शनिवार, 12 जनवरी 2019

भगवान शिव के 35 रहस्य

भगवान शिव के 35 रहस्य


भगवान शिव अर्थात पार्वती के पति शंकर जिन्हें महादेव, भोलेनाथ, आदिनाथ आदि कहा जाता है, उनके बारे में यहां प्रस्तुत हैं 35 रहस्य।

1. आदिनाथ शिव

सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें 'आदिदेव' भी कहा जाता है। 'आदि' का अर्थ प्रारंभ। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम 'आदिश' भी है।

2. शिव के अस्त्र-शस्त्र

शिव का धनुष पिनाक, चक्र भवरेंदु और सुदर्शन, अस्त्र पाशुपतास्त्र और शस्त्र त्रिशूल है। उक्त सभी का उन्होंने ही निर्माण किया था।

3. शिव का नाग

शिव के गले में जो नाग लिपटा रहता है उसका नाम वासुकि है। वासुकि के बड़े भाई का नाम शेषनाग है।

4. शिव की अर्द्धांगिनी

शिव की पहली पत्नी सती ने ही अगले जन्म में पार्वती के रूप में जन्म लिया और वही उमा, उर्मि, काली कही गई हैं।

5. शिव के पुत्र

शिव के प्रमुख 6 पुत्र हैं- गणेश, कार्तिकेय, सुकेश, जलंधर, अयप्पा और भूमा। सभी के जन्म की कथा रोचक है।

6. शिव के शिष्य

शिव के 7 शिष्य हैं जिन्हें प्रारंभिक सप्तऋषि माना गया है। इन ऋषियों ने ही शिव के ज्ञान को संपूर्ण धरती पर प्रचारित किया जिसके चलते भिन्न-भिन्न धर्म और संस्कृतियों की उत्पत्ति हुई। शिव ने ही गुरु और शिष्य परंपरा की शुरुआत की थी। शिव के शिष्य हैं- बृहस्पति, विशालाक्ष, शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज इसके अलावा 8वें गौरशिरस मुनि भी थे।

7. शिव के गण

शिव के गणों में भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय प्रमुख हैं। इसके अलावा, पिशाच, दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी शिव का गण माना जाता है। शिवगण नंदी ने ही 'कामशास्त्र' की रचना की थी। 'कामशास्त्र' के आधार पर ही 'कामसूत्र' लिखा गया।

8. शिव पंचायत

भगवान सूर्य, गणपति, देवी, रुद्र और विष्णु ये शिव पंचायत कहलाते हैं।

9. शिव के द्वारपाल

नंदी, स्कंद, रिटी, वृषभ, भृंगी, गणेश, उमा-महेश्वर और महाकाल।

10. शिव पार्षद

जिस तरह जय और विजय विष्णु के पार्षद हैं उसी तरह बाण, रावण, चंड, नंदी, भृंगी आदि शिव के पार्षद हैं।

11. सभी धर्मों का केंद्र शिव

शिव की वेशभूषा ऐसी है कि प्रत्येक धर्म के लोग उनमें अपने प्रतीक ढूंढ सकते हैं। मुशरिक, यजीदी, साबिईन, सुबी, इब्राहीमी धर्मों में शिव के होने की छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। शिव के शिष्यों से एक ऐसी परंपरा की शुरुआत हुई, जो आगे चलकर शैव, सिद्ध, नाथ, दिगंबर और सूफी संप्रदाय में वि‍भक्त हो गई।

12. बौद्ध साहित्यके मर्मज्ञ अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त विद्वान प्रोफेसर उपासक का मानना है कि शंकर ने ही बुद्ध के रूप में जन्म लिया था। उन्होंने पालि ग्रंथों में वर्णित 27 बुद्धों का उल्लेख करते हुए बताया कि इनमें बुद्ध के 3 नाम अतिप्राचीन हैं- तणंकर, शणंकर और मेघंकर।

13. देवता और असुर दोनों के प्रिय शिव

भगवान शिव को देवों के साथ असुर, दानव, राक्षस, पिशाच, गंधर्व, यक्ष आदि सभी पूजते हैं। वे रावण को भी वरदान देते हैं और राम को भी। उन्होंने भस्मासुर, शुक्राचार्य आदि कई असुरों को वरदान दिया था। शिव, सभी आदिवासी, वनवासी जाति, वर्ण, धर्म और समाज के सर्वोच्च देवता हैं।

14. शिव चिह्न

वनवासी से लेकर सभी साधारण व्‍यक्ति जिस चिह्न की पूजा कर सकें, उस पत्‍थर के ढेले, बटिया को शिव का चिह्न माना जाता है। इसके अलावा रुद्राक्ष और त्रिशूल को भी शिव का चिह्न माना गया है। कुछ लोग डमरू और अर्द्ध चन्द्र को भी शिव का चिह्न मानते हैं, हालांकि ज्यादातर लोग शिवलिंग अर्थात शिव की ज्योति का पूजन करते हैं।

15. शिव की गुफा

शिव ने भस्मासुर से बचने के लिए एक पहाड़ी में अपने त्रिशूल से एक गुफा बनाई और वे फिर उसी गुफा में छिप गए। वह गुफा जम्मू से 150 किलोमीटर दूर त्रिकूटा की पहाड़ियों पर है। दूसरी ओर भगवान शिव ने जहां पार्वती को अमृत ज्ञान दिया था वह गुफा 'अमरनाथ गुफा' के नाम से प्रसिद्ध है।

16. शिव के पैरों के निशान

श्रीपद- श्रीलंका में रतन द्वीप पहाड़ की चोटी पर स्थित श्रीपद नामक मंदिर में शिव के पैरों के निशान हैं। ये पदचिह्न 5 फुट 7 इंच लंबे और 2 फुट 6 इंच चौड़े हैं। इस स्थान को सिवानोलीपदम कहते हैं। कुछ लोग इसे आदम पीक कहते हैं।

रुद्र पद- तमिलनाडु के नागपट्टीनम जिले के थिरुवेंगडू क्षेत्र में श्रीस्वेदारण्येश्‍वर का मंदिर में शिव के पदचिह्न हैं जिसे 'रुद्र पदम' कहा जाता है। इसके अलावा थिरुवन्नामलाई में भी एक स्थान पर शिव के पदचिह्न हैं।

तेजपुर- असम के तेजपुर में ब्रह्मपुत्र नदी के पास स्थित रुद्रपद मंदिर में शिव के दाएं पैर का निशान है।

जागेश्वर- उत्तराखंड के अल्मोड़ा से 36 किलोमीटर दूर जागेश्वर मंदिर की पहाड़ी से लगभग साढ़े 4 किलोमीटर दूर जंगल में भीम के मंदिर के पास शिव के पदचिह्न हैं। पांडवों को दर्शन देने से बचने के लिए उन्होंने अपना एक पैर यहां और दूसरा कैलाश में रखा था।

रांची- झारखंड के रांची रेलवे स्टेशन से 7 किलोमीटर की दूरी पर 'रांची हिल' पर शिवजी के पैरों के निशान हैं। इस स्थान को 'पहाड़ी बाबा मंदिर' कहा जाता है।

17. शिव के अवतार

वीरभद्र, पिप्पलाद, नंदी, भैरव, महेश, अश्वत्थामा, शरभावतार, गृहपति, दुर्वासा, हनुमान, वृषभ, यतिनाथ, कृष्णदर्शन, अवधूत, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, किरात, सुनटनर्तक, ब्रह्मचारी, यक्ष, वैश्यानाथ, द्विजेश्वर, हंसरूप, द्विज, नतेश्वर आदि हुए हैं। वेदों में रुद्रों का जिक्र है। रुद्र 11 बताए जाते हैं- कपाली, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, आपिर्बुध्य, शंभू, चण्ड तथा भव।

