रविवार, 19 नवंबर 2017

रम्भा-शुक संवाद

रम्भा:
ताम्बूलरागैः कुसुम प्रकर्षैः
सुगन्धितैलेन च वासितायाः ।
न मर्दितौ येन कुचौ निशायां
वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥
हे मुनि ! सुगंधी पान, उत्तम फूल, सुगंधी तेल, और अन्य पदार्थों से सुवासित कायावाली कामिनी के कुच का मर्दन, रात को जिसने नहीं किया उसका जीवन व्यर्थ गया ।
शुकः
ब्रह्मादि देवोऽखिल विश्वदेवो
मोक्षप्रदोऽतीतगुणः प्रशान्तः ।
धृतो न योगेन हृदि स्वकीये
वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥
ब्रह्मादि देवों के भी देव, संपूर्ण संसार के स्वामी, मोक्षदाता, निर्गुण, अत्यंत शांत ऐसे भगबान का ध्यान जिसने योग द्वारा हृदय में नहीं किया उसका जीवन व्यर्थ गया ।
रम्भाः
कस्तूरिकाकुंकुम चन्दनैश्च
सुचर्चिता याऽगुरु धूपिकाम्बरा ।
उरः स्थले नो लुठिता निशायां
वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥
कस्तूरी और केसर से युक्त चंदन का लेप जिसने किया है, अगरु के गंध से सुवासित वस्त्र धारण की हुई तरुणी, रात को जिस पुरुष की छाती पर लेटी नहीं, उसका जन्म व्यर्थ गया ।
शुकः
आनन्दरुपो निजबोधरुपः
दिव्यस्वरूपो बहुनामरपः ।
तपः समाधौ मिलितो न येन
वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥
हे रंभा ! आनंद से परिपूर्ण रुपवाले, दिव्य शरीर को धारण करनेवाले, जिनके अनेक नाम और रुप हैं ऐसे भगवान के दर्शन जिसने समाधि में नहीं किये, उसका जीवन व्यर्थ गया ।
रम्भा:
कठोर पीनस्तन भारनम्रा
सुमध्यमा चञ्जलखञ्जनाक्षी ।
हेमन्तकाले रमिता न येन
वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥
जिस पुरुष ने हेमंत ऋतु में, कठोर और भरे हुए स्तन के भार से झुकी हुई, पतली कमरवाली, चंचल और खंजर से नैनोंवाली स्त्री का संभोग नहीं किया, उसका जीवन व्यर्थ गया ।
शुकः
तपोमयो ज्ञानमयो विजन्मा
विद्यामयो योगमयः परात्मा ।
चित्ते धृतो नो तपसि स्थितेन
वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥
हे रंभा ! तपोमय, ज्ञानमय, जन्मरहित, विद्यामय, योगमय परमात्मा को, तपस्या में लीन होकर जिसने चित्त में धारण नहीं किया, उसका जीवन व्यर्थ गया ।
रम्भाः 
सुलक्षणा मानवती गुणाढ्या
प्रसन्नवक्त्रा मृदुभाषिणी या ।
नो चुम्बिता येन सुनाभिदेशे
वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥
हे मुनिवर ! सद्लक्षण और गुणों से युक्त, प्रसन्न मुखवाली, मधुर बोलनेवाली, मानिनी सुंदरी के नाभि का जिसने चुंबन नहीं किया उसका जीवन व्यर्थ गया ।
शुकः
पल्यार्जितं सर्वसुखं विनश्वरं
दुःखप्रदं कामिनिभोग सेवितम् ।
एवं विदित्वा न धृतो हि योगो
वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥
हे रंभा ! जिस इन्सान ने, नारी के सेवन से उत्पन्न सब सुख नाशवंत, और दुःखदायक है ऐसा जानने के बावजुद जिसने योगाभ्यास नहीं किया, उसका जीवन व्यर्थ गया ।
रम्भा:
विशालवेणी नयनाभिरामा
कन्दर्प सम्पूर्ण निधानरुपा ।
भुक्ता न येनैव वसन्तकाले
वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥
जिस पुरुष ने वसंत ऋतु में लंबे बालवाली, सुंदर नेत्रों से सुशोभित कामदेव के समस्त भंडाररुप ऐसी कामिनी के साथ विहार न किया हो, उसका जीवन व्यर्थ गया ।
शुकः
मायाकरण्डी नरकस्य हण्डी
तपोविखण्डी सुकृतस्य भण्डी ।
नृणां विखण्डी चिरसेविता चेत्
वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥
हे रंभा ! नारी माया की पटारी, नर्क की हंडी, तपस्या का विनाश करनेवाली, पुण्य का नाश करनेवाली, पुरुष की घातक है; इस लिए जिस पुरुष ने अधिक समय तक उसका सेवन किया है, उसका जीवन व्यर्थ गया ।
रम्भाः
समस्तशृङ्गार विनोदशीला
लीलावती कोकिल कण्ठमाला ।
विलासिता नो नवयौवनेन
वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥
हे मुनि ! जिस पुरुष ने अपनी युवानी में, समस्त शृंगार और मनोविवाद करने में चतुर और अनेक लीलाओं में कुशल और कोकिलकंठी कामिनी के साथ विलास नहीं किया, उसका जीवन व्यर्थ है ।
शुक:
समाधि ह्रंत्री जनमोहयित्री
धर्मे कुमन्त्री कपटस्य तन्त्री ।
सत्कर्म हन्त्री कलिता च येन
वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥
समाधि का नाश करनेवाली, लोगों को मोहित करनेवाली, धर्म विनाशिनी, कपट की वीणा, सत्कर्मो का नाश करनेवाली नारी का जिसने सेवन किया, उसका जीवन व्यर्थ गया ।
रम्भा: 
बिल्वस्तनी कोमलिता सुशीला
सुगन्धयुक्ता ललिता च गौरी ।
नाऽऽश्लेषिता येन च कण्ठदेशे
वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥
हे मुनिराज ! बिल्वफल जैसे कठिन स्तन है, अत्यंत कोमल जिसका शरीर है, जिसका स्वभाव प्रिय है, ऐसी सुवासित केशवाली, ललचानेवाली गौर युवती को जिसने आलिंगन नहीं दिया, उसका जीवन व्यर्थ गया ।
शुक:
चिन्ताव्यथादुःखमया सदोषा
संसारपाशा जनमोहकर्त्री ।
सन्तापकोशा भजिता च येन
वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥
चिंता, पीडा, और अनेक प्रकार के दुःख से परिपूर्ण, दोष से भरी हुई, संसार में बंधनरुप, और संताप का खजाना, ऐसी नारी का जिसने सेवन किया उसका जन्म व्यर्थ गया ।
रम्भा:
आनन्द कन्दर्पनिधान रुपा
झणत्क्वणत्कं कण नूपुराढ्या ।
नाऽस्वादिता येन सुधाधरस्था
वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥

