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ऋषियों मुनियों महात्माओं के उपहार कैसे होते हैं

प्रसङ्ग है कि महर्षि वाल्मीकि 'श्रीमद्रामायणम्' महाकाव्य की रचना के उपरान्त इसे श्रीकुश-लव मुनिकुमारों को सम्यक् रूप से पढ़ाते हैं ।

तदुपरान्त एक बार श्रीकुशलव इस महाकाव्य का भावितात्मा ऋषि-मुनियों, अमलात्माओं-परमहंसों की सभा में गायन करते हैं ।

इस कथा को सुनकर वह निष्किञ्चन महात्मागण परमविस्मयापन्न अवस्था में प्रेमाश्रुपूरित नेत्रों से, गद्गद कण्ठ से साधु-साधु कह उठते हैं । एवं प्रसन्न हृदय से उनकी प्रशंसा करते हैं ।

तत् श्रुत्वा मुनयः सर्वे बाष्प पर्याकुलेक्षणाः || १-४-१५
साधु साध्विति ता ऊचुः परम् विस्मयम् आगताः |
ते प्रीत मनसः सर्वे मुनयो धर्म वत्सलाः || १-४-१६
प्रशशंसुः प्रशस्तव्यौ गायमानौ कुशी लवौ |
अहो गीतस्य माधुर्यम् श्लोकानाम् च विशेषतः || १-४-१७
चिरनिर्वृत्तम् अपि एतत् प्रत्यक्षम् इव दर्शितम् |

आनन्द परिपूर्ण चित्त वाले वह महात्मागण श्रीकुशलव को उपहारस्वरूप कुछ न कुछ अर्पण करते हैं ।

प्रीतः कश्चिन् मुनिः ताभ्याम् संस्थितः कलशम् ददौ || १-४-२०
प्रसन्नो वल्कलम् कश्चिद् ददौ ताभ्याम् महायशाः |
अन्यः कृष्णाजिनम् अदद् यज्ञ सूत्रम् तथा अपरः || १-४-२१
कश्चित् कमण्डलुम् प्रदान् मौञ्जीम् अन्यो महामुनिः |
ब्रुसीमन्यः तदा प्रादत् कौपीनम् अपरो मुनिः || १-४-२२
ताभ्याम् ददौ तदा हृष्टः कुठारम् अपरो मुनिः |
काषायम् अपरो वस्त्रम् चीरम् अन्यो ददौ मुनिः || १-४-२३
जटाबन्धनम् अन्यः तु काष्ठ रज्जुम् मुदान्वितः |
यज्ञ भाण्डम् ऋषिः कश्चित् काष्ठभारम् तथा परः || १-४-२४
औदुम्बरीम् ब्रुसीम् अन्यः ....

यहाँ ऋषियों मुनियों महात्माओं के उपहार कैसे होते हैं यह देखिए:-

१. कलश
२. वल्कलवस्त्र
३. कृष्णमृगचर्म
४. यज्ञसूत्र
५. कमण्डलु
६. मौञ्जी
७. कौपीन (अन्तःवस्त्र)
८. कुठार (समिधा लकडी काटने के लिए कुल्हाडी)
९. काषायवस्त्र
१०. चीर
११. जटाबन्धन
१२. काष्ठरज्जु (लकडियाँ बाँधने की रस्सी)
१३. यज्ञादि में उपयोग में आने वाला पात्र/बर्तन
१४. काष्ठभार - समिधा की लकडियाँ
१५. औदुम्बरी - वृक्षविशेष की लकडी

भाव यह है कि प्रत्येक महात्मा ने जो कुछ भी सामग्री उनके पास थी वह भेंट में श्रीकुशलव को दी । इससे यह पता चलता है कि प्राचीनकाल में महात्मागण कितने निष्किञ्चन होते थे । कपडे लत्ते, कुछ यज्ञपात्र, लकडियाँ, कुठार, अन्तःवस्त्र इत्यादि ही उनकी सम्पत्ति थे! आजकल के 5-स्टार बाबाओं को विशेष ध्यातव्य है....

अस्तु अब आते हैं कथ्य विषय पर । वहाँ कुछ ऐसे भी अमलात्मा परमहंस कथा-श्रवण हेतु आए थे जिनके तन ढकने को भी वस्त्र न था कि वह भेंटस्वरूप उसे लव-कुश को देते । अतः उन्होंने आशीर्वचन ही भेंट रूप में प्रदान किए:-

... स्वस्ति केचित् तदा अवदन् |
आयुष्यम् अपरे प्राहुर् मुदा तत्र महर्षयः || १-४-२५
ददुः च एवम् वरान् सर्वे मुनयः सत्यवादिनः |

समझ तो गये होंगे आप कि यह महात्मा कौन हैं ? जी हाँ , सही पहचाना आपने । वहाँ लव-कुश के मुखारविन्द से श्रीमद्रामायणम् कथा श्रवण हेतु पधारे थे श्रीशुकदेव परमहंस, श्री सनक-सनन्दन-सनातन-सनत्कुमार सरीखे परमहंस । इन महात्माओं ने भी श्रीकुशलव के मुखारविन्द से निःसृत श्रीमद्रामायणी कथा गङ्गा में अवगाहन किया ।

अतः श्रीमद्वाल्मीकि रामायणम् कथा के प्रथम गायक है श्रीरघुनाथजी के आत्मज श्रीकुशलव जी महाराज और श्रोता हैं श्री सनकादि, शुकदेवजी सहित सभी भावितात्मा ऋषि, मुनि तपस्वी महात्मागण ।

जिस कथा के ऐसे वक्ता और श्रोता हों उसके विषय में ही यह कहा जा सकता है - परं कवीनाम् आधारम् ।

।। श्रीसीताराम ।।

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