18. शिव का विरोधाभासिक परिवार

शिवपुत्र कार्तिकेय का वाहन मयूर है, जबकि शिव के गले में वासुकि नाग है। स्वभाव से मयूर और नाग आपस में दुश्मन हैं। इधर गणपति का वाहन चूहा है, जबकि सांप मूषकभक्षी जीव है। पार्वती का वाहन शेर है, लेकिन शिवजी का वाहन तो नंदी बैल है। इस विरोधाभास या वैचारिक भिन्नता के बावजूद परिवार में एकता है।

19. ति‍ब्बतस्थित कैलाश पर्वत पर उनका निवास है। जहां पर शिव विराजमान हैं उस पर्वत के ठीक नीचे पाताल लोक है जो भगवान विष्णु का स्थान है। शिव के आसन के ऊपर वायुमंडल के पार क्रमश: स्वर्ग लोक और फिर ब्रह्माजी का स्थान है।

20.शिव भक्त :ब्रह्मा, विष्णु और सभी देवी-देवताओं सहित भगवान राम और कृष्ण भी शिव भक्त है। हरिवंश पुराण के अनुसार, कैलास पर्वत पर कृष्ण ने शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी। भगवान राम ने रामेश्वरम में शिवलिंग स्थापित कर उनकी पूजा-अर्चना की थी।

21.शिव ध्यान :शिव की भक्ति हेतु शिव का ध्यान-पूजन किया जाता है। शिवलिंग को बिल्वपत्र चढ़ाकर शिवलिंग के समीप मंत्र जाप या ध्यान करने से मोक्ष का मार्ग पुष्ट होता है।

22.शिव मंत्र :दो ही शिव के मंत्र हैं पहला- ॐ नम: शिवाय। दूसरा महामृत्युंजय मंत्र- ॐ ह्रौं जू सः। ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जू ह्रौं ॐ ॥ है।

23.शिव व्रत और त्योहार :सोमवार, प्रदोष और श्रावण मास में शिव व्रत रखे जाते हैं। शिवरात्रि और महाशिवरात्रि शिव का प्रमुख पर्व त्योहार है।

24.शिव प्रचारक :भगवान शंकर की परंपरा को उनके शिष्यों बृहस्पति, विशालाक्ष (शिव), शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज, अगस्त्य मुनि, गौरशिरस मुनि, नंदी, कार्तिकेय, भैरवनाथ आदि ने आगे बढ़ाया। इसके अलावा वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, बाण, रावण, जय और विजय ने भी शैवपंथ का प्रचार किया। इस परंपरा में सबसे बड़ा नाम आदिगुरु भगवान दत्तात्रेय का आता है। दत्तात्रेय के बाद आदि शंकराचार्य, मत्स्येन्द्रनाथ और गुरु गुरुगोरखनाथ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।

25.शिव महिमा :शिव ने कालकूट नामक विष पिया था जो अमृत मंथन के दौरान निकला था। शिव ने भस्मासुर जैसे कई असुरों को वरदान दिया था। शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था। शिव ने गणेश और राजा दक्ष के सिर को जोड़ दिया था। ब्रह्मा द्वारा छल किए जाने पर शिव ने ब्रह्मा का पांचवां सिर काट दिया था।

26.शैव परम्परा :दसनामी, शाक्त, सिद्ध, दिगंबर, नाथ, लिंगायत, तमिल शैव, कालमुख शैव, कश्मीरी शैव, वीरशैव, नाग, लकुलीश, पाशुपत, कापालिक, कालदमन और महेश्वर सभी शैव परंपरा से हैं। चंद्रवंशी, सूर्यवंशी, अग्निवंशी और नागवंशी भी शिव की परंपरा से ही माने जाते हैं। भारत की असुर, रक्ष और आदिवासी जाति के आराध्य देव शिव ही हैं। शैव धर्म भारत के आदिवासियों का धर्म है।

27.शिव के प्रमुख नाम :शिव के वैसे तो अनेक नाम हैं जिनमें 108 नामों का उल्लेख पुराणों में मिलता है लेकिन यहां प्रचलित नाम जानें- महेश, नीलकंठ, महादेव, महाकाल, शंकर, पशुपतिनाथ, गंगाधर, नटराज, त्रिनेत्र, भोलेनाथ, आदिदेव, आदिनाथ, त्रियंबक, त्रिलोकेश, जटाशंकर, जगदीश, प्रलयंकर, विश्वनाथ, विश्वेश्वर, हर, शिवशंभु, भूतनाथ और रुद्र।

28.अमरनाथ के अमृत वचन :शिव ने अपनी अर्धांगिनी पार्वती को मोक्ष हेतु अमरनाथ की गुफा में जो ज्ञान दिया उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएं हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। 'विज्ञान भैरव तंत्र' एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है।

29.शिव ग्रंथ :वेद और उपनिषद सहित विज्ञान भैरव तंत्र, शिव पुराण और शिव संहिता में शिव की संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है। तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है।

30.शिवलिंग :वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है, उसे लिंग कहते हैं। इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही लिंग की प्रतीक है। वस्तुत: यह संपूर्ण सृष्टि बिंदु-नाद स्वरूप है। बिंदु शक्ति है और नाद शिव। बिंदु अर्थात ऊर्जा और नाद अर्थात ध्वनि। यही दो संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है। इसी कारण प्रतीक स्वरूप शिवलिंग की पूजा-अर्चना है।

31.बारह ज्योतिर्लिंग :सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ॐकारेश्वर, वैद्यनाथ, भीमशंकर, रामेश्वर, नागेश्वर, विश्वनाथजी, त्र्यम्बकेश्वर, केदारनाथ, घृष्णेश्वर। ज्योतिर्लिंग उत्पत्ति के संबंध में अनेकों मान्यताएं प्रचलित है। ज्योतिर्लिंग यानी 'व्यापक ब्रह्मात्मलिंग' जिसका अर्थ है 'व्यापक प्रकाश'। जो शिवलिंग के बारह खंड हैं। शिवपुराण के अनुसार ब्रह्म, माया, जीव, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ज्योतिर्लिंग या ज्योति पिंड कहा गया है। दूसरी मान्यता अनुसार शिव पुराण के अनुसार प्राचीनकाल में आकाश से ज्‍योति पिंड पृथ्‍वी पर गिरे और उनसे थोड़ी देर के लिए प्रकाश फैल गया। इस तरह के अनेकों उल्का पिंड आकाश से धरती पर गिरे थे। भारत में गिरे अनेकों पिंडों में से प्रमुख बारह पिंड को ही ज्‍योतिर्लिंग में शामिल किया गया।
32.शिव का दर्शन :शिव के जीवन और दर्शन को जो लोग यथार्थ दृष्टि से देखते हैं वे सही बुद्धि वाले और यथार्थ को पकड़ने वाले शिवभक्त हैं, क्योंकि शिव का दर्शन कहता है कि यथार्थ में जियो, वर्तमान में जियो, अपनी चित्तवृत्तियों से लड़ो मत, उन्हें अजनबी बनकर देखो और कल्पना का भी यथार्थ के लिए उपयोग करो। आइंस्टीन से पूर्व शिव ने ही कहा था कि कल्पना ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

33.शिव और शंकर :शिव का नाम शंकर के साथ जोड़ा जाता है। लोग कहते हैं– शिव, शंकर, भोलेनाथ। इस तरह अनजाने ही कई लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के दो नाम बताते हैं। असल में, दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं। शंकर को हमेशा तपस्वी रूप में दिखाया जाता है। कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए दिखाया गया है। अत: शिव और शंकर दो अलग अलग सत्ताएं है। हालांकि शंकर को भी शिवरूप माना गया है। माना जाता है कि महेष (नंदी) और महाकाल भगवान शंकर के द्वारपाल हैं। रुद्र देवता शंकर की पंचायत के सदस्य हैं।