हे मुनिवर ! आनंद और कामदेव के खजाने समान, खनकते कंगन और नूपुर पहेनी हुई कामिनी के होठ पर जिसने चुंबन किया नहीं, उस पुरुष का जीवन व्यर्थ है ।
शुक:
कापट्यवेषा जनवञ्चिका सा
विण्मूत्र दुर्गन्धदरी दुराशा ।
संसेविता येन सदा मलाढ्या
वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥
छल-कपट करनेवाली, लोगों को बनानेवाली, विष्टा-मूत्र और दुर्गंध की गुफारुप, दुराशाओं से परिपूर्ण, अनेक प्रकार से मल से भरी हुई, ऐसी स्त्री का सेवन जिसने किया, उसका जीवन व्यर्थ है ।
रम्भाः 
चन्द्रानना सुन्दरगौरवर्णा
व्यक्तस्तनीभोगविलास दक्षा ।
नाऽऽन्दोलिता वै शयनेषु येन
वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥
हे मुनिवर ! चंद्र जैसे मुखवाली, सुंदर और गौर वर्णवाली, जिसकी छाती पर स्तन व्यक्त हुए हैं ऐसी, संभोग और विलास में चतुर, ऐसी स्त्री को बिस्तर में जिसने आलिंगन नहीं दिया, उसका जीवन व्यर्थ है ।
शुक:   
उन्मत्तवेषा मदिरासु मत्ता
पापप्रदा लोकविडम्बनीया ।
योगच्छला येन विभाजिता च
वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥
हे रंभा ! पागल जैसा विचित्र वेष धारण की हुई, मदिरा पीकर मस्त बनी हुई, पाप देनेवाली, लोगों को बनानेवाली, और योगीयों के साथ कपट करनेवाली स्त्री का सेवन जिसने किया है, उसका जीवन व्यर्थ है ।
रम्भा: 
आनन्दरुपा तरुणी नगाङ्गी
सद्धर्मसंसाधन सृष्टिरुपा ।
कामार्थदा यस्य गृहे न नारी
वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥
हे मुनि ! आनंदरुप, नतांगी युवती, उत्तम धर्म के पालन में और पुत्रादि पैदा करने में सहायक, इंद्रियों को संतोष देनेवाली नारी जिस पुरुष के घर में न हो, उसका जीवन व्यर्थ है ।
शुक:   
अशौचदेहा पतित स्वभावा
वपुःप्रगल्भा बललोभशीला ।
मृषा वदन्ती कलिता च येन
वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥
अशुद्ध शरीरवाली, पतित स्वभाववाली, प्रगल्भ देहवाली, साहस और लोभ करानेवाली, झूठ बोलनेवाली, ऐसी नारी का विश्वास जिसने किया, उसका जीवन व्यर्थ है ।
रम्भा:
क्षामोदरी हंसगतिः प्रमत्ता
सौंदर्यसौभाग्यवती प्रलोला ।
न पीडिता येन रतौ यथेच्छं
वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥
हे मुनिवर ! पतली कमरवाली, हंस की तरह चलनेवाली, प्रमत्त सुंदर, सौभाग्यवती , चंचल स्वभाववाली स्त्री को रतिक्रीडा के वक्त अनुकुलतया पीडित की नहीं है, उसका जीवन व्यर्थ है ।
शुक:
संसारसद्भावन भक्तिहीना
चित्तस्य चौरा हृदि निर्दया च ।
विहाय योगं कलिता च येन
वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥
हे रंभा ! संसार की उत्तम भावनाओं को प्रकट करनेवाले प्रेम से रहित पुरुषों के चित्त को चोरनेवाली, ह्रदय में दया न रखनेवाली, ऐसी स्त्री का आलिंगन, योगाभ्यास छोडकर जिस पुरुष ने किया, उसका जीवन व्यर्थ है ।
रम्भा:
सुगन्धैः सुपुष्पैः सुशय्या सुकान्ता
वसन्तो ऋतुः पूर्णिमा पूर्णचन्द्रः ।
यदा नास्ति पुंस्त्वं नरस्य प्रभूतं
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥
हे मुनिवर ! सुंदर, सुगंधित पुष्पों से सुशोभित शय्या हो, मनोनुकूल सुंदर स्त्री हो, वसंत ऋतु हो, पूर्णिमा के चंद्र की चांदनी खीली हो, पर यदि पुरुष में परिपूर्ण पुरुषत्त्व न हो तो उसका जीवन व्यर्थ है ।
सुरुपं शरीरं नवीनं कलत्रं मुद्रण ई-मेल
शुक:
सुरुपं शरीरं नवीनं कलत्रं
धनं मेरुतुल्यं वचश्चारुचित्रम् ।
हरस्याङ्घि युग्मे मनश्चेदलग्नं
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥
हे रंभा ! सुंदर शरीर हो, युवा पत्नी हो, मेरु पर्वत समान धन हो, मन को लुभानेवाली मधुर वाणी हो, पर यदि भगवान शिवजी के चरणकमल में मन न लगे, तो जीवन व्यर्थ है ।

गौमाता की महिमा

गरुड़ पुराण के अनुसार
गोमूत्रं गोमयं दुन्धं गोधूलिं गोष्ठगोष्पदम्।
पक्कसस्यान्वितं क्षेत्रं द्ष्टा पुण्यं लभेद् ध्रुवम्।।
अर्थात- गोमूत्र, गोबर, गोदुग्ध, गोधूली, गोशाला, गोखुर और पके हुए हरे-भरे खेत नजर भर देख लेने से पुण्य प्राप्त होता है।
1. गौमूत्र
गौमूत्र में गंगा मईया वास करती हैं। गंगा को सभी पापों का हरण करने वाली माना गया है। वास्तु दोष आपको काफी कष्ट दे सकता है लेकिन वास्तु दोष निवारण के महंगे उपायों को अपनाने से बेहतर है आप घर में गौमूत्र का छिड़काव करें। जिससे आपके बहुत सारे वास्तु दोषों का समाधान एक साथ हो जाएगा। गाय को मूत्र करते देखने से ही पुण्य-लाभ होता है।
2. गोबर
ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार गौ के पैरों में समस्त तीर्थ व गोबर में साक्षात माता लक्ष्मी का वास माना गया है। मन में श्रद्धा रखकर गाय के गोबर को देखने से पुण्य की प्राप्ति हो जाती है।
3. गौदुग्ध
गाय को माता माना गया है इसलिए गौमाता का दूध पवित्र और पूजनीय है। आयुर्वेद में देशी गाय के ही दूध, दही और घी व अन्य तत्त्वों का प्रयोग होता है। जो व्यक्ति गाय को दूध देते हुए देख ले उसे शुभ फल प्राप्त होते हैं।
4. गौधूली
जब गाय अपने पैरों से जमीन खुरचती है तो जो धूल उड़ती है उसे गोधूली कहा जाता है। वो धूल पावन होती है उसे देखने मात्र से ही व्यक्ति पुण्य का भागी बन जाता है।
5. गौशाला
जहां बहुत सारी गाय संयुक्त रूप से रहती हैं उस स्थान को गौशाला कहा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण के धाम जाने का सरलतम माध्यम है प्रतिदिन गौ सेवा करना। रोजाना गौशाला को मंदिर समान भाव से नमन करने से अक्षय पुण्य मिलता है।
6. गोखुर
जब गौ अपने पैर के नीचे से जमीन खुरचती है उस प्रक्रिया को गोखुर कहा जाता है। गौ माता के पैरों में लगी मिट्टी का जो व्यक्ति नित्य तिलक लगाता है, उसे किसी भी तीर्थ में जाने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि उसे सारा फल उसी समय वहीं प्राप्त हो जाता है।

पद्मपुराण के अनुसार स्वस्थ, भाग्यवान् और कर्मठ सन्तान चाहनेवाली गर्भवती महिला के कर्तव्य

पद्मपुराण के अनुसार स्वस्थ, भाग्यवान् और कर्मठ सन्तान चाहनेवाली गर्भवती महिला के कर्तव्य-


परमवीर और अति जिज्ञासु भीष्मजी और ऋषिश्रेष्ठ पुलस्त्यजी के बीच हुए वार्तालाप के संदर्भ में यह लोकोपयोगी प्रसंग आया है। एकबार मुनिवर कश्यपजी की पत्नी दिति ने उनसे अत्यंत समृद्धशाली, परम तेजस्वी और लोकविजयी पुत्र पाने के लिए गर्भ स्थापित करने का आग्रह किया। मुनि ने सहर्ष उसकी याचना स्वीकारकर उसके गर्भ में अपना वीर्य स्थापित कर दिया। फिर कश्यपजी ने दिति को समझाते हुए कहा कि यदि गर्भवती रहते हुए वह कुछ नियमों का दृढ़ता पूर्वक पालन करेगी तो उसको अपना मनोवाञ्छित पुत्र अवश्य ही प्राप्त होगा, अन्यथा होनेवाली सन्तान न तो अधिक आयु की होगी और न सुन्दर गुणों से सम्पन्न। उन्होंने गर्भवती स्त्रियों के हितार्थ ये नियम इस प्रकार बताये-

