन्त्री यन्त्रारूढपराजितः ।

यन्त्रविद्यन्त्रवासश्च यन्त्राधारो धराधरः ॥ ६८॥


तत्त्वज्ञस्तत्त्वभूतात्मा महत्तत्त्वप्रकाशनः ।

तत्त्वसङ्ख्यानयोगज्ञः साङ्ख्यशास्त्रप्रवर्तकः ॥ ६९॥


अनन्तविक्रमो देवो माधवश्च धनेश्वरः ।

साधुः साधुवरिष्ठात्मा सावधानोऽमरोत्तमः ॥ ७०॥


निःसङ्कल्पो निराधारो दुर्धरो ह्यात्मवित्पतिः ।

आरोग्यसुखदश्चैव प्रवरो वासवस्तथा ॥ ७१॥


परेशः परमोदारः प्रत्यक्चैतन्यदुर्गमः ।

दुराधर्षो दुरावासो दूरत्वपरिनाशनः ॥ ७२॥


वेदविद्वेदकृद्वेदो वेदात्मा विमलाशयः ।

विविक्तसेवी च संसारश्रमनाशनस्तथा ॥ ७३॥


ब्रह्मयोनिर्बृहद्योनिर्विश्वयोनिर्विदेहवान् ।

विशालाक्षो विश्वनाथो हाटकाङ्गदभूषणः ॥ ७४॥


अबाध्यो जगदाराध्यो जगदार्जवपालनः ।

जनवान्धनवान्धर्मी धर्मगो धर्मवर्धनः ॥ ७५॥


अमृतः शाश्वतः साद्यः सिद्धिदः सुमनोहरः ।

खलुब्रह्मखलुस्थानो मुनीनां परमा गतिः ॥ ७६॥


उपद्रष्टा तथा श्रेष्ठः शुचिर्भूतो ह्यनामयः ।

वेदसिद्धान्तवेद्यश्च मानसाह्लादवर्धनः ॥ ७७॥


देहदन्यो गुणादन्यो लोकादन्यो विवेकवित् ।

दुष्टस्वप्नहरश्चैव गुरुर्गुरुवरोत्तमः ॥ ७८॥


कर्मी कर्मविनिर्मुक्तः संन्यासी साधकेश्वरः ।

सर्वभावविहीनश्च तृष्णासङ्गनिवारकः ॥ ७९॥


त्यागी त्यागवपुस्त्यागस्त्यागदानविवर्जितः ।

त्यागकारणत्यागात्मा सद्गुरुः सुखदायकः ॥ ८०॥


दक्षो दक्षादिवन्द्यश्च ज्ञानवादप्रवर्तकः  ।

शब्दब्रह्ममयात्मा च शब्दब्रह्मप्रकाशवान् ॥ ८१॥


ग्रसिष्णुः प्रभविष्णुश्च सहिष्णुर्विगतान्तरः  ।

विद्वत्तमो महावन्द्यो विशालोत्तमवाङ्मुनिः ॥ ८२॥


ब्रह्मविद्ब्रह्मभावश्च ब्रह्मर्षिर्बाह्मणप्रियः  ।

ब्रह्म ब्रह्मप्रकाशात्मा ब्रह्मविद्याप्रकाशनः ॥ ८३॥


अत्रिवंशप्रभूतात्मा तापसोत्तमवन्दितः  ।

आत्मवासी विधेयात्मा ह्यत्रिवंशविवर्धनः ॥ ८४॥


प्रवर्तनो निवृत्तात्मा प्रलयोदकसन्निभः  ।

नारायणो महागर्भो भार्गवप्रियकृत्तमः ॥ ८५॥


सङ्कल्पदुःखदलनः संसारतमनाशनः  ।

त्रिविक्रमस्त्रिधाकारस्त्रिमूर्तिस्त्रिगुणात्मकः ॥ ८६॥


भेदत्रयहरश्चैव तापत्रयनिवारकः  ।

दोषत्रयविभेदी च संशयार्णवखण्डनः ॥ ८७॥


असंशयस्त्वसम्मूढो ह्यवादी राजनन्दितः  ।

राजयोगी महायोगी स्वभावगलितस्तथा ॥ ८८॥


पुण्यश्लोकः पवित्राङ्घ्रिर्ध्यानयोगपरायणः  ।

ध्यानस्थो ध्यानगम्यश्च विधेयात्मा पुरातनः ॥ ८९॥


अविज्ञेयो ह्यन्तरात्मा मुख्यबिम्बसनातनः  ।

जीवसञ्जीवनो जीवश्चिद्विलासश्चिदाश्रयः ॥ ९०॥


महेन्द्रोऽमरमान्यश्च योगेन्द्रो योगवित्तमः  ।

योगधर्मस्तथा योगस्तत्त्वस्तत्त्वविनिश्चयः ॥ ९१॥


नैकबाहुरनन्तात्मा नैकनामपराक्रमः  ।

नैकाक्षी नैकपादश्च नाथनाथोत्तमोत्तमः ॥ ९२॥


सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्  ।

सहस्ररूपदृक्चैव सहस्रारमयोद्धवः ॥ ९३॥


त्रिपादपुरुषश्चैव त्रिपादूर्ध्वस्तथैव च  ।

त्र्यम्बकश्च महावीर्यो योगवीर्यविशारदः ॥ ९४॥


विजयी विनयी जेता वीतरागी विराजितः  ।

रुद्रो रौद्रो महाभीमः प्राज्ञमुख्यः सदाशुचिः ॥ ९५॥


अन्तर्ज्योतिरनन्तात्मा प्रत्यगात्मा निरन्तरः ।

अरूपश्चात्मरूपश्च सर्वभावविनिर्वृतः ॥ ९६॥


अन्तः शून्यो बहिः शून्यः शून्यात्मा शून्यभावनः  ।

अन्तःपूर्णो बहिःपूर्णः पूर्णात्मा पूर्णभावनः ॥ ९७॥


अन्तस्त्यागी बहिस्त्यागी त्यागात्मा सर्वयोगवान्  ।

अन्तर्यागी बहिर्यागी सर्वयोगपरायणः ॥ ९८॥


अन्तर्भोगी बहिर्भोगी सर्वभोगविदुत्तमः  ।

अन्तर्निष्ठो बहिर्निष्ठः सर्वनिष्ठामयस्तथा ॥ ९९॥


बाह्यान्तरविमुक्तश्च बाह्यान्तरविवर्जितः  ।

शान्तः शुद्धो विशुद्धश्च निर्वाणः प्रकृतेः परः ॥ १००॥


अकालः कालनेमी च कालकालो जनेश्वरः  ।

कालात्मा कालकर्ता च कालज्ञः कालनाशनः ॥ १०१॥


कैवल्यपददाता च कैवल्यसुखदायकः  ।

कैवल्यकलनाधारो निर्भरो हर्षवर्धनः ॥ १०२॥


हृदयस्थो हृषीकेशो गोविन्दो गर्भवर्जितः  ।

सकलागमपूज्यश्च निगमो निगमाश्रयः ॥ १०३॥


पराशक्तिः पराकीर्तिः परावृत्तिर्निधिस्मृतिः  ।

पराविद्या पराक्षान्तिर्विभक्तिर्युक्तसद्गतिः ॥ १०४॥


स्वप्रकाशः प्रकाशात्मा परसंवेदनात्मकः  ।

स्वसेव्यः स्वविदां स्वात्मा स्वसंवेद्योऽनघः क्षमी ॥ १०५॥


स्वानुसन्धानशीलात्मा स्वानुसन्धानगोचरः  ।

स्वानुसन्धानशून्यात्मा स्वानुसन्धानाश्रयस्तथा ॥ १०६॥


स्वबोधदर्पणोऽभङ्गः कन्दर्पकुलनाशनः  ।

ब्रह्मचारी ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणो ब्रह्मवित्तमः ॥ १०७॥