34.देवों के देव महादेव :देवताओं की दैत्यों से प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी। ऐसे में जब भी देवताओं पर घोर संकट आता था तो वे सभी देवाधिदेव महादेव के पास जाते थे। दैत्यों, राक्षसों सहित देवताओं ने भी शिव को कई बार चुनौती दी, लेकिन वे सभी परास्त होकर शिव के समक्ष झुक गए इसीलिए शिव हैं देवों के देव महादेव। वे दैत्यों, दानवों और भूतों के भी प्रिय भगवान हैं। वे राम को भी वरदान देते हैं और रावण को भी।

35.शिव हर काल में :भगवान शिव ने हर काल में लोगों को दर्शन दिए हैं। राम के समय भी शिव थे। महाभारत काल में भी शिव थे और विक्रमादित्य के काल में भी शिव के दर्शन होने का उल्लेख मिलता है। भविष्य पुराण अनुसार राजा हर्षवर्धन को भी भगवान शिव ने दर्शन दिए थे।
🙏ॐ नमः शिवाय🙏।    हर हर महादेव जी।

हिंदुत्व - एक जीवनपद्धति

हिंदुत्व - एक जीवनपद्धति

आज से लगभग 6000 वर्ष पहले सम्पूर्ण विश्व में केवल एक ही धर्म था जिसका नाम सनातन धर्म धर्म था और जिसे वैदिक धर्म भी कहा जाता था | सनातन वैदिक धर्म का सीधा मतलब यही था कि  वेदों में बताये गये तरीके से जीवन जीना | वैदिक मार्ग जो जो मानव जीवन को हर तरह से उत्कर्ष पर ले जाने का एकमात्र माध्यम था और है | तब सम्पूर्ण विश्व में केवल दो जातियाँ थी एक आर्य जो वेदमार्गी थे दूसरे अनार्य जो वेद का अनुसरण नही करते थे |
सवाल उठता है की वेद क्या हैं?  इन्हें किसने लिखा?
वेद जो कि सनातन धर्म का मूल हैं सर्वशक्तिमान ईश्वर से अपने आप प्रकट ग्रंथ हैं जिनका रचयिता कोई नहीं है वे परमात्मा से प्रकट भगवद् अंश हैं | लोगों में गलतफहमी है कि महर्षि वेद व्यास जी ने वेदों की रचना की |जबकि सत्यता यह है कि वेद महर्षि वेद व्यास के जन्म के हजारों लाखों साल पहले से ही उपलब्ध हैं |हमारी परम्परा में वेदों को भगवान से उत्पन्न होने के कारण वेद भगवान कहा जाता है उसमें कही गयी हर बात को भगवान की बात माना जाता है |
चूंकि वेदमार्ग का पालन कठिन है और मानवता की सहज प्रवृति है कि सरल की तरफ आकर्षित होना इसलिए लोग वेदमार्ग को त्यागते गये|
हमारे वेद सम्पूर्ण ज्ञान विज्ञान के उद्गम स्थल हैं | वेदों से अनेक उपनिषद निकले हैं | वेदों से अठारह पुराण निकले हैं | अनेक अन्य ग्रंथ जो कि हमारे महान विद्वान महर्षियों द्वारा रचे गये हैं वे वेदों को प्रमाण मानकर ही लिखे गये हैं | जो ज्ञान विज्ञान पूर्व में रहा, या वर्तमान में है अथवा भविष्य में होगा अगर हम खोज सकें तो वेदों में पहले से मिलेगा| चूंकि वेद संस्कृत भाषा में हैं और संस्कृत भाषा के प्रामाणिक विद्वानो की दिनोदिन कमी हो रही है अत: वेदों को पढना समझना बहुत कठिन है |कुछ लोग अनर्गल व्याख्या करके उसमें त्रुटि पैदा करने का षडयंत्र रच रहे हैं |
अनेक आघातों को सहते हुये भी हमारी संस्कृति हमारी परंपरा अगर अबतक बची है तो उसका एकमात्र कारण है हमारी अत्यंत पवित्र गुरू शिष्य परंपरा |गुरू शिष्य परंपरा में गुरू अपने योग्य शिष्य को योग्यतानुसार अपने आचार्यों से प्राप्त तथा खुद के आत्मचिंतन से तैयार ज्ञान विज्ञान अपने शिष्य को प्रदान करता है तथा शिष्य उसे कालक्रम में आगे बढाता है | मैकाले ने इस परंपरा को सुनियोजित तरीके से खत्म करने का षडयंत्र रचा जिसके तहत आज की आधुनिक शिक्षा प्रणाली विकसित की गयी|
विंध्याचल और हिमालय पर्वत के बीच की जगह को प्राचीन काल में आर्यावर्त कहा जाता था हिमालय के उत्तर को सिंध कहा जाता था | जब अंग्रेज आये तो उन्होने हिमालय और हिंद महासागर के बीच के क्षेत्र को हिंद कहा और यहां पर रहने वाले लोगों को हिंदू कहा हिंद शब्द धीरे धीरे इंड हो गया और इस इस क्षेत्र का नाम इंडिया हो गया |
हिंदू जो कि मूल रूप से सनातन धर्म की आधुनिक रूपांतरण है और हिंदुत्व उस महान परंपरा की जीवन शैली है| हमारे धर्म ग्रंथों में जीवन के हर पहलू को वैज्ञानिक, सामाजिक, सामयिक और तार्किक तरीके से समझाया गया है | हमारे ग्रंथ हमें सुबह सोकर उठने से लेकर रात में सोने तक कौन सा कार्य कैसे करना है बताते हैं |हमें कैसे सोना चाहिए, कैसे जागना चाहिए, कैसे बोलना चाहिए, कैसे सुनना चाहिए, कैसे चलना चाहिए , कैसे रूकना चाहिये ,कैसे खाना चाहिये, क्या खाना चाहिए, क्यों खाना चाहिए, किससे दूर रहना चाहिए, किसके संग रहना चाहिए, कब कब क्या करना चाहिए, कब कब क्या क्या नहीं करना चाहिए आदि अनेक बातों को अत्यंत वैज्ञानिक आधार पर बताते हैं |हमारे यहां पानी पीने खाना खाने से लेकर मलमूत्र विसर्जन तक की विधि ग्रंथों में बताई गयी है |हमारे पूर्वज इसी परंपरा से जीवन जीने के अभ्यस्त थे जिन्हें हिंदू तथा जिनकी जीवन पद्धति को हिन्दुत्व कहा गया |हमारी हिंदुत्व परंपरा विश्व की सबसे प्राचीन परंपरा है |दुनिया की समस्त सभ्यताओं ने हमसे कुछ न कुछ सीखा जरूर है | हमारी सभ्यता दुनिया में सबसे ज्यादा आघात सहने वाली सभ्यता है |दुनिया में कितनी सभ्यतायें बनी और मिट गयीं एक मात्र हिंदुत्व की सभ्यता है जो सनातन काल से आजतक अपना गौरव बचाने में समर्थ रही है जो कि श्रेष्ठ है |
हमारी सामर्थ्य का प्रमाण यह है कि हम अनंत आघातो को सहकर भी बचे हैं |
विश्व में कोई सभ्यता तभी चिर काल तक टिकती है जब वह वैज्ञानिक, तार्किक, दार्शनिक, भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक और सामयिक परिस्थितियों को आत्मसात कर अपनी प्रासंगिकता को प्रमाणित करती है और हमारा हिन्दुत्व इसपर शत् प्रतिशत खरा उतरता है |
हमारी समृद्धि का प्रमाण यह है कि विश्व की समस्त सभ्यताओं ने हमसे कुछ न कुछ सीखा जरूर है |
हमरी श्रेष्ठता का प्रमाण यह है कि सबने हमको मिटाने की कोशिश की परंतु हम बचे हैं |
हमारी सहिष्णुता का प्रमाण यह है कि हमने किसी पर आक्रमण नही किया |
हमारी उदारता का प्रमाण यह है कि हमने सबको स्वीकार किया |
जहां आज तथाकथित आधुनिक पश्चिमी सभ्यता दुनिया को बाजार मानती है वहीं हमारा हिंदुत्व दुनिया को परिवार मानता है |हिंदू दुनिया की एकमात्र ऐसी कौम है जो समस्त धर्मों के धर्मस्थलों पर जाती है सबको समान आदर देती है |हमारे यहाँ पेड़ पौधे पर्वत पठार पशु पक्षी नदी सागर स्त्री पुरुष सबको भगवान मानकर पूजा जाता है |हम विश्व बंधुत्व की अवधारणा को मानते हैं |हमने कण कण में भगवान को माना है |हमारे यहाँ अनेक मान्यताएँ है सगुण भी निर्गुण भी, मायावादी भी हैं तत्ववादी भी सबको बराबर सम्मान मिलता है |अनंत काल से अनेक सभ्यतायें बनी और नष्ट हुईं परंतु सनातन वैदिक सभ्यता जिसे कालांतर में हिंदुत्व कहा गया तब भी थी आज भी है और भविष्य में भी रहेगी |हमें अपने हिंदू होने पर और अपने हिंदुत्व पर गौरवान्वित होना चाहिए |