1. उसे संध्या के समय भोजन नहीं करना चाहिए,
2. उसे किसी बृक्ष की जड़ के पास जाना नहीं चाहिए और कदाचित चले गए तो वहाँ ठहरना नहीं चाहिए,
3. उसे गहरे जल में प्रवेश नहीं करना चाहिए,
4. उसे सुने घर में न तो घुसना चाहिए और न रुकना ही चाहिए,
5. सूने घर में बैठकर नख या राख से भूमि पर रेखा नहीं खींचनी,
6. भूसी, कोयले, राख, हड्डी और खपड़े पर खड़ा नहीं होना चाहिए,
7. बाँबी (चूहे, चींटी आदि द्वारा बनाया गया बिल) पर खड़ा नहीं होना चाहिए,
8. अधिक परिश्रम नहीं करना चाहिए,
9. हरदम अलसाकर पड़ा नहीं रहना चाहिए,
10. कभी भी अपवित्र न रहे,
11. अंगड़ाई नहीं लेनी चाहिए,
12. अपने बालों को खोलकर खड़ी न हो,
13. कभी भी मन में उद्वेग (उत्तेजना) नहीं लाना चाहिए,
14. किसी से भी कलह, झगड़ा आदि नहीं करना चाहिए,
15. कभी भी अमङ्गल पूर्ण वचन नहीं बोलना चाहिए,
16. किसी से अधिक हँसी-मजाक नहीं करे,
17. उत्तर की ओर अथवा नीचे की ओर मुँह करके न सोये,
18. वह नंगी होकर, उद्वेग में पड़कर और बिना पैर धोये सोये भी नहीं,
19. सदा मांगलिक और अच्छे कार्यों में लगी रहे,
20. श्रेष्ठ और गुरुजनों के साथ सतत आदर का व्यवहार करे,
21. सबको सत्कार दे,
22. अपनी रक्षा का समुचित प्रबन्ध रखे,
23. पवित्र जल (हो सके तो औषधि युक्त जल) से स्नान करे,
24. अपने पति के प्रिय और हित में तत्पर रह कर सतत प्रशन्न रहे और
25. कभी भी पति की निन्दा न करे।
अतः, सभी स्त्रियों, जिनको भगवान ने गर्भवती होने का सौभाग्य दिया है, वह ध्यान देकर उपरोक्त नियमों का पालनकर सुन्दर, सौभाग्यशाली और दीर्घजीवी सन्तान को प्राप्त करने की चेष्टा करे, जिससे कि उसके साथ-साथ माता-पिता और समाज का हित हो सके।

ग्रहों से होने वाली पीड़ा का निवारण करने के लिए इस स्तोत्र का पाठ अत्यंत लाभदायक है।

ग्रहों से होने वाली पीड़ा का निवारण करने
के लिए इस स्तोत्र का पाठ अत्यंत लाभदायक है। इसमें सूर्य से
लेकर हर ग्रहों से क्रमश: एक-एक श्लोक के द्वारा
पीड़ा दूर करने की प्रार्थना की
गई है-
ग्रहाणामादिरात्यो लोकरक्षणकारक:। विषमस्थानसम्भूतां
पीड़ां हरतु मे रवि: ।।1।।
रोहिणीश: सुधामूर्ति: सुधागात्र: सुधाशन:।
विषमस्थानसम्भूतां पीड़ां हरतु मे विधु: ।।2।।
भूमिपुत्रो महातेजा जगतां भयकृत् सदा। वृष्टिकृद् वृष्टिहर्ता च
पीड़ां हरतु में कुज: ।।3।।
उत्पातरूपो जगतां चन्द्रपुत्रो महाद्युति:। सूर्यप्रियकरो विद्वान्
पीड़ां हरतु मे बुध: ।।4।।
देवमन्त्री विशालाक्ष: सदा लोकहिते रत:।
अनेकशिष्यसम्पूर्ण:पीड़ां हरतु मे गुरु: ।।5।।
दैत्यमन्त्री गुरुस्तेषां प्राणदश्च महामति:। प्रभु:
ताराग्रहाणां च पीड़ां हरतु मे भृगु: ।।6।।
सूर्यपुत्रो दीर्घदेहा विशालाक्ष: शिवप्रिय:। मन्दचार:
प्रसन्नात्मा पीड़ां हरतु मे शनि: ।।7।।
अनेकरूपवर्णेश्च शतशोऽथ सहस्त्रदृक्। उत्पातरूपो जगतां
पीडां पीड़ां मे तम: ।।8।।
महाशिरा महावक्त्रो दीर्घदंष्ट्रो महाबल:।
अतनुश्चोर्ध्वकेशश्च पीड़ां हरतु मे
शिखी: ।।9।।
भावार्थ -
ग्रहों में प्रथम परिगणित, अदिति के पुत्र तथा विश्व
की रक्षा करने वाले भगवान सूर्य विषम स्थानजनित
मेरी पीड़ा का हरण करें ।।1।।
दक्षकन्या नक्षत्र रूपा देवी रोहिणी के
स्वामी, अमृतमय स्वरूप वाले, अमतरूपी
शरीर वाले तथा अमृत का पान कराने वाले चंद्रदेव विषम
स्थानजनित मेरी पीड़ा को दूर करें ।।2।।
भूमि के पुत्र, महान् तेजस्वी, जगत् को भय प्रदान
करने वाले, वृष्टि करने वाले तथा वृष्टि का हरण करने वाले मंगल
(ग्रहजन्य) मेरी पीड़ा का हरण करें ।।
3।।
जगत् में उत्पात करने वाले, महान द्युति से संपन्न, सूर्य का प्रिय
करने वाले, विद्वान तथा चन्द्रमा के पुत्र बुध मेरी
पीड़ा का निवारण करें ।।4।।
सर्वदा लोक कल्याण में निरत रहने वाले, देवताओं के
मंत्री, विशाल नेत्रों वाले तथा अनेक शिष्यों से युक्त
बृहस्पति मेरी पीड़ा को दूर करें ।।5।।
दैत्यों के मंत्री और गुरु तथा उन्हें
जीवनदान देने वाले, तारा ग्रहों के स्वामी,
महान् बुद्धिसंपन्न शुक्र मेरी पीड़ा को दूर
करें ।।6।।
सूर्य के पुत्र, दीर्घ देह वाले, विशाल नेत्रों वाले, मंद
गति से चलने वाले, भगवान् शिव के प्रिय तथा प्रसन्नात्मा शनि
मेरी पीड़ा को दूर करें ।।7।।
विविध रूप तथा वर्ण वाले, सैकड़ों तथा हजारों आंखों वाले, जगत के
लिए उत्पातस्वरूप, तमोमय राहु मेरी पीड़ा
का हरण करें ।।8।।
महान शिरा (नाड़ी)- से संपन्न, विशाल मुख वाले, बड़े
दांतों वाले, महान् बली, बिना शरीर वाले तथा
ऊपर की ओर केश वाले शिखास्वरूप केतु
मेरी पीड़ा का हरण करें।।9।।

शनिवार, 18 नवंबर 2017

ब्राह्मण कण्व के कन्हैया

            ब्राह्मण कण्व के कन्हैया 


मधुवन के निर्जन सघन वन में ब्राह्मण कण्व अपने आश्रम में सदैव नारायण की तपस्या में लीन रहते थे।
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आश्रम के समीप वनक्षेत्र से जो कुछ भी कन्द-मूल-फल उन्हें प्राप्त होता, वह अपने इष्ट नारायण को अर्पित कर देते, और उसी को प्रसाद रूप से ग्रहण कर तृप्त हो जाते।