तत्त्वबोधः सुधावर्षः पावनः पापपावकः  ।

ब्रह्मसूत्रविधेयात्मा ब्रह्मसूत्रार्धनिर्णयः ॥ १०८॥


आत्यन्तिको महाकल्पः सङ्कल्पावर्तनाशनः  ।

आधिव्याधिहरश्चैव संशयार्णवशोषकः ॥ १०९॥


तत्त्वात्मज्ञानसन्देशो महानुभवभावितः  ।

आत्मानुभवसम्पन्नः स्वानुभावसुखाश्रयः ॥ ११०॥


अचिन्त्यश्च बृहद्भानुः प्रमदोत्कर्षनाशनः  ।

अनिकेतप्रशान्तात्मा शून्यवासो जगद्वपुः ॥ १११॥


चिद्गतिश्चिन्मयश्चक्री मायाचक्रप्रवर्तकः  ।

सर्ववर्णविदारम्भी सर्वारम्भपरायणः ॥ ११२॥


पुराणः प्रवरो दाता सुन्दरः कनकाङ्गदी  ।

अनिसूयात्मजो दत्तः सर्वज्ञः सर्वकामदः ॥ ११३॥


कामजित्कामपालश्च कामी कामप्रदागमः  ।

कामवान्कामपोषश्च सर्वकामनिवर्तकः ॥ ११४॥


सर्वकर्मफलोत्पत्तिः सर्वकामफलप्रदः  ।

सर्वकर्मफलैः पूज्यः सर्वकर्मफलाश्रयः ॥ ११५॥


विश्वकर्मा कृतात्मा च कृतज्ञः सर्वसाक्षिकः  ।

सर्वारम्भपरित्यागी जडोन्मत्तपिशाचवान् ॥ ११६॥


भिक्षुर्भिक्षाकरश्चैव भैक्षाहारी निराश्रमी  ।

अकूलश्चानुकूलश्च विकलो ह्यकलस्तथा ॥ ११७॥


जटिलो वनचारी च दण्डी मुण्डी च गण्डवान्  ।

देहधर्मविहीनात्मा ह्येकाकी सङ्गवर्जितः ॥ ११८॥


आश्रम्यनाश्रमारम्भोऽनाचारी कर्मवर्जितः  ।

असन्देही च सन्देही न किञ्चिन्न च किञ्चनः ॥ ११९॥


नृदेही देहशून्यश्च नाभावी भावनिर्गतः  ।

नाब्रह्मच परब्रह्म स्वयमेव निराकुलः ॥ १२०॥


अनघश्चागुरुश्चैव नाथनाथोत्तमो गुरुः  ।

द्विभुजः प्राकृतश्चैव जनकश्च पितामहः ॥ १२१॥


अनात्मा न च नानात्मा नीतिर्नीतिमतां वरः  ।

सहजः सदृशः सिद्धश्चैकश्चिन्मात्र एव च ॥ १२२॥


न कर्तापि च कर्ता च भोक्ता भोगविवर्जितः  ।

तुरीयस्तुरीयातीतः स्वच्छः सर्वमयस्तथा ॥ १२३॥


सर्वाधिष्ठानरूपश्च सर्वध्येयविवर्जितः  ।

सर्वलोकनिवासात्मा सकलोत्तमवन्दितः ॥ १२४॥


देहभृद्देहकृच्चैव देहात्मा देहभावनः  ।

देही देहविभक्तश्च देहभावप्रकाशनः ॥ १२५॥


लयस्थो लयविच्चैव लयाभावश्च बोधवान्  ।

लयातीतो लयस्यान्तो लयभावनिवारणः ॥ १२६॥


विमुखः प्रमुखश्चैव प्रत्यङ्मुखवदाचरी  ।

विश्वभुग्विश्वधृग्विश्वो विश्वक्षेमकरस्तत्जा ॥ १२७॥


अविक्षिप्तोऽप्रमादी च परर्द्धिः परमार्थदृक्  ।

स्वानुभावविहीनश्च स्वानुभावप्रकाशनः ॥ १२८॥


निरिन्द्रियश्च निर्बुद्धिर्निराभासो निराकृतः  ।

निरहङ्कारश्चरूपात्मा निर्वपुः सकलाश्रयः ॥ १२९॥


शोकदुःखहरश्चैव भोगमोक्षफलप्रदः  ।

सुप्रसन्नस्तथा सूक्ष्मः शब्दब्रह्मार्थसङ्ग्रहः ॥ १३०॥


आगमापायशून्यश्च स्थानदश्च सताङ्गतिः  ।

अकृतः सुकृतश्चैव कृतकर्मा विनिर्वृतः ॥ १३१॥


भेदत्रयवरश्चैव देहत्रयविनिर्गतः  ।

सर्वकाममयश्चैव सर्वकामनिवर्तकः ॥ १३२॥


सिद्धेश्वरोऽजरः पञ्चबाणदर्पहुताशनः  ।

चतुरक्षरबीजात्मा स्वभूश्चित्कीर्तिभूषणः ॥ १३३॥


अगाधबुद्धिरक्षुब्धश्चन्द्रसूर्याग्निलोचनः  ।

यमदंष्ट्रोऽतिसंहर्ता परमानन्दसागरः ॥ १३४॥


लीलाविश्वम्भरो भानुर्भैरवो भीमलोचनः  ।

ब्रह्मचर्याम्बरः कालस्त्वचलश्चलनान्तकः ॥ १३५॥


आदिदेवो जगद्योनिर्वासवारिविमर्दनः  ।

विकर्मकर्मकर्मज्ञोऽनन्यगमकोऽगमः ॥ १३६॥


अबद्धकर्मशून्यश्च कामरागकुलक्षयः  ।

योगान्धकारमथनः पद्मजन्मादिवन्दितः ॥ १३७॥


भक्तकामोऽग्रजश्चक्री भावनिर्भावभावकः  ।

भेदान्तको महानग्र्यो निगूहो गोचरान्तकः ॥ १३८॥


कालाग्निशमनः शङ्खचक्रपद्मगदाधरः  ।

दीप्तो दीनपतिः शास्ता स्वच्छन्दो मुक्तिदायकः ॥ १३९॥


व्योमधर्माम्बरो भेत्ता भस्मधारी धराधरः  ।