भारत भूमि की शास्त्रीय महिमा

हम कितने भाग्यशाली हैं कि हमें भारत की पवित्र भूमि पर जन्म मिला इसका व्याख्यान विष्णुपुराण में है ।

विष्णु पुराण के रचनाकार पराशर ऋषि थे, ये महर्षि वसिष्ठ के पौत्र थे, इस पुराण में पृथु, ध्रुव और प्रह्लाद के प्रसंग अत्यन्त रोचक हैं। 'पृथु' के वर्णन में धरती को समतल करके कृषि कर्म करने की प्रेरणा दी गई है, कृषि-व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त करने पर ज़ोर दिया गया है, घर-परिवार, ग्राम, नगर, दुर्ग आदि की नींव डालकर परिवारों को सुरक्षा प्रदान करने की बात कही गई है।

इसी कारण धरती को पृथ्वी नाम दिया गया, ध्रुव के आख्यान में सांसारिक सुख, ऐश्वर्य, धन-सम्पत्ति आदि को क्षण भंगुर अर्थात् नाशवान समझकर आत्मिक उत्कर्ष की प्रेरणा दी गई है, प्रह्लाद के प्रकरण में परोपकार तथा संकट के समय भी सिद्धांतों और आदर्शों को न त्यागने की बात कही गई है।

विष्णु पुराण में भगवान् श्रीकृष्ण के समाज सेवी, प्रजा प्रेमी, लोक रंजक तथा लोक हिताय स्वरूप को प्रकट करते हुए उन्हें महामानव की संज्ञा दी गई है, श्रीकृष्ण ने प्रजा को संगठन-शक्ति का महत्त्व समझाया और अन्याय का प्रतिकार करने की प्रेरणा दी, अधर्म के विरुद्ध धर्म-शक्ति का परचम लहराया, महाभारत में कौरवों का विनाश और कालिया दहन में नागों का संहार उनकी लोकोपकारी छवि को प्रस्तुत करता है,

भगवान् श्रीकृष्ण के जीवन की लोकोपयोगी घटनाओं को अलौकिक रूप देना उस महामानव के प्रति भक्ति-भावना की प्रतीक है, इस पुराण में श्रीकृष्ण चरित्र के साथ-साथ भक्ति और वेदान्त के उत्तम सिद्धान्तों का भी प्रतिपादन हुआ है, विष्णु पुराण में आत्मा को जन्म-मृत्यु से रहित, निर्गुण और अनन्त बताया गया है, समस्त प्राणियों में उसी आत्मा का निवास है।

ईश्वर का भक्त वही होता है जिसका चित्त शत्रु और मित्र और मित्र में समभाव रखता है, दूसरों को कष्ट नहीं देता, कभी व्यर्थ का गर्व नहीं करता और सभी में ईश्वर का वास समझता है, वह सदैव सत्य का पालन करता है और कभी असत्य नहीं बोलता, इस पुराण में प्राचीन काल के राजवंशों का वृत्तान्त लिखते हुए कलियुगी राजाओं को चेतावनी दी गई है कि सदाचार से ही प्रजा का मन जीता जा सकता है, पापमय आचरण से नहीं,

जो सदा सत्य का पालन करता है, सबके प्रति मैत्री भाव रखता है और दुख-सुख में सहायक होता है वही राजा श्रेष्ठ होता है, राजा का धर्म प्रजा का हित संधान और रक्षा करना होता है, जो राजा अपने स्वार्थ में डूबकर प्रजा की उपेक्षा करता है और सदा भोग-विलास में डूबा रहता है, उसका विनाश समय से पूर्व ही हो जाता है, इस पुराण में स्त्रियों, साधुओं और शूद्रों को श्रेष्ठ माना गया है।

जो स्त्री अपने तन-मन से पति की सेवा तथा सुख की कामना करती है, उसे कोई अन्य कर्मकाण्ड किये बिना ही सद्गति प्राप्त हो जाती है, इसी प्रकार शूद्र भी अपने कर्त्तव्यों का पालन करते हुए वह सब प्राप्त कर लेते हैं, जो ब्राह्मणों को विभिन्न प्रकार के कर्मकाण्ड और तप आदि से प्राप्त होता है, कहा गया है-

शूद्रोश्च द्विजशुश्रुषातत्परैद्विजसत्तमा:।
तथा द्भिस्त्रीभिरनायासात्पतिशुश्रुयैव हि।।

अर्थात शूद्र ब्राह्मणों की सेवा से और स्त्रियां प्रति की सेवा से ही धर्म की प्राप्ति कर लेती हैं, विष्णु पुराण के अन्तिम तीन अध्यायों में आध्यात्मिक चर्चा करते हुए त्रिविध ताप, परमार्थ और ब्रह्मयोग का ज्ञान कराया गया है, मानव-जीवन को सर्वश्रेष्ठ माना गया है, इसके लिए देवता भी लालायित रहते हैं, जो मनुष्य माया-मोह के जाल से मुक्त होकर कर्त्तव्य पालन करता है, उसे ही इस जीवन का लाभ प्राप्त होता है।

निष्काम कर्म और ज्ञान मार्ग का उपदेश भी इस पुराण में दिया गया है, लौकिक कर्म करते हुए भी धर्म पालन किया जा सकता है, कर्म मार्ग और धर्म मार्ग दोनों को ही श्रेष्ठ माना गया है, कर्त्तव्य करते हुए व्यक्ति चाहे घर में रहे या वन में, वह ईश्वर को अवश्य प्राप्त कर लेता है, भारतवर्ष को कर्मभूमि कहकर उसकी महिमा का सुंदर बखान करते हुए पुराणकार कहता है।

इत: स्वर्गश्च मोक्षश्च मध्यं चान्तश्च गम्यते।
न खल्वन्यत्र मर्त्यानां कर्मभूमौ विधीयते।।

अर्थात यहीं से स्वर्ग, मोक्ष, अन्तरिक्ष अथवा पाताल लोक पाया जा सकता है, इस देश के अतिरिक्त किसी अन्य भूमि पर मनुष्यों पर मनुष्यों के लिए कर्म का कोई विधान नहीं है, इस कर्मभूमि की भौगोलिक रचना के विषय में कहा गया है- "उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्, वर्ष तद्भारतं नाम भारती यत्र संतति" अर्थात समुद्र कें उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में जो पवित्र भूभाग स्थित है, उसका नाम भारतवर्ष है, भारत भूमि की वन्दना के लिए विष्णु पुराण का यह पद विख्यात है।

