सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

सबसे बड़ा धन

                सबसे बड़ा धन  


एक गॉव में एक धनी व्यक्ति रहता था. उसके पास पैसे की कोई कमी नहीं थी और उसने दसियों नौकर-चाकर लगा रखे थे.

अपने सारे काम वह नौकरों से ही करवाता था और खुद सारे दिन या तो सोता रहता या अय्याशी करता था. धीरे धीरे वह बिल्कुल निकम्मा हो गया था.

उसे ऐसा लगता था कि वह सबका स्वामी है क्योंकि उसके पास बहुत धन है, और इसलिए उसे खुद कुछ भी करने की क्या जरूरत है. यही सोचकर वह दिन रात बस आराम करता रहता था.

कुछ सालों बाद उसे ऐसा महसूस होने लगा कि जैसे उसका शरीर पहले से शिथिल होता जा रहा है. उसे हाथ पैर हिलाने में भी तकलीफ़ होने लगी. यह देखकर वह व्यक्ति बहुत परेशान हुआ.

उसके पास बहुत पैसा था सो उसने शहर से बड़े- बड़े डॉक्टर बुलाये और खूब पैसा खर्च किया, लेकिन उसका शरीर ठीक नहीं हो पाया. अब तो वह बहुत दुखी रहने लगा.

इसी दौरान एक साधु भटकते-भटकते उस गाँव में आये. उन्होने भी उस धनी व्यक्ति की बीमारी के बारे मे सुना. सो उन्होनें सेठ के नौकर से कहा कि वह उसकी बीमारी का इलाज़ कर सकते हैं.

यह सुनकर नौकर सेठ के पास भागा-भागा गया और साधु के बारे में सब कुछ बताया.

अब सेठ ने तुरंत अपने नौकर से साधु को बुला लाने को कहा लेकिन साधु ने कहला भेजा क़ि वह सेठ के पास नहीं आएँगे. अगर सेठ को ठीक होना है तो वह स्वयं यहाँ अपने पांवों पर चलकर आए.

सेठ को साधु का यह व्यवहार बुरा तो लगा लेकिन चूंकि गरज उसकी थी सो दुखी मन से बड़ा कष्ट उठाते हुए हुए वह साधु के स्थान तक पैदल चल कर गया.

सेठ जब वहाँ पहुंचा तो पता चला कि साधु तो कहीं भ्रमण के लिए निकल गए हैं और सेठ को कल आने की कह कर गए हैं.

मन मार कर वह वापस लौट आया और अगले दिन फिर जैसे-तैसे साधु के स्थान पर पहुंचा.

लेकिन दूसरे दिन भी साधु अपने स्थान पर नहीं मिले. साधु के चेले ने फिर से कल आने को कह दिया.

अब तो रोजाना का यही नियम हो गया. साधु रोज उसे बुलाते लेकिन जब सेठ आता तो वे वहाँ नहीं मिलते.

ऐसे करते करते 3 महीने गुजर गये. अब सेठ को लगने लगा जैसे वह ठीक होता जा रहा है उसके हाथ पैर धीरे धीरे काम करने लगे हैं.

अब सेठ की समझ में सारी बात आ गयी कि साधु महाराज आखिर उससे क्यों नहीं मिलते थे. लगातार 3 महीने चलने से उसका शरीर काफ़ी ठीक हो गया था.

तब आखिर एक दिन जाकर उसकी साधु से मुलाक़ात हुई. उन्होंने कहा – “मेरे पास तुम्हें देने के लिए कोई दवा नहीं है. तुम्हारी दवा केवल चलना-फिरना थी, सो तुम्हें मिल गई.

जीवन में कितना भी धन कमा लो लेकिन स्वस्थ शरीर से बड़ा कोई धन नहीं होता. ये शरीर पैसे से नहीं बल्कि मेहनत से स्वस्थ रहता है.”

धनी व्यक्ति को शारीरिक श्रम की महत्ता पहले ही समझ में चुकी थी. इसके बाद उसने जीवन में कभी आलस्य नहीं 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