धर्मगुप्तोऽन्वयात्मा च व्यतिरेकार्थनिर्णयः ॥ १४०॥


एकानेकगुणाभासाभासनिर्भासवर्जितः  ।

भावाभावस्वभावात्मा भावाभावविभाववित् ॥ १४१॥


योगिहृदयविश्रामोऽनन्तविद्याविवर्धनः ।

विघ्नान्तकस्त्रिकालज्ञस्तत्त्वात्मा ज्ञानसागरः ॥ १४२॥


इतीदं दत्तसाहस्रं सायं प्रातः पठेत्तु यः  ।

स इहामुत्र लभते निर्वाणं परमं सुखम् ॥ १४३॥


गुरुवारे दत्तभक्तो भक्तिभावसमन्वितः  ।

पठेत्सदैव तो ह्येतत्स लभेच्चिन्तितं ध्रुवम् ॥ १४४॥


इति श्रीमद्दत्तात्रेयपुराणोक्तं

श्रीमद्दत्तात्रेयसहस्रनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

मंगलवार, 29 नवंबर 2022

अथ लघु विष्णुसहस्त्रनाम स्तोत्रम्

 ॥अथ लघु विष्णुसहस्त्रनाम स्तोत्रम्॥



अलं नामसहस्रेण केशवोऽर्जुनमब्रवित्।

श्रुणु मे पार्थ नामानि यैश्चतुष्यामि सर्वदा॥१॥


केशवः पुण्डरीकाक्षः स्वयंभूर्मधुसूदनः।

दामोदरो हृषीकेशः पद्मनाभो जनार्दनः॥२॥

विष्वक्सेनो वासुदेवो हरिर्नारायणस्तथा।

अनंतश्च प्रबोधश्च सत्यः कृष्णः सुरोत्तमः॥३॥

आदिकर्ता वराहश्च वैकुण्ठो विष्णुरच्युतः।

श्रीधरः श्रीपतिः श्रीमान् पक्षिराजध्वजस्तथा॥४॥


एतानि मम नामानि विद्यार्थी ब्राह्मणः पठेत्।

क्षत्रियो विजयस्यार्थे वैश्यो धनसमृद्धये॥५॥

नाग्निराजभयं तस्य न चोरात् पन्नगाद्भयम्।

राक्षसेभ्यो भयं नास्ति व्याधिभिर्नैव पीड्यते॥६॥

इदं नामसहस्त्रं तु केशवेनोद्धृतं स्तवम्।

उद्धृत्य चार्जुने दत्तं युद्धे शत्रुविनाशनम्॥७॥


॥इति श्री विष्णुपुराणे लघु विष्णुसहस्त्रनामस्तवः॥

बुधवार, 16 नवंबर 2022

श्री काल भैरव अष्टमी

         श्री कालभैरवाष्टमी 

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दसों दिशाओं से रक्षा करते हैं श्री भैरव।


श्री भैरव के अनेक रूप हैं जिसमें प्रमुख रूप से बटुक भैरव, महाकाल भैरव तथा स्वर्णाकर्षण भैरव प्रमुख हैं। जिस भैरव की पूजा करें उसी रूप के नाम का उच्चारण होना चाहिए। सभी भैरवों में बटुक भैरव उपासना का अधिक प्रचलन है। तांत्रिक ग्रंथों में अष्ट भैरव के नामों की प्रसिद्धि है। वे इस प्रकार हैं-


1. असितांग भैरव,

2. चंड भैरव,

3. रूरू भैरव,

4. क्रोध भैरव,

5. उन्मत्त भैरव,

6. कपाल भैरव,

7. भीषण भैरव

8. संहार भैरव।


क्षेत्रपाल व दण्डपाणि के नाम से भी इन्हें जाना जाता है।

श्री भैरव से काल भी भयभीत रहता है अत: उनका एक रूप'काल भैरव'के नाम से विख्यात हैं।


दुष्टों का दमन करने के कारण इन्हें"आमर्दक"कहा गया है।


शिवजी ने भैरव को काशी के कोतवाल पद पर प्रतिष्ठित किया है।


जिन व्यक्तियों की जन्म कुंडली में शनि, मंगल, राहु आदि पाप ग्रह अशुभ फलदायक हों, नीचगत अथवा शत्रु क्षेत्रीय हों। शनि की साढ़े-साती या ढैय्या से पीडित हों, तो वे व्यक्ति भैरव जयंती अथवा किसी माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी, रविवार, मंगलवार या बुधवार प्रारम्भ कर बटुक भैरव मूल मंत्र की एक माला (108 बार) का जाप प्रतिदिन रूद्राक्ष की माला से 41 दिन तक करें, अवश्य ही शुभ फलों की प्राप्ति होगी।

भगवान भैरव की महिमा अनेक शास्त्रों में मिलती है। भैरव जहाँ शिव के गण के रूप में जाने जाते हैं, वहीं वे दुर्गा के अनुचारी माने गए हैं। भैरव की सवारी कुत्ता है। चमेली फूल प्रिय होने के कारण उपासना में इसका विशेष महत्व है। साथ ही भैरव रात्रि के देवता माने जाते हैं और इनकी आराधना का खास समय भी मध्य रात्रि में 12 से 3 बजे का माना जाता है।