आश्रम के निकट ही कल-कल कर बहता हुआ झरना होने से उन्हें जल के लिए भी कहीं नहीं जाना पड़ता था।
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इस प्रकार उस एकान्त वन में उनकी नारायण-भक्ति अबाध रूप से चल रही थी। बाह्यजगत से बेखबर, एकान्तसेवी होकर वे केवल अपने नारायण के ध्यान में ही मस्त रहते थे।
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भक्त अपने इष्ट की भक्ति ईश्वर के रूप में करता है, वह इष्ट ही उसकी दृष्टि में सर्वस्व है, सर्वोपरि है।
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इससे पहले ब्राह्मण कण्व कभी-कभी ब्रजराज नन्द और ब्रजरानी यशोदा के घर चले जाया करते थे।
.
ब्राह्मण कण्व यशोदाजी के मायके से सम्बन्धित थे, अत: उनकी बाल्यकाल से ही ब्राह्मण कण्व में बड़ी श्रद्धा थी।
.
ब्राह्मण कण्व का जीवन-निर्वाह भी ब्रजरानी यशोदा द्वारा दिए गए दान से आराम से हो जाता था।
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किन्तु कई बरस से ब्राह्मणदेव अपने भजन में ऐसे रमे कि वे नन्ददम्पत्ति के घर जा न सके। इसलिए नन्द-यशोदा को पुत्र होने की बात भी उन्हें पता नहीं थी।
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एक बार द्वादशी के दिन प्रात:काल वे पूजा के लिए कंद-मूल-पुष्प-फल आदि को एकत्र करते-करते गोकुल में कालिन्दी (यमुना) के तट पर आ पहुंचे।
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वहां पर कुछ गोपियां आपस में श्रीकृष्ण की रूपमाधुरी व बाल लीलाओं की चर्चा कर रहीं थीं।
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गोकुल में जब से गोकुल चन्द्रमा (श्रीकृष्ण) प्रकट हुए हैं, गोपियों के पास उनकी चर्चा के अलावा कोई काम ही नहीं था।
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सुबह से ही वे नंदमहल के द्वार पर खड़ी रहकर श्रीकृष्ण की बाल चेष्टाओं को निहारा करतीं थीं।
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श्रीकृष्ण के प्रेममाधुर्य में वे ऐसी रमीं थीं कि स्वयं ही ‘परम प्रेमस्वरूपा’ हो गईं थीं। प्रेमस्वरूप श्रीकृष्ण की चर्चा ही उन्हें प्रिय लगती थी।
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ब्राह्मण कण्व जब वहां पहुंचे तो एक गोपी दूसरी गोपी से कह रही थी–’जब मैं नन्दरानी के यहां मथानी मांगने गई तो वहां नन्दजी के आंगन में एक अद्भुत दृश्य देखा और उसे देखकर मैं अपने-आप को ही भूल गई।
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उस शोभा का विस्तार मैं कहां तक करूँ, उसे तो देखते ही बुद्धि कुंठित हो जाती है। मेरे मन का भी पता नहीं कि वह श्यामसुन्दर के किस अंग में लीन हो गया है, उसे मैं ढूंढ़ कर हार गई पर पा न सकी हूँ।’
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कहाँ लौ बरनौं सुन्दरताई ?
खेलत कुंवर कनक आँगन में
नैनन अति सुखदाई।। (सूरदास)
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गोपियों के मुख से निकली कन्हैया की उस रूप माधुरी ने सीधे कण्व के हृदय में प्रवेश किया और वे अपने को रोक न सके और गोपियों से जाकर पूछने लगे–
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हे गोप सुन्दरियों ! तुम लोग किसके पुत्र की बात कर रही हो।’
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गोपियों ने कहा–‘पुत्र भयौ री नन्दमहर कैं बड़ी बैस बड़ भाग।’
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गोपियों ने कन्हैया के जन्म से लेकर अब तक की समस्त सरस लीलाओं को ब्राह्मण कण्व को सुना दिया।
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गोपियों के मुख से श्रीकृष्ण की रूपमाधुरी व लीलाओं को सुनकर ब्राह्मण कण्व समाधिस्थ से हो गए। वे अब और सब कुछ भूल गए और उनके नेत्रों में केवल गोपियों द्वारा सुनाई गई कन्हैया की छवि ही नाच रही थी।
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अब उनकी दृष्टि बदल गई। व्रजपुर (गोकुल) के वृक्ष उन्हें कल्पवृक्ष और  गोकुल की भूमि चिन्तामणि लग रही थी।
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गोकुल के स्त्री-पुरुष आदि सब कुछ उन्हें सच्चिदानन्दमय लग रहा था। गोकुल के चिदानन्दमय आकाश को निहारते हुए धीरे-धीरे चलते हुए वे नन्दमहल में प्रवेश कर गए।
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अपने चिरपरिचित प्रिय ब्राह्मण को आया देखकर नन्ददम्पत्ति के आनन्द की सीमा न रही। दोनों ने ब्राह्मण कण्व के चरणों में प्रणाम कर अर्घ्य आदि समर्पित कर बैठने के लिए सुन्दर आसन प्रदान किया।
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ब्राह्मण कण्व ने नन्दबाबा से कहा–’नन्दरायजी! सुना है कि तुम्हें पुत्र हुआ है; सुनते ही तुम्हारे पुत्र को देखने और आशीर्वाद देने आया हूँ।’
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कण्व की यह बात सुनकर नन्द-यशोदाजी की आंखों में आनन्दाश्रु आ गए और उन्होंने अपने प्यारे नीलमणि कृष्ण को ब्राह्मण के चरणों में डाल दिया।
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श्रीकृष्ण की अंगकान्ति नीलमणि के समान होने के कारण यशोदा जी उनको नीलमणि कहकर बुलाती थीं।
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श्रीकृष्ण की भोली सूरत को देखकर ब्राह्मण कण्व को ऐसा लगा मानो उनकी ध्येय मूर्ति ही आज साकार होकर उनके सामने खड़ी है।
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कण्व का अंग-प्रत्यंग नाच उठा। श्रीकृष्ण के रूपसौन्दर्य व बाल सुलभ भावभंगिमाओं ने जिसके मन को पकड़ न लिया हो, जिसके चित्त को रिझाया न हो, रमाया न हो, ऐसा कौन अभागा व्यक्ति होगा ?
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व्रजरानी यशोदा ने ब्राह्मण कण्व से कहा–’देव ! इतने दिनों बाद आप पधारे हैं, और इतनी देर भी हो गई है, द्वादशी का पारण ( द्वादशी को एकादशी का व्रत खोलने वाला भोजन ) आज यहीं करें। आज तो मैं आपको पारण किए बिना कदापि नहीं जाने दूंगी।’
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ब्राह्मण कण्व ने कहा–’मैं तो स्वयंपाकी हूँ, अपने ही हाथ से बना भोजन ग्रहण करता हूँ।’
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यशोदाजी ने कहा–ब्रह्मन ! शास्त्रों में कहा गया है कि जो मनुष्य अतिथि व ब्राह्मण की पूजा करता है, उसके द्वारा भगवान की पूजा हो जाती है।
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थका हुआ अतिथि जब घर पर आता है, तब उसके पीछे-पीछे समस्त, देवता, पितर और अग्नि भी पदार्पण करते हैं।
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उसकी पूजा होने पर सबकी पूजा हो जाती है। उसके निराश लौटने पर वे देवता आदि भी निराश लौट जाते हैं।
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संतनकी सेवा,
कर मन ऐसे संतनकी सेवा,
शील संतोख सदा उर जिनके,
नाम राम को लेवा।। (सूरदास)
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अत: आज मैं आपको अपने घर से भूखा नहीं जाने दूंगी। आपके ठाकुरजी को जो प्रिय है वही बताइए।
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यशोदाजी का आग्रह ब्राह्मण कण्व ने स्वीकार कर लिया और उन्होंने नन्दरानी से कहा–’आज मैं अपने इष्ट नारायण के लिए खीर बनाता हूँ।’
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यशोदाजी तुरंत स्नानादि करके ब्राह्मण के लिए रसोई की व्यवस्था करने लगीं।
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उन्होंने गोशाला के एक भाग को गोबर से लिपवाया, चूल्हे का निर्माण किया, फिर चूल्हे को गोबर से लीप कर उसका संस्कार किया,
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स्वयं स्वर्णकलशी में यमुनाजल भर कर लाईं। एक नवीन पात्र में पद्मगंधा गाय का दूध दुहकर रख दिया, स्वर्णपात्रों में चावल, घी, मिश्री, शर्करा, इलायची, केसर, मेवा, करछी, सूखी लकड़ियां आदि–रसोई बनाने का सारा सामान अपने हाथ से एकत्र कर ब्राह्मण से भोजन बनाने की प्रार्थना करने लगीं।
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जितनी देर व्रजरानी रसोई की व्यवस्था कर रहीं थीं, उतनी देर वे ब्राह्मण निर्निमेष नेत्रों से श्रीकृष्ण के सौन्दर्य व उनकी बालभंगिमा का पान करते रहे।
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जब वे रसोई बनाने के लिए रन्धनशाला में आए, उन्हें चारों ओर–चूल्हे में, स्वर्णकलशी में, स्वर्णथालों में, दूध के कटोरे में यहां तक कि गौशाला की दीवारों, द्वार, झरोखों–सभी जगह पर श्रीकृष्ण ही दिखाई दे रहे थे।
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उनके हृदय में एक अजीब-सा झंझावत् चल रहा था। वे सोचने लगे, मेरी ऐसी दशा क्यों हो गई है ?
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कुछ समय तक वे जड़वत् बैठे रहे। पर उसी समय मानो उनके हृदय की इष्टमूर्ति ने कहा–’
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कण्व ! भोग अर्पण नहीं करोगे ? बहुत देर हो गई है, मुझे बहुत भूख लगी है।’
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स्वप्न से जागे हुए से कण्व ने तुरन्त सुस्वादु खीर बनाई और स्वर्ण थाल में ठंडी कर उस पर तुलसी मंजरी रख दी।
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इष्टदेव को भोग अर्पित कर नेत्र मूंदकर प्रार्थना करने लगे–’हे वैकुण्ठाधिपते ! हे लक्ष्मीपते ! मैंने बहुत प्रेम व पवित्रता से यह खीर बनाई है, इसे अरोगिए।’
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ब्राह्मण के शब्द श्रीकृष्ण के कानों में पड़े। उन्होंने सोचा–यह तो मुझे ही बुलाते हैं। लक्ष्मी का पति और वैकुण्ठाधिपति तो मैं ही हूँ।
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हमें कोई प्रेम से बुलाता है और हम नहीं जाते तो यह अच्छा नहीं है। श्रीकृष्ण दौड़ते हुए आते हैं और प्रेम से धीरे-धीरे खीर अरोगते हैं।
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ऊधर ब्राह्मण कण्व नेत्र मूंदकर ‘ऊँ नमो नारायण ऊँ नमो नारायण’ का जप करते हुए ऐसी भावना कर रहे हैं कि प्रभु प्रेम से खीर अरोग रहे हैं।
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भक्तिमार्ग में भावना मुख्य है। भावना से भक्ति बढ़ती है। भगवान तो भाव के भूखे हैं, उन्हें ऊपर का ढोंग नहीं सुहाता।
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जैसा भाव होता है, फल भी वैसा ही मिलता है। समर्थ गुरु रामदासजी कहते हैं–वे अन्तर्यामी प्राणिमात्र के हृदय के भावों को जानते हैं।
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जिस भाव का प्रतिबिम्ब हृदय में है, भगवान भी वैसे ही बन जाते हैं। क्योंकि वे तो ‘जैसे-को-तैसे’ हैं।
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यदि कोई मन, वचन व कर्म से अपने कर्तव्य में तन्मय है तो उसको भगवान के पास जाना नहीं पड़ता, भगवान स्वयं उसके पास आ जाते हैं।
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केवल आते ही नहीं, नित्यतृप्त होने पर भी भोक्ता बन जाते हैं। भगवान अपने भक्त और भक्ति के पाश से बंधे हैं।
