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मोहिनी रुप का संकेत

समुद्रमंथन के बाद अमृत निकला , श्रीनारायण मोहिनी का रुप धारण कर जब अमृत देवताओ को बाँटना प्रारम्भ किया तभी राहु सूर्य और चन्द्र के मध्य छलपूर्वक आकर बैठा गया जिसे प्रभू ने जान लिया किन्तु पंक्तिभेद न हो इसलिए राहु को भी अमृत पिला दिया । कभी भी पंक्ति भेद नहीँ करना चाहिए । क्योँकि पक्तिभेद से संग्रहिणी रोग होता है ।
जब इन्द्रादि देवोँ को अमृत मिल रहा था तब राहु नहीँ आया किन्तु जब सूर्य - चन्द्र को अमृत मिल रहा था तो वहाँ राहू आ पहुँचा । मन का स्वामी चन्द्र है । मन चन्द्र का स्वरुप है । बुद्धि का स्वामी सूर्य है । सूर्य बुद्धि का स्वरुप है ।
जब तक हाथोँ से , जीभ से मनुष्य भक्ति करता है तब तक विषयरुपी राहू बाधा डालने नहीँ आता किन्तु जब मनुष्य मन से बुद्धि से ईश्वर का ध्यान करने लगता है तो विषयरुपी राहू बाधा डालने आ जाता है । मन बुद्धि को ईश्वर मेँ लगाया नही कि विषय रुपी राहू बाधक बनकर आया समझो ।
जब मन , बुद्धि को भक्तिरुपी अमृत मिलने लगता है तो विषयरुपी राहू से देखा नहीँ जा सकता और वह विघ्न डालने आ जाता है ।
नारायण ने राहू के सिर को सुदर्शन चक्र चलाकर उड़ा दिया । अर्थात सुदर्शन चक्र - ज्ञानरुपी सुदर्शन चक्र से विषयराहू का नाश किया जाय किन्तु मात्र ज्ञान और बुद्धि से विषय राहु मरता नहीँ । ज्ञान और बुद्धि का अधिक विश्वास भी नहीँ करना चाहिए। अकेले ज्ञान से कुछ भी नहीँ हो सकता क्योँकि वैसे तो राहु अमर है । जब तक किसी सच्चे संत की कृपा नहीँ मिल पाती विषय राहु नहीँ मरता ।
मात्र ज्ञान से विषयोँ का नाश नहीँ हो पाता । ईश्वर के अनुग्रह से ही मन निर्विषयी होता है । भगवान की कृपा के बिना मन निर्विषयी नहीँ हो सकता । ज्ञान का आश्रय लेकर भी अति दीन बनने पर ही परमात्मा कृपा करके विषय राहु को मारेँगे । मात्र ज्ञान से ही निर्विषयता नही हो पाती । ईश्वर की कृपा से निर्विषयता आती है >
"रसवर्जँ रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ।"
परमात्मा की कृपा और साक्षात्कार से ही विषयासक्ति और विषयानुरागिता मेँ से मन निवृत्त हो पाता है । दैत्य भगवान से विमुख थे अतः उन्हेँ अमृत नही मिला । क्योकि वे मोहिनी के चक्कर मे फँस गये थे । संसार भी मोहिनी स्वरुप है , इसमेँ फँस जाने पर भक्तिरुपी अमृत कभी भी नही मिलेगा ।।।

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