गायन्ति देवा: किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारत भूमिभागे।
स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूय: पुरुषा: सुरत्वात्।।
कर्माण्ड संकल्पित तवत्फलानि संन्यस्य विष्णौ परमात्मभूते।
अवाप्य तां कर्ममहीमनन्ते तस्मिंल्लयं ये त्वमला: प्रयान्ति।।

अर्थात देवगण निरन्तर यही गान करते हैं कि जिन्होंने स्वर्ग और मोक्ष के मार्ग् पर चलने के लिए भारतभूमि में जन्म लिया है, वे मनुष्य हम देवताओं की अपेक्षा अधिक धन्य तथा भाग्यशाली हैं, जो लोग इस कर्मभूमि में जन्म लेकर समस्त आकांक्षाओं से मुक्त अपने कर्म परमात्मा स्वरूप भगवान् श्रीविष्णु को अर्पण कर देते हैं।

वे पाप रहित होकर निर्मल हृदय से उस अनन्त परमात्म शक्ति में लीन हो जाते हैं, ऐसे लोग धन्य होते हैं, विष्णु पुराण में कलयुग में भी सदाचरण पर बल दिया गया है, विष्णु पुराण का आकार छोटा अवश्य है, परंतु मानवीय हित की दृष्टि से यह पुराण अत्यन्त लोकप्रिय और महत्त्वपूर्ण है ।

शुक्रवार, 11 जनवरी 2019

शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति उपदेश

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नवधा भक्ति कहेउ तोहि पाही।
        सावधान सुनी धरु मन माहि।।🚩

      निर्मल मन जन सो मोय पावा
       मोय कपट छल छिद्र न भावा।🚩

      सरसिज लोचन बाहु बिसाला।
        जटा मुकुट सिर उर बनमाला॥🚩

            स्याम गौर सुंदर दोउ भाई।
                 सबरी परी चरन लपटाई॥4॥🚩

           प्रेम मगन मुख बचन न आवा।
            पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा॥🚩
     
         अधम ते अधम अधम अति नारी।
                तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी॥🚩

         कह रघुपति सुनु भामिनि बाता।
              मानउँ एक भगति कर नाता॥2॥🚩

         सादर जल लै चरन पखारे।
             पुनि सुंदर आसन बैठारे॥🚩

🚩➖शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति उपदेश➖🚩

इस प्रसंग में तुलसीदासजी ने श्रीरामचरित मानस में प्रभु श्री राम और शवरी का मिलन और शवरी को नवधा भक्ति का उपदेश बड़े सरल भाषा में अपनी चौपाइयों के द्वारा बर्णन किया है । जो इस प्रसंग को अपने दिल से पढ़ता और सुनता है उसका मन माया से हटकर प्रभु के चरणों में भक्ति में लगने लगता है ।प्रयेक व्यक्ति को नवधा भक्ति को जरूर पढ़ना चाहिए।🚩

ताहि देइ गति राम उदारा।
       सबरी कें आश्रम पगु धारा॥
        सबरी देखि राम गृहँ आए।
            मुनि के बचन समुझि जियँ भाए॥3॥🚩

भावार्थ : उदार श्री रामजी उसे गति देकर शबरीजी के आश्रम में पधारे। शबरीजी ने श्री रामचंद्रजी को घर में आए देखा, तब मुनि मतंगजी के वचनों को याद करके उनका मन प्रसन्न हो गया॥॥🚩

 सरसिज लोचन बाहु बिसाला।
        जटा मुकुट सिर उर बनमाला॥
            स्याम गौर सुंदर दोउ भाई।
                 सबरी परी चरन लपटाई॥4॥🚩

भावार्थ : कमल सदृश नेत्र और विशाल भुजाओं वाले, सिर पर जटाओं का मुकुट और हृदय पर वनमाला धारण किए हुए सुंदर, साँवले और गोरे दोनों भाइयों के चरणों में शबरीजी लिपट पड़ीं॥🚩

 प्रेम मगन मुख बचन न आवा।
       पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा॥
          सादर जल लै चरन पखारे।
             पुनि सुंदर आसन बैठारे॥॥🚩

भावार्थ : वे प्रेम में मग्न हो गईं, मुख से वचन नहीं निकलता। बार-बार चरण-कमलों में सिर नवा रही हैं। फिर उन्होंने जल लेकर आदरपूर्वक दोनों भाइयों के चरण धोए और फिर उन्हें सुंदर आसनों पर बैठाया॥॥

दोहा :
* कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि।
प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि॥॥🚩

भावार्थ : उन्होंने अत्यंत रसीले और स्वादिष्ट कन्द, मूल और फल लाकर श्री रामजी को दिए। प्रभु ने बार-बार प्रशंसा करके उन्हें प्रेम सहित खाया॥🚩

 पानि जोरि आगें भइ ठाढ़ी।
      प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी॥
        केहि बिधि अस्तुति करौं तुम्हारी।
          अधम जाति मैं जड़मति भारी॥1॥🚩

भावार्थ : फिर वे हाथ जोड़कर आगे खड़ी हो गईं। प्रभु को देखकर उनका प्रेम अत्यंत बढ़ गया। (उन्होंने कहा-) मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ? मैं नीच जाति की और अत्यंत मूढ़ बुद्धि हूँ॥1॥🚩

 अधम ते अधम अधम अति नारी।
             तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी॥
         कह रघुपति सुनु भामिनि बाता।
         मानउँ एक भगति कर नाता॥॥🚩

भावार्थ : जो अधम से भी अधम हैं, स्त्रियाँ उनमें भी अत्यंत अधम हैं, और उनमें भी हे पापनाशन! मैं मंदबुद्धि हूँ। श्री रघुनाथजी ने कहा- हे भामिनि! मेरी बात सुन! मैं तो केवल एक भक्ति ही का संबंध मानता हूँ॥2॥🚩

 जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई।
      धन बल परिजन गुन चतुराई॥
            भगति हीन नर सोहइ कैसा।
                  बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥3॥🚩

भावार्थ : जाति, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता- इन सबके होने पर भी भक्ति से रहित मनुष्य कैसा लगता है, जैसे जलहीन बादल (शोभाहीन) दिखाई पड़ता है॥॥

नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं।
          सावधान सुनु धरु मन माहीं॥
             प्रथम भगति संतन्ह कर संगा।
                 दूसरि रति मम कथा प्रसंगा॥॥🚩

भावार्थ : मैं तुझसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूँ। तू सावधान होकर सुन और मन में धारण कर। पहली भक्ति है संतों का सत्संग। दूसरी भक्ति है मेरे कथा प्रसंग में प्रेम॥4॥🚩

दोहा :
* गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान॥35॥🚩

भावार्थ : तीसरी भक्ति है अभिमानरहित होकर गुरु के चरण कमलों की सेवा और चौथी भक्ति यह है कि कपट छोड़कर मेरे गुण समूहों का गान करें॥॥🚩

चौपाई :
 मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा।
       पंचम भजन सो बेद प्रकासा॥
       छठ दम सील बिरति बहु करमा।
             निरत निरंतर सज्जन धरमा॥1॥🚩

भावार्थ : मेरे (राम) मंत्र का जाप और मुझमें दृढ़ विश्वास- यह पाँचवीं भक्ति है, जो वेदों में प्रसिद्ध है। छठी भक्ति है इंद्रियों का निग्रह, शील (अच्छा स्वभाव या चरित्र), बहुत कार्यों से वैराग्य और निरंतर संत पुरुषों के धर्म (आचरण) में लगे रहना॥1॥🚩

सातवँ सम मोहि मय जग देखा।
       मोतें संत अधिक करि लेखा॥
          आठवँ जथालाभ संतोषा।
              सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा॥॥🚩

