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मकर संक्रांति के दिन ही भीष्म पितामह ने त्यागे थे अपने प्राण, इसके पीछे है एक विशेष कारण

महाभारत के अजेय योद्धा भीष्म पितामह के बिना महाभारत की कल्पना करना निरर्थक है। भीष्म पितामह का आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत, महाभारत में हुई कई घटनाओं का ऐसा कारक बना, जो अंत में अन्य किरदारों को रणभूमि कुरुक्षेत्र तक ले आया।

भीष्म ने अपने पिता भरतवंशी राजा शांतनु के खातिर सांसारिक जीवन के सभी सुखों और सिंहासन का बलिदान कर दिया। उनके पिता शांतनु एक लड़की से विवाह करना चाहते थे लेकिन उस लड़की के पिता ने शर्त रखी कि ‘यदि मेरी कन्या से उत्पन्न संतान ही आपके राज्य की उत्तराधिकारी हो तो मैं इसका विवाह आपके साथ करने को तैयार हूं।’
यह सुनकर राजा शांतनु ने इंकार कर दिया, क्योंकि वह पहले ही भीष्म को युवराज बना चुके थे। इस घटना के बाद राजा शांतनु चुप से रहने लगे। जब भीष्म को इस पूरी घटना के बारे में पता चला तो उन्होंने सबके सामने अखण्ड ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ली।

अपने बेटे के इस भीषण प्रतिज्ञा से प्रभावित होकर राजा शांतनु ने भीष्म को ‘इच्छामृत्यु’ का वरदान दिया।

हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार, मकर संक्रांति मोक्षदायी पर्व है। ऐसा कहा जाता है कि कुरुक्षेत्र की लड़ाई में अर्जुन के बाणों से घायल होकर पितामह भीष्म शैया पर पड़े थे और वह अपने प्राण त्यागना चाहते थे लेकिन उस समय सूर्य दक्षिणायण था और मान्यता के अनुसार सूर्य के दक्षिणायण होने की स्थिति में मृत्यु होने पर मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती, बल्कि पुनर्जन्म होता है। इसलिए भीष्म ने अपने तप के बल पर सूर्य के उत्तरायण होने तक प्राण नहीं त्यागे। जैसे ही सूर्य उत्तरायण में प्रवेश किया, उन्होंने अपनी इच्छा मृत्यु प्राप्त की।
भारतीय ज्योतिष के अनुसार, मकर संक्रांति पर्व पर सूर्य दक्षिणायण से उत्तरायण में प्रवेश करता है।

भगवान कृष्ण ने गीता के आठवें अध्याय में कहा है कि जिस किसी की उत्तरायण के दौरान मृत्यु होती है वह मोक्ष प्राप्त करता है। लेकिन जिनकी मृत्यु दक्षिणायण में होती है, वह जीवन चक्र से बंधा रहता है।

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