भैरव के नाम जप मात्र से मनुष्य को कई रोगों से मुक्ति मिलती है। वे संतान को लंबी उम्र प्रदान करते है। अगर आप भूत-प्रेत बाधा, तांत्रिक क्रियाओं से परेशान है, तो आप शनिवार या मंगलवार कभी भी अपने घर में भैरव पाठ का वाचन कराने से समस्त कष्टों और परेशानियों से मुक्त हो सकते हैं।


जन्मकुंडली में अगर आप मंगल ग्रह के दोषों से परेशान हैं तो भैरव की पूजा करके पत्रिका के दोषों का निवारण आसानी से कर सकते है। राहु केतु के उपायों के लिए भी इनका पूजन करना अच्छा माना जाता है। भैरव की पूजा में काली उड़द और उड़द से बने मिष्ठान्न इमरती, दही बड़े, दूध और मेवा का भोग लगानालाभकारी है इससे भैरव प्रसन्न होते है।


भैरव की पूजा-अर्चना करने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि के साथ-साथ स्वास्थ्य की रक्षा भी होती है। तंत्र के ये जाने-माने महान देवता काशी के कोतवाल माने जाते हैं। भैरव तंत्रोक्त, बटुक भैरव कवच, काल भैरव स्तोत्र, बटुक भैरव ब्रह्म कवच आदि का नियमित पाठ करने से अपनी अनेक समस्याओं का निदान कर सकते हैं। भैरव कवच से असामायिक मृत्यु से बचा जा सकता है।


खास तौर पर कालभैरव अष्टमी पर भैरव के दर्शन करने से आपको अशुभ कर्मों से मुक्ति मिल सकती है। भारत भर में कई परिवारों में कुलदेवता के रूप में भैरव की पूजा करने का विधान हैं। वैसे तो आम आदमी, शनि, कालिका माँ और काल भैरव का नाम सुनते ही घबराने लगते हैं, लेकिन सच्चे दिल से की गई इनकी आराधना आपके जीवन के रूप-रंग को बदल सकती है। ये सभी देवता आपको घबराने के लिए नहीं बल्कि आपको सुखी जीवन देने के लिए तत्पर रहते है बशर्ते आप सही रास्ते पर चलते रहे।


भैरव अपने भक्तों की सारी मनोकामनाएँ पूर्ण करके उनके कर्म सिद्धि को अपने आशीर्वाद से नवाजते है। भैरव उपासना जल्दी फल देने के साथ-साथ क्रूर ग्रहों के प्रभाव को समाप्त खत्म कर देती है। शनि या राहु से पीडि़त व्यक्ति अगर शनिवार और रविवार को काल भैरव के मंदिर में जाकर उनका दर्शन करें। तो उसके सारे कार्य सकुशल संपन्न हो जाते है।


एक बार भगवान शिव के क्रोधित होने पर काल भैरव की उत्पत्ति हुई। काल भैरव ने ब्रह्माजी के उस मस्तक को अपने नाखून से काट दिया जिससे उन्होंने असमर्थता जताई। तब ब्रह्म हत्या को लेकर हुई आकाशवाणी के तहत ही भगवान काल भैरव काशी में स्थापित हो गए थे।


मध्यप्रदेश के उज्जैन में भी कालभैरव के ऐतिहासिक मंदिर है, जो बहुत महत्व का है। पुरानी धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान कालभैरव को यह वरदान है कि भगवान शिव की पूजा से पहले उनकी पूजा होगी। इसलिए उज्जैन दर्शन के समय कालभैरव के मंदिर जाना अनिवार्य है। तभी महाकाल की पूजा का लाभ आपको मिल पाता है।

 


 !! भैरव साधना !!

मंत्र संग्रह पूर्व-पीठिका

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मेरु-पृष्ठ पर सुखासीन, वरदा देवाधिदेव शंकर से !!

पूछा देवी पार्वती ने, अखिल विश्व-गुरु परमेश्वर से !

जन-जन के कल्याण हेतु, वह सर्व-सिद्धिदा मन्त्र बताएँ !!


जिससे सभी आपदाओं से साधक की रक्षा हो, वह सुख पाए !

शिव बोले, आपद्-उद्धारक मन्त्र, स्तोत्र  मैं बतलाता,

देवि ! पाठ जप कर जिसका, है मानव सदा शान्ति-सुख पाता !!


                *!! ध्यान !!*


*सात्विकः-*

बाल-स्वरुप वटुक भैरव-स्फटिकोज्जवल-स्वरुप है जिनका,

घुँघराले केशों से सज्जित-गरिमा-युक्त रुप है जिनका,

दिव्य कलात्मक मणि-मय किंकिणि नूपुर से वे जो शोभित हैं !

भव्य-स्वरुप त्रिलोचन-धारी जिनसे पूर्ण-सृष्टि सुरभित है !

कर-कमलों में शूल-दण्ड-धारी का ध्यान-यजन करता हूँ !

रात्रि-दिवस उन ईश वटुक-भैरव का मैं वन्दन करता हूँ !!


*राजसः-*

नवल उदीयमान-सविता-सम, भैरव का शरीर शोभित है,

रक्त-अंग-रागी, त्रैलोचन हैं जो, जिनका मुख हर्षित है !

नील-वर्ण-ग्रीवा में भूषण, रक्त-माल धारण करते हैं !

शूल, कपाल, अभय, वर-मुद्रा ले साधक का भय हरते हैं !

रक्त-वस्त्र बन्धूक-पुष्प-सा जिनका, जिनसे है जग सुरभित,

ध्यान करुँ उन भैरव का, जिनके केशों पर चन्द्र सुशोभित !!


*तामसः-*

तन की कान्ति नील-पर्वत-सी, मुक्ता-माल, चन्द्र धारण कर,

पिंगल-वर्ण-नेत्रवाले वे ईश दिगम्बर, रुप भयंकर !

डमरु, खड्ग, अभय-मुद्रा, नर-मुण्ड, शुल वे धारण करते,

अंकुश, घण्टा, सर्प हस्त में लेकर साधक का भय हरते !

दिव्य-मणि-जटित किंकिणि, नूपुर आदि भूषणों से जो शोभित,

भीषण सन्त-पंक्ति-धारी भैरव हों मुझसे पूजित, अर्चित !!


!! तांत्रोक्त भैरव कवच !!

