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होली मनाने की विधि

होलिका दहन ( होली जलाना )  फाल्गुन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि के दिन किया जाता है। होलिका नामक राक्षसी ने भक्त प्रह्लाद को गोद में लेकर जलाने की कोशिश की थी, किन्तु वह खुद जल गई और प्रह्लाद विष्णु भगवान के भक्त होने के कारण सकुशल बच गए। इसी के प्रतीक के रूप में होली मनाई जाती है तथा होलिका दहन किया जाता है।
होली का त्यौहार दो दिन का होता है। पहले दिन शाम के समय होलिका दहन किया जाता है यानि होली जलाई जाती है । दूसरे दिन सभी लोग एक दूसरे को रंग लगाकर आनंद पूर्वक यह त्यौहार मनाते है। रंग लगाने वाले दिन को धुलंडी – कहा जाता है। इसे धुलेटी और रंगवाली होली के नाम से भी जाना जाता है।
कहते है श्रीकृष्ण भगवान ने जब पूतना नामक राक्षसी का वध किया तो गाँव वालों ने ख़ुशी से रंग , राख और धुल उड़ाये थे। तभी से धुलंडी मनाने की प्रथा शुरू हुई। मथुरा वृद्धावन की होली बहुत प्रसिद्ध है। दूर दूर से लोग इसे देखने आते है। बृज में बरसाने की लट्ठमार होली बहुत रोमांचक होती है। इसमें महिलाएँ लकड़ी से पुरुष को मारती है। पुरुष ढाल से अपना बचाव करते है। पूरा देश होली के रंग में रंग जाता है। रंग के लिए गुलाल , पिचकारी , पानी के गुब्बारे आदि का उपयोग किया जाता है। लोग नाचते है , गाते है। कुछ लोग दूध बादाम आदि से बनी ठंडाई और भांग पीकर मस्ती करते है। इस दिन छोटे-बड़े , अमीर-गरीब का भेदभाव मिटाकर लोग खुशियां मनाते है। एक ही वाक्य सभी की जबान पर होता है –” बुरा न मानो , होली है ”
इस साल धुलंडी 2018   –  ” 2  मार्च  , शुक्रवार ” को है। देश विदेश में यह त्यौहार बहुत लोकप्रिय है। जिस प्रकार कई तरह के रंग आपस में मिल कर एक रंग में रंग जाते है उसी प्रकार मनुष्य  को भी आपस में मिल कर आपसी भेदभाव को भुला कर एक रंग में रंग जाना चाहिए। यही होली के त्यौहार का सन्देश होता है।
होली दहन ( होली जलाने का दिन ) की तारीख़  2018 1 मार्च ,  गुरुवार होलिका दहन शुभमुहूर्त से ही किया जाना श्रेष्ठ होता है। होली का पूजन करने से हर प्रकार के डर पर विजय प्राप्त होती है।
इस पूजन से सुख शांति और समृद्धि प्राप्त होती है। बहने भाई को बुरी शक्तियों से बचाने तथा मंगल कामना में यह पूजा करती हैं। महिलाएँ व्रत रखती है जिसे होली जलने के बाद खोला जाता है।
कहते है कि होलिका नामक राक्षसी को हर प्रकार के डर को मिटाने के उद्देश्य से ही पैदा किया गया था । इसलिए प्रह्लाद के साथ होलिका
दहन से पहले होलिका की भी पूजा की जाती है।
होलाष्टक -
अहकूटा भयत्रस्तैः कृता त्वं होलि बालिशैः ।
अतस्वां पूजयिष्यामि भूति-भूति प्रदायिनीम्‌
वंदितासि सुरेन्द्रेण ब्रम्हणा शंकरेण च ।
अतस्त्वं पाहि माँ देवी! भूति भूतिप्रदा भव ॥
होली से आठ दिन पहले यानि फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से होलाष्टक प्रारम्भ हो जाते हैं। इन दिनों में मे कोई भी शुभ कार्य तथा
मांगलिक कार्य नहीं किये जाते। जैसे ब्याहशादी , गृहप्रवेश , दुकान का उद्घाटन आदि नहीं किया जाता है। कोई नई वस्तु भी नहीं खरीदी
जाती। यह  प्रचलन बहुत समय से चला आ रहा है हालाँकि शास्त्रों के अनुसार इस समय में शुभ कार्य वर्जित नहीं हैं।
 होलाष्टक 2018 की तारीख :
—  23 फरवरी से 1 मार्च
 होली का पूजन –होली पूजने की सामग्री –गोबर से बने बड़कूले , रोली , मौली , अक्षत , अगरबत्ती , फूलमाला ,  कच्चा सूत , गुड़ , साबुत हल्दी , मूंग-चावल  ,  फूले , बताशे , गुलाल ,