भावार्थ : सातवीं भक्ति है जगत्‌ भर को समभाव से मुझमें ओतप्रोत (राममय) देखना और संतों को मुझसे भी अधिक करके मानना। आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाए, उसी में संतोष करना और स्वप्न में भी पराए दोषों को न देखना॥2॥🚩

नवम सरल सब सन छलहीना।
          मम भरोस हियँ हरष न दीना॥
        नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई।
            नारि पुरुष सचराचर कोई॥॥🚩

भावार्थ : नवीं भक्ति है सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और दैन्य (विषाद) का न होना। इन नवों में से जिनके एक भी होती है, वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो-॥3॥🚩

सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें।
        सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें॥
        जोगि बृंद दुरलभ गति जोई।
           तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई॥॥🚩

भावार्थ : हे भामिनि! मुझे वही अत्यंत प्रिय है। फिर तुझ में तो सभी प्रकार की भक्ति दृढ़ है। अतएव जो गति योगियों को भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिए सुलभ हो गई है॥4॥🚩

*मम दरसन फल परम अनूपा।
      जीव पाव निज सहज सरूपा॥
           जनकसुता कइ सुधि भामिनी।
                जानहि कहु करिबरगामिनी॥॥🚩

भावार्थ : मेरे दर्शन का परम अनुपम फल यह है कि जीव अपने सहज स्वरूप को प्राप्त हो जाता है। हे भामिनि! अब यदि तू गजगामिनी जानकी की कुछ खबर जानती हो तो बता॥5॥🚩

 पंपा सरहि जाहु रघुराई।
     तहँ होइहि सुग्रीव मिताई॥
      सो सब कहिहि देव रघुबीरा।
        जानतहूँ पूछहु मतिधीरा॥॥🚩

भावार्थ : (शबरी ने कहा-) हे रघुनाथजी! आप पंपा नामक सरोवर को जाइए। वहाँ आपकी सुग्रीव से मित्रता होगी। हे देव! हे रघुवीर! वह सब हाल बतावेगा। हे धीरबुद्धि! आप सब जानते हुए भी मुझसे पूछते हैं!॥6॥🚩
*बार बार प्रभु पद सिरु नाई।
     प्रेम सहित सब कथा सुनाई॥॥🚩

भावार्थ : बार-बार प्रभु के चरणों में सिर नवाकर, प्रेम सहित उसने सब कथा सुनाई॥7॥🚩

छंद :
* कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदय पद पंकज धरे।
तजि जोग पावक देह परि पद लीन भइ जहँ नहिं फिरे॥
नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू।
बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागहू॥
भावार्थ : सब कथा कहकर भगवान्‌ के मुख के दर्शन कर, उनके चरणकमलों को धारण कर लिया और योगाग्नि से देह को त्याग कर (जलाकर) वह उस दुर्लभ हरिपद में लीन हो गई, जहाँ से लौटना नहीं होता। तुलसीदासजी कहते हैं कि अनेकों प्रकार के कर्म, अधर्म और बहुत से मत- ये सब शोकप्रद हैं, हे मनुष्यों! इनका त्याग कर दो और विश्वास करके श्री रामजी के चरणों में प्रेम करो।🚩

छंद :
* जाति हीन अघ जन्म महि मुक्त कीन्हि असि नारि।
महामंद मन सुख चहसि ऐसे प्रभुहि बिसारि॥36॥
भावार्थ : जो नीच जाति की और पापों की जन्मभूमि थी, ऐसी स्त्री को भी जिन्होंने मुक्त कर दिया, अरे महादुर्बुद्धि मन! तू ऐसे प्रभु को भूलकर सुख चाहता है?॥॥🚩

🚩जय हो प्रभु राम की➖ जय हो दीनानाथ🚩

मंगलवार, 8 जनवरी 2019

राजा पुरंजन की कथा

संत नारदजी कहते हैं- एक पुरंजन नाम का राजा था, पुरंजन के सखा का नाम था अविज्ञात, मैं जरा स्पस्ट करता चलूं, आप सभी पुरंजन है और मैं भी पुरंजन हूँ और हमारे सखा का नाम है अविज्ञात, "न ज्ञातुं यः सः अविज्ञात" जो किसी के द्वारा जाना नहीं जा सकता, उसे अविज्ञान कहते है।
एक बार इस पुरंजन राजा ने अविज्ञात सखा को साथ में लिया और किसी सुंदरनगर की तलाश में निकला, कोई नगर इसे पसंद नहीं आया, तब उसने हिमालय की दक्षिण दिशा में एक नौ दरवाजे वाले नगर को देखा, गीता में लिखा है- "नवद्वारे पुरेदेहि" नौ दरवाजे का नगर ही हमारा शरीर है।

शरीर मैं नौ द्वार होते हैं- दो कान, दो आंखे, दो नासाछिद्र, एक मुख और उपस्थ, इन्द्रि (मलद्वार मूत्र द्वार) है, इस प्रकार शरीर में नौ द्वार है, इस पुरंजन नाम के जीव ने शरीर रूपी नगर में प्रवेश किया, जैसे ही नगर के अन्दर गया, एक परम सुन्दरी नारी को देखा, नगर के भीतर बैठी थी।
जीव ने पूछा- देवी, आपका परिचय क्या है? नारी बोली- मेरा क्या परिचय है ये तो मैं भी नहीं जानती, लेकिन मुझे अपने साथ में रखोगे तो मैं तुम्हारा सहयोग जरूर करूंगी, तो उस पुरंजन जीव ने उसका नाम रख दिया पुरंजनी, उसी नारी को हम कहते है बुद्धि, ये बुद्धि हमारे नगर की स्वामिनी है, लेकिन अकेली नहीं थी, उस नारी के साथ दस सहेलीयां है।

पांच ज्ञानेन्दरियां और पांच करमेंन्द्रियां, नगर में जब अन्दर गया तो डंडा लेकर बैठा था विशूचीन, जिसे हम मन कहते है, जब जीव ने बुद्धि रूपी पुरंजनी से विवाह कर लिया तो वो खाती तो खाता, वो रोती तो रोता, वो सोती तो सोता उसके वश में हो गया पुरंजन नाम का जीव, नगर में वास कर रहा है।
रात्रि में इस देह रूपी नगरी में रहने वाले सब लोग सो जाते है, बुद्धि और उसकी दस सहेलियां भी, पर इस नगर का प्रधान द्वार है न इस पर एक पांच फण का नाग बैठा रहता है, ये कभी सोता नहीं है, इस पांच फण के नाग का नाम है पंचप्राण! प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान।
रात्रि में जब हम सो जाते है तो सब इन्द्रियां भी सो जाती है, लेकिन ये प्राण कभी नहीं सोते और यदि ये एक मिनट के लिए भी सो जाये न तो फिर बेटा भी कहेगा, जल्दी नीचे उतारो दुर्गन्धि आ जायेगी, जल्दी ले चलो, एक मिनट भी घर में नहीं रखना चाहते।

नगरी के सामने एक राजा रहता है, उस राजा का नाम है चंडवेगा, चंडवेग कहते है काल को, इसने पूरी सेना लेकर नगर पर चढ़ाई कर दी, सेना में सात सौ बीस गंधर्व और गंधर्वियां है, सालभर के जो तीन सौ साठ दिन है वो गंधर्व है, तीन सौ साठ रात्रियां ही गंधर्वियां है, इन सभी को लेकर चंडवेग राजा ने देह नगरी पर चढ़ाई की।
लेकिन पंचफण का नाग जो पंचप्राण है अकेला लड़ता रहा, नगर को लुटने नहीं दिया, चंडवेग ने कहा- बड़ी विचित्र बात है, ये लुटता ही नहीं, तब एक और काम हुआ, चंडवेग की बेटी का नाम है जरा, जरा यानि बुढ़ापा, उसने अपनी बेटी जरा से कहा- बेटी ये नगर बड़ा मजबूत है, इसे जरा कमजोर बनाओं, जरा, जो बुढ़ापा थी वो गयी।