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भोग अर्पित करने की मानसिक भावना पूरी होने पर जब ब्राह्मण कण्व ने नेत्र खोले तो वे यह देखकर अवाक् रह गए कि
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नैन उघारि विप्र जो देखै,
खात कन्हैया देखन पायौ।।(सूरदास)
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अपने इष्ट के लिए उन्होंने जो आसन व भोग समर्पित किया था उस पर बैठकर श्रीकृष्ण खीर अरोग रहे हैं।
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ब्राह्मण कण्व के देखते ही श्रीकृष्ण आसन से उठकर भयभीत मुद्रा में गोशाला की दीवार से सटकर खड़े हो गए।
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श्रीकृष्ण के आसन से उठते ही कण्व का भाव ही बदल गया। उन्होंने विचार किया कि मैं ब्राह्मण हूँ, नन्दबाबा वैश्य हैं।
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बनिया का पुत्र मेरी खीर को छू गया। केवल छुआ ही नहीं, आधी खा भी गया। इस चंचल यशोदानन्दन ने तो मेरे इष्टदेव का भोग ही जूठा कर दिया।
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अब यह खीर मुझसे नहीं खाई जा सकती और वे जोर-जोर से ‘अरी यशोदा! अरी यशोदा!’ पुकारने लगे।
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नन्दरानी पुत्र के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में ब्राह्मण कण्व को दान में देने के लिए वस्तुएं एकत्र कर रहीं थीं।
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ब्राह्मण के अत्यन्त रूक्ष स्वर को सुनकर उनका हृदय धक्-धक् करने लगा। वे दौड़ती हुईं गोशाला में आईं और स्थिति को समझकर अपने पुत्र से कहने लगीं–’
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नीलमणि ! नीलमणि ! तुमने यह क्या अनर्थ कर डाला।’ पर श्रीकृष्ण तो ऐसी भोली सूरत बनाकर माता व कण्व को देखने लगे जैसे कुछ हुआ ही न हो।
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यशोदाजी को यह अच्छा न लगा। उन्होंने कन्हैया से कहा–’मैंने तो बड़ी उमंग से ब्राह्मण को भोजन का निमंत्रण दिया और श्याम ! तू उन्हें चिढ़ाता है ?
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वे अपने ठाकुरजी को भोग लगाते हैं, तब तू यों ही उठकर दौड़ पड़ता है। तुम यहां क्यों आए ?’
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कन्हैया ने उत्तर दिया–‘मैया! तू मुझे क्यों दोष दे रही है ? वह ब्राह्मण स्वयं बड़े विधान से मेरा ध्यान करता है । नेत्र बंद करके, हाथ जोड़कर बार-बार नाम लेकर मुझे बुलाता है।
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भला, बता ! जो भक्त मेरे मन को भा जाता है, उससे दूर मैं कैसे रह सकता हूँ ?’
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ब्राह्मण कण्व ने कहा–’मैं तो अपने इष्टदेव नारायण को बुला रहा था।’
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कन्हैया ने कहा–’मां ! मैं ही इनका ठाकुर हूँ, मैं ही नारायण हूँ।’
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यशोदामाता ने अपने कानों पर हाथ रखते हुए कहा–’यह लड़का चाहे जैसा बोलता रहता है। तुम्हें पता है नारायण के चार हाथ होते हैं।
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अरे ! तुम कैसे नारायण हो ? तुम तो मेरे पुत्र हो। चार हाथों वाले नारायण को मैं पूजती हूँ, पर मुझे तो मेरा कन्हैया ही अधिक प्रिय लगता है।
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कितना सुन्दर है मेरा कान्हा !’ और ऐसा कहकर अति ममता से माता ने कन्हैया को गोद में उठा लिया।
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माता को दु:खी देखकर ब्राह्मण कण्व को लगा कि कन्हीं व्रजरानी इस छोटी-सी बात के लिए बालक को दण्ड न दे दें। अत: उन्होंने व्रजरानी से कहा–’
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इस बालक का कोई दोष नहीं है, इसने तो मेरे कन्द-मूलाहारी होने के व्रत को बचा लिया। प्रभु ने इस बालक के द्वारा मेरी रक्षा कर दी। मैं बिलकुल भी रुष्ट नहीं हूँ।
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मैं इसे चिरंजीवी होने का आशीर्वाद देता हूँ। तुम्हारे पुत्र का मंगल-ही-मंगल होगा। बहुत देर हो रही है, अब मैं चलता हूँ।’
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व्रजरानी रो पड़ी। उन्होंने ब्राह्मणदेव से कहा–’बालक के अपराध का मार्जन तभी संभव है, जब आप पुन: खीर बनाकर मेरे घर पारण करें।’
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व्रजरानी के विशिष्ट आग्रह के आगे कण्व झुक गए और उन्होंने उनके आग्रह को स्वीकार कर लिया।
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व्रजरानी यशोदा ने पुन: स्नान कर एक दूसरी गौशाला को लीप कर पाकशाला तैयार की और खीर बनाने के लिए समस्त सामग्री स्वर्ण व रजतपात्रों में एकत्र कर दी।
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ब्राह्मणदेव पुन: खीर बनाने में लग गए पर नन्दनन्दन का खीर से सना मुख उन्हें भूल ही नहीं रहा था।
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उन्होंने बार-बार अपने मन को नन्दनन्दन से खींचकर अपने इष्ट नारायण में लगाने की कोशिश की, पर मन तो न जाने क्यूं श्रीकृष्ण की उसी झांकी में अटक गया था।
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खीर बनाने में वे बार-बार गलती कर रहे थे पर उस जगन्नियन्ता की इच्छा से खीर बन ही गयी और उसकी सुवास से सारी गौशाला सुवासित होने लगी।
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इधर श्रीकृष्ण के नटखट व्यवहार से शंकित व्रजरानी उन्हें गोद में उठाकर बाहर आंगन में आम के वृक्ष की छाया में आकर बैठ गईं।
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उन्होंने निश्चय कर लिया था कि वे श्रीकृष्ण को तब तक नहीं छोड़ेंगीं जब तक ब्राह्मणदेव पारण न कर लें।
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आमवृक्ष के नीचे नीलमणि श्रीकृष्ण को देखकर कोकिला कुहु-कुहु करने लगीं। नीलमणि की मेघ-सदृश्य अंगकांति देख कुछ मयूर नृत्य करने लगे क्योंकि मयूरों को मेघ का रंग बहुत प्रिय होता है।
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श्रीकृष्ण के चरणों में दो-चार मयूरपिच्छ गिर पड़ते हैं जिन्हें उठाकर यशोदा जी कन्हैया के बालों में सजा देती हैं।
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देखो माई ये बडभागी मोर।
जिनकी पंख को मुकुट बनत है,
शिर धरें नंदकिशोर॥
ये बडभागी नंद यशोदा,
पुन्य कीये भरझोर।
वृंदावन हम क्यों न भई हैं
लागत पग की ओर।।
ब्रह्मादिक सनकादिक नारद,
ठाडे हैं कर जोर।
सूरदास संतन को सर्वस्व
देखियत माखन चोर।।
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मयूरों को देखकर श्रीकृष्ण भी माता से उनके साथ नृत्य करने की जिद करने लगे पर माता का सशंकित मन उन्हें छोड़ने को बिल्कुल भी तैयार न था।
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इधर ब्राह्मणदेव ने पुन: खीर तैयार कर ली और वे खीर को थाली में डालकर तालवृन्त के पंख से बयार देकर ठंडा करने लगे।
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श्रीकृष्ण ने सोचा खीर तो अच्छी बनाई है। मुझे अर्पण किए बिना ये पानी भी नहीं पीते हैं। ऐसी सरस खीर बनाई है तो मुझे तो बुलाएंगे ही पर मेरी मां तो मुझे वहां जाने नहीं देंगी।
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श्रीकृष्ण का लीला करने का मन हुआ। वे शीतल वायु के स्पर्श से शीघ्र ही माता की गोद में सो गए।
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पुत्र को सोया हुआ जानकर व्रजरानी भी खुश हो गईं कि बेचारे ब्राह्मणदेव भी अब शांति से भोजन कर सकेंगे।
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श्रीकृष्ण के साथ उनकी सेवा में ऐश्वर्यशक्ति सदा विराजमान रहती है। श्रीकृष्ण ने ऐश्वर्यशक्ति को आज्ञा दी कि मेरी माता को निद्रा आ जाए।
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अचानक ठंडी हवा चलने लगी और ऐश्वर्यशक्ति ने माता की आंखों में प्रवेश किया जिससे एकादशी के जागरण से थकी हुई व्रजरानी निश्चिन्त होकर सो गयीं।
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ब्राह्मणदेव नारायण को मनाते हुए कीर्तन कर रहे हैं–
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शंखचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसीरुहक्षणम्।
सहारवक्ष:स्थलकौस्तुभश्रियं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम्।।
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जैसे ही ब्राह्मणदेव ने गोशाला में इष्टचिन्तन कर भोग निवेदित किया तब तक श्रीकृष्ण गोशाला में प्रवेश कर चुके थे।
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कण्व ने मन्त्र संख्या पूरी कर जब आंखें खोलीं तो पहले से भी सुन्दर व माधुर्ययुक्त नन्दनन्दन आसन पर विराजमान होकर खीर अरोग रहे थे।
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कमल के समान रतनारे नेत्र, गोरोचन के तिलक के पास कज्जल का डिठौना, नाक में मोतियों की बाली, धनुष के समान तनी हुई भौंहें, दूध की दँतुलियाँ, मस्तक पर अत्यन्त कोमल काले घुंघराले केश, ललाट पर पुखराज और पद्मराग मणियों से बना लटकन,
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ठुड्डी के नीचे गले में कठुला और बघनखा, श्यामवर्ण कोमल शरीर और उसी के अनुकुल वस्त्र आभूषण ऐसे सजे हैं मानो सुन्दर श्रृंगार-रस का नवीन वृक्ष अद्भुत फलों से फलवान हो रहा हो।
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ब्राह्मण कण्व उस शोभाराशि को मौन होकर एकटक देखते रह गए।
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नन्दरानी की तन्द्रा टूटी। श्रीकृष्ण को गोद में न पाकर वे दौड़ती हुईं गोशाला में आ गईं, साथ ही नन्दबाबा भी वहां आ पहुंचे। उनको देखकर ब्राह्मण कण्व ने कहा–’
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ब्रजेश ! शायद भगवान नहीं चाहते कि तुम्हारे घर मेरा पारण हो। दिन का चौथा प्रहर हो रहा है और सूर्य भी अस्ताचलगामी हो रहे हैं, अत: अब मुझे अपने आश्रम में पहुंच जाना चाहिए।’
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ब्राह्मण की बात सुनकर व्रजरानी ने कहा–’मैं जिन्दगी भर इस दु:ख को भूल न सकूंगी कि एक ब्राह्मण बिना भोजन किए मेरे घर से चले गए।
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देव ! बस, एक बार और आप रसोई बनाने का परिश्रम स्वीकार कर लें। मैं तुरन्त दूसरे स्थान पर सारी व्यवस्था किए देती हूँ। मैं इस चंचल बालक को लेकर अन्य जगह चली जाती हूँ।
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गोशाला के सभी द्वारों पर स्वयं नन्दबाबा को गोपों के साथ पहरा देने के लिए बिठा देती हूँ। जब तक आपका पारण नहीं हो जाता, देखती हूँ, यह बालक यहां कैसे आता है ?’
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ऐसा कहते हुए नन्दरानी के नेत्रों से अविरल अश्रु बहने लगे।