नारियल , जल का लोटा , गेहूं की नई हरी बालियां , हरे चने का पौधा आदि।
बड़कूले ( भरभोलिए ) कितने होने चाहिए
होली से दस बारह दिन पहले शुभ दिन देखकर गोबर से सात बड़कूले बनाये जाते है। गोबर से बने बड़कूले  को भरभोलिए भी कहा जाता है। पाँच बड़कूले छेद वाले बनाये जाते है ताकि उनको माला बनाने के लिए पिरोया जा सके।दो बड़कूले बिना छेद वाले बनाये जाते है । इसके बाद गोबर से ही सूरज , चाँद , तारे , और अन्य खिलौने बनाये जाते है। पान , पाटा , चकला ,एक जीभ , होला – होली बनाये जाते है। इन पर आटे , हल्दी , मेहंदी , गुलाल आदि से बिंदियां लगाकर सजाया जाता है। होलिका की आँखें चिरमी या कोड़ी से बनाई जाती है। अंत में ढाल और तलवार बनाये जाते है। बड़कूले से माला बनाई जाती है। माला में होलिका , खिलोंने , तलवार , ढाल आदि भी पिरोये जाते है। एक माला पितरों की , एक हनुमान जी की , एक शीतला  माता की और एक घर के लिए बनाई जाती है। बाजार से तैयार माला भी खरीद सकते है। यह पूजा में काम आती है।
पूजन करने का तरीका
पूजन करते समय आपका मुंह पूर्व या उत्तर दिशा की तरफ होना चाहिए।जल की बूंदों का छिड़काव आसपास तथा पूजा की थाली और खुद पर करें। इसके पश्चात नरसिंह भगवान का स्मरण करते हुए उन्हें रोली , मौली , अक्षत , पुष्प अर्पित करें।
इसी प्रकार भक्त प्रह्लाद को स्मरण करते हुए उन्हें रोली , मौली , अक्षत , पुष्प  अर्पित करें। इसके पश्चात् होलिका को रोली , मौली , चावल अर्पित करें , पुष्प अर्पित करें  , चावल मूंग का भोग लगाएं।  बताशा , फूले आदि चढ़ाएं। हल्दी , मेहंदी , गुलाल , नारियल और बड़कूले चढ़ाएं। हाथ जोड़कर होलिका से सुख समृद्धि की कामना करें। सूत के धागे से होलिका के चारों ओर घूमते हुए तीन , पाँच या सात बार लपेट दें । जल का लोटा वहीं पूरा खाली कर दें। इसके बाद होलीका दहन किया जाता है। पुरुषों के माथे पर तिलक लगाया जाता है। होली जलने पर रोली चावल चढ़ाकर सात बार अर्घ्य देकर सात परिक्रमा करनी चाहिए ।  इसके बाद साथ लाये गए हरे गेहूं और चने होली की अग्नि में भून लें। होली की अग्नि थोड़ी सी अपने साथ घर ले आएं। ये दोनों काम बड़ी सावधानी पूर्वक करने चाहिए। होली की अग्नि से अपने घर में धूप दिखाएँ। भूने हुए गेहूं और चने प्रसाद के रूप में ग्रहण करें। अगले दिन सुबह होली की राख शरीर पर लगाई जाती है। यह राख पवित्र मानी जाती है। इसे लगाने से शरीर और आत्मा की शुद्धि होती है।
ढूंढ पूजना – बच्चे के जन्म के साल ढूंढ पूजी जाती है। यह फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी यानि ग्यारस के दिन पूजी जाती है। यह होली से चार दिन पहले
आता है। कुछ लोग होली वाले दिन ढूंढ पूजते है। बच्चे को गोद में लेकर होली की परिक्रमा लगाई जाती है ताकि वह बुरी नजर आदि से बचा
रहे। ढूंढ का सामान पीहर से या बुआ के घर से आता है। बच्चे की माँ को पीले का बेस , बताशे , फल , मिठाई , फूले , रूपये आदि दिए जाते
है तथा बच्चे को सफ़ेद रंग के कपड़े दिए जाते है। परिवार के सभी सदस्य इकठ्ठा होते है। ढूंढ पूजन के समय माँ पीले का बेस पहन कर बच्चे
को गोद में लेकर बैठती है। नई माँ द्वारा थाली में बताशे , फल , रूपये आदि रखकर रोली चावल लगाकर सासु माँ को दिए जाते है और उनका
आशीर्वाद लिया जाता है। नई माँ और बच्चे को परिवार के सदस्य उपहार आदि देकर सुखद भविष्य की कामना करते है।

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