रविवार, 31 दिसंबर 2017

मासिकधर्म के विधि- विधान :


मासिक धर्म (माहवारी/पीरियड) के काल में जीर्ण-शीर्ण ( फटे- पुराने)  वस्त्र पहन कर  गोशाला में एकान्तवास करना - ये हिन्दू धर्म की महिलाओं का पिछड़ापन नहीं वरन् गौरव है , क्योंकि ऐसा करके वह त्रिरात्रव्रत का पालन करती हैं और फिर  चौथे दिन आप्लवन  स्नान करके   बिना फटे हुए शोभित नूतन वस्त्र  पहनती हैं ।

इस विशेष व्रत के पालनकाल में स्त्री ना ही अलंकरण करती है , ना ही स्नान करती है , ना ही दिन में सोती है , ना ही दन्तधावन करती है , ना ही ग्रहादि का निरीक्षण करती है , ना हंसती है , ना ही कुछ आचरण करती है , ना ही अंजलि से जल पीती है  ना ही लोहे या कॉसे  के पात्र में भोजन करती है । वह सनातनधर्मिणी नारी   गोशाला में  भूमि पर शयन कर इस महान् व्रत को सम्यक्  परिपालन कर आत्मसंयम का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत कर  आत्मशोधन  करती हुई  देवताओं को आनन्दित करती है ।

पाश्चात्यमुखी,  धर्ममूढ़,  अज्ञानी असुरों व विधर्मियों ने   हिन्दू महिलाओं के इस महान् व्रत को  हिन्दुओं का पिछड़ापन बताकर   हिन्दू मर्यादाओं  को तहस नहस करने का भारी प्रयास किया और कर रहे हैं ।

 वस्तुतः स्त्रियों के  रजस्वला होने से पूर्वकाल में देवराज इन्द्र की विभाजित ब्रह्महत्या का इतिहास जुड़ा है ,  हिन्दू धर्म के विद्वान् मनीषी जानते हैं कि  उस दैवीय  विभाजन का ही एक भाग  स्त्रीजाति को भी प्राप्त हुआ था  , इस व्रत से उसी  ब्रह्महत्या-दोष का उपशमन होता है ।

प्राणी_स्वकृत_कर्म_का_ही_भोग_करता_है - इस दार्शनिक  सिद्धान्त  से स्पष्ट है कि  वस्तुतः रजोधर्मप्रधान स्त्री देह के माध्यम से जीव वस्तुतः अपने ही पूर्वकृत  ब्रह्महनन दोष का ही  उपशमन करता है । इसीलिये गीतोक्त  पापयोनयः विशेषण  का भाष्य  पापजन्मानः भगवान् भाष्यकार ने किया है ।

मात्र ब्राह्मण की हत्या ही  ब्रह्महत्या नहीं होती वरन् ब्राह्मण का अपमान भी ब्रह्महत्या ही होती है,  क्योंकि श्रेष्ठ पुरुषों का अपमान उन पर मृत्युदण्ड प्रहार ही होता है ।   इसीप्रकार,  शास्त्र का विकृतिकरण भी ब्रह्महत्या ही है । अतः सदैव  शास्त्रवचनों का अनर्थ , उनमें मनमानी व  कुतर्कों  के महान् पाप करने से बचना चाहिये ।

जो स्त्री रजस्वलावस्था में त्रिरात्रव्रत रूप धर्म का परिपालन नहीं करती , वह मृत्यु के अनन्तर नरकगामिनी होती है क्योंकि अनुपशमित पाप अंकुरित बीज की भॉति बढता हुआ दुख रूप महान् फलों को पैदा करता है । हमारे महान्  क्रान्तदर्शी तपोनिष्ठ ऋषि-मुनिजन   ये सनातन  रहस्य जानते थे , इसीलिये उन्होंने  इसका आचार -प्रचार किया था ।

 वेदों के ये विधि- निषेध  मानव के  ही कल्याण के साधन होते हैं , किन्तु घोर  अज्ञान में डूबे होने व  घोर कुसंगति  के कारण उन  दुर्भागी  मानवों  को  ये  वैदिक विधान बोझ लगते हैं, जिनको धर्मपालन, ईश्वरभक्ति   व आत्मकल्याण से कोई लेना -देना नहीं ,केवल पशुओं  की तरह अन्धभोगमय जीवन यापन कर चौरासीलाख योनियों के चक्रव्यूह  में ही भटकते जाना है ।

।। जय श्री राम  ।।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

If u have any query let me know.

पितृपक्ष में परान्न से बचें

 गरुड़ पुराणोक्त पितृपक्ष परान्न निषेध कथा सनातन धर्म में 16 दिनों का पितृपक्ष वर्ष का सबसे सूक्ष्म और संवेदनशील समय माना गया है। गरुड़ पुरा...