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ब्राह्मण कण्व ने कन्हैया के मुख की ओर देखा। उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ कि कन्हैया माता को रोता देखकर भयभीत हो रहा है।
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भगवान श्रीकृष्ण इतने लीलाधारी हैं कि कभी डरते हैं और कभी रोते भी हैं।
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ब्राह्मण ने तुरन्त नन्दरानी से कहा–’आप शांत हो जाओ। मैं तुम्हें दु:खी करके यहां से नहीं जाना चाहता।’
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यशोदाजी ने कण्व से कहा–’बस, देव ! एक बार और आप खीर बनाने का परिश्रम कर लें। मैं अभी सारी व्यवस्था किए देती हूँ।’
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तीसरी गोशाला में पुन: खीर बनाने की सारी व्यवस्था करके नन्दरानी श्रीकृष्ण को लेकर बगल में उपनन्द के घर चली गयीं।
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गोशाला के मुख्य द्वार पर स्वयं नन्दबाबा पहरा देने लगे व अन्य गोपों को गोशाला की खिड़कियों व अन्य द्वारों पर बिठा दिया गया ताकि कहीं से भी नन्दनन्दन प्रवेश न कर सकें।
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तीसरी बार ब्राह्मणदेव ने जैसे ही खीर बनाकर इष्टदेव को भोग अर्पित करना शुरु किया, श्रीकृष्ण माता का हाथ छुड़ाकर पूरी शक्ति से गोशाला की ओर दौड़े।
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गोशाला के द्वार पर ही नन्दबाबा ने श्रीकृष्ण का हाथ पकड़ लिया।
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माता यशोदा कातर होकर भगवान को पुकारने लगीं–’नारायण ! नारायण ! रक्षा करो ! हे प्रभु ! मेरे नीलमणि को गोशाला के द्वार पर ही रोक लो।’
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माता ने रोष में भरकर कहा–’अरे नीलमणि ! तुम इतने नटखट हो गए हो, सुबह से ही एक ब्राह्मण को कष्ट दे रहे हो।‘
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पांडे भोग लगावन नहिं पावें।
कर कर पाक वही अर्पत है, तब तब तू छुहि आवे।।
मैं श्रद्धा कर ब्राह्मण न्योत्यौ तू जो गोपाल खिजावे।
वह अपने ठाकुरहिं जिमावत तूं योंही छुइ आवे।।
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नन्दनन्दन ने भी रोष में भरकर तुरन्त कहा–
तू यह बात न जाने री मैया मोहे कित दोष लगावे।
‘परमानन्द’ वह नयन मूंद के मोही कों जु बुलावे।।
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नन्दरानी श्रीकृष्ण की बात को समझ न सकीं। वह यह नहीं जानतीं कि नन्दबाबा के पकड़े जाने पर भी उनका नीलमणि कभी का गोशाला के अन्दर पहुंचकर भोग अरोग रहा है।
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वह यह भी नहीं जानतीं कि जो अजन्मा है, अनादि है, अनन्त है, पूर्ण है, पुरुषोत्तम है, निर्गुण है, सत्य है, प्रत्येक कल्प में स्वयं अपने-आप में अपने-आप का ही सृजन  करता है,
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पालन करता है और फिर संहार कर लेता है, वही विराट् पुरुष मेरा नीलमणि है।
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नन्दरानी तो यह कल्पना भी नहीं कर सकतीं कि समस्त लोकों के स्वामी, महर्षि, देवर्षि, पितृपति, दैत्येन्द्र, सिद्धेश्वर आदि और संसार में जितनी भी वस्तुएं ऐश्वर्य, तेज, इन्द्रियबल, मनोबल, शरीरबल व विशेष सौन्दर्य, लज्जा, वैभव व विभूति से युक्त हैं–उन सबके नायक के रूप में मेरा नीलमणि ही है।
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उन्हें तो यह भान ही नहीं है कि मेरी गोद में रहते हुए भी ठीक उसी क्षण मेरा नीलमणि अनन्त रूपों में अवस्थित है।
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काल कौ काल, ईस ईसन कौ,
नन्द भवन कौ भूषन माई।
जसुदा कौ लाल बीर हलधर कौ
राधारमन परम सुखदाई।।
सिव कौ धन, सन्तन कौ सरबस,
महिमा बेद पुरानन गाई।
इन्द्र कौ इन्द्र, देव देवन कौ,
ब्रह्म कौ ब्रह्म अधिक अधिकाई।।
काल कौ काल, ईस ईसन कौ,
अतिहि अतुल तोल्यौ नहिं जाई।
‘नन्ददास’ कौ जीवन गिरिधर,
गोकुल गाँव कौ कुमहर कन्हाई।।
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वात्सल्यरस के अनन्त सुधासागर में आकण्ठ डूबी हुई यशोदामाता को तो हमेशा यही लगता है कि वह मेरे गर्भ से उत्पन्न हुआ शिशु है, अबोध है।
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इसलिए वे अत्यन्त प्रसन्न हैं कि व्रजराज नन्द ने चंचल नीलमणि को गोशाला में प्रवेश करने से रोक दिया है और भगवान का भोग नीलमणि के द्वारा जूठा होने से बच गया।
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दूसरी ओर ब्राह्मण के शाप से भी बालक की रक्षा हो गई, एक महान अनर्थ होने से रह गया।
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इधर जब कण्व ने नेत्र खोले तो देखा कि पहले से सौगुना माधुर्य लिए नन्दनन्दन आसन पर बैठे भोग अरोग रहे हैं।
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पहले दिन के एकादशी के निर्जल व्रत के कारण भूख व थकान से वह व्याकुल हो गए। श्रीकृष्ण को उन पर दया आ गई।
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सोचा कि ब्राह्मण है, मेरा भक्त है, उसे कब तक भ्रांति में रक्खूं। बालस्वरूप अंतर्धान हुआ और चतुर्भुज नारायण प्रकट हो गए।
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कण्व के कानों में शब्द पड़े कि वैकुण्ठ के नारायण ही श्रीकृष्ण हैं। नारायण और श्रीकृष्ण एक ही हैं।
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इस बार कण्व के मन, बुद्धि व नेत्रों पर पड़ा माया का परदा हट चुका था। चतुर्भुजरूप फिर बालरूप में प्रकट हो गया।
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वे उसी क्षण श्रीकृष्ण के चरणों में लोटने लगे और अपने नेत्रों से झरते हुए अश्रुजल से नन्दनन्दन के युगल चरणों को पखारने लगे।
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ब्राह्मण कण्व को सत्य का ज्ञान होने पर श्रीकृष्ण ने मधुर वाणी में कहा–
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’कण्व ! तुम मुझे देखने के लिए अनेक जन्मों से तपस्यारत हो, इसलिए इस बार तुम्हारा यहां मधुपुरी (मथुरा) में जन्म हुआ।
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मैं भी यहां प्रकट हुआ हूँ। इसीलिए तुम मेरा बालरूप व बाललीला देख सके।’ ऐसा कहकर वह कमनीय बालरूप कण्व के नेत्रों से ओझल हो गया।
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जडवत् कण्व न जाने कितनी देर स्तम्भित से स्वेद (पसीने) से तरबतर भावसमाधि में बहे रहे।
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जब कुछ बाह्यस्थिति का ज्ञान हुआ तो श्रीकृष्ण के अधरों से पीये गए उस अमृत (अधरामृत) को सिर पर धारणकर स्वयं उसका पान किया और फिर उसका सारे शरीर पर लेपन कर लिया। प्रेमावेश में ही बुदबुदाते हुए गोशाला का द्वार खोलकर बाहर आए।
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नन्दबाबा ने देखा कि ब्राह्मण के अंग-अंग से आनन्द झर रहा है और वे दिव्योन्माद की दशा में हैं तो वे इतना तो समझ गए कि प्रसाद अर्पण करते समय उन्हें प्रेमावेश हो गया है।
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उन्होंने कण्व से पूछा–’देव! पारण हो गया ?’
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कण्व ने गद्गद् वाणी में कहा–‘हां, व्रजराज ! हो गया, मैं तो अनन्तकाल के लिए तृप्त हो गया।’
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ब्राह्मण कण्व की प्रेमोन्मत्तता और बढ़ती जाती है और वे नन्दबाबा के आंगन में लोट-लोट कर गाने लगे–
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सफल जन्म, प्रभु आजु भयौ।
धनि गोकुल, धनि नन्द-जसोदा,
जाकैं हरि अवतार लयौ।।
प्रगट भयौ अब पुन्य-सुकृत-फल,
दीनबंधु मोहिं दरस दयौ।
बारंबार नन्द के आँगन,
लोटत द्विज आनंदमयौ।।
मैं अपराध कियौ बिनु जानें,
को जानें किहिं भेष जयौ।
सूरदास प्रभु भक्त-हेत-बस,
जसुमति-गृह आनन्द लयौ।।
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अर्थात्–ब्राह्मण की समझ में बात आ गयी। वह बोला–`प्रभो ! मेरा जीवन आज सफल हो गया।
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यह गोकुल धन्य है, श्रीनन्दजी और यशोदाजी धन्य हैं, जिनके यहां साक्षात् श्रीहरि ने अवतार लिया और जो उनकी गोद में खेल रहे हैं।
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मेरे समस्त पुण्यों एवं उत्तम कर्मों का फल आज प्रकट हुआ जो दीनबन्धु प्रभु ने मुझे दर्शन दिया।’ इस प्रकार कहता हुआ ब्राह्मण आनन्दमग्न होकर बार-बार श्रीनन्दजी के आंगन में लोट रहा है।
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ब्राह्मण श्यामसुन्दर से प्रार्थना करता है–प्रभो ! बिना जाने, अज्ञानवश मैंने अपराध किया, आपका अपमान किया, मुझे क्षमा करें।
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पता नहीं, मेरे किस साधन से आप मुझ पर प्रसन्न हुए। मेरे प्रभु ने भक्त के प्रेमवश श्रीयशोदाजी के घर में यह आनन्द-क्रीड़ा की है।
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कृपा करिये कृपाल,
प्रतिपाल संसार उदधि जंजाल तैं परौं पार।
काहू के ब्रह्मा, काहू के महेस,
प्रभु! मेरे तौ तुमही अधार॥
दीन के दयाल हरि, कृपा मोकौं करि,
यह कहि-कहि लोटत बार-बार।
सूर स्याम अंतरजामी स्वामी
जगत के कहा कहौं करौ निरवार॥
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अर्थात्–ब्राह्मण गद्गद् कंठ से कहता है–`हे कृपालु ! मुझ पर कृपा कीजिये और मेरा पालन कीजिये, जिससे इस संसार-सागर रूपी जंजाल में पड़ा मैं इसके पार हो जाऊँ ।
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किसी के आधार ब्रह्माजी हैं और किसी के शंकरजी; किंतु प्रभो ! मेरे आधार तो एक आप ही हैं ।
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हे दीनों पर दया करने वाले श्रीहरि ! मुझ पर कृपा कीजिये। श्यामसुन्दर ! आप अन्तर्यामी हैं, जगत के स्वामी हैं, आपसे और स्पष्ट करके क्या कहूँ।’ यह कहता हुआ वह ब्राह्मण आंगन में पुन: लोटने लगा।
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यशोदामाता को थोड़ी शंका हुई कि श्रीकृष्ण परमात्मा हैं कि मेरा पुत्र है ? कन्हैया ने सोचा कि इस ब्राह्मण ने तो सब गड़बड़ कर दी।
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यदि मां मुझे परमात्मा मानेगी तो प्यार नहीं कर सकेगी।
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ऐश्वर्य और वात्सल्य दोनों का विरोध है। जहां ऐश्वर्य है वहां संकोच होता है। मैं प्रेमरस देने व लेने के लिए ही बालक बना हूँ।
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इसलिए प्रभु ने वैष्णवी माया का ऐसा आवरण डाल दिया कि यशोदामाता ब्राह्मण की सब बातें भूल गईं। माता ने सोचा कन्हैया बहुत सुन्दर है इसलिए जो आता है वही इससे प्रेम करता है।
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 ((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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आंवला बहुत फायदेमंद होता है