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ॐ सहस्त्रारे महाचक्रे कर्पूरधवले गुरुः !

पातु मां बटुको देवो भैरवः सर्वकर्मसु !!

पूर्वस्यामसितांगो मां दिशि रक्षतु सर्वदा !

आग्नेयां च रुरुः पातु दक्षिणे चण्ड भैरवः !!

नैॠत्यां क्रोधनः पातु उन्मत्तः पातु पश्चिमे !

वायव्यां मां कपाली च नित्यं पायात् सुरेश्वरः !!

भीषणो भैरवः पातु उत्तरास्यां तु सर्वदा !

संहार भैरवः पायादीशान्यां च महेश्वरः !!

ऊर्ध्वं पातु विधाता च पाताले नन्दको विभुः !

सद्योजातस्तु मां पायात् सर्वतो देवसेवितः !!

रामदेवो वनान्ते च वने घोरस्तथावतु !

जले तत्पुरुषः पातु स्थले ईशान एव च !!

डाकिनी पुत्रकः पातु पुत्रान् में सर्वतः प्रभुः !

हाकिनी पुत्रकः पातु दारास्तु लाकिनी सुतः !!

पातु शाकिनिका पुत्रः सैन्यं वै कालभैरवः !

मालिनी पुत्रकः पातु पशूनश्वान् गंजास्तथा !!

महाकालोऽवतु क्षेत्रं श्रियं मे सर्वतो गिरा !

वाद्यम् वाद्यप्रियः पातु भैरवो नित्यसम्पदा !!


!! भैरव वशीकरण मन्त्र !!

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“ॐनमो रुद्राय, कपिलाय, भैरवाय, त्रिलोक- नाथाय, ॐ ह्रीं फट् स्वाहा ”

“ॐ भ्रां भ्रां भूँ भैरवाय स्वाहा। ॐ भं भं भं अमुक-मोहनाय स्वाहा ”

“ॐ नमो काला गोरा भैरुं वीर, पर-नारी सूँ देही सीर ! गुड़ परिदीयी गोरख जाणी, गुद्दी पकड़ दे भैंरु आणी, गुड़, रक्त का धरि ग्रास, कदे न छोड़े मेरा पाश ! जीवत सवै देवरो, मूआ सेवै मसाण ! पकड़ पलना ल्यावे ! काला भैंरु न लावै, तो अक्षर देवी कालिका की आण ! फुरो मन्त्र, ईश्वरी वाचा !”


ॐ भैरवाय नम: !!*

ॐ हं षं नं गं कं सं खं महाकाल भैरवायनम:!

ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाचतु य कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ !!


ॐ ह्रीं वां बटुकाये क्षौं क्षौं आपदुद्धाराणाये कुरु कुरु बटुकाये ह्रीं बटुकाये स्वाहा !!


!! श्री स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत् !!

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विनियोग -

 ॐ अस्य श्रीस्वर्णाकर्षणभैरव महामंत्रस्य श्री महाभैरव ब्रह्मा ऋषिः , त्रिष्टुप्छन्दः , त्रिमूर्तिरूपी भगवान स्वर्णाकर्षणभैरवो देवता, ह्रीं बीजं , सः शक्तिः, वं कीलकं मम् दारिद्रय नाशार्थे विपुल धनराशिं स्वर्णं च प्राप्त्यर्थे जपे विनियोगः !!


      अब बाए हाथ मे जल लेकर दाहिने हाथ की उंगलियों को जल से स्पर्श करके मंत्र मे दिये हुए शरीर के स्थानो पर स्पर्श करे !!


!! ऋष्यादिन्यास !!

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श्री महाभैरव ब्रह्म ऋषये नमः शिरसि !

त्रिष्टुप छ्न्दसे नमः मुखे !

श्री त्रिमूर्तिरूपी भगवान

स्वर्णाकर्षण भैरव देवतायै नमः ह्रदिः !

ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये !

सः शक्तये नमः पादयोः !

वं कीलकाय नमः नाभौ !

मम् दारिद्रय नाशार्थे विपुल धनराशिं

स्वर्णं च प्राप्त्यर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे !

मंत्र बोलते हुए दोनो हाथ के उंगलियों को आग्या चक्र पर स्पर्श करे ! अंगुष्ठ का मंत्र बोलते समय दोनो अंगुष्ठ से आग्या चक्र पर स्पर्श करना है !!


!! करन्यास !!

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ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः !

ऐं तर्जनीभ्यां नमः !

क्लां ह्रां मध्याभ्यां नमः !

क्लीं ह्रीं अनामिकाभ्यां नमः !

क्लूं ह्रूं कनिष्ठिकाभ्यां नमः !

सं वं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः !

अब मंत्र बोलते हुए दाहिने हाथ से मंत्र मे कहे गये शरीर के भाग पर स्पर्श करना है !!


!! हृदयादि न्यास !!

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आपदुद्धारणाय हृदयाय नमः !

अजामल वधाय शिरसे स्वाहा !

लोकेश्वराय शिखायै वषट् !

स्वर्णाकर्षण भैरवाय कवचाय हुम् !

मम् दारिद्र्य विद्वेषणाय नेत्रत्रयाय वौषट् !

श्रीमहाभैरवाय नमः अस्त्राय फट् !

रं रं रं ज्वलत्प्रकाशाय नमः इति दिग्बन्धः !!


      अब दोनो हाथ जोड़कर ध्यान करे !!

(ध्यान मंत्र का  उच्चारण करें !!

 जिसका हिन्दी में सरलार्थ नीचे दिया गया है ! वैसा ही आप भाव करें )


ॐ पीतवर्णं चतुर्बाहुं त्रिनेत्रं पीतवाससम् !

अक्षयं स्वर्णमाणिक्य तड़ित-पूरितपात्रकम् !!

अभिलसन् महाशूलं चामरं तोमरोद्वहम् !

सततं चिन्तये देवं भैरवं सर्वसिद्धिदम् !!


मंदारद्रुमकल्पमूलमहिते माणिक्य सिंहासने, संविष्टोदरभिन्न चम्पकरुचा देव्या समालिंगितः !

भक्तेभ्यः कररत्नपात्रभरितं स्वर्णददानो भृशं, स्वर्णाकर्षण भैरवो विजयते स्वर्णाकृति : सर्वदा !!


