सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कामविकार

श्री आद्य शंकराचार्य कहते हैं -

आयु ढलने पर कामविकार कैसा ? जल सूखने पर जलाशय क्या ? तथा धन नष्ट होने पर परिवार ही क्या ? इसी प्रकार,  तत्त्वज्ञान होने पर संसार ही कहॉ रह सकता है ।
 अतः अरे मूढ !  तू सदा गोविन्द के  ही भजन में लग, (क्योंकि मृत्यु आ जाने पर फिर  अभ्यास रक्षा नहीं करेगा ) ।

वयसि गते  कः कामविकारः,  शुष्के नीरे कः कासारः ।
नष्टे द्रव्ये कः परिवारः,  ज्ञाते तत्त्वे कः संसार ।।

भज गोविन्दं भज गोविन्दं गोविन्दं भज मूढमते ।।

~~~~~~~~~~~~

जिसने जीवन भर  जैसा स्वयं को बनाया है , मृत्युकाल में वह  वैसा ही  हो  कर रह जाता है ,

उत्तराखण्ड   में एक प्रेरणा कथा प्रचलित है ।  कहा जाता है एक बार एक व्यक्ति मरने लगा , तो लोगों ने  मन में सोचा कि इसने जीवन भर तो भगवान् का नामलिया नहीं , तो क्यों न अन्त में ही इसके मुख से  हरि नाम निकलवाया जाये ,   बहुत प्रयास किया नातेदारों ने हरिनाम मुख से निकलवाने का  , पर वह बोल नहीं पाया ,

पहाड़ में ठंडे हिमालयी  प्रदेशों में  ककड़ी बहुत प्रसिद्ध आहार रहती है । वो पहले  हरी रहती है , फिर पीली फिर भूरी हो जाती है । 

उसको हरी ककड़ी बहुत पसन्द थी , जिसे पहाड़ों  में हरिया ककडी  कहते हैं, क्योंकि उसमें स्वादिष्ट रस रहता है , पक कर भूरी हो जाने पर  बाद में खट्टापन आ जाता है  ।   तो लोगों ने सोचा क्यों न इससे  हरिया ककड़ी  का ही नाम   निकलवा लिया जाये , तो कम इस बहाने तो  हरि शब्द  आ जायेगा ।

तो उससे पूछा कि दादा ! ककड़ी खाओगे ?  तो वो बोला हॉ !पूछा कौन सी ?  तो हरिया न कह कर उसके मुखसे निकला  भूरी  ककड़ी  और  प्राण छूट गए  ।

इसलिए जो सोचते हैं  कि जीवन के  अन्त में  भगवत्प्रपन्न बनेंगे  ,   अन्त में  तो चाह कर भी नहीं  हो  सकेगा  !

शंका -  अजामिल ने अन्त में नारायण कहा ।

समाधान -  अजामिल की पत्नी को अजामिल के अन्त के  कल्याण हेतु विशेष  सन्त- वरदान सन्तान के रूप में प्राप्त हुआ था । उसी के बल से नामोच्चार हो सका था ,  जिसके फलस्वरूप वह पुनः भगवत् साधना कर पाया ।

शंका - खटवाङ्ग नामक राजा ने अन्त की दो घड़ी में आत्मकल्याण किया ।

 समाधान - खटवाङ्ग नामक राजा के सम्बन्ध में भी ध्यातव्य  है कि , पूरे जीवन स्वधर्म पालन किया था , युद्ध धर्मपालन करते हुए आजीवन उन्होंने  देवताओं की सेवा की थी ।

इसलिये भगवान् शंकर कहते हैं , बालक तो खेलकूद में आसक्त रहता है ,तरुण स्त्री में आसक्त है और वृद्ध भी नाना प्रकार की चिन्ताओं  में मग्न रहता है , परब्रह्म में तो कोई संलग्न नहीं होता ।

अतः अरे मूढ !  तू सदा गोविन्द के  ही भजन में लग, (क्योंकि मृत्यु आ जाने पर फिर  अभ्यास रक्षा नहीं करेगा ) ।

बालस्तावत् क्रीडासक्तस्तरुणस्तावत् तरुणीरक्तः ।
वृद्धस्तावच्चिन्तामग्नः  पारे ब्रह्मणि कोsपि न लग्नः ।।

भज गोविन्दं भज गोविन्दं गोविन्दं भज मूढमते ।।

।। जय  श्री राम ।।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

शिव नाम महिमा