आंवला आयुर्वेद ने इसे ‘अमृतफल’ कहा है। आयुर्वेंद में इसका बहुत ही महत्व है। खाने में आंवला कड़वा, मधुर, एवं शीतल है।
यह अपने कड़वेपन के कारण कफ एवं गैस को खत्म करता है और मधुरता व शीतलता के कारण पित्तनाशक है अत: यह त्रिदोषनाशक है।
आंवले के अन्दर विटामिन `सी´ भरपूर मात्रा में
पायी जाता है। इसकी खास बात यह है कि इसके विटामिन गर्म करने और सुखाने से भी खत्म नहीं होते।
आंवला युवको को जवान बनाए रखता है और बूढ़ों को युवाशक्ति प्रदान करता है। इसी का प्रयोग करके `च्वयन´ ऋषि ने दुबारा अपने यौवन को प्राप्त किया था।आंवले में जितने रोग से लड़ने की शक्ति, खून को साफ और बल-वीर्य बढ़ाने वाले तत्व हैं उतने संसार की किसी वस्तु या औषधि में नहीं हैं। इसलिए स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए अपने भोजन में आवले को मुख्य रूप से शामिल करें।
आंवला हमारे दांतों और मसूढ़ों को स्वस्थ और मजबूत बनाता है एवं तन-मन को फुर्तीला बनाता है।
नर्वस सिस्टम (स्नायु रोग), हृदय की बेचैनी, धड़कन, मोटापा, जिगर,ब्लडप्रेशर, दाद, प्रदर, गर्भाशय दुर्बलता, नपुसंकता, चर्म रोग, मूत्ररोग एवं हडिड्यों आदि के रोगों में आंवला बहुत उपयोगी होता है।
जिगर की दुर्बलता, पीलिया को खत्म करने में
आंवला को शहद के साथ मिलाकर खाने से लाभ मिलता है और यह टॉनिक का काम करता है।
आंवला को रस के रूप में, चटनी के रूप में या इसके चूर्ण को पानी के साथ ले सकते हैं।
कोलेस्ट्रॉल- रोज सुबह खाली पेट एक चम्मच आंवले का पावडर पानी में घोलकर पी लें। इससे रक्त में कोलेस्ट्रॉल का स्तर स्थिर रहता है।
नेत्र रोग – प्रतिदिन एक बड़ा चम्मच आँवले का रस शहद के साथ मिलाकर चाटने से मोतियाबिन्द में लाभ होता है।आंवले का रस पीने से नेत्र ज्योति बढ़ती है।
आँवला, जामुन और करेले का पावडर एक चम्मच प्रतिदिन दोनों समय लें। इससे मधुमेह को निंयत्रित करने में मदद मिलेगी।
एसिडिटी- तीव्र या असाध्य एसिडिटी हो तो एक ग्राम आँवले का पावडर दूध या पानी में शक्कर के साथ मिलाकर दोनों समय पिएँ।
आंवला अर्थराइटिस के दर्द को कम करने में
भी सहायक होता है।
आंवला बालों को मजबूत बनाता है,इनकी जड़ों को मजबूत करता है और बालों का झडऩा भी काफी हद तक रोकता है।
गर्भवती स्त्रियों को आंवला अवश्य लेना चाहिये, किसी भी रूप में लें।