हिन्दी भावार्थ :- श्रीस्वर्णाकर्षण भैरव जी मंदार (सफेद आक) के नीचे माणिक्य के सिंहासन पर बैठे हैं ! उनके वाम भाग में देवि उनसे समालिंगित हैं ! उनकी देह आभा पीली है तथा उन्होंने पीले ही वस्त्र धारण किये हैं ! उनके तीन नेत्र हैं ! चार बाहु हैं जिन्में उन्होंने स्वर्ण - माणिक्य से भरे हुए पात्र, महाशूल, चामर तथा तोमर को धारण कर रखा है ! वे अपने भक्तों को स्वर्ण देने के लिए तत्पर हैं। ऐसे सर्वसिद्धिप्रदाता श्री स्वर्णाकर्षण भैरव का मैं अपने हृदय में ध्यान व आह्वान करता हूं उनकी शरण ग्रहण करता हूं ! आप मेरे दारिद्रय का नाश कर मुझे अक्षय अचल धन समृद्धि और स्वर्ण राशि प्रदान करे और मुझ पर अपनी कृपा वृष्टि करें।

मानसोपचार पुजन के मंत्रो को मन मे बोलना है !


!! मानसोपचार पूजन !!

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लं पृथिव्यात्मने गंधतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं गंधं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !

हं आकाशात्मने शब्दतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं पुष्पं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !

यं वायव्यात्मने स्पर्शतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं धूपं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !

रं वह्न्यात्मने रूपतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं दीपं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !

वं अमृतात्मने रसतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं अमृतमहानैवेद्यं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !

सं सर्वात्मने ताम्बूलादि सर्वोपचारान् पूजां श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !!


!! मंत्र !!

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ॐ ऐं क्लां क्लीं क्लूं ह्रां ह्रीं ह्रूं स: वं आपदुद्धारणाय अजामलवधाय लोकेश्वराय स्वर्णाकर्षण भैरवाय मम् दारिद्रय विद्वेषणाय ॐ ह्रीं महाभैरवाय नम: !!


मंत्र जाप के बाद स्तोत्र का एक पाठ अवश्य करे !!


!! श्री स्वर्णाकर्षण भैरव स्त्रोत् !!

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!! श्री मार्कण्डेय उवाच !!


भगवन् ! प्रमथाधीश ! शिव-तुल्य-पराक्रम !

पूर्वमुक्तस्त्वया मन्त्रं, भैरवस्य महात्मनः !!

इदानीं श्रोतुमिच्छामि, तस्य स्तोत्रमनुत्तमं !

तत् केनोक्तं पुरा स्तोत्रं, पठनात्तस्य किं फलम् !!

तत् सर्वं श्रोतुमिच्छामि, ब्रूहि मे नन्दिकेश्वर !!


!! श्री नन्दिकेश्वर उवाच !!


इदं ब्रह्मन् ! महा-भाग, लोकानामुपकारक !

स्तोत्रं वटुक-नाथस्य, दुर्लभं भुवन-त्रये !!

सर्व-पाप-प्रशमनं, सर्व-सम्पत्ति-दायकम् !

दारिद्र्य-शमनं पुंसामापदा-भय-हारकम् !!

अष्टैश्वर्य-प्रदं नृणां, पराजय-विनाशनम् !

महा-कान्ति-प्रदं चैव, सोम-सौन्दर्य-दायकम् !!

महा-कीर्ति-प्रदं स्तोत्रं, भैरवस्य महात्मनः !

न वक्तव्यं निराचारे, हि पुत्राय च सर्वथा !!

शुचये गुरु-भक्ताय, शुचयेऽपि तपस्विने !

महा-भैरव-भक्ताय, सेविते निर्धनाय च !!

निज-भक्ताय वक्तव्यमन्यथा शापमाप्नुयात् !

स्तोत्रमेतत् भैरवस्य, ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मनः !!

श्रृणुष्व ब्रूहितो ब्रह्मन् ! सर्व-काम-प्रदायकम् !!


!! विनियोग !!


ॐ अस्य श्रीस्वर्णाकर्षण-भैरव-स्तोत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीस्वर्णाकर्षण-भैरव-देवता, ह्रीं बीजं, क्लीं शक्ति, सः कीलकम्, मम-सर्व-काम-सिद्धयर्थे पाठे विनियोगः !!


!! ध्यान !!


मन्दार-द्रुम-मूल-भाजि विजिते रत्नासने संस्थिते !

दिव्यं चारुण-चञ्चुकाधर-रुचा देव्या कृतालिंगनः !!

भक्तेभ्यः कर-रत्न-पात्र-भरितं स्वर्ण दधानो भृशम् !

स्वर्णाकर्षण-भैरवो भवतु मे स्वर्गापवर्ग-प्रदः !!


!! स्त्रोत् -पाठ !!

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ॐ नमस्तेऽस्तु भैरवाय, ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मने !

नमः त्रैलोक्य-वन्द्याय, 

वरदाय परात्मने !!

रत्न-सिंहासनस्थाय, दिव्याभरण-शोभिने !

नमस्तेऽनेक-हस्ताय, 

ह्यनेक-शिरसे नमः !

नमस्तेऽनेक-नेत्राय, 

ह्यनेक-विभवे नमः !!

नमस्तेऽनेक-कण्ठाय, 

ह्यनेकान्ताय ते नमः !

नमोस्त्वनेकैश्वर्याय, 

ह्यनेक-दिव्य-तेजसे !!

अनेकायुध-युक्ताय, 

ह्यनेक-सुर-सेविने !

अनेक-गुण-युक्ताय, 

महा-देवाय ते नमः !!

नमो दारिद्रय-कालाय, महा-सम्पत्-प्रदायिने !

श्रीभैरवी-प्रयुक्ताय, 

त्रिलोकेशाय ते नमः !!

दिगम्बर ! नमस्तुभ्यं, 

दिगीशाय नमो नमः !

नमोऽस्तु दैत्य-कालाय, 

पाप-कालाय ते नमः !!

सर्वज्ञाय नमस्तुभ्यं, 

नमस्ते दिव्य-चक्षुषे !

अजिताय नमस्तुभ्यं, 

जितामित्राय ते नमः !

नमस्ते रुद्र-पुत्राय, 

गण-नाथाय ते नमः !

नमस्ते वीर-वीराय, 

महा-वीराय ते नमः !!

नमोऽस्त्वनन्त-वीर्याय, 

महा-घोराय ते नमः !

नमस्ते घोर-घोराय, 

विश्व-घोराय ते नमः !!

नमः उग्राय शान्ताय, 

भक्तेभ्यः शान्ति-दायिने !