भगवान् श्रीकृष्ण कहते है ‘महादेव महादेव’ कहनेवाले के पीछे पीछे मै नामश्रवण के लोभ से अत्यन्त डरता हुआ जाता हूं। जो शिव शब्द का उच्चारण करके प्राणों का त्याग करता है, वह कोटि जन्मों के पापों से छूटकर मुक्ति को प्राप्त करता है । शिव शब्द कल्याणवाची है और ‘कल्याण’ शब्द मुक्तिवाचक है, वह मुक्ति भगवन् शंकर से ही प्राप्त होती है, इसलिए वे शिव कहलाते है । धन तथा बान्धवो के नाश हो जानेके कारण शोकसागर मे मग्न हुआ मनुष्य ‘शिव’ शब्द का उच्चारण करके सब प्रकार के कल्याणको प्राप्त करता है । शि का अर्थ है पापोंका नाश करनेवाला और व कहते है मुक्ति देनेवाला। भगवान् शंकर मे ये दोनों गुण है इसीलिये वे शिव कहलाते है । शिव यह मङ्गलमय नाम जिसकी वाणी मे रहता है, उसके करोड़ जन्मों के पाप नष्ट हो जाते है । शि का अर्थ है मङ्गल और व कहते है दाता को, इसलिये जो मङ्गलदाता है वही शिव है । भगवान् शिव विश्वभर के मनुष्योंका सदा ‘शं’ कल्याण करते है और ‘कल्याण’ मोक्ष को कहते है । इसीसे वे शंकर कहलाते है । ब्रह्मादि देवता तथा वेद का उपदेश करनेवाले जो कोई भी संसार मे महान कहलाते हैं उन सब के देव अर्थात् उपास्य होने...

पिशाच भाष्य

पिशाच भाष्य  पिशाच के द्वारा लिखे गए भाष्य को पिशाच भाष्य कहते है , अब यह पिशाच है कौन ? तो यह पिशाच है हनुमानजी तो हनुमानजी कैसे हो गये पिशाच ? जबकि भुत पिशाच निकट नहीं आवे ...तो भीमसेन को जो वरदान दिया था हनुमानजी ने महाभारत के अनुसार और भगवान् राम ही कृष्ण बनकर आए थे तो अर्जुन के ध्वज पर हनुमानजी का चित्र था वहाँ से किलकारी भी मारते थे हनुमानजी कपि ध्वज कहा गया है या नहीं और भगवान् वहां सारथि का काम कर रहे थे तब गीता भगवान् ने सुना दी तो हनुमानजी ने कहा महाराज आपकी कृपा से मैंने भी गीता सुन ली भगवान् ने कहा कहाँ पर बैठकर सुनी तो कहा ऊपर ध्वज पर बैठकर तो वक्ता नीचे श्रोता ऊपर कहा - जा पिशाच हो जा हनुमानजी ने कहा लोग तो मेरा नाम लेकर भुत पिशाच को भगाते है आपने मुझे ही पिशाच होने का शाप दे दिया भगवान् ने कहा - तूने भूल की ऊपर बैठकर गीता सुनी अब इस पर जब तू भाष्य लिखेगा तो पिशाच योनी से मुक्त हो जाएगा तो हमलोगों की परंपरा में जो आठ टिकाए है संस्कृत में उनमे एक पिशाच भाष्य भी है !

श्रीशिव महिम्न: स्तोत्रम्

              __श्रीशिव महिम्न: स्तोत्रम्__ शिव महिम्न: स्तोत्रम शिव भक्तों का एक प्रिय मंत्र है| ४३ क्षन्दो के इस स्तोत्र में शिव के दिव्य स्वरूप एवं उनकी सादगी का वर्णन है| स्तोत्र का सृजन एक अनोखे असाधारण परिपेक्ष में किया गया था तथा शिव को प्रसन्न कर के उनसे क्षमा प्राप्ति की गई थी | कथा कुछ इस प्रकार के है … एक समय में चित्ररथ नाम का राजा था| वो परं शिव भक्त था| उसने एक अद्भुत सुंदर बागा का निर्माण करवाया| जिसमे विभिन्न प्रकार के पुष्प लगे थे| प्रत्येक दिन राजा उन पुष्पों से शिव जी की पूजा करते थे | फिर एक दिन … पुष्पदंत नामक के गन्धर्व उस राजा के उद्यान की तरफ से जा रहा था| उद्यान की सुंदरता ने उसे आकृष्ट कर लिया| मोहित पुष्पदंत ने बाग के पुष्पों को चुरा लिया| अगले दिन चित्ररथ को पूजा हेतु पुष्प प्राप्त नहीं हुए | पर ये तो आरम्भ मात्र था … बाग के सौंदर्य से मुग्ध पुष्पदंत प्रत्यक दिन पुष्प की चोरी करने लगा| इस रहश्य को सुलझाने के राजा के प्रत्येक प्रयास विफल रहे| पुष्पदंत अपने दिव्या शक्तियों के कारण अदृश्य बना रहा | और फिर … राजा च...