अब देखो- बूढ़ा बनना कोई चाहता थोड़ी है, ये तो जबरदस्ती आता है, बड़े-बड़े प्रयास किये जाते है बूढ़े नहीं हो जायें लेकिन जबर्दस्ती होते है, मौत की चार घंटी बजती हैं, कौन-कौन सी? मौत की पहली घंटी बजती है- बाल सफेद हो जाना, यदि बाल सफेद हो जायें तो समझो पहली घंटी बज गयी।

मौत कहती है- बड़ा सुगंधी तेल लगाया था, बड़ी जुल्फें निकाली थी, बड़े केशों को संवारा था, अब तो सफेदी आ गयी, माला हाथ में लेकर भजन करों, पर जीव नहीं मानता सज्जनों! ऐसा बढ़िया तेल लगावेगा जो सफेद भी काले हो जायें, कई लोग काली मेंहदी लगाते है, न जाने क्या-क्या? कि कहीं सफेदी न आ जाये, बड़े-बड़े प्रयास करते है, पर भजन नहीं करते।

मौत कहती है पहली घंटी बजी, फिर भी माला हाथ में नहीं ली, मृत्यु देवी की दूसरी घंटी क्या बजी सज्जनों! आँखों से दीखना कम हो गया, मौत कहती है- तुमने बड़ी दुनियां की रंगरेलियां देखीं, बड़े सिनेमा देखे, सुख-दुख देखा, सुनो अब बाहर देखना बंद करो, जरा अन्दर देखना शुरू करो, मैं अन्दर क्या हूँ।
पर जीव नहीं मानता- ऐसा चश्मा लगाता है, लेंस लगवा लेता है, चश्मा की टेक्नोलॉजी तो पुरानी हो गयी, अभी तो लेंस आँखों में ही फिटिंग हो जाता है, चश्मा की जरूरत नहीं, पहले से भी बढ़िया दिखता है पर नहीं करेंगे भजन और नहीं करेंगे कीर्तन, नहीं लेंगे माला, तो मृत्यु देवी की तीसरी घंटी बजी, तीसरी घंटी क्या बजी? बत्तीसों दांत निकलकर बाहर आ गये।

मौत कहती है- तुमने मिर्ची वडा बहुत खाया है, बड़ा चनाजोर गर्म खाता था, अब तो दांत नहीं रहे, दलिया खाकर भजन करो, अब तो गाय का दूध पीकर भजन करो, सात्विक भोजन लेकर भजन करो, परन्तु जीव नहीं मानता- ऐसा बढ़िया सेट बंधवाता है कि मूल दांतो से भी सुन्दर, लेकिन भजन नहीं करता, तो मृत्यु देवी की चौथी घंटी बजी।

चौथी घंटी क्या बजी? कमर तीन जगह से टेढ़ी हो गयी, मौत कहती है बड़े छाती तानकर चलते थे, मैं राजा हूँ, मैं सेठ हूँ, मैं पण्डित हूँ, छाती तानकर दुनियां के सामने चलते थे, भैया- अब कमर झुक गयी, बुढ़ापा आ गया, अब तो झुकना सीखो, अब तो सभी में राम देखकर प्रणाम करना सीखो, कीर्तन शुरू करो गोविन्द का।
लेकिन जीव नहीं मानता सज्जनों! वो च्यवनप्राश खाना शुरू कर देता है, वो शीलाजीत खाता है, स्वर्णभस्म खाता है, मोतीपिस्टी खाता है, नहीं बनूंगा वृद्ध, नहीं करूंगा भजन, चार घंटी बजने के बाद भी जब अक्ल नहीं आयी तो सज्जनों! पाँचवी घंटी बजते ही चला ••• "टेढ़े होकर चलता करते मान गुमान, सो महल खाली पड़े जाय रहे समसान"
जाना है रहना नहिं, जामे फेर न फार।
जन दरिया भय मान के, अपना राम सम्भार।।

नारदजी ने राजा प्राचीनबहि को कहा- यही परिस्थिति राजा पुरंजन की बनी, मृत्यु के समय स्त्री की याद करते मर गया, मरने के बाद उसे स्त्री बनना पड़ा, अपने पति की मृत्यु के बाद जब सती होने को तैयार हुआ तो वही अविज्ञात नाम का सहयात्री सखा आया, आकार उसे समझाते हुए बोला, भले आदमी- न तुम पुरंजन हो ना ही तुम पुरंजनी हो, तुम तो मेरे सखा हो।
ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुखरासी।
सो माया बस भयहुं गोसाई, बंध्यो कीट मर्कट की नांई।।
पुनः नारदजी कहते हैं- जिस पुरंजन की बात मैं तुमसे कह रहा हूँ, ये कोई पुरंजन नहीं प्राचीनबहि तुम्हीं पुरंजन राजा हो, परमात्मा को भूलकर संसार में पड़े हो, इसलिये अपने शरीर के लिए तुम इतने बड़े अत्याचार भी कर लेते हो, जीवों की हत्या भी कर लेते हो।

प्रत्येक परिस्थिति में परमात्मा को याद करो, परमात्मा ने शरीर जो दिया वो केवल विषयों को भोगने को नहीं मिला, ये शरीर मिला है गोविन्द के चिन्तन के लिये, गोविन्द की याद के लिये, इसको बेकार में गुजारोगे तो इससे बड़ी नासमझी क्या हो सकती है? प्रत्येक परिस्थिति में गोविन्द की याद करों।
जिस देश में, जिस वेश में, परिवेश में रहो।
राधा रमन, राधा रमन, राधा रमन कहो।।

नारदजी ने राजा प्राचीनबहि को ऐसा सुन्दर उपदेश किया और वहां से चले गये, राजा को अक्ल आ गई, उसने सदा-सदा के लिए जीवों को मारना छोड़ दिया, इस आख्यान से हमें भी शिक्षा लेनी चाहिये कि हम हिंसा नहीं करें, आचार्य शुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित! श्री मैत्रेय मुनि के मुंह से, इन समस्त प्रसंगों को सुनकर विदुरजी को परमानन्द की अनुभूति हुई, उसके बाद विदुरजी मैत्रेयजी को प्रणाम कर वहां से चले गये।

भगवान अय्यप्पा और सबरीमाला का संक्षिप्त परिचय

भारत के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है
विश्‍व प्रसिद्ध सबरीमाला का मंदिर।
यहां हर दिन लाखों लोग दर्शन करने के लिए आते हैं।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में
 महिलाओं के प्रवेश पर लगा प्रतिबंध हटा दिया है।
करीब 800 साल पुराने इस मंदिर में ये मान्यता
पिछले काफी समय से चल रही थी कि
 महिलाओं को मंदिर में प्रवेश ना करने दिया जाए।
 इसके कुछ कारण बताए गए थे।
आईये जानते हैं
इस मंदिर के इतिहास और स्थिति के बारे में।