गुरवे सर्व-लोकानां, 

नमः प्रणव-रुपिणे !!

नमस्ते वाग्-भवाख्याय, 

दीर्घ-कामाय ते नमः !

नमस्ते काम-राजाय, 

योषित्कामाय ते नमः !!

दीर्घ-माया-स्वरुपाय, 

महा-माया-पते नमः !

सृष्टि-माया-स्वरुपाय, 

विसर्गाय सम्यायिने !!

रुद्र- लोकेश- पूज्याय, 

ह्यापदुद्धारणाय च !

नमोऽजामल- बद्धाय, 

सुवर्णाकर्षणाय ते !!

नमो नमो भैरवाय, 

महा-दारिद्रय-नाशिने !

उन्मूलन-कर्मठाय, 

ह्यलक्ष्म्या सर्वदा नमः !!

नमो लोक-त्रेशाय, 

स्वानन्द-निहिताय ते !

नमः श्रीबीज-रुपाय, सर्व-काम-प्रदायिने !!

नमो महा-भैरवाय, 

श्रीरुपाय नमो नमः !

धनाध्यक्ष ! नमस्तुभ्यं, 

शरण्याय नमो नमः !!

नमः प्रसन्न-रुपाय, 

ह्यादि-देवाय ते नमः !

नमस्ते मन्त्र-रुपाय, 

नमस्ते रत्न-रुपिणे !!

नमस्ते स्वर्ण-रुपाय, 

सुवर्णाय नमो नमः !

नमः सुवर्ण-वर्णाय, 

महा-पुण्याय ते नमः !!

नमः शुद्धाय बुद्धाय, 

नमः संसार-तारिणे !

नमो देवाय गुह्याय, 

प्रबलाय नमो नमः !!

नमस्ते बल-रुपाय, 

परेषां बल-नाशिने !

नमस्ते स्वर्ग-संस्थाय, 

नमो भूर्लोक-वासिने !!

नमः पाताल-वासाय, 

निराधाराय ते नमः !

नमो नमः स्वतन्त्राय, 

ह्यनन्ताय नमो नमः !!

द्वि-भुजाय नमस्तुभ्यं, भुज-त्रय-सुशोभिने !

नमोऽणिमादि-सिद्धाय, 

स्वर्ण-हस्ताय ते नमः !!

पूर्ण-चन्द्र-प्रतीकाश-

वदनाम्भोज-शोभिने !

नमस्ते स्वर्ण-रुपाय, स्वर्णालंकार-शोभिने !!

नमः स्वर्णाकर्षणाय, 

स्वर्णाभाय च ते नमः !

नमस्ते स्वर्ण-कण्ठाय, स्वर्णालंकार-धारिणे !!

स्वर्ण-सिंहासनस्थाय, 

स्वर्ण-पादाय ते नमः !

नमः स्वर्णाभ-पाराय, स्वर्ण-काञ्ची-सुशोभिने !!

नमस्ते स्वर्ण-जंघाय, भक्त-काम-दुघात्मने !

नमस्ते स्वर्ण-भक्तानां, कल्प-वृक्ष-स्वरुपिणे !!

चिन्तामणि-स्वरुपाय, नमो ब्रह्मादि-सेविने !

कल्पद्रुमाधः-संस्थाय, बहु-स्वर्ण-प्रदायिने !!

भय-कालाय भक्तेभ्यः, सर्वाभीष्ट-प्रदायिने !

नमो हेमादि-कर्षाय, 

भैरवाय नमो नमः !!

स्तवेनानेन सन्तुष्टो, 

भव लोकेश-भैरव !

पश्य मां करुणाविष्ट, 

शरणागत-वत्सल !

श्रीभैरव धनाध्यक्ष, 

शरणं त्वां भजाम्यहम् !

प्रसीद सकलान् कामान्, 

प्रयच्छ मम सर्वदा !!


!! फल-श्रुति !!

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श्रीमहा-भैरवस्येदं, स्तोत्र सूक्तं सु-दुर्लभम् !

मन्त्रात्मकं महा-पुण्यं, सर्वैश्वर्य-प्रदायकम् !!

यः पठेन्नित्यमेकाग्रं, पातकैः स विमुच्यते !

लभते चामला-लक्ष्मीमष्टैश्वर्यमवाप्नुयात् !!

चिन्तामणिमवाप्नोति, धेनुं कल्पतरुं ध्रुवम् !

स्वर्ण-राशिमवाप्नोति, सिद्धिमेव स मानवः !!

संध्याय यः पठेत्स्तोत्र, दशावृत्त्या नरोत्तमैः !

स्वप्ने श्रीभैरवस्तस्य, साक्षाद् भूतो जगद्-गुरुः !

स्वर्ण-राशि ददात्येव, तत्क्षणान्नास्ति संशयः !

सर्वदा यः पठेत् स्तोत्रं, भैरवस्य महात्मनः !!

लोक-त्रयं वशी कुर्यात्, अचलां श्रियं चाप्नुयात् !

न भयं लभते क्वापि, विघ्न-भूतादि-सम्भव !!

म्रियन्ते शत्रवोऽवश्यम लक्ष्मी-नाशमाप्नुयात् !

अक्षयं लभते सौख्यं, सर्वदा मानवोत्तमः !!

अष्ट-पञ्चाशताणढ्यो, मन्त्र-राजः प्रकीर्तितः !

दारिद्र्य-दुःख-शमनं, स्वर्णाकर्षण- कारकः !!

य येन संजपेत् धीमान्, स्तोत्र वा प्रपठेत् सदा !

महा-भैरव-सायुज्यं, स्वान्त-काले भवेद् ध्रुवं !!


!! श्री भैरव चालीसा !!

!! दोहा !!

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श्री गणपति, गुरु गौरि पद, प्रेम सहित धरि माथ !

चालीसा वन्दन करों, श्री शिव भैरवनाथ !!

श्री भैरव संकट हरण, मंगल करण कृपाल !

श्याम वरण विकराल वपु, लोचन लाल विशाल !!


जय जय श्री काली के लाला !

जयति जयति काशी- कुतवाला !!


जयति बटुक भैरव जय हारी !

जयति काल भैरव बलकारी !!


जयति सर्व भैरव विख्याता !

जयति नाथ भैरव सुखदाता !!


भैरव रुप कियो शिव धारण !

भव के भार उतारण कारण !!


भैरव रव सुन है भय दूरी !