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

मीठी नीम के फायदे



नीम दो किस्म का होता है। मीठा नीम और कड़वा नीम । हालांकि दोनों में ही औषधीय गुण पाए जाते हैं लेकिन कड़वा नीम का इस्तेमाल औषधि निर्माण में ज्यादा होता है। आधुनिक शोधों व अनुसंधानों ने सिद्ध कर दिया है कि नीम में अनेक औषधीय गुण हैं, जिनका कोई जवाब नहीं है।
  1. सांप के काटने पर नीम की पत्तियों का रस पिलाने से लाभ होता है।
  2. सिर में जुएं पड़ गयी हो तो निबौलियों का रस लगाने से जुंओं का नाश होता है।
  3. खून की खराबी दूर करने के लिए प्रतिदिन 4-6 पत्तियां नीम की चबानी चाहिए। इससे रक्त विकार दूर होकर रक्त का संचार सुचारू रूप से होता रहता है।
  4. पेचिश में नीम के पत्तों का अरक शक्कर में मिलाकर पीने से फौरन लाभ होता है। पेचिश होने पर मीठे नीम के पत्तों को हरड़ के साथ पीसकर सेवन करने से राहत मिलती है।
  5. किसी भी प्रकार की गांठ होने पर नीम के पत्तों को पानी में उबालकर पीस लें व उसमें थोड़ा सा गुड़ मिलाकर उस स्थान पर बांध लें। फिर देखिए कितनी जल्दी ठीक होती है  गांठ।
  6. मोटापे से निजात पाने के लिए नीम के पत्तों को घी में पकाकर चबाना चाहिए।
  7. पेट दर्द होने पर मीठे नीम के पत्तों का सेवन करना चाहिए।
  8. दमा रोग से निजात पाने के लिए नीम के तने का रस पीना चाहिए।
  9. दांत दर्द से निजात पाने के लिए नीम के गोंद का दुखते दांत पर लगाते ही आराम मिलता है।
  10. मुंह में छाले हो जाने पर व्यक्ति बुरी तरह परेशान रहता है। लेकिन परेशान मत होइए। सिर्फ 4-5 नीम की पत्तियां दिन में 2-3 बर खायें। छाले ठीक हो जाएगे। छाले होने पर नीम की छाल के बारीक चूर्ण को घी में मिलाकर लगाना चाहिए।
  11. यदि मूत्र त्याग में रुकावट आती हो तो नीम के पत्ते इलायची के साथ सेवन करना चाहिए।
  12. यदि गले में खराश हो तो मीठे नीम के साथ मिश्री की डली चबाने से राहत मिलती है।
  13. बुखार उतारने के लिए नीम की पत्ती के डंठल को पत्थर पर पीसकर थोड़े से पानी में गरम करके उसमें 4 बताशे मिलाकर पिला देने से बुखार उतर जाता है।
  14. नीम के फूलों को घोंटकर लगातार दो सप्ताह तक पीने से मलेरिया से बचाव होता है। यदि मलेरिया हो गया हो नीम के तने के अंदर की छाल को ठीक से कूटकर उसे कांसे के बर्तन में थोड़ा सा पानी डालकर गरम कर लें और कपड़े से छान लें। इसमें थोड़ी सी मिश्री मिलाकर खाली पेट दिन में दो बार लेने से दो दिन में ही मलेरिया उतर जाता है।
  15. बवासीर में नीम की निबौली काफी आसरकारी उपचार है। इसके गूदे में शक्कर मिलाकर प्रतिदिन खाने से लाभ होता है।
  16. मुंहासे एक ऐसी चीज है जो किशोरावस्था और युवावस्था में प्रायः सबको होते हैं। यदि तीन की पत्ती और छाल का रस निकालकर रात को सोते समय मुंहासों पर लगाया जाए तो एक महीने में मुंहासे नदारद हो जाते हैं।
  17. नीम का तेल सभी चर्म रोगों की रामबाण औषधि है। इसलिए त्वचा में किसी भी प्रकार की तकलीफ होने पर इसे लगाया जा सकता है। दाद में तो यह विशेष लाभदायक है। चर्म रोगों में मीठा नीम बहुत गुणकारी है। इसके पत्तों को पीसकर उसमें थोड़ी -सी हल्दी मिलाकर लेप करने से भी लाभ होता है।
  18. बालों को काला, घना एवं लंबा बनाए रखने के लिए तेल में मीठे नीम के पत्तों को पकाकर उस तेल से बालों में मालिश करनी चाहिए।
  19. आंखों में दर्द होने पर नीम के फलों का रस पिलाने से लाभ मिलता है। यदि आंख में जाला पड़ता हो तो नीम के तने की छाल की राख को सुरमे के तौर पर लगाने से लाभ मिलता है।
  20. दस्त की शिकायत होने पर नीम की पत्तियों का रस पिलाने से लाभ होता है।
  21. यदि सिर दर्द से परेशान हों तो नीम का रस पीने से राहत मिलती है।
  22. चेहरे के अनावश्यक दाग-धब्बों को मिटाने के लिए नीम की पत्तियों का रस पिलाने से लाभ होता है।
  23. नीम की पत्तियां कीड़ों से बचाती हैं। अनाज में यदि नीम की पत्तियां मिलाकर उसे संग्रह किया जाए तो वह खराब नहीं होता।
  24. यदि नीम की पत्तियां जलायी जाएं तो मच्छर भाग जाते हैं।

पितृपक्ष में परान्न से बचें

 गरुड़ पुराणोक्त पितृपक्ष परान्न निषेध कथा सनातन धर्म में 16 दिनों का पितृपक्ष वर्ष का सबसे सूक्ष्म और संवेदनशील समय माना गया है। गरुड़ पुरा...