शिव नाम महिमा

भगवान् श्रीकृष्ण कहते है ‘महादेव महादेव’ कहनेवाले के पीछे पीछे मै नामश्रवण के लोभ से अत्यन्त डरता हुआ जाता हूं। जो शिव शब्द का उच्चारण करके प्राणों का त्याग करता है, वह कोटि जन्मों के पापों से छूटकर मुक्ति को प्राप्त करता है । शिव शब्द कल्याणवाची है और ‘कल्याण’ शब्द मुक्तिवाचक है, वह मुक्ति भगवन् शंकर से ही प्राप्त होती है, इसलिए वे शिव कहलाते है । धन तथा बान्धवो के नाश हो जानेके कारण शोकसागर मे मग्न हुआ मनुष्य ‘शिव’ शब्द का उच्चारण करके सब प्रकार के कल्याणको प्राप्त करता है । शि का अर्थ है पापोंका नाश करनेवाला और व कहते है मुक्ति देनेवाला। भगवान् शंकर मे ये दोनों गुण है इसीलिये वे शिव कहलाते है । शिव यह मङ्गलमय नाम जिसकी वाणी मे रहता है, उसके करोड़ जन्मों के पाप नष्ट हो जाते है । शि का अर्थ है मङ्गल और व कहते है दाता को, इसलिये जो मङ्गलदाता है वही शिव है । भगवान् शिव विश्वभर के मनुष्योंका सदा ‘शं’ कल्याण करते है और ‘कल्याण’ मोक्ष को कहते है । इसीसे वे शंकर कहलाते है । ब्रह्मादि देवता तथा वेद का उपदेश करनेवाले जो कोई भी संसार मे महान कहलाते हैं उन सब के देव अर्थात् उपास्य होने...

पिशाच भाष्य

पिशाच भाष्य  पिशाच के द्वारा लिखे गए भाष्य को पिशाच भाष्य कहते है , अब यह पिशाच है कौन ? तो यह पिशाच है हनुमानजी तो हनुमानजी कैसे हो गये पिशाच ? जबकि भुत पिशाच निकट नहीं आवे ...तो भीमसेन को जो वरदान दिया था हनुमानजी ने महाभारत के अनुसार और भगवान् राम ही कृष्ण बनकर आए थे तो अर्जुन के ध्वज पर हनुमानजी का चित्र था वहाँ से किलकारी भी मारते थे हनुमानजी कपि ध्वज कहा गया है या नहीं और भगवान् वहां सारथि का काम कर रहे थे तब गीता भगवान् ने सुना दी तो हनुमानजी ने कहा महाराज आपकी कृपा से मैंने भी गीता सुन ली भगवान् ने कहा कहाँ पर बैठकर सुनी तो कहा ऊपर ध्वज पर बैठकर तो वक्ता नीचे श्रोता ऊपर कहा - जा पिशाच हो जा हनुमानजी ने कहा लोग तो मेरा नाम लेकर भुत पिशाच को भगाते है आपने मुझे ही पिशाच होने का शाप दे दिया भगवान् ने कहा - तूने भूल की ऊपर बैठकर गीता सुनी अब इस पर जब तू भाष्य लिखेगा तो पिशाच योनी से मुक्त हो जाएगा तो हमलोगों की परंपरा में जो आठ टिकाए है संस्कृत में उनमे एक पिशाच भाष्य भी है !

श्रीशिव महिम्न: स्तोत्रम्

              __श्रीशिव महिम्न: स्तोत्रम्__ शिव महिम्न: स्तोत्रम शिव भक्तों का एक प्रिय मंत्र है| ४३ क्षन्दो के इस स्तोत्र में शिव के दिव्य स्वरूप एवं उनकी सादगी का वर्णन है| स्तोत्र का सृजन एक अनोखे असाधारण परिपेक्ष में किया गया था तथा शिव को प्रसन्न कर के उनसे क्षमा प्राप्ति की गई थी | कथा कुछ इस प्रकार के है … एक समय में चित्ररथ नाम का राजा था| वो परं शिव भक्त था| उसने एक अद्भुत सुंदर बागा का निर्माण करवाया| जिसमे विभिन्न प्रकार के पुष्प लगे थे| प्रत्येक दिन राजा उन पुष्पों से शिव जी की पूजा करते थे | फिर एक दिन … पुष्पदंत नामक के गन्धर्व उस राजा के उद्यान की तरफ से जा रहा था| उद्यान की सुंदरता ने उसे आकृष्ट कर लिया| मोहित पुष्पदंत ने बाग के पुष्पों को चुरा लिया| अगले दिन चित्ररथ को पूजा हेतु पुष्प प्राप्त नहीं हुए | पर ये तो आरम्भ मात्र था … बाग के सौंदर्य से मुग्ध पुष्पदंत प्रत्यक दिन पुष्प की चोरी करने लगा| इस रहश्य को सुलझाने के राजा के प्रत्येक प्रयास विफल रहे| पुष्पदंत अपने दिव्या शक्तियों के कारण अदृश्य बना रहा | और फिर … राजा च...