कौन थे अयप्पा?
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1.भगवान अयप्पा के पिता शिव और माता मोहिनी हैं।
विष्णु का मोहिनी रूप देखकर भगवान शिव का
वीर्यपात हो गया था।
उनके वीर्य को पारद कहा गया और उनके वीर्य से ही बाद
में सस्तव नामक पुत्र का जन्म का हुआ जिन्हें दक्षिण भारत में अयप्पा कहा गया। शिव और विष्णु से उत्पन होने के कारण उनको '
हरिहरपुत्र' कहा जाता है।
इनके अलावा भगवान अयप्पा को
अयप्पन, शास्ता, मणिकांता नाम से भी जाना जाता है।
इनके दक्षिण भारत में कई मंदिर हैं
उन्हीं में से एक प्रमुख मंदिर है सबरीमाला।
इसे दक्षिण का तीर्थस्थल भी कहा जाता है।
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धार्मिक कथा के मुताबिक समुद्र मंथन के दौरान भोलेनाथ भगवान विष्णु के मोहिनी रूप पर मोहित हो गए थे और इसी के प्रभाव से एक बच्चे का जन्म हुआ जिसे उन्होंने पंपा नदी के तट पर छोड़ दिया। इस दौरान राजा राजशेखरा ने उन्हें 12 सालों तक पाला। बाद में अपनी माता के लिए शेरनी का दूध लाने जंगल गए अयप्पा ने राक्षसी महिषि का भी वध किया।
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2.अय्यप्पा के बारे में किंवदंति है कि
उनके माता-पिता ने उनकी गर्दन के चारों ओर एक
 घंटी बांधकर उन्हें छोड़ दिया था।
पंडालम के राजा राजशेखर ने अय्यप्पा को पुत्र के
 रूप में पाला। लेकिन भगवान अय्यप्पा को ये
सब अच्छा नहीं लगा और उन्हें वैराग्य प्राप्त हुआ तो
 वे महल छोड़कर चले गए।
कुछ पुराणों में अयप्पा स्वामी को शास्ता का
अवतार माना जाता है।
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अयप्पा स्वामी का चमत्कारिक मंदिर :
भारतीय राज्य केरल में शबरीमाला में अयप्पा स्वामी का
प्रसिद्ध मंदिर है, जहां विश्‍वभर से लोग शिव के इस पुत्र के
मंदिर में दर्शन करने के लिए आते हैं।
 इस मंदिर के पास मकर संक्रांति की रात घने अंधेरे में
रह-रहकर यहां एक ज्योति दिखती है।
इस ज्योति के दर्शन के लिए दुनियाभर से
करोड़ों श्रद्धालु हर साल आते हैं।
सबरीमाला का नाम शबरी के नाम पर पड़ा है।
वही शबरी जिसने भगवान राम को जूठे फल खिलाए थे
और राम ने उसे नवधा-भक्ति का उपदेश दिया था।
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बताया जाता है कि जब-जब ये रोशनी दिखती है
इसके साथ शोर भी सुनाई देता है।
भक्त मानते हैं कि ये देव ज्योति है
और भगवान इसे जलाते हैं।
मंदिर प्रबंधन के पुजारियों के मुताबिक मकर माह के
पहले दिन आकाश में दिखने वाले एक खास तारा मकर ज्योति है।
कहते हैं कि अयप्पा ने शैव और वैष्णवों के बीच एकता कायम की।
उन्होंने अपने लक्ष्य को पूरा किया था और
सबरीमाल में उन्हें दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।
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यह मंदिर पश्चिमी घाटी में पहाड़ियों की
श्रृंखला सह्याद्रि के बीच में स्थित है।
घने जंगलों, ऊंची पहाड़ियों और तरह-तरह के
जानवरों को पार करके यहां पहुंचना होता है
इसीलिए यहां अधिक दिनों तक कोई ठहरता नहीं है।
यहां आने का एक खास मौसम और समय होता है।
जो लोग यहां तीर्थयात्रा के उद्देश्य से आते हैं उन्हें
इकतालीस दिनों का कठिन वृहताम का पालन करना होता है।
तीर्थयात्रा में श्रद्धालुओं को ऑक्सीजन से लेकर प्रसाद के
प्रीपेड कूपन तक उपलब्ध कराए जाते हैं।
दरअसल, मंदिर नौ सौ चौदह मीटर की ऊंचाई पर है
और केवल पैदल ही वहां पहुंचा जा सकता है।
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सबरीमाला के महोत्सव :
एक अन्य कथा के अनुसार पंडालम के राजा राजशेखर ने
अय्यप्पा को पुत्र के रूप में गोद लिया।
लेकिन भगवान अय्यप्पा को ये सब अच्छा नहीं लगा और
वो महल छोड़कर चले गए।
आज भी यह प्रथा है कि हर साल मकर संक्रांति के
अवसर पर पंडालम राजमहल से अय्यप्पा के
आभूषणों को संदूकों में रखकर एक भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है।
जो नब्बे किलोमीटर की यात्रा तय करके तीन दिन में
सबरीमाला पहुंचती है। कहा जाता है इसी दिन यहां
एक निराली घटना होती है।
पहाड़ी की कांतामाला चोटी पर असाधारण चमक वाली
ज्योति दिखलाई देती है।
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पंद्रह नवंबर का मंडलम और चौदह जनवरी की
मकर विलक्कू, ये सबरीमाला के प्रमुख उत्सव हैं।
मलयालम पंचांग के पहले पांच दिनों और विशु माह यानी अप्रैल में
ही इस मंदिर के पट खोले जाते हैं।
 इस मंदिर में सभी जाति के लोग जा सकते हैं,
लेकिन दस साल से पचास साल की उम्र की महिलाओं के
प्रवेश पर मनाही है।
 सबरीमाला में स्थित इस मंदिर प्रबंधन का कार्य इस
समय त्रावणकोर देवास्वोम बोर्ड देखती है।
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18 पावन सीढ़ियां
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चारों तरफ से पहाड़ियों से घिरा हुआ यह
मंदिर केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम से 175 किलोमीटर
दूर पहाड़ियों पर स्थित है। इस मंदिर तक पहुंचने के
लिए 18 पावन सीढ़ियों को पार करना पड़ता है,
 जिनके अलग-अलग अर्थ भी बताए गए हैं।
पहली पांच सीढ़ियों को मनुष्य की पांच इन्द्रियों से जोड़ा जाता है।
 इसके बाद वाली 8 सीढ़ियों को मानवीय भावनाओं से
जोड़ा जाता है। अगली तीन सीढ़ियों को मानवीय गुण और
आखिर दो सीढ़ियों को ज्ञान और
अज्ञान का प्रतीक माना जाता है।
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इसके अलावा यहां आने वाले श्रद्धालु सिर पर
 पोटली रखकर पहुंचते हैं। वह पोटली नैवेद्य
(भगवान को चढ़ाई जानी वाली चीजें, जिन्हें प्रसाद के तौर पर
पुजारी घर ले जाने को देते हैं) से भरी होती है।
यहां मान्यता है कि तुलसी या रुद्राक्ष की माला पहनकर,
व्रत रखकर और सिर पर नैवेद्य रखकर जो भी व्यक्ति आता है
उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं

🚩💐🙏#अय्यप्पा_स्वामी_शरणम_अयप्पा🚩💐🙏
 जय श्री राधे राधे जी जय श्री कृष्णा जय राधा माधव

सोमवार, 7 जनवरी 2019

शनि स्तोत्र


*दशरथ कृत शनि स्तोत्र*

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नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च।
नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ।।१।।
    नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।
    नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते।।२।।
नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ  वै नम:।
नमो दीर्घायशुष्काय कालदष्ट्र नमोऽस्तुते।।३।।
    नमस्ते कोटराक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नम: ।
    नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने।।४।।
नमस्ते सर्वभक्षाय वलीमुखायनमोऽस्तुते।
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करे भयदाय च ।।५।।
    अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तुते ।
    नमो मन्दगते तुभ्यं निरिाणाय नमोऽस्तुते ।।६।।
तपसा दग्धदेहाय नित्यं  योगरताय च ।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ।।७।।
    ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज  सूनवे ।
    तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ।।८।।
देवासुरमनुष्याश्च  सिद्घविद्याधरोरगा: ।
त्वया विलोकिता: सर्वे नाशंयान्ति समूलत:।।९।।
    प्रसाद कुरु  मे  देव  वाराहोऽहमुपागत ।
       एवं स्तुतस्तद  सौरिग्र्रहराजो महाबल: ।।१०।।
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