सब विधि होय कामना पूरी !!


शेष महेश आदि गुण गायो ! काशी-कोतवाल कहलायो !!


जटाजूट सिर चन्द्र विराजत !

बाला, मुकुट, बिजायठ साजत !!


कटि करधनी घुंघरु बाजत !

दर्शन करत सकल भय भाजत !!


जीवन दान दास को दीन्हो !

कीन्हो कृपा नाथ तब चीन्हो !!


वसि रसना बनि सारद-काली !

दीन्यो वर राख्यो मम लाली !!


धन्य धन्य भैरव भय भंजन !

जय मनरंजन खल दल भंजन !!


कर त्रिशूल डमरु शुचि कोड़ा !

कृपा कटाक्ष सुयश नहिं थोड़ा !!


जो भैरव निर्भय गुण गावत !

अष्टसिद्घि नवनिधि फल पावत !!


रुप विशाल कठिन दुख मोचन !

क्रोध कराल लाल दुहुं लोचन !!


अगणित भूत प्रेत संग डोलत ! 

बं बं बं शिव बं बं बोतल !!


रुद्रकाय काली के लाला !

महा कालहू के हो काला !!


बटुक नाथ हो काल गंभीरा !

श्वेत, रक्त अरु श्याम शरीरा !!


करत तीनहू रुप प्रकाशा !

भरत सुभक्तन कहं शुभ आशा !!


रत्न जड़ित कंचन सिंहासन !

व्याघ्र चर्म शुचि नर्म सुआनन !!


तुमहि जाई काशिहिं जन ध्यावहिं !

विश्वनाथ कहं दर्शन पावहिं !!


जय प्रभु संहारक सुनन्द जय !

जय उन्नत हर उमानन्द जय !!


भीम त्रिलोकन स्वान साथ जय !

बैजनाथ श्री जगतनाथ जय !!


महाभीम भीषण शरीर जय !

रुद्र त्र्यम्बक धीर वीर जय !!


अश्वनाथ जय प्रेतनाथ जय !

श्वानारुढ़ सयचन्द्र नाथ जय !!


निमिष दिगम्बर चक्रनाथ जय !

गहत अनाथन नाथ हाथ जय !!


त्रेशलेश भूतेश चन्द्र जय !

क्रोध वत्स अमरेश नन्द जय !!

श्री वामन नकुलेश चण्ड जय !

कृत्याऊ कीरति प्रचण्ड जय !!


रुद्र बटुक क्रोधेश काल धर !

चक्र तुण्ड दश पाणिव्याल धर !!


करि मद पान शम्भु गुणगावत !

चौंसठ योगिन संग नचावत !!


करत कृपा जन पर बहु ढंगा !

काशी कोतवाल अड़बंगा !!


देयं काल भैरव जब सोटा !

नसै पाप मोटा से मोटा !!


जाकर निर्मल होय शरीरा !

मिटै सकल संकट भव पीरा !!


श्री भैरव भूतों के राजा !

बाधा हरत करत शुभ काजा !!


ऐलादी के दुःख निवारयो !

सदा कृपा करि काज सम्हारयो !!


सुन्दरदास सहित अनुरागा !

श्री दुर्वासा निकट प्रयागा !!


श्री भैरव जी की जय लेख्यो !

सकल कामना पूरण देख्यो !!


!! दोहा !!


जय जय जय भैरव बटुक, स्वामी संकट टार !

कृपा दास पर कीजिये, शंकर के अवतार !!

जो यह चालीसा पढ़े, प्रेम सहित सत बार !

उस घर सर्वानन्द हों, वैभव बड़े अपार !!


!! आरती श्री भैरव जी की !!

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जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा !

जय काली और गौरा देवी कृत सेवा !! जय !!

तुम्हीं पाप उद्घारक दुःख सिन्धु तारक !

भक्तों के सुख कारक भीषण वपु धारक !! जय !!

वाहन श्वान विराजत कर त्रिशूल धारी !

महिमा अमित तुम्हारी जय जय भयहारी !! जय !!

तुम बिन देवा सेवा सफल नहीं होवे !

चौमुख दीपक दर्शन दुःख खोवे !! जय !!

तेल चटकि दधि मिश्रित भाषा वलि तेरी !

कृपा करिये भैरव करिए नहीं देरी !! जय !!

पांव घुंघरु बाजत अरु डमरु जमकावत !

बटुकनाथ बन बालकजन मन हरषावत !! जय !!

बटकुनाथ की आरती जो कोई नर गावे !

कहे धरणीधर नर मनवांछित फल पावे !! जय !!


!! साधना यंत्र !!

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      श्री बटुक भैरव का यंत्र लाकर उसे साधना के स्थान पर भैरव जी के चित्र के समीप रखें ! दोनों को लाल वस्त्र बिछाकर उसके ऊपर यथास्थिति में रखें ! चित्र या यंत्र के सामने माला, फूल, थोड़े काले उड़द चढ़ाकर उनकी विधिवत पूजा करके लड्डू का भोग लगाएं !!


!! साधना का समय !!

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       इस साधना को किसी भी मंगलवार या मंगल विशेष भैरवाष्टमी के दिन आरम्भ करना चाहिए शाम 7 से 10 बजे के बीच नित्य 41 दिन करने से अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होती है !!


!! साधना की चेतावनी !!

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 साधना के दौरान खान-पान शुद्ध रखें !!

 सहवास से दूर रहें ! वाणी की शुद्धता रखें और किसी भी कीमत पर क्रोध न करें !!

 यह साधना किसी गुरु से अच्छे से जानकर ही करें !!


!! साधना नियम व सावधानी !!

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1 :-  यदि आप भैरव साधना किसी मनोकामना के लिए कर रहे हैं तो अपनी मनोकामना का संकल्प बोलें और फिर साधना शुरू करें !!


2 :- यह साधना दक्षिण दिशा में मुख करके की जाती है !!


3 :-  रुद्राक्ष या हकीक की माला से मंत्र जप किया जाता है !!


4 :-  भैरव की साधना रात्रिकाल में ही करें !!


5 :-  भैरव पूजा में केवल तेल के दीपक का ही उपयोग करना चाहिए !!


6 :-  साधक लाल या काले वस्त्र धारण करें !!


7 :-  हर मंगलवार को लड्डू के भोग को पूजन- साधना के बाद कुत्तों को खिला दें और नया भोग रख दें !!


पितृपक्ष में परान्न से बचें

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